The Mysterious Bell969 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 969

7 min read November 5, 2026

मैं वहीं खड़ा रहा।

फिर मैं मुड़ा। मैं सीधा दुकान की तरफ़ गया।

पीछे से गुड्डू के पापा ने कहा — "बाल्टी का झगड़ा छोड़, ये बता, अब पानी कौन भरेगा?"

मैंने पलटकर नहीं देखा।

पर मैंने सुना — सानिया के अब्बा ने कहा — "तू भर। मुझे तेरे भरे पानी की ज़रूरत नहीं।"

छह बजे दरोगा आए।

मैं दुकान पर था। शटर उठा था पर अंदर कोई काम नहीं था। मैं दीवार से टेक लगाकर बैठा था और मेरी गोद में एक पुरानी रिंच थी जिसे मैं बार-बार घुमा रहा था।

दरोगा ने पीपल के नीचे आकर अपनी लाठी टेकी। उनके साथ तीन सिपाही थे। एक के हाथ में काग़ज़ था, बाक़ी दो के हाथ खाली।

"अंकुश यादव?"

मैं उठा।

"हाँ।"

"ये जगह सरकारी है।" उन्होंने पीपल के नीचे वाली खाली जगह की तरफ़ इशारा किया। "यहाँ तुम्हारा जो भी बोर्ड था, वो हटा दिया गया है। अब यहाँ कोई सभा नहीं, कोई काउंटर नहीं, कोई कुर्सी-मेज़ नहीं।"

"मैंने बोर्ड खुद उतार दिया था," मैंने कहा।

"तो अच्छा किया।"

उन्होंने एक काग़ज़ आगे बढ़ाया।

"ये पढ़ ले।"

मैंने पढ़ा। उसमें लिखा था कि पिछले एक हफ़्ते में इस जगह पर लगातार सभाएँ हो रही थीं और इससे कानून-व्यवस्था पर असर पड़ रहा है। इसीलिए अगले तीन दिन तक यहाँ कोई सभा नहीं होगी। तीन दिन बाद समीक्षा होगी।

"तीन दिन," मैंने कहा।

"तीन दिन।"

"और तीन दिन बाद?"

दरोगा ने अपनी लाठी उठाई।

"तीन दिन बाद तुम्हारी दुकान का काग़ज़ भी आएगा," उन्होंने कहा। "और वो ज़्यादा सख़्त होगा। आज मैं तुम्हें रस्म के तौर पर बता रहा हूँ। कल से तुम यहाँ किसी को नहीं बुलाओगे। अगर बुलाया, तो कुर्सी पर बैठकर पछताओगे।"

"दरोगा जी—"

"मत बोलो," उन्होंने कहा। "मैं जानता हूँ तुम क्या कहोगे। तुम कहोगे कि मैं किसी को नहीं बुला रहा, लोग खुद आते हैं। पर आज लोग आए? तुम्हारे आसपास भीड़ थी? नहीं ना। सो अब तुम्हारे पास कोई नहीं आ रहा, और ये भी जान लो—जिसके पीछे भीड़ नहीं, उसके पीछे काग़ज़ भी नहीं होता।"

वो चले गए।

मैं खड़ा रहा।

उनकी लाठी की आवाज़ दूर तक गई। फिर गली में वो भी नहीं रही।

उस शाम गली में बच्चों की आवाज़ नहीं आई।

यह सबसे अजीब बात थी। मुझे बच्चों की आवाज़ की आदत थी। दिन में कम से कम दस बार कोई न कोई बच्चा गली में चिल्लाता था — क्रिकेट का शोर, पतंग की चिल्लाहट, पंचर वाली साइकिल की घंटी, टिंकू की हँसी, सानिया की डाँट, गुड्डू की भागदौड़। ये गली इन्हीं आवाज़ों से ज़िंदा थी।

आज कोई आवाज़ नहीं थी।

छह बजे से आठ बजे तक मैं दुकान के बाहर बैठा रहा। एक बच्चा भी नहीं दिखा। मुझे पता था कि बच्चे स्कूल से लौट चुके थे। मुझे पता था कि वो घरों के अंदर बंद हैं। मैंने किसी के दरवाज़े पर खटखटाने की नहीं सोची। अगर अब्बा ने मना किया होता, तो बच्चे डरते। और बच्चे जब डरते हैं, तो वो छुपकर भी नहीं आते। वो सीधे मान लेते हैं।

आठ बजे मैंने घंटी निकाली।

मैंने उसे हथेली पर रखा। ठंडी थी। मैंने उसे हिलाया। टन — बस एक धातु की आवाज़। फिर मैंने उसे दोबारा हिलाया। टन। तीसरी बार। टन। चौथी बार। पाँचवीं बार।

कुछ नहीं।

पहली बार ऐसा हुआ कि घंटी बजी और उसने कुछ नहीं कहा।

मैंने उसे सीने से लगाया। वो गरम नहीं हुई। न ही ठंडी पड़ी। वो बस पीतल बन गई थी।

मैं उठा। मैं अस्पताल गया।

डॉक्टर इसरानी अपने कमरे में बैठे थे। उनके सामने एक मोमबत्ती जल रही थी और वो उसकी रोशनी में कुछ काग़ज़ पढ़ रहे थे।

मैं दरवाज़े पर खड़ा रहा। उन्होंने सिर उठाया।

"आ गए," उन्होंने कहा। "बैठो।"

मैं बैठ गया। मैंने घंटी जेब से निकाली और उनके सामने रख दी।

"इसने आज कुछ नहीं कहा," मैंने कहा।

वो घंटी को देखते रहे।

फिर उन्होंने कहा — "मैंने तुम्हें कल बताया था, तुमने सुना नहीं?"

