The Mysterious Bell – Chapter 578
मैंने उससे हाथ मिलाया। फिर गुड्डू से। फिर रफ़ीक़ से। फिर चिंटू से। चिंटू का हाथ छोटा था, पर पकड़ मज़बूत थी — जैसे किसी पुराने मिस्त्री का हाथ। मैंने उसकी तरफ़ देखा तो वो मुस्कुरा दिया।
शबनम आपा ने देखा और मुस्कुराई। "अब जा। तेरी माँ इंतज़ार कर रही होगी।"
मैं उठा। रास्ते में सोच रहा था कि मैंने अभी क्या किया। चार बच्चों को अपने साथ जोड़ लिया। मैं, जो खुद अकेले सब करने की ज़िद में जी रहा था। जिसे लगता था कि मदद माँगना कमज़ोरी है। और अब देखो — दो साल के टिंकू की जगह चार बच्चे, और मुझे कुछ अजीब-सा अच्छा लग रहा था।
तभी मेरी जेब में घंटी बजी। ज़ोर से।
मैं रुक गया।
गुमटी के सामने वाली गली में एक आदमी खड़ा था। सत्तर के ऊपर, सफ़ेद दाढ़ी, मोटा चश्मा, कान पर पेंसिल।
उस्ताद अली बक्श।
वो अपनी दुकान से बाहर आए थे। उनका हाथ सिलाई मशीन के हैंडल पर था, जैसे अभी भी सिलाई कर रहे हों — पर मशीन बंद थी। उनकी आँखें मेरी जेब पर थीं। सीधी। बिना पलक झपकाए।
"घंटी," उन्होंने कहा। सिर्फ़ एक शब्द। धीमा। भारी। जैसे कोई पत्थर कुएँ में गिरा हो।
मैं सीधा खड़ा रहा।
उस्ताद ने एक कदम बढ़ाया। फिर रुके। फिर पलटकर अपनी दुकान की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। जैसे दो रास्तों के बीच खड़े हों। जैसे उन्हें खुद नहीं पता हो कि अंदर जाएँ या बाहर आएँ।
"अंकुश।"
"जी उस्ताद।"
"कौन बजा रहा था?"
"कुछ नहीं उस्ताद। हवा।"
"हवा।" उन्होंने चश्मे के ऊपर से देखा। "हवा से घंटी बजती है, अंकुश। पर हवा से घंटी बोलती नहीं है। और मैंने अभी बोलते सुना है।"
मैं चुप रहा।
उस्ताद ने चारों बच्चों को देखा, जो अब चुप बैठे थे। शबनम आपा ने चिमटी उठाई और समोसे की कड़ाही में डाल दी, पर उनकी आँखें भी उस्ताद पर थीं।
उस्ताद एक और कदम बढ़े। फिर रुके। उन्होंने अपना चश्मा उतारा, रुमाल से पोंछा, और वापस पहना।
"अंदर आ।"
"उस्ताद—"
"अंदर आ, अंकुश। दुकान में। अभी।"
मैं उनके पीछे-पीछे गया। उस्ताद ने दरवाज़ा खोला और मुझे अंदर जाने का इशारा किया। मैं अंदर गया तो सिलाई मशीन की टिक-टिक बंद हो गई थी। मशीन के ऊपर कपड़ा रखा था, आधा सिला हुआ। सुई ऊपर थी, जैसे किसी ने काम बीच में छोड़ दिया हो। पास में पेंसिल रखी थी। एक तरफ़ दराज़ खुली थी।
उस्ताद ने दरवाज़ा बंद किया।
फिर मेरी तरफ़ मुड़े।
"क्या लिया तू उसमें?"
"क्या लियामैंने काग़ज़ मेज़ पर रखा और उस्ताद की तरफ़ देखा। उनका चश्मा अब भी नाक पर फिसला हुआ था, और उनके हाथ सिलाई मशीन के हैंडल पर टिके थे — जैसे वो मशीन से बात कर रहे हों।
"उस्ताद," मैंने कहा। "आपने मुझे अभी तक नहीं बताया कि इस काग़ज़ का मतलब क्या है।"
उस्ताद ने चश्मा उतारा। रुमाल से पोंछा। फिर बोले, "इसका मतलब ये है कि तेरे दादा ने दुकान बेची नहीं थी। उन्होंने गिरवी रखी थी। और गिरवी रखने वाला आदमी मुझे जानता था। मैं उस वक़्त जवान था, अंकुश। मेरी दाढ़ी काली थी और मेरे पास भी एक घंटी थी।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — जैसे कोई बहुत पुराना ज़ख्म अचानक खुल गया हो।
"उस्ताद, आपके पास भी घंटी थी?"
"हाँ। और वो घंटी मेरे भाई इलियास के पास थी।"
मैं सीधा बैठ गया।
"इलियास आपका भाई है?"
