The Mysterious Bell580 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 580

7 min read November 5, 2026

सानिया सबसे आगे थी, हाथ में लाल कवर वाली कॉपी। उसके पीछे गुड्डू, रफ़ीक़ और सबसे पीछे चिंटू, जो चलते-चलते अपने घुटने पर बँधी पट्टी देख रहा था।

"उस्ताद," सानिया ने कहा, "हम सात बजे आ गए। आपने कहा था काम देंगे।"

मैं मुस्कुराया। "आ जाओ। पहला काम — ये ट्रंक। इसमें पेच, नट, बोल्ट सब मिले-जुले पड़े हैं। मुझे साइज़ के हिसाब से अलग चाहिए। बड़े वाले एक तरफ़, छोटे दूसरी तरफ़।"

"बस इतना?" गुड्डू ने कहा, जैसे उसे धोखा मिला हो।

"बस इतना नहीं," मैंने कहा। "जो गलत साइज़ वाले बोल्ट सही जगह नहीं लगते, वो या तो छेद बड़ा कर देते हैं या गाड़ी में ढीले रह जाते हैं। और ढीला बोल्ट सबसे ख़तरनाक चीज़ है। पहली गड्ढे में पता चलता है, और तब तक देर हो चुकी होती है। तुम लोग आज से मेरी दुकान के हिसाब रखने वाले हो।"

सानिया की आँखें चमकीं। चारों ट्रंक के पास बैठ गए, जैसे कोई खज़ाना मिला हो। रफ़ीक़ ने बड़े बोल्ट वाला डिब्बा उठाया और छोटों में डाल दिया, तो चिंटू ने उसका हाथ पकड़ लिया — "अरे नहीं, ये बड़ा है, इसका घर दूसरी तरफ़ है।"

मैं उन्हें देखता रहा और मुझे अचानक याद आया कि तेरह साल की उम्र में मैं भी ऐसा ही बैठा था, दादा के औज़ारों के सामने, और मुझे लगता था कि मैं दुनिया का सबसे बड़ा काम कर रहा हूँ।

आठ बजे मैंने कहा, "चलो, चाय पिलाता हूँ।"

चारों एक साथ चिल्लाए। हम शबनम आपा की गुमटी पर गए।

"अरे," शबनम आपा ने चिमटी उठाकर कहा, "आज पूरी फ़ौज आ गई।"

"आपा," सानिया ने कहा, "हम अंकुश उस्ताद के साथ काम करते हैं।"

"अच्छा?" आपा ने मेरी तरफ़ देखा। "तो अब तेरे पास चेले भी हैं।"

"छह महीने पहले मेरे पास कुछ नहीं था," मैंने कहा। "अब चार चेले हैं, एक ट्रंक, और एक घंटी।"

आपा हँसीं। उन्होंने पाँच कप चाय डाली, और चारों के आगे समोसे का प्लेट रख दिया। "ये मेरी तरफ़ से," उन्होंने कहा। "गली के बच्चे जब काम करने लगें, तो चाय मेरी।"

सानिया ने तुरंत अपनी लाल कॉपी खोली। "आपा, मैंने ये कॉपी रखी है। इसमें ट्रकों की तारीख़, वक़्त और शक्ल लिखी है। कल छह ट्रक आए थे। पीली पट्टी पर भारद्वाज लिखा था। और एक ट्रक ने अस्पताल की दीवार के पास मिट्टी डाली, पर वो मिट्टी लाल थी, बाकी सब पीली।"

मैंने चाय का कप नीचे रख दिया। "लाल मिट्टी?"

"हाँ। जैसे खुदाई की मिट्टी।"

रफ़ीक़ ने कहा, "और उस्ताद, पीपल के नीचे दो बूढ़े आते हैं। एक सुबह आता है, एक शाम। दोनों एक-दूसरे को देखते हैं, पर बोलते नहीं। बत्तीस साल से।"

"कौन?" मैंने पूछा।

"बाबा क़ादिर," चिंटू ने कहा, और मुँह में समोसा ठूँस लिया।

"और लाला बद्रीप्रसाद," गुड्डू ने कहा।

मैंने शबनम आपा की तरफ़ देखा। उनके हाथ की चिमटी रुक गई।

"क़ादिर और बद्री," आपा ने धीरे से कहा, जैसे कोई पुराना नाम याद कर रही हों। "हलवाई के दो साझेदार। बाज़ार में उनकी दुकान थी — क़ादिर और बद्री की हलवाई। पेड़े, बर्फ़ी, और एक ऐसा कलाकंद कि लोग दूर से आते थे।"

"तो फिर?" मैंने पूछा।

"तो फिर एक रात," आपा ने कहा, "एक बड़ा ऑर्डर आया। शादी का। पाँच सौ पेड़े। और सुबह जब लोगों को बाँटा गया, तो वो पेड़े बासी थे। या कम थे। या… मुझे पूरा नहीं पता। बस इतना पता है कि उस दिन के बाद दुकान बंद हो गई। और दोनों ने बत्तीस साल से एक-दूसरे से बात नहीं की।"

"किसने किस पर इल्ज़ाम लगाया?" मैंने पूछा।

"यही तो नहीं पता," आपा ने कहा। "किसी ने किसी से पूछा ही नहीं। दोनों ने बस एक-दूसरे को देखना बंद कर दिया। और गली ने भी पूछना बंद कर दिया। यही गली की सबसे बड़ी बीमारी है, अंकुश — हम पूछना बंद कर देते हैं।"

मैंने चाय ख़त्म की और खड़ा हो गया।

"तुम चारों," मैंने कहा, "मुझे एक काम चाहिए। बाबा क़ादिर के घर जाओ। उनकी अलमारी में एक लोहे का बाट रखा है, कपड़े में लिपटा। और लाला बद्री के आँगन में एक पुराना काँटा टँगा है, ज़ंग लगा। मुझे दोनों चाहिए। कहना कि अंकुश मिस्त्री ने भेजा है, वो काँटा ठीक करेगा।"

"और अगर वो न दें?" सानिया ने पूछा।

"तो वापस आ जाओ। किसी से झगड़ना नहीं। और हाँ — जो भी दें, दोनों हाथ से लेना। कभी भी किसी बूढ़े के हाथ से चीज़ खींचकर मत लेना। हम मरम्मत करते हैं, लूट नहीं।"

चारों भाग गए।

मैं घर की तरफ़ चला। आठ बजकर पंद्रह। सभा दस बजे थी। माँ अब तक अस्पताल से लौट आई होंगी या काजल के साथ निकल गई होंगी।

घर का दरवाज़ा खुला था। अंदर पापा फ़र्श पर बैठे थे। सामने टूटा पंखा खुला पड़ा था — तार टूटा हुआ, ब्लेड हिलते हुए। उन्होंने आधी रात से उसी पंखे को देखा था, मुझे लगता है। कह रहे थे कि ठीक करूँगा, पर कुछ नहीं किया।

"पापा," मैंने कहा।

उन्होंने सिर उठाया। आँखें सूजी हुई थीं। चश्मा कान पर टेप से बँधा था, टेप की एक परत खुल गई थी।

"रोटी रखी है," उन्होंने कहा। "माँ ने रखी है। तू खा ले।"

"आपने खाई?"

चुप्पी।

मैंने पानी का गिलास भरकर उनके आगे रख दिया। फिर उनके बगल में बैठ गया। दोनों चुप। बस पंखे का खुला तार दीवार पर पड़ा था, जैसे कोई उँगली।

"पापा," मैंने कहा, "दस बजे मैं आपको नहीं बोलने दूँगा कि क्या बोलना है। आप जो बोलेंगे, बोलेंगे।"

उन्होंने पानी उठाया। एक घूँट पिया। फिर बोले, "तूने बोर्ड साफ़ किया।"

"हाँ।"

"क्या लिखा था उस पर?"

"शंकर यादव और बेटे।"

पापा ने गिलास नीचे रख दिया। उनका हाथ काँप रहा था, और उन्होंने उसे दूसरे हाथ से दबा लिया। "मैंने वो बोर्ड अपने हाथ से टाँगा था," उन्होंने कहा। "बीस साल पहले। और जिस दिन अंगूठा लगाया, उस दिन उसी बोर्ड के नीचे खड़े होकर मैंने सोचा था कि मैं इस लायक़ नहीं हूँ।"

मैं कुछ नहीं बोला। घंटी ने कहा था, पहले सुनना।

"अच्छा," उन्होंने कहा, "जा। तेरे पास काम है। तेरी घंटी बोल रही है, है ना?"

मैंने उनकी तरफ़ देखा। मैंने कभी नहीं कहा था कि घंटी बोलती है। पर उन्होंने अपने हाथ में झाड़ू पकड़ी हुई थी और वो काँप रही थी, इसलिए मैंने कोई सवाल नहीं किया।

"बोल रही है," मैंने कहा। "पीपल के नीचे।"

उन्होंने सिर हिलाया। "फिर जा। और अंकुश —"

"हाँ।"

"टूटे हुए को जोड़ने से पहले कभी यह मत सोचना कि कौन सही है। यह मत सोचना कि किसने ग़लती की। सिर्फ़ यह देख कि कौन चुप है। क्योंकि जो चुप है वो अंदर से बोल रहा है, बस किसी ने पूछा नहीं।"

मैंने उनका हाथ पकड़ा। वो पहली बार नहीं छूटा।

मैं पीपल के नीचे पहुँचा तो सुबह की धूप छनकर आ रही थी। चारों बच्चे पहले से वहाँ थे, और उनके हाथ में कुछ था — सानिया के हाथ में कपड़े में लिपटा बाट, और गुड्डू के हाथ में लंबा ज़ंग लगा काँटा, जिसके दोनों पलड़े सूखी हुई दाल की पत्तियों से भरे थे।

चबूतरी पर इस सुबह सिर्फ़ दो लोग थे। एक सिरे पर बाबा क़ादिर बैठे थे — लंबा सफ़ेद कुर्ता, टोपी सामने खिसकी, हाथ में तस्बीह। दूसरे सिरे पर लाला बद्रीप्रसाद — पीली धोती, गमछा, लाठी बगल में रखी।

बीच में खाली जगह थी। जिस पर कोई नहीं बैठता था। बत्तीस साल से।

मैंने काँटा उठाया और बीच की खाली जगह पर रख दिया। फिर उसके बगल में बाट रखा।

दोनों बुज़ुर्गों ने देखा। और दोनों के चेहरे पर वही भाव आया, जो किसी की कब्र पर उसका अपना नाम देखकर आता है।

"ये काँटा लाला जी के आँगन से आया है," मैंने कहा। "और ये बाट बाबा क़ादिर की अलमारी से। दोनों अलग-अलग रखे बत्तीस साल से। और बत्तीस साल तक कोई चीज़ सही नहीं तोली गई — न मिठाई, न रिश्ता, न ग़लती।"

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