The Mysterious Bell550 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 550

6 min read November 5, 2026

काका ने दुबे अंकल की तरफ़ देखा। पहली बार। पूरे चौदह साल में पहली बार। और दुबे अंकल ने भी उनकी तरफ़ देखा।

"और अंकल," मैंने कहा, "आप भी एक रुपया ज़्यादा क्यों डालते हैं?"

दुबे अंकल ने मुँह फेर लिया।

"मुझे पानी पिला," उन्होंने कहा।

"पहले बताइए।"

"बेटा —"

"दोनों एक-दूसरे के लिए पैसे डालते हैं," मैंने कहा, "और दोनों एक-दूसरे से बोलते नहीं। मुझे ये समझ नहीं आता।"

काका ने गहरी साँस ली। उन्होंने कपड़ा खोला, फिर मोड़ा।

"मैं नहीं जानता तू क्या खेल खेल रहा है," उन्होंने कहा। "पर सुन ले। चौदह साल पहले, मेरी दुकान की ज़मीन का काग़ज़ लेकर दो आदमी आए थे। सफ़ेद कुर्ते में। कहा कि दुकान बिक चुकी है। मैंने कहा मैंने नहीं बेची। उन्होंने काग़ज़ दिखाया। मैंने पढ़ा नहीं, क्योंकि मैं पढ़ नहीं सकता।"—उनकी आवाज़ धीमी हो गई—"मैं डर गया था। उस दिन आँखों में पानी था। उसी दिन ये आया —" उन्होंने ठुड्डी से दुबे अंकल की तरफ़ इशारा किया — "अपनी बेटी की शादी का सामान माँगने।"

दुबे अंकल ने कुछ कहना चाहा। काका ने हाथ उठाया।

"मैंने मना कर दिया," काका ने कहा। "पर मैंने कारण नहीं बताया। मैंने ये नहीं कहा कि मेरी दुकान का काग़ज़ लेकर दो आदमी आए हैं और मैं डरा हुआ हूँ। मैंने बस कह दिया — आज नहीं। और मेरी आवाज़ में जो डर था, उसे इसने गुस्सा समझा।"

दुबे अंकल बैठे रहे। उनका चेहरा पत्थर जैसा था, पर उनकी उँगलियाँ घुटने पर कस गई थीं।

"अंकल," मैंने कहा। "अब आप।"

"मैं क्या बोलूँ?" उन्होंने कहा। आवाज़ कड़क थी, पर उसके नीचे कुछ और था।

"आपने उस दिन क्या देखा?"

"मैंने क्या देखा?"

"आप उस दिन दुकान पर गए थे। आपने कुछ देखा था।"

दुबे अंकल ने मेरी तरफ़ देखा। फिर पीपल की तरफ़। फिर मेरी तरफ़।

"मैंने देखा," उन्होंने कहा, "कि उसके हाथ काँप रहे थे। मैंने सोचा, बूढ़ा है, हाथ काँपते हैं।"—उन्होंने रुककर साँस ली—"मैंने देखा कि उसकी दुकान के अंदर रोशनी नहीं थी, जबकि उस वक़्त दिन था। मैंने सोचा, दुकान बंद कर रहा होगा। मैंने देखा कि वो कुछ छिपा रहा था बोरियों के नीचे। मैंने सोचा, क्या छिपा रहा है।"

उन्होंने काका की तरफ़ देखा।

"मैंने तुझसे पूछा नहीं," उन्होंने कहा। "मैंने कहा कि मेरी बेटी की शादी है, मुझे सामान चाहिए, और तू मना कर रहा है। और मैं वहाँ से चला आया। और मैंने अपने आप से कह दिया — ऐसे आदमी से मैं फिर नहीं बोलूँगा।"

"पर तूने कटोरी में पैसे डाले," काका ने धीरे से कहा।

"वो अलग बात है," दुबे अंकल ने कहा।

"कैसे अलग?"

"क्योंकि बोलना अलग है और देना अलग है।"

"वो सफ़ेद कुर्ते वाले," मैंने कहा, "उन्होंने तुम्हें क्या दिया था?"

काका ने कपड़ा जेब में ठूँसा।

"एक काग़ज़," उन्होंने कहा। "जिस पर लिखा था कि दुकान बिक चुकी है। मैंने उसे नहीं जलाया। मैंने उसे दाल की बोरी के नीचे रख दिया। और मैं चौदह साल से उस बोरी पर नहीं बैठा।"

"क्यों नहीं जलाया?" मैंने पूछा।

"क्योंकि," काका ने कहा, "अगर मैं जला देता, तो मेरे पास कोई सबूत नहीं बचता कि मैंने कभी दुकान बेची नहीं। मैं जब भी उस बोरी के पास से गुज़रता, लगता कि कोई मेरा नाम बोल रहा है।"

मैंने उन दोनों को देखा। एक आदमी चौदह साल से बोरियों के नीचे एक काग़ज़ दबाए बैठा था। और दूसरा चौदह साल से उसी गली में एक कुर्सी पर बैठा था, तीन सौ कदम दूर।

"अब मेरी बात सुनो," मैंने कहा। "दोनों की।"

मैंने घंटी हथेली पर रखी।

"काका, अंकल ने आपको उस दिन रोते हुए देखा था। और वो ये नहीं बता पाए कि उन्होंने देखा। इसलिए वो आज तक गुस्से में बैठे हैं।"—मैंने दुबे अंकल की तरफ़ देखा—"और अंकल, काका उस दिन डरे हुए थे। और वो ये नहीं बता पाए कि वो डरे हुए हैं। इसलिए वो आज तक डरे हुए हैं। चौदह साल से दोनों एक ही बात के दो आधे हिस्से पकड़कर बैठे हैं, और दोनों सोच रहे हैं कि दूसरे ने पूरा राज़ छिपा रखा है।"

काका की आँखें भर आईं। उन्होंने पलकें झुकाईं।

"और कटोरी?" काका ने कहा। "मैंने तुझे मना किया था, फिर भी मैंने तेरे लिए पैसे डाले। ये क्या था?"

