The Mysterious Bell611 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 611

7 min read November 5, 2026

मेरे पीछे किसी ने साँस ली, और मुझे पता चला कि माँ खिड़की से नहीं, सीढ़ी से नीचे उतर आई थीं और मेरे ठीक पीछे खड़ी थीं।

"माँ, आपको चलना नहीं था।"

"क्या लिखा है?" उन्होंने पूछा।

मैंने पढ़कर सुनाया।

माँ ने कुछ देर उस तस्वीर को देखा, और फिर उन्होंने वही कहा जो सिर्फ़ वो कह सकती थीं।

"तस्वीर में हाथ जोड़े हैं, बेटा। हाथ में कुछ नहीं है। असली आदमी भी कुछ नहीं देता। पक्का समझ ले — यह दवाखाना इसके हाथ-जोड़े से नहीं हटेगा। और तू यहाँ खाली हाथ खड़ा है, इसलिए तेरे से भी नहीं रुकेगा। कुछ लेकर आ।"

"क्या लाऊँ?"

"सबूत," माँ ने कहा, और फिर खाँसकर रुक गईं, और काजल ने उनका हाथ पकड़ लिया। "और एक बात सुन ले। मैं इसी अस्पताल में रहूँगी। चाहे जो हो। मैं यहाँ से दूसरे दवाखाने में नहीं जाऊँगी, क्योंकि यहाँ मेरी दवा है, और यहाँ इसके लिए मेरा पैसा है।"

अब गेट के बाहर।

बबलू के चार आदमी फ़ीता लेकर ज़मीन नाप रहे थे।

एक फ़ीते का सिरा पकड़े खड़ा था, एक खींच रहा था, एक जेब से छोटा काग़ज़ निकालकर गिन रहा था, और चौथा — कमल का फूल जैसा एक आदमी — हर नाप पर एक कील ज़मीन में ठोंक रहा था। ठन, ठन, ठन।

उस आवाज़ से मेरे कान में जैसे मच्छर घुस गया।

और मरीज़ों की कतार?

वो कतार चार दिन से उसी दरवाज़े के सामने लगती थी। आज वो कतार डर से खिसक रही थी। कोई किसी से बात नहीं कर रहा था, पर सब एक-एक कदम पीछे हट रहे थे। जैसे रेलवे स्टेशन पर यह खबर फैल जाए कि ट्रेन रद्द है, और लोग बस इधर-उधर देखते रह जाते हैं।

एक बूढ़ा आदमी अपनी साइकिल पर बैठा रो रहा था।

मैं उसे पहचानता हूँ। यह वही आदमी है जो अपनी औरत को रोज़ साइकिल पर लाकर अस्पताल के सामने उतारता है। साइकिल ऐसी है कि उस पर बैठने की जगह एक ही है — बैठने वाला पीछे, पैर लटकाकर, और हाथ में बासी रोटी का डिब्बा। वो रोज़ सुबह आता है, औरत को बिठाता है, और फिर पूरी दोपहर बाहर बैठा रहता है।

आज वो डर रहा था।

"भाई," उसने मुझसे कहा, और उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई बच्चा पूछ रहा हो। "ये दवाखाना हट गया तो मेरी औरत को कौन देखेगा? नए दवाखाने में चार सौ रुपये लगते हैं, भाई। मेरे पास चार रुपये नहीं होते शाम को।"

मैं कुछ नहीं बोला। मेरे पास ऐसा कोई जवाब नहीं था।

और तभी फ़ीता लेकर नापने वाला एक आदमी उस आदमी के पास आया और उससे कहा —

"काका, ज़रा हट जाइए। नाप में आ रहे हैं।"

तुम सोच रहे होगे कि मैंने उसे झापड़ क्यों नहीं लगाया।

मैंने सोचा। बहुत सोचा। पर मैं जानता था कि झापड़ से आस्पताल काग़ज़ की तारीख़ से कुछ दिन आगे नहीं खिंचेगा, और उससे पीछे मेरा गला ज़रूर पकड़ा जाएगा।

इसलिए मैंने आवाज़ निकाली, बहुत आराम से।

"भाई साहब, इतनी जल्दी क्या है? दवाखाने की दीवारें भी आपसे पहले टूटेंगी। बीस साल से घास नहीं छुई उनको, आप चार दिन में मशीन लाने की बात कर रहे हो।"

नापने वाले ने फ़ीता ज़मीन पर गिरा दिया और मेरी तरफ़ देखा।

"तू कौन है?"

"मैं वो हूँ जिसने यह दुकान उस दीवार के उस पार खोली है," मैंने कहा, और पीछे मुड़कर गली की तरफ़ इशारा किया, "जहाँ कुत्ता भी नहीं जाता था। मेरे पास आठ रुपये की चाय है, तुम्हारे पास एक फ़ीता है। दोनों में ईमानदारी से देख लो — किसका काम पहले होगा।"

कमल जैसे चेहरे वाला आदमी आगे आया। "बबलू साहब से पूछ लेना।"

"बबलू साहब से मैं खुद पूछूँगा," मैंने कहा। "उन्होंने मेरा गला एक बार पकड़ा था। दूसरी बार पकड़ेगा तो मैं उसकी चेन तोड़ दूँगा। सोना बहुत लोग देखते हैं, भाई, असली होना अलग बात है।"

