The Mysterious Bell – Chapter 549
"पाँच साल से जानती हूँ," उन्होंने कहा। "उस रात तेरे पापा रोए थे। मैंने सुना। पर मैंने दरवाज़ा नहीं खोला, क्योंकि अगर मैं खोल देती तो उन्हें कहना पड़ता कि उन्होंने क्या किया। और मैं उन्हें वो कहते हुए नहीं देख सकती थी।"
"तो तुमने चुप रहना चुन लिया," काजल ने कहा।
"मैंने सोचा, चुप रहूँगी तो इलाज चलेगा। काजल की पढ़ाई चलेगी। अंकुश की दुकान चलेगी।" माँ ने मेरी तरफ़ देखा। "और तू मुझे बचाने में लगा रहेगा, बिना ये जाने कि मैं खुद तेरे पीछे एक काग़ज़ पर अंगूठा लगवा चुकी हूँ।"
मेरे गले में कुछ फँस गया। मैंने कुछ नहीं कहा।
"ये पैसे किसलिए?" काजल ने पूछा।
माँ ने लिफ़ाफ़े को हाथ में लिया। उसे सीधा किया। उसकी तहें ठीक कीं, जैसे कोई कपड़ा तह कर रहा हो।
"वकील के लिए," उन्होंने कहा।
"वकील साहब को दिखाने के लिए?" मैंने पूछा। "माँ, वो चंद्रेश —"
"चंद्रेश को नहीं," माँ ने कहा। उनकी आवाज़ पहली बार तेज़ हुई। "मैं उस आदमी को अपना पैसा नहीं दूँगी। मैं इसलिए बचा रही हूँ कि जिस काग़ज़ पर शंकर का अंगूठा है, उसके ऊपर कोई और अंगूठा न लग सके।" उन्होंने लिफ़ाफ़ा मेरी गोद में रख दिया। "अंगूठा लगवाने के लिए नहीं, मिटाने के लिए।"
कमरा चुप हो गया।
तभी पीछे से पापा आए। वो दरवाज़े के पास खड़े थे, पता नहीं कब से। चश्मा टेप से बँधा हुआ, हाथ में पेचकस। उन्होंने माँ की तरफ़ देखा। माँ ने उनकी तरफ़।
और मुझे लगा — ये दोनों आज पंद्रह साल बाद पहली बार एक-दूसरे को ठीक से देख रहे हैं।
"बोलिए," मैंने कहा। "दोनों। एक-एक सच्ची बात। आज। यहीं।"
"अंकुश —" पापा ने कहा।
"एक बात," मैंने कहा। "बस एक।"
पापा ने पेचकस मेज़ पर रखा। उन्होंने माँ की तरफ़ देखा।
"मैंने तुझे बताया नहीं," उन्होंने कहा। "यही मेरी ग़लती थी। ग़लती अंगूठे की नहीं, चुप्पी की थी।"
माँ ने अपना कपड़ा गोद से उठाया। फिर रख दिया।
"मैंने जानकर भी तुझसे नहीं कहा," उन्होंने कहा। "मैंने सोचा तुझे शर्म आएगी। शर्म नहीं देनी चाहिए थी, साथ देना चाहिए था। यह मेरी ग़लती थी।"
और मेरी जेब में घंटी बजी।
एक बार। छोटी सी।
फिर उसने कहा — यह जोड़ पुराना नहीं था। यह टूटा भी नहीं था। यह बंद था। बंद चीज़ का हिसाब छोटा होता है। नौ अंक।
काजल ने मेरी जेब की तरफ़ देखा।
"नौ अंक?" उसने धीरे से पूछा।
"नौ अंक," मैंने कहा। "पर माँ, ये दस अंक से कम है, और मैं तुम्हें बताता हूँ कि ये सबसे कीमती नौ हैं।"
माँ ने मेरी जेब की तरफ़ देखा। उन्होंने कुछ नहीं पूछा। बस मेरे सिर पर हाथ रखा और उठकर रसोई में चली गईं।
काजल ने मेरी तरफ़ देखा।
"अब क्या?" उसने पूछा।
"अब सुबह," मैंने कहा। "और सुबह पीपल के नीचे कुछ है।"
सुबह गली में धूप टूट रही थी, पर पीपल की छाँव में अभी ठंडक बची थी। शबनम आपा की गुमटी पर कड़ाही चढ़ चुकी थी और समोसे की खुशबू पूरी गली में फैल रही थी। मैंने साइकिल मोड़ी और गुमटी के सामने रोक दी।
चारों जासूस वहीं बैठे थे। सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू। सानिया के हाथ में एक लाल कवर वाली कॉपी थी, जिस पर उसने अपने गोल अक्षरों में कुछ लिखा हुआ था। चिंटू की नाक बह रही थी और वो उसे अपनी आस्तीन से पोंछ रहा था। रफ़ीक़ के घुटने पर पट्टी थी, जो हर हफ़्ते नई हो जाती है।
"उस्ताद!" गुड्डू चिल्लाया। "हमने काम कर लिया!"
"कौन सा काम?" मैंने पूछा। "और पहले ये बता, तूने मेरी साइकिल की हवा निकाली क्यों?"
"मैंने नहीं निकाली।"
"तो पिछले हफ़्ते किसने निकाली थी?"