दुबे अंकल ने अपना सिर उठाया।

"यह कि मैं भी तुझसे नफ़रत नहीं करता था," उन्होंने कहा। "मैं बस तुझसे बोलने का रास्ता नहीं ढूँढ पाया।"

दोनों ने एक-दूसरे की तरफ़ हाथ बढ़ाया।

दुबे अंकल ने पहले हाथ बढ़ाया। काका ने झिझक कर, फिर पकड़ लिया। दोनों बूढ़े हाथ, झुर्रीदार, नसों में उभरी हुई। एक क्षण पहले तक ये हाथ दो अलग दुनियाओं में थे।

और मेरी हथेली में घंटी बजी।

लंबी। साफ़। जैसे कोई दरवाज़ा खुला हो, और उसके पीछे से हवा आ रही हो।

तेईस अंक। यह जोड़ चौदह साल पुराना था। इसका हिसाब बड़ा है।

मैंने मुँह में ही कहा — एक सौ इक्कीस।

"क्या हुआ?" दुबे अंकल ने पूछा। "तेरा मुँह क्यों खुला है?"

"कुछ नहीं," मैंने कहा। "मन में हिसाब कर रहा था।"

"तू मन में हिसाब करता है?" दुबे अंकल ने कहा। "फिर तेरी दुकान का हिसाब कौन देखता है?"

"इसीलिए तो दुकान का हिसाब कभी मिलता नहीं," मैंने कहा।

काका हँसे। चौदह साल बाद। हँसी छोटी थी, खुरदुरी थी, जैसे पुराना ताला घिस कर खुला हो।

तभी मुझे पीछे से एक आवाज़ आई।

"घंटी।"

मैं मुड़ा।

उस्ताद अली बक्श अपनी दुकान के दरवाज़े पर खड़े थे। मोटा चश्मा, कान पर पेंसिल, हाथ में कैंची। वो हिल नहीं रहे थे। बस खड़े थे। उनकी सिलाई मशीन की टिक-टिक बंद थी।

"उस्ताद," मैंने कहा।

वो नहीं बोले। उन्होंने घंटी की तरफ़ देखा। फिर मेरे हाथ की तरफ़। फिर दोनों बुज़ुर्गों की तरफ़, जो अभी भी एक-दूसरे का हाथ पकड़े बैठे थे।

और मैंने देखा — उस्ताद की आँखों में पानी था।

एक झलक। फिर बुझ गया। जैसे दीये की लौ पर किसी ने अँगुली रख दी हो।

उन्होंने कैंची अपनी जेब में डाली। फिर धीरे से, बिना कुछ कहे, अपनी दुकान के अंदर चले गए और टिक-टिक फिर शुरू हो गई। तेज़। इस बार बहुत तेज़।

तभी गुमटी की तरफ़ से ऊँची आवाज़ें आईं।

मैंने सुना — चिंटू चिल्ला रहा था, बिल्कुल सुर में नहीं। गुड्डू उसके साथ। सानिया और रफ़ीक़ भी।

बबलू आया था।

मैंने दोनों बुज़ुर्गों से कहा, "आप लोग बैठिए," और भागकर गुमटी की तरफ़ बढ़ा। पर रास्ते में मुझे वो नहीं मिला जिसकी मुझे उम्मीद थी।

बबलू नहीं था।

मीरा थी।

वो गुमटी के सामने खड़ी थी, कंधे पर कैमरा, हाथ में फटा बैग, और उसने बच्चों को ऐसी नज़र से देखा था कि सब गाना भूल गए थे।

"मीरा," मैंने कहा। "तूने बच्चों को डराया?"

"मैंने कुछ नहीं किया," उसने कहा। "मैं तेरे पास आई हूँ। और तुझे मेरे सवालों के जवाब देने पड़ेंगे। आज, यहीं, इसी गली में।"

"पूछ।"

उसने बैग से काग़ज़ निकाले। बहुत सारे। एक-एक करके गिनाकर, जैसे गोलियाँ रख रही हो।

"तेरी दुकान का काग़ज़," उसने कहा। "भारद्वाज कंस्ट्रक्शन से जुड़ा ट्रस्ट। तेरे पापा का अंगूठा। किराया माफ़। अब बता — ये सब एक ही कहानी के टुकड़े हैं या तूने इन्हें अलग-अलग रखकर गली को बेवकूफ़ बनाया है?"

"मैंने किसी को बेवकूफ़ नहीं बनाया," मैंने कहा।

"तो फिर तूने बुज़ुर्गों को पीपल के नीचे बैठाकर उनके पुराने ज़ख़्म क्यों खुलवाए? तेरे पास कौन सा हक़ है कि तू किसी से कहे — बोल, तेरी चुप्पी का कारण क्या है? कौन बनाया तुझे जज?"

बच्चे चुप खड़े थे। शबनम आपा कड़ाही के पास खड़ी थीं, चिमटी हाथ में, और उन्होंने एक शब्द नहीं कहा — पर उनकी नज़र मीरा पर थी।

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