The Mysterious Bell982 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 982

7 min read November 5, 2026

मैंने पीछे देखा। गुमटी के पीछे वाले कमरे का परदा हिला, फिर रुक गया। रज़िया अंदर थी, सुन रही थी।

"आपा, वो काग़ज़ नहीं उतारा आपने?"

"नहीं।"

"क्यों?"

"क्योंकि मैंने नहीं चिपकाया।" उन्होंने कहा। "जिसने चिपकाया है, वो आकर उतारेगा। अगर मैं ख़ुद उतारूँगी, तो सब कहेंगे — देखो, शबनम भी डर गई। और एक बात, मैं चूल्हा नहीं बुझाऊँगी। ये चूल्हा मेरे बाप ने जलाया था। इसे एक काग़ज़ नहीं बुझा सकता।"

फिर चुपचाप बोलीं, "अंकुश, उस्ताद की दुकान पर आज कुछ हुआ।"

मेरा पेट कस गया।

"क्या?"

"शाम को कोई दो आदमी आए थे। सफ़ेद कुर्ता। साथ में एक और — मोटा, हाथ में फ़ाइल। उन्होंने उस्ताद से कहा — आपकी दुकान का काग़ज़ असली नहीं, आपका लाइसेंस पुराना है, और आपकी दुकान की ज़मीन के काग़ज़ में गड़बड़ है। दो दिन में दुकान खाली कर दें, वरना कल से ताला लगेगा।"

मेरा हाथ मेज़ पर कस गया।

"उस्ताद ने क्या कहा?"

"उस्ताद ने कुछ नहीं कहा।" शबनम आपा ने कहा। "उन्होंने सिर्फ़ अपनी मशीन पर हाथ रखा और बोले — ताले की चाबी बनाने वाले से पूछ लेना, क्या ताला भी चाबी के बिना लगेगा।"

मैंने आँखें बंद कीं।

"और फिर?"

"फिर वो दोनों चले गए। और उस्ताद ने अपनी मशीन पर वो सफ़ेद कपड़ा ओढ़ दिया।"

मैं बाहर निकला। गुमटी के बाहर खड़ा हुआ। गली देखी।

गली खाली थी। पर खाली नहीं भी थी। हर दरवाज़े के पीछे कोई था — परदे के पीछे, खिड़की की जाली के पीछे, दीवार के पीछे। आज गली बंद थी। पूरी गली बंद।

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी।

शाम चार बजे डॉक्टर इसरानी का फोन आया। मेरे फोन की घंटी बजी — पुराने रेडियो जैसी धुन — और उनकी आवाज़ आई, "अंकुश, आज कोई मरीज़ नहीं आया। पूरे दिन एक भी नहीं। अस्पताल के बाहर वाले बोर्ड पर किसी ने सफ़ेद पाउडर से लिख दिया — यहाँ आने से पहले सोच लें।"

मैंने कहा, "डॉक्टर साहब, आप मुझे बताने के लिए फोन कर रहे हैं?"

वो हँसे। बूढ़ी हँसी, थकी हुई।

"मैं तुझे यह बताने के लिए फोन कर रहा हूँ कि तू अकेला नहीं है। मैं भी उसी सूची में हूँ। गुमटी भी। उस्ताद भी। इसका मतलब — हमें एक-दूसरे से बात करनी है।"

मैंने कहा, "कल सुबह रजिस्टर।"

"कल सुबह रजिस्टर।" उन्होंने दोहराया। "पर आज शाम तुम नल पर जाना। मुझे पता है वहाँ कुछ होने वाला है।"

"कैसे पता?"

"क्योंकि जब गली सूखती है, तो पहला झगड़ा पानी पर होता है।"

वो फोन काट गया।

मैं शाम पाँच बजे नल पर पहुँचा। मैं पहले से जानता था कि मुझे वहाँ नहीं जाना चाहिए था। पर मैं गया। क्योंकि मैं यह भी जानता था कि अगर मैं नहीं जाऊँगा, तो कोई और बीच में पड़ेगा, और वो किसी और पर लगेगा।

नल पर भीड़ थी। दस-बारह लोग। दो बाल्टियाँ ज़मीन पर रखी थीं, दोनों भरी हुईं। एक बाल्टी के ऊपर हाथ — सानिया के अब्बा का। दूसरी के ऊपर हाथ — गुड्डू के पापा का।

और बीच में एक नई ईंट तिरछी रखी थी, जिससे नल का पानी गली की तरफ़ फैल रहा था।

"ये ईंट किसने रखी?" सानिया के अब्बा चिल्ला रहे थे।

"मैंने रखी।" गुड्डू के पापा बोले। "पानी गड्ढे में जाता है, मेरी बाल्टी में नहीं आता।"

"तो ईंट रखकर पूरी गली कीचड़ कर दोगे?"

"मैंने तुम्हारे हिस्से का पानी नहीं छीना। मैंने बस ईंट रखी।"

"ईंट रखने से पहले पूछ लेते।"

"किससे? तुमसे? तुम हो कौन?"

और फिर वो दोनों भिड़ गए।

शब्द नहीं — हाथ। गुड्डू के पापा ने सानिया के अब्बा का कंधा धक्का दिया, और सानिया के अब्बा का हाथ बाल्टी से छूट गया और बाल्टी गिर पड़ी। पानी फैल गया, ईंट के ऊपर, दोनों के पैरों पर, धूल में।

और मैं बीच में आ गया।

"रुकिए।" मैंने कहा। मैंने दोनों के बीच हाथ डाले। "रुकिए। एक बाल्टी के लिए?"

दोनों रुके। दोनों ने मेरी तरफ़ देखा।

और फिर — दोनों की आँखों में वो चीज़ आई जो मुझे पता थी। मैंने उसे पहले भी देखा था — तीन दिन पहले, कल, परसों। वो नफ़रत नहीं थी। वो थकान थी। और जो थकान में इंसान करता है, वो नफ़रत में भी नहीं करता।

सानिया के अब्बा ने कहा, "तू हट।"

गुड्डू के पापा ने कहा, "तू यहाँ क्यों आया? तेरे पास जाने से लोगों के घर टूटते हैं। तू हमें सिखाने आया है?"

"मैं सिखाने नहीं —"

"तू हमारे बीच नहीं आया कर।" सानिया के अब्बा ने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी और यही सबसे बुरा था। "तेरे आने से पहले हम लड़ते थे, पर सुबह फिर बात कर लेते थे। अब तीन दिन से हम बात नहीं कर रहे। तीन दिन से हमारे बच्चों को कहना पड़ रहा है — तुम उस गली से नहीं जाओगे। और सबका कारण एक है।"

"कारण मैं नहीं —"

"कारण तू है।" उन्होंने कहा। "क्योंकि तेरे आने के बाद से इस गली में सुबह से सुबह तक सब कुछ बदल गया है। और जो बदलता है, उससे डर लगता है।"

मैं कुछ नहीं बोला।

मैंने बाल्टी उठाई। गिरी हुई। मैंने उसे नल के नीचे रखा, पानी भरा, दोनों के बीच रख दिया। मैंने ईंट उठाई और दूर फेंक दी।

फिर मैंने कहा, "एक बाल्टी पानी के लिए।" और चला गया।

मैं जब पीछे मुड़ा, तो दोनों खड़े थे। एक-दूसरे से नहीं, मेरी तरफ़ नहीं — बाल्टी की तरफ़। बाल्टी भरी थी। और उनके पैरों के नीचे कीचड़ था।

शाम छह बजे दो खाकी जीपें आईं।

मैं दुकान पर था। मैंने जीपों की आवाज़ सुनी और उठ बैठा। चार सिपाही उतरे। उनमें से एक — पुराना सिपाही, जिसने पहले भी एक बार मेरा नाम पूछा था — मेरी तरफ़ आया।

"अंकुश यादव?"

"हाँ।"

"ये जो पीपल के नीचे बोर्ड है — किसका?"

"जोड़ केंद्र का।"

"किसने लगाया?"

मैंने कहा, "मैंने।"

"आपके पास इसकी अनुमति है?"

"अनुमति किसी से नहीं ली। ये इलाके के लोगों का —"

"तो ये अवैध है।" उन्होंने कहा। "बिना अनुमति सभा, बिना अनुमति बोर्ड, बिना अनुमति केंद्र — इस शहर के नियम में ये सब एक ही काग़ज़ में आता है।"

मैंने कहा, "पर पीपल के नीचे तो पहले से बुज़ुर्ग बैठते हैं। वहाँ बंसी बाबा, रहमत बाबा —"

"बैठना अलग बात है। बोर्ड लगाना अलग।" उन्होंने कहा। "आज सभा हुई?"

"नहीं।"

"तो अच्छा है। अभी हटा दीजिए। कल से कुछ नहीं रहेगा।"

मैंने कहा, "कल से क्या मतलब?"

"मतलब — जो पीपल के नीचे रखा है, वो हटा दो। हम छह बजे फिर आएँगे। अगर मिला, तो हमें मजबूरी में उठाना पड़ेगा, और फिर काग़ज़ लिखा जाएगा। और तुम जानते हो, काग़ज़ लिखा जाए तो कितने दिन लगते हैं?"

मैं वहीं खड़ा रहा।

"क्यों कर रहे हैं आप यह?"

वो मेरे करीब आए। उनकी आवाज़ धीमी हो गई। "अंकुश, मैं बता दूँ? मुझे सिर्फ़ मुहर पूछने का हक़ है, सच का नहीं। मुहर ऊपर से आई है। मैं मुहर के साथ आया हूँ। और मुहर कभी यह नहीं बताती कि सच क्या है — सिर्फ़ यह बताती है कि ऊपर क्या है।"

मैंने कुछ नहीं कहा।

उन्होंने कहा, "तुम्हारी दुकान का लाइसेंस अधूरा है। तुम्हारी रजिस्ट्री अधूरी है। तुम्हारा हिसाब अधूरा है। मैं कल तक तुम्हें रोक नहीं रहा। पर कल से — मुझे बताना पड़ेगा कि क्या फैसला लिया।"

वो लौट गए।

मैंने पीपल के नीचे जाकर बोर्ड उठाया। यही वो बोर्ड था जो मैंने सफ़ेद पेंट से बनाया था, जिस पर लिखा था — "टूटी चीज़ लाओ, टूटा रिश्ता साथ लाओ"। मैंने उसे अपनी दुकान के पीछे रख दिया। मेज़ भी उठा लाई, टूटी लकड़ी? वो दरोगा कल हटवा चुका था।

मैंने चारों तरफ़ देखा। कोई नहीं था। पीपल के नीचे खाली।

सात बजे गली में ऐसा सन्नाटा छा गया कि मुझे अपनी साँस सुनाई देने लगी।

मैंने अपने कान पकड़े। कभी-कभी सन्नाटा भी एक आवाज़ होता है। सिर्फ़ सुनने के लिए कान चाहिए, और सहने के लिए कालेज।

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