The Mysterious Bell – Chapter 843
दरोगा जी ने कॉपी को मेज़ पर नहीं रखा। उन्होंने उसे दोनों हाथों से उठाकर पंखे की रोशनी की तरफ़ किया, जैसे अंधेरे में किसी की शक्ल पहचाननी हो।
"शंकर जी," उन्होंने कहा, आवाज़ वो पहली वाली नहीं थी। "आपने अभी कहा कि उस आदमी का नाम याद नहीं, हाथ याद है।"
"हाँ, साहब।"
"तो हाथ बताइए। धीरे। एक-एक चीज़।"
पापा ने सामने मेज़ पर रखे अपने हाथों की तरफ़ देखा। उनके हाथ अब भी मेज़ पर थे, उँगलियाँ खुली हुईं। बाईस साल में पहली बार ऐसा था कि वो काँप नहीं रहीं थीं। पापा ने साँस ली और बोले, "दाहिना हाथ था, साहब। उँगली पर एक अंगूठी थी। मोटी। ऐसी नहीं जैसी गली के लोग पहनते हैं। चौड़ी, भारी, और उसमें काला पत्थर जड़ा था।"
"काला पत्थर?"
"काला। और बड़ा। जब वो काग़ज़ की तरफ़ झुकते थे तो वो पत्थर मेज़ पर खट से लगता था। मुझे वही आवाज़ याद है, साहब। इतने साल बाद भी। रात को जब घर में कोई चीज़ खटकती है, तो मेरा शरीर एक बार ऐसे सिकुड़ जाता है जैसे कोई काग़ज़ फिर रख रहा हो।"
दरोगा जी ने कुछ लिखा। उनकी कलम रुकी, फिर चली।
"और उँगलियाँ?"
"उँगलियों पर स्याही थी। खासकर नाखून के नीचे। जैसे दिन भर में हाथ धोया ही न हो। वो इसलिए थी, साहब, क्योंकि उस आदमी ने उस रात पहले भी कई अंगूठे लगवाए थे। मेरी बारी बाद में आई थी।"
कमरे में एक आवाज़ हुई — बाहर की, कोई कुर्सी खींच रहा था। दरोगा जी ने सिर उठाकर दरवाज़े की तरफ़ देखा। मैंने भी देखा। बरामदे में दुबे अंकल बैठे थे, उनकी नीली शर्ट दीवार से टिकी हुई थी, और वो अपनी पुरानी छड़ी के सिरे से ज़मीन पर धीरे-धीरे लिख रहे थे। क्या लिख रहे थे, यह मुझे नहीं दिखा।
"स्याही वाला आदमी," दरोगा जी ने धीरे से कहा, "मतलब दफ़्तर का ही होगा, शंकर जी। क्योंकि स्याही ऐसे ही नहीं लगती। स्याही दफ़्तर में लगती है।"
"जैसा आप कहें, साहब।"
"मैं नहीं कह रहा, आप याद कीजिए।"
पापा ने आँखें बंद कीं। मैंने उनका चेहरा देखा। उनकी आँखों के नीचे की त्वचा पतली हो गई थी और चश्मे का टेप कान पर पीला पड़ गया था। बाईस साल में पापा का चेहरा कितना बदल गया था — यह मुझे आज पता चल रहा था। रोज़ देखने से आदमी को फ़र्क़ नहीं दिखता, यही सच है।
"एक बात और थी, साहब," पापा ने आँखें बंद रखते हुए कहा। "उस आदमी ने मेरा अंगूठा नहीं पकड़ा था। उसने सिर्फ़ स्याही की डिब्बी खोली, और कहा — अंगूठा यहाँ रखिए। फिर मेरा हाथ खुद काग़ज़ की तरफ़ गया। मैंने अपनी मर्ज़ी से लगाया, साहब। किसी ने ज़बरदस्ती नहीं की। इसीलिए यह बात मुझे अंदर से खाती रही। अगर किसी ने हाथ पकड़कर लगवाया होता, तो मैं अपने आप को कोसता नहीं। पर मैंने खुद किया।"
मेरी जेब में घंटी एक बार हिली। बिना आवाज़ के। सिर्फ़ हिली। मुझे लगा जैसे किसी ने मेरी हथेली के अंदर उँगली रख दी हो।
"और उस वक़्त आपकी नज़र किस पर थी?" दरोगा जी ने पूछा।
"काग़ज़ पर।"
"उस आदमी की शक्ल याद है?"
"नहीं।"
"कद?"
"मुझसे थोड़ा लंबा।"
"आवाज़?"
