The Mysterious Bell – Chapter 582
"मेरे बाप के पास भी थी एक घंटी," उन्होंने कहा। "ट्रक चलाते थे। हर मोड़ पर दबाते थे। मरने से पहले उसने मुझे दी थी। पर मैंने इसे कभी नहीं बजाया। खौफ़ लगता था। लगता था कि बजाओगे तो कोई ऐसी खबर आएगी जो तुम नहीं सुनना चाहते।"
"और भोलानाथ काका?"
भोलानाथ काका ने नीचे देखा। "मेरी बीवी के पास थी एक। छोटी, पीतल की। हमारे झगड़े के बाद उसने उसे कबाड़ी को दे दिया। कहा कि जिस घर में घंटी चुप हो जाए, उस घर में न घंटी रखो, न याद।"
दोनों ने एक-दूसरे को देखा। इक़बाल चाचा हल्के से हँसे। भोलानाथ काका भी मुस्कुराए। फिर दोनों चुप हो गए, और उस चुप्पी में अब कुछ कड़वा नहीं था।
मेरी जेब में घंटी गरम हो गई। मैंने उसे हथेली पर निकाला।
"अब मत बोल," मैंने धीरे से कहा। "ये लोग अभी खुद बोल रहे हैं।"
घंटी ने धीमी आवाज़ में कहा, "मैंने कुछ नहीं कहा। बस यह बता रही हूँ कि तूने आज ज़मीन से पहला काँटा निकाला है। यह काँटा गहरा था, अंकुश। इसे निकालने में तेरे हाथ कटे, उनके हाथ कटे, और मीरा की ज़ुबान भी कटी। पर निकला।"
"अब क्या?"
"अब बच्चे आ रहे हैं," घंटी ने कहा। "देख, गली के मोड़ पर।"
मैंने पलटकर देखा। गली के मोड़ से चार साये भागते हुए आ रहे थे। सानिया आगे, उसके पीछे गुड्डू, रफ़ीक़, और सबसे पीछे छोटा चिंटू, जो अपनी पैंट का घुटना पकड़कर दौड़ रहा था।
सानिया के हाथ में वो लाल कवर कॉपी थी, जिस पर उसने खुद मोटे अक्षरों में लिखा था — नाम नहीं, बस एक घेरा और उसके अंदर चार तारीख़ें।
"उस्ताद!" वो चिल्लाई, साँस फूली हुई। "उस्ताद, तीन और ट्रक!"
"धीरे," मैंने कहा। "पहले साँस ले।"
"नहीं, सुनो," उसने कहा, कॉपी खोलते हुए। "सुबह सात बजे वाला ट्रक — पीली पट्टी, भारद्वाज का नाम। फिर नौ बजे — वही। फिर ग्यारह बजे — वही। तीन ट्रक, तीनों खाली आए, भरे हुए गए। मैंने शक्ल भी लिखी है। एक पर पीली मिट्टी थी, दूसरे पर सीमेंट की बोरियाँ, तीसरे पर… कुछ समझ नहीं आया। दबा हुआ था। बोरे से ढका हुआ।"
"कहाँ से आए?"
गुड्डू आगे आया। उसने अपनी जेब से एक काग़ज़ का टुकड़ा निकाला, जिस पर उसने कोयले से कुछ लिखा था — जैसे कोई नक्शा।
"पुराने बिजलीघर की तरफ़ से नहीं आए," उसने कहा। "नए बाज़ार की तरफ़ से आए। तीनों। और वापस भी उसी तरफ़ गए। पर एक बार वो पीछे के प्लॉट में रुके। जहाँ अस्पताल की पिछली दीवार दिखती है। वहाँ चालीस मिनट रुके। मैंने गिना।"
रफ़ीक़ ने कहा, "और उस्ताद, वहाँ एक आदमी खड़ा था। सफ़ेद कुर्ता, हाथ में फ़ाइल। वो ट्रक वालों से कुछ बोल रहा था। दूर से दिख रहा था, पर सुनाई नहीं दे रहा था। फिर वो गाड़ी में बैठकर चला गया। सफ़ेद गाड़ी।"
चिंटू ने अपनी जेब से एक टॉफ़ी निकाली, उसे खोला, मुँह में डाला, और फिर बोला, "और उस्ताद, वो सफ़ेद गाड़ी वाला आदमी आज दुकान की तरफ़ भी देख रहा था। मैंने देखा। वो धीरे चला रहा था, फिर खिड़की से बाहर झाँका, फिर चला गया।"
मेरी नज़र सानिया पर गई। वो मुस्कुरा रही थी, और उसकी आँखों में वो चमक थी जो बच्चों की आँखों में तब आती है जब उन्हें पहली बार लगता है कि उनकी बात किसी ने सच में सुनी है।
"अच्छा किया," मैंने कहा। "अब सुनो। तुम चारों ने जो किया है, वो आसान नहीं था। पर अब काम और मुश्किल है।"
चारों एक साथ सीधे खड़े हो गए। जैसे फौजी।
"कल सुबह सात बजे से पहले दुकान पर आ जाना। मैं तुम्हें एक काग़ज़ दूँगा — तारीख़, वक़्त, गाड़ी का रंग, कहाँ रुकी, कितनी देर। सब लिखना। और जो तुम देख न सको, उसे अनुमान से मत लिखना। खाली जगह छोड़ देना। खाली जगह भी एक जवाब है। समझे?"
