The Mysterious Bell – Chapter 527
"और आज," उन्होंने कहा, "मैं तुझे वो दे रहा हूँ जो मुझे पंद्रह साल पहले देना चाहिए था। सच। ये संदूक अंदर से सड़ रहा था और मैं इसे खोलने से डरता रहा। अब तू खोल।"
मैंने चाबी संदूक के ताले में डाली।
ताला ज़ंग लगा था। चाबी पहले तो नहीं घूमी। मैंने थोड़ा ज़ोर लगाया। फिर थोड़ा और। फिर काजल आई और उसने अपने दोनों हाथ मेरे हाथ पर रख दिए। और हम दोनों ने साथ ज़ोर लगाया।
ताला घूमा।
एक आवाज़ आई — कड़क, पुरानी, दर्द भरी — और ताला खुल गया।
मैंने रस्सी खोली। मैंने ढक्कन उठाया।
अंदर से एक गंध आई। पुराने काग़ज़ की गंध। नमी की गंध। और कुछ और — जैसे बंद कमरे की गंध, जहाँ बहुत सालों से हवा नहीं आई हो।
सबसे ऊपर एक मोटा काग़ज़ था, मुड़ा हुआ, पीला पड़ा हुआ। उसके नीचे दूसरा। फिर तीसरा। तीन-चार काग़ज़ थे, पर वो काग़ज़ नहीं, बल्कि एक-दूसरे से चिपके हुए साल थे — जैसे वक़्त ने उन्हें एक साथ दबा दिया हो।
उनके नीचे एक टूटी चेन थी।
चेन, धातु की, चाँदी जैसी दिखती थी पर शायद स्टील की थी — और वो बीच से टूटी हुई थी। एक सिरा मुड़ा हुआ था, जैसे ज़ोर लगाकर तोड़ा गया हो। मैंने उसे उठाया। वो मेरी हथेली में ठंडी थी।
"ये किसकी है?" मैंने पूछा।
पापा ने कुछ नहीं कहा।
और फिर मैंने सबसे नीचे देखा।
एक फोटो थी।
छोटी, चौकोर, किनारों से थोड़ी घिसी हुई, सफ़ेद-काले रंग की। फोटो में दो आदमी खड़े थे। दोनों मुस्कुरा रहे थे। दोनों के हाथ कंधों पर थे।
बायीं तरफ़ वो आदमी था जिसे मैंने फ़ौरान पहचान लिया — उस्ताद अली बक्श। युवा, कम से कम तीस साल छोटे, पर वही चश्मा, वही मोटा फ़्रेम, वही सफ़ेद दाढ़ी — हालाँकि यहाँ दाढ़ी काली थी, थोड़ी सी। उनकी आँखों में वो शांति थी जो आज भी उनकी दुकान में बैठी रहती है।
और दूसरी तरफ़ — एक आदमी। मुझे नहीं पता था कौन। चौड़ा चेहरा, बड़ी मुस्कान, कानों तक फैली हुई। सफ़ेद शर्ट, बटन खुले हुए, आस्तीन मुड़ी हुई। उसका हाथ उस्ताद के कंधे पर था और उस्ताद का हाथ उसके कंधे पर। दोनों बहुत खुश लग रहे थे, जैसे उस दिन उन्होंने कोई बड़ी बात तय की हो।
मैंने फोटो को करीब किया।
"पापा," मैंने कहा, "ये दूसरा कौन है?"
पापा ने फोटो की तरफ़ देखा। एक लंबी साँस ली। फिर उन्होंने नज़र फेर ली।
"वो तेरे दादा के ज़माने का आदमी था," पापा ने कहा। "उसकी दुकान पीछे की गली में थी। वो… वो हमारे यहाँ आता-जाता था।"
"नाम?"
"अब क्या फ़र्क़ पड़ता है?"
"पापा—"
"अंकुश।" उनकी आवाज़ अचानक सख़्त हो गई। "फोटो रख। पहले काग़ज़ देख।"
मैंने फोटो नीचे रख दी।
मैंने काग़ज़ उठाया। पहला काग़ज़। मुड़ा हुआ। पीला। किनारों से थोड़ा फटा हुआ।
मैंने उसे खोला।
वो एक लिखा हुआ काग़ज़ था — हाथ से लिखा, नीली स्याही से, बहुत साल पुरानी स्याही। नीचे की तरफ़ एक लाल अंगूठे का निशान था — पापा का। और ऊपर बीच में लिखा था — किसी और का नाम। और उसके नीचे, गवाह की जगह पर, एक नाम।
उस्ताद अली बक्श।
मैंने काग़ज़ को दोनों हाथों से पकड़ लिया। मेरी उँगलियाँ काँप रही थीं। काग़ज़ मेरे हाथ में हल्का था, पर उसमें वो वज़न था जो पूरी गली को दबाकर बैठा था।
"पापा," मैंने कहा। मेरी आवाज़ धीमी थी। "उस्ताद की जगह… गवाह की जगह… उनका नाम है।"
पापा ने सिर हिलाया।
"मतलब वो वहाँ थे?" मैंने कहा। "जब आपने अंगूठा लगाया, वो वहाँ थे?"
पापा ने फिर सिर हिलाया। फिर उन्होंने अपनी आवाज़ इतनी धीमी कर दी कि मुझे सुनने के लिए आगे झुकना पड़ा।
"उस्ताद ही मुझे उस कमरे में ले गए थे," उन्होंने कहा। "वो जानते थे।"
कमरे में चुप्पी छा गई।
"और जब मैं काँप रहा था," पापा ने कहा, "जब मेरा हाथ स्याही की डिब्बी तक नहीं जा रहा था, तब वो मेरे पास खड़े थे। उन्होंने मेरा कंधा पकड़ा। फिर मेरा हाथ पकड़ा। फिर स्याही की डिब्बी मेरे अंगूठे के नीचे रखी। और फिर वो… वो बाहर आ गए।"
काजल ने अपना हाथ मेरी कलाई पर रख दिया।
"और आप अंदर अकेले रह गए?" उसने पूछा, बहुत धीमे से।
पापा ने कुछ नहीं कहा।
मैंने घंटी की तरफ़ देखा। मेरी जेब में वो अब भी थी। वो हिल नहीं रही थी। चुप थी।
पर मुझे लगा जैसे उस रात वो बहुत पुरानी और बहुत थकी हुई आवाज़ में बोली — सिर्फ़ एक बार — "अब तुम जान गए।"
और मैं वहीं बैठा रहा, पापा के सामने, संदूक खुला हुआ, फोटो हाथ में, उस्ताद का नाम काग़ज़ पर, और मेरे अंदर कुछ ऐसा टूटा जो मैं नाम नहीं दे सकता था।
क्योंकि मेरे पास घंटी थी।
और मेरे पास तंत्र था।
और वो सब कुछ जोड़ सकता था।
पर किसी ने ये नहीं बताया था कि सबसे पहले मुझे खुद को जोड़ना पड़ेगा।
॥
मैं उस फ़र्श पर बैठा रहा। कितनी देर, ये मुझे नहीं पता। संदूक का ढक्कन उल्टा पड़ा था और उसके अंदर से पुरानी लकड़ी, नैफ़्तलीन और कुछ जला हुआ काग़ज़ जैसी बदबू आ रही थी।
फोटो मेरे बाएँ हाथ में थी। काग़ज़ मेरे दाएँ हाथ में। और दोनों के बीच में जो बैठा था, वो मैं था — पर मुझे लग रहा था जैसे मैं खुद अपने से थोड़ा दूर जाकर बैठ गया हूँ, और वहाँ से देख रहा हूँ कि कमरे में क्या हो रहा है।
काजल ने मेरी कलाई छोड़ी नहीं थी। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं और उसकी साँस बहुत धीमी।
माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं। वो अंदर नहीं आईं। बस खड़ी रहीं, दोनों हाथ साड़ी के पल्लू में लपेटे हुए। उनका चेहरा उस पुराने बल्ब की रोशनी में पीला दिख रहा था और उनकी खाँसी दबी हुई थी — जैसे वो खाँसना चाहती हों पर कमरे में आवाज़ न करना चाहती हों।
पापा मेरे सामने बैठे थे। चश्मा घुटने पर रखा था। और उनकी आँखें… उनकी आँखें उस काग़ज़ पर टिकी थीं, जो मेरे हाथ में था।
मैंने काग़ज़ को करीब किया और फिर से पढ़ा। नीले रंग की स्याही, हाथ की लिखाई, बीच में किसी और का नाम, नीचे पापा का लाल अंगूठा, और उसके बगल में — गवाह। उस्ताद अली बक्श।
तुम सोच रहे होगे कि एक नाम से क्या फ़र्क़ पड़ता है। तो सुनो। उस रात मुझे ये समझ आया कि नाम सिर्फ़ नाम नहीं होता। नाम एक जगह होती है। और अगर कोई नाम किसी काग़ज़ पर गवाह की जगह लिखा हो, तो उसका मतलब है वो आदमी उस वक़्त वहाँ खड़ा था। उसने देखा था। उसने सुना था। और वो चुप रहा।
मैंने धीरे से काग़ज़ नीचे रखा।
"पापा," मैंने कहा, "कल सुबह मैं उस्ताद के पास जाऊँगा।"
पापा ने कुछ नहीं कहा।
"आप मना करेंगे तो भी जाऊँगा," मैंने कहा। "पर मैं चाहता हूँ कि आप मना न करें।"
पापा ने बहुत देर तक मेरी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने वो चश्मा उठाया, कान पर टेप से बाँधा, और बहुत धीमे से कहा, "जब जाओ, तो उनसे ये मत कहना कि मैंने कुछ कहा था। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा था। मुझे बचाया था। अपने तरीक़े से।"
ये सुनकर मेरे अंदर कुछ ऐसा हिला जो मैं नाम नहीं दे सकता। पापा आज भी उस आदमी को बचा रहे थे। साठ साल के आदमी के पास बचाने के लिए सिर्फ़ यही बचा था — दोष किसी और पर मत डालो।
मैं उठा। काग़ज़ को एक पुराने अख़बार की तह में रखा, फिर उसे अपनी क़मीज़ की अंदरूनी जेब में डाला, जो पेट की तरफ़ थी। ये मैंने जानबूझकर किया। अगर कोई मुझे रोके, तो काग़ज़ मेरे हाथ में नहीं, मेरे शरीर पर होगा।
काजल उठी और उसने मेरा हाथ पकड़ लिया।
"मैं साथ चलूँ?" उसने पूछा।
"नहीं," मैंने कहा। "तू माँ के पास रह। सुबह डॉक्टर इसरानी के पास जाना है। दस बजे। चाय की शर्त है, मत भूलना।"
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