The Mysterious Bell – Chapter 529
"मुझे पता है," उन्होंने कहा। "मैंने उसे तेरे घर में देखा था। पच्चीस साल पहले। तेरे दादा की साइकिल पर। और मैंने उस दिन से खुद से कहा था कि मैं उस घंटी की तरफ़ नहीं देखूँगा।"
"क्यों?"
"क्योंकि वो मुझे मेरी ग़लती याद दिलाती है।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और उनकी आँखें साफ़ थीं, बूढ़ी, पर साफ़। "मैंने पचास साल पहले एक चीज़ अपने हाथ से छोड़ दी थी। उसके बाद मैंने तय किया कि मैं किसी भी चीज़ को हाथ नहीं लगाऊँगा जो मुझसे बड़ी हो। घंटी मुझसे बड़ी थी। काग़ज़ मुझसे बड़ा हो गया। और मैं दोनों से पीछे हट गया।"
मैं उनके सामने बैठ गया। फ़र्श पर। कपड़े के ढेर के बगल में।
"उस्ताद," मैंने कहा, "मैं आपको दोष देने नहीं आया। सच में नहीं आया। मैं कल रात से यही सोच रहा था कि क्या कहूँ, और मुझे कुछ नहीं मिला। पर एक बात है।"
"कह।"
"अब सच सबके सामने आना चाहिए।" मैंने काग़ज़ की तरफ़ इशारा किया। "ये काग़ज़ अब संदूक में नहीं रहेगा। ये काग़ज़ उस सभा में जाएगा जहाँ सब होंगे। और मुझे आपकी ज़रूरत है।"
उस्ताद ने बहुत देर तक मेरी तरफ़ देखा।
"तू मुझसे क्या चाहता है?"
"मैं नहीं चाहता कि आप झूठ बोलें। मैं नहीं चाहता कि आप मेरे पापा को बचाएँ।" मैंने कहा। "मैं सिर्फ़ इतना चाहता हूँ कि जब वो काग़ज़ सबके सामने खुले, तो आप वहाँ खड़े हों और कहें — हाँ, मैं गवाह था। मैंने अपना नाम लिखा। मैंने उनका हाथ पकड़ा। और मैंने अंदर क्या लिखा था, वो नहीं पढ़ा। बस इतना।"
उस्ताद ने आँखें बंद कर लीं।
"तू जानता है कि इसका मतलब क्या होगा?" उन्होंने कहा। "इस गली में मैं पचास साल से उस्ताद हूँ। सब मुझे सीधा आदमी मानते हैं। उस दिन के बाद कोई मेरी दुकान पर सिलाई करवाएगा?"
"कोई नहीं करवाएगा तो मैं करवाऊँगा," मैंने कहा।
उन्होंने आँखें खोलीं।
"मेरी जीन्स फटी हुई है," मैंने कहा। "मुझे हर महीने सिलाई करवानी पड़ती है। और मैंने आज तक किसी और के पास नहीं करवाई।"
उस्ताद हँसे। बहुत छोटी सी हँसी, जैसे किसी बूढ़े आदमी के अंदर से कोई बच्चा एक बार झाँककर चला गया हो।
फिर उन्होंने सिर हिलाया।
"ठीक है," उन्होंने कहा। "मैं बोलूँगा। पर एक शर्त है।"
"बोलिए।"
"मैं उस सभा में ये नहीं कहूँगा कि मैंने कुछ नहीं जाना था। मैंने जाना था। मैंने बाद में सब समझ लिया था। और मैं चुप रहा।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "मैं तेरे पापा से भी यही कहूँगा, सबके सामने।"
मेरे गले में कुछ अटक गया।
"उस्ताद, ये ज़रूरी नहीं—"
"ज़रूरी है।" उन्होंने मेज़ पर हाथ रखा। "सच का मतलब ये नहीं कि तू अपने हिस्से का सच छोड़ दे। जो आदमी अपनी ग़लती बताता है, वो गवाही देता है। और जो सिर्फ़ दूसरे की ग़लती बताता है, वो वकील बन जाता है। मैं वकील नहीं हूँ। मैं दर्ज़ी हूँ। मुझे नाप लेना आता है। और मेरा नाप ग़लत था।"
फिर वो उठे और पीछे की अलमारी से एक काग़ज़ निकाला — सादा, पर मोटा।
"इसकी नकल बनवा ले," उन्होंने कहा। "आज ही। दो नकलें। एक तेरे पास रहे, एक मेरे पास। असली काग़ज़ किसी को नहीं देना, चाहे वो पुलिस हो या वकील। असली चीज़ हाथ में रहेगी तो सब डरेंगे। असली चीज़ चली गई तो सब हँसेंगे।"
मैंने काग़ज़ लिया।
"उस्ताद," मैंने कहा, "एक बात और पूछनी है।"
"पूछ।"
"जब आपने पचास साल पहले वो चीज़ छोड़ी थी… वो क्या थी?"
वो रुके। उनके हाथ में कैंची थी। उन्होंने उसे मेज़ पर रख दिया, बहुत सावधानी से, जैसे कोई सोते हुए बच्चे को बिस्तर पर रखता है।
"वो घंटी थी," उन्होंने कहा। "पर उसके बारे में मैं आज नहीं बोलूँगा। किसी दिन बोलूँगा। जिस दिन तेरा काम पूरा हो जाएगा।"
मैं कुछ पूछता, उससे पहले उन्होंने हाथ उठाया।
"जा। दुकान खोल। टिंकू बाहर बैठा है और तेरी दुकान के बोर्ड पर चढ़ा हुआ है।"
"टिंकू?"
"आधे घंटे से।" उन्होंने चश्मा पहना। "बोल रहा था कि बोर्ड टेढ़ा है। मैंने कहा कि बोर्ड असली में सीधा है, दुनिया टेढ़ी हो गई है। उसने मेरी बात नहीं मानी।"
मैं हँसा। पहली बार उस सुबह।
मैंने पापा का काग़ज़ सँभाला और शटर के नीचे से बाहर निकला।
धूप अब तेज़ हो रही थी। गली में लोग आने लगे थे। कोई साइकिल पर, कोई पैदल, कोई दूध का बर्तन लिए। पीपल के नीचे बुज़ुर्गों की चबूतरी पर एक चटाई बिछ गई थी।
मैं अपनी दुकान पर पहुँचा तो देखा — टिंकू सच में बोर्ड पर चढ़ा था।
वो लकड़ी के स्टूल पर खड़ा था, हाथ ऊपर, और उसने बोर्ड के एक तरफ़ की कील अपनी जेब से निकली रिंच से उठा ली थी और उसे ठोकने की कोशिश कर रहा था।
"टिंकू," मैंने कहा, "रिंच से कील ठोकते हैं?"
वो हड़बड़ाया और उसकी परची — माफ़ करना, उसकी टोपी — गिर गई।
"उस्ताद! आप आ गए!" वो नीचे उतरा। "बोर्ड टेढ़ा है। मैंने सोचा, सीधा कर दूँ।"
"बोर्ड टेढ़ा नहीं है। पर अब हो जाएगा।" मैंने उसके हाथ से रिंच ली और उसे ट्रंक पर रख दिया। "और ये रिंच हथौड़ा नहीं है। ये रिंच है। इससे हम गाड़ी ठीक करते हैं, दुनिया नहीं।"
"तो दुनिया किससे ठीक होती है?"
मैं एक पल रुका।
"पता नहीं," मैंने कहा। "शायद उससे, जो रिंच का इस्तेमाल नहीं करता।"
टिंकू ने सिर खुजाया। "आप बहुत गहरी बातें कर रहे हैं। सुबह से। क्या हुआ?"
"कुछ नहीं।" मैंने दुकान का ताला खोला। "चाय ला। शबनम आपा से। और ध्यान रखना, वो तुझे उधार नहीं देगी।"
"उधार नहीं, आपके हिसाब में।"
"मेरे हिसाब में पैसा नहीं है।"
"तो उधार में।" और वो भाग गया। छोटा सा, दुबला, घुटने पर पट्टी, और उसकी चप्पलें उससे तेज़ दौड़ती थीं।
मैंने दुकान में घुसकर ट्रंक खोला। काली साइकिल दीवार के सहारे खड़ी थी — दोनों पहिये ठीक, चेन जुड़ी हुई, और हैंडल पर वो खाली लकड़ी का ब्रैकेट जो अब भी छत की तरफ़ देख रहा था, जैसे उसे किसी का इंतज़ार हो।
मैंने पापा का काग़ज़ ट्रंक के नीचे वाले खाने में रखा — उस जगह जहाँ सिर्फ़ मैं हाथ डालता हूँ, क्योंकि वो खाना टेढ़ा है और दिखता नहीं।
फिर मैं झुका।
फ़र्श पर एक पेचकस पड़ा था। रिंच के बगल में। मुझे याद नहीं था कि मैंने उसे वहाँ छोड़ा था। मैंने कमर झुकाई और उसे उठाने के लिए हाथ बढ़ाया, और मेरी क़मीज़ की जेब मेरे पेट से सट गई।
और घंटी बजी।
एक बार। छोटी, साफ़, ठंडी।
मेरा हाथ हवा में रुक गया।
"टन।"
मैं गली में किसी साइकिल की घंटी समझकर सीधा हुआ। फिर मुझे एहसास हुआ कि आवाज़ बाहर से नहीं आई। मेरी जेब से आई।
मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी मेरी हथेली में आई। वो ठंडी थी।
फिर मुझे कुछ सुनाई दिया। बहुत धीमा। इतना धीमा कि मुझे लगा मैंने सिर्फ़ सोचा है। पर शब्द साफ़ थे।
"ये मुझे पहचानता है।"
मेरे हाथ से पेचकस गिर गया।
"ये मुझे पहचानता है।" मैंने दोबारा सुना, या मुझे लगा? मेरी रीढ़ से ठंडक ऊपर गई और मेरे सिरहाने अटक गई।
मैंने पीछे मुड़कर देखा।
दुकान के दरवाज़े पर, धूप के बीच, एक आदमी खड़ा था।
मोटा शरीर। गले में मोटी सोने की चेन। मुँह में पान। और वो रुक गया था — पूरा रुक गया था, जैसे कोई चलती साइकिल अचानक ब्रेक लगाकर रुक जाए।
बबलू पांडे।
उसका पान चबाना बंद हो गया था।
उसकी नज़र मेरी हथेली पर थी।
मैंने घंटी को बंद करने की कोशिश की — मेरी उँगलियाँ उसे ढकने लगीं।
बबलू ने दो क़दम आगे बढ़े। फिर एक और। और फिर वो इतना करीब आ गया कि मुझे उसके मुँह में पान की लाली और उसकी गर्दन पर पसीना, दोनों दिखने लगे।
उसने मेरा हाथ पकड़ा।
पूरी ताक़त से नहीं। पर ऐसे पकड़ा जैसे कोई मरे हुए आदमी की कलाई पकड़ता है — यक़ीन करने के लिए कि वो मरा है या नहीं।
उसने मेरी उँगलियाँ खोलीं।
घंटी उसकी नज़र के सामने थी — पीतल की, पुरानी, हल्की हरी-भूरी जंग लगी हुई, ऊपर एक छोटी सी दरार।
बबलू की आँखें बदल गईं।
मैंने उस आदमी को उस दिन चूड़ियों की गुमटी उलटते देखा था। मैंने उसे पान चबाते देखा था। मैंने उसे धमकाते देखा था। उसका चेहरा हमेशा एक जैसा रहता था — जैसे कोई दीवार हो, जिस पर कुछ लिखा ही नहीं जा सकता।
पर अब उस दीवार पर कुछ लिखा जा रहा था।
"अरे," उसने कहा। उसकी आवाज़ सूखी थी। "अरे… ये तो वही घंटी है।"
"कौन सी घंटी?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ भी अजीब लग रही थी, जैसे किसी और की हो।
उसने मेरा हाथ नहीं छोड़ा। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं और उनमें काँप रहा था — हल्का सा, पर काँप रहा था।
"वही," उसने कहा। "जो साहब के उस पुराने काग़ज़ पर बनी है। जो साहब ने आज तक अपने कमरे में टाँग रखी है। ऊपर, सीढ़ी के पास, काले फ़्रेम में।"
मेरा दिल एक बार ठोकर खाकर रुका।
"तूने ये कहाँ से निकाली?" उसने मेरी तरफ़ झुककर कहा, और उसकी आवाज़ अब धीमी थी और उसमें वो डर था जो इंसान को सच बोलने पर मजबूर कर देता है। "ये… ये तो सालों से साहब के पास है। ये यहाँ क्या कर रही है ये तेरी जेब में?"
गली में कोई साइकिल गुज़री। किसी ने दूर से कुछ कहा। चाय की केतली की सीटी बजी।
और मैं अपनी दुकान के बीच खड़ा था, एक आदमी का हाथ मेरे हाथ पर था, और मेरी हथेली में एक पुरानी घंटी थी जो अभी-अभी बोली थी — ये मुझे पहचानता है।
और मैंने शबनम आपा की बात याद की — जो लड़ने जाता है, वो कम से कम जानता है कि दुश्मन कौन है।
मुझे अब पता चल रहा था।
दुश्मन यहाँ था। मेरी दुकान में। मेरे बोर्ड के नीचे। मेरी घंटी के ज़रिए।
और सबसे बड़ी बात — वो घंटी को मेरी जेब में देखकर डर गया था।
जो आदमी डरता है, वो कुछ जानता है।
और मुझे वो जानना था।
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