"सुना था।"

"तो फिर डर क्यों रहे हो?"

"क्योंकि कहना और होना अलग बात है," मैंने कहा। "जब वो बोलती थी, तब मुझे लगता था कि ये बोलना आसान है। अब जब वो चुप है, तब पता चल रहा है कि ये चुप्पी कितनी भारी है।"

डॉक्टर इसरानी ने घंटी उठाई। उन्होंने उसे कान के पास ले जाकर हिलाया।

"तुम्हें पता है, इस घंटी की आवाज़ किस चीज़ से आती है?"

"लोगों से।"

"हाँ।" उन्होंने घंटी रख दी। "पर लोगों से कैसे? ये समझो। ये घंटी तुम्हारे हाथ से नहीं बजती। ये उन आवाज़ों से बजती है जो तुम्हारे पीछे हैं। जब गली में कोई किसी से बोलता है, तो वो आवाज़ इस घंटी में बैठ जाती है। जब कोई किसी की मदद करता है, तो वो हाथ इस घंटी में बैठ जाता है। जब कोई माफ़ी माँगता है, तो वो काँपती आवाज़ इस घंटी में बैठ जाती है।"

वो रुके।

"और आज तुम्हारी गली में किसी ने किसी से कुछ नहीं कहा। किसी ने किसी को माफ़ी नहीं माँगी। किसी ने किसी की मदद नहीं की। गली चुप थी। और जब गली चुप हो, तो इस घंटी में बोलने के लिए कुछ नहीं बचता।"

"तो ये घंटी खत्म हो गई?"

"नहीं," उन्होंने कहा। "ये घंटी भूखी है। ये तुम्हें यह बता रही है कि उसका ईंधन खत्म हो गया। और ईंधन है — गली का भरोसा।"

मैंने कहा — "तो मैं क्या करूँ?"

डॉक्टर इसरानी ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें थकी थीं, पर उनमें वो चीज़ थी जो उम्मीद से ज़्यादा ज़िद जैसी लगी।

"तुम क्या करो?" उन्होंने दोहराया। "तुम कुछ मत करो। तुम बस उनकी आवाज़ न बनो। तुम उनकी आवाज़ बनने की कोशिश करोगे, तो वो और चुप हो जाएँगे। तुम अभी उनके बीच सबसे बड़ी चर्चा हो। इसलिए तुम उनके बीच से हट जाओ।"

"मैं कहाँ जाऊँ?"

"कहीं मत जाओ," उन्होंने कहा। "अपनी दुकान पर बैठो। चुप बैठो। काम करो। जिस दिन तुम्हारे पास कोई न आए, तब भी तुम शटर खोलो, अपनी साइकिल के पुर्ज़ों को साफ़ करो, अपने औज़ार तेल से पोंछो। गली देखेगी कि तुम डरे नहीं। और जब गली देखेगी कि तुम डरे नहीं, तो एक-एक करके लोग लौटेंगे।"

"और अगर न लौटें?"

"तो फिर सच जान लो," उन्होंने कहा। "गली तुम्हारी नहीं थी। गली कभी किसी की नहीं होती। गली बस अपनी होती है। और जो अपनी होती है, वो अपनी राह चलती है।"

वो उठे। उन्होंने मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया।

"मैं तुम्हें एक बात बताता हूँ," उन्होंने कहा। "बाईस साल पहले जब मैं ये अस्पताल बना रहा था, तब भी यही हुआ था। पहले हफ़्ते में गली के लोगों ने मेरी दुकान पर आना बंद कर दिया था। क्योंकि उन्हें लगा था कि इस अस्पताल से गली में बीमारी आएगी। और पता है क्या हुआ?"

"क्या?"

"मैंने दो महीने तक किसी मरीज़ के पास जाना बंद नहीं किया। मैं अकेले बैठा रहा। खाली कुर्सियों पर। फिर एक दिन सुबह एक औरत आई — तुम्हारी माँ।" उन्होंने देखा कि मैं चौंका। "हाँ। वो पहली मरीज़ थीं। उस दिन से गली समझ गई कि ये अस्पताल बीमारी नहीं, इलाज है। और आज तीस साल बाद भी गली यहीं है।"

मैं उठा।

मैंने घंटी जेब में रखी।

"डॉक्टर साहब—"

"जाओ," उन्होंने कहा। "और कल सुबह उस्ताद की दुकान पर बैठो। चाय पियो। मैं वहाँ आऊँगा। हम तुम्हें अस्पताल का पुराना रिकॉर्ड कमरा दिखाएँगे। उसमें एक काग़ज़ है जो मैंने दो हफ़्ते पहले देखा था और उसी दिन से मुझे नींद नहीं आ रही। आज रात तुम आराम करो। कल सुबह वो काग़ज़ देखो।"

मैं बाहर आया।

गली में चलते हुए मुझे लगा कि मेरे कदमों की आवाज़ भी किसी और की लग रही है। मैं दुकान तक आया। शटर उठाया। अंदर गया। मैंने शटर गिराया। मैंने बत्ती जलाई। पीली रोशनी में दुकान का फ़र्श, औज़ारों का ट्रंक, टूटी मेज़, सब कुछ वैसा ही था। फिर भी कुछ अलग था।

मैंने घंटी फिर निकाली।

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