The Mysterious Bell – Chapter 583
"अब सुनो," मैंने कहा। "आज सिर्फ़ एक काम है। पीपल के नीचे चबूतरी पर दो बुज़ुर्ग बैठते हैं। एक कोने में बाबा इक़बाल, दूसरे कोने में लाला बद्रीनाथ। दोनों के बीच कोई नहीं बैठता। कोई एक-दूसरे की तरफ़ नहीं देखता। मुझे जानना है कि क्यों।"
"पता है मुझे," सानिया ने कहा, और मैंने देखा कि उसकी आँखों में वो चमक फिर आ गई थी।
"कैसे?"
"शबनम आपा ने बताया था। पर पूरा नहीं बताया। बोलीं कि अभी तुम छोटी हो, बाद में बताऊँगी।"
"तो जाओ," मैंने कहा। "शबनम आपा के पास जाओ। चाय पीने के बहाने बैठो। और जो वो बताएँ, ध्यान से सुनो।"
वो चले गए। मैं दुकान के बाहर खड़ा रहा, हाथ में पेचकस। आसमान साफ़ था, पीपल की पत्तियाँ हल्की हवा में हिल रही थीं। मैंने दूर से देखा — चबूतरी पर दो सफ़ेद आकृतियाँ बैठी थीं, एक-दूसरे से दूर, जैसे एक ही चबूतरी पर दो अलग दुनिया।
थोड़ी देर बाद बच्चे लौटे। सानिया आगे थी, और उसके चेहरे पर वो भाव था जो बच्चों के चेहरे पर तब आता है जब उन्हें कोई बड़ा राज़ मिल जाए।
"उस्ताद," उसने कहा, "शबनम आपा ने बताया — दोनों के बेटे थे। साथ पढ़ते थे। एक साइकिल पर स्कूल जाते थे।"
"फिर?"
"तो एक दिन साइकिल पलट गई। दोनों गिरे। लाला बद्रीनाथ के बेटे के सिर पर चोट लगी। बाबा इक़बाल के बेटे का हाथ टूटा। और दोनों बापों ने… एक-दूसरे पर इल्ज़ाम लगा दिया।"
"क्या इल्ज़ाम?"
"बाबा इक़बाल ने कहा कि लाला बद्रीनाथ का बेटा ही साइकिल चला रहा था। उसने लापरवाही की, इसलिए मेरे बेटे का हाथ टूटा। और लाला बद्रीनाथ ने कहा कि बाबा इक़बाल का बेटा चला रहा था। उसने साइकिल मोड़ने में ग़लती की।"
"और फिर?"
"और फिर दोनों ने बात करनी बंद कर दी। बस। पचास साल से।"
मैंने गहरी साँस ली। इतनी सी बात। इतनी सी बात पर पचास साल।
"एक बात और," गुड्डू ने कहा, जो अब तक चुप था। "शबनम आपा ने कहा कि लाला बद्रीनाथ का बेटा, वो अब दिल्ली में रहता है। और वो दो साल पहले गली में आया था। किसी से मिलने।"
"किससे?"
"शबनम आपा को नहीं पता।"
मैंने घंटी को जेब में टटोला। वो ठंडी थी।
"चलो," मैंने कहा। "तुम चारों गुमटी पर रुको। और आज जो भी हो, मेरे पास मत आना। जब मैं बुलाऊँ, तब आना।"
वो समझ गए। बच्चों को एक बात समझानी नहीं पड़ती — जब बड़ा कहता है "रुको", तो रुकना होता है।
मैं पीपल की तरफ़ चला। धूप अब तेज़ हो रही थी। चबूतरी पर बाबा इक़बाल बैठे थे — सफ़ेद दाढ़ी, सफ़ेद टोपी, हाथ में तस्बीह, आँखें बंद। दूसरे कोने पर लाला बद्रीनाथ — दुबले, पीली धोती, गमछा कंधे पर, लाठी के सहारे, आँखें खुली पर दूर कहीं।
मैं बीच में जाकर खड़ा हो गया।
"बाबा इक़बाल," मैंने कहा। "लाला बद्रीनाथ। मैं अंकुश हूँ। यहाँ गली में दुकान है मेरी।"
बाबा इक़बाल ने आँखें खोलीं। देखा। फिर बंद कर लीं। "जानता हूँ तुझे," उन्होंने धीमे से कहा। "तू वही है जो इन बुज़ुर्गों को जोड़ता फिरता है।"
"काम यही है मेरा।"
"काम?" लाला बद्रीनाथ ने कहा, बिना मेरी तरफ़ देखे। "यह काम नहीं है, बेटा। यह तमाशा है।"
"हो सकता है," मैंने कहा। "पर आप दोनों को देखकर लगता है कि तमाशा नहीं, सन्नाटा है। और सन्नाटा तमाशे से भारी होता है।"
दोनों चुप हो गए।
"मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ," मैंने कहा। "आप दोनों के बेटे थे। वो अब कहाँ हैं?"
बाबा इक़बाल ने तस्बीह पर उँगली रोक दी। "मेरा बेटा भोपाल में है। दूसरी गली में रहता है। पर… आता नहीं।"
"क्यों?"
"क्योंकि मैंने उसे मना किया था। मैंने कहा था — उस घर मत जाना, उस आदमी से मत बोलना।"
"और आपका बेटा?" मैंने लाला बद्रीनाथ की तरफ़ देखा।
"दिल्ली," उन्होंने कहा, और आवाज़ में कुछ ऐसा था जैसे कोई बहुत पुरानी चीज़ उठा रहा हो। "दो साल पहले आया था। फिर चला गया।"
"आपने उससे बात की थी?"
