The Mysterious Bell844 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 844

7 min read November 5, 2026

उनके हाथ में वही पुरानी हिसाब की कॉपी थी। वही जो रसोई के ताखे पर रखी रहती थी। जिसके पन्ने फटे हुए थे, जिसके कोने मुड़े हुए थे, और जिस पर कभी, किसी सुबह, चाय का छल्ला बन गया था। माँ ने साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा हुआ था और माथे पर चंदन का टीका था।

उन्होंने किसी से पूछा नहीं। किसी ने उन्हें बुलाया नहीं। वो अंदर आईं और मेज़ के सामने रखी खाली कुर्सी पर बैठ गईं।

"सुशीला जी," दरोगा जी ने कहा और आधे उठ गए।

"बैठिए, साहब," माँ ने कहा। "मैं ऐसे ही आ गई। बाहर बैठी थी, सब सुन रही थी। और मुझे लगा कि अगर मैं और देर बैठी रहूँगी तो फिर वही करूँगी जो बाईस साल से कर रही हूँ।"

"आप कुछ कहना चाहती हैं?"

"मैं वो काग़ज़ लाई हूँ, साहब," माँ ने कहा और कॉपी को मेज़ पर धीरे से रख दिया, "जिस पर मैंने उस आदमी का नाम लिखा था।"

दरोगा जी ने कॉपी को देखा। उन्होंने एक पल के लिए ऐसे देखा जैसे वो चीज़ नहीं, कोई जानवर हो जो काट सकता है। फिर उन्होंने उसे खोला।

अरे, तुम्हें मैंने बताया था ना यह कॉपी कैसी दिखती है। अब सुनो यह कॉपी अंदर से कैसी दिखती थी। हर पन्ने पर दो खाने। एक तरफ़ तारीख़ और दूसरी तरफ़ रकम — आठ रुपये, बारह रुपये, चार आने, दो रुपये। कहीं टिफ़िन का हिसाब, कहीं दूध का, कहीं किसी बकाये का। माँ की लिखाई छोटी और सीधी थी, जैसे किसी को कुछ छिपाना न आता हो। और पन्नों के बीच पुरानी स्याही की गंध थी, वही गंध जो किसी पुराने बक्से को खोलने पर आती है।

दरोगा जी ने पन्ने पलटे। फिर पीछे की तरफ़ से उलटे।

"यहाँ पर," माँ ने उँगली रखी।

दरोगा जी उस जगह झुके। उनकी आँखें सिकुड़ीं।

"तारीख़ है," उन्होंने कहा। "महीना, तारीख़… और यह समय? सुबह का समय?"

"हाँ, साहब। उस रात का नहीं। अगली सुबह का।"

"अगली सुबह का समय क्यों?"

माँ ने सीधे दरोगा जी की आँखों में देखा। "क्योंकि वो आदमी अगली सुबह भी आया था, साहब। रसीद लेकर। और मैंने उसे गेट से देखा था। और जब वो आया, तो उसके हाथ में जो पर्ची थी, वो मेरी दवा की थी।"

दरोगा जी रुक गए।

"आपकी दवा की पर्ची?"

"हाँ। वो आदमी जब भी आता, मेरी दवा की पर्ची उसके हाथ से होकर जाती। और हर बार उस पर्ची पर उसकी उँगली का निशान छूट जाता। स्याही वाला निशान। मैं उसे रगड़कर मिटाती और सोचती कि यह आदमी मेरी दवा का हिसाब क्यों रखता है। फिर एक दिन मैंने रगड़ना बंद कर दिया।"

"क्यों?"

"क्योंकि मुझे लगा कि जो निशान आदमी के हाथ से आता है, वो मिटाने की चीज़ नहीं, संभालने की चीज़ है।"

कमरे की हवा फिर रुक गई। मैंने महसूस किया कि पंखा चल रहा है, बत्ती जल रही है, दरवाज़े के बाहर दुबे अंकल की छड़ी ज़मीन पर चल रही है — पर इन सबकी आवाज़ कहीं पीछे छूट गई थी।

दरोगा जी ने माँ की कॉपी को दोनों हाथों से पकड़कर अपनी आँखों के सामने उठाया। उनके होंठ हिले। मैंने देखा कि उन्होंने दो बार पढ़ा। पहली बार चुपचाप। दूसरी बार धीरे से बोलकर। और फिर उन्होंने कॉपी को नीचे किया, और उनका चेहरा ऐसा था जैसे किसी ने उनके ही दफ़्तर की दीवार पर कुछ लिख दिया हो जो उन्हें पसंद नहीं।

"सुशीला जी, यह नाम…"

"मैंने लिखा था, साहब।"

"कब?"

"उस रात।"

"उस रात आपको कैसे पता चला?"

माँ ने एक पल सोचा। फिर बोलीं, "पापा उस रात अस्पताल से घर लौटे तो बैठे ही नहीं। सीधे आँगन में जाकर खड़े रह गए। रात भर। मैंने दो बार पानी दिया, दोनों बार उन्होंने गिलास लिया और वापस रख दिया। सुबह मैं बाहर आई तो उन्होंने मुझसे नज़र नहीं मिलाई।"

वो रुकीं। उनका गला भरा नहीं था, पर आवाज़ थोड़ी नीची हो गई थी।

"मैं औरत हूँ, साहब," उन्होंने कहा। "मुझे सब पता चल जाता है। बोलना ज़रूरी नहीं होता। उस सुबह मैंने उनका चेहरा देखा और समझ गई कि कुछ ऐसा हुआ है जो मुझे नहीं बताया जाएगा। और मैं इतनी बीमार थी कि लड़ भी नहीं सकती थी। तो मैंने सोचा — अगर कल कुछ हो जाए, मेरे साथ या इनके साथ, तो किसी को तो पता हो कि यह सब क्या था। इसलिए मैंने नाम लिख लिया। छोटे अक्षरों में। हिसाब के नीचे।"

मैंने कॉपी की तरफ़ देखा। यही कॉपी मैंने हज़ार बार रसोई में देखी थी। एक बार भी नहीं सोचा था कि इसके किसी पन्ने पर मेरे घर का सबसे बड़ा सच छिपा है।

पर तुम सोच रहे होगे कि मैंने इतनी बार इसे देखकर भी क्यों नहीं खोला। तो सुनो — जब आदमी अपने घर में रोज़ कोई चीज़ देखता है, तो वो उसे देखना ही बंद कर देता है। माँ की कॉपी मेरे लिए सिर्फ़ कॉपी थी। आज पता चला कि वो मेरे घर की सबसे पुरानी गवाह थी, और गवाह कभी अपनी मर्ज़ी से नहीं बोलता, उसे कोई पूछने वाला चाहिए।

दरोगा जी ने कुर्सी पीछे सरकाई। उन्होंने एक बार दरवाज़े की तरफ़ देखा, जैसे देखना चाह रहे हों कि बाहर कौन-कौन है। फिर उन्होंने अपना रजिस्टर खोला और उसमें कुछ लिखा।

"शंकर जी," उन्होंने कहा, "आपने जो नाम अभी बताया था — गोविंद — वो मुझे लिखना पड़ेगा।"

"लिखिए, साहब।"

"पर यह समझ लीजिए कि रजिस्टर में नाम आने के बाद यह सीधे ऊपर जाएगा। और ऊपर जाने का मतलब है कि उस आदमी की नौकरी, उसका घर, उसकी…" उन्होंने रुककर मेरी तरफ़ देखा। "और उसकी बेटी की शादी, सब काग़ज़ों में आ जाएगा।"

मैंने कुछ नहीं कहा।

"आपका बेटा कुछ नहीं बोल रहा," दरोगा जी ने कहा। "शंकर जी, आप बोलिए।"

पापा ने दरवाज़े की तरफ़ देखा। मुझे देखा। उनकी आँखों में एक अजीब सी बात थी — जैसे वो मेरे चेहरे पर कोई जवाब ढूँढ रहे हों। फिर उन्होंने धीरे से कहा, "साहब, मैंने आज इस बात को इस कमरे में इसलिए लाया कि मुझे अब किसी को बचाना नहीं है। बस यह बताना है कि मैंने कहाँ गलती की। जहाँ-जहाँ मैंने अंगूठा लगाया, वहाँ मेरा नाम रहेगा। मैं उससे भागूँगा नहीं। पर मेरे बेटे के नाम के नीचे जो लाइन खाली है, साहब, वो खाली ही रहे। यह मेरी आख़िरी अर्ज़ है।"

दरोगा जी ने कलम उठाई। फिर रख दी। फिर फिर उठाई।

और तभी माँ ने वो कहा जो मैं सुनना नहीं चाहता था, पर सुनना ज़रूरी था।

"साहब," उन्होंने कहा, "मुझे भी एक बात कहनी है। मेरी भी गलती है।"

दरोगा जी रुके। पापा ने उनकी तरफ़ देखा, ऐसे जैसे चश्मे के पीछे से कोई गहरा सा रास्ता दिख रहा हो।

"मैं जानती थी," माँ ने कहा, "कि हर महीने के आख़िर में घर में कोई काग़ज़ आता है। मैंने एक बार उनकी मेज़ पर पड़ा काग़ज़ उठाकर देखा भी था। उस पर अँगूठे की जगह बनी थी। मैंने वो काग़ज़ वापस रख दिया और कुछ नहीं कहा। क्योंकि मुझे डर था, साहब। डर यह नहीं था कि काग़ज़ में क्या है। डर यह था कि अगर मैंने पूछा और उन्होंने सच बता दिया, तो मुझे अपना इलाज छोड़ना पड़ेगा। और मेरे बच्चे छोटे थे।"

कमरे में चुप्पी छा गई।

"इसलिए आज आपके रजिस्टर में मेरा नाम भी लिखिए," माँ ने कहा। "सुशीला यादव। और आगे लिखिए — चुप रही।"

दरोगा जी ने माँ को देखा। मैंने उनके चेहरे पर वो भाव देखा जो पुलिस वालों के चेहरे पर कभी-कभी आ जाता है, जब वो भूल जाते हैं कि उनके सामने कोई केस नहीं, कोई आदमी बैठा है।

"सुशीला जी," उन्होंने कहा, "यह ज़रूरी नहीं।"

"यह ज़रूरी है, साहब," माँ ने कहा। "मेरे बेटे को पता चलना चाहिए कि गलती सिर्फ़ उसके पापा ने नहीं की थी।"

और मैं वहीं खड़ा रह गया। दरवाज़े पर। एक कंधा चौखट से टिका हुआ। हाथ जेब में, घंटी को दबाए हुए।

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho