The Mysterious Bell31 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 31: jodne wala mistri hissa 004 ep31-40

177 min read November 5, 2026

दरवाज़ा खुला और वो अंदर आई।

पहले उसके पैर दिखे — घिसी हुई चप्पल, किनारे से फटी, और एड़ी पर धूल की पतली लकीर। फिर सफ़ेद दुपट्टा, जो कंधों पर ठीक से बैठा भी नहीं था, जैसे रास्ते में हवा ने उसे बार-बार खींचा हो। हाथ में छोटा सा बैग, जिसका ज़िप आधा खुला था और उसमें से एक किनारा किसी काग़ज़ का बाहर झाँक रहा था।

उसने दुकान में आकर एक बार चारों तरफ़ देखा। दीवार पर टँगे पुराने औज़ार, कोने में पड़ा पंचर वाला टब, मेज़ पर रखी छोटी फूल वाली घंटी, और मेरे हाथ में ग्रीस के निशान।

फिर वो बोली, "तुम शंकर के बेटे हो।"

यह सवाल नहीं था। यह पहचान थी।

"जी," मैंने कहा। "हूँ तो। कभी-कभी खुद भी सोचता हूँ कि हूँ या नहीं।"

वो नहीं हँसी।

मैंने स्टूल आगे खींच दिया। "बैठिए। चाय आपा की गुमटी से मँगवा लूँ? वो अभी पहला दीया जला रही हैं, पहली चाय का स्वाद ही अलग होता है।"

"नहीं।" उसने स्टूल पर बैठते हुए कहा। "बैठूँगी, पर चाय नहीं। मुझे ज़्यादा देर नहीं रुकना।"

"कहिए।"

उसने बैग को गोद में रखा और दोनों हाथ उस पर रख दिए, जैसे कोई चीज़ उड़ न जाए। फिर उसने सीधे मेरी आँखों में देखा।

"मेरा नाम रज्जो बाई है। मैं चंद्रेश सक्सेना के दफ़्तर में झाड़ू लगाती हूँ। सुबह छह बजे से रात नौ बजे तक। पंद्रह साल से।"

मेरी जेब में घंटी हल्की गरम हुई। मैंने उसे नहीं निकाला। पर मैंने महसूस किया।

"उनका दफ़्तर नए बाज़ार में है," रज्जो बाई ने कहा। "दूसरी मंज़िल। सीढ़ी चढ़ते ही बाईं तरफ़। कमरे में हमेशा काग़ज़ों का ढेर रहता है, इतना ढेर कि कभी-कभी मुझे झाड़ू लगाने की जगह नहीं मिलती। मैं काग़ज़ उठाकर एक तरफ़ रख देती हूँ, और वो कहते हैं — रज्जो, तू मेरे काग़ज़ की दुश्मन है।"

"और आप कहती होंगी — साहब, धूल के काग़ज़ से ज़्यादा बड़ी दुश्मन है।"

इस बार भी वो नहीं हँसी। उसने सिर्फ़ अपने बैग की ज़िप को बंद किया, फिर खोला, फिर बंद किया।

"एक रात की बात है," वो बोली, और उसकी आवाज़ पतली हो गई। "मुझे देर हो गई थी। बारिश आ रही थी। मैंने सोचा, ऊपर के कमरे में आख़िरी बार झाड़ू लगा दूँ, फिर घर। मैं सीढ़ी पर चढ़ी तो देखा कि दफ़्तर का दरवाज़ा पूरा खुला है और अंदर बत्ती जल रही है।"

उसने रुककर साँस ली।

"दो आदमी बैठे थे। एक साहब — चंद्रेश। सफ़ेद कुर्ता, सामने काली फ़ाइल। और दूसरे तुम्हारे पापा।"

मैंने कोई मज़ाक नहीं किया। इस बार मेरे अंदर का वो हिस्सा भी चुप हो गया जो हर बात में हँसी ढूँढता है।

"मैं दरवाज़े के बाहर ही रुक गई," रज्जो बाई ने कहा। "झाड़ू हाथ में थी। मैं अंदर नहीं गई। मैंने सोचा, साहब बात कर रहे हैं, बाद में आ जाऊँगी। पर फिर मैंने तुम्हारे पापा का हाथ देखा।"

वो चुप हो गई।

"कैसा हाथ?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ भी अब पतली थी।

"काँप रहा था।" उसने अपना हाथ उठाकर दिखाया। "ऐसे। जैसे बुखार में हो। वो काग़ज़ पर हाथ नहीं रख पा रहे थे। काग़ज़ सामने था, और उनका हाथ उस पर जाता था, फिर लौट आता था, फिर जाता था।"

मेरा गला सूख गया। "और चंद्रेश?"

"वो मुस्कुरा रहे थे।" रज्जो बाई ने कहा, और उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जैसे वो अब भी उस मुस्कान को देख रही हो। "बहुत प्यार से बोले — बेटा, अंगूठा लगाओ। इलाज का इंतज़ार मत करो। औरत का इलाज रुकता नहीं, औरत का इलाज पैसे माँगता है। जब तक तुम सोचोगे, दवा महँगी हो जाएगी।"

मेरे हाथ मेज़ पर रखे थे। मैंने उन्हें नीचे कर लिया, क्योंकि वो काँप रहे थे।

"फिर?" मैंने कहा।

"फिर तुम्हारे पापा ने कुछ कहा।" रज्जो बाई ने आँखें नीची कर लीं। "बहुत धीमे। मैं सब नहीं सुना, पर एक बात सुन ली। उन्होंने कहा — मेरा बेटा…"

वो रुकी।

"मेरा बेटा क्या कहेगा," रज्जो बाई ने कहा। "बस इतना। और चंद्रेश हँसे और बोले — बेटे को क्या बताना? बेटे बड़े होकर अपने बाप का सच नहीं ढूँढते। उन्हें बस यह दिखता है कि बाप ने क्या दिया। तुम उसे दुकान दे देना। बाकी वो भूल जाएगा।"

उस कमरे में हवा थी। दुकान के बाहर शाम थी, शबनम आपा की गुमटी से चाय की भाप उठ रही थी, बच्चे पीपल के नीचे कुछ खेल रहे थे। पर मुझे उस वक़्त लगा कि सब कुछ बहुत दूर है। जैसे मैं दुकान में नहीं, उस दूसरी मंज़िल के दरवाज़े के बाहर खड़ा हूँ, और अंदर मेरे पापा का हाथ काँप रहा है।

"अंगूठा किसने लगाया?" मैंने पूछा।

रज्जो बाई ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो डर था जो इंसान के चेहरे पर तब आता है जब वो कोई बात पहली बार ज़ोर से बोल रहा हो।

"तुम्हारे पापा नहीं लगा पाए," उसने कहा। "उनका हाथ इतना काँप रहा था कि स्याही की डिब्बी उनके हाथ से छूट गई और फ़र्श पर लाल दाग़ बन गया। मैंने वो दाग़ सुबह रगड़-रगड़कर साफ़ किया था।"

वो रुकी।

"फिर चंद्रेश ने खुद उनकी कलाई पकड़ी," रज्जो बाई ने कहा। "और उनका अंगूठा दबाकर काग़ज़ पर लगा दिया। दो बार। पहली बार ठीक से नहीं लगा, तो दोबारा। और मुस्कुराते रहे।"

दुकान में बहुत देर तक कोई आवाज़ नहीं हुई।

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी गरम थी। मैंने उसे बाहर निकाला, हथेली पर रखा। और घंटी ने कहा, बहुत धीमे, बहुत छोटा —

"गवाह डरी हुई है।"

मैंने रज्जो बाई की तरफ़ देखा। उसके होंठ हिल रहे थे, जैसे वो कुछ और कहना चाहती हो और शब्द जुड़ नहीं रहे हों।

"और?" मैंने घंटी से पूछा।

"सच अधूरा है," घंटी ने कहा। "आधा बोला, आधा पी लिया।"

मैंने घंटी जेब में रख दी और कुर्सी खींचकर उसके सामने बैठ गया, इतना करीब कि मेरे घुटने उसके घुटनों तक पहुँचें।

"रज्जो बाई," मैंने कहा। "एक बात बताइए। जो अब तक छुपाया है, वो क्या है? क्योंकि मैं आपसे झूठ नहीं बोलूँगा — मुझे इस सच की ज़रूरत है। और आपको भी लग रहा है, तभी इस वक़्त तक आप यहाँ तक आई हैं।"

वो एकदम रो पड़ी।

बिना आवाज़ के, बिना कंधे हिलाए। बस आँखों से पानी गिरता रहा और वो उसे पोंछने की कोशिश भी नहीं कर रही थी।

"उस कमरे में एक तीसरा आदमी भी था," उसने कहा।

मेरी रीढ़ ठंडी हो गई।

"कोने में बैठा था। अंधेरे में। मैंने उसका चेहरा नहीं देखा। सिर्फ़ उसके जूते देखे — चमकते हुए, बहुत साफ़। और उसके हाथ में एक काग़ज़ था, जिस पर नीचे कोई लाल निशान था।"

मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। लाल निशान। बच्चे भी कह चुके थे — सफ़ेद गाड़ी में बैठे आदमी के हाथ में लाल निशान वाला काग़ज़।

"उसने क्या कहा?" मैंने पूछा।

"बस एक बात।" रज्जो बाई ने आँखें पोंछीं। "उसने कहा — घंटी का क्या? और चंद्रेश ने जवाब दिया — घंटी बाद में। पहले अंगूठा।"

मेरे अंदर कुछ ऐसा हिला जो मैंने पहले महसूस नहीं किया था। दुकान से पीछे वाले कमरे में, लोहे की अलमारी के ऊपर, एक पुरानी चीज़ रखी थी — उस्ताद की छोटी फूल वाली घंटी। और मेरे गले में पापा की दी हुई पुरानी चाबी थी। इतने सालों तक मुझे यही पता नहीं था कि घंटी क्या है, और उस रात पंद्रह साल पहले ये लोग घंटी के बारे में बात कर रहे थे।

"रज्जो बाई," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में मज़ाक का एक किनारा अपने आप आ गया, क्योंकि मैं डर में हँसी ढूँढ लेता हूँ, यही मेरी बीमारी है, "आप झाड़ू वाली हैं न? तो फिर इस शहर के काग़ज़ भी ज़रा साफ़ कर दीजिए। बहुत धूल जमी है इन पर।"

मुझे लगा वो हँसेगी। मुझे लगा वो कहेगी — चल हट, बड़ी मज़ाक आ रही है।

पर वो नहीं हँसी।

उसकी आँखें फिर भर आईं, और इस बार उसने अपना दुपट्टा उठाकर चेहरा छिपा लिया। बहुत देर तक उसने चेहरा नहीं दिखाया। और मुझे समझ आ गया कि मैंने क्या कह दिया।

शहर में जब कोई बात दबानी होती है, तो लोग यही कहते हैं — काग़ज़ साफ़ कर दो। मतलब, मिटा दो। और मैंने उसी ज़ुबान में मज़ाक कर दिया था। वो औरत पंद्रह साल से लोगों के दफ़्तरों में झाड़ू लगा रही थी, और उसके सामने ही एक काग़ज़ पर कोई औरत का इलाज बन रहा था।

मैंने हाथ जोड़े।

"माफ़ कर दीजिए, बाई।" मेरी आवाज़ सीधी थी, कोई मज़ाक नहीं। "ये ज़ुबान दिमाग़ से पहले दौड़ जाती है। मैं ऐसा नहीं कहता, पर कह गया।"

उसने दुपट्टा नीचे किया। आँखें लाल थीं, पर उसने सिर हिलाया। "बड़े बेटे वाली बात है। तुम्हारे पापा की याद दिला दी।"

"अब पूरी बात कहिए," मैंने कहा। "कमरे में तीसरा आदमी था, वो चला गया। और फिर?"

"फिर मैं सीढ़ी से नीचे उतर गई," वो बोली। "झाड़ू सीढ़ी पर छोड़ गई। अगली सुबह जब साहब आए, तो मुझे कहा — रज्जो, आज से तू दूसरी मंज़िल नहीं चढ़ेगी। नीचे के कमरे ही झाड़ना। और उस दिन के बाद चंद्रेश ने मुझसे सीधे आँख मिलाकर बात नहीं की।"

"पर आपने नौकरी नहीं छोड़ी।"

"क्या करती?" उसने कहा। "मेरा बेटा है। इसी शहर में मज़दूरी करता है।"

वो खामोश हुई, फिर खुद ही बोली, "शाहिद। उन्नीस साल का। भारद्वाज की साइट पर सीमेंट ढोता है। सुबह छह बजे से शाम सात बजे तक। हाथ फटे पड़े हैं और उसकी कमीज़ पर अब कभी साबुन की गंध नहीं आती, बस सीमेंट की।"

मैं समझ गया कि बात कहाँ जा रही है। और मेरा पेट भारी हो गया, जैसे कोई पत्थर अंदर रख दिया हो।

"तीन दिन पहले बबलू पांडे साइट पर आया," रज्जो बाई ने कहा। "पान चबाकर। बड़ी चमकदार चेन गले में। उसने शाहिद का कंधा थपथपाया और कहा — सुन, तेरी माँ कोई सभा में जाकर बोलने न जाए। साइट पर हादसे होते रहते हैं। बोरे गिरते हैं, बल्ली फिसलती है।" वो रुकी। "और फिर हँसकर बोला — तेरी माँ की ज़ुबान लंबी है ना? तो काट देंगे।"

"शाहिद ने क्या कहा?"

"कुछ नहीं।" रज्जो बाई ने आँखें बंद कर लीं। "वो रात को घर आया, खाना नहीं खाया, और बस मेरे पैरों पर सिर रखकर रोया। फिर बोला — माँ, तू कुछ न बोलना। हमारे पास कुछ नहीं है, माँ। हम मुकदमा नहीं कर सकते।"

दुकान के बाहर पीपल की छाया और लंबी हो गई। कहीं दूर एक टेम्पो गुज़रा, उसकी आवाज़ आकर फिर लुप्त हो गई। और मैंने अपने अंदर उठती हुई एक गर्म चीज़ महसूस की, जो गुस्से जैसी थी पर गुस्सा नहीं थी — कुछ और थी, जिसका नाम मैं नहीं जानता।

"रज्जो बाई," मैंने कहा। "आप गवाही देंगी?"

उसने देर तक मेरी तरफ़ देखा। फिर धीमे से कहा, "मैं पंद्रह साल से उस आदमी के काग़ज़ झाड़ती हूँ। मैंने उसे कभी गुस्से में नहीं देखा। वो हर किसी को बेटा कहता है। और मेरे शाहिद को भी एक बार बेटा कहा था, जिस दिन वो दफ़्तर में नौकरी माँगने गया था। उस दिन मेरा बेटा खुश होकर लौटा था।" उसकी आवाज़ काँपी। "और आज मैं यहाँ बैठी हूँ यह सोचने के लिए कि उस एक बेटे ने मेरे बेटे का क्या कर दिया।"

फिर उसने सीधा जवाब दिया, जैसे कोई औरत बाज़ार में भाव पक्का करती है।

"मैं गवाही दूँगी। पर पहले मुझे यह जानना है कि मेरा बेटा सुरक्षित रहेगा। तुम मुझे यह भरोसा दो, तो मैं कल सभा में अपना नाम बोल दूँगी। यह भरोसा नहीं दिया, तो मैं चुप रहूँगी।" उसने मेरी आँखों में देखा। "मैं कायर नहीं हूँ। पर माँ हूँ।"

उसकी बात मुझे चुभी।

क्योंकि मैं उसे भरोसा दे नहीं सकता था। मैं सोलह साल का लड़का नहीं था कि कह दूँ — चिंता मत करो, सब ठीक हो जाएगा। मेरे पास कुछ नहीं था। एक दुकान, एक घंटी, कुछ टूटे हुए रिश्ते, और एक गली जो अभी खुद ही ठीक हो रही थी, कमज़ोर पैरों से।

मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली। उसे हथेली पर रखा।

"बता," मैंने धीमे से कहा। "यह गवाह सच बोलेगी या नहीं?"

घंटी ठंडी हो रही थी। मैंने महसूस किया, जैसे उसके अंदर कोई दीया बुझ रहा हो।

"गवाह डरी हुई है," उसने कहा। "सच अधूरा है। एक डोर अभी जुड़ी हुई है जो उसके गले में है। यह गवाह तभी बोलेगी जब उसके बेटे का डर पहले किसी और के कंधे पर रख दिया जाएगा। अंक, सच का वज़न अकेले उठाने से औरत टूट जाती है।"

"तो क्या करूँ?"

"अभी कुछ नहीं।" घंटी की आवाज़ और धीमी हो गई। "अभी तेरे पास और भी कोई आ रहा है। और वो तेरे हाथ में नहीं है।"

"कौन?"

पर घंटी चुप हो गई। बिल्कुल चुप।

मैंने उसे दोबारा हिलाया। "अरे, कम से कम बता तो दे कि क्या…"

और तभी घर की तरफ़ से काजल की आवाज़ आई।

वो आवाज़ ऐसी थी जो मैंने पहले कभी नहीं सुनी थी। मेरी बहन दिन में सौ बार चिल्लाती है — "अंकुश, तेरा टिफ़िन फिर बासी पड़ा है," "अंकुश, मेरी किताब पर ग्रीस मत लगा," "अंकुश, ज़रा अपनी सफ़ाई का तो ख़याल कर।" वो चिल्लाना घर की आवाज़ है, जैसे कोई गाना चल रहा हो।

पर यह आवाज़ वैसी नहीं थी।

"अंकुश! अंकुश, जल्दी आ!"

मैं उठ खड़ा हुआ। स्टूल पीछे गिरा, मैंने उसे सँभाला भी नहीं।

"अंकुश!" काजल फिर चिल्लाई और इस बार उसकी आवाज़ फट गई। "माँ के होंठ नीले पड़ रहे हैं! साँस फूल रही है! अंकुश!"

रज्जो बाई भी उठ खड़ी हुई। उसने अपना बैग गोद में दबा लिया और उसका चेहरा एक झटके में सफ़ेद पड़ गया। "जाओ," वो बोली। "जाओ, बेटा।"

मैं दौड़ा।

दुकान से निकलते वक़्त मेरा कंधा दरवाज़े के छज्जे से टकराया, और मैंने दर्द नहीं महसूस किया। गली में शाम उतर चुकी थी। शबनम आपा की गुमटी से धुआँ उठ रहा था और पीपल की छाया नीली पड़ गई थी। बच्चे कुछ बोलने लगे, पर मैंने सुना नहीं। मेरी चप्पल फिसली, पैर नंगा हो गया, मैंने पीछे जाकर चप्पल पहनी भी नहीं, बस दौड़ता रहा।

और दौड़ते-दौड़ते मुझे महसूस हुआ कि जेब में घंटी ठंडी है।

ठंडी।

इतनी ठंडी जैसे उसे किसी बर्फ़ के पानी में रख दिया गया हो। कुछ दिन पहले भी एक बार ऐसा हुआ था — जब मैंने गिरधारी के सामने झूठ बोला था और घंटी ठंडी हो गई थी। पर आज मैंने कोई झूठ नहीं बोला। आज मैंने किसी चीज़ की कोशिश भी नहीं की।

मैंने दौड़ते-दौड़ते जेब में हाथ डाला और घंटी को हथेली में दबा दिया।

"क्यों ठंडी है?" मैंने पूछा। मेरी साँस उखड़ी हुई थी। "क्या हो रहा है? बोल!"

घंटी ने कहा, बहुत दूर से, बहुत धीमे, जैसे किसी गली के दूसरे सिरे से कोई बोल रहा हो —

"आज जोड़ नहीं। आज सिर्फ़ दौड़।"

घर का दरवाज़ा खुला था। मैं सीधे अंदर गया।

माँ रसोई और बैठक के बीच के फ़र्श पर बैठी थीं, चूल्हे के पास, एक हाथ ज़मीन पर और दूसरा सीने पर। साड़ी का पल्लू कमर से खुल गया था और फ़र्श पर फैला हुआ था। उनके होंठ नीले थे। सच में नीले। और उनकी साँस ऐसी आवाज़ कर रही थी जैसे कोई पुराना पंप चल रहा हो।

काजल उनके पीछे घुटनों के बल बैठी थी। उसने माँ का सिर अपनी जाँघ पर रखा था और उनके माथे पर पानी का गीला कपड़ा रख रही थी। उसका चेहरा लाल था, आँखें सूजी हुई थीं, और उसकी नर्सिंग की किताबें बैग से आधी निकली पड़ी थीं, जैसे उसने बैग उठाया और गिरा दिया हो।

पापा कोने में खड़े थे। हाथ में स्टील का गिलास, जिससे पानी फ़र्श पर टपक रहा था। उनकी आँखें बहुत बड़ी हो गई थीं और वो हिल नहीं रहे थे, जैसे कोई उन्हें जड़ से पकड़कर खड़ा कर दे। मैंने अपने पापा को पहले कभी ऐसा नहीं देखा था।

"माँ," मैंने कहा और उनके पास घुटने टेक दिए। "माँ, देखो, मैं आ गया।"

उन्होंने आँखें खोलीं। उनकी आँखें कुछ पहचान नहीं रही थीं।

"अंकुश?" उनकी आवाज़ गले से नहीं, कहीं और से आ रही थी।

"हाँ माँ, मैं हूँ।"

"तूने खाना खाया?" उन्होंने पूछा।

और मैं वहीं टूट गया। इस हालत में भी उन्हें यही याद था।

"खाया माँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ काँप गई। "खाया। तुम ठीक हो जाओ, फिर दो प्लेट खाऊँगा।"

काजल ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो नर्स थी जो अभी पढ़ रही है, पर उसके हाथ ठीक से काम कर रहे थे — उसने माँ की नाड़ी पकड़ी, घड़ी नहीं थी तो अपनी उँगली से गिनी, फिर मेरी तरफ़ देखकर कहा, "धड़कन तेज़ है और बहुत पतली। यह सिर्फ़ खाँसी नहीं है, अंकुश। यह वही है जिसके बारे में डॉक्टर इसरानी ने कहा था — इलाज रुका तो…"

वो पूरी बात नहीं बोली। बोलने की ज़रूरत नहीं थी।

मैंने माँ के पैरों की तरफ़ देखा। उनके पैर ठंडे थे। बहुत ठंडे। मैंने उन्हें अपनी हथेलियों में लिया।

"पापा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ एकदम साफ़ निकली, जैसी मुझे नहीं आती थी। "गाड़ी। गली के मुहाने से कोई टेम्पो पकड़िए। रास्ते में मिले तो। अभी।"

पापा ने गिलास मेज़ पर रखा। उनके हाथ काँप रहे थे, पर उन्होंने गिलास ठीक से रखा, यह देखकर मुझे किसी चीज़ का भरोसा आया।

"मैं जा रहा हूँ," उन्होंने कहा। यही दो शब्द। और फिर वो दौड़े — पचपन साल की झुकी कमर लेकर दौड़े।

तभी दरवाज़े पर छाया पड़ी।

रज्जो बाई खड़ी थी। उसने हमारे पीछे-पीछे दौड़कर आना चाहिए था, पर वो साँस नहीं फूलने दे रही थी। उसने बैग ज़मीन पर रख दिया और घुटनों के बल मेरे पास बैठ गई। उसने माँ का सिर बड़ी नरमी से अपनी गोद में लिया, जैसे कोई पुरानी आदत हो। "बहन," वो बोली, "बहन, आँख खोलो। मैं रज्जो हूँ। तुम्हारे घर आई हूँ।"

माँ ने उसे देखा। शायद पहचाना नहीं, पर उनकी साँस की आवाज़ थोड़ी कम हुई।

मैंने रज्जो बाई की तरफ़ देखा। उस औरत ने अभी-अभी मुझे बताया था कि उसका बेटा साइट पर सीमेंट ढोता है और उसके हाथ फटे हैं, और अब वो मेरी माँ का सिर अपनी गोद में लेकर बैठी थी, और उसकी आँखों में कोई हिसाब नहीं था, कोई शर्त नहीं थी।

काजल उठी। उसने अपना बैग उठाया, उसकी ज़िप लगाई, और फिर उसने मेरी तरफ़ ऐसा देखा जैसे वो मुझसे बड़ी हो, बहुत बड़ी हो।

वो दरवाज़े के पास गई और वहीं खड़ी हो गई। उसके हाथ में बैग था, उसके पैरों में चप्पल थी, और उसकी आँखों में वो सूखापन था जो रोने के बाद आता है।

उसने कहा, "अंकुश, अब अस्पताल नहीं गए तो कभी नहीं जाएँगे।"

और मैंने अपनी माँ को गोद में उठाया।

॥

मैंने माँ को गोद में उठाया तो पता चला कि वो कितनी हल्की हो गई हैं। जैसे कोई बच्चा उठा लिया हो। मेरी छाती से उनका सिर टिका था और उनकी साँस मेरी गर्दन पर लग रही थी — गरम, तेज़, जैसे कोई छोटी सी गाड़ी ऊपर चढ़ाई चढ़ रही हो।

काजल आगे बढ़ी और दरवाज़ा खोल दिया। बाहर गली में शाम की रोशनी पीली पड़ रही थी। पीपल के पत्ते हिल रहे थे और उनकी आवाज़ आ रही थी जैसे कोई दूर से काग़ज़ फाड़ रहा हो।

रज्जो बाई ने मेरी कुहनी पकड़ी। "धीरे, बेटा। सीढ़ी है। पैर संभाल।"

मैंने माँ को कसकर पकड़ा और सीढ़ी उतरा। गली में जो भी था, सब रुक गया। शबनम आपा ने चिमटी छोड़ दी और गुमटी से बाहर निकल आईं। टिंकू दौड़कर आया और मेरे पैरों के आगे खड़ा हो गया, जैसे वो रास्ता साफ़ कर रहा हो।

"उस्ताद," वो बोला, "उस्ताद, बूढ़े काका की साइकिल ले लूँ? उसमें बड़ी सीट है।"

"नहीं," मैंने कहा। "पापा टेम्पो लेने गए हैं। तू पीपल तक दौड़ और देख कि वो आ रहे हैं या नहीं।"

टिंकू उसी पल भागा। उसके घुटने पर पट्टी थी और वो फिर भी हवा से बात करता हुआ भागा — मुझे आज तक समझ नहीं आया कि उसमें इतनी ताक़त कहाँ से आती है।

पीपल के नीचे चबूतरी पर जो बुज़ुर्ग बैठे थे, वो सब उठ खड़े हुए। बंसी बाबा ने अपनी लाठी टिकाकर खड़े होने की कोशिश की और रहमत बाबा ने उन्हें संभाला। दोनों अब साथ बैठते हैं, ये मैंने कुछ दिन पहले ही देखा था। ऐसे लगता है जैसे पचास साल की चुप्पी के बाद उनके पास बोलने के लिए इतना कुछ है कि वो चुप नहीं हो पाते।

"सुशीला?" बंसी बाबा ने कहा। "ये सुशीला है?"

"हाँ बाबा," काजल ने कहा। "हम अस्पताल ले जा रहे हैं।"

"जाओ, जाओ," उन्होंने हाथ उठाया। "और बेटा, सुन —" उनकी आवाज़ भारी हो गई, "अस्पताल में जो दीवार पीली है न, उसके नीचे एक बार मैं भी बैठा था। वहाँ से कोई खाली हाथ नहीं जाता। जा।"

मुझे उनकी बात समझ नहीं आई, पर मैंने सिर हिला दिया। माँ का वज़न मेरी बाँहों में बढ़ता जा रहा था और मेरी पीठ पर पसीना आ गया था।

गली के मुहाने पर टेम्पो आया। पापा ने खिड़की से हाथ निकालकर इशारा किया। उनकी झुकी कमर आज भी झुकी थी, पर उनकी आवाज़ अंदर से कुछ और कह रही थी।

"लाओ," उन्होंने कहा और दरवाज़ा खोल दिया। "धीरे। धीरे से।"

मैंने माँ को टेम्पो में बिठाया। काजल उनके साथ बैठी और माँ का सिर अपने कंधे पर रख लिया। रज्जो बाई पीछे की तरफ़ चढ़ीं और मैंने उन्हें रोका — "आप घर पर रहिए, रज्जो बाई। काजल है ना।"

"बेटा," उन्होंने कहा और मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैंने कुछ बहुत बड़ी ग़लती कर दी हो, "मैं चंद्रेश के दफ़्तार में झाड़ू लगाती हूँ, माँ-बेटी का हिसाब नहीं जानती। पर आज मेरी बहन इस हाल में है और तू मुझे घर भेज रहा है? मैं चलूँगी। चुपचाप बैठूँगी।"

मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने दरवाज़ा बंद किया और मैं खुद आगे बैठ गया।

टेम्पो चला। गली पीछे छूटने लगी। पीपल का पेड़, दुकान का टेढ़ा बोर्ड, शबनम आपा की गुमटी — सब पीछे। पापा ने पीछे मुड़कर माँ को देखा और मैंने उनकी आँखों में वो डर देखा जो वो पंद्रह साल से छुपा रहे थे।

"पापा," मैंने धीरे कहा।

"हाँ।"

"आप ठीक हैं?"

उन्होंने कुछ देर सोचा। फिर बोले, "नहीं।"

बस इतना। दो अक्षर। पर मेरे लिए वो दो अक्षर पंद्रह साल की चुप्पी से भारी थे।

नूर अस्पताल आया तो टेम्पो रुका। पीली दीवारें, ऊपर की मंज़िल की दो खिड़कियों में काँच नहीं थे और उनमें अख़बार की परत चिपकी थी। दरवाज़े पर लोहे का बोर्ड है जिस पर नीले रंग से लिखा है — नूर अस्पताल और उसके नीचे नाम डॉक्टर निहाल इसरानी। बोर्ड का कोना ज़ंग खा गया है।

अंदर जाते ही एक गंध आई। पुरानी दवा की गंध। स्पिरिट, फिनाइल, और उसके ऊपर कुछ मीठा सा — जैसे दादी की अलमारी खोलने पर आती है। मेरी माँ ने ये गंध सूँघी और उनके चेहरे पर एक पल के लिए कुछ उभरा। वो यह जगह पहचानती हैं। पिछले कई महीनों से पहचानती हैं।

काउंटर पर एक लड़का बैठा था जो मुझे पहचानता था। उसने नाम पूछा भी नहीं। उसने बस इशारा किया — "पहली मंज़िल, दूसरा कमरा। डॉक्टर साहब हैं।"

सीढ़ी चढ़ते वक़्त मेरी साँस फूलने लगी थी। काजल आगे-आगे चल रही थी। उसने पीछे मुड़कर देखा और कहा, "जल्दी करो।"

हम कमरे में घुसे। डॉक्टर इसरानी कुर्सी पर बैठे थे और किसी पुराने अख़बार पर कुछ लिख रहे थे। उनके सामने काग़ज़ों का ढेर था, आधा पानी का गिलास, और एक टूटा चश्मा जिसका एक काँच अलग पड़ा था। दीवार पर एक तस्वीर टँगी थी — एक औरत, जिसकी आँखें हँस रही थीं और तस्वीर पर कोई तारीख़ नहीं लिखी थी।

वो उठे। साठ के पार, सफ़ेद बाल, हल्की दाढ़ी, और उनके गले में एक पुराना स्टेथोस्कोप लटक रहा था जिसकी रबर की नली पर टेप लिपटा हुआ था — जैसे कोई घाव है जिसे बार-बार साफ़ करना पड़ता है।

"बेड पर लाओ," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी, और उसमें वो संगीत था जो बहुत बूढ़े लोगों की आवाज़ में आ जाता है, जैसे वो हर शब्द को ज़ुबान पर तोलकर निकालते हैं।

मैंने माँ को बेड पर लिटाया। काजल ने तकिया ठीक किया। डॉक्टर माँ के पास गए, स्टेथोस्कोप के ईयरपीस लगाए और माँ की पीठ पर धीरे से हाथ रखकर कहा, "गहरी साँस लो, बहन।"

माँ ने साँस लेने की कोशिश की और खाँस पड़ीं। खाँसी अंदर से आ रही थी — गहरी, गली में पड़ी मिट्टी जैसी।

डॉक्टर ने आँखें बंद करके सुना। फिर उन्होंने दूसरी तरफ़ सुना। उनका चेहरा नहीं बदला, पर उनकी उँगलियाँ धीमी हो गईं। यही सबसे बुरा संकेत होता है — जब डॉक्टर का चेहरा नहीं बदलता और उसके हाथ धीमे हो जाते हैं।

उन्होंने स्टेथोस्कोप उतारा और गले में लटका दिया। फिर उन्होंने किनारे पर रखी कुर्सी खींची और उस पर बैठ गए। सीधे मेरी तरफ़ देखा।

"अंकुश," उन्होंने कहा।

"सर।"

"क्या तुम ईमानदारी से जवाब दोगे?"

मेरी जेब में घंटी थी। वो ठंडी थी। मुझे लगा जैसे वो जानती है कि डॉक्टर क्या पूछेंगे।

"पूछिए, सर।"

"माँ को खाँसी कब से है?"

"करीब आठ महीने से।"

"बुखार?"

"तीन-चार दिन से।"

"रात में पसीना?"

"बहुत आता है," काजल ने कहा, और उसकी आवाज़ अचानक बच्चों जैसी हो गई। "डॉक्टर साहब, कमीज़ भीग जाती है और सुबह वो धोकर गोली पर सुखा देती हैं। मैंने कई बार देखा है और मैंने कुछ नहीं किया। मैं नर्सिंग पढ़ रही हूँ और मैंने अपनी माँ को नहीं देखा।"

कमरा चुप हो गया।

डॉक्टर इसरानी ने उसकी तरफ़ ऐसे देखा जैसे वो उसे पहचानते हों — न सिर्फ़ चेहरे से, बल्कि उस डर से जो उसके चेहरे पर था।

"काजल," उन्होंने कहा। "तुमने एक चीज़ की है जो बहुत कम लोग करते हैं। तुमने सच बोला। बैठो। मेरे पास एक कुर्सी और है।"

काजल नहीं बैठी। वो खड़ी रही।

डॉक्टर ने मेरी तरफ़ देखा। "अंकुश, तुम्हारी माँ की साँस नली में सूजन बढ़ गई है। खाँसी और बुखार दोनों ऊपर चढ़े हैं। ये वही बात है जिसके बारे में मैंने तीन महीने पहले कहा था — इलाज नहीं रुकना चाहिए।"

"तो रुका क्यों?" काजल ने पूछा, और उसकी आवाज़ तेज़ हो गई।

"काजल," पापा ने कहा, पहली बार।

"नहीं पापा," वो बोली। "मैंने पूछा है। हमने दवा रोक दी थी क्योंकि पैसे थे नहीं, या क्योंकि हमें डर था कि अस्पताल कब बंद हो जाएगा? दोनों है ना? और मैं हर रोज़ डॉक्टर साहब के सामने से गुज़रती हूँ, कॉपी लेकर, किताब लेकर, और मैंने कभी ठीक से नहीं पूछा। मैंने कभी नहीं पूछा कि अस्पताल कब तक चलेगा।"

उसकी आवाज़ भर आई थी। उसने मुँह फेर लिया।

डॉक्टर इसरानी ने कुछ देर सोचा। फिर उन्होंने अपनी जेब से एक काग़ज़ निकाला — मोड़ा हुआ, जिस पर उन्होंने पहले ही कुछ लिख रखा था।

"काजल," उन्होंने कहा। "मेरा स्टेथोस्कोप उठाओ।"

काजल ने पलक झपकाई। "सर?"

