The Token System – Chapter 1003
"वो हो जाएगा," मैंने कहा। "पहले कमलेश को बचाना है।"
"कब?"
"आज रात। बसंत जी कह रहे हैं — वो भाग रही है।"
मैंने सक्सेना की तरफ़ देखा।
"मुझे एक घंटा दो। मैं भवानी के मकान तक जाऊँगा।"
पीछे बसंत सिंह की आवाज़ आई, "लड़के…"
मैं मुड़ा।
"तू हिसाब पूरा करेगा — ये मुझे तेरे दादा ने कहा था। पर एक बात याद रखना। हिसाब पूरा होने पर मुहर चुप हो जाती है। और उसके साथ जो औरत है… वो भी।"
"कौन औरत?"
"जिसके पाँव में घुँघरू हैं। वो कमलेश नहीं है। वो कौशल्या है — असली कौशल्या। और वो… वो तुम्हारी माँ नहीं है।"
मैंने कुछ कहना चाहा, पर आवाज़ गले में रुक गई।
गली में सफ़ेद गाड़ी का इंजन बजा। फिर बंद हुआ। फिर दरवाज़े पर दस्तक।
राजेंद्र ने दरवाज़े की तरफ़ देखा, फिर सक्सेना की तरफ़।
"मैं खोलता हूँ," वो बोला।
दरवाज़ा खुला। सफ़ेद कुर्ता पहने एक आदमी बाहर खड़ा था। हाथ में एक मोटा लिफ़ाफ़ा था।
"कमलेश देवी का पता यहाँ मिलेगा?" उसने कहा। "मैं उनका वकील हूँ। भवानी जी ने भेजा है।"
राजेंद्र ने दरवाज़ा पूरा खोल दिया। वकील ने भीतर कदम रखा, जूते आँगन की मिट्टी पर रगड़कर साफ़ किए, जैसे यहाँ की धूल से परहेज़ हो। उसकी नज़र कमरे में घूमी — टूटी चारपाई, सूखा पेड़, और बूढ़े बसंत सिंह पर जाकर ठहर गई।
"बसंत सिंह?" उसने कहा। "आप यहाँ?"
बसंत सिंह ने पलक तक नहीं झपकी। "क्या भवानी ने तुम्हें मेरा पता दिया?"
"मुझे आपका पता नहीं दिया गया। मुझे बस कहा गया कि सुखदेव के घर से कोई आएगा, उसका इंतज़ार करना।" वकील ने लिफ़ाफ़ा मेज़ पर रखा। "मैं भवानी जी का वकील हूँ। नाम रमाकांत त्रिपाठी। और मैं यहाँ अपनी मर्ज़ी से नहीं आया हूँ। भवानी जी ने बोला था कि अगर कमलेश भागने की कोशिश करे, तो उसे रोकना और उसका सामान ज़ब्त करना। पर मैं वो काम नहीं करूँगा।"
सक्सेना ने सिर उठाया। "क्यों नहीं करेंगे?"
"क्योंकि वो काम मुझे अब जायज़ नहीं लगता," रमाकांत ने कहा। "मैं चालीस साल से भवानी जी के काग़ज़ लिख रहा हूँ। एक भी काग़ज़ ऐसा नहीं लिखा जिसमें सच के बारे में लिखा हो। सब लिखा-पढ़ी, सब हिस्सा-बंटवारा — सब में कमलेश की माँ का नाम मिटाया हुआ है।" उन्होंने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर काग़ज़ों की गड्डी थी। "ये सारे काग़ज़ मेरी नक़ल में हैं। भवानी जी ये जलाना चाहते थे। मैं जलाने से पहले उनका दो-दो नक़ल बना चुका था।"
"आपने भवानी के ख़िलाफ़ काग़ज़ रखे?" मैंने पूछा।
"सिर्फ़ काग़ज़ नहीं," रमाकांत ने कहा। "मैंने सुनने की कोशिश की है कि चालीस साल पहले उस घर में क्या हुआ था। लोग डरते हैं, पर बूढ़े लोग — मरने से पहले सच बोल जाते हैं।" उसने एक काग़ज़ निकाला। "ये कमलेश की माँ, कौशल्या के नाम का पुराना राजीनामा है। जिसमें उसने अपना हिस्सा हरि सिंह को दिया था। पर यहाँ नीचे — देखिए — शर्त लिखी है।"
उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ सरकाया।
"हरि सिंह को हिस्सा तभी मिलेगा जब वो कमलेश की शादी अपनी मर्ज़ी से कर देगा और कमलेश को हवेली की दीवारों के अंदर लाने से पहले सब हिस्सेदारों को ख़बर देगा। अगर वो ऐसा नहीं करे, तो हिस्सा अपने आप कौशल्या के वारिसों — यानी कमलेश — को लौट जाएगा।"
"तो हरि सिंह ने उस शादी को रोका क्यों नहीं?" सक्सेना ने पूछा।
"रोका," रमाकांत ने कहा। "हरि सिंह ने शादी के दिन भवानी को हवेली भेजा। दूल्हे को मना लिया। कमलेश को भवानी के हवाले कर दिया। और बाद में सारे काग़ज़ अपने नाम कर लिए। कौशल्या को हवेली से बाहर किया गया। उसे बताया गया कि कमलेश मर गई। उस औरत ने अपनी बेटी को ज़िंदा देखा ज़रूर, पर बेटी ने उसे अपनी माँ नहीं माना।"
मैंने सक्सेना की तरफ़ देखा। उसके हाथ दबे हुए थे।
"कौशल्या — वो औरत जिसकी बसंत जी बात कर रहे हैं," सक्सेना ने कहा। "वो अब कहाँ है?"
रमाकांत ने जवाब नहीं दिया। सिर झुका कर रह गया।
बसंत सिंह ने कहा, "बोलो उसे। अब छिपाने से कोई फ़ायदा नहीं।"
"भवानी के घर के पिछले हिस्से में है," रमाकांत ने कहा। "मंदिर जैसा एक कमरा है। उसके पाँव में घुँघरू बंधे हैं। उसका नाम कोई नहीं लेता। मैंने कभी उसकी आवाज़ नहीं सुनी। बस घुँघरू की आवाज़ सुनता हूँ, जब वो पूजा के लिए घूमती है।"
"उसे कैद में रखा है?" मेरी आवाज़ सख़्त हो गई।
"कैद कहो या पुण्य," रमाकांत ने कहा। "भवानी कहता है कि वो उसे भगवान का काम करवाती है। पर हक़ीक़त ये है कि भवानी उसे घर से निकलने नहीं देता क्योंकि अगर वो बाहर निकली, तो ऊँची आवाज़ में बोलेगी। और अगर बोली, तो चालीस साल का सारा हिसाब एक दिन में खुल जाएगा।"
"तो काग़ज़ यहाँ है," मैंने कहा। "और मुहर?"
"मुहर उसी कमरे में है," बसंत सिंह ने कहा। "कौशल्या के पास। भवानी ने कभी उसे हाथ नहीं लगाया, क्योंकि वो मुहर का डरता है।"
रमाकांत ने घड़ी देखी। "कमलेश भागने वाली है। रात के ग्यारह बजे के बाद। मुझे भवानी जी ने यहाँ भेजा है कि मैं देखूँ कोई आता है या नहीं। पर सच ये है — मुझे डर है कि जब तक मैं लौटूँगा, कमलेश पकड़ी जा चुकी होगी। भवानी ने घर के सब दरवाज़ों पर लोग बिठा रखे हैं।"
"फिर हम पहुँचेंगे कैसे?" सक्सेना ने पूछा।
"एक रास्ता है," रमाकांत ने कहा। "पिछली दीवार के पीछे नाला है। उस नाले से सीधे मंदिर वाले कमरे तक जाते हैं। पर वहाँ सिर्फ़ एक आदमी जा सकता है। ज़्यादा लोग चले, तो आवाज़ होगी।"
मैंने अपनी जेब से मोबाइल निकाला। तीन मिस्ड कॉल — एक आशा की, दो किसी अजनबी नंबर से। मैंने आशा को फ़ोन लगाया। घंटी बजती रही।
"मन्नू," सक्सेना ने कहा, "तुम अकेले जाओगे?"
"मैं अकेला नहीं जाऊँगा," मैंने कहा। "रमाकांत जी, आप साथ चलिए। आप घर के अंदर से रास्ता जानते हैं। राजेंद्र जी बाहर गाड़ी लेकर रुकेंगे। सक्सेना जी —"
"मैं बसंत जी के पास रहूँगी," सक्सेना ने कहा। "कोई आया, तो मैं सँभाल लूँगी।"
बसंत सिंह ने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं।
"लड़के, एक बात सुन। वहाँ पहुँचेगा तो सबसे पहले कौशल्या से मिल। कमलेश से नहीं।" उनकी आवाज़ धीमी हो गई। "कौशल्या चालीस साल से इंतज़ार कर रही है किसी ऐसे आदमी का जो उसका नाम ले। तू उसका नाम लेना। और जब वो सुन ले कि तेरे मुँह से उसका नाम निकला, तब वो मुहर तुझे ख़ुद देगी।"
"आपको कैसे पता?"
"क्योंकि वो मुहर मेरी माँ की थी," बसंत सिंह ने कहा। "वो हवेली की असली रानी की मुहर है। और मेरी माँ का नाम भी कौशल्या था।"
कमरे में हवा भारी हो गई।
सक्सेना ने धीरे से कहा, "तो आप और कौशल्या —"
"हम दोनों एक ही नाम के हैं," बसंत सिंह ने कहा। "पर वो औरत मेरी बहू है। मेरे बेटे की बीवी। और मेरे बेटे को हरि सिंह ने मरवा दिया था।" उसने आँखें बंद कर लीं। "अब जा। और जो मैंने चालीस साल नहीं कहा, वो सब उस मुहर के साथ खुल जाएगा।"
मैं उठा। राजेंद्र ने गाड़ी की चाबी मेरी तरफ़ फेंकी। मैंने लपक ली।
रमाकांत ने दरवाज़ा खोला। बाहर गली में सफ़ेद गाड़ी अब भी खड़ी थी, पर उसका इंजन बंद था। शीशा थोड़ा नीचे था। भीतर बैठे आदमी ने हमें देखा, फिर मोबाइल निकाला।
"वो भवानी को ख़बर कर रहा है," रमाकांत ने कहा। "अब हमारे पास सिर्फ़ बीस मिनट हैं।"
मैं गाड़ी की तरफ़ बढ़ा। पीछे से सक्सेना की आवाज़ आई।
"मन्नू!"
मैं मुड़ा।
"अगर वो औरत तुम्हें अपने बेटे की तरह गले लगाए, तो हक़ीक़त बोल देना। झूठ मत बोलना।"
"क्या हक़ीक़त?"
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