"क्या बात करता? वो आया, मुझे देखा, चला गया। दस मिनट भी नहीं बैठा।"
मैंने एक कदम आगे बढ़ाया। "लाला जी, आपके बेटे ने शबनम आपा से कुछ पूछा था। वो आज सुबह मेरे पास आया। और मैंने सोचा कि आपको बताना चाहिए।"
लाला बद्रीनाथ ने पहली बार मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें धुँधली थीं, पर अंदर कुछ तेज़ था।
"क्या पूछा था?"
"उन्होंने पूछा था कि बाबा इक़बाल अभी भी उसी चबूतरी पर बैठते हैं? और क्या वो अभी भी गुस्से में हैं?"
चबूतरी पर सन्नाटा छा गया। बाबा इक़बाल ने आँखें खोल लीं। उनकी तस्बीह हाथ से छूटकर पत्थर पर गिरी।
"उसने मेरा नाम लिया?" उन्होंने पूछा, आवाज़ काँप रही थी।
"हाँ," मैंने कहा। "और एक बात और। उसने शबनम आपा से यह भी कहा था कि वो उनसे मिलना चाहता है। पर डरता है।"
"किससे डरता है?"
"शायद इससे कि आप अभी भी उसे ग़लत मानते हैं।"
लाला बद्रीनाथ ने लाठी उठाई और फिर रख दी। उनके हाथ काँप रहे थे।
"मैं नहीं मानता," वो धीमे से बोले। "मैंने तो कभी उसके बेटे को ग़लत नहीं कहा। मैंने तो बस यह कहा था कि बच्चे ध्यान से चलाएँ।"
"तो आपने मुझे पचास साल तक यह क्यों नहीं बताया?" बाबा इक़बाल ने कहा। उनकी आवाज़ अब धीमी नहीं थी, दर्द से भरी थी। "तुमने मुझे कहा था — तुम्हारा बेटा लापरवाह है। तुमने मुझ पर इल्ज़ाम लगाया था।"
"मैंने इल्ज़ाम नहीं लगाया था, इक़बाल। मैंने बस… मैंने बस यह कहा था कि तेरा बेटा भी उस साइकिल पर था। मैंने यह नहीं कहा कि उसने धक्का दिया।"
"तुमने कहा था कि सिर्फ़ मेरे बेटे की वजह से तुम्हारे बेटे का सिर फूटा।"
"क्योंकि मुझे तब गुस्सा आ रहा था। मेरे बेटे का सिर फूटा था, ख़ून बह रहा था। मैं डर गया था।"
दोनों के बीच पहली बार कुछ ऐसा हुआ जो पचास साल में नहीं हुआ था — दोनों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा। सीधे।
और उसी पल मेरी जेब में घंटी बजी। ज़ोर से। इतना ज़ोर से कि मैं चौंक गया।
मैंने घंटी निकाली। वो गरम थी, हाथ जलाने लगी थी।
"क्या?" मैंने धीरे से कहा।
"बोल," घंटी ने कहा। "अब तेरी बारी। उनसे वो बात कह जो तूने आज तक किसी को नहीं कही।"
मेरा गला सूख गया। मैं समझ गया कि घंटी क्या कह रही है।
"बाबा इक़बाल," मैंने कहा। "लाला बद्रीनाथ। मैं आप दोनों को एक बात कहना चाहता हूँ। जो मैंने कभी किसी को नहीं कही।"
दोनों ने मेरी तरफ़ देखा।
"मैं अपने घर को नहीं बचा पाऊँगा, ऐसा मुझे लगता है। रोज़ लगता है। सुबह उठते ही लगता है। मैं हँसता हूँ, आप दोनों के सामने भी हँस रहा हूँ, पर अंदर एक डर है कि जब ज़रूरत पड़ेगी, तब मैं अकेला रह जाऊँगा। मैं सब ठीक करना चाहता हूँ, अकेले। और मुझे पता है कि अकेले कुछ नहीं ठीक होगा। यह बात मैंने अपने पापा से भी नहीं कही। आज आपसे कह रहा हूँ, क्योंकि आप दोनों पचास साल से उसी डर में बैठे हैं — कि कहीं सामने वाला मान न ले, कहीं उसे पता न चल जाए कि मैं कमज़ोर हूँ।"
चबूतरी पर सन्नाटा। इतना गहरा कि पीपल की पत्ती की आवाज़ भी सुनाई दे रही थी।
बाबा इक़बाल ने पहली बार अपनी तस्बीह उठाई और उसे जेब में रखा। फिर धीमे से बोले, "मैंने पचास साल तक सोचा कि मैंने अपने बेटे को उस आदमी से बचाया है। पर सच यह है कि मैंने उसे उसके दोस्त से दूर कर दिया।"
लाला बद्रीनाथ ने लाठी को दीवार से टिकाया। "और मैंने पचास साल तक सोचा कि मैं सही हूँ। पर सच यह है कि मैं चुप रह गया, क्योंकि मुझे लगा कि अगर मैंने कहा कि दोनों बच्चे बराबर के ज़िम्मेदार थे, तो मेरा बेटा भी ग़लत साबित होगा। और मैं अपने बेटे को ग़लत नहीं देखना चाहता था।"
"तो अब?" मैंने पूछा।
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