"उठाओ। डरो मत, वो टूटा नहीं है। टेप लगा है बस। आज से तुम मेरे साथ सुबह की गोली में आया करोगी। मैं तुम्हें अपने मरीज़ों की साँस सुनने दूँगा। नर्सिंग की किताबों में जो नहीं लिखा होता, वो यहाँ लिखा जाता है। और अंकुश —" वो मेरी तरफ़ मुड़े, "— तुम माँ को दो दिन के लिए हमारे पास छोड़ने की हिम्मत कर सकते हो?"

"सर, मैं —"

"मैंने पूछा, कर सकते हो?"

मैंने माँ की तरफ़ देखा। वो आँखें खोलकर मेरी तरफ़ देख रही थीं। उनके होंठ हिले।

"अंकुश," उन्होंने कहा। आवाज़ बहुत पतली थी, जैसे काग़ज़ के पीछे से आ रही हो। "मुझे अस्पताल का खाना नहीं चलेगा। घर का टिफ़िन चलेगा।"

मैं हँस पड़ा। मुझे नहीं पता ये हँसी कहाँ से आई। आँखें गीली थीं और हँसी आ रही थी।

"माँ," मैंने कहा, "पहले साँस ठीक, फिर दाल का हिसाब।"

"मेरे यहाँ दाल में पानी नहीं मिलता," उन्होंने कहा, और आँखें बंद कर लीं, "और बात में भी नहीं। घर का टिफ़िन। बस।"

डॉक्टर इसरानी हँसे। बहुत हल्का, बहुत छोटा। जैसे किसी पुरानी तस्वीर में कोई हिल गया हो।

"ठीक है बहन," उन्होंने कहा। "टिफ़िन घर से आएगा। पर खाना तीन बजे और रात आठ बजे। वक़्त पर। मेरे यहाँ वक़्त की मिर्ची तेज़ है।"

फिर वो मेरी तरफ़ मुड़े और उनकी आवाज़ बदल गई।

"अंकुश, दो दिन भर्ती रहना पड़ेगा। दवा बदलनी है। साँस की जाँच एक और करानी है। और —" उन्होंने काग़ज़ को मेज़ पर रख दिया, "— मुझे तुमसे एक बात कहनी है, इस कमरे में नहीं। बाद में। जब माँ सो जाए।"

काजल ने स्टेथोस्कोप उठा लिया था। वो उसे हाथ में लेकर उलट-पुलट रही थी, जैसे कोई नई चीज़ मिली हो। उसने गले में लटका लिया। वो सफ़ेद कोट डॉक्टर के बगल वाले हुक पर टँगा था, पुराना, घिसा, कहीं-कहीं से सिला हुआ।

डॉक्टर ने उसकी तरफ़ इशारा किया।

"पहन लो," उन्होंने कहा। "ये मेरी बीवी का था। मेरे साइज़ का नहीं हुआ करता था। तुम्हारे काम आएगा।"

काजल ने कोट पहना। और मैंने पहली बार देखा कि वो कितनी छोटी है और उतनी ही बड़ी भी। कोट उसके घुटनों तक आ गया। उसने एक बार अपने दोनों हाथ जेब में डाले, फिर निकाले, फिर सीधी खड़ी हो गई।

"पापा," उसने कहा, "आप बाहर बैठिए। मैं परची लिखवाती हूँ।"

फिर मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखें तेज़ हो गईं।

"और तू," वो बोली। "देर क्यों की? मैंने रज्जो बाई के आने से पहले ही कहा था कि माँ की हालत खराब है। मैंने दो घंटे पहले कहा था। तू गुमटी पर बैठा किस्से सुना रहा था।"

"काजल —"

"मुझे नहीं सुनना। तू पूरी गली को जोड़ता फिरता है, और अपने घर में तेरी माँ बेड पर पड़ी रहती है। तू उस्ताद का शागिर्द है, अंकुश। उस्ताद से पूछ, राज़ कब मिले थे और देर कब हुई थी।"

वो कमरे से निकल गई। उसके कदम तेज़ थे और कोट उसके पीछे लहरा रहा था।

मैं खड़ा रह गया। बेड के पास। माँ की आँखें बंद थीं और उनकी साँस धीमी हो रही थी।

डॉक्टर इसरानी ने मेरी तरफ़ देखा। "ग़ुस्सा है," उन्होंने कहा। "अच्छा है। ग़ुस्सा होना चाहिए। जो ग़ुस्सा नहीं करता, वो सच भी नहीं बोलता।"

मैंने कुछ नहीं कहा।

तभी मेरी नज़र दीवार पर गई।

बेड के ठीक ऊपर, पीली दीवार पर, एक बड़ा पोस्टर लगा था। प्लास्टिक की परत चढ़ी हुई, चमकदार। उस पर एक आदमी हाथ जोड़े खड़ा था, सफ़ेद कुर्ता, साफ़ कटा बाल, मुस्कान। नीचे मोटे अक्षरों में लिखा था — रणवीर भारद्वाज, समाजसेवी। और उसके नीचे एक और लाइन थी — नई शुरुआत, नए सपने।

"ये कब लगा?" मैंने पूछा।

डॉक्टर इसरानी ने देखा। "दो हफ़्ते पहले। भारद्वाज कंस्ट्रक्शन के आदमी आए थे। उन्होंने कहा, अस्पताल की मदद के लिए पोस्टर। मैंने मना नहीं किया।"

"आपने मना क्यों नहीं किया?"

वो कुछ देर चुप रहे। फिर बोले, "क्योंकि उसी दिन उन्होंने मुझे एक काग़ज़ दिखाया था जिसमें मेरे अस्पताल के लिए अलग जगह का ज़िक्र था। बड़ी इमारत। नई खिड़कियाँ। पहली मंज़िल पर मेरे लिए कमरा।"

"और आप मान गए?"

"मैंने कोई काग़ज़ नहीं ढीला छोड़ा," उन्होंने धीरे कहा। "पर मैंने मना भी नहीं किया। और यही मेरी ग़लती थी। मैं साठ पार कर चुका हूँ, अंकुश। मैं मरने से नहीं डरता। मैं इस डर से डरता हूँ कि जब मैं यहाँ नहीं रहूँगा, तो इस दरवाज़े पर ताला लगा होगा और इस मोहल्ले का कोई आदमी अपनी बीवी को लेकर कहीं और जाएगा। कहीं दूर। जहाँ वो उसका नाम भी नहीं जानते होंगे।"

मेरी जेब में घंटी हिली।

बहुत हल्की। बस एक बार। जैसे कोई उँगली उठाकर इशारा कर रहा हो।

मैंने उसे जेब से निकाला। वो ठंडी थी। और मुझे लगा जैसे मेरे कान के अंदर कोई फुसफुसाया है — बहुत दूर से, बहुत धीमा, पर शब्द साफ़।

इस दीवार के पीछे कोई टूटा भरोसा दबा है।

मैंने दीवार की तरफ़ देखा। पीली दीवार। पोस्टर के किनारे से एक दरार नीचे तक जाती थी, जिस पर प्लास्टिक की परत चढ़ गई थी। मैंने हाथ बढ़ाया और दीवार को छुआ।

घंटी फिर हिली। एक बार।

"क्या हुआ?" डॉक्टर ने पूछा।

"कुछ नहीं सर," मैंने कहा और हाथ नीचे कर लिया। "दीवार ठंडी है।"

वो मेरी तरफ़ देखते रहे। फिर बोले, "छह महीने पहले मेरी बीवी यहाँ नर्स थी। वो कहती थी, पीली दीवारें रखना, इसरानी। पीली दीवारें देखकर लोग डरते नहीं, बीमार होने से अच्छे होने की तरफ़ जाते हैं। उसकी बात सही थी। मैंने ये दीवारें आज तक नहीं बदलीं।"

उन्होंने दीवार पर टँगी तस्वीर की तरफ़ देखा और फिर अपने टूटे चश्मे की तरफ़।

उसी वक़्त गलियारे में पहियों की आवाज़ आई।

चरचर। चरचरर।

ऐसी आवाज़ जैसे कोई पुराना लोहा लकड़ी के फ़र्श पर रगड़ रहा हो। फिर एक आदमी की साँस — भारी, थकी, पर कोशिश में लगी हुई। और फिर एक जवान आवाज़।

"संभाल के, अब्बा। धीरे। ये टूटा हुआ पहिया है, अपने आप घूम जाता है।"

कमरे के दरवाज़े से एक कुर्सी अंदर आई।

पुरानी, लोहे की, कहीं-कहीं से ज़ंग लगी। उस पर एक बूढ़ा आदमी बैठा था — सफ़ेद टोपी, गमछा, और उसका एक हाथ कुर्सी की बाँह पर कसकर टिका था। उसके घुटने पर कोई चादर रखी थी जो सरक गई थी। उसकी आँखें बहुत थकी थीं।

कुर्सी को धकेल रहा था एक जवान लड़का। उन्नीस-बीस साल का होगा। पतला, कमर झुकी हुई, हाथों पर सीमेंट के सफ़ेद दाग़। उसका कोई एक पतलून का घुटना फटा हुआ था और वो चप्पल पहने था।

उसे देखते ही मैंने कुछ महसूस किया — वो एहसास जो गुमटी पर रज्जो बाई के चेहरे पर था।

"शाहिद," मैंने धीरे कहा।

लड़के ने मेरी तरफ़ देखा। पहले उसे पहचानने में वक़्त लगा। फिर उसके चेहरे पर एक हल्की सी हँसी आई, बहुत जल्दी मिटने वाली।

"अंकुश भाई," उसने कहा।

बूढ़े आदमी ने अपना सिर उठाया। "कौन है, शाहिद?"

"यही अंकुश भाई हैं, अब्बा। जिनकी दुकान पर मैंने एक बार ब्रेक का तार करवाया था। मैंने आपको बताया था।"

"अंकुश," बूढ़े आदमी ने कहा। उनकी आवाज़ काँप रही थी और उसमें कुछ ऐसा था जो मुझे समझ नहीं आया। "मेरा नाम यूसुफ़ है। मेरा बेटा तुम्हारे यहाँ ब्रेक करवाने आया था। उसने कहा था, दुकान वाला भला लड़का है। पैसे नहीं थे, कह दिया बाद में दूँगा, भला आदमी पहचान के तो संभाल लेता है।"

मेरी जेब में घंटी ठंडी हो गई।

मुझे याद आया। दो महीने पहले। एक लड़का ब्रेक का तार लाया था। दस रुपये थे। उसने कहा था, "पाँच रुपये हैं, पाँच महीने बाद दूँगा।" मैंने बिना देखे कर दिया था। उसका नाम तक नहीं पूछा था।

और अब वो अपने पापा को इस टूटे पहिये वाली कुर्सी पर मेरे सामने लेकर आया है।

मैंने शाहिद की तरफ़ देखा। वो मुझसे नज़र नहीं मिला रहा था। वो अपने पापा के कंधे पर हाथ रखकर खड़ा था, और वो इस तरह खड़ा था जैसे उसे कोई भार उठाना पड़ रहा हो।

"शाहिद," मैंने कहा, "अब्बा क्या —"

"कुर्सी," वो बोला। "अस्पताल आते वक़्त मुड़ जाता है। मैं रोक नहीं पाता। दो दिन से ठीक से घूम नहीं रही।"

डॉक्टर इसरानी ने आगे बढ़कर बूढ़े आदमी की तरफ़ देखा। उन्होंने कुर्सी की तरफ़ नहीं देखा, पहले यूसुफ़ मियाँ के चेहरे की तरफ़ देखा, और फिर उनका हाथ उनके कंधे पर रख दिया।

"यूसुफ़ मियाँ," उन्होंने कहा। "कम से कम दो हफ़्ते से आप नहीं आए।"

"काम पड़ा," बूढ़े आदमी ने कहा, और ये ऐसा झूठ था जो पूरे कमरे में सुनाई दे रहा था।

"और यह पहिया?" डॉक्टर ने कुर्सी की तरफ़ देखा। "मैंने कहा था, बदल देते हैं। दुकान पर मिल जाएगा। तीन सौ का होगा। मैं चार-पाँच रुपये महीने में आपसे ले लूँगा।"

बूढ़े आदमी ने नीचे देखा। शाहिद के कान लाल हो गए।

"डॉक्टर साहब," शाहिद ने धीरे कहा, "मैं सीमेंट ढोता हूँ साहब। चार दिन लगातार काम मिल जाए, तो तीन सौ का इंतज़ाम हो जाए। पर चार दिन बबलू साहब साइट पर नहीं आने देते।"

मैंने डॉक्टर की तरफ़ देखा। उनका चेहरा ग़ुस्से से नहीं, किसी और चीज़ से बदल रहा था। जैसे किसी ने उनके ही घर की दीवार पर कोई लिख दिया हो।

तभी बेड पर माँ ने करवट बदली। मैं दौड़कर उनके पास गया। उनकी आँखें आधी खुली थीं।

"अंकुश," उन्होंने कहा।

"हाँ माँ।"

"वो बूढ़ा आदमी रो रहा है क्या?"

मैंने पीछे देखा। यूसुफ़ मियाँ कुछ रो नहीं रहे थे। पर उनकी एक आँख के कोने में पानी का एक कतरा था, जो टोपी के नीचे छुप गया था।

"नहीं माँ," मैंने कहा।

"झूठ," माँ ने कहा, आँखें बंद करते हुए। "तू बचपन से यही झूठ बोलता है।"

कमरे का दरवाज़ा फिर खुला और काजल अंदर आई। उसके हाथ में परची थी, और उसके पीछे पापा थे।

"डॉक्टर साहब," काजल ने कहा, पूरी तरह व्यवसायिक आवाज़ में, "परची बन गई। नर्स से बात कर ली है। बेड तैयार है, एक बजे दोपहर की दवा शुरू हो जाएगी।"

फिर उसकी नज़र कुर्सी पर पड़ी और उसकी आवाज़ अटक गई।

"शाहिद भाई," वो बोली।

शाहिद ने सिर हिलाया। "बहन जी।"

काजल ने डॉक्टर की तरफ़ देखा, फिर कुर्सी की तरफ़, फिर मेरी तरफ़। उसकी आँखों में एक सवाल था जो उसने नहीं पूछा।

तभी डॉक्टर इसरानी ने कुर्सी की तरफ़ इशारा किया और अपनी आवाज़ थोड़ी सी बढ़ाई। वो कभी आवाज़ नहीं बढ़ाते, इसलिए जब बढ़ाते हैं तो पूरा कमरा सुनता है।

"अंकुश," उन्होंने कहा।

मैं गया। बेड से कुर्सी तक, चार कदम। फिर रुक गया।

"ये पहिया देखा?" उन्होंने कहा।

"देखा सर।"

"जोड़ सकते हो?"

मैंने कुर्सी की तरफ़ झुककर देखा। पहिया मुड़ा हुआ था। तीन तीलियाँ बीच से टेढ़ी हो गई थीं, और बॉल बियरिंग चरचरा रही थी। जंग भी लग गई थी।

"जोड़ सकता हूँ," मैंने कहा। "तीलियाँ सीधी करके, बेयरिंग में थोड़ा तेल, और अगर एक नई रिंग मिल जाए, तो एक घंटे का काम है।"

मैंने उठकर सीधा खड़े होते वक़्त यूसुफ़ मियाँ की तरफ़ देखा। वो अपने बेटे की तरफ़ देख रहे थे, और उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने अपने पापा की आँखों में कई साल से देखा है। वो देख रहे थे — इस डर से कि कहीं उनका बेटा उन्हें शर्मिंदा न कर दे।

और मैंने देखा कि शाहिद अपने पापा की तरफ़ नहीं देख रहा था। वो दीवार की तरफ़ देख रहा था। रणवीर के पोस्टर की तरफ़।

डॉक्टर इसरानी उठे। उन्होंने अपना टूटा चश्मा मेज़ से उठाया, पहना और फिर से उतार दिया। फिर उन्होंने सीधे मेरी तरफ़ देखा।

"अंकुश," उन्होंने कहा।

"सर।"

"इस कुर्सी का पहिया जोड़ सको तो जोड़ो। पर —"

उन्होंने एक कदम आगे बढ़ा दिया और उनकी आवाज़ वो धीमी, वो तोलकर बोली वाली हो गई जो मैंने पहले सुनी थी।

"पर पहले इस बाप-बेटे का भरोसा जोड़ना पड़ेगा।"

कमरा चुप हो गया।

शाहिद ने अपना सिर मोड़ा। उसके होंठ हिले पर आवाज़ नहीं निकली। यूसुफ़ मियाँ की उँगलियाँ कुर्सी की बाँह पर और कस गईं।

मेरी जेब में घंटी ठंडी थी। बहुत ठंडी। और फिर, किसी के सुने बिना, बहुत धीमी आवाज़ में, मेरे कान के अंदर उसने कहा —

दो पहिये एक हो रहे हैं। पर पहले दो पापा अलग हैं। सुन, तेरे घर का चौथा सच — दीवार के इस पार नहीं, तेरे ही दरवाज़े पर खड़ा है।

मैंने पीछे मुड़कर देखा। दरवाज़े पर पापा खड़े थे। पापा — जो अभी तक एक शब्द नहीं बोले थे। उनका हाथ अभी भी दरवाज़े के चौखट पर टिका था, और उनकी आँखों में उस तस्वीर की तरफ़ देखते हुए कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा।

वो रणवीर के पोस्टर को देख रहे थे।

और मुझे पहली बार लगा कि मेरे पापा की चुप्पी मेरे घर की सबसे बड़ी चीज़ नहीं है।

उससे भी बड़ी चीज़ कोई है, जो उनके अंदर बैठी है — और वो बाहर आने की जगह ढूँढ रही है।

॥

पापा दरवाज़े पर खड़े थे और रणवीर के पोस्टर को ऐसे देख रहे थे जैसे कोई पुराना हिसाब देख रहा हो। उनका हाथ चौखट पर टिका था और उँगलियाँ धीरे-धीरे लकड़ी को खुरच रही थीं, जैसे बच्चा दीवार पर रेखा खींचता है।

मैंने दो बार आवाज़ दी।

"पापा।"

दूसरी बार में उन्होंने सिर घुमाया, पर आँखें थोड़ी देर बाद आईं। जैसे गाड़ी का पहिया पहले घूमता है और आवाज़ बाद में आती है।

"हाँ," उन्होंने कहा। बस हाँ।

"आप ठीक हैं?"

उन्होंने चश्मा ठीक किया, जो कान पर टेप से बँधा है। टेप पुराना हो गया है, किनारे से छूट रहा है और कान के पीछे छोटा सा लटक रहा है।

"ठीक हूँ," वो बोले। फिर एक शब्द और जोड़ा, "अंदर चल।"

अंदर चले। माँ पहली मंज़िल के दूसरे कमरे में बेड पर लेटी थीं। उनकी साँस अब भी थोड़ी तेज़ चल रही थी, पर होंठों का नीलापन हल्का हो गया था। उनके सिरहाने काजल खड़ी थी, डॉक्टर इसरानी की बीवी का सफ़ेद कोट पहने हुए, जो उसके कंधों से बड़ा था, और गले में पुराना स्टेथोस्कोप लटका हुआ था। वो बीच-बीच में स्टेथोस्कोप को हाथ से पकड़ लेती थी, जैसे किसी ने उसे उधार दिया है और वो कहीं गिर न जाए।

माँ ने मुझे देखा और तुरंत बोलीं, "अंकुश, तीन बजे का टिफ़िन आया?"

"माँ, अभी तो दो ही बजे हैं।"

"तो जल्दी जाओ। यहाँ का खाना मुझे नहीं खाना। इनकी खिचड़ी में नमक नहीं, और मेरे यहाँ दाल में पानी नहीं मिलता, और बात में भी नहीं।"

काजल ने आँखें ऊपर कर लीं।

"अम्मा, आपको आराम करना है।"

"मैं कर रही हूँ। मैं लेटी हूँ। क्या लेटना भी आराम नहीं है? अब ज़ुबान से न लेटूँ तो क्या करूँ, दिल से लेट जाऊँ?"

मैं हँस दिया। पापा कुर्सी खींचकर बेड के पास बैठ गए और माँ के हाथ पर हाथ रख दिया। बस इतना। न कोई शब्द, न कोई हलचल। माँ ने उनका हाथ देखा और फिर अपनी आँखें बंद कर लीं, जैसे कह रही हों कि ठीक है, तुम यहीं रहो।

मैं बाहर गलियारे में आया। गलियारा लंबा है, छत नीची, दीवार पीली, और बीच में पुरानी ट्यूबलाइट जो कभी जलती है, कभी झपकती है, कभी बस बुझी पड़ी रहती है। फ़र्श पर फिनाइल की बदबू और किसी के खाने की भाप। कोने में प्लास्टिक की तीन कुर्सियाँ पड़ी हैं, और उन्हीं में से एक पर यूसुफ़ मियाँ बैठे थे।

वही लोहे की कुर्सी। टूटा पहिया। मुड़ी तीलियाँ। और चरचराती बॉल बियरिंग, जो हर बार घूमने पर ऐसी आवाज़ करती है जैसे कोई पुराना दरवाज़ा खुल रहा हो।

शाहिद उनके सामने खड़ा था। उसके हाथ में एक काग़ज़ था, जिसे वो बार-बार मोड़ रहा था और फिर सीधा कर रहा था। मोड़े जाने की वजह से काग़ज़ का कोना चीरा जा चुका था।

"पापा," शाहिद बोला, "ये तीसरी बार है। हर हफ़्ते नया काग़ज़ थमा देते हैं। पिछले हफ़्ते दवा का दाम बढ़ गया, इस हफ़्ते जाँच जुड़ गई। अगर ऐसे ही चलेगा तो मेरी मज़दूरी पूरी दवा में लग जाएगी और घर का किराया कहाँ से आएगा?"

यूसुफ़ मियाँ ने कोई जवाब नहीं दिया। वो दीवार की तरफ़ देख रहे थे। दीवार पर पोस्टर लगा था — रणवीर भारद्वाज, हाथ जोड़े, सफ़ेद कुर्ता, और नीचे मोटे अक्षरों में लिखा था, नई शुरुआत, नए सपने।

मुझे लगा कि यूसुफ़ मियाँ पोस्टर नहीं देख रहे। वो उस दीवार के पीछे कुछ देख रहे हैं जो सिर्फ़ उन्हें दिखता है।

शाहिद ने काग़ज़ जेब में ठूँसा और कुर्सी की तरफ़ इशारा किया।

"और ये कुर्सी। इसका पहिया ऐसे घूमता है कि पूरा अस्पताल सुन लेता है। कल मैंने पूछा तो नर्स बोली, नई कुर्सी का काग़ज़ भर दो। तीन सौ रुपये और चार-पाँच रुपये महीने का किराया। पापा, अब बताइए, मैं क्या करूँ?"

यूसुफ़ मियाँ ने सिर हिलाया। बस हिलाया। हाँ जैसे, या ना जैसे, पता नहीं।

तभी सीढ़ियों से तेज़ पदचाप आई और टिंकू गलियारे में घुसा। उसके हाथ में माँ का टिफ़िन था — कपड़े में बँधा हुआ, और उसके मुँह पर पसीना।

"उस्ताद! मैंने कहा था न, मैं खुद लाऊँगा। तीन बजे अभी दो ही बजे हैं, पर मैंने सोचा कि आपको भूख लगी होगी, तो टिफ़िन ले आया। रास्ते में एक बकरी ने मेरी तरफ़ ऐसे देखा, जैसे मैं ही उसका टिफ़िन ले जा रहा हूँ।"

फिर उसकी नज़र कुर्सी पर पड़ी।

"अरे, इस कुर्सी का पहिया…" वो झुक गया और उँगली डाल दी।

"टिंकू, रुक—"

बहुत देर हो चुकी थी। उसकी उँगली तीलियों के बीच फँस गई और चरचराती बॉल बियरिंग ने उसे पकड़ लिया। टिंकू चीखा। सच में चीखा, बिना नाटक के, और पूरा गलियारा हिल गया।

"आआआ! निकल नहीं रही! निकल नहीं रही!"

मैंने उसे पकड़कर खींचा, फिर धीरे से उसकी कलाई घुमाई और उँगली बाहर निकाली। तीनों पोर पर लाल निशान पड़ गया था और ग्रीस की काली लकीर बन गई थी।

"देखा," मैं हँसा, "ये कुर्सी नहीं, इंसान है। ज़रा सब्र से पेश आइए। जब ये बोले तब पकड़िए, अपने आप पकड़ के मत बैठिए।"

टिंकू अपनी उँगली चूम रहा था।

"उस्ताद, आपको हँसी आ रही है?"

"मुझे इसलिए हँसी आ रही है कि तूने कुर्सी से वो सलूक किया जो ये सालों से लोगों से कर रही है। मुझे लगता है ये जानती है कि किसका दर्द कहाँ है। देख, अभी भी सबसे पहले तेरी ही उँगली पकड़ी।"

टिंकू भी हँस दिया। यूसुफ़ मियाँ के चेहरे पर हल्की सी हलचल आई। शाहिद ने भी मुस्कुराने की कोशिश की, पर मुस्कान आधी में अटक गई।

मैंने कुर्सी के पहिये के पास हाथ रखा और जाँचने लगा। बॉल बियरिंग में जंग है। तीलियाँ मुड़ी हैं। रिंग बैठी हुई है। और नीचे की धुरी पर भी दरार है।

तभी मेरी जेब में घंटी गरम होने लगी। गरम — इतनी कि जेब की जीन्स भी गरम लगी। मैंने बाहर से हाथ दबाया। और घंटी ने बहुत धीरे, बहुत छोटे से, मेरे कान के अंदर कहा —

पहले सच। फिर पहिया।

बस इतना। और फिर चुप।

मैंने टिंकू को टिफ़िन पकड़ाया और शाहिद की तरफ़ देखा। वो अब भी काग़ज़ को जेब में दबा रहा था, और उसकी जेब से काग़ज़ का पीला कोना बाहर झाँक रहा था।

"शाहिद भाई," मैंने कहा।

"हाँ।"

"आपकी जेब में जो काग़ज़ है, निकालिए।"

उसका चेहरा उतर गया।

"ये… ये तो बिल है। अस्पताल का हिसाब। इसमें क्या है।"

"अगर बिल है तो निकालिए। मैं आपको इलाज का हिसाब समझा दूँगा, कौन सी लाइन में क्या लिखा है, कौन सी दवा कहाँ से सस्ती मिलेगी। मेरी माँ का इलाज भी यहीं चलता है, उनके काग़ज़ मैंने खुद भरे हैं।"

शाहिद पीछे हट गया। एक कदम। फिर दूसरा। उसकी एड़ी दीवार से टकराई और टकराते ही वो रुक गया, जैसे दीवार ने भी उसे ठेल दिया हो।

"बिल नहीं है," यूसुफ़ मियाँ ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा। उनकी आवाज़ सूखी थी, जैसे बहुत दिनों बाद बोली हो।

सब उनकी तरफ़ देखने लगे।

"यूसुफ़ भाई," डॉक्टर इसरानी कहाँ से आ गए, पता नहीं चला। वो मेरे पीछे खड़े थे, हाथ में टूटा चश्मा। उनकी आवाज़ धीमी थी। "क्या कह रहे हो?"

यूसुफ़ मियाँ ने दीवार से नज़र नहीं हटाई।

"मत पूछो," वो बोले। "बेटा मेरी वजह से फँसा है। मेरी दवा, मेरी कुर्सी, मेरी जाँच, मेरा ही सब कुछ। वो सुबह सीमेंट की बोरी उठाता है और शाम को यहाँ आकर मेरे पैर दबाता है। उसकी उम्र में मैं भी मज़दूरी करता था, पर मैंने अपने बाप के पैर कभी नहीं दबाए, क्योंकि मेरा बाप मेरे पैर पर नहीं बोझ था।"

"पापा," शाहिद ने कहा। उसकी आवाज़ काँप रही थी।

"मैं बोल रहा हूँ," यूसुफ़ मियाँ ने कहा, और यह पहली बार था कि उन्होंने अपने बेटे की तरफ़ देखा।

शाहिद का हाथ जेब की तरफ़ गया। उँगलियाँ काँप रही थीं। उसने काग़ज़ पकड़ा, बाहर निकाला, और काग़ज़—

उसके हाथ से छूट गया।

वो काग़ज़ हवा में धीरे-धीरे घूमकर नीचे गिरा, जैसे कोई पत्ता गिरता है, और फ़र्श पर सीधा पड़ गया, खुला हुआ, जैसे कोई खुद ही अपना सच बता रहा हो।

मैं झुक गया।

काग़ज़ पीला था, ऊपर मोटे अक्षरों में सफ़ेद काग़ज़ पर छपा हुआ। सबसे ऊपर बड़ी मोहर — गोल, नीली स्याही, और उसमें साफ़ पढ़ा जा सकता था, भारद्वाज कंस्ट्रक्शन।

नीचे की लाइनें छोटी थीं। मैंने उँगली से उस पर हल्की धूल हटाई और पढ़ा।

सुविधा के नाम पर, अस्पताल में भर्ती रोगी के परिवार को मुफ़्त इलाज, मुफ़्त दवा और मुफ़्त जाँच की सुविधा दी जाएगी।

और उसके नीचे, बड़े मोटे अक्षरों में —

बदले में अस्पताल की ज़मीन के काग़ज़ पर अंगूठा।

और उसके नीचे एक खाली जगह, जहाँ स्याही की गोली जैसी जगह बनी थी, और उस जगह पर कोई नहीं था। खाली। इंतज़ार कर रही थी।

कमरे में कोई नहीं बोला। ट्यूबलाइट झपकी, फिर जल गई, फिर झपकी।

टिंकू ने काग़ज़ पढ़ने की कोशिश की। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।

डॉक्टर इसरानी ने काग़ज़ उठाया। उनके हाथ नहीं काँप रहे थे। यही सबसे डरावना था। उन्होंने उसे दोनों हाथों से पकड़ा, बहुत देर तक देखा, और फिर धीरे से बोले, "मुझे भी यह मिला था।"

सबने उनकी तरफ़ देखा।

"दो हफ़्ते पहले," डॉक्टर ने कहा। "उसी सफ़ेद कुर्ते वाले आदमी ने मेरी मेज़ पर रखा था। यही काग़ज़, यही मोहर, यही लाइनें। उसने कहा कि अस्पताल पुराना हो गया है, नई इमारत चाहिए, और मैं वहाँ पहली मंज़िल पर बैठूँगा, बड़ा कमरा, नई मशीन, अपना नाम साथ में। मैंने अंगूठा नहीं लगाया। पर मैंने उसे रोका भी नहीं। और फिर मैंने उन्हें दीवार पर बोर्ड लगाने दिया। मैंने सोचा, क्या फ़र्क़ पड़ता है, बोर्ड है, काग़ज़ नहीं।"

उन्होंने काग़ज़ नीचे किया।

"फ़र्क़ पड़ता है," वो बोले, अपने ही आप से, जैसे कोई डाँट रहा हो। "बोर्ड भी वही काम करता है जो अंगूठा करता है। आदमी को आदत डाल देता है।"

मैंने पीछे देखा। पापा दरवाज़े पर खड़े थे। उनका हाथ अभी भी चौखट पर था। और उनकी आँखें काग़ज़ पर टिकी थीं।

फिर पापा आगे आए। उन्होंने डॉक्टर इसरानी के हाथ से काग़ज़ लिया, अपने चश्मे के पास ले गए, और बहुत देर तक देखा। मैंने सोचा कि उन्हें पढ़ने में दिक्कत हो रही होगी। पर फिर मैंने देखा कि वो पढ़ नहीं रहे थे। वो बस देख रहे थे। वो काग़ज़ जानता था और पापा भी।

"यह काग़ज़ मैं जानता हूँ," उन्होंने कहा।

उनकी आवाज़ सामान्य थी। न धीमी, न तेज़। और यही सबसे भारी थी।

"पापा," मैंने कहा। मेरी आवाज़ कहाँ गई, पता नहीं।

"इसकी स्याही मेरे अंगूठे पर लगी थी," उन्होंने कहा। "पाँच साल पहले। दफ़्तर में। मैंने तुम्हारी माँ के इलाज के लिए अंगूठा लगाया था। काग़ज़ क्या था, मैंने पूछा नहीं। मुझे डर लगा था कि पूछने से सब रुक जाएगा। और जिस चीज़ में सबसे ज़्यादा डर हो, वही सबसे ज़्यादा सच होती है।"

गलियारा चुप हो गया।

शाहिद का चेहरा सफ़ेद पड़ गया था। वो अपने पापा की तरफ़ देख रहा था, और उसकी आँखें सवाल से भरी थीं।

"पापा," वो बोला, "ये काग़ज़ आपने कब देखा?"

यूसुफ़ मियाँ ने दीवार से नज़र हटाई।

"चार दिन पहले," उन्होंने कहा। "तू साइट पर गया था। तेरी माँ मेरे पास बैठी थी। वो सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी, जो यहाँ डॉक्टर साहब से बात करने आता है, वो मेरे पास आया और यह काग़ज़ रख दिया। बोला, बस एक अंगूठा, और तेरा इलाज मुफ़्त, तेरी जाँच मुफ़्त, और तेरे बेटे को साइट पर पक्की नौकरी।"

"और आपने?" मैंने पूछा।

"मैंने कहा," यूसुफ़ मियाँ ने आँखें बंद करके कहा, "कि मेरा अंगूठा लगाने से किसी को क्या फ़र्क़ पड़ता है। मैं तो कोई ज़मीन का मालिक नहीं हूँ। मेरे पास ज़मीन कहाँ है।"

"आपने लगाया?" शाहिद की आवाज़ फट गई।

"मैंने काग़ज़ शाहिद को दिया," यूसुफ़ मियाँ ने कहा। "बोला, देख ले, तेरा पापा पढ़ा नहीं जो, तू पढ़ ले। और मैंने यह नहीं सोचा कि वो लाइन — अस्पताल की ज़मीन पर अंगूठा — इसका मतलब क्या है। अंगूठा तो मैं अपना लगाता हूँ, ज़मीन तो अस्पताल की है। मैंने सोचा, बात बन गई।"

"और अब?" मैंने कहा।

"अब मैंने काग़ज़ पढ़वाया शाहिद से," उन्होंने कहा। "उसने पढ़कर मुझे सुनाया। और मैं बैठा रह गया। चार दिन से बैठा हूँ। काग़ज़ वापस देना है या फाड़ देना है, यह भी नहीं तय कर पाया। हर रात सोचता हूँ, सुबह कर दूँगा। सुबह होती है, और मैं कुर्सी पर बैठकर दीवार देखता रह जाता हूँ।"

अब मुझे समझ आया कि वो दीवार क्यों देख रहे थे। वही पोस्टर। वही चेहरा। वही हाथ जोड़े हुए सफ़ेद कुर्ता।

काग़ज़ के कोने पर छोटी सी लाइन और थी, जिसे मैंने पहले नहीं देखा था। मैंने काग़ज़ झुकाया और पढ़ा।

तीस दिन के अंदर अंगूठा।

और उसके नीचे, बहुत छोटे अक्षरों में —

वरना इलाज की सुविधा समाप्त मानी जाएगी।

मेरी जेब में घंटी गरम थी। बहुत गरम। और फिर उसने कहा —

तीस दिन। काग़ज़ आया है। काग़ज़ वापस जाएगा। पर पहले बाप-बेटे के बीच एक सच बाकी है।

मैंने शाहिद की तरफ़ देखा। वो दीवार से टिका खड़ा था, आँखें नीची, और उसके होंठ कुछ कहना चाहते थे पर निकल नहीं रहा था।

"शाहिद भाई," मैंने कहा। "आपने काग़ज़ वापस नहीं किया। क्यों?"

उसने सिर उठाया। उसकी आँखों में पानी था और गुस्सा भी।

"क्योंकि मुझे लगा," उसने कहा, "कि अगर पापा का इलाज मुफ़्त हो जाए, तो मैं चार दिन और मज़दूरी करूँगा, और उस पैसे से अपनी माँ को दवा दिला दूँगा, और कभी किसी से कुछ नहीं माँगूँगा। मुझे यह नहीं सोचना था कि काग़ज़ पर अंगूठा किसका लगेगा। मुझे यही सोचना था।"

वो फिर चुप हो गया। फिर बोला, "और एक बात है। चार दिन पहले, साइट पर, बबलू भाई ने मेरा कंधा पकड़कर कहा था — तेरे पापा अंगूठा लगा दें, तो तेरे लिए पक्की नौकरी। मैंने उससे यह नहीं कहा कि मैं पहले ही काग़ज़ ले आया हूँ। मैंने सोचा, अगर पक्की नौकरी मिल जाए, तो छह महीने में घर की हालत बदल जाएगी।"

"तो तुमने क्यों नहीं कहा?" यूसुफ़ मियाँ ने पूछा।

"क्योंकि आपने काग़ज़ फाड़ने की बात की थी," शाहिद ने कहा। "मैंने डर के मारे छुपा लिया।"

यूसुफ़ मियाँ ने कुछ नहीं कहा। उनकी उँगलियों ने कुर्सी की बाँह पकड़ी। मुड़ा पहिया फिर चरचराया। उस आवाज़ में एक अजीब बात थी — जैसे कुर्सी भी उनकी बात सुन रही हो और मज़ाक बना रही हो।

काजल दरवाज़े पर आई। उसका चेहरा बताता था कि उसने सब सुना है। उसके हाथ में परची थी, जो उसने अब मोड़ दी थी।

"ये क्या है?" उसने कहा। "अस्पताल में भर्ती मरीज़ के परिवार से इस तरह का काग़ज़? डॉक्टर साहब, ये किसी ने यहाँ बाँटा? आपने क्यों नहीं रोका?"

डॉक्टर इसरानी ने सिर झुका लिया।

"मैंने रोका नहीं," उन्होंने कहा। "और यही मेरी सबसे बड़ी ग़लती है। मैंने सिर्फ़ अपने बारे में सोचा — कि मुझे अंगूठा नहीं लगाना है, तो मेरा क्या जाता है। पर जब मैं चुप रहा, तब ये काग़ज़ उस कमरे तक चला गया जहाँ मेरे मरीज़ लेटे हैं। इसलिए यह काग़ज़ मेरे ख़ाते में भी दर्ज है।"

रज्जो बाई, जो अभी खिड़की के पास खड़ी थी, आगे आई। उसने अपना आधा खुला बैग सीने से लगा रखा था। उसने काग़ज़ देखा और उसका हाथ रुक गया।

"ठीक यही काग़ज़," उसने धीरे से कहा। "इसी की नक़ल पंद्रह दिन पहले चंद्रेश सक्सेना के दफ़्तर में आई थी। मैंने झाड़ू लगाते हुए उसे फ़ाइल में रखते देखा था। उस पर पीतल का एक टुकड़ा भी था, छोटा सा, घंटी जैसे रंग का। और चंद्रेश बोला था — इसे किसी ऐसे हाथ से लगवाना है जो बोले नहीं।"

कमरे में सन्नाटा छा गया।

मैंने ठंडी होती हुई घंटी को जेब में महसूस किया और अपने पापा की तरफ़ देखा। पापा काग़ज़ पकड़े खड़े थे। उनके हाथ में वही काग़ज़ था, जिस पर उन्होंने पाँच साल पहले अँगूठा लगाया था, और उन्होंने ऐसे देखा, जैसे कोई पुराना आदमी अपना ही खोया हुआ नाम पढ़ रहा हो।

और तभी मेरी जेब में घंटी ने आख़िरी बात कही, बहुत धीमी आवाज़ में, सिर्फ़ मेरे लिए —

अब सच खुला है। पर पहिया अभी नहीं जुड़ेगा। क्योंकि यह काग़ज़ दो पापाओं के बीच है, और एक पापा वो है जो इसे लिखवाता है।

मैंने काग़ज़ अपने हाथ में लिया और कुर्सी की तरफ़ देखा। मुड़ा पहिया, जंग लगी तीलियाँ, चरचराती बॉल बियरिंग।

टिंकू ने मेरी कुहनी छुई।

"उस्ताद," उसने फुसफुसाया, "अब हम क्या करेंगे?"

मैंने काग़ज़ मोड़कर जेब में नहीं रखा। मैंने उसे सीधा रखा, सबके सामने, मेज़ पर, और उस पर हाथ रख दिया, जैसे कोई मोहर लगा रहा हो।

"अब हम," मैंने कहा, "पहले यह तय करेंगे कि इस काग़ज़ पर अंगूठा कौन लगवाता है — वो भी जानेंगे। और टिंकू, जब तक मैं यह जानूँ, तू इस कुर्सी को छूना मत। इसकी उम्र तेरी उम्र से दोगुनी है, और इसका गुस्सा तेरे उस्ताद से कहीं ज़्यादा।"

टिंकू ने अपनी उँगली सहलाई और कुर्सी से दो कदम पीछे हट गया।

दूर, दूसरे कमरे से माँ की आवाज़ आई, "काजल! तीन बज गए? टिफ़िन आया कि नहीं?"

और मुझे लगा कि इस पूरे अस्पताल में सबसे साफ़ और सबसे सच्ची आवाज़ वही है। बस उसे सुनने वाले अभी कम हैं।

उस शाम मुझे एक बात समझ आई जो मैंने पहले कभी ऐसे नहीं सोची थी।

रणवीर भारद्वाज मोहल्ले को ज़मीन से नहीं खरीदता।

वो उसे अँगूठों से खरीदता है।

॥

मैंने काग़ज़ उठाया। अस्पताल के गलियारे की पीली रोशनी उस पर ऐसे पड़ रही थी जैसे कोई बूढ़ा आदमी टॉर्च लेकर किसी पुराने खत को पढ़ रहा हो। काग़ज़ ज़्यादा पुराना नहीं था, पर उसकी गंध पुरानी थी — स्याही, मोहर और उस डर की गंध जो काग़ज़ों पर चुपचाप बैठ जाता है और फिर पूरे घरों में फैल जाता है।

मैंने उसे सीधा किया।

ऊपर नीली गोल मोहर थी। उसके नीचे साफ़ साफ़ लिखा था — मरीज़ और उसके परिवार को इलाज, दवा और जाँच की कोई भी कीमत नहीं देनी होगी। बीच में एक खाली जगह थी, स्याही की गोली जैसी गोल, जहाँ अंगूठा लगना बाकी था। और सबसे नीचे, छोटे अक्षरों में, एक पंक्ति — तीस दिन के अंदर।

मैंने ज़ोर से पढ़ा, ताकि सिर्फ़ मैं सुनूँ नहीं, पूरा गलियारा सुने। मेरी आवाज़ ने मेरी जेब में पड़ी छोटी फूल वाली घंटी को भी सुना होगा, क्योंकि वो मेरी छाती के पास ऐसे बैठी थी जैसे कोई बच्चा कक्षा में आख़िरी बेंच पर डरकर बैठा हो।

"तीस दिन," मैंने कहा। "मरीज़ को मुफ़्त इलाज। मुफ़्त दवा। मुफ़्त जाँच।" मैंने उँगली उस खाली गोल जगह पर रखी जहाँ मोहर नहीं, अँगूठा लगना था। "बदले में सिर्फ़ एक अंगूठा। किस चीज़ पर, ये नीचे लिखा है, क्योंकि पीछे की तरफ़ का हिस्सा किसी ने फाड़ दिया है। पर मुझे लगता है, इस काग़ज़ की नस-नस ये चिल्ला रही है कि अंगूठा अस्पताल की ज़मीन पर है।"

डॉक्टर इसरानी ने सिर और नीचा कर लिया।

मैंने काग़ज़ शाहिद की तरफ़ बढ़ाया।

"ये तेरी जेब से गिरा था," मैंने कहा। "अपना हो तो ले ले।"

शाहिद ने हाथ बढ़ाया, फिर रोक लिया। उसकी उँगलियाँ हवा में ऐसे अटक गईं जैसे कोई चीज़ पकड़ने जा रहे हों और हाथ कहे कि नहीं, इससे तो छूना भी नहीं।

"ये मेरा नहीं है," उसने कहा। "ये मुझे दिया गया था।"

"किसने दिया?"

शाहिद ने अपने पापा की तरफ़ देखा। यूसुफ़ मियाँ टूटे पहिये वाली लोहे की कुर्सी में बैठे थे। उनकी कमर टेढ़ी थी, हाथ कुर्सी की बाँह पर कपड़े से बँधे हुए से। उन्होंने हल्का सा सिर हिलाया — ऐसे जैसे बेटे को इजाज़त दे रहे हों।

"बबलू भाई ने दिया था," शाहिद ने कहा। "ग्यारह दिन पहले। साइट पर। वो मेरे पास आए, मेरा कंधा पकड़ा, और मुझे खींचकर ट्रक के पीछे ले गए जहाँ कोई नहीं देख रहा था। उन्होंने मेरी हथेली में ये काग़ज़ रखा।"

मैंने सुना। मैंने बीच में कुछ नहीं पूछा।

"उन्होंने कहा — सुन बेटा, ये काग़ज़ तेरे घर वालों को देना। तेरी माँ की इलाज की कोई कीमत नहीं लगेगी, सब मुफ़्त। तेरे पापा की दवा, उनकी जाँच, सब मुफ़्त। और तुझे साइट पर पक्की नौकरी, अगर…" शाहिद की आवाज़ अटकी। "अगर तेरे पापा का अंगूठा इस पर लग जाए।"

"और तूने क्या किया?"

"मैंने काग़ज़ जेब में रखा," शाहिद ने कहा। "मैंने पापा को कुछ नहीं बताया। मैंने सोचा कि… मैं खुद लगवा दूँगा। मैंने…" उसकी आवाज़ टूटी। "मैंने सोचा कि पापा के सो जाने के बाद, रात में, उनका हाथ पकड़कर लगवा दूँगा और वो कभी जानेंगे भी नहीं।"

यूसुफ़ मियाँ ने अपना मुँह खोला। उनकी आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई पुराना ट्रक धीरे धीरे चालू हो रहा हो।

"मैं जानता था," उन्होंने कहा। "मैं जानता था कि काग़ज़ कहाँ से आया।"

शाहिद ने आँखें बड़ी करके पापा की तरफ़ देखा।

"चार दिन पहले," यूसुफ़ मियाँ ने कहा, "सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी खुद मेरे पास आया था। स्टेशन के पास, जहाँ मैं चाय पीने जाता हूँ। वो मेरी बगल में बैठा। एक काग़ज़ निकाला। बोला — यूसुफ़ भाई, आपके बेटे की नौकरी की बात है। बस एक अंगूठा। पर अंगूठा आपका नहीं, मरीज़ की तरफ़ से आपके हाथ का।"

डॉक्टर इसरानी की तरफ़ सबकी नज़रें गईं। वो खिड़की के पास खड़े थे, पीली दीवार पर टिके, और उनका चेहरा ऐसा था जैसे कोई पुराना आदमी अपने ही हाथ देख रहा हो।

"मैंने अंगूठा नहीं लगाया," यूसुफ़ मियाँ ने कहा। "मैंने एक बार भी नहीं लगाया। पर…" वो रुके। "पर मैंने बेटे को भी नहीं रोका। मैंने काग़ज़ उसके पढ़ने के लिए दे दिया। मैंने सोचा — बेटा पढ़ेगा, समझेगा कि घर में क्या हाल है।" उनकी आवाज़ भारी हो गई। "और अगर वो खुद मना कर देगा तो… तो मेरे सर से इल्ज़ाम उतर जाएगा।"

कुछ देर सब चुप रहे। दूसरे कमरे से माँ की खाँसी आई — वो खाँसी जो किसी की जान पर बोझ होती है, जो किसी की नींद खराब करती है, पर जिसे सुनने के लिए किसी को जगाना पड़ता है।

मुझे लगा कि मुझे अब बोलना चाहिए। मैंने अपना मुँह खोला, और बोला वो जो मैंने सैकड़ों बार सोचा था, जो सच लगता था, जो मुझे मदद करता था हर बार जब कोई काग़ज़, कोई मोहर, कोई शर्त मेरे सामने आती थी।

"ऐसे काग़ज़ तो मैं रोज़ देखता हूँ," मैंने कहा। "मेरे पास से रोज़ गुज़रते हैं। किसी दुकान के लिए, किसी ठेले के लिए, किसी ज़मीन के लिए। तो तुम लोग…"

मेरी जेब में घंटी ठंडी हुई। अचानक ऐसी ठंडी, जैसे ठंडे पानी की बोतल किसी ने मेरी जेब में रख दी हो। और फिर उसमें से एक चुभन निकली — पतली, तेज़, बर्फ़ की सुई जैसी। मेरी रीढ़ से चलती हुई मेरे कान तक आई और मेरी ज़ुबान को ऐसे पकड़ लिया जैसे कोई रस्सी पकड़ ले।

मैं रुक गया।

क्योंकि वो सच नहीं था। ऐसे काग़ज़ मैं रोज़ नहीं देखता था। मैं रोज़ अपनी दुकान पर पंचर देखता था, चेन देखता था, टूटी हुई घंटियाँ देखता था। ऐसे काग़ज़ मैंने पहली बार तब देखा जब बबलू ने मेरी गर्दन पकड़ी थी और कहा था कि बड़े साहब की नज़र मेरी दुकान पर है। और दूसरी बार तब देखा जब अपने ही पापा के अंगूठे का निशान देखा। मैं ऐसे काग़ज़ों से डरता था, और मैंने ये डर छुपाने के लिए अपनी ही ज़ुबान से झूठ निकाल दिया — कि मैं इनका आदी हूँ।

जब तुम अपने रोज़ के काम में झूठ नहीं बोल सकते, तो तुम्हें अपनी ही आदतें बदलनी पड़ती हैं।

मैंने आँखें बंद कीं। गहरी साँस ली। और फिर आँखें खोलकर शाहिद और यूसुफ़ मियाँ दोनों की तरफ़ देखा।

"मैं ग़लत बोलते बोलते रुक गया," मैंने कहा। "माफ़ी। मुझे ये नहीं कहना चाहिए था कि ऐसे काग़ज़ रोज़ देखता हूँ। सच ये है कि मैं इनसे डरता हूँ। मैं अपने पापा के अंगूठे से डरता हूँ। मैं ये भी नहीं जानता कि अब क्या करना है। पर एक बात मुझे पक्का पता है — हम तीनों इस गलियारे में इसलिए खड़े हैं कि हम में से कोई किसी से सच नहीं बोल रहा।"

मैंने काग़ज़ मेज़ पर रखा। सीधा। बिल्कुल सीधा।

"अब आप दोनों," मैंने कहा। "एक-एक सच्ची बात बोलो। बहाना नहीं। बात को घुमाना नहीं। सिर्फ़ एक सच्ची बात। जो आपने कभी किसी को नहीं बोली।"

कमरे में चुप्पी ऐसी उतरी जैसे कोई भारी कपड़ा फ़र्श पर गिरा हो। काजल दरवाज़े के पास खड़ी थी, उसके हाथ में परची थी, पर वो अब भी थी — जैसे स्टेथोस्कोप की नली की तरह, जो सुनती है पर बोलती नहीं।

शाहिद ने पहले बोला।

उसकी आवाज़ सूखी थी, जैसे गर्मी में कोई नल सूख जाता है और फिर अचानक पानी आ जाए, पर पहला पानी कीचड़ वाला होता है।

"मैं डरता हूँ," उसने कहा। "बहुत डरता हूँ। मुझे रात को नींद नहीं आती। साइट पर सीमेंट ढोते वक़्त मेरे हाथ काँपते हैं और मुझे लगता है कि बोरी फिसलकर मेरे सीने पर गिरेगी। पर वो डर नहीं है। असली डर ये है —" उसने कुर्सी में बैठे अपने पापा की तरफ़ देखा। "असली डर ये है कि पापा मर जाएँगे। और उस दिन मेरे पास किराया भी नहीं होगा।"

यूसुफ़ मियाँ ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

"मैं जानता हूँ," शाहिद ने कहा, "ये सुनकर आपको कैसा लगेगा। पर ये सच है। मैंने काग़ज़ इसलिए छिपाया कि मैं सोचता रहा कि अगर इलाज मुफ़्त हो गया और नौकरी पक्की हो गई, तो मैं कम से कम इंसान की तरह जी सकूँगा। मुझे ये नहीं सोचना पड़ेगा कि महीने के आख़िर में क्या बेचूँ। मैं…" उसकी आवाज़ फिर अटकी। "मैं डरता हूँ कि मैं अपने पापा को बचा नहीं पाऊँगा। और शायद मैं ये भी डरता हूँ कि वो मुझ पर बोझ बन रहे हैं, और मैं ऐसा सोचना नहीं चाहता, पर सोचता हूँ। और यही सबसे ज़्यादा डरावना है।"

कमरे में कोई नहीं हिला।

यूसुफ़ मियाँ ने अपनी आँखें खोलीं। उनका चेहरा ऐसा था जैसे उन्होंने अभी कुछ खोया हो और वो भी जानते हों कि खोया हुआ वो वापस नहीं आएगा — पर वो खोया हुआ कोई चीज़ नहीं थी, वो एक शब्द था।

"मैं जानता था," वो धीरे से बोले, "कि बेटा रात को रोता है। मैंने सुना है। मैंने दो बार आँख खोलकर देखा है — वो सिर ज़मीन की तरफ़ करके रोता है।" वो रुके। "मैंने उसे कभी गले नहीं लगाया। दस साल में। आपको पता है क्यों?"

किसी ने जवाब नहीं दिया। यूसुफ़ मियाँ ने खुद अपना सवाल उठाया।

"क्योंकि डर था कि वो रोएगा तो मैं रो दूँगा। और अगर मैं रो दूँगा तो घर कौन सँभालेगा?"

मैंने अपनी जेब में हाथ रखा। छोटी घंटी अब भी ठंडी थी, पर वो मेरी ज़ुबान को पकड़े हुए नहीं थी। वो सिर्फ़ सुन रही थी।

"मुझे एक डर है," यूसुफ़ मियाँ ने कहा। उनकी आवाज़ पहली बार ऐसी निकली जैसे किसी पुराने मकान की छत से पहली बार बारिश का पानी टपक रहा हो। "मुझे डर है कि मेरा बेटा मुझे छोड़कर चला जाएगा। एक दिन वो कहेगा — बस, अब नहीं। और वो साइट पर रहने लगेगा, या दूसरे शहर चला जाएगा, और मुझे खबर भी नहीं होगी। मैं इस कुर्सी में बैठा रह जाऊँगा और वो अपनी ज़िंदगी जीने लगेगा।" उनकी आँखें भर आईं। "और यही डर मुझे रात को जगाए रखता है, शाहिद। तेरे रोने की आवाज़ नहीं। मेरा ही डर।"

दोनों पिता-पुत्र ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा।

मुझे लगा कि अब घंटी कुछ कहेगी। कुछ बड़ा, कुछ भारी। मैंने उम्मीद की कि वो कहेगी — अठठारह? बीस? उन्नीस? मैंने सुना उसका नाम लेने की तैयारी की।

पर घंटी चुप रही।

और अगले पल शाहिद की जेब से फोन बजा।

वो आवाज़, सीटी जैसी, तीन बार, चार बार — बिल्कुल वैसी जैसे साइट पर किसी ट्रक का हॉर्न। शाहिद ने फोन निकाला, स्क्रीन देखी, और उसका चेहरा एक पल में बदल गया। रोना चला गया। डर आ गया।

उसने फोन अपने कान से लगाया। उसने "हाँ" कहा, फिर कुछ नहीं बोला। फिर बोला, "अभी?"

मैंने काग़ज़ की तरफ़ देखा। मैंने देखा कि शाहिद की नज़रें उसी काग़ज़ पर हैं। और मैंने देखा कि उसके हाथ में पसीना आ गया।

"लेकिन मैं…" शाहिद ने कहा। "मैंने अभी तक…"

उधर से कोई बोल रहा था। शाहिद ने अपना सिर झुका लिया। उसने घूमकर अपने पापा की तरफ़ देखा, फिर अपनी माँ की तरफ़ जो अब भी दूसरे कमरे में खाँस रही थी, फिर मेरी तरफ़।

और फिर उसने वो किया जो मुझे आज तक समझ नहीं आया — या शायद मैं खुद को समझाना नहीं चाहता था।

उसने मेज़ से काग़ज़ उठाया। उसे मोड़ा। उसे अपनी जेब में नहीं रखा — उसने उसे अपनी छाती से लगाया, और दरवाज़े की तरफ़ भागा।

"शाहिद!" यूसुफ़ मियाँ ने पुकारा। पर वो नहीं रुका।

डॉक्टर इसरानी ने हाथ बढ़ाया। "बेटा, रुको…"

शाहिद गलियारे में भागा। बायें मुड़ा। सीढ़ियों की तरफ़। उसके जूतों की चाप सुनाई दी, फिर और तेज़, फिर धीमी, फिर सीढ़ियों पर, फिर गायब।

यूसुफ़ मियाँ कुर्सी से उठने की कोशिश कर रहे थे, पर उनकी टाँग ने साथ नहीं दिया। वो कुर्सी में वापस गिर पड़े, और उनका मुँह बोला, "शाहिद…"

काजल मेरे पास आई। उसका चेहरा सख़्त था।

"अंकुश," उसने कहा, "अब क्या?"

मैंने अपनी जेब में हाथ रखा। छोटी घंटी ठंडी थी, पर अब उसमें एक तरह की कसमसाहट थी — जैसे कोई चीज़ मुझसे कहना चाह रही हो, पर बोल न पा रही हो।

मैं गलियारे की तरफ़ भागा।

सीढ़ियों के पास एक खिड़की है जहाँ से नीचे अस्पताल का गेट दिखता है। मैं वहाँ पहुँचा। मैंने काँपते हाथ से खिड़की खोली।

नीचे, गेट पर, एक सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी। उसके पास एक आदमी खड़ा था — मोटा, गले में सोने की चेन, हाथ में पान। बबलू का आदमी नहीं — बबलू खुद नहीं — कोई और, एक दुबला, ऊँचा, जिसने काली शर्ट पहन रखी थी।

शाहिद गेट की तरफ़ भाग रहा था, हाथ में वो मोड़ा काग़ज़।

मैंने खिड़की से झाँका और सुना — या शायद मैंने कल्पना की, पर मुझे साफ़ सुनाई दिया — कि उस काली शर्ट वाले ने अपना फोन फिर लगाया, और शाहिद की जेब में फोन बजा, और मैंने उसकी आवाज़ सुनी कि कह रही थी, जैसे किसी पुरानी फ़िल्म का संवाद जो पूरे शहर में बजता है:

"साहब का काग़ज़ लेकर गेट पर आ जा। वरना नौकरी आज ही जाती है।"

शाहिद गेट पर पहुँचा। काली शर्ट वाले ने उससे काग़ज़ लिया, उसे खोला, देखा, और सफ़ेद गाड़ी की खिड़की के पास ले गया। खिड़की धीरे से नीचे हुई। मुझे अंदर का चेहरा नहीं दिखा, सिर्फ़ हाथ दिखा — सफ़ेद कुर्ते की बाँह, और एक उँगली जो काग़ज़ पर रखी गई, ऐसे जैसे कोई तराज़ू पर हाथ रख रहा हो।

और फिर, जैसे कोई तमाशा खत्म होता हो, गाड़ी की खिड़की चढ़ गई। इंजन बजा। गाड़ी मुड़ी।

शाहिद वहीं खड़ा रह गया।

मैं खिड़की पर टिका रहा।

मेरी जेब में छोटी फूल वाली घंटी पहली बार गुनगुनाई।

और उसके बाद, मेरी ही जेब से, वो बड़ी आवाज़ आई जिसे सिर्फ़ मैं सुन सकता हूँ — रूखी, छोटी, और ऐसी जैसे किसी पुरानी पीतल की प्लेट पर कील गिरी हो।

"पहिया अब भी नहीं जुड़ा," उसने कहा। "क्योंकि तेरे दरवाज़े पर एक और काग़ज़ रखा है, और वो तेरे पापा के नाम का है।"

मैंने खिड़की बंद की।

मैंने नीचे गेट की तरफ़ आख़िरी बार देखा — शाहिद अब भी वहीं खड़ा था। उसके हाथ खाली थे। उसका चेहरा ऊपर उठा, ठीक मेरी खिड़की की तरफ़, और उसने मुझे देखा।

उसने कुछ नहीं कहा।

मुझे लगा कि उसने यही कहा — "देखा? मैंने बोला था ना, डर जीत जाता है।"

मैंने अपनी आँखें बंद कीं।

मेरी जेब में बड़ी घंटी ठंडी थी।

मैंने पलटकर काजल की तरफ़ देखा।

"काजल," मैंने कहा, "तू अंदर जा। माँ के पास। उन्हें कुछ मत बता। उन्हें लगेगा कि सब ठीक है, और शायद आज के दिन उन्हें यही लगना चाहिए।" मैंने गलियारे में यूसुफ़ मियाँ की तरफ़ देखा। "और तू, चाचा — तू मेरे साथ चल।"

यूसुफ़ मियाँ ने अपना सिर उठाया। उनकी आँखों में पानी था। उन्होंने कुछ कहना चाहा, पर सिर्फ़ एक शब्द निकला।

"कहाँ?"

"नीचे," मैंने कहा। "गेट के बाहर।" मैंने अपना हाथ उनकी तरफ़ बढ़ाया। "वो तेरे बेटे का काग़ज़ नहीं था, चाचा। वो तेरा था। और तूने अंगूठा नहीं लगाया था। उस काग़ज़ पर आज तक कोई अंगूठा नहीं लगा। और जो काग़ज़ खाली है, वो रद्दी नहीं, वो सबूत है।"

यूसुफ़ मियाँ ने मेरा हाथ पकड़ा।

नीचे जाते वक़्त, सीढ़ियों पर, मैंने अपनी जेब में हाथ रखा और छोटी घंटी को छुआ। वो अब भी गुनगुनी थी।

"अच्छा," मैंने मन में कहा, "तो अब वो काग़ज़ दौड़ेगा, और एक बार घूमकर रणवीर के दफ़्तर पहुँचेगा। और फिर जब लौटेगा, तब हम उसे पढ़ेंगे — नहीं, तब हम उसे राज़ की तरह नहीं, सबूत की तरह पढ़ेंगे।"

मैं सीढ़ी से नीचे उतरा।

अस्पताल के गलियारे की पीली रोशनी मेरे पीछे रह गई। गेट के बाहर असली धूप थी, असली सड़क, असली धूल।

और शाहिद वहीं खड़ा था — खाली हाथ, झुका हुआ कंधा, और उसके सामने उसका मुँह — जो कह रहा था, "मैं कुछ नहीं कर पाया, उस्ताद।"

मैंने उसके पास जाकर उसका कंधा पकड़ा।

"नहीं," मैंने कहा। "तूने काग़ज़ लौटाया। ये भी कुछ है।" मैंने उसके पापा की तरफ़ देखा जो मेरे पीछे आ रहे थे। "अब हम तीनों मिलकर एक नई बात सोचते हैं। क्योंकि काग़ज़ तो उनके पास गया, पर अंगूठा कहीं नहीं गया। और जब तक अंगूठा कहीं नहीं गया, तब तक ये अस्पताल हमारा है।"

शाहिद ने एक लंबी साँस ली।

और तभी मेरी जेब में बड़ी घंटी बोली, बहुत धीमी आवाज़ में, जैसे किसी पुराने दरवाज़े की चरचराहट में छिपी हुई हो:

"पहला सच खुला। अब दूसरा — तेरे दरवाज़े पर।"

मैंने सिर उठाया। मैंने आसमान की तरफ़ देखा।

धूप अब भी तेज़ थी।

पर मुझे लगा कि थोड़ी देर के लिए, किसी पुरानी घंटी की चुभन मेरे कान से गुज़रकर मेरे दिल तक गई और वो ये कह रही थी — "जल्दी चल, बेटा। क्योंकि जब रणवीर आदमी के अंगूठे से ज़मीन खरीदता है, तो असली चीज़ वो ज़मीन नहीं होती। असली चीज़ वो आदमी होता है।"

मैंने यूसुफ़ मियाँ को सहारा दिया और हम तीनों अस्पताल के गेट से बाहर, गली की तरफ़ चले।

रास्ते में शाहिद ने एक बार पलटकर अस्पताल की पीली दीवार देखी। उसने कुछ नहीं कहा, पर उसके होठों पर एक छोटी सी बात थी — जो मैंने खुद अपने मन में बोली थी:

"तेरे पापा बचेंगे, शाहिद। और तू उन्हें छोड़कर नहीं जाएगा। बस तू अब अपने सच को अपनी जेब में मत रखना। सच जेब में रखा रहे तो सिक्के जैसा लगता है, और जब ज़ुबान पर आ जाए, तो हथियार बन जाता है।"

और हम चल दिए।

॥

अस्पताल के गेट से बाहर निकलते ही धूप आँखों में घुस गई। अंदर की पीली रोशनी ऐसी थी जैसे किसी पुराने कमरे में रखा हुआ पानी, और बाहर की धूप ऐसी कि जैसे किसी ने मुँह पर गर्म तवा रख दिया हो।

शाहिद मेरे बगल में चल रहा था। उसके कंधे झुके हुए थे। उसके हाथ खाली थे, और खाली हाथ आदमी के चलने में एक अजीब सी आवाज़ होती है — कुछ नहीं गिरता, फिर भी लगता है कुछ गिर गया।

यूसुफ़ मियाँ मेरे दूसरी तरफ़ थे। रज्जो बाई पीछे थीं। और मैं सोच रहा था कि अगर ये सारी गली एक दिन मिलकर कुछ तय कर ले, तो हमें किसी सफ़ेद गाड़ी से डरने की ज़रूरत नहीं रहेगी — पर फिर मैंने खुद को टोका। तय करना आसान है, निभाना मुश्किल।

गेट के बाहर, दस कदम पर, नीम के पेड़ के नीचे, एक मोटा आदमी खड़ा था।

मैं उसे पहचानता नहीं था। पर जिस तरह वो खड़ा था, उससे पता चल रहा था कि वो यहाँ पहले से रुका हुआ है, और हमारा ही इंतज़ार कर रहा है।

मोटा शरीर। गले में मोटी सोने की चेन, जो उसकी गर्दन में ऐसे बैठी थी जैसे किसी को गले में रस्सी बाँध दी गई हो। पीली कमीज़ के ऊपर काला कोट इस गर्मी में। और मुँह में पान की पीक, जिसे वो ऐसे घुमा रहा था जैसे कोई गुटका हो, जिससे बात करने में ज़ोर लगता हो।

उसने हमें देखा। पहले शाहिद को देखा। फिर उसके खाली हाथ देखे। और उसके चेहरे पर वो हँसी आई जो मुझे सबसे ज़्यादा चुभती है — जिसमें गुस्सा नहीं होता, मज़ाक होता है।

"अरे," उसने कहा, पान की पीक पैर के पास थूककर, "खाली हाथ?"

शाहिद ने अपना सिर नीचे कर लिया।

"काग़ज़ कहाँ है, बेटा?" आदमी ने दो कदम आगे बढ़कर कहा। "जो दिया था, वो अपने साथ लाया था ना? तो अब कहाँ गया? बीच में किसी को दे आया क्या?"

"वो… वो आपके आदमी ही ले गए," शाहिद ने धीरे से कहा।

"मेरा आदमी?" आदमी हँसा। उसकी हँसी मोटी थी, जैसे कोई थैला फट रहा हो। "मेरा आदमी तुम्हारे जेब से थोड़े लेगा। मेरा आदमी तुम्हारे हाथ से लेगा। हाथ से। जब तुम देओगे।"

तभी पीछे से चप्पलों की आवाज़ आई।

रज्जो बाई।

वो अपना बैग कंधे पर लटकाए, साड़ी का पल्लू कमर में खोंसती हुई, सीधी उस आदमी के सामने आकर खड़ी हो गईं। उनकी आँखें लाल थीं। अस्पताल के अंदर ये लाल नहीं थीं। अंदर वो बस सख्त थीं, जैसे कोई दीवार जिसे गिरना नहीं है। पर बाहर आते ही — शायद धूप से, शायद अपने बेटे के झुके कंधों से — वो लाल हो गईं।

"तू," उन्होंने उस आदमी की तरफ़ उँगली उठाई, "तू अपना मुँह संभालके रख। मेरा बेटा यहाँ अपने बाप के अंगूठे का सौदा करने नहीं आया है।"

आदमी ने पान चबाते हुए उन्हें देखा। फिर बोला, बड़ी मीठी आवाज़ में, "अरे बाई जी, सौदा तो तुम्हारा बेटा खुद कर रहा है। हम तो बस काग़ज़ माँग रहे हैं। काग़ज़ जो खुद आया था। खुद के पैरों से।"

"चुप कर!" रज्जो बाई की आवाज़ ऊँची हो गई। "बारह दिन पहले किसने मेरे बेटे को साइट पर बुलाया था? किसने उसे पक्की नौकरी का सपना दिखाया? किसने उसके हाथ में वो पीला काग़ज़ थमाया?"

"उसका जवाब सुनना है?" आदमी ने मेरी तरफ़ देखा, जैसे मैं कोई जज हूँ। "जवाब ये है कि उसका हाथ आगे बढ़ा था, और काग़ज़ उसने लिया था। हमने नहीं थमाया, हमने सिर्फ़ दिखाया।"

मुझे लगा मेरी जेब में छोटी घंटी हिली। नहीं हिली। बस मुझे लगा।

"ठीक है," आदमी ने हाथ हिलाया, "इतनी बहस से कुछ नहीं होगा। मैं बता दूँ, बाई जी, साहब ने मशीन का वक़्त पक्का कर दिया है। दो दिन बाद सुबह, सात बजे, यहाँ के पीछे वाले प्लॉट पर मशीन खड़ी होगी। उससे पहले तुम्हारा बूढ़ा यहाँ से उठ जाए, तो अच्छा है। नहीं तो मशीन खुद उठा देगी।" उसने अस्पताल की पीली दीवार की तरफ़ सिर हिलाया। "दो दिन में ये दीवार ज़मीन पर आएगी। और अगर साहब की मेहरबानी हो गई, तो बच्चा ज़िंदा बच जाएगा।"

"तू…" रज्जो बाई की आवाज़ फँस गई।

"मैं कुछ नहीं," आदमी ने कहा। "मैं तो यहाँ हिसाब लेने आया हूँ।" उसने शाहिद की तरफ़ उँगली उठाई। "ये सुन ले, बेटा। काग़ज़ लेकर आएगा, तो तेरी नौकरी पक्की, और तेरे बाप का इलाज भी साहब के खाते से। ठीक से सुन — साहब के खाते से। नहीं तो दोनों बाहर। बाप यहाँ से, और तू साइट से।"

शाहिद का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उसने एक बार अपनी माँ की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़, फिर ज़मीन की तरफ़।

और रज्जो बाई ने वो किया जो गली की औरतें करती हैं जब शब्द खत्म हो जाते हैं।

उन्होंने अपनी चप्पल पैर से निकाली।

हाथ में उठाई।

और उस आदमी की तरफ़ बढ़ गईं।

"रुक जा, रज्जो!" मैंने कहा, पर मेरी आवाज़ कमज़ोर थी, क्योंकि मन में मैं भी उसे एक चप्पल मारना चाहता था।

"मेरे बेटे को बाप के अंगूठे का सौदागर मत बना!" वो चिल्लाईं, चप्पल हवा में। "मेरे बेटे के हाथ काँपते हैं — तुझे पता है क्यों काँपते हैं? क्योंकि वो तेरे जैसा नहीं है। वो अपने बाप से डरता है, और तेरे जैसे लोग उसी डर पर कुर्सी बनाकर बैठ जाते हैं।"

आदमी ने एक हाथ से उनकी कलाई पकड़ी। बड़ी आसानी से। जैसे कोई पंखा पकड़ ले। वो मुस्कुराया, और उस मुस्कान में पान की लाली थी।

"बाई जी," उसने कहा, "हाथ रखो। ये आदमी बेचने आया है, मैं नहीं। और इस गली में अगर कुछ बिकना है, तो बिकेगा। मैं तो सिर्फ़ काग़ज़ लेने वाला मुहर्रिर हूँ।"

मैंने आगे बढ़कर रज्जो बाई का हाथ पकड़ा और उन्हें हल्के से पीछे किया। फिर अपने हाथ से उस आदमी की कलाई छुड़ाई। बड़ी नरमी से, पर साफ़ इशारे में।

"इतना ज़ोर मत लगाइए," मैंने कहा। "ये अस्पताल का गेट है, आपकी साइट नहीं।"

आदमी ने मेरी तरफ़ देखा। पहली बार गौर से।

"तू कौन है?"

"मैं तो मिस्त्री हूँ," मैंने कहा। "साइकिल ठीक करता हूँ। तेरे जैसे लोगों की खुद की चीज़ें बड़ी जल्दी टूट जाती हैं, पता है? चेन टूट जाती है, जूता फट जाता है, काग़ज़ के किनारे जल जाते हैं।"

उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखें सिकुड़ीं। फिर वो हँसा।

"अच्छा," उसने कहा, "तू ही है।"

"ही है क्या?"

"शंकर यादव का बेटा।"

मेरे भीतर कुछ ठंडा हुआ। ज़ुबान पर कई बातें आईं। मैंने कुछ नहीं कहा। बस शाहिद की तरफ़ बढ़कर उसकी कलाई पकड़ ली। उसकी नब्ज़ बहुत तेज़ चल रही थी, जैसे घुटने पर पट्टी बाँधी हो किसी की।

मैंने उसके कान के पास धीरे से कहा, "भागने से काग़ज़ नहीं बचता, शाहिद। और हाथ काँप रहा है तो सच बोल दे। सच बोलने से हाथ कम काँपता है। मैंने आज़माया है।"

शाहिद ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो डर था जो इंसान को बच्चा बना देता है। और मैं उसे पहचानता था। क्योंकि वो मेरे भीतर भी बैठा हुआ है, हर वक़्त, बस मैं उसे हँसी से ढक देता हूँ।

"उस्ताद," उसने कहा, "मैंने वो काग़ज़…"

"अभी नहीं," मैंने कहा। "अभी तेरी माँ खड़ी है।"

तभी पीछे से तेज़ क़दमों की आवाज़ आई।

काजल।

सफ़ेद कोट में। दौड़कर आ रही थी, सीढ़ियों से उतरकर, गलियारे से बाहर। कोट उसके शरीर से बड़ा था, आस्तीनें मोड़ी हुई थीं, गले में स्टेथोस्कोप लटक रहा था — वो पुराना वाला, जिसकी रबर की नली पर टेप लिपटा हुआ है। दौड़ते हुए वो ऐसी लग रही थी जैसे कोई बच्ची डॉक्टर का कपड़ा पहनकर खेल रही हो। पर उसका चेहरा बच्ची का नहीं था।

"भैया!" उसने गेट पर ही आवाज़ दी। "डॉक्टर साहब ने बुलाया है। यूसुफ़ मियाँ की साँस फिर भारी हो गई है। ऊपर आ जाओ। जल्दी।"

मैंने यूसुफ़ मियाँ की तरफ़ देखा। वो मेरे हाथ पर टिके हुए थे, और उनकी छाती ऊपर-नीचे हो रही थी, जैसे कोई पुराना पंप धक्का लगाकर चल रहा हो। उनके होंठ खुले थे।

"चाचा," मैंने कहा, "सुन रहे हो?"

उन्होंने सिर हिलाया। बोले नहीं।

"ठीक है," मैंने कहा। "हम अंदर चलते हैं।"

पर तभी वो मोटा आदमी बोला।

"अरे रुक।" उसकी आवाज़ बदल गई थी। हँसी नहीं थी। सिर्फ़ काम की आवाज़। "तू शंकर यादव का बेटा है ना?"

मैं रुका, पर पलटा नहीं।

"साहब ने पहले ही बता दिया था," उसने कहा। "कहा था कि आज यहाँ शंकर यादव का बेटा भी आएगा। उसका काग़ज़ भी तैयार रखना।" उसने जेब से एक छोटी सी पर्ची निकाली, देखी, फिर जेब में वापस डाल दी। "तो सुन ले। तेरे पापा का काग़ज़ भी तैयार है। दो महीने पहले का। उनका अंगूठा उसमें सूख चुका है। नया काग़ज़ भी है। तेरे नाम का भी है।"

मेरा गला सूख गया।

मैंने अपने होंठ कसे। मुस्कुराने की कोशिश की। मुस्कान आई नहीं। तो मैंने सीधा जवाब दिया।

"काग़ज़ बहुत है तुम्हारे पास," मैंने कहा। "पर अंगूठा कहीं नहीं है।"

वो हँसा।

"अंगूठा बहुत है," उसने कहा। "अंगूठे की कमी नहीं। बस हाथ ढूँढ़ने पड़ते हैं।"

वो मुड़ा। उसने अपना कोट ठीक किया, पान की पीक फिर थूकी — इस बार नीम की जड़ पर — और चल दिया।

पर पाँच कदम जाकर वो फिर रुका।

वो पलटा। मुझे देखा।

"अच्छा, एक बात," उसने कहा, "साहब ने ये भी कहा था — कि तू घंटी वाला है।"

मेरे भीतर की सारी हवा जम गई।

"घंटी वाले को बोल देना," उसने मुस्कुराते हुए कहा, "कि घंटी अच्छी चीज़ है। घंटी बजती है तो आवाज़ आती है। और आवाज़ वाले आदमी को ढूँढ़ना आसान होता है।" उसने अपना हाथ उठाया, जैसे कोई आशीर्वाद दे रहा हो। "बाकी, तेरे पापा का काग़ज़ कब लेना है, बता देना। साहब आजकल फ्री में काम नहीं करते।"

वो चल दिया।

उसके जाने की आवाज़ — भारी जूते, धूल, फिर सड़क — सब पीछे छूट गई।

मैं कुछ देर वहीं खड़ा रहा।

रज्जो बाई मेरी बगल में थीं, चप्पल अब भी हाथ में थी। शाहिद ने उनका हाथ देखा, और उन्होंने शर्म से चप्पल ज़मीन पर रख दी, पैर में डाली — पर पैर सही जगह पर नहीं गया। वो दोबारा पहन रही थीं।

काजल ने मेरा हाथ पकड़ा। "भैया, चलो ना। डॉक्टर साहब दोबारा बुला रहे हैं।"

"हाँ," मैंने कहा।

और तभी जेब में बड़ी घंटी बोली।

वो ठंडी थी। इतनी ठंडी कि मुझे लगा बर्फ़ का टुकड़ा जेब में रख दिया गया है। और उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि मैंने पहले सोचा कि मैंने सुना नहीं, गुज़र गई।

"काग़ज़ नहीं। बेटा टूटा है।"

मैंने साँस रोक ली।

"और तू खुद उसी काग़ज़ में लिखा हुआ है।"

फिर चुप्पी।

मैंने आँखें बंद कीं।

धूप सिर पर पड़ रही थी। गेट के अंदर से अब भी वो पीली रोशनी आ रही थी, और दूर कहीं अस्पताल के भीतर कोई स्ट्रेचर खड़खड़ा रहा था। शाहिद की साँस मेरे कंधे के पास चल रही थी, तेज़ और छोटी। रज्जो बाई कुछ बुदबुदा रही थीं — मुझे सिर्फ़ "मेरे बेटे" सुनाई दिया।

मैंने आँखें खोलीं।

"शाहिद," मैंने कहा।

"हाँ, उस्ताद।"

"तेरे पापा की साँस भारी है। तू पहले अंदर जा। उनके सिरहाने बैठ। और जब डॉक्टर साहब कुछ पूछें, तो तू सच बोलना — जो भी हो, चाहे मेरे बारे में हो, चाहे तेरे बारे में हो।"

"और बाहर?"

"बाहर मैं देख लूँगा," मैंने कहा। "जो तेरे हाथ से गया, वो तेरे हाथ की गलती नहीं थी। वो मेरी गलती थी। मुझे उस वक़्त तेरी कलाई पकड़कर खींच लेना चाहिए था।"

"उस्ताद, आपकी…"

"जा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ थोड़ी सख्त हुई। "जा, शाहिद। तेरे पापा इस वक़्त माँग रहे हैं, उस्ताद नहीं।"

वो दौड़कर अंदर गया। मैंने उसे सीढ़ियों पर जाते देखा — एक झुका हुआ कंधा, एक छोटी सी गठरी, और सफ़ेद कोट में काजल उसके पीछे-पीछे।

रज्जो बाई मेरे पास खड़ी रह गईं।

"बेटा," उन्होंने कहा, "उस आदमी ने जो कहा…"

"मैं जानता हूँ," मैंने कहा।

"नहीं, तुम नहीं जानते।" उन्होंने मेरा कंधा पकड़ा। उनके हाथ में झाड़ू चलाने की मेहनत थी — खुरदुरे, सख्त। "उसने कहा कि पापा का काग़ज़ भी तैयार है। पाँच साल पहले वाले काग़ज़ की बात नहीं कर रहा था वो। नए काग़ज़ की बात कर रहा था। तुम्हारे नाम का।"

"जानता हूँ," मैंने दोहराया। और मेरी आवाज़ अब भी सुनने में बहुत शांत लग रही थी, और यही मुझे सबसे ज़्यादा डरा रहा था। क्योंकि अंदर कोई चीज़ चिल्ला रही थी, और मैं उसे चुप करा रहा था।

घंटी ने कहा था — तू खुद उसी काग़ज़ में लिखा हुआ है।

मतलब मेरा नाम उस काग़ज़ में है जिस पर अंगूठा लगना है। मतलब मैं भी बिक रहा हूँ। मतलब पापा के बाद मेरी बारी है। मतलब अस्पताल की ज़मीन का काग़ज़ अकेला नहीं है — उसके साथ एक और काग़ज़ है, जिसमें पापा का नाम है, और एक और, जिसमें मेरा है।

और उस आदमी ने कहा — घंटी वाले को बोल देना।

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। बड़ी घंटी। वो अब भी ठंडी थी।

"अच्छा," मैंने मन में उससे कहा, "तो अब तू मुझे बता — दूसरा सच मेरे दरवाज़े पर है, या मेरे नाम पर?"

घंटी चुप रही।

"सुन," मैंने कहा, "मैंने कभी आपसे झूठ नहीं बोला। डर के मारे कई बार चुप रहा हूँ, ये सच है। पर झूठ नहीं बोला। तो अब थोड़ा साफ़ बोलिए। वो काग़ज़ जिसमें मेरा नाम है — वो कहाँ है?"

घंटी ने कुछ देर ली। फिर बोली, बहुत छोटा सा वाक्य:

"जहाँ तेरा घर टूटा है।"

मैंने आँखें खोलीं।

"घर?" मैंने कहा। "घर तो ठीक है।"

घंटी बोली, "टूटा घर दीवार से नहीं दिखता।"

और चुप हो गई।

रज्जो बाई ने मेरी तरफ़ देखा। "किससे बात कर रहे हो, बेटा?"

"अपने आप से," मैंने कहा, और मुस्कुरा दिया, और ये मुस्कान इस बार आई भी। "कभी-कभी अपने आप को डाँटना पड़ता है, वरना ये बहुत बड़ा आदमी बन बैठता है।"

वो हँसीं। छोटी सी हँसी, जिसमें से डर अभी निकला नहीं था, पर आई।

"तू अजीब है," उन्होंने कहा। "तेरे पापा भी अजीब थे। वो कभी कुछ नहीं बोलते थे, और तू कभी कुछ नहीं छोड़ता।"

"हाँ," मैंने कहा। "हम दोनों मिलकर एक पूरा आदमी बनते हैं। बस हमें एक ही कमरे में बैठना नहीं आता।"

वो फिर हँसीं, और इस बार ज़्यादा।

फिर उन्होंने मेरी तरफ़ गौर से देखा।

"बेटा," उन्होंने कहा, "तू गवाही के लिए मुझ पर दबाव नहीं डालेगा, ना? तेरे पापा के ज़माने का आदमी हूँ, मुझे डर है कि मैं तेरे सामने सच बोलकर खुद को मुसीबत में डाल दूँगी।"

"नहीं," मैंने कहा। "मैं दबाव नहीं डालूँगा। बस एक बात कहूँगा — तू जब तैयार हो, तब बोल। और जब बोले, तो पूरा बोल। आधा सच, रज्जो बाई, पूरे झूठ से भी ज़्यादा महँगा पड़ता है। मैंने एक बार आधा सच बोला था, और वो आज तक मेरे पीछे चल रहा है।"

उन्होंने सिर हिलाया। कुछ नहीं बोलीं।

तभी अंदर से काजल की आवाज़ आई, गेट तक पहुँचती हुई।

"भैया! जल्दी आओ! डॉक्टर साहब कह रहे हैं कि पापा को…"

बाकी बात धूल में मिल गई।

मैं दौड़ा।

सीढ़ियाँ चढ़ते हुए मेरे जूते चरचरा रहे थे। पीली दीवारें, गलियारे की रोशनी, दरवाज़े के किनारे पर लगा वो पोस्टर — रणवीर का चेहरा, हाथ जोड़े, नीचे लिखा, नई शुरुआत, नए सपने। मैंने उस पोस्टर को देखा और मेरे मुँह से अपने आप निकला, "तेरी नई शुरुआत, हमारी पुरानी गली पर।"

कमरे में घुसा।

यूसुफ़ मियाँ बिस्तर पर लेटे थे। उनका सिर तकिये पर तिरछा था। उनके होठ खुले थे। डॉक्टर इसरानी उनके सीने पर स्टेथोस्कोप रखे झुके हुए थे, और उनका चेहरा बता रहा था कि अभी वो कुछ सोच रहे हैं और जो सोच रहे हैं वो अच्छी बात नहीं है।

शाहिद बिस्तर के पास घुटनों के बल बैठा था। उसने अपने पापा का हाथ पकड़ा हुआ था।

और मैंने देखा — उस हाथ में कुछ नहीं था। कोई काग़ज़ नहीं। कोई पीली शीट नहीं। सिर्फ़ एक बूढ़ी हथेली, और उस हथेली में पाँच झुर्रियाँ।

मैं दरवाज़े पर रुक गया।

क्योंकि मुझे लगा कि यही वो काग़ज़ है जिसकी बात घंटी कर रही थी। ये हथेली। ये झुर्रियाँ। ये आदमी जिसने अपना पूरा ज़िंदगी मज़दूरी में लगा दी और जिसके पास अब एक टूटी कुर्सी और एक बेटा है।

डॉक्टर इसरानी ने सिर उठाया। मुझे देखा।

"आओ," उन्होंने कहा। "बैठो।" उन्होंने आँखें मलीं। "मैं तुमसे एक बात कहना चाहता हूँ, और मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे बीच में रोको नहीं। मैं डॉक्टर हूँ, अंकुश। मैंने कसम खाई थी। और मैंने उस काग़ज़ को दो हफ़्ते पहले देखा था, और मैंने उसे लौटा दिया था, और मैंने खुद से कहा था कि मैंने अपनी नौकरी बचा ली।" उन्होंने यूसुफ़ मियाँ की तरफ़ देखा। "आज मुझे पता चल रहा है कि मैंने नौकरी नहीं बचाई थी। मैंने एक आदमी की साँस रोकी थी।"

कमरे में सन्नाटा था। काजल ने अपना सिर नीचे कर लिया।

मैंने एक लंबी साँस ली।

"डॉक्टर साहब," मैंने कहा, "मैं आपको रोकूँगा नहीं। पर मैं एक बात कहूँगा, और आपको बुरी लगे तो बुरी लगे।" मैंने उनकी आँखों में देखा। "आपने वो काग़ज़ लौटाया था। पर आपने अस्पताल में उसका पोस्टर लगने दिया। आपने वो कमरा लेने की बात सुनी और मना नहीं किया। ये सब एक ही काम के हिस्से हैं, साहब। जिस आदमी को काग़ज़ लौटाया जाता है, उसी आदमी को पोस्टर भी नहीं लगाने देना चाहिए।"

डॉक्टर इसरानी ने अपनी आँखें बंद कीं। और वो कुछ देर बंद ही रहीं।

फिर उन्होंने आँखें खोलीं और बोले, "तुम ठीक कह रहे हो।"

और फिर वो यूसुफ़ मियाँ की तरफ़ मुड़े।

"इनकी साँस की नली में सूजन है," उन्होंने कहा, "और दिल की धड़कन बार-बार तेज़ हो रही है। मैंने दवा बदली है। पर असली दवा ये कमरा नहीं है, अंकुश। असली दवा ये बेटा है।" उन्होंने शाहिद की तरफ़ देखा। "इनका हाथ पकड़े रहो। छोड़ना मत। मैंने कई बूढ़ों को सिर्फ़ इसलिए जाते देखा है कि उनके हाथ के पास कोई हाथ नहीं था।"

शाहिद ने अपने पापा का हाथ कसकर पकड़ लिया।

और यूसुफ़ मियाँ ने पहली बार, उस पूरे दिन में, अपनी आँखें पूरी खोलीं।

उन्होंने अपने बेटे को देखा।

फिर उन्होंने धीरे से कहा, इतना धीरे कि मुझे पास जाकर सुनना पड़ा:

"शाहिद… तेरे उस्ताद का काग़ज़… मत लेने देना।"

शाहिद सन्न रह गया।

मैं भी।

क्योंकि बूढ़ा आदमी अभी-अभी ठीक से बोलना सीखा था, और उसने पहली बात यही कही — मेरे बारे में।

मैंने अपने होंठ भींचे। मेरी आँखें जल रही थीं, और यही मेरे जीवन का सबसे बड़ा धोखा है — मैं मज़ाक करते-करते रो पड़ता हूँ और रोते-रोते मज़ाक कर देता हूँ।

"यूसुफ़ चाचा," मैंने कहा, घुटने के बल उनके पास बैठते हुए, "आप अपनी साँस मेरे काग़ज़ पर मत लगाइए। आपकी साँस अभी कीमती है। मेरा काग़ज़ अभी बना भी नहीं है।"

उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी पकड़ कमज़ोर थी, पर हिम्मत थी।

"लेकिन…" वो फुफकारे, "वो आदमी बोला था… तेरे नाम का काग़ज़…"

"वो आदमी बहुत बोलता है," मैंने कहा। "उसका काम बोलना है। हमारा काम करना है।"

मैंने उनका हाथ छोड़ा और खड़ा हुआ।

कमरे के बाहर गलियारे में, दरवाज़े के फ्रेम में, रज्जो बाई खड़ी थीं। उन्होंने सब सुना था। उनका चेहरा सूखा था, पर उनके हाथ बैग की पट्टी को इतनी ज़ोर से मरोड़ रहे थे कि पट्टी का रंग बदल रहा था।

मैं उनके पास गया।

"रज्जो बाई," मैंने धीरे से कहा, "आज शाम सभा है। तुम्हारी गवाही उस सभा में कूद जाएगी। तुम्हारे बेटे पर सबकी नज़र होगी। और वो आदमी फिर आएगा — शायद कल, शायद आज रात।"

"मुझे पता है," उन्होंने कहा।

"तो तय करो," मैंने कहा। "काश मैं तुम्हें कोई सुरक्षा दे सकता। पर मेरे पास एक घंटी है और एक दुकान।"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।

"तेरे पास गली है," उन्होंने कहा। "बस वो काफ़ी है।"

और फिर उन्होंने अपना बैग मेरी तरफ़ बढ़ाया।

"इसको रख," उन्होंने कहा। "इसमें वो पीली काग़ज़ की नक़ल है। जो रात चंद्रेश के दफ़्तर में मैंने उठाई थी। मैंने उसे कभी बाहर नहीं निकाला। मुझे डर था कि मेरे बेटे को पता चलेगा तो वो साइट पर और खतरा मोल लेगा।" उन्होंने मेरे हाथ पर बैग रखा। "अब नहीं डरती। अब मुझे लगता है कि ये काग़ज़ मेरी बजाय मेरे बेटे की रक्षा करेगा।"

मैंने बैग पकड़ा। हल्का था। और इतना भारी भी था कि मेरा हाथ झुक गया।

"ठीक है," मैंने कहा। "अब एक बात सुनो। आज रात तुम और शाहिद दोनों मेरी दुकान के पीछे वाले कमरे में सोना। वहाँ एक चारपाई है और एक लोहे की अलमारी है। अलमारी में एक ट्रंक है जिसमें मेरे औज़ार हैं। तुम्हें वो ट्रंक ही नहीं छूना है — क्योंकि उसमें एक चीज़ है जो रात को बजती है और चीज़ें बिगाड़ देती है।"

वो सीधी मेरी तरफ़ देखने लगीं।

"रात में क्या बजता है, बेटा?"

"मेरा हिसाब," मैंने कहा, और मुस्कुराया। "रात में मेरा हिसाब बजता है। मैं कमाता कम हूँ, खर्च ज़्यादा। ऐसा हिसाब सोने नहीं देता।"

वो हँसीं।

और उस हँसी में पहली बार कुछ ऐसा था जो डर से नहीं, थकान से आ रहा था। और थकी हुई हँसी सबसे सच्ची होती है।

मैं नीचे उतरा।

अस्पताल के बाहर, गेट पर, धूप थोड़ी ढल रही थी। नीम की छाया लंबी हो रही थी। और शाहिद वहीं खड़ा था — मैंने सोचा वो अंदर था, पर वो बाहर आ गया था, चुपचाप, बिना आवाज़।

"क्या हुआ?" मैंने पूछा।

"उस्ताद," उसने कहा, "वो आदमी जो बोला था… घंटी वाले को बोल देना…"

"हाँ।"

"उसने कैसे जाना कि आप घंटी वाले हैं?"

मैं कुछ देर चुप रहा।

फिर मैंने अपनी जेब से बड़ी घंटी निकाली। पीतल की घंटी, जिस पर उँगलियों के निशान जैसे पुराने नक्शे बने हुए हैं। मैंने उसे धूप में पकड़ा।

"शाहिद," मैंने कहा, "मैं इसे किसी को नहीं दिखाता। किसी को नहीं। तेरी माँ ने देखा। तूने देखा। काजल ने देखा। उस्ताद ने देखा। इन पाँच के अलावा इस गली में किसी ने इसे इस तरह, अपने हाथ में, नहीं देखा।"

"तो…?"

"तो इसका मतलब ये है," मैंने कहा, "कि जो आदमी इसे जानता है, वो इस दुकान से बहुत दूर बैठा है, और उसके पास काग़ज़ बहुत हैं। और उसके काग़ज़ों में मेरा नाम सिर्फ़ इसलिए नहीं है कि मैं शंकर यादव का बेटा हूँ। मेरा नाम उन काग़ज़ों में इसलिए है कि कोई उसे बता रहा है कि मैं क्या-क्या करता हूँ।"

शाहिद का चेहरा फिर सफ़ेद पड़ा।

"कोई… हमारे बीच से?"

"मैं नहीं जानता," मैंने सच कहा। "और आज के दिन, शाहिद, मैंने इतना ही सीखा है कि जब मैं किसी को शक करता हूँ, तो सबसे पहले अपने आप से पूछूँ कि मुझे किससे सबसे ज़्यादा डर लग रहा है। क्योंकि शक अक्सर सच नहीं होता — शक अक्सर हमारा डर होता है, जो किसी और का चेहरा पहन लेता है।"

मैंने घंटी को धीरे से हिलाया।

वो बोली।

"काग़ज़ नहीं। बेटा टूटा है।"

मैंने शाहिद की तरफ़ देखा।

"सुन रहा है?"

"हाँ," उसने कहा। "पर मुझे समझ नहीं आया।"

"मुझे भी नहीं," मैंने कहा। "पर जब समझ आएगा, तब तक के लिए एक बात याद रखना — तेरा बाप सिर्फ़ एक बीमार आदमी नहीं है। वो एक टूटा हुआ आदमी है। और टूटे हुए आदमी की सबसे बड़ी दवा यह नहीं होती कि उसे ठीक कर दिया जाए। उसकी सबसे बड़ी दवा यह होती है कि कोई उसके पास बैठ जाए और कहे — तू टूटा नहीं है, तू बस थका हुआ है।"

शाहिद ने मेरी तरफ़ देखा।

"आपने ये अपने पापा को कहा था, उस्ताद?"

मैं हँस दिया।

"नहीं," मैंने कहा। "मैंने अपने पापा से सिर्फ़ यही कहा था कि — आपने मुझे चाबी क्यों दी थी।" मैंने गले में लटकी चाबी छुई। "और अब मुझे लगता है कि मुझे उस सवाल का जवाब आज शाम मिलेगा, चाबी खोले बिना।"

मैंने घंटी जेब में रखी।

"चल," मैंने कहा, "तेरे पापा के पास चलते हैं। और फिर मैंने सोचा — आज शाम की सभा से पहले मुझे एक काम करना है। मुझे अपने घर जाना है, अपने पापा से वो सवाल पूछना है जो मैं पाँच साल से पूछना चाहता था और पूछ नहीं पाया।"

मैं मुड़ा।

और जब मैं मुड़ा, तब मेरी जेब से एक आवाज़ आई — धीमी, फुसफुसाती, जैसे कोई काग़ज़ हवा में सरक रहा हो:

"तेरा नाम इसलिए काग़ज़ में है क्योंकि तेरे पापा ने उस पर लिखवाया था।"

मेरे पैर जम गए।

"और क्यों?" मैंने पूछा, बिना हिले।

घंटी ने कहा, "क्योंकि पाँच साल पहले उस काग़ज़ पर दो नाम लिखे गए थे। एक पापा का। एक तेरा। और तेरे पापा ने सिर्फ़ अपना अंगूठा लगाया था। तेरे हिस्से की लाइन खाली छोड़ दी थी।"

मेरा गला सूख गया।

"वो लाइन आज भी खाली है?"

घंटी बोली, "आज भी खाली है।"

और फिर, बहुत धीरे, इतना धीरे कि जैसे वो खुद अपनी आवाज़ से डर रही हो:

"और तेरा पापा उसी वजह से आज तक चुप है।"

॥

मेरे पैर जम गए।

धूप सिर पर पड़ रही थी और मुझे ठंड लग रही थी। ये अजीब बात है ना — जब अंदर से ठंड लगती है, तो बाहर की धूप भी कंबल जैसी लगती है। बस फ़र्क़ इतना है कि कंबल गरम करता है, धूप सिर्फ़ चमकती है।

मैंने घंटी को जेब से निकाला।

वो चुप थी। बिल्कुल चुप। जैसे ज़्यादा बोलकर थक गई हो और अब साँस ले रही हो।

"अब समझा," मैंने धीरे से कहा। "तूने कह दिया और चुप हो गई। बड़ा आसान काम है ना तेरा। बोल दिया, और सामने वाले को छोड़ दिया जले।"

घंटी ने कुछ नहीं कहा।

रज्जो बाई ने मेरा कंधा छुआ। उनके हाथ खुरदुरे थे, झाड़ू चलाने वाले हाथ। पर उस वक़्त उनका हाथ अचानक बहुत नरम लगा।

"बेटा," उन्होंने कहा, "तेरा चेहरा देखकर लग रहा है कि तूने अभी कोई बहुत बड़ी चीज़ सुन ली है।"

"सुन ली," मैंने कहा।

"क्या?"

"कुछ नहीं," मैंने कहा। "बस इतना कि मेरे पापा पाँच साल से चुप हैं, और उस चुप्पी में मेरा भी हिस्सा है।"

रज्जो बाई मेरी तरफ़ देखती रहीं। फिर वो मेरे हाथ से घंटी लेने को आईं और मैंने हाथ पीछे कर लिया। ये मेरी आदत है। जब कोई चीज़ मेरे पास होती है और कोई उसे छूने आता है, तो मेरा हाथ अपने आप पीछे चला जाता है। पापा कहते थे कि ये लालच नहीं है, ये डर है — जो अपनी चीज़ बचा रहा हो, वो डरता है।

"माफ़ करना," मैंने कहा। "आदत है।"

"आदत नहीं है," उन्होंने कहा। "तू अभी डरा हुआ है। डरा हुआ आदमी अपनी चीज़ नहीं छोड़ता। मैं पंद्रह साल चंद्रेश सक्सेना के दफ़्तर में झाड़ू लगाते हुए यही देखती आई हूँ।"

फिर वो मेरी तरफ़ झुकीं।

"अपना बैग खोल। देख, मैं तेरे लिए क्या लाई हूँ।"

मैंने उनका बैग खोला।

उसमें कपड़े थे, एक पुराना रुमाल, कुछ चीनी की गोलियाँ, और उन सबके नीचे मुड़ा हुआ एक काग़ज़।

मैंने वो काग़ज़ निकाला।

वो पीला था। हाथ से लिखा हुआ नहीं था — छपा हुआ था, पर उसकी छपाई ऐसी थी जैसे मशीन ने बहुत जल्दी में छापा हो। कुछ शब्द धुँधले, कुछ जगह स्याही फैली हुई, और किनारे पर एक कोना फटा हुआ — जैसे किसी ने जल्दी में खींचकर निकाला हो।

मैंने उसे धूप की तरफ़ उठाया।

और जो मैंने देखा, उससे मेरे हाथ ठंडे हो गए।

ऊपर भारद्वाज कंस्ट्रक्शन की नीली मोहर थी। नीचे बहुत छोटे अक्षरों में कुछ लिखा था। पर मेरी नज़र पहले उस शब्द पर गई जो उस काग़ज़ के बीच में बड़ा छपा था, और वो शब्द था — "साइकिल गली"।

और उसके नीचे, बहुत छोटे अक्षरों में — "पुराना बोर्ड वाली दुकान"।

मैंने आँखें सिकोड़कर पढ़ा। शब्द फटे हुए थे, पर जोड़कर पढ़े जा सकते थे।

"दुकान का पुराना नाम — शंकर यादव और बेटे।"

मैं वहीं खड़ा रह गया। धूप, सड़क, नीम का पेड़, दूर कहीं ट्रक का हॉर्न — सब दूर हो गया। सिर्फ़ वो एक लाइन बची — "शंकर यादव और बेटे।"

मेरा नाम काग़ज़ में था।

पर वो मेरा नाम नहीं था।

वो "बेटे" था।

दो अक्षर। ब, े, ट, े। बस। कोई पूरा नाम नहीं, कोई उम्र नहीं, कोई अंगूठा नहीं। सिर्फ़ "और बेटे"।

और मेरे हाथ काँपने लगे, क्योंकि अब मुझे समझ आ रहा था कि घंटी ने यह क्यों कहा कि मेरे हिस्से की लाइन खाली छोड़ दी गई थी।

पापा ने दुकान का नाम उस काग़ज़ पर डाला था, और उसमें बेटे का हिस्सा ऐसा लिखा था कि उस पर अंगूठा लगे बिना काग़ज़ पूरा न हो। और पापा ने वो अंगूठा नहीं लगवाया। उन्होंने अपना लगाया — और मेरा हिस्सा खाली छोड़ दिया।

मतलब — उन्होंने मुझे उस काग़ज़ से बाहर रखा। जानबूझकर। जैसे कोई आदमी अपने बेटे को जलते घर से बाहर धकेल दे और ख़ुद अंदर बंद हो जाए।

"बेटा?" रज्जो बाई ने कहा। "क्या हुआ? तेरा रंग उड़ गया।"

"रज्जो बाई," मैंने कहा, "ये काग़ज़ तुमने कब उठाया था?"

"पाँच साल पहले," उन्होंने कहा। "उस रात के बाद, जब तेरे पापा का अंगूठा लिया गया था। मैंने सोचा, अगर कल को कोई पूछे कि क्या हुआ था, तो मेरे पास कुछ होना चाहिए। मैं पढ़ी नहीं हूँ। पर मैं जानती हूँ कि काग़ज़ कितना भारी होता है।"

"तुमने इसे किसी को दिखाया?"

"किसी को नहीं," उन्होंने कहा। "पंद्रह साल झाड़ू लगाते हुए इतना तो सीख ही लिया कि कौन सी चीज़ फर्श पर रहनी चाहिए और कौन सी जेब में।"

मैंने वो काग़ज़ मोड़ा और अपनी जेब में रखा।

"ये सबूत नहीं है," मैंने कहा। "ये नक़ल है। असली काग़ज़ उनके पास है।"

"तो?"

"तो," मैंने कहा, "ये नक़ल मुझे बता रही है कि वो असली काग़ज़ किस बारे में है। और मुझे ये भी बता रही है कि मेरे पापा ने मुझे किस चीज़ से बचाया है।"

मैंने एक गहरी साँस ली।

और फिर मैं मुड़ा, और अंदर चला।

शाहिद और यूसुफ़ मियाँ दोनों मेरी तरफ़ देख रहे थे। यूसुफ़ मियाँ बिस्तर पर थे, आधे लेटे, आधे उठे। उनकी साँस की आवाज़ कमरे में सबसे तेज़ चीज़ थी — जैसे कोई पुराना पंखा चल रहा हो, जिसकी बेल्ट ढीली हो गई हो।

"शाहिद," मैंने कहा। "अंदर आ।"

"उस्ताद, पापा ठीक नहीं हैं, उन्हें आराम—"

"अंदर आ," मैंने दोहराया। "और तू भी," मैंने यूसुफ़ मियाँ से कहा। "बस बैठे रहिए। लेटिए मत।"

डॉक्टर इसरानी दरवाज़े पर आए। उनके हाथ में वही पुराना स्टेथोस्कोप था, जिसकी नली पर टेप लिपटा हुआ था। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।

"अंकुश," उन्होंने कहा, "मैं जानता हूँ तू क्या करने आया है। पर मैं तुझे बता दूँ — ये कमरा अस्पताल का है। यहाँ मरीज़ की साँस पहले है।"

"मैं भी यही कर रहा हूँ," मैंने कहा।

"क्या?"

"यूसुफ़ मियाँ की साँस रुकी हुई है," मैंने कहा। "दवा उसे रोक नहीं पा रही, क्योंकि असली रुकावट दवा वाली जगह पर नहीं है। वो यहाँ है।" मैंने शाहिद की तरफ़ और फिर यूसुफ़ मियाँ की तरफ़ देखा। "इन दोनों के बीच।"

डॉक्टर इसरानी कुछ कहने को हुए, फिर रुक गए।

"तू डॉक्टर नहीं है," उन्होंने धीरे से कहा।

"नहीं हूँ," मैंने कहा। "मैं मिस्त्री हूँ। और मिस्त्री का काम यही है — जहाँ से आवाज़ आ रही हो, उसे ढूँढ़ना।"

मैंने शाहिद की तरफ़ देखा।

"शाहिद, तेरे पापा की कुर्सी का पहिया टूटा है। मैं उसे ठीक कर सकता हूँ। मेरे पास औज़ार है, मेरे पास तेल है, मेरे पास वो छोटी बॉल बियरिंग भी है जो मुझे पिछले हफ़्ते टिंकू ने दी थी और जिसे मैंने अब तक किसी काम में नहीं लगाया।"

शाहिद ने सिर हिलाया। उसकी आँखों में उम्मीद आई।

"पर," मैंने कहा, "पहिया नहीं। पहले तुम दोनों की आवाज़ जुड़ेगी।"

कमरा चुप हो गया।

"क्या मतलब?" शाहिद ने कहा।

"मतलब ये कि अगर मैं आज ये पहिया लगा भी दूँ, तो कल फिर टूट जाएगा," मैंने कहा। "क्योंकि तू और तेरे पापा — तुम दोनों की आवाज़ें अभी अलग-अलग कमरों में रह रही हैं, एक ही कमरे में होकर भी।"

शाहिद ने हाथ जेब में डाले। फिर निकाले। फिर माथा पोंछा।

"उस्ताद," उसने कहा, "मैंने कुछ नहीं किया।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"मैंने सच में कुछ नहीं किया," उसने कहा, और उसकी आवाज़ थोड़ी ऊँची हो गई। "मैं तो बस काग़ज़ लेकर आया था। मुझे क्या पता था कि इसमें क्या लिखा है? मैं तो पढ़ भी नहीं पाया पूरा। मैंने सिर्फ़ सोचा कि पापा का इलाज मुफ़्त हो जाएगा, पैसे नहीं लगेंगे, और मेरी नौकरी भी पक्की हो जाएगी। बस इतना। बस इतना सोचा था मैंने।"

"और अब?"

"अब क्या?"

"अब क्या सोच रहा है?"

शाहिद ने नीचे देखा।

"अब मुझे डर लग रहा है," उसने कहा।

"किससे?"

"इससे कि पापा ठीक हो गए तो पता चलेगा कि मैंने क्या किया," उसने कहा। "और अगर ठीक नहीं हुए तो… तो भी पता चलेगा। दोनों तरफ़ मैं फँसा हूँ।"

मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।

"शाहिद," मैंने कहा, "मैं तुझे एक बात बता दूँ। आज मैं झूठ नहीं बोलूँगा।"

"क्यों?"

"क्योंकि मैं अभी मरम्मत कर रहा हूँ," मैंने कहा। "और जो आदमी मरम्मत करता है, वो मरम्मत के वक़्त झूठ नहीं बोल सकता। मेरे लिए ये नियम है। अगर मैंने झूठ बोला, तो मेरा सारा हिसाब शून्य हो जाएगा। इसलिए मैं तुझे सच बताऊँगा, चाहे वो कड़वा हो।"

शाहिद ने आँखें उठाईं।

"तो… तो क्या मेरे पापा बचेंगे?"

मेरा गला सूखा।

यही वो सवाल है, जिससे मैं हमेशा डरता हूँ। हर वो आदमी जो किसी बीमार के पास बैठा हो, यही सवाल पूछता है — और सच ये है कि कोई भी, जिसके हाथ में औज़ार हो, या स्टेथोस्कोप हो, या घंटी हो, उसका जवाब नहीं दे सकता।

"नहीं," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ अपनी ही कानों में अजनबी लगी। "मुझे यक़ीन नहीं है।"

शाहिद की आँखें भर आईं।

"पर मैं ये भी नहीं कहूँगा कि वो नहीं बचेंगे," मैंने कहा। "क्योंकि मुझे वो भी नहीं पता। और जो मुझे नहीं पता, उसे मैं बोलकर अपने हाथ ख़राब नहीं करूँगा।"

"तो फिर आप क्या जानते हैं?"

"मैं सिर्फ़ इतना जानता हूँ," मैंने कहा, "कि तेरे पापा की साँस आज सुबह से दो बार भारी हुई है। और दोनों बार ऐसा तब हुआ जब तेरी माँ की बात आई, या तेरी नौकरी की बात आई।"

डॉक्टर इसरानी ने धीरे से सिर हिलाया। उन्होंने पहली बार कुछ नहीं कहा। बस देखते रहे।

"और अब," मैंने कहा, "तू मुझे बता — तुझे अपने पापा से क्या डर लगता है?"

शाहिद ने मुँह खोला, बंद किया।

"मैं नहीं—"

"शाहिद," मैंने कहा, "मैंने अभी कहा था कि मैं झूठ नहीं बोलूँगा। इसलिए तू भी मत बोल। मैंने देखा है कि झूठ बोलने वाले का हिसाब भी बिगड़ जाता है, और झूठ के बाद आदमी के पास बचता क्या है? सिर्फ़ चुप्पी। और चुप्पी वो चीज़ है जिसने मेरे घर में पाँच साल पहले घुसकर आज तक दरवाज़ा नहीं छोड़ा।"

शाहिद ने हाथ से आँखें ढक लीं।

और फिर, बिस्तर से, यूसुफ़ मियाँ बोले।

उनकी आवाज़ बहुत धीमी थी, फटी हुई, जैसे पुराने रेडियो की आवाज़ जो दूर से आ रही हो।

"मुझे यह डर लगता है," उन्होंने कहा, "कि यह बेटा बड़ा होकर मुझे छोड़कर चला जाएगा।"

कमरे में जैसे किसी ने ठहरा हुआ हवा का पंखा चला दिया।

"मैं रात भर सो नहीं पाता," यूसुफ़ मियाँ ने कहा। "कुर्सी की पहिया चरचराती है, और मैं सुनता रहता हूँ कि क्या ये उठकर बाहर जा रहा है। एक बार ये आधी रात को उठकर दरवाज़ा बंद करने गया था। मैंने सोचा, बस, अब चला, अब नहीं लौटेगा। मैं बैठा रहा, सुबह तक, पलंग पर, चादर पकड़कर। ये तीन बजे लौटा। बोला कि बाहर कुत्ते भौंक रहे थे और उसने दरवाज़ा देखकर बंद किया।"

वो रुके। उनकी साँस की आवाज़ तेज़ हुई।

"मैं उस दिन से रात को कुर्सी हिलाकर देखता हूँ," उन्होंने कहा, "कि कहीं ये जाने की तैयारी में तो नहीं।"

शाहिद ने हाथ आँखों से हटाया।

"पापा," उसने कहा, "मैं कहाँ जाऊँगा?"

"वही तो डर है," यूसुफ़ मियाँ ने कहा। "तू बड़ा है। तेरे हाथ-पैर ठीक हैं, मेरे नहीं हैं। तुझे नौकरी मिलेगी अच्छी, तू दूसरी जगह रहेगा, कभी-कभी आएगा, ठीक है। पर मैं… मैं इस कुर्सी पर बैठा इंतज़ार करता रहूँगा। और वो इंतज़ार मुझे खा जाएगा।"

शाहिद की आवाज़ काँपी।

"और मैं," उसने कहा, "मैं डरता हूँ कि आप मर गए तो—"

वो रुक गया। जैसे शब्द मुँह में ही अटक गए।

"बोल," यूसुफ़ मियाँ ने कहा।

"मुझे डर है," शाहिद ने रोते हुए कहा, "कि आप मर गए तो ये मकान का किराया कौन देगा, और मेरी नौकरी क्या होगी, और मुझे कौन सिखाएगा कि फड़ देखकर बीमारी कैसे पहचानते हैं, और माँ की याद किसके पास रहेगी। मुझे डर है कि आपके जाने के बाद मैं अकेला नहीं रहूँगा — मैं अधूरा रह जाऊँगा। आधा। जैसे कोई साइकिल जिसका एक पहिया निकाल दिया गया हो और उसे सिर्फ़ इसलिए खड़ा रखा गया हो कि गिर न जाए।"

यूसुफ़ मियाँ ने उसकी तरफ़ देखा।

और फिर वो कुछ ऐसा हुए जो मैंने उस कमरे में पहले कभी नहीं देखा था।

यूसुफ़ मियाँ ने अपना हाथ उठाया। बहुत मुश्किल से, बहुत धीरे, जैसे कोई पुराना दरवाज़ा अपने आप खुल रहा हो। और उन्होंने अपने बेटे का सिर पकड़ लिया।

"तू अधूरा नहीं है," उन्होंने कहा। "तू मेरा बेटा है। और मेरी एक ही चीज़ है दुनिया में। ये कुर्सी जाए तो जाए, ये कमरा जाए तो जाए। तू जाता है तो मैं सच में मर जाऊँगा। मरना बीमारी से नहीं होता, बेटा। मरना तब होता है जब कोई तेरे पास बैठना बंद कर दे।"

शाहिद ने उनका हाथ पकड़ लिया और उनके हाथ पर सिर रखकर रोने लगा।

और मैं वहीं खड़ा था, और मुझे लगा कि मेरे अंदर कहीं कोई पुरानी लकीर खिंच गई है — वो लकीर जो पापा और मेरे बीच भी है। मुझे लगा कि सामने ये बाप-बेटा नहीं, पापा और मैं बैठे हैं। और मैं वहीं खड़ा हूँ, हाथ में औज़ार लिए, और समझ नहीं पा रहा कि कहाँ से शुरू करूँ।

रज्जो बाई दरवाज़े के पास खड़ी थीं। उन्होंने अपना पल्लू आँखों पर रख लिया।

डॉक्टर इसरानी ने खिड़की की तरफ़ मुँह कर लिया।

और दरवाज़े पर, सफ़ेद कोट में, काजल खड़ी थी — हाथ में पुराना स्टेथोस्कोप, आँखें भरी हुईं।

शाहिद ने रोते-रोते अपनी जेब से वो पीला काग़ज़ निकाला, जो उसने बबलू से लेकर छिपाया था — कुचला हुआ, मुड़ा हुआ, कोने से फटा हुआ।

"ये," उसने कहा, और अपनी आवाज़ फाड़कर बोला, "ये मेरे काम का नहीं है।"

और उसने उसे बीच से फाड़ दिया।

एक बार। फिर दूसरी बार। फिर तीसरी बार।

काग़ज़ के टुकड़े हवा में उड़े और बिस्तर पर, फर्श पर, और यूसुफ़ मियाँ की चादर पर गिरे।

"शाहिद!" डॉक्टर इसरानी ने कहा। "वो सबूत था—"

"सबूत नहीं था," मैंने कहा। "जाल था।"

मैंने झुककर एक टुकड़ा उठाया। उस पर सिर्फ़ "तीस दिन" लिखा था।

"सबूत असली काग़ज़ होता है," मैंने कहा। "और असली काग़ज़ उनके पास है। जो फटा, वो उनका दिया हुआ डर था। डर को फाड़ना अच्छा काम है।"

तभी मेरी जेब में घंटी गरम हुई।

ठंडी नहीं। गरम। जैसे किसी ने उसे धूप में रख दिया हो।

मैंने उसे निकाला और वो अपने आप बजी — एक बार, साफ़, तेज़, ऐसी आवाज़ जो कमरे के कोनों तक गई और खिड़की के शीशे पर अटक गई।

"साफ़ हिसाब," घंटी ने कहा। "एक ही है। दो सौ अठाईस।"

मैंने आँखें सिकोड़ीं।

"पर तूने पहले एक सौ अठासी कहा था," मैंने कहा। "फिर दो सौ अठाईस। फिर एक सौ बीस। मैं हिसाब लिखता हूँ, और मेरा हिसाब कभी इतना बिगड़ा नहीं।"

"हिसाब नहीं बिगड़ा था," घंटी ने कहा। "तेरा डर हिसाब में घुस गया था। डर हिसाब की कॉपी में बैठ जाए तो हर जोड़ गलत निकलता है। अब डर बाहर निकला। साफ़ हिसाब दो सौ अठाईस।"

मैंने धीरे से साँस छोड़ी।

"और अब?"

"अब जोड़ बयालीस का जुड़ा," घंटी ने कहा। "दो सौ सत्तर।"

मैंने घंटी को हथेली में दबाया और आँखें बंद कर लीं।

दो सौ सत्तर।

मुझे नहीं पता कि ये आँकड़े किस तराज़ू पर तोले जाते हैं। मुझे नहीं पता कि इनका कोई मोल है भी या नहीं। पर उस वक़्त, उस कमरे में, मुझे लगा कि ये आँकड़े वो नहीं हैं जो मैंने कमाए हैं। ये वो हैं जो लोगों ने मुझे दिए हैं — अपनी चुप्पी तोड़कर, अपना डर कहकर, अपना हाथ बढ़ाकर।

मैंने आँखें खोलीं।

"अब पहिया," मैंने कहा।

शाहिद ने मुझे देखा, आँखें सूजी हुईं।

"अभी?"

"अभी।"

मैंने अपना बैग खोला। उसमें से टिंकू की दी हुई छोटी बॉल बियरिंग निकाली। फिर रिंच। फिर वो छोटी सी कील जो हमेशा काम आती है।

"शाहिद, कुर्सी को थोड़ा आगे खींच।"

उसने खींचा। पहिया चरचराया। वो आवाज़ — ठीक वैसी, जैसी उस रात पत्थर के टैंक के पास बॉल बियरिंग की आवाज़ आई थी, जब मैंने पहली बार सोचा था कि भूत है। मैं मुस्कुरा दिया। कितना बेवकूफ़ था मैं उस रात। और कितना अच्छा लग रहा है आज वही आवाज़ सुनकर।

मैंने पहिये का ढक्कन खोला। चरचराती बियरिंग उसमें बैठी थी, जंग खाई हुई, दाने टूटे हुए।

"रज्जो बाई," मैंने कहा, "दो मिनट पानी ले आइए।"

वो भागीं। लाईं। मैंने ढक्कन साफ़ किया, अंदर जमी जंग को आराम से निकाला, नई बियरिंग डाली, हल्का तेल डाला, और ढक्कन बंद करके पहिये को घुमाया।

पहिया घूमा।

एक बार। दो बार। तीन बार। बिना आवाज़। बिना चरचराहट। बिना किसी रुकावट के।

शाहिद ने देखा और उसकी साँस रुक गई।

"पापा," उसने कहा, "देखिए। बिल्कुल चुप है।"

और यूसुफ़ मियाँ ने, पहली बार, मुझे नहीं पता कितने सालों में, हँसा।

वो हँसी अजीब थी — टूटी हुई, फूटी हुई, जैसे कोई पुरानी मशीन चलना भूल गई हो और अचानक चल पड़े। पहले उनका गला हिला, फिर कंधे, फिर आँखों से पानी आया, और वो हँसते रहे, बस थोड़ी देर।

"मिस्त्री हो कि जादूगर," उन्होंने कहा।

"मिस्त्री," मैंने कहा। "जादूगर होता तो पहले अपना हिसाब ठीक कर लेता।"

काजल ने दरवाज़े से कहा, "उस्ताद, बाहर बच्चे खड़े हैं। सानिया कह रही है कि गली से तीन ट्रक आए हैं।"

"कहाँ से?"

"पुराने बिजलीघर की तरफ़ से।"

मेरा चेहरा सख़्त हो गया।

"दो दिन," मैंने धीरे से कहा। "मशीन सुबह सात बजे।"

"उस्ताद," शाहिद ने कहा, "अब क्या?"

"अब कुछ नहीं," मैंने कहा। "अब मैं तेरे पापा से एक बात पूछने जा रहा हूँ, और ये बात मुझे किसी काग़ज़ से नहीं, किसी दफ़्तर से नहीं, इन्हीं से पूछनी है।"

मैं यूसुफ़ मियाँ के बिस्तर के पास गया और उनके सामने बैठ गया।

"यूसुफ़ मियाँ," मैंने कहा, "जो आदमी उस रात सफ़ेद कुर्ते में आया था, उसने आपको काग़ज़ दिया। आपने उसे देखा। आपने उसे छुआ। आपने बेटे को पढ़ने को दिया।"

"हाँ," उन्होंने कहा।

"उस काग़ज़ पर क्या था? असली पर।"

यूसुफ़ मियाँ ने आँखें बंद कर लीं। उनकी साँस फिर भारी हुई, पर इस बार शाहिद ने उनका हाथ पकड़ा हुआ था, और मैंने देखा कि साँस की भारीपन की आवाज़ थोड़ी कम हो गई।

"कुछ लिखा नहीं था," उन्होंने कहा। "मुझे पढ़ना भी नहीं आता। मैंने सिर्फ़ मोहर देखी — नीली गोल मोहर। और उसके नीचे लिखा था कि मुफ़्त इलाज। मैंने सोचा, मुफ़्त का तो कोई नुक़सान नहीं।"

"आपने अंगूठा नहीं लगाया?"

"नहीं।"

"क्यों?"

"क्योंकि जब मैंने उँगली उस काग़ज़ पर रखी," यूसुफ़ मियाँ ने कहा, "तो मुझे अपने पापा की याद आई। वो भी कभी इसी तरह एक काग़ज़ पर उँगली रखते थे, और फिर ज़मीन चली गई थी।"

कमरा चुप।

मैंने उनकी तरफ़ देखा और मुझे लगा कि मुझे कुछ कहना चाहिए, पर कुछ नहीं आया।

मैं उठने लगा। मेरा हाथ उनकी चादर पर था।

और तभी यूसुफ़ मियाँ ने मेरी कलाई पकड़ ली।

बहुत ज़ोर से नहीं। बहुत धीरे से। उतने धीरे से जैसे कोई बोलने से पहले सोच रहा हो कि बोलूँ या नहीं।

"अंकुश," उन्होंने कहा।

"हाँ?"

वो रुके। उन्होंने शाहिद की तरफ़ देखा, फिर खिड़की की तरफ़, फिर मेरी तरफ़।

"अगर तुझे असली काग़ज़ चाहिए," उन्होंने बहुत धीमे से कहा, "तो वो यहाँ नहीं है।"

मैंने साँस भी नहीं ली।

"चंद्रेश के दफ़्तर में भी नहीं है," उन्होंने कहा। "डॉक्टर साहब के पास भी नहीं है।"

"तो कहाँ है?"

यूसुफ़ मियाँ ने मेरी कलाई और कसकर पकड़ ली। उनके हाथ की हड्डियाँ मेरी कलाई पर चुभीं। उनकी आवाज़ में वो चीज़ आई जो सिर्फ़ उन आदमियों की आवाज़ में आती है जिन्होंने ज़िंदगी में कुछ ऐसा देखा है जो वो भूलना चाहते हैं और भूल नहीं पाते।

"वो उस ताले में है," उन्होंने कहा, "जो डॉक्टर साहब के पास नहीं था।"

मेरा गला सूख गया।

"किसके पास था?"

और यूसुफ़ मियाँ ने जो कहा, उससे कमरे की हवा जम गई।

"तेरे दादा के पास था।"

मैं वहीं बैठा रह गया। पहिये से तेल की बू आ रही थी। हाथ में चाबी लटक रही थी, वो चाबी जो पापा ने मुझे पंद्रह साल की उम्र में दी थी और ये कभी नहीं बताया कि किस चीज़ की है।

और मेरी जेब में घंटी, बहुत धीरे से, इतनी धीरे से कि जैसे मेरे कान में ही बोल रही हो, कह गई —

"अब ताले की बारी।"

॥

काजल ने मेरा हाथ पकड़कर खींचा, और मैं यूसुफ़ मियाँ के बिस्तर के पास से उठ गया।

"बाहर चल," उसने धीरे से कहा। "डॉक्टर साहब बुला रहे हैं। माँ की नई दवा के बारे में बात करनी है।"

मैंने पीछे मुड़कर देखा। यूसुफ़ मियाँ की आँखें बंद थीं, होंठ हिल रहे थे, और शाहिद उनका हाथ पकड़े बैठा था, ऐसे जैसे कोई रस्सी पकड़कर किसी को कुएँ में गिरने से रोक रहा हो।

मेरे गले में चाबी लटक रही थी। मैंने उसे उँगली पर लपेट लिया और जेब में रख लिया।

"डॉक्टर साहब का कमरा ऊपर है," काजल ने कहा। "सीढ़ियों के पास वाला।"

"मुझे पता है," मैंने कहा। "मैं तेरे अस्पताल में नया नहीं हूँ, बहन।"

"तो फिर सीढ़ी से चढ़ते वक़्त हाथ का सहारा सीढ़ी की रेलिंग पर रख, मेरी कमर पर नहीं।"

"मैंने कब कहा —"

"तू मुँह से कुछ नहीं कहता," उसने कहा, "और हाथ खुद-ब-खुद काम कर जाता है।"

मैं हँस पड़ा। दिन भर में पहली बार हँसा, और वो हँसी भी आधी ही निकली, क्योंकि सीढ़ियों पर डॉक्टर इसरानी का सफ़ेद कोट एक झलक दिखाकर गुज़र गया, और उसकी आवाज़ आई — "अंकुश, तीन मिनट, ऊपर आ जाओ।"

काजल ने मेरी तरफ़ देखा। उसके माथे पर वो सिलवट आ चुकी थी, जो माँ के माथे पर आती है, जब वो बिना बोले कह देती हैं कि कुछ गड़बड़ है।

"क्या हुआ?" मैंने पूछा।

"कुछ नहीं," उसने कहा। "बस डॉक्टर साहब का चेहरा देख।"

"चेहरा?"

"हाँ, उस्ताद। चेहरा। तेरी दुकान के बोर्ड जैसा — टेढ़ा टँगा हुआ।"

डॉक्टर इसरानी का कमरा वैसा ही था जैसा आठ महीने पहले देखा था। मेज़ पर काग़ज़ों का ढेर, एक गिलास आधा पानी भरा, उसके नीचे छल्ले का निशान लकड़ी पर बना हुआ, टूटा चश्मा एक कोने में, और दीवार पर वो तस्वीर — बिना तारीख़ वाली। औरत का सफ़ेद कोट, आँखें हँसती हुई, माथे पर छोटी सी बिंदी।

तीस साल से वही तस्वीर वहीं टँगी थी। डॉक्टर ने कभी नहीं बदली।

"बैठो," उन्होंने कहा, और खुद काग़ज़ों के ढेर के पीछे कुर्सी खींचकर बैठे। उनकी उम्र साठ के पार थी और हाथ में पुराना स्टेथोस्कोप लिपटा पड़ा था, जिसकी रबर नली पर सालों पहले टेप चढ़ाया गया था।

काजल खड़ी रही।

"तू भी बैठ," मैंने कहा।

"मैं खड़ी रहूँगी," उसने कहा। "मैं अब इस अस्पताल की तरफ़ से बैठी हूँ, तेरी तरफ़ से नहीं।"

मैंने उसे देखा। सफ़ेद कोट उस पर ढीला था, आस्तीन मोड़नी पड़ी थी, और गले में स्टेथोस्कोप ऐसे लटक रहा था जैसे कोई बच्चा माँ का दुपट्टा ओढ़कर शेर बन गया हो।

"अँगूठा मत दबा," मैंने धीरे से कहा।

"चुप कर," उसने कहा, पर आधी आवाज़ में।

डॉक्टर साहब ने चश्मा पहना, फिर उतारा, फिर मेज़ पर रख दिया और बिना चश्मे के ही बोलने लगे, जैसे अब उन्हें साफ़ दिखने की ज़रूरत नहीं, सिर्फ़ कहने की है।

"माँ की साँस अब ठीक है," उन्होंने कहा। "होंठ का नीलापन काफ़ी उतर गया है। खाँसी भी अपनी जगह है, बिगड़ी नहीं।"

"तो ठीक है," मैंने कहा। "तो फिर कमरा क्यों खाली है? आप काग़ज़ों का पहाड़ इसलिए बनाते हैं ताकि सीधी ख़बर छिपी रहे?"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और हल्का सा मुस्कुराए। वो मुस्कुराहट उनके चेहरे पर बैठी नहीं।

"दवा बदलनी है, अंकुश," उन्होंने कहा। "पुरानी दवा भी चलेगी, पर एक नई दवा जुड़ेगी — सूजन के लिए। उससे आराम ज़्यादा होगा, कमीज़ भी कम आएगी, और रात की साँस फूलने की शिकायत भी कम होगी।"

"तो खुशखबरी है," मैंने कहा। "फिर आपका चेहरा ऐसा क्यों है जैसे बोर्ड टँगा हो और बोर्ड पर लिखा हो — बकाया?"

डॉक्टर साहब ने हाथ मेज़ पर रख दिए।

"क्योंकि नई दवा के कार्टन दो महीने के आए हैं," उन्होंने कहा। "कंपनी ने सैंपल भेजे हैं, दो महीने के लिए। उसके बाद वो दवा बाज़ार में आ जाएगी, और खरीदनी पड़ेगी।"

मैं चुप हो गया।

"कितने का?"

"महीने का हिसाब बैठाऊँ?" उन्होंने कहा, और मेज़ पर पड़ी एक पर्ची उठा ली, फिर तुरंत रख दी। "नहीं, बैठाऊँगा नहीं। जब तक सैंपल चलेंगे, तब तक तो कोई किराया नहीं। और उन दो महीनों में हम रास्ता निकाल लेंगे।"

"अगर रास्ता न निकले तो?"

"तो मैं उस वक़्त बात करूँगा," उन्होंने कहा। "आज रात आठ बजे मैं उसी बात की चिंता नहीं करने वाला। आज रात मुझे कुछ और देखना है।"

काजल ने कहा, "डॉक्टर साहब, दो जाँच और हैं।"

"हाँ। एक फिर से खून की, एक साँस की। सुबह सात बजे भेज देंगे।"

"दोनों की रिपोर्ट कब?"

"कल शाम," डॉक्टर ने कहा। "और मैं तुम दोनों से एक बात साफ़ कह देना चाहता हूँ। मैं माँ को झूठी तसल्ली नहीं दूँगा। वो वैसी औरत हैं जिन्होंने अपनी हालत तीन महीने छिपाकर रखी। ऐसे लोगों को तसल्ली नहीं, सच चाहिए।"

मैंने कुर्सी पर पीछे टेक लगाई। कमरे में पुरानी दवा की गंध थी, और उसके नीचे एक और गंध — गीली दीवार की, बारिश के बाद की।

"डॉक्टर साहब," मैंने कहा, "एक बात पूछूँ?"

"पूछो।"

"आपने कहा था कि माँ ने आपको कोई बात बताई है।"

वो रुके। उन्होंने काग़ज़ों के ढेर को उँगली से एक तरफ़ सरकाया, फिर दूसरी तरफ़, जैसे उन्हें कुछ ढूँढना हो और पता हो कि नहीं मिलेगा।

"सात सौ इकहत्तर रुपये," उन्होंने कहा। "लिफ़ाफ़े में। माँ ने मुझे रात में बताया, जब वार्ड में सब सो गए थे। उन्होंने कहा — डॉक्टर साहब, जाँच में कुछ निकले तो वो पैसे काम आएँगे।"

मेरा गला सूख गया।

"मुझे नहीं बताया," मैंने कहा। "उन्होंने आपको बताया, मुझे नहीं।"

"हाँ।"

"क्यों?"

डॉक्टर साहब ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें थकी हुई थीं, पर टालने वाली नहीं।

"क्योंकि उन्होंने कहा — ये पैसे काजल को देना, अंकुश को नहीं। और मैंने पूछा क्यों, तो वो बोलीं — क्योंकि अंकुश इन पैसों को लेकर कुछ और बेच देगा, और मैं ये नहीं चाहती।"

कमरे में चुप्पी बैठ गई। काजल ने मेरी तरफ़ नहीं देखा। वो दीवार पर टँगी तस्वीर की तरफ़ देखती रही।

मैं मुस्कुराया। मुझे मुस्कुराना पड़ता है, जब कुछ लगता है। ये मेरी आदत है, और ये आदत मेरे साथ बड़ी हुई है, माँ के हाथ की रोटी की तरह।

"डॉक्टर साहब," मैंने कहा, "ये भी तो देखिए। माँ मुझे तीन महीने से कह रही हैं कि मैं तेरी दुकान का हिसाब देख, और वो खुद मेरे पीछे काग़ज़ छिपाकर डॉक्टर को दे रही हैं। वाह। क्या परिवार है। मेरी बहन सफ़ेद कोट पहनकर मुझे घूर रही है, मेरी माँ डॉक्टर से मेरी निंदा कर रही है, और मेरे पापा घर पर बैठे हैं — वो चुप हैं, लेकिन उनका चुप रहना भी एक तरह की राय है।"

डॉक्टर साहब हँसे। इस बार हँसी सच्ची थी।

"बेटा," उन्होंने कहा, "तेरी माँ ने मुझे भी एक बात कही थी।"

"क्या?"

"उन्होंने कहा — मेरे बेटे की ज़ुबान के नीचे एक और आदमी बैठा है, जो हँसी में सब दबा देता है। उसे लगता है कि अगर वो हँसेगा नहीं, तो सब रो पड़ेंगे।"

मैं कुर्सी पर सीधा बैठ गया।

"ये माँ ने कहा?"

"हाँ। और उन्होंने यह भी कहा — उससे मत बोलना कि मैंने कहा है।"

"तो आप बोल रहे हैं।"

"क्योंकि मैं डॉक्टर हूँ, भगवान नहीं," उन्होंने कहा, "और मेरे पास इस वक़्त माँ को ठीक करने की दवा है, तुझे ठीक करने की नहीं।"

काजल ने तब कहा — "डॉक्टर साहब, वो लिफ़ाफ़ा?"

"वो मैंने खुद नहीं छुआ," उन्होंने कहा। "जब माँ ने बताया, मैंने कहा कि ये तुम्हारा है, तुम्हीं रखो। वो लिफ़ाफ़ा उनकी कॉपी के पीछे है। और मेरी बात साफ़ है — वो काजल को दिया जाएगा। जिस दिन ज़रूरत पड़ेगी, काजल के हाथ में जाएगा।"

काजल ने एक बार मेरी तरफ़ देखा, फिर तुरंत नज़र नीचे कर ली।

"क्यों?" मैंने पूछा। "मैं बड़ा हूँ, मैं कमाता हूँ —"

"नहीं, तू बड़ा नहीं है," काजल ने कहा। "तू सबसे बड़ा दिखता है। तेरे सिर पर सबसे ज़्यादा बोझ है और तू सबसे ज़्यादा मज़ाक करता है। माँ ने गलत नहीं किया।"

मैंने हाथ उठाकर हार मान ली।

"ठीक है," मैंने कहा। "ठीक है। मैं हार गया। पर एक बात सुन लो।"

"क्या?"

"वो सात सौ इकहत्तर रुपये मैं नहीं खाऊँगा।"

"कौन कह रहा है तू खाएगा," काजल ने कहा। "तू वो नहीं खा सकता। तू तो अपनी दुकान के पैसे भी नहीं खाता — वो सीधे टिंकू की पेंसिल और मेरी किताबों में चले जाते हैं।"

डॉक्टर साहब हँसे, और हँसते हुए उन्होंने पानी का गिलास उठाया, हिलाया, फिर रख दिया।

मैंने हल्का सा मज़ाक करने की सोची। मुझे नहीं पता क्यों, पर जब भी कमरा भारी होता है, मेरी ज़ुबान हल्का करने पर उतर आती है।

"डॉक्टर साहब," मैंने कहा, "आपकी घड़ी भी मेरे यहाँ से ठीक हुई थी। याद है? पिछली बार। इसलिए बिल में थोड़ी छूट चलेगी। दो-चार रुपये नहीं, थोड़ी अच्छी छूट।"

काजल ने मुझे घूरा। वो घूरना उसने माँ से सीखा है — आँखों से, बिना पलक झपकाए, जैसे दीवार पर कील ठोंक रही हो।

डॉक्टर साहब ने कहा, "छूट चलेगी।"

"सच?"

"हाँ। पर एक शर्त पर।"

"बोलिए।"

"तेरे हाथ में जो चाबी है, उसे आज रात ताले में लगाने से पहले सोच लेना कि उस ताले के पीछे क्या है।"

मैं रुक गया।

"आपको कैसे पता कि ये चाबी किसी ताले की है?" मैंने पूछा।

डॉक्टर साहब ने तस्वीर की तरफ़ देखा।

"क्योंकि मेरी बीवी के पास भी एक चाबी थी," उन्होंने कहा, "और वो कहती थी कि जिस ताले की चाबी गले में लटकती है, वो ताला कभी पूरा बंद नहीं होता।"

और मेरी जेब में घंटी चुप रही।

न ठंडी हुई, न गरम। न कुछ बोली।

मैंने जेब में हाथ डालकर उसे छुआ। वो बस पड़ी थी। जैसे किसी ने उसे अभी उठाया ही न हो।

मुझे ये चुप्पी सबसे ज़्यादा डराती है। घंटी जब बोलती है, तब भी डर लगता है, पर जब वो चुप हो जाती है, तब ऐसा लगता है कि कोई मेरे कंधे के पीछे खड़ा है और जानबूझकर साँस नहीं ले रहा।

मैं उठा, कमरे में दो कदम चला और खिड़की के पास पहुँचा। बाहर अस्पताल का गेट दिख रहा था, नीम का पेड़, और उसके नीचे पान की पीक का पुराना निशान।

और तभी मेरी नज़र दीवार पर पड़ी।

वही पोस्टर। चमकदार, नया, पीली दीवार पर चिपकाया हुआ। रणवीर भारद्वाज हाथ जोड़े, सफ़ेद कपड़े, साफ़ कटा हुआ चेहरा, और नीचे बड़े अक्षरों में लिखा था — नई शुरुआत, नए सपने।

मैंने काजल की तरफ़ देखा।

"ये कब लगा?"

काजल ने कंधे उठाए।

डॉक्टर साहब ने कहा, "मैंने नहीं लगाया।"

"किसी ने लगाया तो होगा।"

"हाँ," उन्होंने कहा। "पर मुझे नहीं पता किसने। तीन दिन पहले जब मैं सुबह आया, ये यहीं लगा मिला। और उसी सुबह —"

वो रुके।

"उसी सुबह क्या?"

"उसी सुबह पीछे के प्लॉट में गड्ढा खुदा मिला।"

मैंने खिड़की के काँच में अपना चेहरा देखा।

"कितना बड़ा गड्ढा?"

"उतना बड़ा नहीं," डॉक्टर ने कहा। "पर उसकी जगह ऐसी थी कि मुझे रात को नींद नहीं आई।"

"कहाँ?"

डॉक्टर साहब उठे। उन्होंने कुर्सी पीछे खिसकाई, और उसकी टाँग फर्श पर चरचराई। फिर वो खिड़की के पास आए, मेरे बगल में खड़े हुए, और उन्होंने उँगली बाहर की तरफ़ की।

"देख," उन्होंने कहा, "अस्पताल की पिछली दीवार के ठीक उस कोने में, जहाँ से ईंटें उखड़ी हुई हैं। जहाँ से बरसात का पानी रिसता है।"

मैंने देखा।

नीचे पीछे के प्लॉट में मिट्टी का ढेर पड़ा था। मिट्टी गीली थी, हाल की थी, और उसके इर्द-गिर्द ईंटें रखी थीं।

"वहाँ तो पहले से ही ढेर था," मैंने कहा।

"हाँ, था," उन्होंने कहा। "पर ये ढेर उस ढेर से अलग है। ये दीवार के नीचे से निकली मिट्टी है, ऊपर से नहीं आई।"

काजल मेरे पास आ गई। उसने भी बाहर झाँका।

"डॉक्टर साहब," उसने कहा, "आपने किसी से पूछा नहीं?"

"पूछा," उन्होंने कहा। "चौकीदार से पूछा। वो कहता है कि रात को उसे कुछ सुनाई नहीं दिया। वो कहता है कि उस रात उसे नींद की गोली की तरह नींद आई थी — अपने आप।"

"अपने आप," मैंने धीरे से दोहराया।

"तीस साल में वो आदमी कभी अपने आप नहीं सोया," डॉक्टर ने कहा। "हमेशा वो दो बजे उठकर चारों तरफ़ एक चक्कर लगाता है। उस रात नहीं लगाया।"

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और घंटी को बाहर निकाला। लोग कहते हैं कि घंटी बजाने से कुछ होता है। मेरे लिए बजाने की ज़रूरत नहीं थी। मैंने बस उसे हथेली में पकड़ा और उँगली उसके ठंडे पीतल पर रख दी।

कुछ नहीं हुआ।

और यही सबसे बड़ी बात थी।

"डॉक्टर साहब," मैंने कहा, "आप ऊपर रहिए। मैं नीचे जाता हूँ।"

"अंकुश —"

"आप मना मत कीजिए," मैंने कहा। "आपने खुद कहा था कि पोस्टर लगने देना भी उसी हिसाब का हिस्सा है। तो ये भी उसी हिसाब का हिस्सा है।"

डॉक्टर साहब ने मेरी तरफ़ देखा और कुछ नहीं कहा। काजल ने अपना सफ़ेद कोट सीधा किया।

"मैं साथ चलूँगी," उसने कहा।

"तू ऊपर रुक, माँ के पास।"

"माँ सो रही हैं। और उनके पास अभी कोई और बैठा है — शाहिद। वो उन्हें देख रहा है।"

"शाहिद को तूने बिठाया?"

"नहीं," उसने कहा, "उसने खुद कहा — चाची जी के पास मैं बैठूँगा, आप जाइए।"

मैंने कुछ नहीं कहा। मेरे सीने में एक अजीब सी गरमाहट हुई। कल का वो लड़का, जो पक्की नौकरी के लिए काग़ज़ छिपा रहा था, आज मेरी माँ के बिस्तर के पास बैठा है और मुझे कह रहा है कि आप जाइए।

गली का हिसाब कभी काग़ज़ों में नहीं बैठता। वो हिसाब सीने में बैठता है, और वहाँ से कोई उसे मिटा नहीं सकता।

नीचे उतरते वक़्त सीढ़ियों के पास की खिड़की से गेट दिख रहा था। सफ़ेद गाड़ी वहाँ नहीं थी। नीम के पेड़ के नीचे सिर्फ़ एक बूढ़ा आदमी बैठा था, अपनी लाठी पर झुका हुआ, और पास में एक साइकिल खड़ी थी।

"उस्ताद," काजल ने कहा, "तूने सानिया को बुलाया?"

"नहीं," मैंने कहा। "पर बच्चे इन बातों के बिना नहीं रहते।"

सच यह था कि सानिया गेट के बाहर खड़ी थी।

मैंने उसे देखा तो वो दौड़कर आई। उसके हाथ में लाल कवर की कॉपी थी, जिसमें वो ट्रकों की तारीख़, वक़्त और शक्ल लिखती है।

"उस्ताद," उसने कहा, "तीन ट्रक। पुराने बिजलीघर की तरफ़ से। उन्होंने मिट्टी डाली और वापस गए।"

"मिट्टी?"

"हाँ। और एक ट्रक पर मशीन का हिस्सा था — लोहे का बड़ा सा।"

मैंने उसकी कॉपी की तरफ़ देखा।

"कितने बजे?"

"सुबह छह बजे के आस-पास। मैं स्कूल जाते वक़्त देख रही थी। फिर गुड्डू ने भी देखा, रफ़ीक़ ने भी। और चिंटू ने कहा कि उसने अस्पताल के पीछे गड्ढा भी देखा।"

मैं रुका।

"चिंटू कहाँ है?"

"वहीं पीछे," सानिया ने कहा। "वो कह रहा है कि मिट्टी में कुछ चमक रहा है।"

मैंने काजल की तरफ़ देखा।

काजल ने मेरी तरफ़ देखा।

और उसके बाद हम दोनों एक साथ चले, बिना कुछ बोले, जैसे दोनों को एक ही आवाज़ ने बुलाया हो।

अस्पताल के पीछे वाला प्लॉट वैसा ही था — उजाड़, टूटी ईंटों का ढेर, एक कोने में सूखा पीपल का पत्ता, और दूसरे कोने में बिना ढकी सीमेंट की बोरियाँ, जिन पर नमी की सफ़ेद फफूँद आ गई थी। ज़मीन पर पीली पट्टी बँधी थी, वो पट्टी जो रणवीर के लोगों ने दी थी, और उस पट्टी के आगे एक पुरानी फावड़ी पड़ी थी।

चिंटू वहीं घुटनों के बल बैठा था।

गुड्डू और रफ़ीक़ दोनों उसके पीछे खड़े थे, और टिंकू सबसे आख़िर में — मेरी दुकान का टिंकू, जिसके घुटने पर पट्टी थी और जिसकी आँखों में वो तेज़ी थी जो सिर्फ़ उन बच्चों की आँखों में होती है जिन्होंने कम उम्र में ज़्यादा देख लिया है।

"उस्ताद," चिंटू ने कहा, "आओ। यहाँ।"

"क्या है?"

"देखो।"

मैंने झुककर देखा।

गड्ढा छोटा था — दो हाथ गहरा, तीन हाथ चौड़ा। उसका एक किनारा दीवार के नीचे तक घुसा हुआ था, जैसे किसी ने दीवार को सहारा देने वाली नींव की ईंटें ढूँढी हों। मिट्टी गीली थी, और उसके ऊपर ट्रक के पहियों के निशान साफ़ थे — मोटे, गहरे, एक-दूसरे से जुड़े हुए, जैसे किसी बड़े जानवर ने रेंगकर रास्ता बनाया हो।

"ये पीतल है," चिंटू ने उँगली से दिखाया।

मिट्टी के बीच से कुछ झाँक रहा था। हल्का पीला, हरा-भूरा, जैसे राख के नीचे से कोई चीज़ झाँकती है।

मेरा दिल एक बार ज़ोर से धड़का।

"हाथ मत लगाओ," मैंने कहा, और मैं खुद घुटनों के बल बैठ गया।

टिंकू ने झट से अपनी जेब से एक पुराना काग़ज़ निकाला — वो काग़ज़ जिसमें माँ ने उसके लिए कुछ रखा था — और मिट्टी हटाने के लिए आगे कर दिया। मैंने उसे हाथ से रोक दिया और अपने हाथ से मिट्टी हटाने लगा।

मिट्टी ठंडी थी। उसमें वो गंध थी जो बरसात के तीन दिन बाद आती है — सड़ी जड़ और गीली ईंट की। मेरी उँगलियों में मिट्टी भर गई, ग्रीस के पुराने निशानों के ऊपर नया मिट्टी का नक्शा बन गया।

पहले मुझे किनारा मिला। फिर ऊपर का हिस्सा। फिर वो पूरी चीज़ मेरी हथेली में आ गई, और वो जितनी छोटी दिख रही थी, उतनी भारी थी।

पीतल की पट्टी। मोटी, आधी टूटी, किनारे से एक कोना गायब। ऊपर हरी परत जमी थी, और उस पर उभरे हुए अक्षर — खुदे हुए नहीं, ढाले हुए, जैसे पुराने बोर्ड पर होते हैं।

"उस्ताद," काजल ने कहा, "क्या है?"

"रुक," मैंने कहा।

मैंने पट्टी को अपनी कमीज़ से पोंछा। एक बार, दो बार, तीन बार। हरी परत उतरने लगी, और नीचे पीतल का साफ़ चमकता रंग आने लगा।

पहला अक्षर उभरा।

दूसरा।

फिर एक पूरा शब्द।

मैंने बिना सोचे, जैसे कोई काग़ज़ पढ़ते हुए ज़ोर से पढ़ देता है, पढ़ दिया —

"जगदीश यादव।"

और काजल, जो मेरे पीछे खड़ी थी और जो अभी कुछ कह रही थी — "उस्ताद, ये तो कोई पुराना…" — उसकी आवाज़ बीच में ही रुक गई।

मैंने पीछे मुड़कर देखा।

काजल का चेहरा सफ़ेद पड़ गया था। उसके होंठ खुले रह गए, और वो अपने सफ़ेद कोट की जेब में हाथ डालकर खड़ी थी, जैसे कहीं गिरने से पहले सहारा ढूँढ रही हो।

"काजल?"

उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें भरी हुई थीं, और उसकी आवाज़ जब निकली तो ऐसी निकली जैसे किसी ने गले में कुछ फँसा दिया हो।

"ये… ये तो दादा का नाम है।"

मेरे हाथ से पीतल की पट्टी फिसलने लगी। मैंने उसे कसकर पकड़ लिया।

"क्या?"

"दादा का नाम," उसने दोहराया। "मैंने ये नाम बोर्ड पर पढ़ा था। माँ के संदूक में एक पुरानी तस्वीर है न — उसके पीछे लिखा है। और पापा ने एक बार मुझे बताया था कि दादा की दुकान का बोर्ड पीतल का था, और उस पर उनका नाम खुदा था।"

मैंने पट्टी को दोनों हाथों से पकड़कर ऊपर उठाया।

उस पर नाम के नीचे एक और लाइन थी, आधी टूटी हुई — दो अक्षर और फिर खाली जगह। और उसके नीचे, छोटे अक्षरों में, मिट्टी से भरा हुआ एक शब्द, जिसे मैंने उँगली से खुरचकर निकाला।

साइकिल।

और उसके बाद खाली जगह। और उस खाली जगह के बाद एक शब्द का आख़िरी हिस्सा, जिसे टूटे किनारे ने काट दिया था।

टिंकू ने मेरे कंधे के ऊपर से झाँका।

"उस्ताद," उसने धीरे से कहा, "ये अस्पताल के पीछे कैसे आया?"

मैंने कोई जवाब नहीं दिया।

मेरे गले में चाबी लटक रही थी। वो चाबी जो पापा ने मुझे पंद्रह साल की उम्र में दी थी, और ये कभी नहीं बताया कि किस चीज़ की है।

और अब मेरे हाथ में पीतल की पट्टी थी, जिस पर मेरे दादा का नाम था — वो दादा जिनकी साइकिल मैंने मेले से खरीदी थी, वो दादा जिनकी घंटी मेरी जेब में थी, वो दादा जो पच्चीस साल पहले बुखार में चले गए थे, और जिनकी दवा देर से आई थी।

मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने पट्टी को अपने सीने से लगा लिया, जैसे कोई बच्चा गिरी हुई चीज़ को छिपाने की कोशिश करता है।

और पीछे, अस्पताल की पहली मंज़िल की खिड़की से, डॉक्टर इसरानी खड़े थे। उन्होंने कुछ नहीं कहा। उन्होंने बस अपना टूटा चश्मा उतारा और दीवार पर टँगी अपनी बीवी की तस्वीर की तरफ़ देखने लगे।

काजल ने मेरा हाथ पकड़ लिया।

"अंकुश," उसने कहा, और इस बार वो मुझे उस्ताद नहीं बोली, "पापा को फ़ोन करना है।"

"नहीं," मैंने कहा। मेरी आवाज़ अपनी नहीं लग रही थी। "पापा को फ़ोन नहीं करना है। पापा को आना है। और वो अपने आप आएँगे, जब वक़्त होगा।"

"तू क्या कह रहा है?"

मैंने पट्टी को उठाया और सूरज की तरफ़ किया। रोशनी उस पर पड़ी और वो अक्षर चमक उठे, जैसे पच्चीस साल बाद किसी ने उन्हें जगा दिया हो।

"मैं ये कह रहा हूँ," मैंने कहा, "कि ये पट्टी यहाँ अपने आप नहीं आई। इसे यहाँ कोई लाया है, और वो कोई भी हो, उसे पता है कि ये हमारे लिए कितनी बड़ी चीज़ है।"

"तो?"

"तो ये धमकी है," मैंने कहा। "ये कह रहे हैं — तेरे पास जो भी है, वो हमारे पास है। तेरे दादा का नाम भी हमारे पास है, तेरे पापा का अंगूठा भी, और तेरी घंटी वाला राज़ भी।"

काजल की आँख से एक आँसू निकला और उसने उसे पोंछा नहीं — उसने मेरी तरफ़ देखा और कहा, "उस्ताद, तेरी जेब में जो है, उससे पूछ। अब तो पूछ।"

मैंने जेब से घंटी निकाली।

हथेली पर रखी। उसे सूरज की रोशनी में रखा, और वो पीतल जैसी चमकी, वैसी ही चमक, वैसा ही रंग, जैसा हाथ में पकड़ी पट्टी का था।

"बोल," मैंने धीरे से कहा।

घंटी चुप रही।

"बोल," मैंने फिर कहा, और इस बार मेरी आवाज़ में वो चीज़ आई जो मैं छिपाना चाहता था। "कुछ बोल। पूरे दिन चुप रही है, अब बोल।"

बच्चे पीछे खड़े साँस रोककर देख रहे थे। टिंकू ने मेरी बाँह छुई और फिर छोड़ दी।

और तब घंटी ठंडी हुई। बहुत ठंडी, बर्फ़ जैसी नहीं, पर उस ठंड से ज़्यादा ठंडी जो पीतल में होती है जब वो किसी पुरानी जगह से निकलता है।

और उसने कहा, एक छोटा वाक्य, इतनी धीमी आवाज़ में कि मुझे लगा वो मेरी हड्डियों से बोली —

"ये टुकड़ा नहीं है। ये ताले का मुँह है।"

मैंने पट्टी को गौर से देखा।

और तब मैंने वो देखा जो पहले नहीं देखा था — पट्टी का टूटा किनारा, और उसके नीचे, पीतल के भीतर, एक छोटा सा छेद। नाम के नीचे। ऐसा छेद जिसमें कोई सालों से कुछ घुसाया जाता रहा हो।

मैंने अपने गले से चाबी निकाली।

चाबी वैसी ही पीली थी। पुरानी, घिसी हुई, एक तरफ़ हल्की मुड़ी हुई।

मैंने उसे छेद के पास लाया।

हाथ काँप रहे थे। काजल ने मेरा हाथ सहारा दिया, और टिंकू ने मेरी कमर पकड़ ली, जैसे मैं गिरने वाला हूँ।

मैंने चाबी अंदर डाली।

और वो तीन चौथाई तक अंदर गई, फिर रुक गई — ठीक उतनी ही, जितनी कोई पच्चीस साल से अंदर जाती रही हो। चिकनी, बिना ज़ंग के, जैसे किसी ने उसे रोज़ चलाया हो।

काजल ने फुसफुसाकर कहा, "ये ताले की चाबी है।"

"हाँ," मैंने कहा।

"तो ताला कहाँ है?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

उसके चेहरे पर वही सवाल था जो मेरे सीने में ठोकर मार रहा था — कि ताला कहाँ है, कि ये पट्टी किस ताले के दरवाज़े से निकली है, कि दादा की दुकान कहाँ थी, कि पीछे की गली में उस्ताद अली बक्श की उस पुरानी दुकान के नीले दरवाज़े पर लगा ज़ंग लगा ताला किसका था।

मैंने चाबी बाहर निकाली और उसे गले में वापस डाल दिया।

फिर मैंने पट्टी को अपनी जेब में रखा, और काजल की तरफ़ देखा, और टिंकू की तरफ़, और सानिया की तरफ़, और गुड्डू और रफ़ीक़ की तरफ़।

"सब सुनो," मैंने कहा। "अभी यहाँ से कोई किसी को एक शब्द नहीं बोलेगा। न माँ को, न पापा को, न उस्ताद को, न मीरा को।"

"उस्ताद," टिंकू ने कहा, "पर ये तो बड़ी बात है —"

"हाँ," मैंने कहा। "इसीलिए अभी नहीं। जो आदमी इस पट्टी को यहाँ गाड़कर गया है, वो ये देखना चाहता है कि हम क्या करते हैं। हम अभी कुछ नहीं करेंगे। हम सिर्फ़ उसका इंतज़ार करेंगे।"

"कब तक?"

मैंने अस्पताल की दीवार की तरफ़ देखा। पीली दीवार, उखड़ी ईंटें, और बगल में गड्ढा।

"दो दिन," मैंने कहा। "मशीन सुबह सात बजे आने वाली है। तब तक हम तैयार रहेंगे।"

और मेरी जेब में घंटी, जो पूरे दिन चुप थी, बहुत धीरे से फिर बोली, इतनी धीरे से कि सिर्फ़ मैं सुन सका —

"अब वो मिल गया जिसका ताला तेरे गले में है।"

॥

मैंने पट्टी जेब में डाली और वहीं, अस्पताल की पीली दीवार के नीचे, मिट्टी के उस गड्ढे के किनारे खड़े-खड़े घंटी को हथेली पर रखकर फिर पूछा।

"अब बता। ये ताला किस चीज़ का है। और वो काग़ज़, जिस पर दादा का नाम है, कहाँ है।"

बच्चे मेरे पीछे खड़े थे। टिंकू ने मेरी बाँह पकड़ी हुई थी, सानिया ने गुड्डू का कंधा दबा रखा था, और रफ़ीक़ अपने होठ काट रहा था, जैसे उसे भी कुछ बोलना है पर डर है कि बोलेगा तो सब बिगड़ जाएगा।

घंटी चुप रही।

फिर बोली, धीमे से, जैसे कोई पुराना आदमी सीढ़ी उतरते-उतरते एक-एक कदम गिन रहा हो।

"पुरानी परत। सत्तर अंक।"

मेरा हाथ ठंडा हो गया।

"सत्तर?" मैंने कहा। "तूने अभी कहा कि अब ताले की बारी है। और अब कहती है सत्तर अंक?"

"परत खोलनी है तो कीमत लगेगी," घंटी बोली। "मुफ़्त में सिर्फ़ चुप्पी मिलती है।"

"ये तीसरा सच नहीं है?" मैंने पूछा। "ये वही नहीं जो पीपल के नीचे बाकी है?"

"पीपल के नीचे वाला सच लोगों का है," घंटी बोली। "ये सच पत्थर का है। पत्थर की कोई ज़ुबान नहीं होती, इसलिए उसे खोलना पड़ता है।"

मैंने गड्ढे की तरफ़ देखा।

मिट्टी ताज़ी थी। जिस आदमी ने ये पट्टी यहाँ गाड़ी थी, उसने ऊपर से पैर भी नहीं पोंछा था। दो दिन पहले की बारिश की नमी अंदर तक बैठी थी, और गड्ढे के किनारे नीचे से पीली मिट्टी बाहर आई थी, ऐसी पीली जैसे दीवार का रंग। मुझे लगा जैसे दीवार ने अपना ही कोई हिस्सा उगल दिया हो।

"उस्ताद," टिंकू ने धीरे से कहा। "सत्तर अंक मतलब हमारे पास बहुत कम बचेंगे।"

"हाँ," मैंने कहा। "बहुत कम बचेंगे।"

मैंने जेब से घंटी निकाली और दुकान के पीछे वाले कमरे की तरफ़ चला। बच्चे पीछे-पीछे आए, पर मैंने दरवाज़े पर रुककर उन्हें रोक दिया।

"तुम चारों बाहर," मैंने कहा। "दुकान के सामने। कोई आए तो बोलना — उस्ताद हिसाब देख रहा है।"

"उस्ताद, हम भी देखेंगे," सानिया ने कहा।

"तू देखेगी," मैंने कहा, "पर बाद में। पहले मैं देखूँगा कि मैं क्या देख रहा हूँ।"

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो बात थी जो वो कभी सीधे नहीं कहता — कि अकेले मत जाओ।

"तू दरवाज़े पर बैठ," मैंने कहा। "अंदर की आवाज़ सुनाई दे तो आ जाना।"

वो दरवाज़े के बाहर, दहलीज़ पर बैठ गया, और मैं अंदर गया और दरवाज़ा खींचकर आधा बंद कर दिया।

कमरे में अंधेरा था। गुनगुनाता बल्ब आज भी गुनगुना रहा था, काँपता हुआ, जैसे उसे भी बुखार हो। मैंने लोहे की अलमारी पर बैठकर, हाथ पैंट पर पोंछकर, घंटी सामने रखी और फिर उसी तरफ़ देखकर बैठ गया जहाँ औज़ारों का ट्रंक था।

मैंने एक गहरी साँस ली और हिसाब जोड़ा।

पहले घंटी कह चुकी थी — एक सौ अठासी।

फिर बाद में कहा — दो सौ अठाईस।

और एक बार, उस दिन चबूतरी पर, उसने साफ़ कहा था — एक सौ बीस।

तीन गिनतियाँ। तीन आँकड़े। एक ही चीज़ के तीन चेहरे, जैसे कोई एक ही काग़ज़ को तीन तरह से पढ़कर तीन अलग बातें कर दे।

"सुन," मैंने घंटी से कहा। "मुझे साफ़ चाहिए। तीन हिसाब हैं तेरे पास। एक सौ अठासी, दो सौ अठाईस, और एक सौ बीस। मैं किस पर भरोसा करूँ?"

घंटी कुछ देर चुप रही। फिर बोली, इतनी धीरे से जैसे कमरे में कोई और भी सुन रहा हो।

"तीन हिसाब तेरे हैं। एक मेरा।"

"मतलब?"

"एक सौ अठासी वो लिखा था जब तेरा हाथ काँप रहा था। एक सौ बीस वो जब तेरा घमंड बोल रहा था। दो सौ अठाईस वो जब तेरा काम बोल रहा था।"

मैं सीधा हो गया।

"तो अब?"

"अब सिर्फ़ एक हिसाब है। दो सौ अठाईस।"

"और तीनों में फ़र्क़ क्यों?"

"क्योंकि तू नहीं जानता था कि जोड़ना क्या है," घंटी बोली। "तू सोचता था दो आदमियों को बिठा देना और एक-दूसरे से बोलवा देना, जोड़ है। जोड़ वहाँ होता है जहाँ आदमी कहे — ये मेरी ग़लती थी, और दूसरा सुने, और फिर दोनों ज़िंदा रहें। तेरी पहली गिनती में हिसाब पूरा था, काम अधूरा। इसलिए अब मैं काम गिनती हूँ, भावना नहीं।"

मैंने अपनी उँगलियाँ ट्रंक पर रखी। ग्रीस का पुराना निशान अब भी वहीं था, और उसी के बगल में एक छोटा सा स्थान खाली था, जहाँ से उस्ताद की छोटी फूल वाली घंटी आज सुबह हटाई गई थी।

"अच्छा," मैंने कहा। "तो दो सौ अठाईस से सत्तर काट।"

"एक सौ अठ्ठावन बचेंगे," घंटी बोली, और इस बार उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जैसे… कुछ ऐसा जैसे कोई हिसाब लिखने वाला कलम उठाने से पहले एक बार रुक जाए।

"बता पूरी बात," मैंने कहा। "परत खोलने में क्या होगा? मैं क्या देखूँगा? कोई इंसान, या कोई जगह?"

"तू उस चीज़ का आख़िरी सच्चा लम्हा देखेगा," घंटी बोली। "जो चीज़ जिसके हाथ से टूटी, उसी का हाथ दिखेगा। और जो आदमी उसे जोड़ने आया, उसका चेहरा भी। ये परत वैसी नहीं जैसी तूने कभी देखी है। यहाँ तू सिर्फ़ देखेगा नहीं। यहाँ तू अंदर खड़ा होगा।"

मैंने आँखें मींच लीं।

फिर खोली।

"हाँ," मैंने कहा। "खोल।"

घंटी ठंडी हुई।

अब मुझे पता चल गया था कि ये ठंड क्या होती है। ये डर की नहीं होती। ये उस तरह की ठंड होती है जैसे हाथ को ज़ंग लगी रॉड पर रखने से होती है, और जैसे ही तुम उसे छोड़ते हो, तुम्हारी हथेली पर ज़ंग की एक पतली लकीर बन जाती है।

मैंने जेब से पट्टी निकाली।

उसे दोनों हाथों से पकड़ा, और उसे दो पल देखा — वो नाम, जो मैंने अब तक कभी अपने कान से नहीं सुना था, केवल मिट्टी में पढ़ा था। जगदीश यादव। साइकिल। और नीचे वो छेद, जिसमें मेरी चाबी तीन चौथाई तक गई थी।

मैंने पट्टी को माथे से लगाया।

और एक ही साँस में बल्ब का गुनगुनाना बंद हो गया।

पहले सन्नाटा आया। ऐसा सन्नाटा जैसे कमरे में हवा भी साँस रोककर खड़ी हो गई हो।

फिर गंध आई। लकड़ी की, टिन की, गरम लोहे की, और उसके ऊपर एक पतली-सी, मीठी ज़ंग की गंध जो तेल में मिली हुई हो।

और फिर मैं वहाँ था।

मैं अपनी दुकान में नहीं था। मैं पुराने बाज़ार के पीछे खड़ा था, बिजलीघर से पहले मुड़ने वाली गली में, उसी जगह जहाँ उस्ताद अली बक्श की पुरानी दुकान है — नीला दरवाज़ा, उतरता रंग, और पीछे का छोटा कमरा जहाँ आज भी काली साइकिल कपड़े से ढकी पड़ी है।

पर यहाँ कुछ और था। एक ही बार देखकर मैं पहचान गया।

सामने लोहे के बड़े बक्सों की कतार थी, धूल से ढकी, जिन पर ट्रकों की तरह कोई मोहर लगी थी। दुकान का बोर्ड टेढ़ा टँगा था। छत आधी टिन की थी, आधी ईंट की। और दुकान के बाहर, एक लकड़ी के मेज़ पर, एक काग़ज़ रखा था — एक मोटा काग़ज़, जिसकी ऊपर की शीट पर नीली स्याही में कुछ लिखा था और नीचे एक लाल स्याही का गोल निशान, अंगूठे के आकार का।

मैंने मेज़ के पास कदम बढ़ाया और तब जाकर देखा कि वहाँ चार आदमी खड़े हैं।

पहला — लंबा, दुबला, कंधों पर झुका हुआ, सफ़ेद कुर्ता, और हाथ में लकड़ी का एक बक्सा। उसकी उँगलियाँ मेज़ की तरफ़ नहीं, दरवाज़े की तरफ़ थीं, जैसे वो हर वक़्त भागने का रास्ता तय कर रहा हो। ये इलियास थे। मैंने उन्हें पहचान लिया — आज से पच्चीस साल पहले का चेहरा, पर वही आँखें, वही वो हल्की-सी काँपती ठुड्डी जो आज गुमटी की मेज़ पर बैठकर भी काँप रही थी।

दूसरा — बैठा हुआ, चश्मा नाक पर, सफ़ेद दाढ़ी नहीं, बस काली-सफ़ेद दाढ़ी का शुरुआती हिस्सा। कान पर पेंसिल। हाथ में पीतल की एक घंटी, जिस पर फूल खुदा था। उस्ताद अली बक्श, जवान, और उस वक़्त भी चुप।

तीसरा — मैंने उसे देखा और मेरा सिर घूम गया। एक आदमी, जिसके जूते बहुत चमक रहे थे। बाकी सब धूल में थे और इसके जूते चमक रहे थे — जैसे ये घर से चलकर नहीं, गाड़ी से उतरकर आया हो। इसके हाथ में एक मोटा काग़ज़ था, जिसके कोने पर लाल निशान था। इसकी उँगली उस काग़ज़ पर ऐसे रखी थी जैसे कोई ताश का पत्ता छिपा रहा हो।

और चौथा—

मैंने अपनी साँस रोक ली।

चौथा जवान था — बहुत जवान। बाल साफ़ कटे हुए, सफ़ेद कमीज़, कमर पर बेल्ट, और चेहरे पर वो मुस्कान जो मैंने पोस्टरों पर देखी थी। रणवीर भारद्वाज। पर यहाँ, इस जगह पर, इस टिन की छत के नीचे, वो मुस्कुरा रहा था — और उसकी मुस्कान में कुछ था जो मुझे बर्फ़ की तरह चुभा।

कमरे में हवा भी नहीं हिल रही थी, पर मुझे ठंड लग रही थी।

उस्ताद ने घंटी मेज़ पर रखी और काग़ज़ की तरफ़ इशारा किया।

"सुन लो," उस्ताद ने कहा। आवाज़ आज जितनी धीमी नहीं थी, पर उतनी ही भारी। "ये काग़ज़ जो है, इसमें दुकान का नाम लिखा है। गिरवी का काग़ज़ है। पैसा मिलेगा, दुकान रहेगी, बाद में छुड़ा लेना।"

इलियास ने कुछ कहना चाहा। उनके होंठ हिले, फिर रुक गए।

तीसरा आदमी बोला। उसकी आवाज़ में एक अजीब चीज़ थी — जैसे कोई बहुत सलीके से मीठा बोल रहा हो।

"अंगूठा यहाँ," उसने कहा, और उँगली रख दी। "नीचे तारीख़। और गवाह की जगह।"

और तब मैंने वो हाथ देखा।

मेज़ के दूसरी तरफ़ से एक हाथ आया। मोटा हाथ, हथेली चौड़ी, उँगलियाँ छोटी और मज़बूत, और कलाई पर चमड़े का एक पुराना धागा बँधा हुआ।

लाल स्याही की डिब्बी खुली। इलियास ने उसे आगे बढ़ाया। हाथ काँप रहा था — इलियास का हाथ नहीं, वो दूसरा।

वो हाथ अंगूठे को स्याही में डुबाने ही वाला था कि उसके मालिक ने कुछ कहा।

"मैं अंगूठा लगा रहा हूँ," आवाज़ आई। "पर एक बात साफ़ कर लो। मेरा नाम इस काग़ज़ पर ऐसे नहीं आएगा कि मेरा बेटा इसे कभी पढ़े और मुझसे नज़र न मिला सके।"

मैं जम गया।

वो आवाज़।

वो आवाज़ मैंने पूरी ज़िंदगी सुनी थी — छोटे वाक्यों में, रसोई में, अँधेरे में, हमेशा से एक कदम पीछे खड़ी।

ये मेरे दादा थे। जगदीश यादव।

उनका चेहरा मैंने केवल तस्वीरों में नहीं, किसी ने बताया भी नहीं था। पर जब वो इस तरह बोले, मुझे कोई पहचान चाहिए ही नहीं थी। मुझे लगा जैसे पापा के चेहरे से बीस साल उतार दिए गए हों और सामने खड़ा कर दिया हो।

"लगाओ," तीसरे आदमी ने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ में मिठास कम थी, जल्दी ज़्यादा।

दादा ने अंगूठा स्याही में डुबाया और काग़ज़ पर लगा दिया।

लाल निशान बन गया। उसने हाथ पीछे खींच लिया, और मैंने देखा कि उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं, और वो काँपती उँगलियाँ उन्होंने जल्दी से कुर्ते में छिपा लीं, जैसे बच्चा कोई चोरी की चीज़ जेब में छिपाता है।

उस्ताद ने काग़ज़ उठाया। देखा। सिर हिलाया, और फिर बोले, "गवाह में मेरा नाम।"

"नहीं," तीसरे आदमी ने कहा। "गवाह मैं भरूँगा। तुम बैठो।"

इलियास ने आगे कदम बढ़ाया।

"नहीं," इलियास ने कहा, और इस बार उनकी आवाज़ में वो डर नहीं था जो पच्चीस साल बाद गुमटी की मेज़ पर था। कुछ और था। "गवाह तुम नहीं। गवाह वो जो यहाँ का है।"

और तब वही हुआ जो मुझे देखना था और जिसे देखने के लिए मैं तैयार नहीं था।

उस्ताद ने मेज़ से घंटी उठाई — वो पीतल की, फूल वाली घंटी। उसे अपनी हथेली में रखा, और उसे इलियास की तरफ़ बढ़ाया।

और तीसरे आदमी का हाथ आगे आया।

उसने घंटी उस्ताद के हाथ से नहीं छीनी।

उसने घंटी को उस्ताद के हाथ में ही ऐसे पकड़ा जैसे कोई डॉक्टर घाव को दबाता है — दो उँगलियाँ ऊपर, अंगूठा नीचे।

और एक ही झटके में घंटी का ऊपरी हिस्सा अलग हो गया।

चट।

ऐसी आवाज़ नहीं जैसे लोहा टूटता है। ऐसी आवाज़ जैसे किसी के दाँत अंदर से टूट रहे हों।

उस्ताद की हथेली में घंटी का आधा हिस्सा रह गया, और नीचे मेज़ पर एक चमकता टुकड़ा गिरा और लुढ़ककर रुक गया।

और उस टुकड़े से एक आवाज़ आई।

नहीं — आवाज़ नहीं। कुछ और। जैसे घंटी जो बजने से पहले हवा में एक झुरझुरी बनाती है, वो झुरझुरी टूट गई और मेज़ पर गिर गई।

मैंने अपने दोनों हाथ कानों पर रख लिए।

और तभी इलियास बीच में आ गए। वो सच में बीच में आ गए — मेज़ और उस्ताद के बीच, और उन्होंने अपनी दोनों हथेलियाँ उठा दीं, जैसे कोई गिरती हुई चीज़ को हवा में थामने की कोशिश करता है।

"बस," इलियास ने कहा। "अब नहीं। ये नहीं। ये आख़िरी चीज़ है, इसे मत तोड़ो।"

"ये कोई चीज़ नहीं है," तीसरे आदमी ने कहा। "ये एक औज़ार है। और औज़ार जिसका हो, वो अपनी मर्ज़ी से चलाएगा।"

"और जिसका नहीं हो?" उस्ताद ने कहा, बहुत धीमे से, बहुत सादगी से, जैसे कोई हिसाब में फ़र्क़ बता रहा हो।

"तो वो औज़ार नष्ट कर देता है," तीसरे आदमी ने कहा। "ताकि कोई और उठाकर उससे अपनी चीज़ न बना ले।"

"अपनी चीज़," उस्ताद ने दोहराया। "तुम्हारे मुँह से ये शब्द अच्छा नहीं लगता।"

तब रणवीर बोला।

वो अब तक चुप खड़ा था, सिर्फ़ देख रहा था, और उसकी मुस्कान बदल नहीं रही थी। वो आगे आया और उसने मेज़ पर गिरा पीतल का टुकड़ा उठा लिया। उसे उँगलियों में घुमाया, जैसे कोई सिक्का घुमाता है।

"उस्ताद," रणवीर ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो मिठास थी जो आज टीवी पर बोलते वक़्त भी आती है। "आप इस चीज़ को बहुत बड़ा मान रहे हैं। ये पीतल है। पाँच रुपये किलो।"

"पीतल पाँच रुपये किलो है," उस्ताद ने कहा। "और मेरा भाई पीतल से नहीं बनता।"

रणवीर हँसा।

हँसा, और उस हँसी में कुछ नहीं था — न मज़ाक, न शरारत, न कोई गरमी। कोई ज़रूरत न हो तो हँसते हैं न, इसलिए हँस देते हैं। यही बात उसकी हँसी में थी। और वो हँसी इस पूरे दृश्य की सबसे ठंडी चीज़ थी। दीवार से भी ठंडी। घंटी से भी ठंडी।

उसने पीतल का टुकड़ा जेब में डाला, फिर काग़ज़ की तरफ़ देखा, और बोला,

"चलो। अंगूठा हो गया। अब बाकी काग़ज़।"

"कौन से काग़ज़," दादा ने कहा। ये उनकी पहली बात थी जिसमें गुस्सा था, और मुझे लगा जैसे वो गुस्सा मेरे भीतर भी पुराना बैठा हुआ है, मुझे भी उसका इस्तेमाल करना है।

"वही जो तुम्हारे गले में लटकता है," रणवीर ने कहा। वो मुस्कुराया। "ताले वाली चाबी। कहो, वो ताला कहाँ है।"

मैंने अपनी गर्दन की तरफ़ बिना सोचे हाथ बढ़ा दिया, और उँगलियों में मेरी चाबी आई, जो आज भी उसी धागे से लटक रही है, जो उस दिन मेरे गले में थी नहीं, मेरे दादा के गले में थी।

दादा ने उत्तर नहीं दिया।

वो मेज़ पर रखे काग़ज़ों की तरफ़ देखते रहे, और देखते रहे, और फिर उन्होंने अपना हाथ उठाया और उसे मेज़ पर रख दिया, खुली हथेली से, जैसे कोई कह रहा हो — मेरे पास बस यही है।

और फिर धुंधलापन आया।

पहले कोनों से। पहले मेज़ के किनारे से, फिर दीवार से, फिर उस्ताद के कंधे से, और मैंने जाना कि परत बंद हो रही है। बाहर की ओर जानेवाली कोई घड़ी ऐसे घूम रही थी जैसे उसने सिर्फ़ एक लम्हा दिखाने का वादा किया था और अब हिसाब चुका रही हो।

पर मैं रुका रहा।

नहीं रुका — मैं जानबूझकर खड़ा रहा, जब तक सब कुछ white नहीं हो गया… नहीं, गलती हुई मुझसे। कोई अंग्रेज़ी शब्द नहीं। मैं कहता हूँ — सब कुछ सफ़ेद नहीं हुआ, सब कुछ उस पीले रंग में बदल गया जो अस्पताल की दीवार का है।

और मैं अपने कमरे के फ़र्श पर घुटनों पर गिर गया।

घुटने चुभे। हाथ फ़र्श से चिपके रहे। मेरे मुँह से निकला — कुछ नहीं निकला। सिर्फ़ साँस। साँस जो बाहर जाती थी पर अंदर नहीं आ रही थी।

दरवाज़ा खुला और टिंकू अंदर आया, और उसकी आवाज़ बहुत दूर से आई।

"उस्ताद!" उसने मेरे कंधे पकड़े। "उस्ताद, उठिए! सानिया, जल्दी आ!"

सानिया और गुड्डू और रफ़ीक़ तीनों अंदर आ गए। कोई पानी लाया। गुड्डू ने मेरे चेहरे पर हाथ फेरा, और उसकी हथेली में मिट्टी थी, और मुझे लगा मैं वहीं पड़ा हूँ, पीछे के प्लॉट में, गड्ढे के किनारे।

"मैं ठीक हूँ," मैंने कहा, और मेरी अपनी आवाज़ सुनकर मुझे लगा जैसे किसी और की आवाज़ सुन रहा हूँ। "पानी दे।"

पानी आया। पुराना स्टील का गिलास उसी हाथ ने पकड़ाया जिसे मैंने गिरधारी और मोहन को दिया था। मैंने पूरा पी लिया और गिलास फ़र्श पर रख दिया, और फिर पीछे झुककर अलमारी से पीठ टिका दी।

कमरे में चुप्पी थी। बल्ब का गुनगुनाना भारी लग रहा था, जैसे वो भी छुपकर सब सुन रहा हो।

"उस्ताद," टिंकू ने धीरे से कहा, और इस बार "उस्ताद" उसने ऐसे कहा जैसे किसी को नींद से उठा रहा हो। "आपने क्या देखा?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। बच्चा था, तेरह साल का, घुटने पर पट्टी बँधी, आँखों में वही तेज़ी जो हर वक़्त सवाल पूछती है। मुझे लगा अगर मैंने इससे झूठ बोला तो घंटी मेरे हाथ में ठंडी हो जाएगी।

"मैंने अपने दादा को देखा," मैंने कहा। "काग़ज़ पर अंगूठा लगाते हुए।"

टिंकू की आँखें बड़ी हो गईं।

"और?"

"और मैंने वो हाथ देखा जिसने घंटी तोड़ी," मैंने कहा। "वो हाथ मेरे दादा के हाथ नहीं थे, टिंकू।"

मैंने साँस ली।

"वो किसी तीसरे आदमी के थे। चमकते जूतों वाला कोई आदमी, जिसके हाथ में एक काग़ज़ था जिसके कोने पर लाल निशान था। और वहाँ एक चौथा भी था — बहुत जवान, सफ़ेद कमीज़ में। रणवीर भारद्वाज।"

टिंकू ने कुछ नहीं कहा। वो बैठ गया, मेरे सामने, फ़र्श पर, और उसने अपने घुटने सीने से लगा लिए।

"और इलियास चाचा?" सानिया ने पूछा। "वो वहाँ थे?"

"थे," मैंने कहा। "और उन्होंने बीच में आकर रोका। उन्होंने कहा — बस, अब नहीं। ये आख़िरी चीज़ है, इसे मत तोड़ो।"

मैंने हथेली खोली, जिसमें पट्टी रखी थी।

अब वो ठंडी नहीं थी। गरम थी, हल्की गरम, जैसे थोड़ी देर पहले किसी की जेब में रही हो।

और तब घंटी बोली।

उसकी आवाज़ आज पहले बहुत कठोर नहीं थी। थोड़ी धीमी थी, थोड़ी… कुछ और।

"देख लिया," उसने कहा।

"देख लिया," मैंने कहा।

"तो अब सुन। और इस बार मैं सवाल नहीं पूछूँगी। ये बस कहूँगी।"

"कह।"

"तेरा दादा मुजरिम नहीं था। वो भी बचाने आया था।"

मैंने आँखें बंद कर लीं।

"बचाने?" मैंने कहा। "वो अंगूठा लगा रहा था। वो काग़ज़ पर अपना नाम डाल रहा था।"

"वो काग़ज़ पर अपना नाम डाल रहा था," घंटी बोली, "क्योंकि उस काग़ज़ पर तुम्हारा नाम न आए, यही वो चाहता था। वो आया था दुकान बचाने, और जानता था कि उससे दुकान नहीं बचेगी। इसलिए उसने सिर्फ़ एक चीज़ बचाई — तुम्हें।"

कमरा शांत था। गुड्डू ने खाँसी रोक ली।

"और वो हाथ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ फटी। "जिसने घंटी तोड़ी?"

घंटी कुछ देर चुप रही। फिर बोली, इतने धीमे स्वर में कि मुझे लगा वो मेरी हथेली से नहीं, मेरी हड्डी से बोल रही है।

"वो हाथ आज भी ज़िंदा हैं।"

और मैं उस फ़र्श पर बैठा रह गया, हाथ में पीतल की पट्टी लिए, और पीछे के प्लॉट की तरफ़ से किसी ट्रक का हॉर्न बजा — लंबा, दूर से आता, अस्पताल की दीवार को छूकर लौट जाने वाला हॉर्न।

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा और कहा, "उस्ताद, वो तीसरा आदमी कौन था?"

मैंने पट्टी अपनी जेब में रखी, और उठकर खड़ा हो गया, और अपने घुटने झाड़े, और उसका जवाब देने से पहले घंटी की तरफ़ देखा।

घंटी ने कुछ नहीं कहा। वो चुप थी, पर उस चुप्पी में वो बात थी जो मुझे अभी अंदर से खुद ढूँढनी थी।

"पता नहीं," मैंने कहा। "पर एक बात पता है। वो आज भी ज़िंदा है, और आज भी उसके जूते चमकते होंगे।"

॥

मैं सीधे घर की तरफ़ चला। पीछे के प्लॉट से गुज़रते वक़्त मैंने एक बार पीछे मुड़कर नहीं देखा, क्योंकि मुझे पता था अगर देखा तो वहीं बैठ जाऊँगा। गड्ढा, फावड़ी, मिट्टी का ढेर, और उसके पीछे अस्पताल की पीली दीवार — ये सब मुझे बुला रहे थे, जैसे कोई कहे, आ जा, और थोड़ा खोद ले, और थोड़ा सच निकाल ले। पर आज नहीं। आज मुझे घर जाना था।

गली में शाम का वक़्त था। शबनम आपा की गुमटी पर कोयले की गरमी और समोसे की महक हवा में तैर रही थी। उस्ताद की दुकान से आज सिलाई मशीन की आवाज़ नहीं आ रही थी, सिर्फ़ दरवाज़े की कुंडी चुपचाप लटक रही थी। पीपल के नीचे चबूतरी खाली थी — बुज़ुर्ग अपने-अपने घर चले गए थे, और चबूतरी पर सिर्फ़ एक बूढ़ा रूमाल पड़ा था, जिसे किसी ने भूलकर छोड़ दिया था। गुड्डू और रफ़ीक़ दूर खड़े मुझे देख रहे थे, पर आज किसी ने कुछ नहीं पूछा। बच्चे भी समझ गए थे कि आज उस्ताद के पास वक़्त नहीं है।

घर का दरवाज़ा खुला था। अंदर से पंखे की धीमी खड़खड़ाहट आ रही थी। पापा फ़र्श पर बैठे थे, उसी पुराने पंखे के पास, जिसका तार टूटा हुआ था और जिसे वो पिछले तीन दिन से ठीक करने के बहाने बस छूते रहते थे। उनके सामने औज़ार बिखरे थे — पेचकस, प्लायर, तार का एक टुकड़ा, और एक छोटा टेप। कुछ भी जुड़ा नहीं था। मुझे लगा वो पंखा नहीं, कुछ और ठीक करने की कोशिश कर रहे थे, जो उनके हाथ में नहीं आ रहा था।

"पापा।"

उन्होंने सिर उठाया। चश्मा कान पर टेप से बँधा था, और उसकी एक डंडी कुछ दिनों से ढीली थी। उन्होंने मुझे देखा और फिर मेरे हाथ देखे। मेरी जेब से पीतल की पट्टी का कोना बाहर झाँक रहा था, जैसे कोई चोर दरवाज़े से आधा मुँह निकालकर देख रहा हो।

"क्या लाया?" उन्होंने पूछा।

मैंने जूते उतारे, फ़र्श पर बैठ गया, और पट्टी जेब से निकालकर उनके सामने रख दी। रसोई की लाइट कम थी, पर पीतल ने अपनी चमक नहीं छोड़ी थी। पट्टी पर दो लाइनें खुदी थीं। ऊपर — जगदीश यादव। नीचे — साइकिल। और बीच में छेद, जिसमें मेरी गले की चाबी तीन चौथाई तक फिट हुई थी।

पापा ने पट्टी को नहीं उठाया।

वो बस देखते रहे, बहुत देर तक, जैसे कोई पुराना नाम पढ़ रहे हों जिसे पढ़ना उन्होंने बंद कर दिया था।

"ये पीछे के प्लॉट से निकली," मैंने कहा। "उसी जगह से, जहाँ अस्पताल की दीवार के नीचे आज सुबह से गड्ढा खोदा जा रहा है। बच्चों ने देखा। सानिया ने पहले देखा।"

पापा की उँगली धीरे से पट्टी के किनारे पर गई और फिर रुक गई।

"और पापा," मैंने कहा, "मैंने घंटी की पुरानी परत खोली।"

तब उनका सिर उठा।

"क्या?"

"सत्तर अंक लगे," मैंने कहा। "मेरा हिसाब दो सौ अठाईस था। अब एक सौ अठ्ठावन बचा है। मैंने पच्चीस साल पहले का एक पल देखा, अपनी आँखों से। वही दुकान, वही गली, वही बिजलीघर का मोड़। और उसमें दादा थे।"

पापा ने औज़ार रख दिए।

"दादा काग़ज़ पर अंगूठा लगा रहे थे," मैंने कहा। "उनके सामने कोई सफ़ेद काग़ज़ था। और उस काग़ज़ के पास एक आदमी खड़ा था जिसके जूते चमकते थे और जिसके हाथ में एक और काग़ज़ था जिसके कोने पर लाल निशान था। इलियास चाचा वहाँ थे। जवान उस्ताद वहाँ थे। और एक चौथा आदमी भी था — जवान, सफ़ेद कमीज़ में। रणवीर भारद्वाज।"

पापा की साँस छोटी हो गई। वो कुछ देर चुप रहे और उनकी गर्दन की नस दबी रही, जैसे कोई रस्सी खींच रहा हो।

"और उस चमकते जूतों वाले आदमी ने घंटी तोड़ी," मैंने कहा। "इलियास चाचा ने हाथ उठाकर रोका — बस, अब नहीं। ये आख़िरी चीज़ है। पर वो नहीं रुका। उसने घंटी मेज़ पर पटकी, और घंटी टूट गई। और रणवीर ने टूटा पीतल का टुकड़ा उठाकर जेब में डाल लिया। फिर उसने दादा से पूछा — ताले की चाबी कहाँ है।"

मैंने एक पल रुककर अपनी साँस सँभाली।

"दादा चुप रहे। उन्होंने कुछ नहीं कहा। उन्होंने बस अपनी हथेली मेज़ पर खोलकर रख दी, जैसे कह रहे हों, मेरे पास बस यही है।"

कमरे में पंखे की खड़खड़ाहट भी अचानक शर्मिंदा लगने लगी।

पापा ने बहुत धीरे से, बिल्कुल सपाट आवाज़ में, वो शब्द कहे जो मैंने कभी उनके मुँह से नहीं सुने थे।

"मैं बताता हूँ।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा। वो सीधे बैठ गए। उनकी कमर आज झुकी नहीं थी। चश्मा वही टेप वाला था, पर आँखें आज किसी और आदमी की थीं।

"तेरे दादा ज़मीन नहीं बेच रहे थे," पापा ने कहा। "वो उस काग़ज़ पर अंगूठा अपने बेटे को बचाने के लिए लगा रहे थे।"

मैं कुछ नहीं बोला।

"उन दिनों मेरे ऊपर एक इल्ज़ाम था," पापा ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो झिझक नहीं थी जो पिछले पाँच साल से थी। "बिजलीघर के पीछे वाली गली में उस वक़्त एक पुरानी साइकिल की दुकान थी। किसी ने कहा कि मैंने उस दुकान से चीज़ें उठाईं। चोरी का इल्ज़ाम नहीं था, उससे भी बुरा था — कहा गया कि मैंने किसी बंधक रखी साइकिल को बेच दिया। बात झूठी थी, पर उस वक़्त उस बात को सच बनाने वाले दो गवाह मिल गए थे।"

"कौन?"

"वही जिनका नाम आज भी कोई नहीं लेता," पापा ने कहा। "और एक काग़ज़ था जिसमें लिखा था कि अगर मामला थाने गया, तो मुझ पर केस बनेगा। तेरे दादा ने वो काग़ज़ देखा। उन्होंने दो दिन सोचा। तीसरे दिन उन्होंने कहा — ठीक है, मैं अंगूठा लगा दूँगा।"

"पर उस काग़ज़ पर ज़मीन का ज़िक्र था—"

"काग़ज़ कई थे," पापा ने कहा। "जिस काग़ज़ पर उन्होंने अंगूठा लगाया, वो ऊपर की शीट थी। नीचे की शीट में लिखा था कि जगदीश यादव अपनी दुकान के हिस्से छोड़ रहे हैं, और उसके बदले उनके बेटे पर जो इल्ज़ाम है, वो हट जाएगा। तेरे दादा को पढ़ना नहीं आता था, पर उन्हें इतना समझ आ गया था कि जो आदमी उनके सामने बैठा है, वो दुकान भी लेगा और मेरा नाम भी बचाएगा। दोनों नहीं हो सकता था। इसलिए उन्होंने वो चुना जो उनके हिसाब से बड़ा था।"

"बेटा," मैंने धीरे से कहा।

"बेटा," पापा ने कहा, और उनकी आवाज़ पहली बार तोड़ी। "उन्होंने बेटा चुना। दुकान नहीं।"

मैंने नीचे देखा। मेरे हाथ फ़र्श पर थे, और उनमें से एक उँगली काँप रही थी, छोटी उँगली, जो हमेशा पहले काँपती है।

"और मैं," पापा ने कहा, "मैं उस दिन से उनकी नज़र में नहीं आ सका। वो मरे तब भी मैं उनके सामने यही आदमी था — वो आदमी जिसके लिए उन्होंने अंगूठा लगाया था। और पाँच साल पहले, जब तेरी माँ को इलाज के लिए पैसा चाहिए था, मैं उसी मेज़ के सामने फिर बैठा। उसी तरह। और मैंने अंगूठा लगा दिया।"

"पापा—"

"और उस काग़ज़ पर दो नाम लिखे थे," पापा ने कहा। "मेरा और तेरा। मैंने सिर्फ़ अपना अंगूठा लगाया। तेरी लाइन खाली छोड़ दी।"

"क्यों?"

"क्योंकि मैंने सोचा," पापा ने कहा, "कि अगर मेरे हिस्से की दुकान जाएगी, तो गली कहेगी कि शंकर यादव ने बेच दी। पर अगर तेरा नाम उस काग़ज़ पर होता, तो गली कहती कि बाप-बेटे दोनों ने मिलकर बेची। और मैं नहीं चाहता था कि तेरे नाम पर कोई उँगली उठाए। तेरे नाम पर कोई एक भी शब्द ऐसा न बोले जो मुझे सुनना पड़े।"

मुझे कुछ देर समझ नहीं आया कि मैं क्या महसूस कर रहा हूँ। गुस्सा आया — यही तो मुझे सबसे ज़्यादा डराता है। मुझे गुस्सा आया कि मेरी उम्र के हिसाब से मुझे इतना सब क्यों नहीं बताया गया। फिर गुस्सा उतर गया, और उसकी जगह कुछ और आ गया जो बहुत भारी था, जैसे किसी ने मेरे सीने में गीली रेत भर दी हो।

क्योंकि मैं जानता था यह डर कहाँ से आया है। मैं दो साल से अपने अंदर यह मानकर चल रहा था कि मैं अपने घर को बचा नहीं पाऊँगा। मैंने ये बात किसी को नहीं कही थी, काजल को भी नहीं, माँ को भी नहीं। और अब पता चल रहा था कि यह डर मेरा नहीं है। यह मुझे विरासत में मिला है, खून से नहीं, चुप्पी से।

"पापा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ थोड़ी ऊँची थी, "आपने पाँच साल ये सब अकेले सहा।"

"सहा नहीं," पापा ने कहा। "छुपाया।"

"वही तो।" मैं उठकर खड़ा हो गया। "आपने छुपाया। मैंने भी दो साल से यही किया। मैंने सोचा था ये मेरा स्वभाव है, मैं ऐसा ही हूँ, मैं हर चीज़ खुद ठीक करता हूँ। पर आज पता चला कि ये मेरा स्वभाव नहीं है, पापा। ये आपकी चुप्पी है जो मेरे अंदर बैठ गई।"

पापा ने कुछ नहीं कहा।

"और मैं आज ये साफ़ कह रहा हूँ," मैंने कहा। "मैं अकेले नहीं लड़ूँगा।"

मेरी आवाज़ अपने ही कानों में अजीब लगी — जैसे कोई पहली बार अपनी भाषा में कुछ बोल रहा हो।

"मैं अकेले नहीं लड़ूँगा," मैंने फिर कहा, इस बार धीरे। "मैं गली, अस्पताल, उस्ताद, मीरा, टिंकू, काजल, माँ, आप — मैं इन सबको साथ लूँगा। अकेले अगर लड़ा तो रणवीर जीत जाएगा, क्योंकि वो आदमी ही ऐसा है जो सिर्फ़ तब जीतता है जब कोई अकेला हो।"

तब पीछे से माँ की आवाज़ आई।

"ये गली का कौन सा लड़का है जो इतनी बड़ी बातें कर रहा है?"

मैं मुड़ा। माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं। एक हाथ दरवाज़े के चौखट पर, दूसरे हाथ में वो छोटा कपड़े का थैला, जो अस्पताल में उनके साथ था। काजल उनके पीछे खड़ी थी, मुँह में एक नारियल का टुकड़ा, और मुँह में घुसाकर मुस्कुरा रही थी। डॉक्टर इसरानी ने शाम को घर जाने की इजाज़त दे दी थी — बस इतनी शर्त पर कि सुबह सात बजे की जाँच से पहले अस्पताल लौटना होगा।

मैं दौड़कर पास गया।

"आपको आना नहीं था।"

"अच्छा," माँ ने कहा, और मेरा हाथ झटक दिया, पर हल्के से। "तो तू बीमार पड़ता और मैं अस्पताल में बैठकर तेरी फ़िक्र करती रहती। ये ज़्यादा अच्छा था?"

वो अंदर आईं, सीधे रसोई की तरफ़ गईं, चूल्हे के पास खड़ी होकर एक पल रुकीं, और फिर पलटकर मेरी तरफ़ देखा।

"तूने खाया?"

"माँ—"

"पूछा, खाया?"

"नहीं।"

"तो सुन," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो कड़क थी जो पूरी गली जानती है। "आज खाना मैं बनाऊँगी।"

मैं हँस पड़ा। सच में हँसा — उस शाम की पहली असली हँसी।

"माँ," मैंने कहा, "आपकी दाल अब भी गली की सबसे अच्छी दाल है।"

"हाँ?"

"बस नमक कम है।"

काजल ने नारियल का टुकड़ा ज़ोर से चबाया और कहा, "ये मैंने भी कई बार सोचा है पर कभी कहा नहीं।"

माँ ने काजल की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़, फिर उन्होंने साड़ी का पल्लू कमर में और कसकर खोंसा, जो उनके गुस्से का सबसे साफ़ इशारा है।

"नमक कम है," माँ ने कहा, "क्योंकि डॉक्टर साहब ने कहा है।"

"तो डॉक्टर साहब के लिए अलग बनाइए," मैंने कहा, "हमारे लिए अलग।"

"बहुत होशियार है तू।" और वो हँसीं। अस्पताल से लौटकर, दो दिन की भर्ती के बाद, दो जाँचों से पहले — वो हँसीं।

पापा अब भी फ़र्श पर बैठे थे। माँ ने उनकी तरफ़ देखा, और उनके चेहरे पर कुछ बदला। वो उनके पास नहीं गईं, बस चूल्हे के पास खड़ी रहकर बोलीं, "तुमने बता दिया?"

पापा ने सिर हिलाया।

"पूरा?"

पापा ने फिर सिर हिलाया।

"तो अब बाकी है क्या?" माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ अचानक नरम हो गई थी। "कुछ नहीं बचा। पाँच साल का हिसाब है, शंकर। अब बस उसे सभा में कहना है, और चुप रह जाना।"

मैंने उन दोनों के बीच देखा, और मुझे पहली बार लगा कि मेरे माँ-पापा एक ही कमरे में दो अलग-अलग कहानियाँ नहीं जी रहे थे। वो एक ही कहानी जी रहे थे, बस दोनों ने एक-दूसरे से छुपाकर।

तभी दरवाज़े पर खटखट हुई।

काजल ने दरवाज़ा खोला, और बाहर मीरा खड़ी थी। कंधे तक कटे बाल, कंधे पर फटा बैग, एक हाथ में छोटा कैमरा, और दूसरे हाथ में एक पतला लिफ़ाफ़ा जो उसने पूरी शाम से नहीं छोड़ा था।

"अंदर आओ," माँ ने कहा, बिना पूछे। "चाय पी लो।"

"आंटी, आप ठीक हैं?"

"मैं ठीक हूँ," माँ ने कहा। "मेरा बेटा नहीं है। ये सुबह से एक ही जगह पर खड़ा है, चलता नहीं, बैठता नहीं, बोलता नहीं। तुम इसे ले जाओ, मुझे दाल चढ़ानी है।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने बाहर आँगन की तरफ़ इशारा किया।

डीवार के पास, उसी पुराने पत्थर के टैंक के किनारे, हम दोनों बैठ गए। ऊपर आसमान में पहला तारा दिख रहा था, और गली की एक खिड़की से रेडियो की आवाज़ आ रही थी।

"तुम्हारे पास क्या है?" मीरा ने पूछा।

मैंने जेब से पीतल की पट्टी निकाली और उसकी हथेली पर रख दी।

उसने पढ़ा। उसकी उँगली अक्षरों के ऊपर चली।

"जगदीश यादव," उसने कहा। "ये तुम्हारे दादा?"

"हाँ।"

"और नीचे साइकिल?"

"पता नहीं," मैंने कहा। "पूरा पता नहीं।"

वो मेरी तरफ़ देखने लगी। और उसने वो नज़र डाली जो वो तब डालती है जब किसी को सच बोलने पर मजबूर करना होती है — दो सेकंड का सीधा सन्नाटा।

"अंकुश," उसने कहा। "तुम कुछ छिपा रहे हो।"

मैंने देखा — मेरे अंदर एक लाइन थी जहाँ से आगे झूठ शुरू होता है। मैंने उस लाइन पर पैर रखा, और तुरंत मेरी जेब में घंटी ठंडी हो गई। एक छोटी सी ठंडक, दाँत जैसी।

मैंने साँस छोड़ दी।

"छिपा रहा हूँ," मैंने कहा। "पर झूठ नहीं बोलूँगा, क्योंकि आज मेरे पास झूठ बोलने की गुंजाइश नहीं है। जो मैं तुम्हें बता सकता हूँ, वो ये — ये पट्टी कल शाम अस्पताल के पीछे के प्लॉट से निकली है। उसी प्लॉट से जहाँ दो दिन बाद सुबह सात बजे मशीन आएगी। और ये पट्टी पच्चीस साल पहले की किसी चीज़ से जुड़ी है। बात मैं पूरी नहीं कह सकता। कुछ मेरी है, कुछ और लोगों की, और कुछ ऐसी है कि अगर मैंने अभी बताई तो किसी की जान या किसी का घर दाँव पर लग जाएगा।"

मीरा कुछ देर चुप बैठी रही।

"अच्छा," उसने कहा। "कम से कम तुमने झूठ नहीं बोला। बाकी लोग मुझसे यही करते हैं — वो मुझे आधा सच देकर सो जाते हैं, और मैं आधा सच पूरा मानकर सुबह अख़बार में छाप देती हूँ।"

उसकी आवाज़ में वो कड़वाहट थी जो आज पहली बार साफ़ सुनाई दी।

"मुझे इसकी फ़ोटो चाहिए," मीरा ने कहा। "दोनों तरफ़ की। साफ़, ऐसी कि अक्षर पढ़े जाएँ।"

"क्यों?"

"क्योंकि तुम्हारे पास ये पट्टी है," उसने कहा, "पर इसका पता नहीं कि ये पट्टी क्या है। और मुझे यह भी नहीं पता। पर मैं जानती हूँ कि अगर ये सच में पच्चीस साल पुरानी चीज़ है, तो इसके अक्षर एक दिन अदालत में काम आएँगे। और अदालत में चीज़ें हाथ से खो जाती हैं। फोटो नहीं खोती।"

मैंने पट्टी उसके सामने रख दी, और उसने फ़्लैश जलाकर चार फोटो लीं — ऊपर से, नीचे से, तिरछी, और पास से। फिर उसने मेरी गले की चाबी की तरफ़ देखा, जो आज पहली बार मेरी कमीज़ के बाहर आई हुई थी, क्योंकि मैंने उसे पट्टी के छेद में फँसाया हुआ था।

"वो क्या है?"

"चाबी," मैंने कहा।

"किसकी?"

"पापा ने दी थी। पंद्रह सोलह साल की उम्र में। किस चीज़ की है, नहीं बताया।"

मीरा ने चाबी को देखा, और फिर पट्टी के छेद को, और मैंने उसकी आँखों में वो चीज़ देखी जो पत्रकारों की आँखों में होती है जब दो अलग-अलग काग़ज़ एक ही कहानी बनने लगते हैं।

उसने कैमरा बंद किया और बैग में रखा।

"आज रात मैं खुद पीछे वाला काग़ज़ देखूँगी," उसने कहा।

"कौन सा काग़ज़?"

"वही जो अस्पताल के रिकॉर्ड में है। नीलामी का काग़ज़, नक्शा, और वो सूची जिसमें तेरी दुकान सातवें नंबर पर है। जब वो काग़ज़ कोई नहीं देखता, तब असली बातें दिखती हैं। मैंने ये किसी को नहीं बताया, खुद ही करूँगी।"

"तुम अकेली जाओगी?"

"मैं दो साल से अकेली ही जाती हूँ," उसने कहा। और फिर रुककर जोड़ा, "पर आज पहली बार किसी ने मुझसे पूछा। इसलिए बता देती हूँ — नहीं, अगले हफ़्ते से अकेली नहीं जाऊँगी।"

वो उठी, दुपट्टा ठीक किया, और जाते-जाते दरवाज़े पर रुकी।

"अंकुश, एक बात। तुम्हारी आवाज़ में अब वो हल्कापन नहीं है जो सुबह था।"

"अच्छी बात है या बुरी?"

"पता नहीं," उसने कहा। "पर मुझे लगता है अब तुम से सीधे सवाल पूछे जा सकते हैं।" और वो चली गई।

मैं आँगन में खड़ा रह गया। पीछे रसोई से तड़के की आवाज़ आ रही थी, और माँ कुछ गुनगुना रही थीं — वही पुरानी फ़िल्मी धुन, जो वो हमेशा तब गुनगुनाती हैं जब मन ठीक न हो और दिखाना न हो।

तभी गली के मोड़ से उस्ताद अली बक्श आते दिखे।

वो आम दिनों में शाम सात बजे के बाद दुकान से बाहर नहीं निकलते। आज वो आ रहे थे — धीरे, एक हाथ लाठी पर, दूसरे हाथ में वो मोटा चश्मा जो उन्होंने आँख पर पहना हुआ था और जिस पर पेंसिल फँसी थी।

"उस्ताद।"

उन्होंने हाथ उठाकर मुझे रोका, और पहले मेरे आँगन में झाँका, फिर मेरी तरफ़ आकर बहुत धीरे से कहा, "अंदर चल।"

दुकान के पीछे वाले कमरे में हम गए। टिंकू वहीं था — चारपाई के किनारे बैठा, हाथ में रिंच पकड़े, जिसे छूने की इजाज़त उसे अब मिल गई थी। उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा और फिर मेरी तरफ़।

"ये सुन ले," उन्होंने कहा। "आज शाम को नए बाज़ार में दो आदमी चाय पी रहे थे। मेरा भांजा वहाँ काम करता है, गुमटी पर। एक आदमी ने कहा — बड़े साहब ने आज सुबह से ही किसी को भेज रखा है। दूसरे ने पूछा, किस लिए। पहले ने कहा — पता करने, कि घंटी जागी है या नहीं।"

मेरा हाथ अपने आप जेब की तरफ़ गया।

"और?" मैंने कहा।

"और," उस्ताद ने कहा, "उनका जवाब था — हाँ, जाग गई।"

उस्ताद ने लाठी दीवार के सहारे खड़ी की। उनकी आवाज़ में वो थकान थी जो सिर्फ़ उन आदमियों में होती है जो एक ही कहानी को दो बार जी चुके हैं।

"अंकुश, मैंने तुझे पहले भी कहा था — घंटी बाज़ार में मत दिखाना। तूने आज पूरे मोहल्ले के सामने पीतल की पट्टी उठाई। गली में चार आदमी बैठे थे, दो खड़े थे, और एक बच्चा छत पर था। आज शाम तक बात नए बाज़ार पहुँच चुकी है।"

"तो क्या होगा?"

"जो पच्चीस साल पहले हुआ," उस्ताद ने कहा, और उनकी आवाज़ अचानक बहुत धीमी हो गई। "वो पहले काग़ज़ लाएँगे। फिर अंगूठा माँगेंगे। फिर घंटी माँगेंगे। और जब तीनों न मिलें, तब वो चीज़ तोड़ेंगे जिसे तोड़ने में ताक़त नहीं लगती — भरोसा।"

मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। बच्चा सुन रहा था, और उसका हाथ रिंच पर कस गया था।

"उस्ताद," मैंने कहा, "आपने पच्चीस साल पहले उनको रोका था। आप जानते हैं वो क्या करेंगे?"

"हाँ।"

"तो बताइए क्या करें।"

उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें बहुत पुरानी थीं, और उसमें वो चीज़ थी जो इंसान के पास तब आती है जब वो अपनी सबसे बड़ी गलती की नक़ल होते देखता है।

"एक चीज़," उन्होंने कहा। "रात को कोई अकेला मत छोड़ना। जो भी हो, सब एक छत के नीचे, या सब एक गली में। वो आदमी भीड़ से नहीं डरता। वो अकेलेपन से डरता है।"

फिर उन्होंने मेरी जेब की तरफ़ देखा, जहाँ घंटी थी।

"और इसे मत खोना," उन्होंने कहा। "ये मिरासी है। मिरासी का हिसाब भारी होता है, और इसका हिसाब आज रात से शुरू हो रहा है।"

वो जाने लगे, फिर दरवाज़े पर रुके।

"अंकुश, इलियास आया था?"

"हाँ," मैंने कहा। "कल।"

"वो क्या लाया?"

"एक कपड़े में लिपटा बंडल," मैंने कहा। "और उसमें शंकर यादव के पिता वाला एक पीला काग़ज़ था। नीली स्याही, लाल अंगूठा, दुकान की गिरवी का हिसाब।"

उस्ताद ने आँखें बंद कर लीं।

"तो वो भी निकाल लाया," उन्होंने कहा, इतने धीमे कि मुझे लगा वो खुद से बोल रहे हैं। "पचास साल में पहली बार।"

"उस्ताद, वो काग़ज़ क्या है?"

"वो काग़ज़," उस्ताद ने कहा, "तेरे घर के दो दरवाज़ों के बीच रखा हुआ है। जब तेरा घर खुलेगा, तब वो खुलेगा। और मैं तुझे आज सिर्फ़ इतना बताऊँगा कि उस काग़ज़ पर जो अंगूठा है, वो तेरे दादा का नहीं है।"

मैं जम गया।

"किसका है?"

"कल सुबह," उस्ताद ने कहा, और चले गए।

घंटी ने कुछ नहीं कहा। वो चुप थी, और उस चुप्पी में इतना वज़न था कि मैं कुछ देर ट्रंक के पास बैठा रह गया। टिंकू ने मेरे पास आकर बैठना चाहा, फिर रुक गया, फिर बैठ गया, और उसने कोई सवाल नहीं पूछा। मेरे लिए वो आज की सबसे बड़ी बात थी। तेरह साल का लड़का, जो बिना सवाल पूछे बैठ गया था।

रात के खाने में माँ ने दाल बनाई। नमक कम था, और मैंने कुछ नहीं कहा। पापा ने दो रोटी खाईं, जो उनके हिसाब से बहुत थी। काजल ने तीन बार पानी माँगा। मैंने अपनी प्लेट पूरी खाली की, और माँ ने देखा और कुछ नहीं कहा, पर उनके हाथ का काँपना कम हो गया था।

फिर काजल अस्पताल लौट गई — रात की ड्यूटी पर, डॉक्टर इसरानी के साथ, सफ़ेद कोट में। पापा चारपाई पर लेट गए, पर मैं जानता हूँ वो सोए नहीं; उनकी साँस की आवाज़ सोए हुए आदमी की नहीं थी। माँ रसोई समेटकर बैठीं, और मुझे लगा वो मुझसे कुछ कहना चाहती हैं, पर मैं चुप था, इसलिए उन्होंने भी चुप रहना चुना।

मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में आया। बल्ब गुनगुना रहा था। मैंने ट्रंक खोला, औज़ार देखे, फिर बंद कर दिया। रिंच वहीं रखी थी जहाँ टिंकू ने छोड़ी थी। मैंने चाबी गले से निकाली और पट्टी के छेद में फिर फँसाई — इस बार पूरी। तीन चौथाई से ज़्यादा। चार पाँच बार घुमाया, और छोड़ दिया।

फिर मैं उस छोटी छत पर चढ़ गया — आधी ईंट, आधी टीन वाली छत। वहाँ से पूरी गली दिखती है। पीपल, पत्थर की चबूतरी, उस्ताद की बंद दुकान, शबनम आपा की गुमटी की बुझती लालटेन, और दूर अस्पताल की पीली दीवार, जिस पर रणवीर का पोस्टर चिपका था। अस्पताल की खिड़कियों में रोशनी थी। कोई भीतर जाग रहा था।

मैंने घंटी जेब से निकाली और हथेली में रखी।

"एक बात पूछूँ?"

घंटी चुप रही।

"वो काग़ज़, जिस पर अंगूठा दादा का नहीं है — उस पर किसका है?"

घंटी बोली, बहुत धीमे, जैसे बहुत दूर से आ रही हो।

"जिस आदमी ने तेरे पापा को बचाया था, उसका।"

"कौन?"

"वो जो तेरे घर के सबसे पुराने दरवाज़े के पीछे रहता है," घंटी ने कहा। "और आज से पहले तू उसे कभी नहीं देखा, क्योंकि तूने कभी उस दरवाज़े को खोला ही नहीं।"

"मेरे घर में कोई बंद दरवाज़ा नहीं है।"

"तो कल खोजना," घंटी ने कहा। "आज रात मत। आज रात तेरा काम अलग है।"

"क्या काम?"

"तेरे पास आने वाले को सुनना।"

मैं समझा नहीं। मैंने पूछने के लिए मुँह खोला, पर तभी मेरी जेब में घंटी ठंडी हो गई — इतनी ठंडी कि जैसे बर्फ़ की सुई।

और नीचे, गली से, किसी के दौड़ने की आवाज़ आई।

वो दौड़ पहचानी हुई थी। चप्पल का तेज़ फिसलना, और बीच-बीच में साँस फूलने की आवाज़। मैंने नीचे झाँका, और छत की किनारी पर मेरा हाथ कस गया।

काजल थी। सफ़ेद कोट में, बाल खुले हुए, हाथ में स्टेथोस्कोप जिसकी नली उलझी हुई थी, और चेहरे पर वो रंग जो मैंने पहले सिर्फ़ एक बार देखा था — उस रात, जब हम दोनों अस्पताल की सीढ़ियों पर खड़े थे।

वो दुकान के दरवाज़े तक दौड़ी, और उसने ज़ोर से दरवाज़ा पीटा।

"भैया! भैया, नीचे आ!"

मैं सीढ़ी से उतरा, और मेरे पैर फिसलते-फिसलते बचे।

"क्या हुआ?"

काजल ने एक हाथ दरवाज़े के चौखट पर टिकाया, और अपनी साँस सँभालने की कोशिश की, और नहीं सँभाल पाई।

"अस्पताल की बिजली काट दी गई है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ काँप रही थी, और वो काँप रही थी, और मुझे लगा वो गिर पड़ेगी। "पूरी इमारत में अंधेरा है। जनरेटर भी नहीं चला। डॉक्टर साहब ने मोमबत्ती जलाकर मरीज़ देखे, और माँ की दवा फ्रिज में रखी है — भैया, दवा फ्रिज में है!"

मैंने उसका कंधा पकड़ा।

"बिजली क्यों गई?"

"बोर्ड वाले कह रहे हैं कि केबल में गड़बड़ी है," काजल ने कहा, और फिर उसने मेरी आँखों में देखा और उसकी आवाज़ और धीमी हो गई। "पर भैया, मैंने देखा। बिजली के खंभे पर कोई चढ़कर तार काटकर नहीं उतरा — जाने कब काटा गया, कोई शोर नहीं, कुछ नहीं। पहले से काटकर रखा था।"

मेरे हाथ से घंटी निकली और चारपाई पर गिरी, और उसने एक बहुत छोटी आवाज़ की — टन।

"और एक बात," काजल ने कहा, और उसने अपने होंठ काटे। "अस्पताल की पिछली दीवार पर आज शाम एक नई पट्टी लग गई है। मैंने उसे अंधेरे में छुआ। लोहे का बोर्ड है, बड़ा, और उस पर कुछ लिखा है।"

"क्या लिखा है?"

काजल ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखें भरी हुई थीं, पर उसने रोना नहीं चुना।

"लिखा है — यह ज़मीन भारद्वाज कंस्ट्रक्शन की है। और नीचे, छोटे अक्षरों में, अस्पताल के काम का आख़िरी दिन भी लिखा है, भैया। वो दिन मशीन वाले दिन के ठीक बाद है।"

मैं कुछ देर खड़ा रहा। गली बिल्कुल शांत थी, और उस शांति में सिर्फ़ दूर से आती हुई किसी ट्रक की आवाज़ थी।

मैंने चारपाई से घंटी उठाई। वो ठंडी नहीं थी। हल्की गरम थी।

"अब?" काजल ने कहा।

मैंने चाबी गले से निकाली, पट्टी जेब से, और घंटी हथेली में रखी।

"अब हम दोनों जा रहे हैं वहाँ," मैंने कहा। "और जाते-जाते रास्ते में उन बुज़ुर्गों को उठा लेंगे जो चबूतरी पर बैठते हैं। अब कोई अकेला नहीं जाएगा, काजल। अब से नहीं।"

ऊपर की छत पर बल्ब गुनगुना रहा था, और मेरी मुट्ठी में घंटी ने बहुत धीमे से आवाज़ दी — एक ही बात।

"अब ताले की बारी नहीं," उसने कहा। "अब लोगों की बारी है।"

॥

रात के करीब दो बजे थे जब मैंने उस्ताद अली बक्श की दुकान का दरवाज़ा खटखटाया। दो बजे किसी के दरवाज़े पर हाथ रखना अपने आप में एक जुर्म लगता है, पर उस रात मेरे पास कोई और रास्ता नहीं था।

दरवाज़ा खुला, और उस्ताद बाहर आए — पूरे कपड़े पहने हुए, चश्मा लगा हुआ, कान पर पेंसिल, और हाथ में रुमाल।

"मुझे पता था," उन्होंने कहा, और मुझे कोई सवाल पूछने की ज़रूरत नहीं पड़ी। "पिछले एक घंटे से मैं चप्पल पहनकर बैठा हूँ। आवाज़ आई थी — दूर, बहुत दूर।"

"कैसी आवाज़, उस्ताद?"

"घंटी की," उन्होंने कहा, और उन्होंने दरवाज़े पर ताला लगाना शुरू किया, पर हाथ काँप रहा था। "पर वो मेरी घंटी नहीं थी। मेरी घंटी सिर्फ़ सुनती है। वो बोल रही थी। इलियास की घंटी बोल रही थी।"

काजल ने मेरी कलाई पकड़ ली।

"भैया, चलो पहले अस्पताल।"

"एक मिनट," मैंने कहा, और फिर उस्ताद की तरफ़ देखा। "उस्ताद, चबूतरी पर बंसी बाबा और रहमत बाबा सो रहे होंगे।"

उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने पहले कभी नहीं देखी — डर नहीं, थकान। पचास साल की थकान।

"मैं उन्हें उठाता हूँ," उन्होंने कहा। "तू अपनी माँ की दवा की सोच। मैं उन्हें लेकर आता हूँ।"

और वो गए। सत्तर साल का आदमी, रात के दो बजे, अंधेरी गली में, बुज़ुर्गों को उठाने।

यह सोचकर आज भी मेरा गला भर आता है।

अस्पताल पहुँचे तो पूरी इमारत काली थी। दो मंज़िला, पीली दीवारें, और उन दीवारों पर अंधेरा ऐसे बैठा था जैसे किसी ने स्याही उँडेल दी हो। गेट का लोहे का दरवाज़ा खुला था, और अंदर से मोमबत्ती की पीली रोशनी निकल रही थी।

डॉक्टर इसरानी पहली मंज़िल के गलियारे में खड़े थे, हाथ में मोमबत्ती, और उस मोमबत्ती के नीचे उनका चेहरा इतना पुराना लग रहा था जितना कि मैंने कभी नहीं देखा। उनके साथ कोई तीस साल का लड़का था, जो एक छोटी बैटरी-लालटेन लिए खड़ा था।

"आ गए," उन्होंने कहा, बिना शिकायत, बिना कोई सवाल। "शंकर यादव की दवा ठीक है। मैंने उसे लालटेन वाले कमरे में रखवा दिया है, और घड़ी पर नज़र रखे हुए हूँ। दो घंटे में बर्फ़ ख़त्म हो जाएगी।"

"बर्फ़ कहाँ से?"

"शबनम बहन ने भेजी," डॉक्टर ने कहा। "उसकी गुमटी में ठेले वाले के लिए बर्फ़ रहती है। उसने कहा — अस्पताल के लिए ले जाओ। और मैंने एक शर्त मानी।"

"क्या शर्त?"

"मैंने कहा कि सुबह उसका चूल्हा नहीं बुझेगा," डॉक्टर ने कहा, और पहली बार मुस्कुराए। "उसने कहा — मेरा चूल्हा चालीस साल से नहीं बुझा, डॉक्टर साहब। आप अपना दवाखाना बचाइए।"

मैं कुछ देर उस गलियारे में खड़ा रहा, और मेरी मुट्ठी में घंटी चुप थी।

माँ दूसरे कमरे में थीं। एक मोमबत्ती जल रही थी, और उसकी रोशनी में माँ का चेहरा ऐसे दिख रहा था जैसे कोई पुरानी तस्वीर अचानक सामने आ गई हो। उन्होंने मुझे देखा, और पहला सवाल यह पूछा —

"खाना खाया?"

"माँ, रात के दो बज रहे हैं।"

"तो जवाब दे। खाया कि नहीं?"

"नहीं।"

"तो अब खा। मेरे बैग में रोटी है, काजल ने रखी थी।"

काजल ने मेरी तरफ़ देखा और कंधे उचकाए, जैसे कह रही हो — मैंने कहा था न, माँ को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि बिजली गई है या दुनिया बदल गई है।

मैंने रोटी खाई। ठंडी थी, और उसमें माँ के हाथ का अजवाइन था, और मुझे ऐसा लगा कि उस रात उसी ठंडी रोटी से मैं ज़िंदा हूँ।

फिर चार बजे के करीब बिजली आ गई।

पूरी इमारत एक झटके में जाग गई। बल्ब बल्ब गुनगुनाने लगे, फ्रिज फिर से गरमाहट छोड़ने लगा, और डॉक्टर ने मेरी तरफ़ देखा और सिर्फ़ इतना कहा —

"वो तार जानबूझकर काटा गया था। आज से मैं अपने खर्चे पर एक छोटा जनरेटर लगवाऊँगा।"

"डॉक्टर साहब, पैसे?"

"पैसे फूँकने के लिए हैं, बेटा। अस्पताल ज़मीन के लिए नहीं।"

और वो मोमबत्ती लेकर मरीज़ देखने चले गए, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

मैं तुमसे झूठ नहीं बोलूँगा — उस वक़्त मुझे डॉक्टर इसरानी से जलन हुई। नहीं, जलन नहीं। शर्म। मैं घंटी लेकर घूमता हूँ, उनके पास मोमबत्ती है, और उन्होंने मुझसे ज़्यादा काम किया।

सुबह छह बजे माँ की पहली जाँच करवाई गई। काजल सफ़ेद कोट में दिख रही थी, और सच कहूँ तो वो उस कपड़े में ऐसी लग रही थी जैसे बड़ी हो गई हो। मेरे सामने वो आठ साल की लड़की थी जो मेरी साइकिल की घंटी बजाकर भाग जाती थी। आज वो सुई पकड़े खड़ी थी, और उसके हाथ नहीं काँप रहे थे।

करीब सात बजे जब हम रिसेप्शन की तरफ़ आए, तो मैंने माँ की दवा का खाली डिब्बा उठाया और फिर रुक गया।

अस्पताल के बाहर, गेट के सामने की दीवार पर, एक बड़ी पीली पट्टी लगी थी।

इतनी बड़ी कि उस पर ट्रक का नंबर लिखा जा सकता था। इतनी बड़ी कि मुझे लगा किसी ने दीवार पर पीला कंबल चिपका दिया है।

और पेंट गीला था।

मैंने उँगली लगाई, और मेरी उँगली पर पीला रंग चढ़ गया।

पट्टी पर बड़े अक्षरों में लिखा था — "यहाँ नई इमारत बनेगी। पुराना दवाखाना हटेगा।"

उसके नीचे छोटे अक्षरों में — "भारद्वाज कंस्ट्रक्शन। शहर का विकास, हमारी ज़िम्मेदारी।"

और उसके नीचे, एक बहुत छोटी लाइन में, एक तारीख़।

और सबसे नीचे, बीच में, रणवीर भारद्वाज की तस्वीर — हाथ जोड़े हुए, मुस्कान, सफ़ेद कुर्ता।

मेरे पीछे किसी ने साँस ली, और मुझे पता चला कि माँ खिड़की से नहीं, सीढ़ी से नीचे उतर आई थीं और मेरे ठीक पीछे खड़ी थीं।

"माँ, आपको चलना नहीं था।"

"क्या लिखा है?" उन्होंने पूछा।

मैंने पढ़कर सुनाया।

माँ ने कुछ देर उस तस्वीर को देखा, और फिर उन्होंने वही कहा जो सिर्फ़ वो कह सकती थीं।

"तस्वीर में हाथ जोड़े हैं, बेटा। हाथ में कुछ नहीं है। असली आदमी भी कुछ नहीं देता। पक्का समझ ले — यह दवाखाना इसके हाथ-जोड़े से नहीं हटेगा। और तू यहाँ खाली हाथ खड़ा है, इसलिए तेरे से भी नहीं रुकेगा। कुछ लेकर आ।"

"क्या लाऊँ?"

"सबूत," माँ ने कहा, और फिर खाँसकर रुक गईं, और काजल ने उनका हाथ पकड़ लिया। "और एक बात सुन ले। मैं इसी अस्पताल में रहूँगी। चाहे जो हो। मैं यहाँ से दूसरे दवाखाने में नहीं जाऊँगी, क्योंकि यहाँ मेरी दवा है, और यहाँ इसके लिए मेरा पैसा है।"

अब गेट के बाहर।

बबलू के चार आदमी फ़ीता लेकर ज़मीन नाप रहे थे।

एक फ़ीते का सिरा पकड़े खड़ा था, एक खींच रहा था, एक जेब से छोटा काग़ज़ निकालकर गिन रहा था, और चौथा — कमल का फूल जैसा एक आदमी — हर नाप पर एक कील ज़मीन में ठोंक रहा था। ठन, ठन, ठन।

उस आवाज़ से मेरे कान में जैसे मच्छर घुस गया।

और मरीज़ों की कतार?

वो कतार चार दिन से उसी दरवाज़े के सामने लगती थी। आज वो कतार डर से खिसक रही थी। कोई किसी से बात नहीं कर रहा था, पर सब एक-एक कदम पीछे हट रहे थे। जैसे रेलवे स्टेशन पर यह खबर फैल जाए कि ट्रेन रद्द है, और लोग बस इधर-उधर देखते रह जाते हैं।

एक बूढ़ा आदमी अपनी साइकिल पर बैठा रो रहा था।

मैं उसे पहचानता हूँ। यह वही आदमी है जो अपनी औरत को रोज़ साइकिल पर लाकर अस्पताल के सामने उतारता है। साइकिल ऐसी है कि उस पर बैठने की जगह एक ही है — बैठने वाला पीछे, पैर लटकाकर, और हाथ में बासी रोटी का डिब्बा। वो रोज़ सुबह आता है, औरत को बिठाता है, और फिर पूरी दोपहर बाहर बैठा रहता है।

आज वो डर रहा था।

"भाई," उसने मुझसे कहा, और उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई बच्चा पूछ रहा हो। "ये दवाखाना हट गया तो मेरी औरत को कौन देखेगा? नए दवाखाने में चार सौ रुपये लगते हैं, भाई। मेरे पास चार रुपये नहीं होते शाम को।"

मैं कुछ नहीं बोला। मेरे पास ऐसा कोई जवाब नहीं था।

और तभी फ़ीता लेकर नापने वाला एक आदमी उस आदमी के पास आया और उससे कहा —

"काका, ज़रा हट जाइए। नाप में आ रहे हैं।"

तुम सोच रहे होगे कि मैंने उसे झापड़ क्यों नहीं लगाया।

मैंने सोचा। बहुत सोचा। पर मैं जानता था कि झापड़ से आस्पताल काग़ज़ की तारीख़ से कुछ दिन आगे नहीं खिंचेगा, और उससे पीछे मेरा गला ज़रूर पकड़ा जाएगा।

इसलिए मैंने आवाज़ निकाली, बहुत आराम से।

"भाई साहब, इतनी जल्दी क्या है? दवाखाने की दीवारें भी आपसे पहले टूटेंगी। बीस साल से घास नहीं छुई उनको, आप चार दिन में मशीन लाने की बात कर रहे हो।"

नापने वाले ने फ़ीता ज़मीन पर गिरा दिया और मेरी तरफ़ देखा।

"तू कौन है?"

"मैं वो हूँ जिसने यह दुकान उस दीवार के उस पार खोली है," मैंने कहा, और पीछे मुड़कर गली की तरफ़ इशारा किया, "जहाँ कुत्ता भी नहीं जाता था। मेरे पास आठ रुपये की चाय है, तुम्हारे पास एक फ़ीता है। दोनों में ईमानदारी से देख लो — किसका काम पहले होगा।"

कमल जैसे चेहरे वाला आदमी आगे आया। "बबलू साहब से पूछ लेना।"

"बबलू साहब से मैं खुद पूछूँगा," मैंने कहा। "उन्होंने मेरा गला एक बार पकड़ा था। दूसरी बार पकड़ेगा तो मैं उसकी चेन तोड़ दूँगा। सोना बहुत लोग देखते हैं, भाई, असली होना अलग बात है।"

पीछे से किसी ने हँसी छोड़ी। कतार की हँसी थी। छोटी, दबी हुई, पर थी।

और उसी हँसी में फ़ीता फिर ज़मीन पर गिरा।

तभी अस्पताल का दरवाज़ा खुला, और डॉक्टर इसरानी बाहर आए।

उन्होंने सफ़ेद कोट नहीं पहना था। कोट अंदर काजल के पास था। वो सिर्फ़ एक पुरानी शर्ट और पैंट में थे, हाथ में एक मरीज़ की परची, और चश्मा ऑंख से नीचे खिसका हुआ।

उन्होंने फ़ीता देखा। फिर बबलू के आदमियों को देखा। फिर कतार को देखा।

और उन्होंने इतनी धीमी आवाज़ में बात की कि गली के मोड़ तक सिर्फ़ उनका आख़िरी वाक्य पहुँचा — पर वो वाक्य हवा में टँग गया।

"मैं बयालीस साल से इस दवाखाने में बैठा हूँ," उन्होंने कहा। "जब मैं आया तब इस गली में पक्का रास्ता भी नहीं था। मैंने यह ज़मीन नहीं बेची। मेरी बीवी इसी इमारत में नर्स थी, और उसने इसकी दीवारें पीली रखने के लिए अपनी साड़ी की कीमत तक दे दी थी।"

उन्होंने परची सीने की जेब में रखी।

"अब सुन लो, सब के सब। जब तक इस दवाखाने में एक भी मरीज़ है — एक — यह दवाखाना बंद नहीं होगा। तुम काग़ज़ लाओ, तारीख़ लाओ, मशीन लाओ। मेरी कुर्सी वहाँ से नहीं हिलेगी। और अगर मेरी कुर्सी नहीं हिली, तो तुम्हारी मशीन इस दीवार को छूने से पहले मुझे छूएगी।"

कतार खड़ी रह गई।

बूढ़ा आदमी, जो अपनी औरत को साइकिल पर लाता है, साइकिल से उतरा, और उसने अपना माथा डॉक्टर साहब की तरफ़ झुकाया। बस इतना।

और मुझे उस पल ऐसा लगा कि यह अस्पताल आज बच गया। सच में बच गया। कोई जादू नहीं, कोई घंटी नहीं। सिर्फ़ एक बूढ़ा आदमी जो अपनी कुर्सी से नहीं हिला।

मैंने काजल की तरफ़ देखा। वो दरवाज़े के अंदर खड़ी थी, सफ़ेद कोट में, और उसके हाथ में स्टेथोस्कोप था, और वो अपने आँसू पोंछ नहीं रही थी, जानबूझकर नहीं पोंछ रही थी।

फिर आए दुबे अंकल।

वो थाने के बाहर अपनी कुर्सी पर बैठते हैं, और उनकी कुर्सी की आड़ में बच्चे छिपकर बातें सुनते हैं। आज वो सीधे अस्पताल के गेट तक आए। वही नीली शर्ट, जो वर्दी जैसी है पर वर्दी नहीं है, और हाथ में एक पुरानी कॉपी, जिसके कोने मुड़े हुए थे।

उन्होंने अपना चश्मा साफ़ किया, कॉपी खोली, और उस पीली पट्टी की तरफ़ इशारा किया।

"तारीख़ पढ़ो," उन्होंने कहा।

नापने वालों में से किसी ने कुछ नहीं कहा।

"काग़ज़ पर जो तारीख़ लिखी है, उससे पहले कोई मशीन नहीं चलेगी," दुबे अंकल ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो रिटायरमेंट के बाद भी नहीं जाती। "मैं रिटायर हूँ, अंधा नहीं। तुम अपनी मशीन उस तारीख़ से एक दिन पहले लाओगे, तो मेरी शिकायत तुम्हारे मालिक के दफ़्तर पहुँचने से पहले थाने पहुँच जाएगी। और मैं इस गली का आदमी हूँ — मेरी शिकायत काग़ज़ में नहीं, लोगों के मुँह में लिखी जाएगी।"

उन्होंने कॉपी बंद की और कुर्सी की तरफ़ लौट गए।

और फिर आई शबनम आपा।

मैं तुम्हें बताना भूल गया कि शबनम आपा जब गुस्से में होती हैं तो उनका चेहरा नहीं बदलता — उनकी आवाज़ बदल जाती है। वो धीमी हो जाती हैं, और उनकी आवाज़ में उतनी ही मिठास आ जाती है जितनी गुड़ में होती है, और उसी मिठास से लोगों के कान जलने लगते हैं।

वो गुमटी से एक ट्रे लेकर आईं — उसमें दस गिलास चाय, और एक थाली में समोसे, और चाय की भाप उनके चश्मे पर जम गई, और उन्होंने चश्मा उतारकर कमर पर खोंस दिया।

"अरे, तो तुम लोग यहाँ नाप रहे हो," उन्होंने कहा, और बहुत प्यार से कहा। "कितना अच्छा काम करते हो। मेहनत वालों के लिए मेरे यहाँ चाय है।"

फ़ीता पकड़े आदमी ने हाथ बढ़ाया।

और शबनम आपा ने ट्रे उसके हाथ से बचाकर पीछे रख दी और अपनी लोहे की चिमटी उठा ली।

"पहले बताओ, तुमने यह फ़ीता किसकी ज़मीन पर बिछाया है?"

"मैडम, हम तो आदेश पर आए हैं।"

"आदेश किसका?"

"बबलू साहब का।"

"अच्छा। तो बबलू साहब को बोलो कि यह गली उनके पिता की नहीं है," शबनम आपा ने कहा, और उनकी आवाज़ और मीठी हो गई। "यह गली के उन लोगों की है जिन्होंने यहाँ चालीस साल चप्पल घिसी है। और मैं तुम्हें बता दूँ — मैं यहाँ चाय बेचती हूँ, चिमटी भी रखती हूँ। चिमटी गरम होती है। और मैं गरम चीज़ें उठाने में ज़्यादा सोचती नहीं।"

दो आदमी अपने आप पीछे हट गए।

"आपा," मैंने धीरे से कहा। "चाय ठंडी हो रही है।"

"ठंडी होने दे," उन्होंने कहा। "आज किसी को चाय नहीं मिलेगी। आज यह चाय अस्पताल के मरीज़ों के लिए है। इन चार लोगों को ज़िंदगी में यहाँ की चाय नहीं मिलेगी, मैं कसम खाती हूँ।"

और फिर उन्होंने ट्रे उठाकर सीधे अस्पताल के अंदर चली गईं, और जाते-जाते बूढ़े आदमी को एक गिलास थमा दिया, बिना कुछ कहे।

तुम सोच रहे होगे कि यह सब बहुत अच्छा चल रहा है। सब जीत रहे हैं, सब बोल रहे हैं।

हाँ, मैं भी यही सोच रहा था।

और यही सोचते हुए मेरे कान में घंटी बोली, बहुत छोटा सा वाक्य।

"पीछे मत देख। आगे देख।"

मैंने आगे देखा।

गली के मुहाने से एक सफ़ेद गाड़ी आ रही थी। धीरे, बहुत धीरे, जैसे कोई शादी में आ रहा हो। उसकी खिड़कियाँ काली थीं, और धूप उन पर पड़कर बहुत साफ़ दिख रही थी, और मुझे उस गाड़ी से वो गंध आई जो नई गाड़ी से आती है — पेंट और चमड़े की।

गाड़ी रुकी। दरवाज़ा खुला।

और उतरा बबलू पांडे।

आज उसने पान नहीं चबाया हुआ था। आज वो अलग लग रहा था। उसके गले में वही मोटी सोने की चेन थी, पर आज उसने ऊपर एक सफ़ेद कुर्ता पहना था, और हाथ में एक मोटा मुड़ा हुआ नक्शा था — इतना मोटा कि जैसे उसने उसमें कोई किताब लपेट रखी हो।

और उसके चेहरे पर मुस्कान थी।

वो मुस्कान मुझे सबसे ज़्यादा डराती है। गुस्सा तो ठीक है, गुस्से से आदमी की बुद्धि खराब होती है। पर मुस्कान — मुस्कान का मतलब होता है कि आदमी ने पहले से सोच रखा है।

वो सीधा मेरे पास आया। कतार के बीच से, बिना किसी को हटाए, और लोग उसके रास्ते से अपने आप हट गए।

"अंकुश भाई," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में मिठास थी। "तुम सुबह-सुबह यहाँ क्या कर रहे हो? तुम्हारी दुकान का तो कोई काम नहीं है न इस इमारत से?"

"बबलू भाई," मैंने कहा, "मेरी दुकान का काम अस्पताल से नहीं, इस गली से है। और इस गली में हवा भी अब आपका काग़ज़ पढ़कर चलती है। मैं आपके काग़ज़ के नीचे अपने हाथ की लकीर देखने आया हूँ।"

"देख लो," बबलू ने कहा, और उसने नक्शा खोल दिया।

मैंने नक्शा देखा।

एक बड़ी शीट। ऊपर नीली मोहर, नीचे तारीख़, और बीच में पूरी गली की लकीरें, रास्ते, नाली, पीपल का गोल निशान, चबूतरी का चौकोर, और… और मेरी दुकान।

मेरी दुकान का चौकोर बना हुआ था, और उस पर लाल पेंसिल से एक छोटा क्रॉस।

मेरे पीछे किसी ने साँस रोक ली। मुझे नहीं पता कौन था। शायद डॉक्टर साहब। शायद काजल। शायद मैं खुद।

बबलू ने नक्शे पर उँगली रखी और उसे धीरे-धीरे खींचने लगा, जैसे कोई बच्चा रेत पर लकीर बनाता है।

"देख ले," उसने कहा, और उसकी मुस्कान थोड़ी और बढ़ गई।

"यहाँ से…" उसकी उँगली अस्पताल के चौकोर पर रुकी।

"…यहाँ तक।"

और उसकी उँगली गली की पूरी लंबाई नापकर मेरी दुकान के चौकोर पर आकर रुकी, और फिर आगे बढ़ी, और उस नीली लकीर पर रुकी जहाँ मेरा घर था।

"अस्पताल," उसने कहा, और उँगली दबाई।

"गली," उसने कहा, और उँगली खिसकी।

"तेरी दुकान," उसने कहा, और उसने मेरी तरफ़ देखा।

"और तेरा घर।"

उसने नक्शा मेरे सामने फैला दिया, इतना पास कि मेरी साँस उस पर लग रही थी।

"सब एक नक्शे में हैं, अंकुश भाई," उसने कहा। "एक ही नक्शे में। और यह नक्शा मेरी जेब में है। अब तू बोल — तू किस चीज़ को बचाने की बात करता है? इस गली को? इस दवाखाने को? अपनी दुकान को? अपने घर को?"

उसने नक्शा मोड़ना शुरू किया, और मोड़ते हुए बोला —

"इनमें से एक भी चीज़ अलग नहीं है, भाई। सब एक ही काग़ज़ पर लिखी हैं। और मैं तुझे एक बात और बता दूँ — साहब ने इस नक्शे पर तेरे नाम की जगह भी खाली रखी है। सोच ले। खाली जगह अच्छी चीज़ होती है। कभी-कभी उसमें बहुत कुछ भरा जा सकता है।"

नक्शा मुड़ा। गाड़ी का दरवाज़ा खुला। और मैं वहीं खड़ा रह गया, हाथ में पीले रंग वाली उँगली, और जेब में एक घंटी जो अब तक चुप थी — बिल्कुल चुप, जैसे वो भी सुन रही हो कि इस नक्शे में मेरे लिए क्या लिखा है।

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