The Mysterious Bell – Chapter 526
"घर। पापा से पूछने।"
"अभी?"
"तू कब तक इंतज़ार करेगा, अंकुश? कल सुबह? फिर कल दोपहर? फिर अगले हफ़्ते? चंद्रेश अगले हफ़्ते आएगा, तूने खुद कहा था। और उसके पहले हमें पता होना चाहिए कि संदूक में क्या है। अगर उसमें कुछ ऐसा है जो काम आ सकता है, तो हमारे पास हफ़्ता है, चार दिन है, कम से कम कुछ तो है। और अगर नहीं है, तो भी हमें पता होना चाहिए कि नहीं है। अंधेरे में लड़ना सबसे बड़ी बेवकूफी है।"
मैं उठा।
"कब से तू इतनी समझदार हो गई?" मैंने कहा।
"जब से मुझे पता चला कि मेरा भाई पूरी दुनिया को अकेले बचाने के चक्कर में खुद को खा जाएगा," उसने कहा। और फिर वो मुस्कुराई — इस बार पूरी तरह, थोड़ी देर के लिए।
हम सीढ़ियों से उतरे। नीचे डॉक्टर इसरानी का कमरा बंद था, पर उसके दरवाज़े के नीचे से रोशनी की एक पतली लकीर आ रही थी। बूढ़ा आदमी अंदर बैठा होगा, काग़ज़ों के बीच, और शायद वो हमारे जाने के बाद अपनी बीवी की तस्वीर से कुछ कह रहा हो। मुझे ये सोचकर अजीब लगा — कि इतनी रात को भी कोई इंसान तस्वीर से बात करता है। पर फिर मुझे लगा कि मैं भी तो घंटी से बात करता हूँ। और घंटी भी कभी-कभी जवाब देती है। तो मैं किस पर हँसूँ?
अस्पताल के बाहर निकले तो हवा ठंडी थी। गली में अंधेरा था, बस एक-दो दुकानों के बाहर छोटे बल्ब जल रहे थे। पीपल का पेड़ आगे खड़ा था, बड़ा, काला, जैसे कोई बूढ़ा आदमी चुपचाप खड़ा हो और हमें जाते हुए देख रहा हो।
हम चुपचाप चल रहे थे। काजल के नंगे पैर सीमेंट पर आवाज़ कर रहे थे — हल्की, हल्की, जैसे कोई बच्चा सोते-सोते बड़बड़ाए। मैंने अपनी चप्पल उतारकर उसे देना चाहा, पर उसने सिर हिला दिया।
"रहने दे। पैर ठंडे रहेंगे तो दिमाग़ ठंडा रहेगा," उसने कहा।
"क्या बात है। पहली बार तूने इतनी अच्छी बात कही।"
"चुप।"
हम मुड़े उस गली से जहाँ उस्ताद अली बक्श की दुकान थी। दुकान बंद थी, शटर पर एक बड़ा सा ताला लगा था, और ताले के ऊपर एक छोटा सा पीला बल्ब जल रहा था जो धीमी-धीमी आँख मार रहा था, जैसे थक गया हो।
काजल रुकी।
"अंकुश," उसने कहा।
"हाँ।"
"उस्ताद अंकल ने आज हमें नीला दरवाज़ा खोला। क्यों?"
"क्योंकि मैंने पूछा।"
"पर उन्होंने पहले मना किया था, ना? चाबी देने से मना किया था। फिर अचानक मान गए।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"तू क्या कह रही है?"
"मैं कह रही हूँ कि उन्होंने अचानक क्यों माना?"
मैंने उस बल्ब की तरफ़ देखा। फिर ताले की तरफ़। फिर उस अंधेरे शटर की तरफ़ जिसके अंदर पुरानी सिलाई मशीन खड़ी थी, शायद आज रात भी टिक-टिक नहीं कर रही थी।
"मुझे नहीं पता," मैंने कहा। "पर तूने अच्छा सवाल पूछा।"
"हम्म।"
"अब चल। घर चल। फिर सोचेंगे।"
हम आगे बढ़े। पीपल की चबूतरी के पास से गुज़रे। एक कुत्ता वहाँ सो रहा था, उसने हमें देखा, सिर उठाया, फिर वापस सिर रख दिया। उसे हमसे कोई मतलब नहीं था। कुत्ते बहुत समझदार होते हैं — वो जानते हैं कब किससे डरना है और कब नहीं।
गली के मोड़ पर पुराना नल था, पत्थर के टैंक के पास, और वहाँ से पानी टपक रहा था — टप, टप, टप — हर दो सेकंड में। रात में वो आवाज़ बहुत तेज़ लगती है। मुझे लगा जैसे वो पानी नहीं, वक़्त टपक रहा है।
और फिर हम घर पहुँचे।
दरवाज़ा खुला था।
माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं।
उनके हाथ अब भी खाली थे। उन्होंने साड़ी का पल्लू कमर में खोंस रखा था, और उनके माथे पर चंदन का टीका थोड़ा फैल गया था, जैसे उन्होंने बीच में माथा पोंछा हो। उनकी आँखें लाल थीं, पर वो रो नहीं रही थीं। वो बस खड़ी थीं, और उनके चेहरे पर वो भाव था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — किसी औरत का चेहरा जब वो अपने घर की दहलीज़ पर खड़ी हो और उसे पता हो कि अंदर कोई टूटा बैठा है और बाहर कोई आने वाला है।
