The Mysterious Bell512 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 512

7 min read November 5, 2026

घंटी ने अपना सवाल अधूरा छोड़ दिया था। मैंने उसे मुट्ठी में दबाकर रखा, पर वो फिर चुप हो गई। जैसे कोई बुज़ुर्ग बात कहकर मुँह फेर लेता है और तुम्हें अकेला छोड़ देता है खुद सोचने के लिए।

मैंने घंटी को जेब में रखा। काली साइकिल की तरफ़ देखा। उसका पहिया अब भी धीरे-धीरे घूम रहा था, जैसे रुकने की ज़िद ही न हो।

मैंने हाथ बढ़ाकर उसे रोका। धातु ठंडी थी। उँगलियों पर ग्रीस लग गई।

दुकान का शटर उस वक़्त तक आधा खुला हुआ था। बाहर से गली की आवाज़ें आ रही थीं — कोई बच्चा साइकिल की घंटी बजा रहा था, कहीं पानी का नल छूटा हुआ था, और दूर किसी के घर से भजन की आवाज़ आ रही थी।

मैंने स्टूल खींचकर बैठना चाहा।

तभी टिंकू दौड़ता हुआ अंदर आया।

अरे, वो तो अपनी माँ के बुलावे पर घर गया था ना? मुझे लगा कि वो अब कल सुबह आएगा। पर वो लौट आया था। पसीना-पसीना। घुटने पर पट्टी फिर से खुल गई थी और उसे बाँधे हुए था, जैसे रास्ते में ही उसे सँभाला हो।

"उस्ताद," उसने कहा, साँस फूली हुई। "मैंने माँ को सब बता दिया।"

मैं सीधा हो गया।

"क्या बताया?"

"कि मैं स्कूल नहीं जाता। कि मैं पीपल के पीछे बैठा रहता हूँ। कि मैंने आपकी दुकान से पेचकस बेचा था।"

"और तेरी माँ ने?"

टिंकू ने नीचे देखा। उसके होंठ काँप रहे थे। फिर उसने मुँह उठाया और एक ऐसी बात कही जो मुझे उम्मीद नहीं थी।

"रोई," उसने कहा। "फिर मेरे सिर पर हाथ रखा। बोली — तूने सच बता दिया, यही बहुत है। अब रोज़ दुकान जाया कर। और हाँ, वो लाल वाली कॉपी में जो पैसे हैं, वो रख ले। मैं दवा फिर से शुरू कर दूँगी।"

मुझे कुछ समझ नहीं आया।

"कौन से पैसे?"

"पापा के," उसने धीरे से कहा। "जो उन्होंने किसी काम के लिए बचाए थे। माँ को पता था, पर उसने कभी नहीं छुआ। बोली — तेरे पापा चाहते थे कि तू कुछ बने। मैं वो पैसे नहीं रखूँगी।"

मैं टिंकू को देखता रहा।

इस छोटे से लड़के ने जो किया, वो मैं कई दिनों से नहीं कर पाया था। मैंने अपनी माँ से सच नहीं कहा था — कि मेरे पास घंटी है, कि मैं जोड़ तंत्र चला रहा हूँ, कि मैं अपने ही घर को बचाने की लड़ाई में उलझा हुआ हूँ। सब छुपा रहा था। और ये लड़का एक शाम में सब कह आया।

"उस्ताद?" टिंकू ने कहा। "आप नाराज़ हो?"

"किस बात पर?"

"कि मैंने बिना पूछे माँ को सब बता दिया।"

मैं हँसा। और मुझे हँसी में यह एहसास हुआ कि मेरी आँखें भीग रही हैं। मैंने हाथ से मुँह पोंछा।

"टिंकू," मैंने कहा। "तू स्टूल लेकर यहाँ आ।"

वो आया। मैंने उसे अपने सामने बैठाया।

"आज से तू यहाँ काम पर है। सुबह आठ बजे आएगा। शाम छह बजे जाएगा। महीने के आख़िर में पैसे मिलेंगे। बीच में कुछ भी चाहिए, मुझसे बोलेगा। पर एक बात पक्की —"

उसने कान सीधा किया।

"पहले औज़ार संभालना सीखेगा।"

वो चुप रहा।

"सुन रहा है? औज़ार। रिंच, पेचकस, हथौड़ा, पाना। इनको संभालना सीखना कोई छोटी बात नहीं है। जब तक तू किसी औज़ार को सही जगह पर सही हाथ से नहीं रख सकता, तब तक तू मशीन को छूने लायक़ नहीं है। समझा?"

"समझा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो कुछ था जो मैंने पहले कभी नहीं सुना — कृतज्ञता जैसा कुछ, पर डर से मिला हुआ।

"और सुन," मैंने कहा। "तेरे पापा के पैसे मत छूना। वो माँ के लिए हैं। तेरी मेहनत की कमाई से तू चीज़ें लेगा। अब चला जा, बोर्ड साफ़ कर। बाहर वो टेढ़ा बोर्ड टँगा है — सुबह से देख रहा हूँ, उस पर धूल जमी है। उसे पोंछ।"

टिंकू खुश होकर उठा। उसकी आँखों में वो चमक लौट आई थी जो सुबह थी — हाँ, जब वो रिंच चुराते पकड़ा गया था, तब भी थी, पर उस वक़्त मैंने उसे देखा नहीं था।

वो दौड़कर बाहर गया। मैंने देखा — उसने कद का दामन बढ़ाया, बोर्ड के नीचे खड़ा हुआ, और अपनी कमीज़ की आस्तीन से उसे पोंछने लगा।

मेरी दुकान के बोर्ड पर लिखा था — "अंकुश साइकिल रिपेयरिंग वर्क्स"। टेढ़ा टँगा हुआ। नीचे छोटे अक्षरों में मेरे पापा का नाम भी था, जो अब मिट चुका था।

टिंकू उसे पोंछ रहा था। धूल उड़ रही थी, और वो छींक रहा था, और फिर भी पोंछ रहा था।

मैंने जेब से घंटी निकाली।

उसे हथेली पर रखा। देखा।

फिर धीरे से कहा, जैसे मैं किसी से नहीं, खुद से बोल रहा हूँ, "दस अंक। क्या मिलेगा इनसे?"

घंटी चुप रही।

"बता ना," मैंने कहा। "तूने खुद कहा — पहला अंक, दस। तो इसका कोई फ़ायदा भी होगा।"

घंटी फिर भी चुप।

मैंने उसे एक बार हल्का सा हिलाया।

और तब वो बोली।

"टूटने से पहले की आवाज़," घंटी ने कहा। "दस अंक। चौबीस घंटे पहले पता चल जाएगा कि कौन सी चीज़ टूटने वाली है।"

मेरा दिल धक् से रह गया।

"पर एक बात," घंटी ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो वो तभी लाती है जब कोई शर्त बताती है। "ये एक ही बार चलेगी। एक बार सुन लिया, फिर खत्म। दस अंक एक बार में उड़ जाएँगे।"

मैं चुप हो गया।

मेरे हाथ में घंटी थी, और मेरे सामने काली साइकिल खड़ी थी, और बाहर टिंकू बोर्ड पोंछ रहा था, और मेरे सीने में एक चीज़ थी जो मुझे खा रही थी।

पहले मैंने सोचा — माँ की दवा।

माँ दो हफ़्ते की दवा छोड़ने वाली है। डॉक्टर इसरानी ने दो नई जाँच लिखी हैं और दवा बदली है, और वो परची उनकी जेब में पिछले महीने की तारीख़ से मोड़ी पड़ी है। जबकि माँ इसे जानती भी नहीं। मुझे पता है क्यों — क्योंकि वो मुझे बचाना चाहती है। वो चाहती है कि मैं ये घर सँभाल सकूँ, और उसके लिए वो खुद को काट लेगी।

अगर मैं टूटने से पहले की आवाज़ सुन सकूँ, तो शायद पता चल जाए कि आगे क्या टूटने वाला है। कहीं माँ की सेहत? कहीं उनकी दवा? कहीं कुछ और?

या फिर — दुकान।

क्योंकि दुकान का सातवाँ नंबर उस सौदे में है। जो काग़ज़ मीरा लाई थी, उसमें मेरी दुकान का नाम सातवें नंबर पर लिखा था। मतलब जो भी होने वाला है, वो मेरी इस जगह को निगलने के लिए आ रहा है। और अगर मुझे चौबीस घंटे पहले पता चल जाए कि क्या टूटेगा, तो शायद मैं कुछ कर सकूँ।

पर ये दस अंक एक ही बार में उड़ जाएँगे। कहीं मैं ग़लत चीज़ पर लगा दूँ तो?

मैंने आँखें बंद कर लीं।

मुझे पापा की आवाज़ याद आई। वो आवाज़ जो अब बहुत कम आती है। जो रात में पंखा ठीक करते हुए बस "हूँ" कहकर रह जाती है। जो कभी मेरे सवाल का जवाब नहीं देती।

माँ की आवाज़ याद आई। "मेरे यहाँ दाल में पानी नहीं मिलता, और बात में भी नहीं।"

काजल की आवाज़। उसकी कड़क। जो आज सुबह दरवाज़े की आड़ से सब सुन रही थी और कुछ नहीं बोली।

मीरा की आवाज़। जो मैंने आख़िरी बार सुनी थी तब वो चुप होकर चली गई थी। क्योंकि मैंने गुस्से में उसे चोट पहुँचाई थी। बात से नहीं। तीखे शब्दों से।

"दस अंक," मैंने धीरे से कहा। "और अगर मैं खर्च न करूँ?"

"तो वो पड़े रहेंगे," घंटी ने कहा। "काग़ज़ की तरह।"

"काग़ज़ की तरह?"

"जब तक तू खुद किसी को जोड़ने की हिम्मत नहीं करेगा," घंटी ने कहा, "बाक़ी अंक सिर्फ़ काग़ज़ रहेंगे।"

"मतलब?"

घंटी चुप हो गई।

"अरे, आधी बात क्यों छोड़ देती है तू?"

वो चुप रही।

मैंने घंटी को जेब में वापस रखा। मेरा दिमाग़ घूम रहा था। दस अंक — एक ही बार की आवाज़। चौबीस घंटे। माँ या दुकान। दुकान या माँ।

मैंने काली साइकिल की तरफ़ देखा। उसके हैंडल पर वो खाली लकड़ी का ब्रैकेट था। जंग लगी पुरानी साइकिल जो घर के पीछे दीवार की तरफ़ खड़ी है, उस पर भी वैसा ही खाली ब्रैकेट है। दोनों साइकिलें। दोनों ब्रैकेट। दोनों खाली।

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