The Mysterious Bell – Chapter 21: jodne wala mistri hissa 003 ep21-30
बबलू का हाथ अब भी मेरे हाथ पर था।
उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं। पसीने से भीगी हुई। और उसके नाखून मेरी कलाई में इतने धँसे हुए थे कि मुझे लगा कल सुबह निशान मिलेंगे।
मैंने अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश नहीं की। जो आदमी डरा हुआ होता है, उसकी पकड़ सबसे मज़बूत होती है। तुम उसका हाथ झटक दो, तो वो और कसेगा।
तो मैंने वही किया जो मैं हमेशा करता हूँ।
मैं हँसा।
अरे बबलू भाई, ये घंटी है, कोई आत्मा नहीं। साइकिल की घंटी। मैंने सुबह ही साइकिल ठीक की है। तुमने कभी साइकिल की घंटी इतने गौर से देखी है क्या?
उसने मेरी बात सुनी ही नहीं। उसकी नज़र घंटी पर टिकी थी, जैसे किसी ने उसे उसके बचपन का कोई डर दिखा दिया हो।
तेरा ये कहाँ से आया, उसने फिर वही पूछा। आवाज़ धीमी।
जेब में बजी, मैंने कहा। सुबह से मुझे भी यही सवाल है कि घंटी जेब में बजती क्यों है। तुम बताओ न, तुम बड़े तजुर्बे वाले लगते हो।
मेरी जेब से एक और आवाज़ आई। बहुत धीमी। सिर्फ़ मेरे कान तक।
डरा हुआ है।
और फिर।
इससे पूछ, साहब के कमरे में वो काग़ज़ किसने टाँगा।
मेरी साँस एक पल को रुक गई। पर चेहरे पर कुछ नहीं आने दिया। यह मेरी सबसे बड़ी आदत है, या कहो सबसे बड़ी कमज़ोरी। जब अंदर सब हिल रहा होता है, बाहर से मैं वही लड़का रहता हूँ जो रेट लिस्ट पूछ रहा हो।
बबलू भाई, मैंने धीरे से कहा। साहब के कमरे में जो काग़ज़ टँगा है, उसे किसने टाँगा?
उसका हाथ एक झटके में खुल गया।
नहीं। नहीं नहीं नहीं। मैंने वो नहीं कहा। मैंने कुछ नहीं कहा।
कहा था तुमने। अभी। मेरे सामने।
वो एक कदम पीछे हटा। उसका पान चबाना पूरी तरह बंद हो गया था और उसके होठों पर लाल रंग सूख रहा था, जैसे किसी दीवार पर पुरानी स्याही।
सुन अंकुश, उसने उँगली उठाई। इस घंटी को बोर्ड पर मत टाँगना। किसी को मत दिखाना। समझा? किसी को भी नहीं।
क्यों?
क्यों का जवाब वो नहीं दे पाया। बस गला सूख गया और वो पलटकर चल दिया। उसकी चाल में वो जल्दबाज़ी थी जो इंसान के पीछे डर का कुत्ता भौंक रहा हो तब आती है।
दरवाज़े पर पहुँचकर वो रुका।
साहब तुझे बुलाएँगे, उसने पीछे मुड़कर कहा। बुलाएँगे नहीं। बुलवाएँगे। और जब बुलवाएँ तो घंटी घर पर छोड़कर जाना।
वो गया।
उसकी चप्पलों की आवाज़ धूप में धीमी होती गई।
ट्रंक के पीछे से टिंकू का सिर निकला। उसकी आँखें बड़ी थीं और उसके हाथ में वही नई रिंच थी, जिसे वो आज सुबह से दो बार गिरा चुका था।
उस्ताद, उसने फुसफुसाकर कहा, वो जाते-जाते काँप रहा था।
हाँ।
बबलू पांडे काँप रहा था।
हाँ।
वो जो चूड़ियों वाली गुमटी उलटता है?
वही।
टिंकू ने रिंच अपनी छाती से लगा ली।
तो फिर हमें डरना चाहिए या नहीं?
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।
देख, जो आदमी गुमटी उलटता है, वो ताक़त से उलटता है। जो आदमी काँपता है, वो किसी और चीज़ से डरता है। और जो किसी और चीज़ से डरता है, वो हमारे लिए काम की चीज़ है। डरना तब है जब वो हमसे नहीं, हम उससे डरें।
टिंकू ने सिर हिलाया। समझ गया।
क्या समझा?
कि तुम ऊपर से ऐसे बोलते हो जैसे सब पता है, उसने कहा, और अंदर से तुम्हें भी कुछ नहीं पता।
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
ये तूने कहाँ से सीखा?
तुमसे ही, उसने कहा और रिंच लेकर पीछे भाग गया।
बच्चा तेज़ हो रहा है। ये अच्छी बात नहीं है मेरे लिए।
मैंने जल्दी से ट्रंक खोला, उसमें अख़बार में लपेटा हुआ काग़ज़ रखा, ऊपर से औज़ारों का डिब्बा रखा, ट्रंक बंद किया और चाबी अपनी जेब में डाल दी। फिर मैंने घंटी को हथेली में घुमाया।
बोल, मैंने धीरे से कहा। अब क्या?
घंटी चुप रही।
बोल न।
सिर्फ़ इतना आया।
अभी नहीं। तेरे हाथ में काम बाक़ी है।
कौन सा काम?
जवाब नहीं आया।
मैंने चाय की तरफ़ देखा। शबनम आपा की गुमटी से धुआँ सीधा ऊपर जा रहा था और पीपल के पत्तों के बीच फँस रहा था।
मैं उसी तरफ़ चला।
शबनम आपा ने मुझे देखते ही कटोरी मेरी तरफ़ सरका दी।
बैठ, उन्होंने कहा। तेरा चेहरा ऐसा है जैसे तूने सुबह से कुछ नहीं खाया और दोपहर से कुछ सोचा नहीं।
आपा, चाय में अदरक कम है।
उन्होंने चिमटी उठाई। मैं चुप हो गया।
तीन सिप के बाद मुझे लगा ज़मीन वापस आ गई है।
तभी चार जोड़ी पैर एक साथ गुमटी पर आ धमके।
सानिया सबसे आगे। उसके पीछे गुड्डू, हाफ़ पैंट में, घुटने पर नई पट्टी। उसके पीछे रफ़ीक़, जिसकी शर्ट हमेशा उसके बड़े भाई की होती है और इसलिए कंधे से फिसलती रहती है। और सबसे पीछे चिंटू, दस साल का, जो इस गली का सबसे तेज़ दौड़ने वाला बच्चा है और सबसे धीमा सोचने वाला।
उस्ताद! सानिया ने कहा। उस्ताद, तुम्हें पता है पीपल के नीचे क्या हुआ?
मुझे क्या पता, मैंने कहा। मैं तो सुबह से साइकिल ठीक कर रहा हूँ।
उसने अपनी कलाई पर हाथ रखा, जैसे कोई बड़ी खबर देने वाली टीवी आंटी हो।
बंसी बाबा आज चबूतरी पर आए। पहली बार। दो महीने बाद। और रहमत बाबा पहले से बैठे थे।
तो?
तो कुछ नहीं, उसने आँखें बड़ी करके कहा। न बंसी बाबा ने बोला, न रहमत बाबा ने। दोनों पत्थर की तरह बैठे रहे। इतनी दूर बैठे थे कि बीच में एक आदमी और बैठ सके। मैंने गिना।
चिंटू आगे आया। उसकी मुट्ठी बंद थी।
उस्ताद, उसने कहा, और बंसी बाबा के हाथ से एक चीज़ गिरी। मैंने उठा ली।
उसने मुट्ठी खोली।
उसकी हथेली पर लकड़ी का एक टुकड़ा था। छोटा, काला, पुराना। एक तरफ़ काँच था, फूटा हुआ। काँच के नीचे किसी तस्वीर का आधा हिस्सा दिख रहा था — किसी आदमी का कंधा, कुछ ईंटों वाली दीवार, और एक साइकिल का आधा हैंडल।
फ्रेम बीच से टूटा था। असली में कटा हुआ था, जैसे किसी ने ब्लेड से सीधा आधा कर दिया हो।
मैंने उसे हाथ में लिया। लकड़ी पुरानी थी, किनारे चिकने हो चुके थे, जैसे कोई चालीस साल से उसे जेब में रखकर उँगलियों से सहला रहा हो।
यह तो आधी तस्वीर है, मैंने कहा।
हाँ, गुड्डू बोला। और रहमत बाबा की जेब से भी ऐसा ही एक टुकड़ा गिरा था कल। मैंने देखा था। वो उसे उठाकर रूमाल से पोंछकर वापस जेब में रखते हैं।
मेरी छाती में कुछ हिला।
तुम चारों, मैंने कहा और अपनी जेब से दो रुपये निकाले। शबनम आपा ने मेरी कलाई पकड़ ली।
अपने पैसे रख, उन्होंने कहा और कटोरी से दो सिक्के निकालकर बच्चों को दे दिए। और मुझे देखकर बोलीं, इसकी गुमटी में जो लोग चाय के पैसे छोड़ते हैं, वो पैसे बच्चों के ही हैं। सवाल मत पूछ।
फिर बच्चों को देखकर। जाओ, चार लड्डू लेकर आओ। और हाँ, सानिया, तेरे को पता है न, मैं सुनना नहीं चाहती कि तुमने दुकान से लड्डू चुराए।
नहीं आपा, सानिया हँसी।
चारों भाग गए।
मैंने फ्रेम का टुकड़ा जेब में रखा और चाय खत्म की।
आपा, मैंने कहा, बंसी बाबा और रहमत बाबा में क्या बात हुई थी?
उन्होंने चिमटी से समोसा उठाया और मुझे थमा दिया।
मैं बोलूँगी नहीं, उन्होंने कहा। मैं गली की बात मुँह से नहीं निकालती। ये लोग अपनी बात खुद नहीं बोलते और मुझसे उम्मीद करते हैं कि मैं बोलूँ। मैं नहीं बोलती।
फिर उन्होंने मेरे सिर पर नज़र डाली।
पर इतना बता देती हूँ। वो दोनों एक चबूतरी पर पैंतालीस साल से बैठते हैं और एक-दूसरे से एक शब्द नहीं बोले। एक बार भी नहीं। और रोज़, हर सुबह, दोनों आते हैं। अगर एक दिन कोई न आए, तो दूसरा उसी दिन घर जाकर पूछता है — तबीयत ठीक है? और फिर लौटकर चबूतरी पर बैठ जाता है और फिर चुप।
मैंने कहा, तो फिर झगड़ा किस बात का है?
वो मुस्कुराईं। यही सबसे बड़ी बात है, अंकुश। किसी को ठीक से पता ही नहीं। दोनों ने कभी कहा नहीं। और जो कभी नहीं कहा जाता, वो साल-दर-साल बड़ा होता रहता है। तीस साल पहले जो बात एक रोटी जितनी थी, आज वो पूरे घर जितनी हो गई है।
मैं गुमटी से उठा।
कहाँ?
पीपल के नीचे।
शबनम आपा ने मेरी कलाई पकड़ी और उनकी आवाज़ बदल गई।
सुन, उन्होंने कहा। वहाँ दो बुज़ुर्ग बैठे हैं। उनकी उम्र का लिहाज़ करना। हमारी गली के बुज़ुर्ग ऐसे होते हैं कि अगर वो चुप बैठे हैं तो चुप बैठे रहने दो, तुम्हारी ज़ुबान चलाने की ज़रूरत नहीं।
आपा, मैंने कहा, मुझे उन दोनों की ज़ुबान ही चलानी है।
उन्होंने मेरा हाथ छोड़ दिया और एक लंबी साँस ली।
अच्छा, तो एक बात याद रख। उन दोनों के सामने अपने घर की बात मत करना। घर की बात वहीं बोलनी चाहिए जहाँ सच बोलने का इरादा हो।
मैंने सिर हिलाया।
चार लड्डू लेकर बच्चे लौटे। मैंने सानिया को पास बुलाया।
सानिया, एक काम है।
बोलो।
जब मैं पीपल के नीचे बैठा होऊँ, तो तुम सब वहीं रहना। दूर से। और अगर मैं हाथ उठाऊँ, तो तुम लोग आ जाना। पर बीच में बोलना मत।
गुड्डू बोला, हम क्यों?
क्योंकि तुम्हारे पास जो फ्रेम का टुकड़ा है न, वो आधा है। और आधी चीज़ें मेज़ पर रखी नहीं जातीं। उन्हें जोड़ने के लिए गवाह चाहिए। और गवाह वही होता है जो पीपल के नीचे खेलने वाला हो।
रफ़ीक़ की आँखें चमकीं। गवाह। यानी हम गवाह हैं।
हाँ, मैंने कहा। और गवाह को क्या करना होता है?
सच बोलना, चिंटू ने कहा।
नहीं, मैंने कहा। गवाह को याद रखना होता है। सच लोग खुद बोलते हैं। गवाह सिर्फ़ याद रखता है कि किसने कब क्या कहा।
मैं पीपल के नीचे पहुँचा।
चबूतरी पर दोनों बैठे थे। बंसी बाबा एक सिरे पर, सफ़ेद कुर्ता, माथे पर चंदन, हाथ में एक पुरानी लाठी जिसके ऊपर पीतल का मुँह था। रहमत बाबा दूसरे सिरे पर, सफ़ेद टोपी, हल्की दाढ़ी, और गोद में एक मैला रूमाल।
बीच में असली में जगह थी। बैठने की जगह। एक आदमी के लिए पूरी जगह।
मैंने बीच में पैर फैलाकर बैठने की सोची, फिर सोचा कि अभी नहीं।
मैंने नमस्ते कहा।
बंसी बाबा ने सिर हिलाया।
रहमत बाबा ने सिर हिलाया।
दोनों ने एक-दूसरे को नहीं देखा। जैसे एक-दूसरे के होने की खबर उन्हें सिर्फ़ हवा से मिलती हो।
मैंने बीच में बैठे बिना, चबूतरी के किनारे पर बैठकर कहा, बाबा, मेरी साइकिल का पहिया आज सुबह अटक रहा था।
बंसी बाबा बोले, तेल डाल।
रहमत बाबा बोले, धुरी देख।
दोनों ने एक साथ बोला।
फिर दोनों चुप।
मैं मुस्कुराया। बाबा, दोनों की सलाह सही है। तेल भी डाला, धुरी भी देखी। दिक्कत ये है कि पहिया बोलता है।
बंसी बाबा ने मेरी तरफ़ देखा। पहिया बोलता है?
हाँ। कभी-कभी। बोलता है कि तुम मुझे ठीक करते हो, पर मुझे चलाने वाला कोई और है।
रहमत बाबा हँसे। हल्की, खुरदरी हँसी। बंसी बाबा ने उनकी तरफ़ देखा, फिर तुरंत नज़र हटा ली।
मैंने कहा, बाबा, एक बात पूछूँ?
पूछ, बंसी बाबा बोले।
आप दोनों रोज़ यहाँ आते हैं?
हाँ।
कितने साल से?
बंसी बाबा ने सोचा। पैंतालीस। छियालीस हो गए होंगे।
और बात कितने साल से नहीं हो रही?
वो चुप हो गए।
रहमत बाबा ने रूमाल को मरोड़ा और उसकी तरफ़ देखे बिना कहा, बच्चा है। इसे क्यों घसीट रहे हो।
मैंने कहा, बाबा, मैं इसे घसीट नहीं रहा। मैं आप दोनों को बैठा देख रहा हूँ और मुझे ये समझ नहीं आ रहा कि जो आदमी रोज़ आता है, वो बोलता क्यों नहीं।
बंसी बाबा ने लाठी ज़मीन पर टिकाई।
बोलने से कुछ होता है क्या?
मैंने कहा, बाबा, मेरी दुकान पर हर हफ़्ते कोई न कोई आता है और कहता है कि उसका रिश्ता टूट गया है। और मैंने देखा है कि जो लोग बोल देते हैं, उनका रिश्ता टूटा हुआ भी घर जाता है तो टूटा हुआ नहीं रहता। जो लोग नहीं बोलते, वो ज़िंदा रहते हैं पर मरे हुए जैसे।
रहमत बाबा ने कहा, तू चौबीस साल का है। तू चबूतरी पर नहीं बैठा पैंतालीस साल।
सही कहा, मैंने कहा। आप बैठे हैं। आप बताइए, इसमें क्या मज़ा है? रोज़ आना, बैठना, एक शब्द न कहना, फिर घर जाना। ये सज़ा है या आदत?
दोनों चुप।
मैंने कहा, अच्छा, फिर मैं बताता हूँ। और बाबा, ये सुनकर आप मुझे गली से निकाल सकते हैं, कोई बात नहीं।
मैंने घुटनों पर हाथ रखे।
पंद्रह साल पहले मेरे पापा ने एक काग़ज़ पर अंगूठा लगाया। उस काग़ज़ पर सिर्फ़ इलाज की बात लिखी थी, ऐसा उन्हें लगा। नीचे क्या था, उन्होंने देखा नहीं। और सात महीने बाद पता चला कि उस अंगूठे से पूरी गली बिक गई। मेरी माँ का इलाज चल रहा था इसलिए उन्होंने अंगूठा लगाया। वो ख़ुद को पंद्रह साल से कोस रहे हैं। और मैंने उनसे आज से पहले कभी नहीं पूछा कि पापा, क्या हुआ था।
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
मैं पंद्रह साल से उस घर में रह रहा हूँ और मैंने अपनी माँ से कभी नहीं पूछा कि आप क्यों चुप हैं। मैंने सिर्फ़ ये मान लिया कि वो चुप हैं। आप दोनों भी यही कर रहे हैं। आपने मान लिया कि दूसरा बोलेगा नहीं। और वो भी यही मान बैठा। और मानने में आसानी है, बाबा, क्योंकि पूछने में गले पर चाकू चलता है।
बंसी बाबा की लाठी ज़मीन से खिसकी।
मैंने फ्रेम का टुकड़ा निकाला और अपनी हथेली पर रखा।
ये सुबह आपके हाथ से गिरा था। ये आधा है, बाबा। और जो चीज़ आधी रखी जाती है, वो टूटी इसलिए रहती है क्योंकि उसे जोड़ने वाला कोई नहीं होता।
रहमत बाबा की आँखें फ्रेम पर टिक गईं।
वो मेरी है, बंसी बाबा ने जल्दी से कहा।
आधी आपकी, मैंने कहा। और आधी किसकी?
चुप्पी।
रहमत बाबा ने अपना रूमाल खोला। उसमें दूसरा टुकड़ा था। बिल्कुल वैसा ही, उल्टा। उन्होंने उसे सामने फैलाकर रख दिया और हाथ खींच लिया, जैसे वो चीज़ आग की तरह जल रही हो।
मैंने दोनों टुकड़ों को साथ रखा।
वे मिलते थे। एकदम। बीच की लकड़ी टूटी हुई थी, पर किनारे ऐसे घूमते थे जैसे कोई साँस ले रहा हो।
तस्वीर में दो लड़के खड़े थे। दोनों युवा। दोनों के हाथ कंधों पर एक-दूसरे को छू रहे थे। उनके पीछे एक दुकान थी जिस पर एक बोर्ड था और बोर्ड पर जो लिखा था, उसका सिर्फ़ आधा हिस्सा बचा था, पर दो अक्षर साफ़ थे और दुकान के सामने खड़ी साइकिल का आधा हैंडल भी।
बंसी बाबा ने तस्वीर देखी और उनका चेहरा एक झटके में बूढ़ा हो गया।
रहमत बाबा ने देखा और उनकी आँखें भर आईं।
मैंने कुछ नहीं कहा। कुछ देर के लिए सब कुछ सुनाई देना बंद हो गया — पीपल की पत्तियों की आवाज़, दूर स्कूल की घंटी, नाली में पानी का बहाव।
फिर बंसी बाबा बोले, और उनकी आवाज़ में वो चीज़ नहीं थी जो लोग बुज़ुर्गों में सुनना चाहते हैं — वो प्यार नहीं था, वो डर था।
मेरी बहन का बेटा था।
मैंने पूछा, क्या था?
वो ज़ेवर। उन्होंने आँखें उठाईं। तेरे रहमत बाबा की बीवी ने उस रात अपनी चूड़ी उतारकर मेरी बेटी के हाथ में रखी थी। अपनी चूड़ी, बच्चा। अपनी, जो ब्याह में मिली थी। और सुबह जब संदूक खुला, तो सोने की चेन नहीं थी।
रहमत बाबा ने रूमाल कसकर मरोड़ा।
बंसी बाबा ने आगे कहा, सबने कहा कि उस रात घर में वो ही नई औरत थी। मैंने भी सुना। और मैंने मुँह नहीं खोला।
क्यों?
क्योंकि उस रात मुझे चेन का कुंडा मेरी बहन के बेटे की जेब में मिला था।
चबूतरी पर सन्नाटा।
वो मेरी मरी हुई बहन का इकलौता बेटा था, बंसी बाबा ने धीरे से कहा। मैंने सोचा, अगर मैं बोल दिया तो मेरी बहन का घर बिखर जाएगा। और मैं ये नहीं सोच पाया कि जो आदमी मेरे बगल में बैठता है, उसका घर इसी वक़्त बिखर रहा है।
उन्होंने रहमत बाबा की तरफ़ देखा, और ये पहली बार था कि उन्होंने पूरे पैंतालीस साल बाद उनकी आँखों में देखा।
रहमत, मैं ग़लत था। मैं जानता था और मैं चुप रहा। ये चुप्पी मेरी है। मेरी बीवी चालीस साल से घर से बाहर नहीं निकली ये सोचकर कि इस गली ने उसे चोर समझ लिया, और इस चुप्पी का पहला पत्थर मेरे हाथ से गिरा था।
रहमत बाबा ने रूमाल आँखों पर रख लिया।
फिर उन्होंने बहुत धीमी आवाज़ में कहा, मुझे पता था।
बंसी बाबा ने सिर उठाया।
मुझे पता था, तेरे भांजे ने लिया था, रहमत बाबा बोले। उसी रात मैंने उसे जाते देखा था। मैं तेरे पास आया, तेरे सामने खड़ा हुआ, और तुझे देखा। तूने मुँह फेर लिया। मैं समझ गया कि तू जानता है। और फिर मैंने सोचा कि अगर मैं बोल दिया तो तू कभी ये नहीं कह पाएगा कि तू जानता था। और अगर तू ये नहीं कह पाएगा, तो तू मुझसे कभी नहीं बोलेगा।
उनकी आवाज़ काँपी।
और मैं तुझसे बोलना चाहता था, बंसी। मैं इसीलिए रोज़ आता था। मैं रोज़ यही सोचकर आता था कि आज ये बोलेगा। और बोले तो मैं कह दूँगा — छोड़ दे, हो गया। पैंतालीस साल से मैं इसी चबूतरी पर उस एक वाक्य के लिए बैठा हूँ।
बंसी बाबा ने लाठी किनारे रख दी।
तूने एक बार भी नहीं पूछा, उन्होंने कहा।
क्योंकि मुझे डर था कि तू कहेगा — जा, तेरी बीवी चोर है। रहमत बाबा ने कहा। डर से बड़ी चुप्पी होती है, बंसी। दुश्मनी से नहीं।
मैंने अपने घुटने पर हाथ रखा और देखा कि मेरे हाथ काँप रहे हैं।
मैंने घंटी जेब से बाहर नहीं निकाली। छुपाकर उसे उँगलियों के नीचे दबाया।
फिर वो आवाज़ आई, बहुत धीमी।
ये जोड़ अंक नहीं देगा।
मैंने सोचा, तो क्या देगा?
और घंटी ने जवाब दिया।
ये जवाब देगा।
फिर, कुछ देर बाद।
अब उन्हें अकेला छोड़।
मैं उठा। बंसी बाबा ने मेरा हाथ पकड़ा।
बेटा, उन्होंने कहा, तूने अभी क्या किया?
कुछ नहीं, बाबा, मैंने कहा। मैंने सिर्फ़ अपने घर की बात बताई। बाक़ी आप दोनों ने किया।
रहमत बाबा ने हाथ उठाया। मैं हाथ उठाकर चारों बच्चों को बुलाया।
चारों दौड़कर आए, और जैसे ही आए, रहमत बाबा ने उन्हें देखा और उनकी आँखों में कुछ बदला।
तुम लोग यहीं रहते हो न, उन्होंने कहा। पीपल के नीचे। रोज़।
हाँ बाबा, सानिया बोली।
तो एक बात याद रखना, रहमत बाबा ने कहा। अगर आज से तुमने कभी देखा कि इन दो बूढ़ों में से कोई एक भी टूटा-फूटा सा बैठा है, तो आकर कहना — रहमत बाबा, बंसी बाबा को चाय पिलानी है।
चारों खिलखिला गए।
और मैंने फ्रेम के दोनों टुकड़े उठाकर जोड़े।
वो खुद जुड़ गए। बीच की लकड़ी चरचराई, और एक पल को मुझे लगा जैसे किसी ने ताला खोला हो। लकड़ी के जुड़े हुए किनारे पर एक पतली सफ़ेद लकीर उभरी और फिर गायब हो गई।
मेरी जेब में घंटी गरम हुई।
मैंने उसे बाहर निकाला, ताकि कोई देख न ले। वो एक बार बजी। बहुत धीमी। इतनी धीमी कि सिर्फ़ मैंने सुनी। उसकी आवाज़ किसी के हाथ की चूड़ी जैसी थी, हल्की और दूर।
मैंने सिर उठाया।
और मुझे लगा जैसे कोई मेरे पीछे खड़ा है।
शबनम आपा की गुमटी से आगे, उस्ताद अली बक्श की दुकान का दरवाज़ा खुला हुआ था। धूप उस दरवाज़े पर सीधी पड़ रही थी और उस धूप के बीच उस्ताद खड़े थे।
उनके हाथ में कैंची थी। छोटी, चमकदार, जिसे वो कभी नीचे नहीं रखते। और वो कैंची उनके हाथ से लटक रही थी, जैसे कोई चीज़ पकड़ना भूल गए हों।
उन्होंने पीपल की तरफ़ देखा।
फिर मेरी तरफ़।
उनकी आँखें काँच जैसी हो गई थीं।
मैंने हाथ उठाकर सलाम किया।
उन्होंने सलाम का जवाब नहीं दिया। वो जैसे इस दुनिया में थे ही नहीं। वो अपनी दुकान की तरफ़ घूमे, अंदर गए और बिना आवाज़ दरवाज़ा बंद कर दिया।
पीपल के नीचे रहमत बाबा हँस रहे थे और बंसी बाबा उनकी हँसी में झिझककर शामिल हो रहे थे, और मैं मुड़कर खड़ा था और मेरी छाती में एक ठंडी सी चीज़ बैठ गई।
घंटी ने उस्ताद की आवाज़ सुनी है इससे पहले भी। क्या तब भी वो ऐसे ही रुके थे?
मैं दुकान की तरफ़ चला, पर आधी गली में मुझे शबनम आपा ने रोका।
अंकुश।
मैं रुका।
उनके हाथ में चिमटी थी और उनकी आवाज़ में वो चीज़ नहीं थी जो आम तौर पर होती है।
अभी जो हुआ, वो ठीक हुआ, उन्होंने कहा।
फिर?
फिर ये भी ठीक नहीं हुआ, उन्होंने कहा। तेरी घंटी बजी। और उस्ताद की दुकान का दरवाज़ा बंद हुआ। मैं पच्चीस साल से देख रही हूँ कि इन दोनों का कोई रिश्ता नहीं है। अब लगने लगा है कि है।
मैं दुकान पहुँचा, तो मीरा वहाँ पहले से खड़ी थी।
उसका कैमरा उसके हाथ में था और वो मेरे दरवाज़े के सामने इस तरह खड़ी थी जैसे कोई बाड़ लगा दे।
अंकुश, उसने कहा।
मीरा, मैंने कहा, तुम रोज़ ऐसे आती हो जैसे कोई इनकम टैक्स का छापा हो।
उसने मेरी बात नहीं सुनी।
मुझे सच बताओ, उसने कहा। तुम लोगों को बेवकूफ़ बना रहे हो?
मेरे पीछे टिंकू आ गया और फिर हाथ में रिंच लिए जैसे युद्ध में खड़ा हो।
मीरा दीदी, उसने कहा…
चुप, उसने कहा। बड़ों की बात चल रही है।
कौन सा बेवकूफ़ बनाना? मैंने कहा।
आज सुबह पीपल के नीचे क्या हुआ था?
कुछ नहीं। दो बुज़ुर्ग बैठे थे। मैं चाय पीने गया था।
उसने कैमरा उठाया। मेरे पास वीडियो है, अंकुश।
मैं चुप हो गया।
मेरा मतलब है, उसने धीरे से कहा, मेरे पास एक लड़के का वीडियो है जो पीपल के पीछे खड़ा था और जिसने तुम्हारी जेब से एक चमकती चीज़ निकलते देखी। और उसने मुझे फ़ोन किया और कहा कि अंकुश भाई ने कुछ बजाया और दोनों बाबा बोलने लगे।
मैंने सोचा कि स़ानिया को कुछ मिला कैंडी का सिक्का। मैंने कहा, वो मेरी साइकिल की घंटी है।
हाँ, उसने कहा। पिछले हफ़्ते भी मैंने सुना था कि तेरी साइकिल की घंटी जेब में बजती है। और उसी रात नूर अस्पताल के सामने सफ़ेद गाड़ी आई। और उसी रात किसी ने गली में काग़ज़ बाँटने शुरू किए।
मैंने कहा, मीरा, तुम दो अलग-अलग बातों को जोड़कर एक कहानी बना रही हो।
और तुम, उसने कहा, दो बुज़ुर्गों को जोड़कर एक तमाशा बना रहे हो। फ़र्क़ ये है कि मेरी कहानी सब देख सकते हैं तुम्हारा तमाशा नहीं।
उसकी आवाज़ सख़्त थी, पर उसकी आँखों में कुछ और था। वो थकी हुई थी। और वो थकान आज की नहीं थी।
मीरा, मैंने कहा, तुम मुझसे सच पूछो।
मैं सच ही पूछ रही हूँ।
नहीं, तुम सवाल पूछ रही हो। सवाल और सच में फ़र्क़ होता है। तुम पूछ रही हो कि मैं लोगों को बेवकूफ़ बना रहा हूँ या नहीं। तुम ये पूछो कि मैं क्या छुपा रहा हूँ।
वो एक पल रुकी।
फिर उसने कहा, ठीक है। तुम क्या छुपा रहे हो?
मैंने कहा, बहुत कुछ।
उसने कैमरा नीचे किया।
तुम्हें पता है, उसने कहा, मैं एक बार आधा सच छाप चुकी हूँ। पाँच साल पहले। और उस आधे सच ने एक मास्टर जी का घर तोड़ दिया। तब से मैं पूरा सच चाहती हूँ। आधा सच मुझसे नहीं होता। इसलिए जब मैं देखती हूँ कि कोई आधा सच लेकर लोगों को खुश कर रहा है, मुझे गुस्सा आता है। ककभी कभी लगता है कि तुम्हें पता ही नहीं कि तुम क्या कर रहे हो।
मीरा ने यह कहा और उसका कैमरा नीचे लटक गया, जैसे उसने भी थक कर हथियार डाल दिया हो।
मैंने कहा, मुझे पता है।
नहीं, तुम्हें नहीं पता। तुम एक बुज़ुर्ग को बोलने पर मजबूर करते हो, दूसरे को रुलाते हो, और फिर चाय पीने चले जाते हो जैसे कुछ हुआ ही न हो। तुम्हारे पास कोई जवाब नहीं है।
जवाब है, मैंने कहा। पर वो जवाब तुम्हें अभी नहीं दे सकता। क्योंकि वो जवाब मेरा नहीं है।
तो किसका है?
मैंने जेब की तरफ़ देखा। घंटी अब भी वहीं थी, ठंडी, चुप, जैसे कुछ सुन रही हो।
मीरा, मैंने कहा, तुमने कभी कोई चीज़ छुपाई है?
उसका चेहरा सख़्त हो गया।
क्यों पूछ रहे हो?
क्योंकि तुम्हारी आँखों में जो थकान है, वो आज की नहीं है। वो पाँच साल पुरानी है। और मुझे लगता है तुम यहाँ सिर्फ़ मेरा सच नहीं ढूँढने आई हो। तुम अपना भी कुछ ढूँढ रही हो।
वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखती रही। फिर उसने कैमरा उठाया और बंद कर दिया।
ठीक है, उसने कहा। आज शाम। पीपल के नीचे। तुमने जो कहा, वो करके दिखाओ। पर मैं वहाँ रहूँगी, और मेरा कैमरा चालू रहेगा।
मैंने कहा, कैमरा चालू रखना, पर एक बात याद रखना।
क्या?
जब मैं सच बोलूँ, तो कैमरे से ज़्यादा अपनी आँखों पर भरोसा करना। क्योंकि कैमरा आदमी का चेहरा पकड़ता है, आवाज़ नहीं।
वो हँसी। पहली बार। छोटी सी हँसी, जैसे किसी बंद कमरे में खिड़की खुल गई हो।
चलो देखें, उसने कहा।
वो मुड़ी और चली गई। मैं दुकान के दरवाज़े पर खड़ा रहा।
और तभी मुझे एहसास हुआ कि जब मीरा आई थी, तब बबलू वहाँ नहीं था।
वो कब गया, मुझे पता ही नहीं चला।
पर दरवाज़े की चौखट पर पान की एक लाल बूँद पड़ी थी। और उसके साथ मिट्टी के जूते का एक निशान, जो सीधे दुकान के बाहर, मेरे बोर्ड की तरफ़ जाता था।
बबलू गया नहीं था। बबलू रुककर मेरा बोर्ड पढ़ रहा था।
शंकर यादव और बेटे।
उसने वो नाम पढ़ा था। और वो नाम उसे कुछ याद दिला गया था।
मैंने उस पल महसूस किया कि खेल अब सिर्फ़ घंटी का नहीं रह गया है। खेल अब नाम का हो गया है।
शाम को मैं समय से पहले पीपल के पास पहुँच गया।
सूरज तालाब की तरफ़ जा रहा था। गली में मिट्टी की खुशबू थी, क्योंकि पीछे के प्लॉट से ट्रक फिर गुज़रे थे और उन्होंने पूरी गली में धूल छोड़ दी थी।
चबूतरी पर दो बुज़ुर्ग बैठे थे।
बाबा कलीम, एक सिरे पर। सफ़ेद टोपी, सफ़ेद दाढ़ी, हाथ में तस्बीह। और पंडित रामदीन, दूसरे सिरे पर। पीली धोती, कंधे पर गमछा, हाथ में छोटी सी लाठी जिसे वो बस पकड़े रहते थे, टेकने के लिए नहीं।
दोनों के बीच में एक हाथ भर की जगह खाली थी।
पचास साल से खाली।
मैं वहाँ पहुँचा तो दोनों ने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं। जैसे मैं हवा हूँ।
मीरा पहले से वहाँ थी। उसका कैमरा एक कोने में टंगा था, तिपाई पर। टिंकू पेड़ की जड़ के पास बैठा था। शबनम आपा अपनी गुमटी से गर्दन निकालकर देख रही थी। और बच्चे — सानसानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू — चारों शबनम आपा की गुमटी के पीछे बैठे थे। वो टूटी बेंच जो आपा ने किसी के घर से उठाकर लाई थी, उस पर चारों इस तरह बैठे थे जैसे कोई सभा चल रही हो।
सानिया के हाथ में आधा समोसा था और आँखें पीपल की तरफ़।
"देखो," उसने कहा, "दोनों एक-दूसरे को छू भी नहीं रहे। बाबा कलीम की तस्बीह उस तरफ़ झूल रही है, पंडित जी की लाठी इस तरफ़। जैसे बीच में कोई दीवार हो जो हमें दिखती नहीं।"
चिंटू ने घुटने पर बँधी पट्टी खुजाई। "माँ कहती है पचास साल से ऐसे ही है। बात नहीं करते। सलाम भी नहीं, राम भी नहीं।"
"पर झगड़ा किस बात का?" मैंने पूछा। मैं उनके पीछे खड़ा था और मुझे लगा मैं किसी बड़ी कहानी के दरवाज़े पर खड़ा हूँ।
गुड्डू ने समोसे का आधा हिस्सा एक साँस में निगलकर कहा, "मेरी दादी बताती है। पहले यहीं, इसी कोने पर, दोनों की मिलकर चाय की दुकान थी। छोटी सी। तीन बेंच, एक स्टोव, एक पीतल का डिब्बा — जिसमें दिन भर की कमाई डालते थे।"
"डिब्बा?"
"हाँ. पीतल का। ढक्कन पर फूल बना था। दादी कहती है पैसा पूरा उसी डिब्बे में जाता था और रात को डिब्बा पीपल के कोटर में छिपा दिया जाता था, क्योंकि दुकान में ताला नहीं था।"
रफ़ीक़ ने धीमी आवाज़ में कहा, "एक रात डिब्बा गायब हो गया। सुबह पंडित जी ने बाबा कलीम पर इल्ज़ाम लगा दिया। बाबा कलीम ने कुछ नहीं कहा। बस उस दिन के बाद दुकान बंद।"
मेरे अंदर कुछ हिला।
"और डिब्बा?"
"किसी को नहीं मिला," सानिया ने कहा। "दादी कहती है जब तक डिब्बा नहीं मिलेगा, तब तक कोई नहीं बोलेगा।"
मैंने पीपल की तरफ़ देखा। उसकी जड़ें चबूतरी की सीढ़ी में घुसी हुई थीं, जैसे कोई बूढ़ा हाथ ज़मीन पकड़े बैठा हो। और उस तने में, कमर की ऊँचाई से थोड़ा ऊपर, एक गहरा कोटर था — काला, चौड़ा, जिसमें शायद कभी कुछ रखा जाता था।
मैंने सानिया को देखा।
वो मुस्कुराई। वो मुस्कान जो बच्चे तभी मुस्कुराते हैं जब उनके पास कोई चीज़ पहले से हो।
"चिंटू, पतंग वाली डोर ला," उसने कहा।
चिंटू गुमटी के पीछे से एक मैली, पतली रस्सी ले आया। गुड्डू ने उसे अपनी कमर से बाँधा और सानिया ने कहा, "तू हल्का है, तू चढ़।"
मैं वहीं खड़ा रहा और मैंने कुछ नहीं कहा। क्योंकि मुझे पता था — इन बच्चों को रोकना बेकार है। ये गली के जासूस हैं। इनके पास हर खबर पहले आती है, और ये कभी बड़ों की इजाज़त नहीं लेते।
चिंटू पीपल पर चढ़ा। उसकी पट्टी वाली टाँग पेड़ से चिपकी रही और वो तने के सहारे कोटर तक पहुँचा। उसने हाथ अंदर डाला। कुछ हिलाया। फिर उसका चेहरा बदला।
"कुछ है," उसने ऊपर से कहा। "पत्थर जैसा। भारी है।"
"निकाल," सानिया ने कहा।
चिंटू ने ज़ोर लगाया। कोटर से एक चीज़ निकली — गोल, हरी-काली, जंग से भरी हुई, ऊपर एक उभरा हुआ फूल जिसे देखकर ही पता चलता था कि ये कभी पीतल था।
पीतल का डिब्बा।
वो उतरा और उसने डिब्बा सानिया की गोद में रख दिया। सब उस पर झुक गए। मैं भी झुका।
ढक्कन जंग से बैठ गया था। रफ़ीक़ ने रिंच जैसा कुछ निकाला, ज़ोर लगाया, और ढक्कन टूटकर खुल गया।
अंदर सिक्के थे — पुराने, काले पड़े हुए। कुछ आने, कुछ पैसे। और उनके नीचे एक मुड़ा हुआ काग़ज़।
चिंटू ने काग़ज़ निकाला। पीला, नाज़ुक, किनारों से फटा हुआ। मैंने उसे बहुत सँभालकर खोला।
उस पर हाथ से लिखा था, नीली स्याही में, झुके अक्षरों में।
"कलीम की बच्ची के इलाज के लिए — दो रुपये चार आने। किसी को न बताना।"
नीचे एक तारीख़ थी, और उसके नीचे वही हस्ताक्षर जो मैंने पंद्रह दिन पहले एक पुराने संदूक के काग़ज़ पर देखे थे — नहीं, वो उस्ताद के थे। ये दूसरे थे। पर मैं उन्हें पहचानता था।
रामदीन।
चबूतरी पर बैठे पंडित रामदीन के हाथ के अक्षर।
मैंने काग़ज़ को दोनों हाथों में पकड़कर पलटा। पीछे की तरफ़ बस धुँधला सा एक वाक्य और था, बहुत छोटा, बहुत झुका हुआ।
"बच्ची बच जाए तो कह दूँगा। न बचे तो कभी नहीं।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
मैंने काग़ज़ सानिया के हाथ में दिया और कहा, "इसे सँभालकर रख।"
फिर मैं पीपल की तरफ़ चला।
चबूतरी पर दोनों बुज़ुर्ग बैठे थे। बाबा कलीम की तस्बीह चल रही थी। पंडित रामदीन की लाठी उनके घुटने के पास खड़ी थी। दोनों के बीच वो एक हाथ भर की खाली जगह — जो दिखती जगह नहीं थी, आदत थी।
मैं सीधा गया और उसी खाली जगह में बैठ गया।
दोनों ने मेरी तरफ़ देखा। पंडित जी की भौंहें चढ़ीं। बाबा कलीम की तस्बीह रुकी।
"ये जगह नहीं है तेरी," पंडित जी ने कहा। आवाज़ सूखी, जैसे पुराने पीतल पर उँगली फेर दी हो।
"पता है," मैंने कहा। "पर मेरे पास बैठने की और जगह नहीं है।" मैंने झूठ नहीं बोला। मैंने सच बोला — इन दोनों के बीच, इस खाली जगह में, मुझे लगा जैसे मैं कुछ ठीक करने आया हूँ।
बाबा कलीम ने बहुत धीरे कहा, "जा, बेटा। हमारे बीच कुछ नहीं रहा।"
"मुझे पता है आप दोनों मुझसे नहीं बोलेंगे," मैंने कहा। "तो मैं बोलता हूँ। मैं कुछ माँगने नहीं आया। मैं बस एक सच्ची बात कहने आया हूँ, अपने घर की। क्योंकि मेरे घर में कोई सच नहीं बोलता, तो बाहर बोलना पड़ता है।"
दोनों चुप रहे।
मैंने अपने घुटनों की तरफ़ देखकर कहा, "मेरे पापा ने पंद्रह साल पहले एक काग़ज़ पर अंगूठा लगाया था। उन्हें लगा वो सिर्फ़ इलाज का काग़ज़ है। नीचे जो था, वो उन्होंने देखा ही नहीं। और उस अंगूठे से ये पूरी गली बिक गई। ये दुकान बिक गई, ये पीपल बिक गया, ये चबूतरी भी बिक गई जिस पर आप दोनों बैठे हैं।"
मैंने रुककर साँस ली।
"और मैं पंद्रह दिन से उसी अंगूठे को छिपाने की कोशिश कर रहा था। लोगों से, अपनी बहन से, ख़ुद से भी। कल रात मेरी बहन ने पूछा — माँ का इलाज पूरी गली की कीमत पर क्यों? मेरे पास जवाब नहीं था।"
पंडित रामदीन की लाठी की गाँठ पर उनकी उँगलियाँ सख़्त हो गईं।
"तू ये क्यों बता रहा है हमें?" उन्होंने पूछा।
"क्योंकि आप दोनों पचास साल से एक-दूसरे को इल्ज़ाम दे रहे हैं और कोई कुछ नहीं बोल रहा। और मैंने आज देखा कि सच बोलने से आदमी टूटता नहीं। डर से ज़्यादा सच हल्का होता है।"
मैंने हाथ आगे बढ़ाया। सानिया दौड़कर आई और उसने पीतल का डिब्बा और वो काग़ज़ मेरे हाथ में रख दिया।
डिब्बा देखकर बाबा कलीम उठ खड़े हुए। उनकी तस्बीह हाथ से छूटकर ज़मीन पर गिरी और फिर भी वो नहीं झुके।
"ये…" उनका गला रुंध गया। "ये वही है।"
पंडित रामदीन की आँखें डिब्बे पर टिक गईं। उनका मुँह खुला रह गया।
मैंने वो काग़ज़ धीरे से खोला और उनके आगे रखा।
पंडित जी ने काग़ज़ पढ़ा। उनके चेहरे पर पहले कुछ समझ नहीं आया। फिर आया। फिर उनका हाथ काग़ज़ पर जम गया, जैसे उसे वापस मोड़ना चाह रहा हो, जैसे वो लिखा हुआ मिटाना चाहते हों।
"मैंने सोचा था तूने लिया," पंडित रामदीन ने कहा। आवाज़ इतनी धीमी कि मैंने कान आगे किया। "उस सुबह डिब्बा खाली देखकर मैंने सीधे तुझ पर शक किया। कुछ पूछा भी नहीं।"
बाबा कलीम काँप रहे थे।
"मैंने तेरे मुँह पर इल्ज़ाम सुना," उन्होंने कहा, "और मैंने जवाब नहीं दिया। क्योंकि जवाब देने का मतलब था तेरे सामने रोना। मेरी बच्ची उस हफ़्ते चली गई थी। मुझे पता भी नहीं था कि तू उसके इलाज के लिए ये पैसे ले गया था। मैंने सोचा तूने चुराए।"
"मैंने चुराए नहीं," पंडित जी ने कहा। उनकी आवाज़ टूट रही थी। "मैंने तेरी बच्ची को क्लिनिक ले जाने के लिए उठाए थे। पर तू उस रात कहीं और था। तेरे घर वाले कह रहे थे तू दवा के लिए शहर गया है। मैंने सोचा — तू आएगा, मैं बताऊँगा। तू एक हफ़्ते बाद आया।"
"मैं शहर नहीं गया था," बाबा कलीम ने कहा। "मैं बच्ची के पास बैठा था। तेरी बीवी ने मुझसे कहा था कि तू पैसों के लिए परेशान है, इसलिए मैंने तुझसे कुछ नहीं कहा।"
दोनों ने एक-दूसरे को देखा।
पचास साल में पहली बार, सीधे आँखों में।
चबूतरी पर बैठे बाक़ी बुज़ुर्ग चुप हो गए। किसी के हाथ में चाय का गिलास बीच में ही रुक गया। पीपल की पत्तियाँ बिना हवा के खड़खड़ाईं।
मैं उठ गया। मैंने उनका बीच खाली कर दिया। ये जगह अब मेरी नहीं थी।
और मेरी जेब में घंटी बजी।
बहुत हल्की। इतनी हल्की कि मुझे लगा पीपल की पत्ती गिरी है।
पर आवाज़ साफ़ थी, और वो मेरी ही थी।
"बारह।"
बस एक शब्द। बारह।
मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी गर्म थी, जैसे किसी ने उसे हथेली में देर तक पकड़ा हो।
मैंने धीरे से कहा, "ये तो दस का था।"
घंटी चुप रही।
फिर बोली, "बीच में तेरी उम्र लगी।"
मैं समझ गया। मैंने दो रुपये चार आने को दस अंक में नहीं तोला। मैंने पचास साल को तोला। उसका हिसाब ज़्यादा था।
मैं मुड़ा और मैंने देखा कि शबनम आपा अपनी गुमटी के दरवाज़े पर खड़ी थीं, हाथ में लोहे की चिमटी, और उनकी आँखें भरी हुई थीं। उन्होंने मुझे देखा, कुछ नहीं कहा, बस चिमटी नीचे रखी और अंदर चली गईं।
बच्चे चबूतरी के पास खड़े थे। सानिया के हाथ में अब भी उस डिब्बे की जंग लगी गंध थी और गुड्डू अपनी कमर से रस्सी खोल रहा था। चिंटू मेरी तरफ़ देखकर हँसा और उसने कान के पीछे उँगली डालकर कहा, "उस्ताद, हमने काम किया न?"
मैंने उसका सिर खरबूजे की तरह पकड़कर हिलाया।
"तुम चारों ने वो किया जो मैं पंद्रह दिन में नहीं कर पाया," मैंने कहा। "तुमने ढूँढा। मैंने तो बस पूछा।"
"अब क्या मिलेगा हमें?" रफ़ीक़ ने पूछा। "हमें भी कुछ मिलता है? जो काम करे, उसे मिलता है न? मेरे अब्बा कहते हैं —"
"मिलेगा," मैंने कहा। "सबसे पहले — शबनम आपा के यहाँ आज सबकी चाय मेरी तरफ़ से। और समोसा भी।"
चारों चीख पड़े और गुमटी की तरफ़ भाग गए।
मैं वहीं खड़ा था, हाथ जेब में, जब एक आवाज़ मेरे पीछे से आई।
"तू क्या समझता है ख़ुद को?"
मैं मुड़ा।
मीरा खड़ी थी। उसका कैमरा अब भी उसी कोने में तिपाई पर लगा था, लाल बत्ती जल रही थी। उसने अपना फटा बैग कंधे पर चढ़ाया और दो क़दम आगे आई।
"तू इन बुज़ुर्गों की ज़िंदगी का सबसे बड़ा ज़ख़्म खोलकर उसे कैमरे में कर रहा है," उसने कहा। "और तू क्या बोलेगा? कि तेरी घंटी चमत्कार करती है? कि तू भगवान का आदमी है? तू इन्हें बेवकूफ़ बना रहा है।"
"मीरा —"
"नहीं, सुन।" उसने हाथ उठाया। "मैं पाँच साल इस शहर में रहकर यही सीखी हूँ कि जो भी कहे मैं सच बताऊँगा, वो या तो पैसे ले रहा होता है, या वोट माँग रहा होता है, या अपनी दुकान बढ़ा रहा होता है। तेरे पास क्या है? एक घंटी, एक पुरानी साइकिल और बोलने का तमाशा।"
वो मेरे बोर्ड के पास आई और उसने उस पर उँगली रखी।
"शंकर यादव और बेटे।" वो हँसी। "ये तेरे पापा का नाम है। और मुझे पता है तेरे पापा ने क्या किया। मेरे पास वो काग़ज़ है जिस पर उनका लाल अंगूठा है। और तू यहाँ बैठकर ये गली बचाने की बातें करता है?"
उसकी आवाज़ अब बहुत साफ़ थी, और उसके शब्द सुइयों की तरह आ रहे थे।
"तू इन बुज़ुर्गों को जोड़ेगा? तू? जिसका अपना बाप इस पूरी गली को बेच आया?"
गली में किसी ने साइकिल का हैंडल दबाया। चाय की केतली छनकी। दूर स्कूल की घंटी बजी।
मेरे अंदर कुछ ठंडा हुआ। वो ठंडा जो गुस्सा नहीं होता, वो ठंडा जो शर्म होता है।
मैंने कुछ नहीं कहा।
और फिर, इसी वक़्त, पीछे की गली से — उस्ताद अली बक्श की दुकान की दरवाज़े की घंटी बजी और उस्ताद दुकान से बाहर आए।
वो चलते हुए आ रहे थे, हाथ में मोटा चश्मा, कान पर पेंसिल। वो मेरी दुकान के सामने से गुज़रने वाले थे, पर जैसे ही मेरी जेब से घंटी बजी — फिर से बजी, बिना मेरे हाथ लगाए — उस्ताद रुक गए।
पूरे रुके। वैसे ही जैसे बबलू रुका था।
उनका हाथ जो अपने चश्मे पर था, वहीं जम गया।
वो मेरी तरफ़ देखने लगे। मेरे बोर्ड पर देखा। फिर जेब पर। फिर मेरे चेहरे पर।
उनके चेहरे पर कोई डर नहीं था। कुछ और था। वैसा, जैसा आदमी के चेहरे पर तब आता है जब वो अपने ही बहुत पुराने सपने को सड़क पर चलते देख ले।
"मीरा," उस्ताद ने कहा। आवाज़ शांत, पर भारी। "तेरा कैमरा बंद कर।"
मीरा चौंकी। "उस्ताद, पर —"
"कैमरा बंद कर।" उन्होंने दोहराया, और इस बार उनकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो उनकी दुकान से आने वाली सिलाई मशीन की टिक-टिक में होती है — बहुत ठहरी हुई, बहुत पक्की।
मीरा ने कुछ बड़बड़ाया और कैमरा बंद कर दिया।
उस्ताद मेरे पास आए, मेरा हाथ पकड़कर दुकान के अंदर ले गए और पीछे वाले कमरे का दरवाज़ा खट से बंद कर दिया।
कमरे में अंधेरा था। गुनगुनाता बल्ब जल रहा था। टिंकू दरवाज़े के बाहर चुपचाप खड़ा था, उसकी छाया दरवाज़े के नीचे से चपटी होकर अंदर आ रही थी।
उस्ताद ने मेरी जेब से चुपचाप घंटी निकालने को कहा। मैंने निकाली।
वो घंटी अपनी हथेली में रखकर देर तक निहारते रहे, जैसे कोई चेहरा याद कर रहे हों।
"ये…" उनकी आवाज़ भर्राई। "ये किसी की मिरासी होती है।"
"मिरासी?"
"विरासत में मिली चीज़।" उन्होंने घंटी मेरी हथेली पर वापस रख दी। "और मिरासी का हिसाब भारी होता है, अंकुश। बेटा ठीक है, पर हिसाब भारी है।"
"उस्ताद, ये घंटी —"
"मेरी बात सुन।" उन्होंने मेरी तरफ़ झुककर कहा, और उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो डर और चेतावनी के बीच होती है। "इसे बाज़ार में मत दिखाना। न शबनम को, न इन बच्चों को, न किसी काग़ज़ वाले को। ख़ासकर उन्हें जो अंगूठे लेने आते हैं। ये घंटी जिस के हाथ लगी, वो आदमी आधा रह जाता है — आधा उसका, आधा इसका। समझ रहा है?"
मैंने सिर हिलाया, हालाँकि मैं पूरा नहीं समझा था।
उस्ताद दरवाज़े की तरफ़ बढ़े। उन्होंने हाथ कुंडी पर रखा और रुक गए। उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा, बस दीवार की तरफ़ देखते हुए कहा:
"और अंकुश — एक बात घंटी से पूछना।"
"क्या?"
"तेरा घर इतना चुप क्यों है।"
वो बाहर चले गए। दरवाज़ा बंद हो गया।
मैं कमरे में अकेला खड़ा रहा। बल्ब गुनगुनाता रहा।
उस रात मैं घर लौटा तो घर सचमुच चुप था।
माँ की खाँसी आ रही थी कमरे के अंदर से, पर वो खाँसी भी अपनी आवाज़ दबा रही थी, जैसे किसी को जगा न दें। काजल अपनी नर्सिंग की किताब खोलकर बैठी थी पर पन्ना पलटते हुए मैंने उसे एक बार भी नहीं देखा। पापा छत पर चले गए थे और वहाँ से सिर्फ़ चारपाई की चरचराहट आ रही थी।
मैं अपने कमरे में बैठा। मैंने घंटी जेब से निकाली और अपनी हथेली में रखी।
"एक बात पूछनी है," मैंने धीरे से कहा।
कुछ देर चुप्पी रही।
"पूछ।"
"मेरा घर इतना चुप क्यों है?"
बल्ब गुनगुनाया। बाहर कहीं ट्रक गुज़रा और उसकी गूँज दीवारों से टकराकर कमरे में आई।
घंटी ठंडी हो गई।
और फिर उसकी आवाज़ आई। बहुत छोटी। बहुत साफ़।
"क्योंकि तेरे घर में सबसे ज़्यादा सच तेरे पास है। और तू उसे हँसी में लपेटकर रखता है।"
मैं वहीं बैठा रहा।
और पहली बार मुझे लगा कि जो मैं सबके लिए कर रहा हूँ, वो मेरे ही घर में अभी शुरू नहीं हुआ।
घंटी फिर बोली।
"बारह अंक। एक सवाल के लिए काफ़ी है।"
"कौन सा सवाल?"
"तेरे घर वाला।"
॥
रात भर मैंने करवटें बदलीं। घंटी मेरी जेब में थी और सवाल मेरे सिर में। कभी मैं सोचता कि घंटी ने जो कहा, वो सच है — सबसे ज़्यादा सच मेरे पास है, और मैं उसे हँसी में लपेटकर रखता हूँ। कभी सोचता कि नहीं, ये कोई पहेली है, और घंटी पहेलियाँ ही बोलती है।
सुबह चार बजे माँ की खाँसी उठी। मैं उठकर गया तो वो चूल्हे के पास बैठी थीं, हाथ में हिसाब की कॉपी, और आँखें लाल। मैंने कहा, "माँ, आज अस्पताल चलना है।" उन्होंने कहा, "टिफ़िन का ऑर्डर है।" मैंने कहा, "काजल देख लेगी।" काजल पीछे से आई, बाल बाँधते हुए, और बोली, "माँ, आज मैं चूल्हा संभाल लूँगी, तू बस चल।"
माँ ने एक लंबी साँस ली, जैसे कोई पुराना बोझ उतार रही हों, और कहा, "ठीक है।"
डॉक्टर इसरानी ने सुबह दस बजे बुलाया था। हम नौ बजे निकले — माँ, काजल और मैं। पापा घर पर रहे। निकलते वक़्त उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा, "परची लेकर आना।" और मैंने सिर हिलाया।
नूर अस्पताल की पीली दीवारों पर सुबह की धूप पड़ रही थी। सीढ़ियों पर कोई मरीज़ खाँस रहा था। डॉक्टर इसरानी के कमरे में काग़ज़ों का ढेर था, आधा पानी का गिलास था, और उनके टेप से लिपटे पुराने स्टेथोस्कोप की नली कुर्सी पर लटक रही थी।
डॉक्टर ने माँ को देखा। खाँसी सुनी। परची पर पिछली बार की दवा काटी, नई दवा लिखी, और दो जाँचें लिखीं। फिर वो मेरी तरफ़ मुड़े।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "परची में जो लिखा है, वो करवाना। पैसे की तकलीफ़ हो तो बताना।"
मैंने कहा, "डॉक्टर, पैसे की नहीं, वक़्त की तकलीफ़ है।"
वो हँसे। एक छोटी-सी हँसी, जैसे कोई थका हुआ आदमी हँसे। फिर उन्होंने आवाज़ धीमी करके कहा, "वक़्त भी बचेगा, अंकुश। बस उस काग़ज़ का सच सामने आ जाए।"
मैंने सिर हिलाया। बाहर आकर काजल ने माँ का हाथ पकड़ा और कहा, "तू ठीक है?" माँ ने कहा, "मैं ठीक हूँ। बस ये बता, तेरे पापा ने नाश्ता किया या नहीं।"
काजल ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने कंधे उठाए।
घर लौटकर माँ को आराम करने को कहा। काजल ने दवा की पर्ची रसोई की दीवार पर टाँग दी, जहाँ से माँ की नज़र पड़ती रहे। पापा बरामदे में बैठे थे, हाथ में पुराना पेचकस। वो उसे घुमा रहे थे, पर कुछ ठीक नहीं कर रहे थे।
मैंने कहा, "पापा, मैं दुकान जा रहा हूँ।" उन्होंने सिर हिलाया। फिर मैंने धीरे से कहा, "आज सुबह उस्ताद के पास से आता हूँ।" पापा का हाथ रुक गया। उन्होंने पेचकस रख दिया और बस इतना कहा, "उस्ताद से कहना, मैं आऊँगा।"
मैं समझ गया। पापा का "मैं आऊँगा" मतलब — मैं गवाही दूँगा।
मैं दुकान की तरफ़ निकला।
गली में सुबह की चहल-पहल शुरू हो चुकी थी। उस्ताद की दुकान से सिलाई मशीन की टिक-टिक आ रही थी। शबनम आपा की गुमटी पर भाप उठ रही थी। पीपल के नीचे चबूतरी पर बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे, और उनके बीच से एक गेंद मेरे पैरों पर आकर लगी।
"अरे!" मैंने कहा। "अंकुश भैया, माफ़ करना!" चिंटू भागकर आया। उसके घुटने पर पट्टी थी, आँखों में शरारत। "भैया, वो गुड्डू ने गेंद फेंकी थी।"
मैंने गेंद उठाकर वापस दी। "अच्छा, तो गुड्डू ने फेंकी। और तूने क्या किया?"
