The Mysterious Bell – Chapter 557
पर मैंने उन्हें गिना नहीं। मैं उस्ताद अली बक्श के उस चेहरे को देख रहा था जो मैंने उन पर कभी नहीं देखा था।
—
गुमटी पर वापस लौटा तो शबनम आपा ने मुझे रोका।
"उस्ताद अली बक्श तुझे ढूँढ रहे थे," उन्होंने कहा।
"कहाँ हैं?"
"पीछे। अपनी दुकान के पीछे वाले कमरे में। बोले कि अंकुश आए तो सीधे भेजना। किसी और को नहीं।"
मैं पीछे गया। उस्ताद की दुकान के पीछे वाला कमरा। मैंने दरवाज़ा खटखटाया।
"अंदर आ," उनकी आवाज़ आई।
कमरे में रोशनी कम थी। एक बल्ब जल रहा था, जो पीला था। उस्ताद कुर्सी पर बैठे थे, उनके सामने मेज़ पर एक पुराना ट्रंक खुला था। उनके हाथ ट्रंक के अंदर थे।
"बैठ," उन्होंने कहा।
मैं बैठ गया।
वो कुछ देर चुप रहे। फिर उन्होंने ट्रंक मेंउस्ताद अली बक्श ने ट्रंक में हाथ डाला और एक कपड़े में लिपटी चीज़ निकाली। चीज़ छोटी थी, एक हथेली भर। उन्होंने उसे मेज़ पर नहीं रखा। अपनी जाँघ पर रखा और दोनों हाथों से ढक लिया, जैसे कोई बच्चा चिड़िया को पकड़ता है और डरता है कि कहीं उड़ न जाए।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
"अभी नहीं।"
"उस्ताद, आपने मुझे बुलाया। मैं आया। अब कहिए कि ये क्या है।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। बल्ब पीला था और उनके चश्मे पर एक गोल चमक बन रही थी।
"मैंने तुझे बुलाया नहीं," उन्होंने कहा। "मैं तो बैठा था। अपना हिसाब देख रहा था। और फिर मैंने वो सुना।"
"क्या सुना?"
"घंटी।"
मेरी जेब में घंटी थी, पर उस वक़्त वो चुप थी।
"इससे पहले मैंने तुझसे पूछा था कि तेरा घर इतना चुप क्यों है," उन्होंने कहा। "उसका जवाब मुझे नहीं चाहिए था। मुझे यह देखना था कि तू उस सवाल को कितनी देर अपने अंदर रख पाता है। तूने रख लिया। अच्छा किया।"
"उस्ताद—"
"आज रात तूने घंटी से पूछा था ना?" उन्होंने कहा। "बैठकर। अकेले। हाथ में रखकर।"
"आपको कैसे पता?"
"क्योंकि आज रात घंटी ने मेरी दुकान की खिड़की के पास से आवाज़ दी," उन्होंने कहा। "और वो इतनी दूर बजी, इतना दूर, कि मुझे लगा कि मेरे कान मुझसे मज़ाक कर रहे हैं। मैं सत्तर साल का हूँ, मेरे कान अब कम सुनते हैं। पर आज मैंने वो सुना। जो चीज़ कम सुनाई देती है, वो ज़्यादा सच बोलती है।"
वो चुप हुए।
"फिर मैंने सुना कि घंटी ने कहा — तेरा घर चुप क्यों है।"
मेरी नाड़ी फड़की।
"उस्ताद, आपने वो सुना?"
"मैंने वो सुना जो मुझे सुनना था," उन्होंने कहा। "बाकी मत पूछ। वो जवाब मेरा नहीं, तेरा है।"
उन्होंने जाँघ पर रखी चीज़ की तरफ़ देखा। फिर ट्रंक बंद किया। उसकी चेन घिसी और चटकी। उन्होंने उसे खटखटाया, जैसे कोई घड़ी ठीक करता है।
"अभी ये नहीं," उन्होंने कहा। "जब तेरा घर खुलेगा, तब ये खुलेगी।"
"उस्ताद, ये सिलसिला क्या है? आप कुछ बताते हैं, फिर रोक देते हैं। मेरे पापा भी यही करते हैं। मैं आधी-आधी बातों के बीच में जी रहा हूँ।"
उन्होंने मेरी तरफ़ अपना पूरा चेहरा घुमाया।
"अंकुश," उन्होंने कहा। "मैं तुझे आधी बात इसलिए नहीं कहता कि मैं तुझे अधूरा छोड़ना चाहता हूँ। मैं तुझे आधी बात इसलिए कहता हूँ क्योंकि तंत्र भी वही करता है। और तंत्र जो करता है, वो सिर्फ़ मज़ाक नहीं है। वो तरीक़ा है। जो आदमी आधी बात में आगे बढ़ जाता है, वो पूरी बात का हक़दार नहीं होता। तू अभी आधी बात से पूरी बात तक पहुँचने का सफ़र कर रहा है। मैं उस सफ़र में तेरे पास बैठा हूँ, तेरे आगे नहीं चल रहा।"
मैं कुछ नहीं बोला।
"अब सुन," उन्होंने कहा। "पीपल के नीचे दो बुज़ुर्ग बैठते हैं। एक को छड़ी है, एक के हाथ में तस्बीह। पचास साल से दोनों उसी चबूतरी पर आते हैं, एक साथ आते हैं, पर अलग-अलग बैठते हैं। और पचास साल से उस चबूतरी के बीच में एक हाथ भर की जगह खाली है। कोई वहाँ नहीं बैठता। न बच्चे, न बूढ़े। मैं भी नहीं बैठा, पचास साल में एक बार भी नहीं।"
"क्यों?"
"क्योंकि बीच में बैठने वाला जोड़ता है," उन्होंने कहा। "और जोड़ने के लिए तुझे उन दोनों की बात सुननी पड़ेगी, जो पचास साल से कोई नहीं सुन रहा।"
"उनका नाम?"
"बाबा नूर मोहम्मद," उन्होंने कहा। "और लाला रामकिशन।"
उन्होंने अपना चश्मा उतारा और मेज़ पर रख दिया। उनकी आँखें थकी हुई थीं, पर तेज़ थीं।
"जा," उन्होंने कहा। "और जब उन दोनों के बीच बैठे, तो चुप मत बैठना। तंत्र तुझे अंक देगा। पर पहले वो तेरे हाथ में गर्म होगा, और तब गर्म होगा जब तू उनके बीच पहुँच जाएगा।"
मैं उठा।
"उस्ताद," मैंने दरवाज़े पर मुड़कर कहा। "आपके ट्रंक में जो कपड़े में लिपटी चीज़ है — क्या वो भी घंटी है? इलियास की दूसरी घंटी?"
उनका हाथ ट्रंक पर था। उन्होंने उँगली से उसकी धूल हटाई।
"जा," उन्होंने बस इतना कहा।
—
बाहर निकला तो शाम पूरी तरह गली में उतर चुकी थी। पीपल के पत्तों में हवा घुसकर ऐसी आवाज़ कर रही थी जैसे कोई दूर से बच्चे को बुला रहा हो। शबनम आपा की गुमटी पर लालटेन जल चुकी थी, और उसकी कटोरी में दिन भर के सिक्के टनटन कर रहे थे।
मैं गुमटी के पास पहुँचा।
"तेरे लिए नहीं है," शबनम आपा ने सिर उठाए बिना कहा। "मेरी चाय उनके लिए है जो सीधे आते हैं, तिरछे सवालों के साथ नहीं।"
"आपा, एक चाय।"
"अब आया समझ में।"
उन्होंने चाय का गिलास मेरे सामने रखा। फिर मेरी तरफ़ देखा।
"तूने आज शाम गली में क्या किया, मुझे पता है," उन्होंने कहा। "मैं वहाँ नहीं थी, पर मुझे पता है। इस गली में जो भी होता है, मुझे आधे घंटे में पता चल जाता है। कोई बताता नहीं, हवा बताती है।"
"कुछ नहीं किया। बस दो लोग अपनी बात कह रहे थे।"
"अपनी बात कहने से बात नहीं खुलती," उन्होंने कहा। "बात खुलती है जब कोई सुनता है। तू सुनता है। यही तेरी सबसे अच्छी आदत है। और सबसे खतरनाक भी।"
"क्यों खतरनाक?"
"क्योंकि जो सुनता है, उसके पास बहुत बोलते हैं," उन्होंने कहा। "और जिसके पास बहुत बोलते हैं, उस पर बोझ बढ़ता जाता है। तेरे पापा भी सुनने वाले आदमी थे। आज तक किसी को कुछ नहीं बोले।"
वो गमले की तरफ़ मुड़ गईं। मैंने बात बदली, क्योंकि वो मुझे पता थी और अभी इसका वक़्त नहीं था।
"आपा, बच्चे कहाँ हैं?"
"कहाँ होंगे। पीछे।"
"बुला दीजिए। मुझे उनसे काम है।"
उन्होंने मुझे ऐसे देखा जैसे मैंने कुछ गलत कह दिया हो।
"काम?" उन्होंने कहा। "ये दस-चौदह साल के बच्चे हैं। इनका काम पढ़ना है, क्रिकेट खेलना है, और मेरी गुमटी के पीछे बैठकर दुनिया के सबसे बड़े झूठ बोलना है। तू इन्हें क्या काम देगा?"
"आपा, यही तो बात है," मैंने कहा। "मैं इन्हें काम नहीं दूँगा। मैं इनसे मदद माँगूँगा। फ़र्क़ है दोनों में।"
वो एक क्षण रुकीं। फिर पीछे की तरफ़ खड़ी होकर बोलीं।
"ओए! चारों, इधर आ।"
चारों आए। सानिया आगे, उसके पीछे उसका भाई चिंटू, जिसका घुटना फिर से पट्टी में था, फिर गुड्डू जो अपनी जेब से बादाम निकालकर खा रहा था, और सबसे पीछे रफ़ीक़, जो हमेशा ऐसे चलता है जैसे किसी की नक़ल कर रहा हो।
"उस्ताद!" चिंटू बोला। "पंचर?”
"आज नहीं," मैंने कहा।
"तो फिर क्यों बुलाया?"
"क्योंकि आज मुझे तुम चारों की ज़रूरत है।"
चारों एक-दूसरे को देखने लगे। सानिया ने अपनी लाल कवर वाली कॉपी छाती से लगा ली।
"हमसे?" उसने कहा। "आप हमसे मदद माँग रहे हैं?"
"हाँ।"
"बड़े लोग बच्चों से मदद नहीं माँगते।"
"बड़े लोग बेवकूफ़ होते हैं," मैंने कहा। "मैं भी बड़ा हूँ। इसलिए मैं पूछ रहा हूँ।"
गुड्डू ने बादाम चबाते हुए कहा, "क्या करना है?"
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