The Token System – Chapter 1027
"चल फिर।" बंसी ने कहा।
हम गली से बाहर निकले। छड़ी वाले अब भी वहीं खड़े थे, पर उन्होंने रोका नहीं। मुझे लगा बंसी की रसीद ने उनके हाथ बाँध दिए थे।
रास्ते में मैंने टोकन को मुट्ठी में दबाया। वो ठंडा था। मैंने सोचा — अब क्या होगा।
हवेली पहुँचकर मैंने आँगन में दीया जलाया। राजेंद्र वहीं था।
मैंने उसे काग़ज़ दिखाया। राजेंद्र ने पढ़ा और उसका चेहरा सख़्त हो गया।
"पापा के दस्तख़त?" उसने कहा।
"और भवानी के भी।"
राजेंद्र ने काग़ज़ मेज़ पर रखा। "मन्नू। ये दस्तख़त अगर अदालत में गए, तो पापा पर भी इल्ज़ाम आएगा।"
"मुझे पता है।"
"तो?"
"तो हम इसे कल अदालत में देंगे।" मैंने कहा। "और पापा से पहले पूछेंगे।"
राजेंद्र ने मेरी तरफ़ देखा। "पापा कहाँ हैं?"
मैंने बाहर देखा। रात गहरी थी। "नहीं पता।"
सुमन ने काग़ज़ की गठरी मेज़ पर रखी और अपने सिर पर पट्टी बाँधी।
"एक बात।" उसने कहा। "स्टोर में जो लिफ़ाफ़ा था, उस पर पापा का नाम था। अगर वो अभी भी वहाँ है, तो कल सुबह सबसे पहले उसे लाना होगा।"
"मैं लाऊँगा।" मैंने कहा।
"साथ में मैं चलूँगी।"
"तुम घायल हो।"
"खोपड़ी फटी नहीं है।" सुमन ने कहा।
मैंने सिर हिलाया।
रात को मैं आँगन में लेटा। ऊपर तारे दिख रहे थे। मैंने टोकन जेब से निकाला। हाथ में रखा। ठंडा था। सपाट।
"बोल।" मैंने धीरे कहा।
कुछ नहीं।
मैंने उसे करवट पर रखा। फिर बंद मुट्ठी में। कोई लकीर नहीं उभरी। कोई शब्द नहीं।
मेरी आँख लग गई।
सुबह मुझे किसी के आने की आहट से नींद खुली। आँगन के फाटक पर कोई खड़ा था। मैं उठा।
वो शेखर बाबू थे। उनके हाथ में एक लिफ़ाफ़ा था।
"मन्नू।" उन्होंने कहा। "मैंने स्टोर से लिफ़ाफ़ा निकाल लिया। पर उसे खोला नहीं।"
मैंने लिफ़ाफ़ा लिया। ऊपर पापा का नाम था — किशनचंद — और नीचे एक लाइन।
"मन्नू।" शेखर बाबू ने कहा। "ये लिफ़ाफ़ा तेरे पापा ने मेरे हवाले किया था — दो महीने पहले। जिस दिन उन्होंने वो काग़ज़ भवानी को दिया थो।"
मैंने लिफ़ाफ़ा पलटा। कोई मोहर नहीं। कोई सील नहीं।
"क्यों नहीं खोला?"
शेखर बाबू ने अपना चश्मा पोंछा। "क्योंकि उन्होंने कहा था — 'जिस दिन मन्नू स्टोर तक पहुँच जाए, उस दिन देना।'"
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला।
अंदर एक काग़ज़ था — पापा की लिखाई में। और साथ में एक पीतल की चाबी।
काग़ज़ पर सिर्फ़ एक लाइन थी —
"बेटा, मुझे माफ़ कर देना। पर हिसाब अब तेरे हाथ में है। चाबी से वो तिजोरी खोलना, जो हवेली के नीचे है। और हाँ — भवानी का असली दस्तख़त मेरे पास नहीं था, मैंने उससे ज़बरदस्ती लिए थे।"
मैंने काग़ज़ मोड़ा और शेखर बाबू की तरफ़ देखा।
"वो तिजोरी?" मैंने पूछा।
शेखर बाबू ने सिर हिलाया। "हवेली के नींव वाले कमरे में। जो अभी तक खुली नहीं।"
मैंने चाबी मुट्ठी में दबाई।
॥
टोकन मेरी मुट्ठी में ठंडा था — पर वो ठंडक पहले जैसी नहीं थी। जैसे किसी ने उसे आग में पकड़कर बुझा दिया हो और किनारे जल गए हों। मैंने उँगली से किनारा सहलाया तो हाथ में कालिख लगी।
मैंने एक कदम बढ़ाया और सामने से आवाज़ आई।
"इन्हें छोड़ो! तुम्हारे हाथ में कुछ नहीं!"
सुमन। गली के मोड़ पर। उसकी आवाज़ में वो तल्ख़ी थी जो ड्यूटी में आती है।
मैं दौड़ा। टोकन जेब में डाला। सुमन की सफ़ेद कोट गली की दीवार से चिपकी थी, सामने दो आदमी खड़े थे — एक ने स्टोर का खाली डिब्बा उठा रखा था, दूसरे के हाथ में लोहे की छड़ थी।
"अबे, सफ़ेद कोट पहनकर भी समझती नहीं।" छड़ वाले ने कहा।
मैंने पीछे से उसका कंधा पकड़ा और घुमाया। वो लड़खड़ाया। बंसी भी आ गया — हाँफता हुआ।
"अरे, दो-दो जने लड़की पर?" बंसी ने कहा। "शर्म आती है?"