"समझे, उस्ताद," सानिया ने कहा।
"और एक बात," मैंने कहा। "ये काम खतरनाक हो सकता है। अगर कोई तुमसे पूछे कि तुम क्या कर रहे हो, तो कहना स्कूल का प्रोजेक्ट है। झूठ नहीं, प्रोजेक्ट। तुम सच में प्रोजेक्ट कर रहे हो। बस इसे किसी को पूरा मत बताना।"
"उस्ताद," चिंटू ने कहा, टॉफ़ी चबाते हुए, "अगर वो हमें पकड़ लें तो?"
"तो मेरा नाम मत लेना," मैंने कहा। "कहना कि तुम खुद देख रहे थे। बच्चों को देखने का हक है।"
"और अगर वो डराएँ?" गुड्डू ने पूछा।
"तो उन्हें कहना कि डरने के लिए तुम्हें अभी उम्र नहीं मिली। डर बड़ों की चीज़ है। तुम्हारा काम देखना है, डरना नहीं।"
सानिया हँसी। गुड्डू भी। फसानिया हँसी। गुड्डू भी। फिर रफ़ीक़ और चिंटू भी हँसने लगे। और मैंने देखा कि उनकी हँसी में वो बात थी जो बड़ों की हँसी में नहीं होती — न कोई हिसाब, न कोई डर। बस खुली हँसी, जैसे गली में पहली बारिश के बाद बच्चों के पैर फिसलते हैं और वो गिरकर भी हँसते हैं।
"अच्छा, अब जाओ," मैंने कहा। "सुबह सात बजे आना। और हाँ, याद रखना — पहले देखो, फिर लिखो। जो दिखे वही लिखो। जो न दिखे, उसके आगे खाली जगह छोड़ दो। खाली जगह भी एक जवाब होता है।"
"उस्ताद," चिंटू ने कहा, मुँह में टॉफ़ी घुमाते हुए, "कल सुबह मैं तुम्हारे लिए एक चीज़ लाऊँगा।"
"क्या?"
"पता नहीं। पर लाऊँगा।"
मैं हँस पड़ा। यही तो फ़र्क़ है बच्चों और बड़ों में। बड़े कहते हैं, "मैं कुछ लाऊँगा" तो पहले दस बार सोचते हैं कि लाएँगे या नहीं। बच्चे कहते हैं और अगली सुबह चीज़ हाथ में होती है, चाहे वो एक टूटा हुआ पत्थर ही क्यों न हो।
वो चले गए। मैंने दुकान का दरवाज़ा बंद किया, पीछे वाले कमरे में गया और चारपाई पर गिर पड़ा। शरीर थका हुआ था, पर दिमाग़ में एक ही आवाज़ घूम रही थी — उस्ताद की वो बात कि घर का तीसरा सच भीतर का है, बिना लड़े नहीं खुलेगा।
मैंने जेब से घंटी निकाली। चाँद की रोशनी में पीतल चमक रहा था। मैंने उसे हथेली पर रखा और देर तक देखता रहा।
"सो जा," घंटी ने धीमे से कहा। "कल भारी दिन है।"
"कितना भारी?"
"जितना तू सोच नहीं सकता।"
"यही तो तेरी आदत है," मैंने कहा। "कभी सीधा जवाब नहीं देती।"
"सीधा जवाब सुनने की हिम्मत रखता है तू?"
"रखता हूँ।"
"तो सुन। कल पीपल के नीचे दो आदमी बैठे होंगे। दोनों ने पचास साल से एक-दूसरे की शक्ल तक नहीं देखी। उनके बीच जो टूटा है, वो तेरे उस्ताद के झगड़े से भी पुराना है। और उसे जोड़ने के लिए तुझे वो बात कहनी पड़ेगी जो तूने आज तक किसी को नहीं कही।"
"कौन सी बात?"
पर घंटी चुप हो गई। ठंडी हो गई, जैसे कोई पत्थर।
मैंने करवट बदली। नींद नहीं आई।
सुबह पाँच बजे माँ की चूल्हे की आवाज़ आई। मैं उठा, मुँह धोया, और दुकान खोलने लगा। सात बजे से पहले चारों बच्चे आ गए — सानिया के हाथ में लाल कवर कॉपी, गुड्डू के हाथ में एक छोटी पेंसिल, रफ़ीक़ के हाथ में टूटा हुआ प्लास्टिक का स्केल, और चिंटू के हाथ में… एक पत्थर।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
"पत्थर," चिंटू ने गर्व से कहा।
"देख तो रहा हूँ। पर किसलिए?"
"तुमने कहा था न, खाली जगह भी जवाब होती है। तो मैंने सोचा, अगर कल कुछ न दिखे, तो ये पत्थर रख देंगे उस जगह।"
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। "तू बड़ा होकर या तो बहुत बड़ा आदमी बनेगा, या बहुत बड़ा सिरदर्द।"
"दोनों," उसने कहा, और टॉफ़ी चबाने लगा।
मैंने उन्हें काग़ज़ दिए। चार काग़ज़, चार हाथ। ऊपर तारीख़, वक़्त, गाड़ी का रंग, कहाँ रुकी — सब खाने बनाए थे।
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