The Token System1026 / 1154

The Token System – Chapter 1026

7 min read November 6, 2026

"स्टोर में?"

"स्टोर में।" सुमन ने कहा। "तुम लोग यहाँ क्या कर रहे हो?"

"हम? हम तो — भवानी साहब ने भेजा था। कह रहे थे कि स्टोर में कुछ काग़ज़ रह गए हैं।"

मैं खिड़की से कूद गया। घुटने ज़मीन से टकराए। दर्द हुआ पर मैं उठ गया। घास थी। गीली। मैंने काग़ज़ों की गठरी उठाई और भागा।

तीन क़दम भागा था, तभी पीछे से कोई मेरी जेब से टकराया। कुछ खटककर ज़मीन पर गिरा। मैंने हाथ बढ़ाया — अंधेरा। घास मोटी थी। मैं उँगलियाँ घुमाता रहा, पर कुछ नहीं मिला।

टोकन।

मेरा टोकन गिर गया था।

मैं एक पल के लिए रुका। पीछे रोशनी बढ़ रही थी — कोई क़दमों की आवाज़ भी थी पर दूर से। मैं घास में हाथ मारता रहा — गीली घास, कीचड़, फिर कुछ जाम। पत्थर। मैंने उँगलियाँ फैलाईं। ज़मीन। बस ज़मीन।

सुमन की आवाज़ दरवाज़े से आई — "हाँ, हाँ, खोल रही हूँ। देख लो।"

मेरे पीछे कोई नहीं आ रहा था। पर मैं रुक नहीं सकता था।

मैंने गठरी कसकर पकड़ी और भागा।

पीछे फाटक था — अस्पताल की पिछली दीवार का कच्चा फाटक। मैं उससे बाहर निकला। सड़क पार की। सामने पुरानी सब्ज़ी मंडी की दीवार थी। मैंने दीवार से टेक लगाई और साँस लिया।

जेब में अमर की दवा थी — एक शीशी। हाथ में काग़ज़ों की गठरी। और जेब जहाँ टोकन रहता था, वो खाली थी।

मैंने गठरी खोली। नीचे से एक पन्ना निकाला — जिस पर सरकारी स्टॉक की बात लिखी थी। टॉर्च नहीं थी, पर स्ट्रीट लाइट की रोशनी में इतना दिख रहा था कि नीचे किसी का दस्तख़त था।

दस्तख़त दो थे।

एक — साफ़, चौड़ा। मैंने करीब लाकर देखा। वो मेरे पापा की लिखाई थी, और उसके नीचे भवानी का हस्ताक्षर था। दोनों एक ही तारीख़ पर।

मैं बैठ गया।

पापा जानते थे। पापा इस स्टोर में आते थे। पापा ने इन काग़ज़ों पर दस्तख़त किए थे।

अमर ने कहा था — कल रात पापा अस्पताल आए थे। उन्होंने कहा था — "काग़ज़ के अंदर वाला हिस्सा भी ढूँढ लेना।"

मतलब वो जानते थे कि स्टोर के काग़ज़ों के अंदर कुछ और है। पर वो कहाँ गए?

मैंने पन्ने उलटे। काग़ज़ की दूसरी गठरी का पहला पन्ना — जिस पर एक लाइन लिखी थी, सुमन की लिखाई में — "जिसने ये हिसाब छुपाया, वो किसी का नहीं रहा।"

मुझे सुमन का चेहरा याद आया जब उसने अपनी ही लिखी शीशियाँ देखी थीं। वो काँप रही थी, पर उसकी आवाज़ नहीं काँपी थी।

पीछे अस्पताल की सीढ़ियों पर बत्ती जल रही थी। मैंने देखा — दो आदमी नीचे जा रहे थे। उनके बीच में सुमन थी। वो सीधी चल रही थी, सिर ऊँचा। उसकी शर्ट की जेब से कुछ चमक रहा था — मेरा टोकन नहीं, कुछ और।

मैं उठा। पर जाता तो स्टोर के काग़ज़ कहाँ छोड़ता? मैंने गठरी अपनी शर्ट के अंदर की और पीछे की गली से निकल पड़ा।

बंसी की दुकान पर बत्ती जल रही थी। बंसी बाहर खड़ा था, हाथ में चाय का गिलास। मुझे देखकर गिलास रखा।

"तेरा चेहरा?" उसने कहा।

"सुमन।" मैंने कहा। "भवानी के आदमी उसे ले गए। स्टोर से।"

बंसी ने चाय का गिलास उठाया और एक घूँट में पी गया। "कहाँ?"

"अस्पताल के अंदर।"

"और तू भाग आया?"

"मैं —" मैंने जेब में हाथ डाला। "मेरा टोकन गिर गया। स्टोर के पीछे। घास में।"

बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। उसका चेहरा बदल गया। "तू पागल है। टोकन छोड़कर आया?"

"अंधेरा था। मुझे —"

"अंधेरा।" बंसी ने मेरी बात काटी। "सुन। भवानी के आदमियों ने सुमन को पकड़ा, पर तेरा टोकन वहीं पड़ा है। अगर भवानी को मिल गया तो —"

"तो क्या? टोकन दो लोगों के हाथ नहीं चलता। तुमने ही कहा था।"

"हाँ।" बंसी ने कहा। "पर भवानी के पास भी टोकन है। दो टोकन पास आ जाएँ तो क्या होता है, किसने देखा है?"

मैं चुप हो गया।

बंसी ने मेरा कंधा पकड़ा। "चल। पहले स्टोर का पीछा। फिर सुमन।"

"नहीं।" मैंने कहा। "पहले सुमन। टोकन बाद में।"

बंसी ने एक पल मेरी तरफ़ देखा। फिर सिर हिलाया। "तेरा दिमाग़ तेरा ही है।"

हम अस्पताल की तरफ़ चले। रास्ते में मैंने बंसी को काग़ज़ दिखाया — वो पन्ना जिस पर पापा के दस्तख़त थे।

बंसी ने रोशनी में देखा। "तेरे पापा के दस्तख़त?"

"हाँ।"

"और भवानी के?"

"हाँ।"

बंसी ने काग़ज़ मेरे हाथ में वापस रखा। "मन्नू। एक बात पूछूँ?"

"पूछ।"

"तेरे पापा ने कभी बताया कि वो भवानी के साथ बैठते थे?"

मैंने सोचा। कुछ याद नहीं आया।

"नहीं।"

"तो ये दस्तख़त कब के हैं?"

मैंने पन्ने पर तारीख़ देखी। दो महीने पुरानी।

"ये…" मैंने कहा। "ये तो हाल की है।"

बंसी रुक गया। "हाल की। मतलब तेरे पापा अभी भी भवानी से मिलते हैं।"

मैंने कुछ नहीं कहा।

"और तू सोच रहा था पापा बेचारे डर के मारे छिपे हैं।" बंसी ने कहा।

उसकी बात में कड़वाहट थी, पर मैं उससे नाराज़ नहीं हुआ। क्योंकि वही बात मेरे अंदर भी खटक रही थी।

अस्पताल का फाटक खुला था। अंदर लाइट जल रही थी। हम बरामदे से सीढ़ियों की तरफ़ बढ़े, तभी साइड के गलियारे से एक आवाज़ आई।

"मन्नू।"

सुमन थी। उसके सिर से खून की पतली लकीर बह रही थी। वो दीवार से टेक लगाए खड़ी थी। उसके साथ एक सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी बेहोश पड़ा था।

"ये —" मैंने देखा।

"ये मुझे छोड़ने आया था।" सुमन ने कहा। "पर मैंने उसका ही सिर दीवार से टकरा दिया।"

बंसी ने आदमी का चेहरा उठाया। "अरे, ये तो वही है जो कल अस्पताल में घूम रहा था।"

"काग़ज़?" सुमन ने कहा।

"मेरे पास।" मैंने कहा।

"अमर की दवा?"

"मेरी जेब में।"

सुमन ने आँखें बंद कर लीं। "तो अब बस टोकन।"

मैंने सिर हिलाया।

"और स्टोर में एक और चीज़ थी।" सुमन ने कहा। "तीसरे बक्से के नीचे एक लिफ़ाफ़ा था। मैंने देखा। उस पर पापा का नाम था।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"मैं उसे ले नहीं पाई।" सुमन ने कहा। "वो स्टोर में ही है।"

मैंने बंसी की तरफ़ देखा। बंसी ने सिर हिलाया। "पहले टोकन। फिर लिफ़ाफ़ा।"

हम पीछे के फाटक से बाहर निकले। स्टोर की गली में रोशनी अब भी थी — दो आदमी वहाँ खड़े थे। एक के हाथ में छड़ी थी।

हम रुके। छड़ी वाले ने हमारी तरफ़ देखा। "कौन?"

बंसी आगे बढ़ा। "चाय वाला हूँ। स्टोर का ताला कल टूटा था, सोचा देख आऊँ।"

"तू —" छड़ी वाले ने बंसी को धकेला।

बंसी लड़खड़ाया। फिर भी हँसा। "अरे भाई, हाथ तो संभाल।"

छड़ी वाले का हाथ उठा। मैं आगे बढ़ा, पर बंसी ने मुझे हाथ से रोका। फिर उसने अपनी जेब से कुछ निकाला — एक रसीद, जिस पर मोहर लगी थी।

"ये देख।" बंसी ने कहा। "तेरे साहब का हस्ताक्षर।"

छड़ी वाले ने रसीद पकड़ी और रोशनी में देखी। उसका चेहरा बदला।

"कहाँ से?"

"तेरे साहब ने ही मेरे पापा को दी थी।" बंसी ने कहा। "अब मुझे दे रही है। कुछ कहना है?"

छड़ी वाला कुछ नहीं बोला। दूसरा आदमी भी चुप रहा।

बंसी ने मेरी तरफ़ देखा — "घास। जल्दी।"

मैं स्टोर के पीछे भागा। घास में हाथ मारा। चारों तरफ़ अंधेरा। ऊपर एक बत्ती थी जो कभी जलती थी, कभी बुझती थी। मैंने घुटनों के बल बैठकर हाथ घुमाया।

बंसी पीछे खड़ा था, छड़ी वालों को रोके हुए।

"मिला?" उसने पूछा।

"नहीं।"

"और ज़ोर से मार।"

मैंने दोनों हाथ घास में फैलाए। मेरी उँगली एक चीज़ से टकराई। छोटी, ठंडी। मैंने उसे उठाया — काँच का टुकड़ा।

"नहीं।"

तभी घास में कुछ और चमका। मैंने हाथ बढ़ाया। पीतल। मोटा। गोल।

मैंने उसे खींचा। मिट्टी में धँसा था। मैंने उँगलियों से मिट्टी हटाई। टोकन। ठंडा।

मैंने उसे मुट्ठी में लिया और उठा।

बंसी ने पीछे मुड़कर देखा। "मिला?"

मैंने हाथ उठाया।

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