छड़ वाले ने देखा — हम तीन हैं। उसने डिब्बा पटक दिया और दोनों पीछे की तरफ़ भागे। गली के कोने पर एक सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी, दोनों उसमें चढ़े और गाड़ी निकल गई।
सुमन ने कलाई सहली। खरोंच थी।
"शीशी?" मैंने पूछा।
"मेरे पास।" उसने जेब से निकाली। "ये लोग डिब्बे ढूँढ रहे थे। दवा नहीं।"
"कौन से डिब्बे?"
"खाली डिब्बे। जिन पर मेरा नाम लिखा है।" उसने मुझे देखा। "लगता है किसी को पता चल गया कि मैंने स्टोर खोल दिया।"
बंसी ने गली के कोने पर देखा। "गाड़ी पर नंबर नहीं था।"
"हमेशा की तरह।" मैंने कहा।
अस्पताल पहुँचते-पहुँचते सुबह की पहली किरण इमरजेंसी के शीशे पर पड़ रही थी। गेट पर राजेंद्र खड़ा था। उसने हमें देखा और सीधा मेरी तरफ़ आया।
"मन्नू। तुम्हारा फ़ोन बंद था।"
"जेब में था।" मैंने जेब टटोली। "बैटरी…"
"माँ ने पाँच बार फ़ोन किया।" राजेंद्र ने कहा। "अमर की तबीयत रात में बिगड़ी थी।"
मैं सीधा इमरजेंसी में घुसा। अमर की चारपाई के पास लक्ष्मी खड़ी थी। उसके हाथ में दवा की शीशी थी — मेरी जेब वाली नहीं, अस्पताल की।
"बच गया।" लक्ष्मी ने कहा। "पर पता नहीं कैसे। साँस रुकने लगी थी।"
मैंने चारपाई के पास जाकर देखा। अमर की आँखें आधी खुली थीं। उसके होंठ हिल रहे थे।
"क्या कह रहा है?" मैंने पूछा।
लक्ष्मी ने सिर हिलाया। "यही। बार-बार। एक ही नाम।"
"कौन सा?"
"कौशल्या।"
मैंने पीछे मुड़कर सुमन को देखा। उसकी आँखें बड़ी हो गईं।
"कौशल्या?" सुमन ने कहा। "वो नाम कल अदालत में आने वाला है।"
"मुझे पता है।" मैंने कहा।
"तो वो ये नाम क्यों ले रहा है?"
मैंने अमर के चेहरे की तरफ़ देखा। उसकी उँगलियाँ चादर पर हिल रही थीं — जैसे कुछ लिख रहा हो।
"अमर।" मैंने धीरे कहा। "अमर, मैं मन्नू हूँ।"
उसकी आँखें खुलीं। उसने मुझे देखा। फिर होंठ हिले।
"दादा…" उसने फुसफुसाया। "दादा ने… कहा…"
"किसने? कौशल्या ने?"
"नहीं।" उसने साँस ली। "कौशल्या… नहीं है। कौशल्या… खाता है।"
मैं स्तब्ध रह गया।
"क्या?"
"दादा ने कहा…" अमर की आवाज़ टूट रही थी। "चौथा… खाता… मेरे पास… नहीं…"
लक्ष्मी ने मेरी बाँह पकड़ी। "इसे आराम करने दो। अभी बोलने से…"
"एक मिनट।" मैंने कहा।
पर अमर की आँखें फिर बंद हो गईं।
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। "ये क्या कह रहा था?"
"समझ नहीं आया।" मैंने कहा।
पर मैं झूठ बोल रहा था। समझ आ गया था। माँ ने भी यही कहा था — कौशल्या एक औरत नहीं, एक खाता है। अमर भी वही कह रहा था। पर उसका "दादा" कौन है?
राजेंद्र ने मेरा कंधा पकड़ा और बाहर खींचा।
"बाहर आओ।"
गलियारे में वो मेरे सामने खड़ा हुआ।
"मन्नू। मैंने काग़ज़ देखे। पापा के दस्तख़त हैं उन पर।"
"मुझे पता है।"
"तो तुम क्या करने वाले हो? कल अदालत में दे दोगे? चारों तरफ़ से पापा पर इल्ज़ाम आ जाएगा। भवानी का वकील तो यही चाहता है।"
मैंने पापा का लिफ़ाफ़ा जेब से निकाला। वो चाबी — पीतल, छोटी, तीन दाँते।
"पापा ने खुद लिखा है कि दस्तख़त उन्होंने ज़बरदस्ती लिए थे।"
"लिखा है, पर साबित कैसे होगा?"
"चाबी से।" मैंने कहा। "हवेली के नीचे की तिजोरी में।"
राजेंद्र ने चाबी देखी। "तो खोलो।"
"आज।"
सुमन पीछे से आई। "मैं साथ चलूँगी।"
"तुम घायल हो।"
"खरोंच है।" उसने कलाई दिखाई। "और स्टोर का काग़ज़ मेरे पास है। उसे मिलाकर देखना होगा।"
मैंने सिर हिलाया। "पहले माँ को फ़ोन।"
घर पहुँचा तो माँ चूल्हे के पास बैठी थी। उसने मुझे देखा और चाय का कप बढ़ा दिया। बिना पूछे।
"माँ, तुमने फ़ोन किया था?"
"अमर के लिए।" उसने कहा। "लक्ष्मी ने बताया था।"
"तुम्हें कैसे पता लक्ष्मी है?"
माँ ने चाय घूँट भरी। "मैं अस्पताल गई थी। रात में। तू नहीं था।"
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