पापा चुप रहे। फिर बोले, "आवाज़ मीठी थी, साहब। बहुत मीठी। ऐसी कि आदमी सुनता रहे और लगे कि यह आदमी मेरा हित चाहता है।"
दरोगा जी ने कलम नीचे रख दी। उन्होंने पीछे झुककर कुर्सी की पीठ से अपनी कमर टिकाई और पापा को देखने लगे। कमरे में एक-दो पल चुप्पी रही। बाहर से किसी राहगीर की साइकिल की घंटी आई, फिर दूर चली गई।
"शंकर जी," दरोगा जी ने कहा, "आप आज जो बोलना चाहते हैं, पूरा बोलिए। आधा सच आधी बीमारी जैसा होता है — वो ठीक नहीं होता, बस कुछ दिन बाद फिर लौट आता है। और उसके बाद आदमी को डॉक्टर बदलना पड़ता है।"
पापा ने सिर हिलाया।
"मैं पूरा ही बोलूँगा, साहब," उन्होंने कहा। "बाईस साल पहले उस रात मैं सीधे अस्पताल से आया था। सुशीला अंदर थी। बुखार था, खून की जाँच हुई थी, और एक दवा शुरू हुई थी जिसका नाम मुझे भी ठीक से याद नहीं था, बस उसका दाम याद था। दाम ऐसा था, साहब, कि मैं उसे सुनकर अस्पताल के गलियारे में दीवार से टिक गया था। मैंने टिफ़िन का हिसाब जोड़ा, दुकान का हिसाब जोड़ा, हाथ में जो काग़ज़ थे वो दो बार उलटे-पलटे। कुछ नहीं निकला।"
वो रुके। उनका गला सूख रहा था। मैंने मेज़ पर रखा पानी का गिलास उनकी तरफ़ सरका दिया। उन्होंने उसे देखा, फिर मेरी तरफ़ देखा, और एक घूँट पिया। मुझे लगा आज वो गिलास उनके हाथ में किसी दवा की शीशी जैसा है।
"तभी वो आदमी आया," पापा ने कहा। "वो अस्पताल के बाहर खड़ा था। कहने लगा कि शंकर भाई, आपकी हालत मुझे पता है, और मैं आपका दुश्मन नहीं हूँ। ये तीन काग़ज़ हैं। अंगूठा लगा दो, इलाज चलता रहेगा। मैंने पूछा कि काग़ज़ किस चीज़ का है। उसने कहा कि यह सरकारी काग़ज़ है, अस्पताल की ज़मीन का है, और इसमें आपका नुक़सान नहीं, सिर्फ़ एक गवाही चाहिए।"
"और आपने पढ़ा नहीं?"
"मैंने पढ़ने की कोशिश की थी, साहब।" पापा की आवाज़ धीमी हो गई। "पर उस रात मेरी आँखों के आगे सिर्फ़ सुशीला का चेहरा था। अस्पताल के बेड पर वो सफ़ेद चादर में ऐसी लेटी थी जैसे कोई काग़ज़ रखा हो। मैंने सोचा, अगर मैं यह काग़ज़ पढ़ने बैठूँगा और पढ़ते-पढ़ते महीना निकल जाएगा, तो दवा कौन देगा। इसलिए मैंने पढ़ा नहीं।"
"तीनों काग़ज़?"
"तीनों नहीं। पहला काग़ज़ अंगूठा लगाने के लिए आगे रखा था। बाक़ी दो नीचे थे। उसने कहा कि अगले महीने दो और लगेंगे। मैंने कहा कि ऐसा क्यों। उसने कहा कि नियम है। अस्पताल की ज़मीन एक साथ नहीं दी जाती।"
मैंने दरवाज़े से कदम आगे नहीं बढ़ाया। पर मेरी जेब में घंटी दूसरी बार हिली, और इस बार हल्की-सी गूँज मेरी हथेली में बनी रही, जैसे किसी ने बहुत धीरे से कहा हो — सुन रहा हूँ।
"फिर तीसरी बार?" दरोगा जी ने पूछा।
"तीसरी बार मैंने पढ़े ही नहीं, साहब। दूसरे और तीसरे साल में वो आदमी खुद दुकान पर आने लगा। कभी दवा लेकर, कभी रसीद लेकर। हर महीने के आख़िर में। और हर बार काग़ज़ रखकर कहता, शंकर भाई, अंगूठा। मैं लगा देता। मुझे लगता कि अगर मैं मना करूँगा तो दवा बंद हो जाएगी।"
"आपने कभी किसी को बताया?"
"नहीं।"
"किसी को? घर में? सुशीला जी को?"
पापा ने सिर नीचे कर लिया। मैंने देखा कि उनकी गर्दन की नसें उभर आई थीं।
"मैं डर गया था, बेटा," उन्होंने कहा।
यह मुझसे नहीं कहा गया था। यह उसी कमरे में कहा गया, दरोगा जी के सामने, रजिस्टर के सामने, दीवार पर टँगी उस टेढ़ी तस्वीर के सामने। पर मुझे लगा जैसे पापा ने यह सिर्फ़ मेरे लिए कहा हो। और मेरी जेब में घंटी फिर हिली।
मुझे कुछ कहना था। मैंने महसूस किया कि मेरे मुँह में एक लाइन बन रही है — कोई बड़ी लाइन, कोई माफ़ी वाली लाइन, कुछ ऐसा जो अच्छा सुनाई दे। पर मैंने मुँह नहीं खोला। क्योंकि मुझे याद आया कि तंत्र की एक शर्त है — मरम्मत के वक़्त झूठ नहीं। और मैं उस वक़्त यह नहीं कह सकता था कि मुझे गुस्सा नहीं है। मुझे गुस्सा था। गुस्सा बाईस साल के उस आदमी पर था जिसने मेरे पापा से अंगूठा लिया, और उससे भी ज़्यादा उस आदमी पर जो आज भी अपनी कुर्सी पर बैठा मुस्कुराता है।
इसलिए मैं चुप रहा। और यही ठीक था।
तभी बाहर बरामदे में चप्पलों की आवाज़ आई। दरवाज़े पर माँ खड़ी थीं।
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