काजल उनके पास गई। और कुछ नहीं बोली। बस उनसे लिपट गई। और माँ ने उसका सिर पकड़ा और उसके बालों में उँगलियाँ फिराईं।
"अंदर आ," माँ ने कहा। सिर्फ़ इतना।
हम अंदर गए।
पापा बैठे थे।
वही जगह — चूल्हे के पास वाला फ़र्श, पर चूल्हा अब बुझ चुका था। उसकी राख में आख़िरी अंगारा भी ठंडा हो रहा था। पापा की गोद में लकड़ी की वो छड़ी अब भी थी, पर उन्होंने उसे ज़मीन पर रख दिया था, जैसे छोड़ दिया हो। उनका चश्मा कान पर टेप से बँधा था, और टेप अब काला पड़ चुका था। उन्होंने हम दोनों को देखा — पहले काजल को, फिर मुझे — और मुझे लगा जैसे वो एक सवाल पूछ रहे हैं, बिना मुँह खोले।
काजल ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने उसकी तरफ़ देखा। और फिर मैं आगे बढ़ा।
मैंने पापा के सामने फ़र्श पर घुटने टेके।
"पापा," मैंने कहा।
"हाँ।"
"मैं डॉक्टर इसरानी के पास गया था। काजल के साथ।"
पापा ने सिर हिलाया।
"उन्होंने बताया कि अस्पताल की ज़मीन पर रणवीर की नज़र है। और अगर काग़ज़ात में गड़बड़ी निकली, तो अस्पताल दो महीने में बंद हो जाएगा। मरीज़ दूसरी जगह चले जाएँगे। बिल्डिंग खाली पड़ जाएगी। और फिर ज़मीन कौड़ियों के भाव बिकेगी।"
पापा ने कुछ नहीं कहा।
"पापा," मैंने कहा, "अब मैं सामना करूँगा।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें पानी भरी थीं, पर वो रो नहीं रहे थे। उनका हाथ एक पल के लिए काँपा, फिर रुक गया।
"अंकुश—" उनकी आवाज़ फँस गई। उन्होंने गला साफ़ किया। "अंकुश, तू नहीं जानता। वो आदमी—"
"मैं जानता हूँ, पापा।"
"नहीं, तू नहीं जानता।"
"पापा," काजल ने कहा। उसकी आवाज़ धीमी थी पर साफ़। "आप अभी भी डर रहे हैं। हम समझ रहे हैं। पर आप अकेले डर रहे हैं, और यही सबसे बड़ी बात है। अब आप अकेले नहीं हैं।"
पापा ने अपना चश्मा उतारा। उन्होंने उसे अपने घुटने पर रख दिया। उसके बिना उनका चेहरा थोड़ा और छोटा लग रहा था, थोड़ा और उजला।
"मैंने पंद्रह साल इसे पहने रखा," उन्होंने कहा, बहुत धीमे से, जैसे खुद से बोल रहे हों। "कान पर टेप बाँधकर। सोचा कि अगर चश्मा ठीक रहेगा तो सब ठीक रहेगा। बेवकूफ़ आदमी।"
"पापा—"
"ता।" उन्होंने हाथ उठाकर मुझे रोका। "अब मत बोल। अब मैं बोलता हूँ।"
वो उठे। धीरे से। उनकी कमर झुकी हुई थी, जैसे अंदर कुछ भारी टँगा हो। वो घर के अंधेरे कोने की तरफ़ गए। वहाँ लकड़ी का पुराना संदूक रखा था — रस्सी बँधी, धूल, और ऊपर एक पुराना ताला। मैंने उस संदूक को सैकड़ों बार देखा था, पर कभी सोचा नहीं कि उसमें क्या है। बचपन में सोचता था कि शायद खज़ाना है। फिर बड़ा हुआ तो सोचना बंद कर दिया।
पापा संदूक के सामने रुके।
वो मेरी तरफ़ मुड़े।
"अंकुश," उन्होंने कहा। "अपनी चाबी निकाल।"
मेरा हाथ अपने आप गले की तरफ़ गया। उँगलियों ने उस पुरानी चाबी को छुआ, जो पंद्रह-सोलह साल की उम्र में पापा ने मेरे गले में डाली थी, बिना बताए कि ये किस चीज़ की है। धातु ठंडी थी, पर मेरी गर्दन की गर्मी से उसमें थोड़ी जान आ गई थी।
मैंने डोरा उतारा और चाबी अपनी हथेली पर रखी।
"ये चाबी," पापा ने कहा, "इसी संदूक की है।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"फिर आपने मुझे पंद्रह साल पहले क्यों दी?"
"क्योंकि मुझे डर था," पापा ने कहा। "डर था कि अगर मैं इसे अपने पास रखूँगा, तो एक दिन कमज़ोर पड़कर इसे कहीं फेंक दूँगा। या जला दूँगा। या किसी को बेच दूँगा। और तू उस वक़्त छोटा था, तू इसे सिर्फ़ एक चीज़ समझता था। तू इसे अपने गले में डालकर सो जाता था। मैं जानता था कि तू इसे कभी नहीं खोएगा। इसीलिए तुझे दे दी।"
वो एक पल रुके।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno