The Mysterious Bell – Chapter 558
"पीपल के नीचे वो चबूतरी है," मैंने कहा। "उसके नीचे, उसके किनारे, उसकी दरारों में — कुछ लिखा है क्या? कुछ खुदा है? कोई नाम, कोई निशान?"
"क्यों?" रफ़ीक़ ने पूछा।
"क्योंकि पचास साल से वहाँ दो बुज़ुर्ग बैठते हैं और बीच की जगह खाली रहती है," मैंने कहा। "और मुझे लगता है कि वो जगह पहले खाली नहीं थी।"
सानिया की आँखें चमकीं। वो कॉपी खोलकर तेज़ी से कुछ लिखने लगी।
"मुझे पता है," वो बोली। "मैंने एक बार देखा था। पत्थर के कोने पर, नीचे की तरफ़, काई के नीचे। मुझे लगा पत्थर की लकीर है। पर वो लकीर नहीं थी।"
"तो जाओ," मैंने कहा। "अंधेरा आ गया है, लालटेन ले जाओ। मुझे वो देखना है। और हाँ — जल्दी। क्योंकि बुज़ुर्ग अभी चबूतरी पर हैं, और मुझे उनके होते हुए ही वहाँ पहुँचना है।"
चारों भागे। शबनम आपा ने उनके पीछे देखा, फिर मेरी तरफ़।
"तू इन बच्चों को किस लाइन में खड़ा कर रहा है, अंकुश?" उन्होंने धीमी आवाज़ में पूछा।
"पता नहीं आपा," मैंने सच कहा। "पर जब मैं छोटा था, कोई मुझे लाइन में नहीं खड़ा करता था। और मुझे लगता है कि इसीलिए मैं आज भी खुद को किसी लाइन में नहीं खड़ा कर पाता।"
वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखती रहीं।
"तेरी माँ आज सुबह आई थी," उन्होंने कहा। "रोटी देने। और उसने मुझसे कहा कि काजल की आँखें लाल हैं और वो कुछ बोलती नहीं।"
मेरा पेट कसा।
"आपा—"
"मैं नहीं कह रही कि तू कुछ कर," उन्होंने कहा। "मैं बस कह रही हूँ कि तू बाहर की चीज़ें जोड़ रहा है और घर की चीज़ें अनजोड़ी पड़ी हैं। जो पहले जुड़ेगा, वही बाद में मज़बूत रहेगा। सोच ले।"
—
बच्चे लौटे। उनके हाथ में लालटेन थी और आँखों में वो चीज़ थी जो बड़ों की आँखों में नहीं होती — बिना डरे देखने की आदत।
"मिला," सानिया ने कहा और कॉपी खोली। "पत्थर के कोने पर, काई के नीचे। दो नाम। एक तरफ़ 'नूर', दूसरी तरफ़ 'राम'। और बीच में —" वो रुकी, अपनी उँगली से काग़ज़ पर बना निशान दिखाया। मैंने उसे देखा। दो हाथ जुड़े हुए, जैसे कोई मिलता है।
"ये निशान क्या है?" गुड्डू ने पूछा।
"ये दोस्ती का निशान है," मैंने कहा। "ये लोग पत्थर पर अपने नाम साथ खुदवाते हैं जब वो अलग नहीं होना चाहते।"
"तो ये दोनों दोस्त थे?"
"हाँ," मैंने कहा। "और शायद अब भी हैं। बस भूल गए हैं।"
चिंटू ने पूछा, "उस्ताद, भूलने से दोस्ती टूटती है?"
मैं एक पल रुका। अच्छा सवाल था। दस साल के बच्चे अच्छे सवाल पूछते हैं, क्योंकि वो अभी नहीं सीखे कि कौन सा सवाल डर पैदा करता है।
"नहीं," मैंने कहा। "भूलने से दोस्ती नहीं टूटती। भूलने से बस दोस्ती पुरानी हो जाती है। टूटती है जब कोई याद करके भी नहीं बोलता।"
—
चबूतरी पर पहुँचा तो दोनों वहाँ थे। बाबा नूर मोहम्मद एक सिरे पर, सफ़ेद टोपी, हाथ में तस्बीह, आँखें बंद। लाला रामकिशन दूसरे सिरे पर, पीली धोती, गमछा कंधे पर, छड़ी उनके बगल में खड़ी। बीच में वो जगह — एक हाथ भर, खाली। ऐसी खाली कि देखने वाले का दिल भर आए।
मैंने एक कदम बढ़ाया। मुझे लगा कि कोई मुझे रोकेगा। किसी ने नहीं रोका। मैं उनके बीच में गया और बैठ गया।
बाबा नूर ने आँखें खोलीं। लाला जी ने छड़ी कीछड़ी की नोक ज़मीन पर टिकाई और मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे कोई अनजाना आदमी उनके घर के आँगन में बैठ गया हो।
"तू कौन है?" लाला जी ने पूछा। आवाज़ में वो खुरदुरापन था जो सत्तर पार करने के बाद आता है, और उसमें वो चीज़ भी थी जो हर बुज़ुर्ग में होती है — डर और अकड़, दोनों एक साथ।
"अंकुश," मैंने कहा। "साइकिल मरम्मत वाला। गली में दुकान है।"
"साइकिल वाले का यहाँ क्या काम?"
