The Mysterious Bell – Chapter 511
"वो सोचती है मैं रोज़ जाता हूँ। मैं सुबह बस्ता लेकर निकलता हूँ। स्कूल की गली में जाता हूँ। फिर पीछे से मुड़ जाता हूँ। पूरा दिन इधर-उधर।"
"क्यों?"
"क्योंकि स्कूल की फीस नहीं है," उसने कहा। "और माँ बीमार रहती है। दवा चाहिए। मैंने सोचा, कुछ काम करूँगा। कुछ पैसे मिलेंगे। पर कोई काम पर रखता नहीं। कहते हैं, उम्र कम है। कहते हैं, काग़ज़ चाहिए। कहते हैं, बड़ा आदमी भेजो।"
वो फर्श पर बैठ गया। घुटने मोड़कर। सिर झुका। उसके कंधे हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं आ रही थी।
"तो तूने सोचा," मैंने कहा, "कि मेरी रिंच उठा ले, बेच दे, और कुछ दिन का सामान आ जाए।"
उसने सिर हिलाया। "मैंने पहले कभी नहीं चुराया, उस्ताद। मैं कसम खाता हूँ। मैंने सिर्फ़ सोचा—"
"क्यों मुझसे नहीं माँगा?"
वो रुक गया।
"क्यों नहीं कहा, टिंकू को काम चाहिए, टिंकू को पैसे चाहिए?"
"क्योंकि आपके पास भी नहीं हैं," उसने कहा, और ये उसने एक ऐसी आवाज़ में कहा जो मेरे सीने में लगी। "मैंने देखा है, उस्ताद। आप खुद दुकान का किराया नहीं दे पाए, कल। उस सफ़ेद कुर्ते वाले आदमी को। आपकी माँ की दवा महँगी है। आपकी बहन की किताबें हैं। मैंने सोचा — मैं कहूँगा, तो आप पर बोझ बनूँगा। आप मुझे निकाल देंगे।"
"निकाल दूँगा?" मैंने कहा। "मैंने तुझे कभी रखा ही कब था, जो निकालूँगा?"
वो चुप हो गया। उसने ऊपर देखा। मेरी आँखों में देखा।
"मैं आता था," उसने कहा, बहुत धीमे। "रोज़। आप कभी नहीं पूछते थे कि क्यों आता है। बस एक बार बोले थे, 'पानी भर दे।' फिर एक बार बोले थे, 'ये पेचकस पकड़।' मैंने सोचा, मैं यहीं हूँ। मैं काम पर हूँ।"
मुझे कुछ देर कुछ नहीं सूझा।
उसकी बात सच थी, और सच से बड़ा कोई आरोप नहीं होता। मैंने टिंकू को कभी काम पर नहीं रखा था। मैंने उसे बस आने दिया था। बस दुकान में बैठने दिया था। बस कभी नहीं पूछा कि वो कौन है, कहाँ से आता है, क्यों आता है।
और वो एक तेरह साल का लड़का था। छह महीने से घर पर झूठ बोल रहा था, गली-गली घूम रहा था, किसी तरह ज़िंदा रह रहा था।
मैं उसके सामने बैठ गया। फर्श पर। घुटने मोड़कर। मेरी जीन्स घुटनों पर पहले से फटी हुई थी, अब और फटी।
"टिंकू," मैंने कहा, "मुझे कुछ बात बतानी है।"
"हाँ, उस्ताद?"
"मैं चोर नहीं पकड़ता," मैंने कहा। "मैं मरम्मत करता हूँ।"
वो मुझे देखने लगा। उसकी आँखों में पानी, नाक बह रही थी, और मुँह खुला हुआ था — जैसे उसने कुछ ऐसा सुना हो जो उसकी समझ से बाहर हो।
"मैं ये रिंच लेकर आया था," मैंने कहा, और ज़मीन से रिंच उठाई। "तेरे लिए।"
"मेरे लिए?"
"अगर तुझे ज़रूरत है, तो बेचने के लिए नहीं — कमाने के लिए। मेरी दुकान पर। असली काम पर।"
वो बोला नहीं।
"सुबह आठ बजे आना," मैंने कहा। "शाम सात बजे तक। पंचर, चेन, ब्रेक, हवा — सब सीखेगा। महीने के आख़िर में पैसे मिलेंगे। बहुत नहीं, पर इतने कि तेरी माँ की दवा आ जाए। और हाँ—"
मैं रुका। मैंने उसकी आँखों में देखा।
"स्कूल," मैंने कहा। "शाम की पाठशाला। डॉक्टर इसरानी के अस्पताल के पीछे चलती है। सात बजे के बाद। मैं तेरा नाम लिखवा दूँगा। माँ को सच बताना पड़ेगा।"
उसने अपने हाथ से मुँह ढक लिया। कंधे और ज़्यादा हिलने लगे। वो रो पड़ा — पूरी तरह।
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"मैं—" वो फूट-फूटकर रो रहा था। "मैं डर गया था, उस्ताद। मैं रोज़ डरता था। रोज़ सोचता था, कल माँ पूछेगी, तो क्या बोलूँगा।"
"अब नहीं डरेगा," मैंने कहा। "क्योंकि अब झूठ नहीं है।"
वो उठा। आँखें पोंछीं। फिर उसने देखा — मेरी हथेली में रिंच थी।
"ले," मैंने कहा।
"ये— ये महँगी है, उस्ताद।"
"लेनी है या नहीं?"
उसने दोनों हाथों से रिंच पकड़ी। जैसे कोई पुरानी चीज़ पकड़ता है — संभालकर, धीरे, डर से।
"मैं इसे नहीं बेचूँगा," उसने कहा।
"बेचेगा तो नहीं," मैंने कहा। "पर अब गुस्सा मत आना, जब मैं तुझे रोज़ सुबह छह बजे उठाऊँगा।"
उसने हँसने की कोशिश की। रोने के बीच हँसी — वो अजीब सी आवाज़ निकली। फिर उसने रिंच को सीने से लगाया।
"उस्ताद," उसने कहा।
"हाँ।"
"आपने मुझे नहीं निकाला।"
"निकालता तो क्या करता?" मैंने कहा। "मेरे पास इतने औज़ार हैं कि सारी गली के लड़के रख लूँ। बस काम करने वाले चाहिए।"
उसने सिर हिलाया। फिर वो कमरे से बाहर गया, दुकान की तरफ़। मैं पीछे-पीछे आया।
जब हम बाहर आए, दुकान में एक आदमी खड़ा था।
उस्ताद अली बक्श।
वो चुपचाप खड़े थे। उनके हाथ में कोई औज़ार नहीं था। उन्होंने हम दोनों को देखा — पहले मुझे, फिर टिंकू को। टिंकू के हाथ में रिंच देखकर उनके चेहरे पर कुछ नहीं बदला।
वो काली साइकिल के पास गए। बिना कुछ कहे।
उन्होंने साइकिल के पहिये पर हाथ रखा। और धीरे से घुमाया।
पहिया घूमा। धीरे। बिना आवाज़। जैसे पानी में पत्थर फेंकने पर लहरें उठती हैं।
उस्ताद ने उसे घूमते देखा। फिर वो पलटे। मेरी आँखों में देखा।
"चेन?" उन्होंने पूछा।
"जुड़ गई," मैंने कहा।
"कैसे?"
"सच से," मैंने कहा। "गिरधारी ने बताया कि पंद्रह साल पहले पिता के बक्से से पैसे चुराए थे, पर वो पैसे मोहन की स्कूल फीस के लिए थे। शर्म के मारे कभी नहीं बता पाया। मोहन रोया। उसने कहा कि उसे पता था — पर उसने गुस्से में साइकिल यहीं छोड़ दी, ताकि भाई को तकलीफ़ हो।"
उस्ताद की आँखें भर आईं। उन्होंने पलक नहीं झपकी। फिर उन्होंने सिर हिलाया।
"पचास साल," उन्होंने कहा, बहुत धीरे। "मैंने पचास साल सोचा कि मेरे भाई ने मुझसे झूठ बोला था। आज तुझसे सुनकर लगा — शायद उसने भी कोई ऐसी ही बात छुपाई थी। शर्म के मारे।"
"उस्ताद—"
"मैं नहीं जानता," उन्होंने कहा। "अब जानूँगा कैसे? वो तो नहीं है।" उन्होंने साइकिल के पहिये को देखा। "पर ये साइकिल जानती है। ये चल पड़ेगी, तो शायद वो भी कहीं से आएगा।"
वो पलटे। मेरी तरफ़ देखा।
"तूने उसको काम पर रखा?" उन्होंने टिंकू की तरफ़ इशारा किया।
"हाँ।"
"अच्छा किया," उन्होंने कहा। "पर एक बात सुन ले। जब किसी का टूटा हुआ तू जोड़े, तो ये मत सोच कि तूने उसका उपकार किया। वो तुझे भी जोड़ता है। तेरे अंदर कोई चीज़ जो तेरे पापा के पास जाकर चुप हो गई है — वो भी उस लड़के के साथ थोड़ी नरम पड़ेगी।"
वो दरवाज़े की तरफ़ चले। फिर रुके। बिना पलटे।
"मैंने उस लड़के को पहले भी देखा है," उन्होंने कहा, टिंकू की तरफ़ इशारा करके। "पीछे की गली में। तेरी दुकान के औज़ार बेचने आया था, तीन महीने पहले। एक चश्मे वाले को। मैंने उसे रोका नहीं। मैंने सोचा, कोई तो हो जो इसे रोके। आज देख लिया। तूने रोका।"
वो चले गए।
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। डरा हुआ।
"उस्ताद, मैं— वो सच है। तीन महीने पहले मैंने एक पेचकस बेचा था। एक चश्मे वाले को। मुझे पैसे चाहिए थे, माँ को बुखार था—"
"टिंकू," मैंने कहा। "अब नहीं। अब कुछ नहीं। अब सिर्फ़ काम है। समझा?"
उसने सिर हिलाया। फिर रिंच को कमीज़ से निकालकर ट्रंक पर रख दिया। सीधी लकीर में। जैसे कोई बुज़ुर्ग अपना हिसाब रखता है।
वो अपनी माँ के बुलावे पर घर गया।
मैं अकेला रह गया। मेरी दुकान के बीच में वो काली साइकिल खड़ी थी, उसका पहिया धीरे-धीरे घूमता रहा — जैसे उस्ताद ने इतनी ज़ोर से घुमाया हो कि उसे रुकने का इंतज़ार हो।
मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली। मुट्ठी में बंद कर लिया। ठंडी थी। फिर गरम हुई।
बजी।
"पहला अंक," घंटी ने कहा। "दस।"
मैं चुप रहा।
"अब सोच," घंटी ने कहा। "इसे किस च
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