The Mysterious Bell787 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 787

7 min read November 5, 2026

हम उतरे। धीरे-धीरे। अंधेरे में हर कदम दुगुना लंबा लगता है। मुझे लगा मैं हमेशा उतरता ही रहूँगा और ये सीढ़ी कभी खत्म नहीं होगी।

फिर टिंकू ने कहा, बहुत धीमे, "उस्ताद, मेरे नीचे कुछ है।"

मेरा खून जम गया।

"क्या?"

"मेरे पैर के नीचे — सीढ़ी नहीं है। ज़मीन है।"

मैंने अपना पैर आगे बढ़ाया। ज़मीन। सपाट ज़मीन।

"हम नीचे हैं," मैंने कहा। "टिंकू, गिनती?"

"मैंने छोड़ दी थी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में शर्म थी।

"कोई बात नहीं," मैंने कहा। "अब दीवार पकड़कर चलेंगे। टिंकू बाएँ, मीरा दाएँ। उस्ताद, आप मेरे पीछे।"

"और तू?" उस्ताद ने कहा।

"मैं बीच में," मैंने कहा। "मुझे बीच में रहना आता है।"

और फिर ऊपर से आवाज़ आई।

पर ये चीख़ नहीं थी।

ये कदम थे।

धीमे कदम। लकड़ी के जूते। सीढ़ी पर एक-एक करके उतरते हुए। ठक। ठक। ठक।

मीरा ने मेरी बाँह पकड़ी। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं।

"अंकुश," उसने कहा।

"सुन रहा हूँ," मैंने कहा।

"वो ऊपर से आ रहे हैं।"

"हाँ।"

"तो हमें क्या करना चाहिए?"

मैंने अंधेरे में अपना मुँह खोला और उससे पहले कि मैं कुछ कहूँ, मेरी जेब में घंटी फिर बजी। इस बार उसकी आवाज़ में कुछ था जो मैंने पहले कभी नहीं सुना — जल्दी।

"नाम बोल," उसने कहा। "फिर से नाम बोल। अभी।"

"अंकुश यादव," मैंने कहा, ज़ोर से, और मेरी आवाज़ कमरे में गूँजी। "जगदीश यादव का पोता।"

"मीरा तिवारी," मीरा ने कहा।

"टिंकू," टिंकू ने कहा, और फिर अटका।

"पूरा नाम," घंटी ने कहा।

टिंकू ने एक गहरी साँस ली।

"टिंकू — टिंकू कुमार," उसने कहा, और उसकी आवाज़ पहली बार अपने नाम से बड़ी लगी।

उस्ताद ने अपना नाम बोला। और उनका नाम सबसे आख़िर में गूँजा, जैसे कमरे ने उसे पहचाना हो।

कदम रुक गए।

एक पल के लिए पूरा कमरा साँस रोककर बैठ गया।

फिर एक आवाज़ आई — ऊपर नहीं, सामने से। बहुत पास से। इतनी धीमी कि लगा दीवार बोल रही है।

"नाम बोलने से कुछ नहीं होता, बेटा। नाम तो काग़ज़ पर भी लिखा है। और काग़ज़ मेरे पास है।"

मैंने घंटी उँगलियों में दबाई।

और मैंने अंधेरे में वो कहा जो मुझे कहना था, चाहे मेरी आवाज़ काँप रही थी।

"तो काग़ज़ लेकर आ," मैंने कहा। "हम यहाँ खाली हाथ आए हैं।"

जवाब में जो आवाज़ आई, वो हँसी नहीं थी। वो किसी चीज़ के खिसकने जैसी थी — जैसे काग़ज़ों का ढेर एक तरफ़ से हटाया जा रहा हो।

और घंटी ने धीरे से कहा।

"वो खाली हाथ नहीं है। उसने तेरा घर उठा रखा है।"

॥

"वो खाली हाथ नहीं है। उसने तेरा घर उठा रखा है।"

घंटी की वो आवाज़ मेरे कान में ऐसे बैठ गई जैसे किसी ने ठंडी कील ठोक दी हो। मेरी जेब में घंटी अब भी गरम थी, पर उसका गरम होना अब तसल्ली नहीं दे रहा था। पहले जब वो गरम होती थी, मुझे लगता था कि वो मेरे साथ है। आज लगा कि वो मुझे चेतावनी दे रही है।

"घर?" मैंने धीरे से कहा। "कौन सा घर? मेरा घर तो — "

"बात करने का वक़्त नहीं," घंटी ने कहा। "सीढ़ी। पीछे मत देख। ऊपर चल।"

"पर वो आवाज़ — "

"वो आवाज़ जानती है तू यहाँ है। इसीलिए बोली। अब चुप कर और चल।"

मैंने मीरा का हाथ कसकर पकड़ा। उसकी उँगलियाँ बर्फ जैसी ठंडी थीं, पर उसने हाथ नहीं छुड़ाया। टिंकू मेरे बाएँ था, और मुझे उसकी साँस सुनाई दे रही थी — तेज़, छोटी, जैसे कोई दौड़कर आया हो।

"उस्ताद?" मैंने कहा।

"मैं यहाँ हूँ," उस्ताद की आवाज़ पीछे से आई। "कुर्सी उठा ली है। बोलो किधर।"

"सीढ़ी आपके सामने है," मैंने कहा। "दीवार पकड़कर। एक-एक कदम। मैं आगे जा रहा हूँ।"

"अंकुश," मीरा ने कहा, "वो कदम — वो रुक गए थे।"

"हाँ।"

"तो क्या वो ऊपर चला गया?"

मैंने अंधेरे में अपना सिर हिलाया। फिर याद आया कि वो मुझे देख नहीं सकती।

"नहीं," मैंने कहा। "वो ऊपर नहीं गया। वो कहीं और गया। उसे नाम बोलने से फ़र्क़ नहीं पड़ता — उसने खुद कहा। उसे फ़र्क़ काग़ज़ से पड़ता है। और काग़ज़ उसके पास है।"

"तो अब?" टिंकू ने कहा। उसकी आवाज़ में वो डर था जो बच्चों की आवाज़ में तभी आता है जब वो किसी बड़े को भी डरा हुआ देख लें।

"अब हम ऊपर जा रहे हैं," मैंने कहा। "तेज़। मगर बिना शोर।"

हम सीढ़ियाँ चढ़ने लगे।

मैंने पहले वाली चढ़ाई में ध्यान दिया था कि उतरते वक़्त सीढ़ियाँ कैसी लगती हैं — ठंडी, ऊपर से रेत जैसी महीन धूल फिसलती हुई। अब चढ़ते वक़्त वही सीढ़ियाँ अलग लग रही थीं। जैसे कोई मेरे पीछे खड़ा गिन रहा हो।

टिंकू धीरे-धीरे गिन रहा था। "एक। दो। तीन।"

"चुप," मैंने फुसफुसाया।

"गिनना ज़रूरी है, उस्ताद," उसने वही बात दोहराई जो मैंने उसे सिखाई थी। "अंधेरे में गिनती ही रस्सी होती है।"

मैं मुस्कुराया। डर में भी। क्योंकि वो सही कह रहा था, और मुझे अच्छा लगा कि मेरी सिखाई बात किसी के काम आ रही है।

हम चढ़ते रहे। आठ। नौ। दस।

फिर अचानक ऊपर से रोशनी की एक पतली लकीर आई। किसी ने दरवाज़ा खोला था।

"दरवाज़ा खुला है," मीरा ने कहा।

"देखा," मैंने कहा।

"तो अंदर कोई — "

"हाँ। कोई है।"

हम आख़िरी सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर पहुँचे। दरवाज़ा खुला था, और बाहर से हल्की पीली रोशनी आ रही थी — फाटक की लालटेन, या चाँद, जो भी था। मैंने दरवाज़े से सिर निकाला।

बंसीलाल ज़मीन पर बैठा था।

अपनी चारपाई के पास, दीवार से टिका हुआ, घुटने मोड़कर, दोनों हाथ ज़मीन पर टिकाए। उसका सिर झुका हुआ था, और पहले पल मुझे लगा कि उसके सिर से खून बह रहा है।

"बंसीलाल भाई!" मैं दौड़कर उसके पास गया और घुटनों के बल बैठ गया। "आपको — आपके सिर — "

मैंने उसका सिर छुआ। खून नहीं था। चोट नहीं थी। सिर्फ़ पसीना था, ठंडा पसीना, जो उसके झुर्रियों में भरा हुआ था।

"बंसीलाल भाई, आप ठीक हैं?"

उसने सिर उठाया। उसकी आँखें — मैंने उन आँखों में वो देखा जो मैंने अपनी माँ की आँखों में एक बार देखा था, जिस दिन उन्हें पहली बार अस्पताल में भर्ती किया गया था। वो डर नहीं था। वो कुछ और था। जैसे कोई अंदर से खाली हो गया हो।

"मैंने बत्ती जलाई," वो धीरे से बोला। उसकी आवाज़ फटी हुई थी। "मैं ऊपर था, चारपाई पर बैठा। मैंने सुना कि नीचे से आवाज़ आई — तेरी आवाज़, अंकुश। तू अपना नाम बोल रहा था। फिर उस्ताद का नाम आया। मैं उठा। मैंने सोचा कि बत्ती जलाकर नीचे देखूँ।"

उसने एक गहरी साँस ली। उसका हाथ काँप रहा था।

"मैंने लालटेन उठाई। और फिर — फिर कुछ हुआ।"

"क्या हुआ?" मीरा ने पूछा। वो मेरे पीछे खड़ी थी, पर उसकी आवाज़ में जो था, वो पत्रकार की आवाज़ नहीं थी। वो किसी बहन की आवाज़ थी।

"मुझे याद नहीं," बंसीलाल ने कहा। "मुझे बस इतना याद है कि मैंने लालटेन उठाई। और फिर मैं यहाँ बैठा था। ज़मीन पर। बत्ती बुझी हुई। और — और मेरे हाथ में ये।"

उसने अपना दाहिना हाथ उठाया।

उसकी उँगलियाँ काली थीं।

मैंने देखा। सिर्फ़ उँगलियाँ नहीं — उसकी हथेली पर कालिख की पतली लकीरें थीं, जैसे किसी ने उसका हाथ पकड़कर किसी काली चीज़ पर रगड़ा हो।

"बंसीलाल भाई," मैंने धीरे से कहा, "आपने कोई चीज़ छुई?"

उसने सिर हिलाया — ना में।

"मुझे याद नहीं।"

टिंकू ने मेरी कमर पकड़ ली। "उस्ताद," उसने फुसफुसाया। और उसकी आवाज़ में जो था, उसने मेरी रीढ़ ठंडी कर दी।

"क्या?"

"दीवार।"

मैंने मुड़कर देखा।

अस्पताल की पिछली दीवार — वही पीली दीवार जिस पर हम रोज़ गुज़रते हैं, जिस पर नया पीला बोर्ड लगा था — उस पर काले अक्षरों में कुछ लिखा हुआ था।

बड़े अक्षर। कालिख से। हाथ से।

तीन शब्द।

जोड़ना बंद करो।

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