"वो पिछले हफ़्ते था," गुड्डू ने कहा, बड़े आत्मविश्वास से। "अब मैं जासूस हूँ। जासूस साइकिल की हवा नहीं निकालते।"
शबनम आपा ने चिमटी से समोसा निकाला और मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"ले," उन्होंने कहा। "और इन चारों को सुन। ये तीन दिन से तेरे लिए ख़ुफ़िया काम कर रहे हैं। मुझे तो ये बताते भी नहीं थे, आज पकड़े गए।"
सानिया ने कॉपी खोली।
"देखो," उसने कहा। "मैंने सब लिखा है। तारीख़, वक़्त, कौन आया, क्या बोला।"
मैंने कॉपी पकड़ी। उसमें सच में लिखा था। उसकी लिखाई टेढ़ी थी, हिज्जे कई जगह ग़लत थे, पर हर लाइन में वो चीज़ थी जो बड़ी किताबों में नहीं होती — मेहनत।
"ये क्या है?" मैंने पूछा, एक लाइन पर उँगली रखकर।
"वही तो!" चिंटू उछल पड़ा। "वो मैंने देखा! मैंने देखा!"
"क्या देखा?"
सानिया ने कहा, "किराने की दुकान वाले बूढ़े काका रोज़ शाम गुमटी पर आते हैं। एक गिलास चाय। कटोरी में पैसे डालते हैं। और हमेशा एक रुपया ज़्यादा डालते हैं।"
"ज़्यादा क्यों?"
"क्योंकि," गुड्डू ने कहा, बड़ी नाटकीय आवाज़ में, "वो कहते हैं — उस नीली शर्ट वाले के लिए रख देना।"
मेरे हाथ रुक गए।
"नीली शर्ट वाले?" मैंने पूछा।
"दुबे अंकल," रफ़ीक़ ने कहा। "जो थाने के बाहर कुर्सी पर बैठते हैं। वो भी आते हैं। और वो भी एक रुपया ज़्यादा डालते हैं। और कहते हैं — उस बुड्ढे काका के लिए रख देना।"
मैंने शबनम आपा की तरफ़ देखा।
वो कड़ाही में चमचा घुमा रही थीं। उन्होंने आँख नहीं उठाई।
"चौदह साल से," उन्होंने कहा। "चौदह साल से दोनों यही कर रहे हैं। एक बार भी नहीं पूछा कि दूसरे का हिसाब क्या हुआ।"
"और तुमने बताया नहीं?" मैंने पूछा।
"मैं गुमटी चलाती हूँ, अदालत नहीं," उन्होंने कहा। "अगर मैं बता देती तो ये दोनों शायद आज तक एक-दूसरे को नहीं देखते। चुप्पी भी एक रिश्ता है, अंकुश। बुरा रिश्ता, पर रिश्ता है।"
मैंने समोसा खाया। फिर उठा।
"कहाँ जा रहे हो?" सानिया ने पूछा।
"पीपल के नीचे।"
चारों मेरे पीछे चल पड़े।
"नहीं," मैंने कहा। "तुम लोग यहीं रहो। गुमटी पर। अगर बबलू आए तो मुझे खबर करना।"
"कैसे?" चिंटू ने पूछा।
"तुम चारों मिलकर ज़ोर से गाना शुरू कर देना," मैंने कहा। "बबलू को गाना पसंद नहीं है। बस उसकी शक्ल देखकर गाना शुरू कर देना।"
"कौन सा गाना?" गुड्डू ने पूछा।
"जो स्कूल में सीखा है।"
"मैंने कोई नहीं सीखा," गुड्डू ने कहा। "मैं स्कूल ही नहीं जाता।"
"तो कोई भी," मैंने कहा। "सबसे ऊँची आवाज़ में।"
पीपल के नीचे चबूतरी पर दोनों बुज़ुर्ग बैठे थे। और मैंने पहली बार ध्यान दिया — वो दोनों एक ही चबूतरी पर बैठते हैं, पर एक-दूसरे से इतनी दूर कि बीच में दो लोगों की जगह बची रहती है। दुबे अंकल दाहिनी तरफ़, अपनी नीली शर्ट में, जो अब वर्दी नहीं थी पर वर्दी जैसी ही लगती थी। और बाईं तरफ़ बूढ़े काका, अपनी किराने की दुकान से आए हुए, हाथ में एक छोटा कपड़ा जिसे वो बार-बार मोड़ते और खोलते रहते थे।
दोनों ने मुझे देखा।
"अंकुश," दुबे अंकल ने कहा। "कैसे हो बेटा?"
"ठीक हूँ," मैंने कहा। "और आप दोनों?"
दोनों चुप हो गए।
मैं बीच में बैठ गया। उसी खाली जगह पर, जो चौदह साल से खाली थी। मेरे बैठते ही बीच की जगह भर गई, और दोनों को थोड़ा सरकना पड़ा। दोनों असहज हुए।
"तू यहाँ क्यों बैठा है?" काका ने पूछा।
"गर्मी है," मैंने कहा। "छाँव अच्छी है।"
"ये मेरी जगह है," दुबे अंकल ने कहा।
"और ये चबूतरी किसकी है?" मैंने पूछा।
"गली की है," काका ने कहा।
"तो फिर जगह किसकी?" मैंने कहा।
दोनों चुप।
मैंने घंटी जेब से निकाली। घुमाई। जैसे बस हाथ में पकड़कर खेल रहा हूँ। उसकी ठंडक मेरी हथेली में जम रही थी।
"काका," मैंने कहा। "एक सवाल पूछूँ?"
"पूछ।"
"आप रोज़ शाम गुमटी पर एक रुपया ज़्यादा क्यों डालते हैं?"
काका का हाथ रुक गया। कपड़ा मुट्ठी में बंद हो गया।
"शबनम ने बताया?" उन्होंने पूछा।
"नहीं। बच्चों ने देखा।"
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