The Mysterious Bell503 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 503

7 min read November 5, 2026

वो दरवाज़े की तरफ़ चले। मैंने पीछे मुड़कर उन्हें जाते देखा।

उन्होंने दरवाज़े की चौखट पर हाथ रखा और रुक गए, बिना पलटे। उनकी पीठ सामने थी और उनकी आवाज़ अंदर आई।

"मेरे भाई का नाम इलियास था," उन्होंने कहा। "हम दोनों इसी कमरे में बैठते थे। उसने एक बात कही और मैंने उसे सच मान लिया, बिना पूछे कि वो सच थी या नहीं। फिर पचास साल बीत गए।"

उन्होंने दरवाज़ा खींचकर बंद किया।

और बंद होते-बंद होते, दरवाज़े के बाहर से, उनकी आवाज़ आई।

"अब इनके अंदर जो टूटा है, वो मैं नहीं जोड़ सकता।"

ताला बाहर से लगा। चाबी घूमी। कमरे की हवा अचानक और भारी हो गई, जैसे किसी ने खिड़की बंद कर दी हो।

मैं खड़ा था। मेरे दाहिने हाथ में चेन की टूटी कड़ी थी और बाएँ हाथ में मेरी जेब से निकली हुई पीतल की घंटी, जो आज अपने आप बजी। एक छोटी सी आवाज़। इतनी छोटी कि गिरधारी और मोहन ने सुनी भी या नहीं, पता नहीं।

"चेन जोड़नी है?" गिरधारी ने कहा। वो अभी भी साइकिल के पास खड़ा था और उसका पहिया उसके हाथ में था।

"चेन नहीं," मैंने कहा। मैंने उन दोनों की तरफ़ देखा। "पहले तुम दोनों।"

मोहन ने मुँह खोला, फिर बंद कर दिया। गिरधारी ने माथे पर हाथ फेरा। कमरे में सिर्फ़ बल्ब की गुनगुनाहट थी और बाहर से आती उस्ताद की मशीन की टिक-टिक, जो अब चल रही थी, धीरे-धीरे, जैसे कोई बुज़ुर्ग अपनी ही बात गुनगुना रहा हो।

मैंने देखा कि साइकिल के हैंडल पर एक खाली लकड़ी का ब्रैकेट है।

बिल्कुल वैसा ही, जैसा मेरी जंग लगी साइकिल के हैंडल पर है।

और मेरी मुट्ठी में पीतल की घंटी ठंडी हो गई।

॥

कमरे के अंदर हवा रुक गई थी। बाहर ताले की चाबी घूमी, उसकी आवाज़ दीवार से टकराकर लौटी और फिर सब चुप। सिर्फ़ ऊपर लटके बल्ब की गुनगुनाहट बची रह गई, जैसे कोई बूढ़ा आदमी अपने ही मन में कोई पुरानी बात दोहरा रहा हो।

मैं खड़ा था। दाहिने हाथ में चेन की कड़ी थी, बाएँ हाथ में घंटी। घंटी ठंडी थी, ऐसी ठंडी जैसे सुबह के चार बजे का लोहे का गेट।

गिरधारी अभी भी वहीँ खड़ा था। पहिया उसके हाथ में था और वो उसे ऐसे पकड़े हुए था जैसे अपनी छाती से कोई चीज़ अलग कर रहा हो। मोहन दो कदम पीछे था। उसके दोनों हाथ साइकिल की सीट पर टिके थे और उसकी उँगलियाँ धीरे-धीरे चमड़े को सहला रही थीं। पुराना चमड़ा। बाप का चमड़ा।

मैंने कुछ नहीं कहा। मुझे याद था कि आज काम सिर्फ़ सुनने का है। और उस्ताद ने पीछे जो कहा था, वो मेरे कान में बैठा था कि सच वो होता है जिसे कहते वक़्त हाथ काँपे। मैं देख रहा था कि इन दोनों के हाथ तो पहले से ही काँप रहे थे। जैसे ही मैंने बोलने के लिए मुँह खोला, मैंने उसे बंद कर लिया।

गिरधारी ने पहले साँस खींची। फिर वो बोला, बिना मेरी तरफ़ देखे।

"मैंने बक्से से पैसे निकाले थे।"

कमरे में जो सन्नाटा था, वो और गहरा हो गया।

"बाप के उस टिन के बक्से से," उसने आगे कहा। "जो उनके पलंग के नीचे रहता था। चार सौ बीस रुपये थे। भैंस बेचने के पैसे थे। बाप कहते थे कि ये बुढ़ापे के हैं, इन्हें कोई नहीं छुएगा।"

उसका हाथ जिसमें पहिया था, और ज़्यादा काँपने लगा। मोहन ने ऊपर देखा, पर गिरधारी ने नज़र नहीं मिलाई।

"मैंने तीन सौ दस निकाले। बाकी जगह पर ही रख दिए, बिल्कुल उसी कोने में, जैसे वो अपनी जगह से हिले ही न हों। मुझे लगा कि बाप को पता नहीं चलेगा। और जिस दिन चलेगा, उस दिन मैं कह दूँगा कि बक्सा खुला मिला।"

वो रुका। घुटनों को सीधा किया। मुझे लगा जैसे वो किसी भारी चीज़ को उतार रहा है, और उसे उतारते-उतारते उसकी कमर टूट रही है।

"वो पैसे," उसने कहा, "मैंने अपने लिए नहीं निकाले थे।"