उस्ताद ने सिर हिलाया। एक बार। बस एक बार। जैसे ये बात कहने में उन्हें पूरी ताक़त लगी हो।
"पचास साल पहले, अंकुश, हम तीन थे। मैं, इलियास और विजय। विजय भारद्वाज। रणवीर का बाप।" उन्होंने रुककर साँस ली। "हम तीनों ने मिलकर ये घंटी चलाई थी। एक ही घंटी, तीन हाथ। हम गली-गली घूमकर टूटे रिश्ते जोड़ते थे। कोई हमें जानता नहीं था। हम बस कहते थे — हम दर्ज़ी हैं, हम साइकिल वाले हैं, हम कुछ भी हैं। और लोग हमें बुलाते थे।"
उनकी आवाज़ धीमी हो गई।
"फिर एक दिन विजय ने कहा कि ये घंटी हमें अमीर बना सकती है। हम इसे बाज़ार में ले चलें। लोग इसके लिए पैसे देंगे। मैंने मना किया। इलियास ने मना किया। पर विजय नहीं माना।"
"फिर क्या हुआ?"
"फिर एक रात विजय ने घंटी चुरा ली। उसने उसे बाज़ार में दिखाया। उसने लोगों को बताया कि ये घंटी चमत्कार करती है। और शहर भर से लोग आए। कुछ लोगों के रिश्ते जुड़े, कुछ के टूटे। और जो टूटे, उन्होंने विजय को कोसा। विजय ने कहा कि घंटी में दोष है, वो अधूरी है। उसने घंटी को तोड़ दिया।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"तोड़ दिया?"
"तोड़ दिया।" उस्ताद ने कहा। "उसने घंटी को दो हिस्सों में बाँट दिया। एक हिस्सा उसने अपने पास रखा, जो अब रणवीर के पास है। और दूसरा हिस्सा उसने इलियास को दे दिया, ये कहकर कि तू इसे संभाल, मैं इसे बाज़ार में नहीं लाऊँगा। इलियास ने घंटी ली और दिल्ली चला गया। और मैं —" उन्होंने रुककर अपने हाथ देखे — "मैं चुप रहा। मैंने विजय से नहीं लड़ा। मैंने इलियास को रोका नहीं। मैंने बस अपनी दुकान बंद कर दी और यहाँ बैठ गया।"
"उस्ताद—"
"पचास साल, अंकुश। पचास साल मैंने इस दुकान में सुई चलाई और हर बार सोचा कि मैंने क्या किया। और अब तू आया है, तेरे हाथ में वो घंटी है, और इलियास वापस आ गया है। और मुझे लगता है कि ये सब व्यर्थ नहीं है।"
वो उठे। उन्होंने दराज़ से एक पुराना पीतल का डिब्बा निकाला — छोटा, जंग लगा, ढक्कन पर फूल खुदा हुआ। उन्होंने उसे खोला। उसमें एक छोटी सी घंटी थी। बहुत छोटी। फूल वाली।
"ये मेरी घंटी है," उन्होंने कहा। "इलियास वाली नहीं। ये मेरी अपनी थी। ये बोलती नहीं है। ये सिर्फ़ सुनती है। जब तेरी घंटी बोलती है, ये सुनती है। और आज रात, जब मैंने इसे उठाया, तो ये गरम थी।"
उन्होंने घंटी मेरी हथेली पर रख दी।
"ये मैं तुझे दे रहा हूँ।"
"उस्ताद, ये आपकी—"
"ये तेरी है।" उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में कोई नरमी नहीं थी, बस एक पुराना फ़ैसला था। "मैंने पचास साल इसे संभाला। अब तू संभाल। और अंकुश," उन्होंने मेरी तरफ़ झुककर कहा, "अगर इलियास से मिले, तो उससे कहना कि मैंने उसके लिए एक जोड़ा कुर्ता सिला है। पचास साल से मेज़ पर रखा है। और मैं उसे पहनकर उसका इंतज़ार कर रहा हूँ।"
मैंने वो छोटी घंटी अपनी जेब में रखी। वो बड़ी घंटी के ठीक बगल में थी, और मुझे लगा जैसे दोनों एक-दूसरे को पहचान रही हों।
"एक बात और," उस्ताद ने कहा। "तूने आज नबी और श्यामलाल को जोड़ा। अच्छा किया। पर एक ग़लती की।"
"क्या?"
"तूने उनके बीच सिक्का रखा। सही था। पर तूने ये नहीं सोचा कि जब तक वो दोनों खुद न बोलें, सिक्का चुप रहेगा। अंकुश, तंत्र तेरे हाथ में है, पर बात उनके मुँह से निकलनी चाहिए। तू सिर्फ़ दरवाज़ा खोलता है। अंदर वो जाते हैं।"
"तो मैं क्या करूँ?"
"जब अगली बार कोई टूटा रिश्ता सामने आए, तो पहले पूछ — तुम दोनों में से कौन पहले बोलेगा? और जो पहले बोले, उसे सबके सामने बोलने देना। तेरा काम सिर्फ़ इतना है कि तू उन्हें एक ही मेज़ पर बैठा दे।"
वो फिर मशीन के पास गए। उन्होंने कैंची उठाई और कपड़े का एक टुकड़ा काटने लगे, जैसे बात खत्म हो गई हो।
मैंने दरवाज़ा खोला।
"उस्ताद," मैंने पलटकर कहा। "आपने कहा था कि घर का सच मेरे अपने मुँह और हाथ से निकलेगा। वो क्या सच है?"
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