"आप दोनों के बीच में बैठना है," मैंने कहा।
दोनों एक साथ मेरी तरफ़ देखने लगे। मैंने कुछ और नहीं कहा। सिर्फ़ अपना हाथ उस पत्थर पर रख दिया जो मेरे सामने था — जिसके एक कोने पर काई के नीचे नूर खुदा था और दूसरे कोने पर राम, और बीच में वो निशान जिसे बच्चे अभी-अभी लेकर आए थे। दो हाथ जुड़े हुए। एक-दूसरे को पकड़े हुए। जैसे कोई मिलता है और फिर कभी नहीं छोड़ना चाहता।
"ये पत्थर बहुत पुराना है," मैंने कहा। "आप दोनों ने इस पर अपने नाम साथ खुदवाए थे। जो आदमी अपना नाम किसी और के साथ पत्थर पर खुदवाता है, वो उससे दूर नहीं जा सकता। भले बैठक अलग कर ले, भले रास्ते अलग कर ले। नाम तो साथ का साथ रहता है।"
बाबा नूर ने आँखें पूरी खोलीं। उनका हाथ तस्बीह पर रुक गया।
"तूने ये कहाँ देखा?" उन्होंने पूछा।
"बच्चों ने ढूँढा। पत्थर के कोने पर, काई के नीचे।"
लाला जी ने छड़ी फिर ज़मीन पर टिकाई। इस बार ज़ोर से। जैसे कोई अपने ही कमरे में दरवाज़ा बंद करता है।
"अब ये सब बातें पुरानी हैं," वो बोले। "पुरानी बातें जलाकर राख कर देनी चाहिए, ताकि नई हवा आ सके।"
"राख में भी अंगारा बचा रह जाता है, लाला जी," मैंने कहा। "और अंगारा हवा से और भड़कता है। आप दोनों चालीस साल से इस चबूतरी पर बैठते हैं। दो हाथ के फ़ासले पर। न आपने उनसे बात की, न उन्होंने आपसे। ये दुश्मनी नहीं है। दुश्मनी में तो आदमी लड़ता है, चीखता है, कभी-कभी हाथ भी चल जाता है। मगर आप दोनों — आप दोनों चुप हैं। चालीस साल की चुप्पी। इतनी लंबी चुप्पी में आदमी अपने दुश्मन का चेहरा भूल जाता है, बस दुश्मनी याद रहती है। और ये सबसे बड़ी सज़ा है — जब आपको याद भी न रहे कि किस बात पर लड़े थे।"
लाला जी का हाथ छड़ी पर कसा। बाबा नूर ने तस्बीह के दाने उँगलियों में दबा दिए।
मैंने इंतज़ार किया। मुझे पता था, अब मुझे कुछ नहीं कहना है। अब उन्हें बोलना है। मैं सिर्फ़ वो आदमी हूँ जो बीच में बैठा है, जिसने रास्ता बनाया है, और अब रास्ते पर खड़ा है।
तभी लाला जी ने कुछ कहा। बहुत धीमे। मुझे सुनने के लिए आगे झुकना पड़ा।
"उसने मेरा पतंग बेच दिया था।"
मैं एक पल के लिए रुक गया। "पतंग?"
बाबा नूर ने तस्बीह नीचे रख दी। उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
"हमारी पतंगों की दुकान थी," वो बोले। "इसी गली के मोड़ पर। 'नूर-राम पतंग महल'। दोनों ने मिलकर खोली थी। बीस साल चलाई। हमारी पतंगें दूर-दूर तक जाती थीं। शादियों में, मेलों में, त्योहारों में। लोग कहते थे कि इस गली की पतंगें आसमान को भी हँसा देती हैं।"
लाला जी ने मुँह फेर लिया। "मेरी पतंगें," उन्होंने सुधारा। "मैंने बनाई थीं।"
"हमने बनाई थीं," बाबा नूर ने कहा। "तू काग़ज़ लाता था, मैं बाँस चीरता था। तेरे हाथ के कटाव और मेरे हाथ की माँज। दोनों मिलकर पतंग बनती थी।"
"अब ये सब क्या—"
"लाला जी," मैंने बीच में कहा, "आगे बताइए। क्या हुआ?"
लाला जी ने छड़ी उठाई, फिर रख दी। "उस साल शहर में पतंगबाज़ी का बड़ा मुक़ाबला था। पाँच सौ रुपये का इनाम। हम दोनों ने महीने भर मेहनत की — एक पतंग बनाई। एक ख़ास पतंग। इतनी हल्की कि हवा से बातें करे, इतनी मज़बूत कि रेशम का धागा भी न काटे। हमने उसका नाम रखा — 'दोस्ती'।"
बाबा नूर ने आँखें बंद कर लीं।
"मुक़ाबले से एक रात पहले," लाला जी ने कहा, "वो पतंग गायब हो गई। मैंने सारी गली छानी। फिर उसे पता चला — इसने बेच दी थी। एक अमीर आदमी को। तीन सौ रुपये में। उसने मुझे बताया ही नहीं। मैंने पूछा, वो चुप रहा। मैंने उसका गला पकड़ा, वो कुछ नहीं बोला। बस मुँह फेरकर बैठ गया। अगले दिन मैंने दुकान का ताला डाल दिया। हम दोनों वहाँ से हट गए। उसने दूसरी जगह दुकान खोली, मैंने नहीं खोली। चालीस साल हो गए।"
मैंने बाबा नूर की तरफ़ देखा।
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