मोहन की उँगलियाँ सीट पर रुक गईं।

"उस साल तेरी फीस बाकी थी," गिरधारी ने कहा। "स्कूल वाले सर ने मुझे गली में रोककर कहा था कि किताबें लौटा दो या पैसे दे दो, वरना मास्टर जी तेरा नाम काट देंगे। तू उस दिन घर आकर कह रहा था कि सबको नई किताब मिली है। तेरे पास फटी किताब थी और तू उसे छुपाने के लिए उस पर अख़बार चढ़ा रहा था।"

मेरा गला सूखने लगा।

"मैंने सोचा कि बाप से माँगूँगा तो वो कहेंगे कि पहले मेरी भैंस बिकेगी," गिरधारी ने कहा। "और सच यह भी है कि मुझमें पूछने की हिम्मत नहीं थी। मैं गया, बक्सा खोला, पैसे निकाले, स्कूल में फीस जमा कर दी, किताबें ले आया। तुझे कह दिया कि फीस कुछ महीने माफ़ हो गई है।"

अब उसने मोहन की तरफ़ देखा।

"और फिर मैं हर रात सोने से पहले सोचता रहा कि किस दिन ये बात खुलेगी। भाई, तेरे पास उस दिन अगर मैंने कह दिया होता कि मैंने बक्सा खोला है, तो तू मुझे एक-दो झापड़ मारता, दो दिन पानी भी न माँगता, फिर सब ठीक हो जाता। पर मैंने सोचा कि चोर कहलाने से अच्छा है चुप रह जाऊँ। और यही चुप्पी पंद्रह साल से मेरे साथ रह रही है। मैं जब भी तेरे सामने आया, मुझे ऐसा लगा कि तू मेरी आँखों में वो बक्सा देख रहा है।"

उसने रूमाल निकाला। फटा, धुला हुआ पुराना रूमाल। माथा पोंछा और उसे हाथ में मरोड़कर पकड़ लिया, जैसे किसी चीज़ को और ज़्यादा न कहने दे।

"शर्म आती है," उसने धीमे से कहा। "चार सौ बीस रुपये की चोरी की शर्म नहीं। इस बात की शर्म आती है कि जो अच्छा काम मैंने किया, उसे भी मैं चोरी की तरह छुपाकर करता रहा। और तू मुझे पंद्रह साल चोर समझता रहा।"

मोहन की आवाज़ आई, फटी हुई, जैसे किसी पुराने पेड़ की टहनी अचानक टूटे।

"मुझे पता था।"

गिरधारी का सिर ऊपर उठा।

"क्या?"

"मुझे पता था," मोहन ने कहा। वो सीट से हाथ हटाकर सीधा खड़ा हो गया। "फीस की रसीद तेरी कमीज़ की जेब से एक दिन निकल पड़ी थी। मैंने भी वो पढ़ी। ऊपर तेरा नाम, नीचे मेरा नाम। तूने माँ से कहा था कि स्कूल वालों ने छूट दे दी है। मैं तेरे पीछे खड़ा था, मैंने सुना था।"

कमरे में फिर चुप्पी आई।

"फिर तूने मुझसे कभी नहीं कहा," गिरधारी ने कहा। उसकी आवाज़ नरम थी, हैरान थी, किसी आरोप की तरह नहीं।

"कहता कैसे," मोहन ने कहा, और उसकी आवाज़ पहली बार चढ़ गई। "कहता तो तुझे पता चल जाता कि मैं जान गया हूँ। और मुझे यह सहना पड़ता कि मेरी पढ़ाई के पैसे तूने बक्से से चुराए थे। मैं खुद को सह नहीं पाता, भाई। मैं यही नहीं सह पाता कि मेरा भाई मेरे लिए चोर बना।"

वो थोड़ा झुका। उसकी साँस टूट रही थी।

"इसीलिए मैंने साइकिल यहाँ छोड़ी।"

मैंने देखा, गिरधारी की मुट्ठी में रूमाल ऐंठ गया।

"उस रात तूने साइकिल बंधक रखी," मोहन ने कहा, "और मैं जानता था कि तू कहाँ जा रहा है। मैं छत पर खड़ा था। जब तू साइकिल धकेलकर ले गया, मैं कुछ नहीं बोला। और अगले दिन, जब मेरे पास दो सौ पचास रुपये थे, गिरधारी, मैं बिजलीघर के मोड़ तक आया था। लाल रजिस्टर वाले उस आदमी की दुकान के सामने खड़ा था। पैसे जेब में थे और उसने मुझे अंदर आते देख भी लिया था।"

गिरधारी ने साँस रोक ली।

"और मैं लौट गया," मोहन ने कहा। "मैंने पैसे उसकी बीवी की दवा में लगा दिए और साइकिल को वहीं पड़ा रहने दिया। मैंने सोचा कि जब तक तू रोज़ सुबह उस नीले दरवाज़े के सामने से गुज़रेगा — और तू गुज़रता था, भाई, पंद्रह साल से रोज़ छह बजे, अपनी सब्ज़ी की ठेली लेकर, आँखें सामने — मैं चाहता था कि तुझे पता रहे कि उस दरवाज़े के पीछे बाप की साइकिल बंद है। मैं चाहता था कि तुझे रोज़ तकलीफ़ हो।"

उसने अपनी आवाज़ नीची कर ली, जैसे अब वो खुद को सुन नहीं पा रहा हो।

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