The Mysterious Bell – Chapter 530
बबलू का हाथ अब भी मेरे हाथ पर था।
उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं। पसीने से भीगी हुई। और उसके नाखून मेरी कलाई में इतने धँसे हुए थे कि मुझे लगा कल सुबह निशान मिलेंगे।
मैंने अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश नहीं की। जो आदमी डरा हुआ होता है, उसकी पकड़ सबसे मज़बूत होती है। तुम उसका हाथ झटक दो, तो वो और कसेगा।
तो मैंने वही किया जो मैं हमेशा करता हूँ।
मैं हँसा।
अरे बबलू भाई, ये घंटी है, कोई आत्मा नहीं। साइकिल की घंटी। मैंने सुबह ही साइकिल ठीक की है। तुमने कभी साइकिल की घंटी इतने गौर से देखी है क्या?
उसने मेरी बात सुनी ही नहीं। उसकी नज़र घंटी पर टिकी थी, जैसे किसी ने उसे उसके बचपन का कोई डर दिखा दिया हो।
तेरा ये कहाँ से आया, उसने फिर वही पूछा। आवाज़ धीमी।
जेब में बजी, मैंने कहा। सुबह से मुझे भी यही सवाल है कि घंटी जेब में बजती क्यों है। तुम बताओ न, तुम बड़े तजुर्बे वाले लगते हो।
मेरी जेब से एक और आवाज़ आई। बहुत धीमी। सिर्फ़ मेरे कान तक।
डरा हुआ है।
और फिर।
इससे पूछ, साहब के कमरे में वो काग़ज़ किसने टाँगा।
मेरी साँस एक पल को रुक गई। पर चेहरे पर कुछ नहीं आने दिया। यह मेरी सबसे बड़ी आदत है, या कहो सबसे बड़ी कमज़ोरी। जब अंदर सब हिल रहा होता है, बाहर से मैं वही लड़का रहता हूँ जो रेट लिस्ट पूछ रहा हो।
बबलू भाई, मैंने धीरे से कहा। साहब के कमरे में जो काग़ज़ टँगा है, उसे किसने टाँगा?
उसका हाथ एक झटके में खुल गया।
नहीं। नहीं नहीं नहीं। मैंने वो नहीं कहा। मैंने कुछ नहीं कहा।
कहा था तुमने। अभी। मेरे सामने।
वो एक कदम पीछे हटा। उसका पान चबाना पूरी तरह बंद हो गया था और उसके होठों पर लाल रंग सूख रहा था, जैसे किसी दीवार पर पुरानी स्याही।
सुन अंकुश, उसने उँगली उठाई। इस घंटी को बोर्ड पर मत टाँगना। किसी को मत दिखाना। समझा? किसी को भी नहीं।
क्यों?
क्यों का जवाब वो नहीं दे पाया। बस गला सूख गया और वो पलटकर चल दिया। उसकी चाल में वो जल्दबाज़ी थी जो इंसान के पीछे डर का कुत्ता भौंक रहा हो तब आती है।
दरवाज़े पर पहुँचकर वो रुका।
साहब तुझे बुलाएँगे, उसने पीछे मुड़कर कहा। बुलाएँगे नहीं। बुलवाएँगे। और जब बुलवाएँ तो घंटी घर पर छोड़कर जाना।
वो गया।
उसकी चप्पलों की आवाज़ धूप में धीमी होती गई।
ट्रंक के पीछे से टिंकू का सिर निकला। उसकी आँखें बड़ी थीं और उसके हाथ में वही नई रिंच थी, जिसे वो आज सुबह से दो बार गिरा चुका था।
उस्ताद, उसने फुसफुसाकर कहा, वो जाते-जाते काँप रहा था।
हाँ।
बबलू पांडे काँप रहा था।
हाँ।
वो जो चूड़ियों वाली गुमटी उलटता है?
वही।
टिंकू ने रिंच अपनी छाती से लगा ली।
तो फिर हमें डरना चाहिए या नहीं?
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।
देख, जो आदमी गुमटी उलटता है, वो ताक़त से उलटता है। जो आदमी काँपता है, वो किसी और चीज़ से डरता है। और जो किसी और चीज़ से डरता है, वो हमारे लिए काम की चीज़ है। डरना तब है जब वो हमसे नहीं, हम उससे डरें।
टिंकू ने सिर हिलाया। समझ गया।
क्या समझा?
कि तुम ऊपर से ऐसे बोलते हो जैसे सब पता है, उसने कहा, और अंदर से तुम्हें भी कुछ नहीं पता।
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
ये तूने कहाँ से सीखा?
तुमसे ही, उसने कहा और रिंच लेकर पीछे भाग गया।
बच्चा तेज़ हो रहा है। ये अच्छी बात नहीं है मेरे लिए।
मैंने जल्दी से ट्रंक खोला, उसमें अख़बार में लपेटा हुआ काग़ज़ रखा, ऊपर से औज़ारों का डिब्बा रखा, ट्रंक बंद किया और चाबी अपनी जेब में डाल दी। फिर मैंने घंटी को हथेली में घुमाया।
बोल, मैंने धीरे से कहा। अब क्या?
घंटी चुप रही।
बोल न।
सिर्फ़ इतना आया।
अभी नहीं। तेरे हाथ में काम बाक़ी है।
कौन सा काम?
जवाब नहीं आया।
मैंने चाय की तरफ़ देखा। शबनम आपा की गुमटी से धुआँ सीधा ऊपर जा रहा था और पीपल के पत्तों के बीच फँस रहा था।
मैं उसी तरफ़ चला।
शबनम आपा ने मुझे देखते ही कटोरी मेरी तरफ़ सरका दी।
बैठ, उन्होंने कहा। तेरा चेहरा ऐसा है जैसे तूने सुबह से कुछ नहीं खाया और दोपहर से कुछ सोचा नहीं।
आपा, चाय में अदरक कम है।
उन्होंने चिमटी उठाई। मैं चुप हो गया।
तीन सिप के बाद मुझे लगा ज़मीन वापस आ गई है।
तभी चार जोड़ी पैर एक साथ गुमटी पर आ धमके।
सानिया सबसे आगे। उसके पीछे गुड्डू, हाफ़ पैंट में, घुटने पर नई पट्टी। उसके पीछे रफ़ीक़, जिसकी शर्ट हमेशा उसके बड़े भाई की होती है और इसलिए कंधे से फिसलती रहती है। और सबसे पीछे चिंटू, दस साल का, जो इस गली का सबसे तेज़ दौड़ने वाला बच्चा है और सबसे धीमा सोचने वाला।
उस्ताद! सानिया ने कहा। उस्ताद, तुम्हें पता है पीपल के नीचे क्या हुआ?
मुझे क्या पता, मैंने कहा। मैं तो सुबह से साइकिल ठीक कर रहा हूँ।
उसने अपनी कलाई पर हाथ रखा, जैसे कोई बड़ी खबर देने वाली टीवी आंटी हो।
बंसी बाबा आज चबूतरी पर आए। पहली बार। दो महीने बाद। और रहमत बाबा पहले से बैठे थे।
तो?
तो कुछ नहीं, उसने आँखें बड़ी करके कहा। न बंसी बाबा ने बोला, न रहमत बाबा ने। दोनों पत्थर की तरह बैठे रहे। इतनी दूर बैठे थे कि बीच में एक आदमी और बैठ सके। मैंने गिना।
चिंटू आगे आया। उसकी मुट्ठी बंद थी।
उस्ताद, उसने कहा, और बंसी बाबा के हाथ से एक चीज़ गिरी। मैंने उठा ली।
उसने मुट्ठी खोली।
उसकी हथेली पर लकड़ी का एक टुकड़ा था। छोटा, काला, पुराना। एक तरफ़ काँच था, फूटा हुआ। काँच के नीचे किसी तस्वीर का आधा हिस्सा दिख रहा था — किसी आदमी का कंधा, कुछ ईंटों वाली दीवार, और एक साइकिल का आधा हैंडल।
फ्रेम बीच से टूटा था। असली में कटा हुआ था, जैसे किसी ने ब्लेड से सीधा आधा कर दिया हो।
मैंने उसे हाथ में लिया। लकड़ी पुरानी थी, किनारे चिकने हो चुके थे, जैसे कोई चालीस साल से उसे जेब में रखकर उँगलियों से सहला रहा हो।
यह तो आधी तस्वीर है, मैंने कहा।
हाँ, गुड्डू बोला। और रहमत बाबा की जेब से भी ऐसा ही एक टुकड़ा गिरा था कल। मैंने देखा था। वो उसे उठाकर रूमाल से पोंछकर वापस जेब में रखते हैं।
मेरी छाती में कुछ हिला।
तुम चारों, मैंने कहा और अपनी जेब से दो रुपये निकाले। शबनम आपा ने मेरी कलाई पकड़ ली।
अपने पैसे रख, उन्होंने कहा और कटोरी से दो सिक्के निकालकर बच्चों को दे दिए। और मुझे देखकर बोलीं, इसकी गुमटी में जो लोग चाय के पैसे छोड़ते हैं, वो पैसे बच्चों के ही हैं। सवाल मत पूछ।
फिर बच्चों को देखकर। जाओ, चार लड्डू लेकर आओ। और हाँ, सानिया, तेरे को पता है न, मैं सुनना नहीं चाहती कि तुमने दुकान से लड्डू चुराए।
नहीं आपा, सानिया हँसी।
चारों भाग गए।
मैंने फ्रेम का टुकड़ा जेब में रखा और चाय खत्म की।
आपा, मैंने कहा, बंसी बाबा और रहमत बाबा में क्या बात हुई थी?
उन्होंने चिमटी से समोसा उठाया और मुझे थमा दिया।
मैं बोलूँगी नहीं, उन्होंने कहा। मैं गली की बात मुँह से नहीं निकालती। ये लोग अपनी बात खुद नहीं बोलते और मुझसे उम्मीद करते हैं कि मैं बोलूँ। मैं नहीं बोलती।
फिर उन्होंने मेरे सिर पर नज़र डाली।
पर इतना बता देती हूँ। वो दोनों एक चबूतरी पर पैंतालीस साल से बैठते हैं और एक-दूसरे से एक शब्द नहीं बोले। एक बार भी नहीं। और रोज़, हर सुबह, दोनों आते हैं। अगर एक दिन कोई न आए, तो दूसरा उसी दिन घर जाकर पूछता है — तबीयत ठीक है? और फिर लौटकर चबूतरी पर बैठ जाता है और फिर चुप।
मैंने कहा, तो फिर झगड़ा किस बात का है?
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