पीछे से किसी ने हँसी छोड़ी। कतार की हँसी थी। छोटी, दबी हुई, पर थी।

और उसी हँसी में फ़ीता फिर ज़मीन पर गिरा।

तभी अस्पताल का दरवाज़ा खुला, और डॉक्टर इसरानी बाहर आए।

उन्होंने सफ़ेद कोट नहीं पहना था। कोट अंदर काजल के पास था। वो सिर्फ़ एक पुरानी शर्ट और पैंट में थे, हाथ में एक मरीज़ की परची, और चश्मा ऑंख से नीचे खिसका हुआ।

उन्होंने फ़ीता देखा। फिर बबलू के आदमियों को देखा। फिर कतार को देखा।

और उन्होंने इतनी धीमी आवाज़ में बात की कि गली के मोड़ तक सिर्फ़ उनका आख़िरी वाक्य पहुँचा — पर वो वाक्य हवा में टँग गया।

"मैं बयालीस साल से इस दवाखाने में बैठा हूँ," उन्होंने कहा। "जब मैं आया तब इस गली में पक्का रास्ता भी नहीं था। मैंने यह ज़मीन नहीं बेची। मेरी बीवी इसी इमारत में नर्स थी, और उसने इसकी दीवारें पीली रखने के लिए अपनी साड़ी की कीमत तक दे दी थी।"

उन्होंने परची सीने की जेब में रखी।

"अब सुन लो, सब के सब। जब तक इस दवाखाने में एक भी मरीज़ है — एक — यह दवाखाना बंद नहीं होगा। तुम काग़ज़ लाओ, तारीख़ लाओ, मशीन लाओ। मेरी कुर्सी वहाँ से नहीं हिलेगी। और अगर मेरी कुर्सी नहीं हिली, तो तुम्हारी मशीन इस दीवार को छूने से पहले मुझे छूएगी।"

कतार खड़ी रह गई।

बूढ़ा आदमी, जो अपनी औरत को साइकिल पर लाता है, साइकिल से उतरा, और उसने अपना माथा डॉक्टर साहब की तरफ़ झुकाया। बस इतना।

और मुझे उस पल ऐसा लगा कि यह अस्पताल आज बच गया। सच में बच गया। कोई जादू नहीं, कोई घंटी नहीं। सिर्फ़ एक बूढ़ा आदमी जो अपनी कुर्सी से नहीं हिला।

मैंने काजल की तरफ़ देखा। वो दरवाज़े के अंदर खड़ी थी, सफ़ेद कोट में, और उसके हाथ में स्टेथोस्कोप था, और वो अपने आँसू पोंछ नहीं रही थी, जानबूझकर नहीं पोंछ रही थी।

फिर आए दुबे अंकल।

वो थाने के बाहर अपनी कुर्सी पर बैठते हैं, और उनकी कुर्सी की आड़ में बच्चे छिपकर बातें सुनते हैं। आज वो सीधे अस्पताल के गेट तक आए। वही नीली शर्ट, जो वर्दी जैसी है पर वर्दी नहीं है, और हाथ में एक पुरानी कॉपी, जिसके कोने मुड़े हुए थे।

उन्होंने अपना चश्मा साफ़ किया, कॉपी खोली, और उस पीली पट्टी की तरफ़ इशारा किया।

"तारीख़ पढ़ो," उन्होंने कहा।

नापने वालों में से किसी ने कुछ नहीं कहा।

"काग़ज़ पर जो तारीख़ लिखी है, उससे पहले कोई मशीन नहीं चलेगी," दुबे अंकल ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो रिटायरमेंट के बाद भी नहीं जाती। "मैं रिटायर हूँ, अंधा नहीं। तुम अपनी मशीन उस तारीख़ से एक दिन पहले लाओगे, तो मेरी शिकायत तुम्हारे मालिक के दफ़्तर पहुँचने से पहले थाने पहुँच जाएगी। और मैं इस गली का आदमी हूँ — मेरी शिकायत काग़ज़ में नहीं, लोगों के मुँह में लिखी जाएगी।"

उन्होंने कॉपी बंद की और कुर्सी की तरफ़ लौट गए।

और फिर आई शबनम आपा।

मैं तुम्हें बताना भूल गया कि शबनम आपा जब गुस्से में होती हैं तो उनका चेहरा नहीं बदलता — उनकी आवाज़ बदल जाती है। वो धीमी हो जाती हैं, और उनकी आवाज़ में उतनी ही मिठास आ जाती है जितनी गुड़ में होती है, और उसी मिठास से लोगों के कान जलने लगते हैं।

वो गुमटी से एक ट्रे लेकर आईं — उसमें दस गिलास चाय, और एक थाली में समोसे, और चाय की भाप उनके चश्मे पर जम गई, और उन्होंने चश्मा उतारकर कमर पर खोंस दिया।

"अरे, तो तुम लोग यहाँ नाप रहे हो," उन्होंने कहा, और बहुत प्यार से कहा। "कितना अच्छा काम करते हो। मेहनत वालों के लिए मेरे यहाँ चाय है।"

फ़ीता पकड़े आदमी ने हाथ बढ़ाया।

और शबनम आपा ने ट्रे उसके हाथ से बचाकर पीछे रख दी और अपनी लोहे की चिमटी उठा ली।

"पहले बताओ, तुमने यह फ़ीता किसकी ज़मीन पर बिछाया है?"

"मैडम, हम तो आदेश पर आए हैं।"

"आदेश किसका?"

"बबलू साहब का।"

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho