The Mysterious Bell – Chapter 974
मैं दुकान पर बैठा था, किसी पुराने पहिये की तीलियाँ सीधी कर रहा था।
दरोगा सीधे पीपल के नीचे गए।
वहाँ मेरी मेज़ थी। चबूतरी पर रखी। बोर्ड — जिस पर मैंने लिखा था कि टूटी चीज़ और टूटा रिश्ता दोनों लेकर आओ। टूलबॉक्स। दो छोटी कुर्सियाँ।
दरोगा ने हाथ उठाया।
सिपाहियों ने मेज़ उठाई। कुर्सियाँ उठाईं। टूलबॉक्स उठाया।
मैं दौड़कर गया।
"साहब, वो बोर्ड—"
"बोर्ड हटाओ।" उन्होंने कहा।
"वो बोर्ड मेरा है—"
"जगह सरकारी है।" उन्होंने कहा। "यहाँ बोर्ड लगाने की इजाज़त किसने दी? काग़ज़ दिखाओ।"
मेरे पास काग़ज़ नहीं था।
"मैं पूछ रहा हूँ, इजाज़त किसने दी?" वो फिर बोले।
मैं चुप रहा।
"अवैध सभा का काग़ज़ आया है।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखकर कहा। "बिना इजाज़त के यहाँ जमावड़ा। तीन दिन की रोक लगती है। और यह जो कुछ तुमने पीपल के नीचे जमा कर रखा है, वो सब हटेगा। कल से यहाँ कुछ नहीं रखोगे। समझे?"
"साहब, मैं किसी को जोड़ने का काम करता हूँ—"
"कौन सा काम?" उन्होंने पूछा।
"मैं लोगों की बात कराता हूँ। रिश्ते जोड़ता हूँ।"
दरोगा हँसे।
"अंकुश यादव," उन्होंने धीमे से कहा, "जहाँ तक मुझे याद है, तुम साइकिल ठीक करते हो। पंचर बनाते हो। ट्यूब पैच करते हो। और जोड़ने का काम… सरकार करती है।"
वो अपनी जीप की तरफ़ मुड़े।
"साहब," मैंने पीछे से कहा, "एक बाल्टी पानी का सवाल था। नल पर दो आदमी लड़ रहे थे। मैंने बस उन्हें बैठाया था—"
दरोगा रुके।
"इसीलिए हटवा रहा हूँ।" उन्होंने कहा। "क्योंकि तुम अब भी यही सोचते हो कि तुमने कुछ ठीक किया है। तुमने नहीं ठीक किया, अंकुश। तुमने बीच में पड़कर आग हवा दी। जिस दिन यह समझ आ जाएगा, उस दिन तेरा भला होगा।"
वो चले गए।
पीपल के नीचे खाली ज़मीन बची। पत्थर की चबूतरी पर एक पीला गीला दाग — बबलू के पान का, जो कभी वहाँ बैठा था। और धूल में मेज़ के चार पैरों के निशान।
मैंने उन निशानों को देखा।
फिर मैंने मेज़ को नहीं उठाया। मैंने उसे उसी जगह, उसी चबूतरी के किनारे पटक दिया — जहाँ कभी जोड़ स्कूल बैठता था — और उस पर वो बोर्ड रख दिया जो मैंने सफ़ेद पेंट से बनाया था।
दरोगा ने कहा था — कल से यहाँ कुछ नहीं रखोगे। तो मैंने आज रख दिया। आख़िरी बार। जैसे कोई आदमी अपने घर का आख़िरी दीया बुझाने से पहले एक बार फूँक मारता है।
फिर मैं दुकान पर आ गया।
छह बजे शाम।
गली में सन्नाटा छा गया।
तुम सोचते होगे कि सन्नाटा क्या होता है? शोर का न होना? नहीं। सन्नाटा वो होता है जब बच्चों के खेलने की जगह पर बच्चे न हों। जब गेंद ज़मीन पर गिरकर उछले और कोई न दौड़े। जब माँ अपने बच्चे को बुलाए और आवाज़ दीवार से टकराकर लौट आए क्योंकि सामने कोई नहीं जो सुने।
उस शाम ऐसा ही था।
मैं दुकान के सामने चौकी पर बैठा था। पीपल की डाल अब भी हिल रही थी। पर उसके नीचे कुछ नहीं था। न बुज़ुर्ग, न बच्चे, न चबूतरी पर बैठने वाला कोई।
किशनलाल की दुकान का बल्ब जल रहा था।
शबनम आपा की गुमटी पर चूल्हा जल रहा था, पर वहाँ कोई ग्राहक नहीं था।
उस्ताद की दुकान ढकी हुई थी।
और मेरी दुकान खुली थी।
मैंने जेब से घंटी निकाली।
वो बर्फ जैसी ठंडी थी। छल्ले पर वो दो लकीरें और बीच का बिंदु था — मुझे अब उसमें कुछ और दिखने लगा था, जो पहले नहीं दिखता था। जैसे कोई आदमी थक जाए और रास्ते की हर लकीर में चेहरा ढूँढने लगे।
मैंने घंटी बजाई।
टन।
बस। बस टन। धातु की आवाज़। जैसे किसी और की साइकिल।
मैंने फिर बजाई।
टन।
फिर बजाई। और फिर।
टन। टन। टन।
मेरे हाथ की हड्डी दुखने लगी। मैंने घंटी को हथेली में दबाया, फिर खोला, फिर देखा, फिर गरम करने के लिए मुँह से फूँका।
कुछ नहीं।
ना आवाज़। ना फुसफुसाहट। ना वो रूखी, छोटी, टूटी ज़ुबान जो कहती थी — "क्या टूटा है?"
बस सन्नाटा।
मैंने उसे फिर बजाया।
"बोल।" मैंने कहा। मेरी आवाज़ काँप रही थी। "बोल ना। मुझे पता है तू सुन रही है। तूने कल भी सुना था। आज गली चुप है, तो क्या हुआ? तू तो घंटी है। तू मेरी है।"
टन।
"मत कर ऐसा।" मैंने कहा। "मैं तुझसे लड़ नहीं रहा। मैं तुझसे नहीं लड़ूँगा। बस एक बार बोल दे।"
कुछ नहीं।
मैंने घंटी को चौकी पर रख दिया। मेरे हाथ काँप रहे थे। और मेरी आँखें? वो भरी हुई थीं, पर मैंने उन्हें छुआ नहीं।
फिर पीछे से आवाज़ आई।
"अंकुश बेटा।"
मैं पलटा।
डॉक्टर इसरानी खड़े थे। हाथ में एक स्टील का डिब्बा था — उन्होंने पहले भी इस्तेमाल किया था — और उसमें से भाप निकल रही थी। गरम चाय।
"बैठ।" उन्होंने कहा।
मैं बैठ गया।
उन्होंने स्टील का डिब्बा मेरे हाथ में रखा।
"पी।"
मैंने पिया। गरम थी, और उससे मेरा गला भर गया। मैंने आँखें बंद कर लीं।
वो मेरे सामने खड़े रहे।
"घंटी बजा रहा था?" उन्होंने पूछा।
"हाँ।"
"आवाज़ आई?"
"नहीं।"
"अच्छा।" उन्होंने कहा।
मैंने उनकी तरफ़ देखा। "अच्छा?"
"हाँ।" वो मेरे सामने वाली कुर्सी पर बैठ गए। "मुझे पता था कि नहीं आएगी।"
"तो आपने मुझे बताया क्यों नहीं?"
"क्योंकि तू खुद सुनना चाहता था।" उन्होंने कहा। "और मेरी बात तूने कभी उतनी गहराई से नहीं सुनी जितनी अपने डर की। जब तक डर सामने न आए, बात पीछे नहीं लगती।"
मैं चुप रहा।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "यह घंटी कोई जादू की चीज़ नहीं है। मैं साठ साल से इन लोगों को देख रहा हूँ, इन गलियों को देख रहा हूँ। यह घंटी गली की ज़ुबान है। जब गली बोलती है, यह बोलती है। जब गली चुप हो जाती है, यह चुप हो जाती है। तूने तो बस उसकी आवाज़ बनना सीखा है।"
"पर यह तंत्र है।" मैंने कहा। "इसमें नियम हैं, अंक हैं, शक्तियाँ हैं—"
"हाँ।" उन्होंने कहा। "और उन सबका ईंधन क्या है?"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"मैं पूछ रहा हूँ, ईंधन क्या है?"
"भरोसा।" मैंने कहा।
"जली हुई लकड़ी को आग नहीं रहती।" उन्होंने कहा। "और भरोसा ही इस तंत्र की लकड़ी है। उसे इकट्ठा करने में तुझे महीने लगे, और इसे जलाने में रणवीर को एक हफ़्ता। क्योंकि आग जलाना आसान है, हवा देना आसान है।"
मेरा हाथ घंटी पर गया।
"तो मैं क्या करूँ?" मैंने कहा। "यहीं बैठ जाऊँ?"
"नहीं।" उन्होंने कहा। "तू वो कर जो इन सबब से होता है — सवाल छोड़कर अपना काम कर।"
"क्या?"
"एक आवाज़ी चीज़ का इंतज़ार मत कर। तू ज़ुबान वाला काम कर। कल सुबह उस्ताद के साथ मेरे पास आना। रिकॉर्ड कमरा खुलेगा। उसमें एक काग़ज़ है जिसमें इस अस्पताल की ज़मीन का हिसाब है, और उस हिसाब में एक नाम है जिसे सबने मिटाया है।"
"कौन सा नाम?"
"जब देखेगा तब जानेगा।" वो उठे। "पर एक बात कान में डाल ले — जिस दिन गली फिर से बोलेगी, उस दिन घंटी आवाज़ नहीं देगी। घंटी चीख़ देगी। जितनी गहरी चुप्पी, उतनी ऊँची आवाज़।"
वो चले गए।
मैं अकेला रह गया।
रात नौ बजे तक मैं दुकान पर बैठा रहा। घंटी सामने मेज़ पर पड़ी थी। मैंने उसे एक बार भी नहीं छुआ।
फिर ग्यारह बजे मैं बाहर आया। गली में बत्तियाँ बुझी हुई थीं। सिर्फ़ किशनलाल की दुकान का बल्ब जल रहा था। दूर, नए बाज़ार के मोड़ की तरफ़, एक-दो बत्तियाँ और दिख रही थीं।
मैंने सड़क की तरफ़ देखा।
फिर चौक की तरफ़।
फिर वो गाड़ी आई।
सफ़ेद। लंबी। चमकदार। रोशनी पहले मेरे शटर पर आई — मैंने वो कोयले वाला नाम और गहरा कर दिया था, वो उभरकर दिखा — फिर रोशनी मेरे चेहरे पर पड़ी।
गाड़ी रुकी। इंजन बंद हुआ। खिड़की का काँच उतरा। धीरे।
अंदर रणवीर बैठा था। सफ़ेद कुर्ता। हाथ में वही रूमाल। काली अंगूठी अब भी उँगली पर।
"अंकुश।" उसने कहा।
मैंने जवाब नहीं दिया।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno