The Mysterious Bell – Chapter 522
"पापा, जवाब दीजिए!"
मेरी आवाज़ ऊँची हो गई। पहली बार। मैंने ऐसा कभी नहीं किया था।
पापा काँपे।
और फिर उन्होंने वो कहा जो मैं कभी भूल नहीं पाऊँगा।
"मैं डर गया था," उन्होंने कहा। "उस वक़्त मैं तेरी उम्र का नहीं था, न? मैं एक पति था जिसकी बीवी तीन साल से खाँस रही थी और मैं एक बाप था जिसके पास बेटे को ये बताने की हिम्मत नहीं थी कि दुकान चल नहीं रही। और फिर एक आदमी ने कहा कि मुफ़्त इलाज हो जाएगा। तो मैंने अंगूठा लगा दिया। और मैं उस दिन भी डरा था, और मैं आज भी डरा हूँ। बस डर का चेहरा बदल गया।"
वो उठे। धीरे। घुटना चटका।
"मैं ये नहीं कह रहा कि मैंने सही किया। मैंने ग़लत किया, और मैं ये ग़लती पंद्रह साल ढोया, और मैंने तुम दोनों को भी ढुलवाया। मैंने तेरे हाथ में किराए की दुकान दी, अंकुश। किराए की। और उसे तेरी दुकान कहा। तुझे कितना बड़ा धोखा दिया, ये मैं जानता हूँ।"
"पापा—"
"मैं जानता हूँ कि तू मुझे माफ़ कर देगा।" उनकी आँखें भर गईं। "यही तो दिक्कत है। तू कर देता है। तेरी माँ कर देती है। और मैं खुद को नहीं कर पाता।"
काजल दीवार से सरका कर आगे आई।
वो धीरे चली। और वो मेरे पास से गुज़री और पापा के सामने खड़ी हुई। और उसने एक शब्द भी नहीं कहा। बस देखती रही।
और फिर उसने कुछ ऐसा पूछा जो मैंने नहीं पूछा था।
"पापा," उसने कहा, "जब आपने अंगूठा लगाया, तब आपको पता था?"
पापा ने उसकी तरफ़ देखा।
"क्या पता था?"
"कि उस काग़ज़ से घर बिक रहा है।"
चुप्पी।
लंबी चुप्पी।
और यही अब सबसे ज़रूरी सवाल था। क्योंकि मैं उस सवाल का जवाब जानना नहीं चाहता था। मैं नहीं चाहता था कि मेरे पापा वो आदमी बनें जो जानकर भी चुप रहा। मैं चाहता था कि वो बेवकूफ़ बने रहें। मैं चाहता था कि वो धोखे में रहें। यही सबसे आसान होता।
पापा ने सीधा काजल की आँखों में देखा।
और उन्होंने कहा, "नहीं पता था।"
काजल ने आँखें बंद कर लीं।
"नहीं पता था," पापा ने फिर कहा, जैसे खुद को ही समझा रहे हों। "काग़ज़ के ऊपर वाली शीट पर सिर्फ़ इलाज की बात थी। नीचे की शीट मेरे हाथ में आई ही नहीं। उन्होंने ऊपर वाली शीट पर अंगूठा लिया। बाक़ी बंडल वो अपने साथ ले गए। और मुझे ये सात महीने बाद पता चला, जब मोहल्ले में नीलामी की बात चली। और उस दिन मैं उनके पास गया था, अंकुश।"
"और उस दिन उन्होंने क्या कहा?"
पापा ने अपना फटा कुर्ता देखा।
"उन्होंने कहा — शंकर भाई, आपका अंगूठा सबसे पहला है। अगर आप खड़े होकर बोल गए कि मैंने ये नहीं लगाया, तो मैं बर्बाद हो जाऊँगा। मैं कोई तीस साल का काम बंद नहीं करूँगा। मैं तुम्हारी बीवी का इलाज खुद करवाऊँगा — इस बात का काग़ज़ लिख दूँगा। और तुम्हारे बेटे की दुकान का भी हिसाब देखूँगा।"
"और आप चुप रह गए," काजल ने कहा।
"मैं चुप रह गया।"
"आप चुप रह गए," वो फिर बोली, और उसकी आवाज़ बढ़ने लगी, "और मैं पाँच महीने से खुद को कोस रही हूँ कि मैंने देखा और मैंने कुछ नहीं किया!"
"काजल, ये तेरी ग़लती नहीं है—"
"मुझे पता है!" वो चीखी। "मुझे पता है, पापा! मैं सिर्फ़… मैं सिर्फ़ ये चाहती थी कि आप मुझसे कह दें! एक बार कह दें! मैं आपकी बेटी हूँ, मैं पढ़ रही हूँ नर्सिंग, मैं दवा भी जानती हूँ और काग़ज़ भी पढ़ सकती हूँ, और मैं बस अठारह की हूँ, पापा, अठारह की! मैं वो काग़ज़ पढ़ सकती थी जो आपकी जेब में पंद्रह साल पड़ा था!"
वो फूट पड़ी। और रोई। चारपाई पकड़कर। और माँ ने थाली पास के ताखे पर रख दी, और वो काजल के पास गईं, पर काजल ने हाथ झटक दिया।
मैं चुप बैठा रहा।
क्योंकि कभी-कभी कुछ टूटने देने से ही जुड़ता है। मुझे ये घंटी ने नहीं सिखाया था। ये मुझे आज पता चला, उस कमरे में, अपने पापा को बिना चश्मे के देखते हुए।
और फिर पापा ने वो कहा जो मुझे तोड़ गया।
"काजल," उन्होंने कहा, "काग़ज़ की तह खोलने की हिम्मत मुझमें नहीं थी। तेरे पास होती।"
काजल रुकी।
"मैं तेरे जैसा नहीं हूँ," पापा ने कहा। "मैं हमेशा से काग़ज़ों से डरता आया हूँ। मेरे बाप भी डरते थे। हमारे घर में काग़ज़ पढ़ने का काम किसी ने नहीं किया। हम दिन में मेहनत करते थे और रात में दुआ पढ़ते थे। बस इसी से काम चलता था। तू पहली औरत है इस घर में जो काग़ज़ पढ़ती है। और मैंने तुझे नहीं बताया, इसकी सज़ा मुझे मिलनी चाहिए।"
"मुझे सज़ा नहीं चाहिए," काजल ने कहा। उसकी आवाज़ टूट रही थी। "मुझे बस ये चाहिए कि—"
वो रुकी।
"कि क्या?" मैंने पूछा।
"कि हम कुछ करें," उसने कहा। "हम आज भी बैठे हैं। पापा ने सब कबूल कर लिया, ठीक है। अब क्या? कल नीलामी का… कल तारीख़ आगे बढ़ जाएगी न! चंद्रेश आएगा और बोलेगा कि तारीख़ बढ़ती है, काग़ज़ ऐसे चलते हैं। और हम फिर बैठ जाएँगे।"
"नहीं," मैंने कहा।
"क्यों नहीं?"
"क्योंकि अब मेरे पास कुछ है," मैंने कहा, और मैंने अपनी जेब पर हाथ रखा। "अब मेरे पास एक ऐसा काग़ज़ है जिस पर आपके पापा का अंगूठा है और जो असली नहीं है। अब मेरे पास एक ऐसा आदमी है जो उस काग़ज़ के सामने खड़ा होकर कहेगा कि ये अंगूठा मेरा है और ये ग़लत था।"
काजल ने मेरी तरफ़ देखा।
"तू मतलब…"
"मतलब ये कि हम अब डरने वाले नहीं हैं," मैंने कहा। "अब जो है, वो खड़ा होगा।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "अगर मैं खड़ा हो गया, तो वो मुझे—"
"जो करना हो कर लें," मैंने कहा। "पर ये घर, ये गली, ये अस्पताल — ये सब कोई भी नहीं, तेरे हिसाब से नहीं चलेगा, पापा।"
मेरी आवाज़ तेज़ हो गई। मैंने खुद को रोका। यह मैं सोचकर अंदर ही अंदर मुस्कुराया कि ये मैं था। मैं, जो किसी की बात नहीं मानता। और मैं यहाँ खड़ा होकर अपने पापा को डाँट रहा था। मज़े की बात यह थी कि मैं शायद पहली बार उनकी बेटी जैसा बोल रहा था। माँ बीच में आईं और यही उन्होंने कहा।
"अब बहुत हुआ," माँ ने कहा।
हम तीनों रुके।
वो वहीं खड़ी थीं, दरवाज़े के पास, जिस तरह से वो तीन साल से खड़ी रहती हैं — जैसे खड़े रहना ही उनका इलाज हो।
"मैं तीन साल से यही कह रही हूँ," उन्होंने कहा। "कौन सुनता है?"
किसी ने कुछ नहीं कहा।
"मैं जानती थी," माँ ने कहा। "पंद्रह साल से नहीं, लेकिन पाँच साल से जानती थी। मुझे लगा कि अगर मैंने पूछा तो इनका चेहरा और झुक जाएगा। और मैं वो चेहरा देख नहीं सकती थी। इसलिए मैंने पूछा नहीं। मैं भी चुप रही। तो ग़लती सिर्फ़ इनकी नहीं है। मेरी भी है। और तुम दोनों की भी है, क्योंकि तुमने भी कुछ शुरू होने नहीं दिया।"
वो मेरे पास आईं। मेरे बालों में हाथ फिराया। उनके हाथ में मसालों की गंध थी, हल्दी और जीरा।
"अब कल सुबह," उन्होंने कहा, "मैं भी चलूँगी।"
"माँ, आपको आराम—"
"चुप।"
बस एक शब्द। और मैं चुप हो गया।
और फिर वो रसोई में चली गईं, और चूल्हे की आवाज़ आने लगी। और पापा उठकर उनके पीछे गए और उन्होंने चूल्हे के पास पड़ी लकड़ी उठाई, और कहा, "मैं चूल्हा ज़रा और तेज़ कर देता हूँ।"
और मुझे लगा कि शायद यही है। यही सबसे बड़ी बात है। कोई गले लगाकर रोना नहीं। बस एक आदमी का उठकर यह कहना कि मैं चूल्हा तेज़ कर देता हूँ।
मैं फर्श पर बैठा रहा। काजल भी। वो मेरे पास आई और बैठ गई, दीवार से टिककर, मुझसे सटकर। बहुत देर तक हम दोनों कुछ नहीं बोले।
फिर उसने कहा, "तूने घुटनों पर बैठकर पापा से पूछा।"
"हाँ।"
"तू वैसे नहीं है।"
"मैं जानता हूँ।"
"किसने सिखाया?"
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