चिंटू हँसा। "मैंने कैच छोड़ दी।"
मैं दुकान की तरफ़ बढ़ा, तभी मेरी नज़र चबूतरी के दूसरे सिरे पर पड़ी।
वहाँ दो बुज़ुर्ग बैठे थे। एक बहुत सफ़ेद दाढ़ी वाला, चश्मा, हाथ में तस्बीह — वो इब्राहीम चाचा थे। दूसरे पतले, सफ़ेद कुर्ता और पगड़ी जैसा कुछ सिर पर — बृजमोहन बाबा। दोनों के बीच चबूतरी पर इतनी जगह खाली थी जितनी में एक बैल बैठ जाए। दोनों एक-दूसरे की तरफ़ नहीं देख रहे थे। इब्राहीम चाचा पूरब देख रहे थे, बृजमोहन बाबा पश्चिम।
मुझे ये अजीब लगा, क्योंकि कल तक मैंने इन्हें यहाँ इतनी साफ़ अलग बैठे नहीं देखा था। या शायद देखा था, पर ध्यान नहीं दिया। इंसान को आदत हो जाती है — कुछ चीज़ें रोज़ सामने होती हैं, और हम उन्हें देखते हुए भी नहीं देखते।
मैं दुकान पर पहुँचा। टिंकू पहले से था। उसने बोर्ड साफ़ कर दिया था, और अब स्टूल पर बैठकर पुरानी रिंच को तेल से रगड़ रहा था।
"उस्ताद," उसने कहा, "आज मैं एक कील सीधी कर सकता हूँ?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "एक कील?"
"हाँ। मैंने सोचा — छोटी शुरुआत।"
मैं हँसा। "ठीक है। कील ले आ। पर सीधी करने से पहले मुझे दिखाना।"
टिंकू ने सिर हिलाया और ट्रंक की तरफ़ भागा। मैंने पंचर वाले टब में हाथ धोए और दुकान के बाहर देखा।
चबूतरी पर अब बंसी बाबा भी आ गए थे। वो रहमत बाबा के साथ बैठे थे — कल की सुलह के बाद पहली बार साथ बैठे थे। दोनों के चेहरों पर वो चीज़ थी जो सुलह के बाद होती है — थोड़ी शर्म, थोड़ी राहत, और बहुत सारी चुप्पी। बंसी बाबा ने इब्राहीम चाचा की तरफ़ देखा, फिर बृजमोहन बाबा की तरफ़, और धीरे से रहमत बाबा से कुछ कहा। रहमत बाबा ने सिर हिलाया।
मैंने टिंकू को आवाज़ दी। "टिंकू, वो दोनों — इब्राहीम चाचा और बृजमोहन बाबा — क्या बात है?"
टिंकू ने रिंच रखी और दरवाज़े पर आ गया। "पता नहीं, उस्ताद। मैंने पूछा था सानिया से। सानिया ने कहा कि बचपन से ऐसे ही हैं। न बोलते हैं, न झगड़ते हैं। बस अलग बैठते हैं।"
"कितने साल से?"
टिंकू ने कंधे उठाए। "सानिया कहती है, जब से उसे होश आया, तब से।"
मैं दुकान से बाहर निकला। शबनम आपा की गुमटी पर गया।
"आपा," मैंने कहा, "एक चाय, और एक सवाल।"
उन्होंने चिमटी से समोसा उठाया और पतीले में डाला। "चाय पहले, सवाल बाद में।"
मैं स्टूल पर बैठ गया। गुमटी के पास सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू इकट्ठे हो गए थे — चारों के हाथ में चाय के पैसे थे, चार आने-चार आने के।
"अंकुश भैया," सानिया ने कहा, "आज हम तेरी मदद करेंगे।"
मैंने भौंहें उठाईं। "मेरी मदद? कैसे?"
"अब तक तू हमें चाय पिलाता था। आज हम तुझे पिलाएँगे।"
मैं हँस पड़ा। "अरे वाह। ये तो कल की सुलह का असर है।"
गुड्डू ने आगे बढ़कर कहा, "भैया, हमें पता है इब्राहीम चाचा और बृजमोहन बाबा के बारे में।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "क्या पता है?"
"सानिया को पता है।"
सानिया ने गुड्डू को कोहनी मारी। "चुप कर।"
रफ़ीक़ बोला, "अरे बता दे। अंकुश भैया को सब पता है। इन्होंने कल दो बुज़ुर्गों को जोड़ दिया।"
मैंने चाय का कप उठाया। "ठीक है, सानिया, बता।"
सानिया ने चारों तरफ़ देखा, जैसे कोई राज़ बता रही हो। "भैया, इब्राहीम चाचा के बेटे का नाम यूसुफ़ है। व"भैया, इब्राहीम चाचा के बेटे का नाम यूसुफ़ है। वो अब दिल्ली में बड़ा आदमी है। मगर वो चाचा से नहीं बोलता।"
सानिया ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो गंभीरता थी जो तेरह साल की लड़की में अचानक नहीं आती।
मैंने चाय का गिलास नीचे रखा।
"क्यों नहीं बोलता?"
"यही तो नहीं पता, भैया।" उसने कंधे उठाए। "मगर बृजमोहन बाबा रोज़ शाम को चार बजे से पहले आ जाते हैं। पीपल के नीचे। एक ही जगह — ज़मीन पर रखे उस पुराने पत्थर पर। वहाँ बैठकर वो इब्राहीम चाचा को देखते हैं, जो चबूतरी के दूसरे सिरे पर बैठते हैं।"
रफ़ीक़ ने आगे बढ़कर कहा, "और भैया, वो जेब से कुछ निकालकर देखते हैं। छोटी सी किसी चीज़ को।"
चिंटू ने गर्दन आगे की। "मैंने एक बार देखा। उनके हाथ से गिर गई थी। भूरे रंग की छोटी बोतल। खाली। जब वो उसे उठाने झुके, उनके हाथ काँप रहे थे।"
मेरे अंदर कुछ हिला।
मैंने शबनम आपा की तरफ़ देखा।
"आपा, इन दोनों के बीच क्या बात है?"
उन्होंने लोहे की चिमटी पतीले से बाहर निकाली और किनारे रख दी। उनका चेहरा पल भर के लिए सपाट हो गया।
"चालीस साल में मैंने इन दोनों को एक बार साथ नहीं देखा।" उन्होंने कहा। "बस एक बार देखा था, बहुत पहले। तब मैं छोटी थी। मेरी माँ गुज़री थीं। शाम को पीपल के नीचे ये दोनों एक-दूसरे के गले लगकर रो रहे थे।"
"फिर क्या हुआ?"
"फिर कुछ हुआ। क्या हुआ, मुझे नहीं पता। अगली सुबह से ये अलग बैठने लगे।"
वो समोसा उठाने लगीं, फिर रुक गईं।
"अंकुश, ये चारों कल शाम से इन दोनों को देख रहे हैं। तुझे बताया नहीं?"
मैंने चारों की तरफ़ देखा। चारों एक साथ सिर हिला रहे थे, एक ही लय में, जैसे कोई छोटी सेना हो।
सानिया ने आगे बढ़कर कहा, "भैया, आज हमें कुछ करने दे। हम उनके पीछे लगेंगे। तू जा, उनसे बात कर। हम तेरे कान होंगे।"
मैं हँस पड़ा। "मेरे कान?"
"हाँ। तेरे कान। और तेरी आँखें भी।"
गुड्डू ने अपनी छोटी मुट्ठी बंद करके कहा, "आज से हम तेरी टीम हैं, भैया।"
मैंने उन चारों को देखा। रफ़ीक़ के घुटने पर पट्टी बँधी थी, चिंटू की नाक बह रही थी, सानिया के बाल उलझे थे — और इन चारों की आँखों में वो चीज़ थी जो बड़ों की आँखों में अब नहीं बची थी।
"ठीक है," मैंने कहा, और चाय का आख़िरी घूँट मारा। "लेकिन दूर से। किसी को कुछ नहीं बोलना। बस देखना।"
"हाँ भैया!"
चारों भागे। शबनम आपा ने उनके पीछे देखते हुए कहा, "ऐसे भागेंगे तो बृजमोहन बाबा को शक हो जाएगा।"
मगर वो हँस रही थीं।
मैं शाम चार बजकर पचास मिनट पर दुकान से निकला। पीपल के नीचे चबूतरी खाली थी। बृजमोहन बाबा अभी नहीं आए थे। शबनम आपा की गुमटी के पीछे चार छोटी छायाएँ दिखीं और फिर गायब हो गईं।
मैं पीपल की तरफ़ गया और चबूतरी के किनारे बैठ गया।
चार बजकर पचपन पर बृजमोहन बाबा आए।
दुबले, सफ़ेद कुर्ता, हाथ में लाठी, सिर पर सफ़ेद टोपी और छोटी दाढ़ी। उन्होंने पीपल के नीचे ज़मीन पर पड़े उस पत्थर को देखा, फिर चबूतरी पर मुझे देखा।
वो रुक गए।
"अंकुश," उन्होंने कहा। आवाज़ में वो कड़वाहट थी जो सिर्फ़ पुराने लोगों की आवाज़ में होती है। "चबूतरी तो हमारी है।"
"जानता हूँ, बाबा। मैं आपकी जगह नहीं लूँगा।"
मैं उठ गया। "अरे, और वो पत्थर भी आपका ही है — जिस पर आप चालीस साल से बैठते हैं। मुझे सब पता है।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें भारी थीं।
"किसने बताया?"
"मेरे जासूस," मैंने कहा और हल्का मुस्कुराया।
वो नहीं हँसे। वो पत्थर पर बैठ गए। मैं उनके सामने घुटनों के बल बैठ गया।
"बाबा, एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"वो जो आप जेब से निकालकर देखते हैं, छोटी सी भूरी बोतल — क्या है?"
उनका चेहरा एकदम नरम हो गया। वो देर तक मेरी तरफ़ देखते रहे, जैसे तय कर रहे हों। फिर उन्होंने जेब में हाथ डाला।
बोतल निकली। छोटी, काँच की, भूरी। ढक्कन खोया हुआ था। ऊपर का काग़ज़ पूरा घिस चुका था, सिर्फ़ एक कोने पर "अ" अब भी दिखता था, बाकी सब मिट गया था।
"ये बोतल चालीस साल पुरानी है।" उन्होंने कहा। "मेरी बीवी की दवा की बोतल। साँस की।"
उन्होंने उसे उलट-पलट कर देखा।
"उस रात वो हमारे घर के बाहर ज़मीन पर गिर गई थी। साँस नहीं आ रही थी। होश नहीं था। मैंने उसे गोद में उठाया और अस्पताल भागा। रास्ते में सोचा — पैसे? मेरे पास एक रुपया भी नहीं था।"
वो रुके। साँस भरते रहे, धीरे।
"उसी दिन सुबह इब्राहीम ने यूसुफ़ की फ़ीस के अस्सी रुपये मेरे हाथ में दिए थे। मैंने कहा था — भरोसा रख, सोमवार तक फ़ार्म जमा करा दूँगा। और सोमवार से पहले, उसी रात, मेरी बीवी उस हाल में पहुँची।"
"अस्सी रुपये दवा में लग गए?"
"डॉक्टर ने कहा — इंजेक्शन। पच्चीस रुपये। और भर्ती। उस रात मेरे पास सोलह रुपये थे। फिर इब्राहीम के अस्सी। मैंने एक मिनट सोचा।"
उन्होंने आँखें बंद कर लीं।
"एक मिनट, बेटा। बस एक मिनट। फ़ीस ज़रूरी है या साँस? पागल था मैं। मैंने पैसे दे दिए। मेरी बीवी बच गई।"
"और यूसुफ़ भाई?"
"उस साल दाख़िला रह गया। अगले साल फिर रह गया। तीसरे साल उसने पढ़ाई छोड़ दी और गोदाम में काम करने लगा।" उन्होंने आँखें खोलीं। "मेरे बेटे के साथ। दोनों एक ही गोदाम में। मेरा बेटा आज भी वहीं है। यूसुफ़ दिल्ली में है। भगवान की मर्ज़ी।"
"और इब्राहीम चाचा को क्या बताया?"
"मैंने क्या बताता?" उनका गला भर आया। "उसने पूछा, पैसे कहाँ हैं? मैंने कहा, पैसे नहीं हैं। उसने पूछा, कहाँ गए? मैं चुप रहा।"
"क्यों?"
"शर्म आई, बेटा।" उन्होंने कहा। "मैंने सोचा — कहेगा, तेरी बीवी की दवा के लिए मेरे बेटे का भविष्य? मैं वो सुनने को तैयार नहीं था।"
"उसने क्या कहा?"
"उसने मुझे गली के बाहर खींच लिया। लोग खड़े थे। उसने कहा — बृजमोहन, तू चोर है। मेरे बेटे का भविष्य खा गया।"
उनकी आवाज़ रुक गई। उन्होंने अपनी आस्तीन से आँखें पोंछीं।
"मैं उस दिन से चुप हूँ। रोज़ शाम यहाँ आता हूँ। पत्थर पर बैठता हूँ, बोतल निकालता हूँ, और सोचता हूँ — काश उस रात मुझे बुख़ार होता। काश मेरी बीवी को दौरा उस रात न पड़ा होता।"
मैं कुछ नहीं बोला। बस हाथ बढ़ाकर उनके हाथ पर रख दिया।
"बाबा, वो जो पत्थर है — उस पर बैठने की ज़रूरत क्या थी? चबूतरी पर बैठ जाते।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें भरी हुई थीं।
"क्योंकि चबूतरी पर वो बैठता है। मैं उसके सामने नहीं बैठ सकता। मगर उसकी चबूतरी से इतनी दूर भी नहीं बैठ सकता कि वो दिखे न।"
"बाबा, ये बात आज चबूतरी पर जाकर कहनी पड़ेगी।"
"नहीं।" उन्होंने सिर हिलाया। "वो नहीं सुनेगा।"
"वो सुनेगा," मैंने कहा। "मैं अभी उसके पास जा रहा हूँ। और मैं उससे कहूँगा कि एक बूढ़ा आदमी चालीस साल से तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है।"
उनकी आँखें फैल गईं।
"अंकुश, तू —"
"बाबा, आप मेरे साथ चलिए।"
वो उठे। लाठी पकड़ी। काँप रहे थे।
जब हम चबूतरी की तरफ़ बढ़ रहे थे, शबनम आपा की गुमटी के पीछे से चार सिर उभरे। सानिया ने मुझे इशारा किया — "सब तैयार है, भैया।"
मैंने उन चारों को आँख से धन्यवाद कहा।
इब्राहीम चाचा चबूतरी के अपने सिरे पर बैठे थे। सफ़ेद कुर्ता, गले में तस्बीह, हाथ में रुमाल। उन्होंने बृजमोहन बाबा को देखा।
दोनों रुक गए।
दोनों के बीच चार कदम का फ़ासला और चालीस साल का सन्नाटा।
मैं बीच में खड़ा था।
"चाचा," मैंने कहा। "बृजमोहन बाबा आपसे कुछ कहना चाहते हैं।"
इब्राहीम चाचा का चेहरा सख़्त हो गया। उन्होंने रुमाल मोड़ा।
"मुझसे नहीं कहना। जो कहना है, अपने आप से कहो।"
बृजमोहन बाबा पीछे हटने लगे। मैंने उनका हाथ नहीं छोड़ा।
"चाचा, एक बात मैं कहूँ?"
"तू कौन है?"
"मैं शंकर यादव का बेटा हूँ।"
इब्राहीम चाचा ने मेरी तरफ़ देखा।
"वो जो साइकिलों वाली दुकान चलाता था?"
"हाँ।"
"वो तो अब नहीं दिखता।"
"वो घर पर है। पंद्रह साल से चुप है। उसने एक ग़लती की थी — बड़ी ग़लती। कल रात मेरे सामने कबूल की।"
इब्राहीम चाचा कुछ नहीं बोले।
"चाचा, चालीस साल पहले आपने बृजमोहन बाबा पर एक इल्ज़ाम लगाया। क्या वो सच था?"
मेरी आवाज़ धीमी हो गई।
"आप जानते थे, है न? आपको पता था कि अस्सी रुपये उनकी बीवी की दवा में लगे थे।"
इब्राहीम चाचा का चेहरा पत्थर हो गया।
"किसने कहा तुझसे?"
"किसी ने नहीं कहा। मैं बस देख रहा था।" मैंने कहा। "आप हर शाम चबूतरी पर आते हैं। उस पत्थर की तरफ़ नहीं देखते — मगर उस पत्थर की जगह ठीक आपकी आँखों के सामने है। चालीस साल से आपने वो जगह नहीं बदली।"
उनकी आँखें भर आईं।
"मैं उस रात अस्पताल के बाहर गुज़रा था," उन्होंने धीरे से कहा। "वो अपनी बीवी को गोद में लेकर भाग रहा था। मैंने देखा।"
"और?"
"और मुझे समझ आ गया।" उनका गला रुँध गया। "मैं अगली सुबह उसके घर गया। मैंने सोचा — वो खुद कहेगा। मैंने सोचा — अगर वो मुझे भाई मानता है, तो कहेगा। उसने नहीं कहा। मैंने पूछा, पैसे कहाँ गए? वो चुप रहा।"
"चाचा —"
"मैंने सोचा — ये आदमी मुझे भाई नहीं मानता। चालीस साल से यही सोचता हूँ।" उन्होंने रुमाल से आँखें पोंछीं। "मैं हर शाम यहाँ बैठता हूँ, बृजमोहन। बस तुझे देखने के लिए। तेरे पत्थर पर नहीं जाता — क्योंकि तू आएगा तो मुझसे बोलेगा नहीं। मुझे पता है। तू भी ज़िद्दी है।"
बृजमोहन बाबा काँप रहे थे।
"इब्राहीम," उन्होंने कहा। आवाज़ टूट रही थी। "मेरे पास एक लिफ़ाफ़ा भी है।"
मैं चौंका।
"क्या?"
उन्होंने जेब में हाथ डाला। फिर एक पुराना, मैला, मोड़ा हुआ लिफ़ाफ़ा निकाला।
"इसमें इकतालीस रुपये हैं। पूरे इकतालीस। चालीस साल में जोड़े — आधा-आधा रुपया, एक-एक रुपया। अस्सी में से इकतालीस, उसका ब्याज। बाकी नहीं जुड़े।"
इब्राहीम चाचा उनकी तरफ़ देखते रहे।
"तूने ये लिफ़ाफ़ा चालीस साल अपनी जेब में रखा?"
"हाँ। हर रोज़ सोचता था — आज दे दूँ। हर रोज़ आते-आते हिम्मत टूट जाती थी।"
इब्राहीम चाचा उठे। वो बृजमोहन बाबा के सामने आए। वो लिफ़ाफ़ा लिया। उन्होंने उसे अपनी दोनों हथेलियों में रखा। और फिर फेंक दिया — हवा में नहीं, बल्कि एक धक्के से, दूर।
लिफ़ाफ़ा उड़कर पत्थर के पास गिरा।
"मैंने कोई पैसा नहीं माँगा," इब्राहीम चाचा ने कहा। उनकी आवाज़ टूट रही थी। "मैंने तुझसे एक बात माँगी थी — कि तू मुझे बता दे। बस इतना। मैंने पूरे चालीस साल यही माँगा।"
"इब्राहीम —"
"तूने कहा भी नहीं।" उन्होंने अपनी आवाज़ दबाई। "बता तो देता। मैं तेरा भाई हूँ। किसी और की बीवी नहीं, तेरी बीवी। मैं बचा देता। यूसुफ़ का दाख़िला — अगले साल हो जाता। मगर तूने मुझे बताया भी नहीं।"
बृजमोहन बाबा फूट-फूटकर रोने लगे।
"मैं डरा हुआ था," उन्होंने कहा। "मैं डरा हुआ था, इब्राहीम।"
फिर इब्राहीम चाचा ने उनका हाथ पकड़ा। उन्होंने अपना रुमाल निकाला और बृजमोहन बाबा का चेहरा पोंछा।
"चुप कर।"
"मैं —"
"चुप कर।" उन्होंने बृजमोहन बाबा का सिर अपने कंधे पर रख दिया। "चालीस साल बाद बोला है, तो अब यहीं बैठ।"
मैं पीछे हट गया। सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू गुमटी के पीछे से बाहर आ गए थे और आँखें मल रहे थे। रफ़ीक़ ने अपना हाथ सानिया के कंधे पर रखा।
मेरी जेब में घंटी ठंडी हुई — और फिर बजी।
एक बार। छोटी सी। दो बार। तीन बार।
और फिर उसकी आवाज़ आई। धीमी। साफ़।
"अठारह अंक।"
मैंने साँस ली।
कुल तीस।
मैं वहीं बैठ गया, पीपल के नीचे, ज़मीन पर। और मैंने आसमान की तरफ़ देखा।
तभी — उस्ताद की दुकान से सिलाई मशीन की आवाज़ आ रही थी। टिक… टिक… टिक…
और वो अचानक बंद हो गई।
मैंने पीछे देखा।
उस्ताद अली बक्श अपनी दुकान के दरवाज़े पर खड़े थे। उनका चश्मा हिल रहा था। वो हमारी तरफ़ नहीं देख रहे थे। वो हवा में कुछ सुन रहे थे।
वो धीरे-धीरे गली के बीच आए। रुक गए।
"ये क्या बजा?" उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ काँप रही थी।
मैंने जेब से हाथ हटाया।
"कुछ नहीं, उस्ताद।"
"कुछ नहीं नहीं होता, अंकुश।" वो मेरी तरफ़ आए। उन्होंने मेरा कंधा पकड़ा। "घंटी बजी। मैंने सुनी। पचास साल बाद इतनी साफ़ सुनी कि कान में दर्द हो गया।"
उनकी आँखें चबूतरी की तरफ़ गईं। वहाँ दो बूढ़े आदमी एक-दूसरे का हाथ पकड़कर बैठे थे।
उस्ताद कुछ देर देखते रहे।
"आज तेरे हाथ में पहला बड़ा जोड़ पूरा हुआ," उन्होंने कहा। "मुझे पता है। घंटी ने बता दिया।"
तभी — मैंने पाया कि गली के मोहाने से मीरा आ रही थी।
आज उसके कंधे पर वही फटा बैग था, हाथ में कैमरा। वो जल्दी-जल्दी चल रही थी जैसे कोई खबर उसके तलवों में बैठी हो।
"अंकुश!"
मैंने सीधा देखा।
"तू ये क्या कर रहा है?"
"मीरा —"
"तू इन बुज़ुर्गों को तमाशा बना रहा है।" उसकी आवाज़ ऊँची थी। "कल दो बुज़ुर्गों को रुलाया। आज दो और को। कल किसी और को रुलाएगा। किसके लिए? किसके फ़ायदे के लिए? तेरे पास इन आँसुओं का कोई सबूत है? मैंने अपनी आँखों से देखा — तूने उन दोनों को गले लगवा दिया, और उसी वक़्त तेरी जेब से कुछ बजा। कुछ बज रहा है तेरी जेब में।"
चारों बच्चे जम गए।
"मीरा, सुन —"
"मैं सुन रही हूँ।" उसने कहा। "मैं तुझ पर इल्ज़ाम लगा रही हूँ — कि तू इन बुज़ुर्गों को इस्तेमाल कर रहा है। पाँच साल पहले मैंने एक आधा सच छापकर मास्टर जी का घर बिखेर दिया था। मैं दोबारा नहीं करूँगी। और तुझे भी नहीं करने दूँगी।"
वो सीधे अपने बैग से निकल आई। मेरे पीछे वो दुकान की तरफ़ चल पड़ी।
"मीरा!" मैंने पीछे से आवाज़ दी। "मीरा, रुक।"
वो नहीं रुकी। हम दुकान के सामने पहुँच गए। टिंकू दरवाज़े पर खड़ा था, और उसकी आँखें फैली हुई थीं।
मीरा ने मेरी दुकान में घुसकर पूछना शुरू किया। एक सवाल के बाद दूसरा, दूसरे के बाद तीसरा। "ये घंटी क्या है? किसकी है? तूने ये किसे दिखाई? क्या मैं इसे रिकॉर्ड कर सकती हूँ? क्या तूने पुलिस को बताया? तेरे पापा का अंगूठा किस काग़ज़ पर है? कल का वीडियो क्यों डिलीट कर दिया? क्या तू ये सब पैसों के लिए कर रहा है? किसने तुझे भेजा?"
उसके सवाल गोलियों की तरह आ रहे थे। मैं जवाब देता तो वो सुनती नहीं।
तभी उस्ताद दरवाज़े पर आए।
"बिटिया।"
मीरा रुकी।
"तेरा काम सही है," उस्ताद ने कहा। उनकी आवाज़ शांत थी। "मगर तेरा शक तेरे कान बंद कर रहा है। तू सुनना छोड़ चुकी है।"
"उस्ताद, आप —"
"मैं अभी इससे बात करूँगा। तू जा। शाम को आना। आज का हिसाब देख लेना।"
मीरा ने एक पल मुझे देखा। फिर उस्ताद को। फिर पलट गई।
"मैं शाम को आऊँगी," उसने कहा। "और मैं सबूत लेकर आऊँगी।"
वो गई।
उस्ताद ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे दुकान के पीछे वाले कमरे में ले गए। दरवाज़ा बंद कर दिया।
कमरे में गुनगुनाता पुराना बल्ब जल रहा था।
"तेरे हाथ में जो है," उन्होंने कहा, "मैंने तुझे कल कहा था — ये किसी की मिरासी होती है।"
"याद है, उस्ताद।"
"आज दोहरा रहा हूँ।" वो मेरे पास आए और मेरी आँखों में देखा। "क्योंकि आज तेरे हाथ में पहला बड़ा जोड़ पूरा हुआ। जो आदमी पहला जोड़ पूरा करता है, उसके चारों तरफ़ दो तरह के लोग जुटते हैं — एक जो उससे उम्मीद लगाते हैं। और दूसरे जो उससे डरते हैं। क्योंकि जो जोड़ता है, वो उनकी बनी हुई दुनिया हिला देता है।"
"उस्ताद, आप डरा रहे हैं मुझे?"
"नहीं।" उन्होंने हाथ उठाया। "मैं बस याद दिला रहा हूँ — ये घंटी जिसके हाथ लगी, वो आधा रह जाता है। आधा उसका, आधा इसका।"
वो कुर्सी पकड़कर बैठ गए।
"मैं आधा हूँ, अंकुश। पचास साल से।"
"उस्ताद —"
"मैं तुझे अपनी कहानी नहीं सुनाऊँगा। आज नहीं।" उन्होंने आँखें बंद कर लीं। "बस इतना याद रख — इसे बाज़ार में मत दिखाना। न शबनम को, न इन बच्चों को, न किसी काग़ज़ वाले को। ख़ासकर उन्हें जो अंगूठे लेने आते हैं।"
उन्होंने आँखें खोलीं।
"और एक बात।"
"क्या?"
"वो बात पूछी जो मैंने कही थी?"
मेरे पेट में ठंडी गिरी।
"पूछी, उस्ताद। रात को।"
"तो जवाब मिला?"
मैं चुप रहा।
"जवाब मिला होता, तो तू आज इतना हल्का न दिखता।" उन्होंने कहा। "तूने सुना होगा। पर समझा नहीं होगा। फिर से पूछ। — तेरा घर इतना चुप क्यों है।"
वो उठे और दरवाज़ा खोल दिया।
मैं बाहर निकला।
सूरज ढल गया था। गली में नीली रोशनी पसर रही थी। पीपल के नीचे चबूतरी पर इब्राहीम चाचा और बृजमोहन बाबा साथ बैठे थे। एक-दूसरे की तरफ़ मुँह करके। और उनके बीच में, चबूतरी पर, एक छोटी सी खाली भूरी बोतल रखी थी।
इब्राहीम चाचा ने बोतल उठाई, देखी, और फिर वापस चबूतरी पर रख दी।
"ये अब यहीं रहेगी," उन्होंने कहा। "अब मुझे इसे जेब में नहीं रखना।"
बृजमोहन बाबा ने उनका हाथ पकड़ लिया।
मैं अपनी दुकान की तरफ़ बढ़ा।
दुकान के बाहर टिंकू खड़ा था। उसने मेरी तरफ़ देखा और कहा, "उस्ताद, सब ठीक है?"
"ठीक है," मैंने कहा। "आज काम बंद। जा, माँ को बता दे कि मैं जल्दी आ रहा हूँ।"
वो भागा।
मैं दुकान के अंदर गया और स्टूल पर बैठ गया। घंटी जेब से निकाली। हथेली पर रखी।
"मैं फिर पूछूँ?" मैंने धीरे से कहा।
"अभी नहीं," घंटी बोली।
"क्यों?"
"क्योंकि अभी तेरा घर चुप नहीं है। अभी तेरे घर में एक बात पक रही है। जब वो तैयार होगी, तब पूछ।"
"कब?"
"जब काजल की सुबह आए।"
मैंने घंटी जेब में रख दी। और बाहर देखा — गली में दो बूढ़े एक साथ बैठे थे, पीपल के पत्ते हिल रहे थे, और उस्ताद की दुकान से फिर सिलाई मशीन की आवाज़ आने लगी थी।
टिक… टिक… टिक…
मैंने आँखें बंद कर लीं। उस्ताद की आवाज़ कान में गूँज रही थी।
"तेरा घर इतना चुप क्यों है।"
मैं जानता था — ये सवाल आज रात मुझे सोने नहीं देगा।
॥
रात भर मैं करवटें बदलता रहा।
चारपाई गरम हो गई थी, तकिया सिर के नीचे से खिसक गया था, और छत पर पंखे की आवाज़ ऐसी लग रही थी जैसे कोई बूढ़ा आदमी सीढ़ी चढ़ रहा हो। घंटी जेब में थी। मैंने उसे दो बार उठाया, दोनों बार हथेली पर रखकर देखा, और दोनों बार वो चुप रही। जैसे कोई बच्चा सो रहा हो और जगाना मना हो।
"तेरा घर इतना चुप क्यों है।"
उस्ताद का सवाल दिमाग में चक्कर काट रहा था। मैंने अपने घर को सुना — माँ की खाँसी, पापा के करवट बदलने की आवाज़, काजल के कमरे से आती पन्नों की सरसराहट। तीन अलग-अलग आवाज़ें। और इन तीनों के बीच में एक बड़ी सी चुप्पी, जैसे गली के बीच में पड़ा पत्थर का पुल — जिसके नीचे पानी बहता है, पर कोई उसे देखता नहीं।
सुबह माँ की खाँसी सुनकर मैं उठा।
आँगन में धूप आधी आई थी। चूल्हे पर कड़ाही चढ़ी थी और उसमें से भाप ऐसे उठ रही थी जैसे कोई सपना उड़ रहा हो। काजल चूल्हे के पास बैठी थी, उसके बाल उलझे हुए, और उसके घुटने पर वही नर्सिंग की मोटी किताब खुली पड़ी थी।
"तू जाग गई?" मैंने कहा।
"मैं सोई ही नहीं।" उसने चूल्हे की लौ की तरफ़ देखा। "माँ पाँच बजे उठ गई थीं। खाँसी ज़्यादा थी। मैंने कहा आज टिफ़िन मत बनाओ, मैं बना दूँगी।"
"और माँ ने क्या कहा?"
"माँ ने कहा — 'मेरे हाथ ही चलेंगे तो दिन चलेगा'।" काजल ने किताब बंद कर दी। "फिर खाँसी में यह भी कह गईं — 'तुम्हारे पापा चूल्हा जलाना सीख गए थे, पर बोलना नहीं सीखे'।"
मैंने काजल को देखा।
"तूने पूछा?"
"क्या पूछा?"
"घर चुप क्यों है।"
काजल ने मुझे देखा। उसकी आँखों में वो थकान थी जो आमतौर पर पढ़ाई की किताबों से आती है, पर आज वो थकान कुछ और थी। जैसे रात भर उसने भी घंटी की बात सोची हो।
"मैंने पूछा था, भाई।" उसने धीरे से कहा। "अस्पताल से लौटते वक़्त। मैंने कहा — माँ, हमारा घर इतना चुप क्यों है? और माँ ने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं। बस चलती रहीं। फिर दो कदम बाद बोलीं — 'चुप्पी भी एक आदत होती है, बेटा। पापा चुप हो गए, और मैं उनकी चुप्पी सुनने लगी'।"
"बस?"
"बस।" काजल ने कहा। "फिर मैंने कुछ नहीं पूछा। क्योंकि माँ का हाथ मेरे कंधे पर था और उंगलियाँ काँप रही थीं।"
चूल्हे की लौ फड़फड़ाई।
"आज सुबह क्या करना है?" मैंने पूछा।
"डॉक्टर इसरानी ने दो जाँचें लिखी हैं। एक खून की, एक छाती की। खून वाली आज हो जाएगी, छाती वाली कल।" काजल ने किताब उठाई। "माँ से कह दिया है — नौ बजे अस्पताल। और भाई…"
"हाँ?"
"मैंने उस्ताद का सवाल सुना है। तूने रात को बताया था।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "वो सवाल मुझे भी डस रहा है।"
"क्यों?"
"क्योंकि घर चुप इसलिए है कि यहाँ सबने एक-दूसरे को बचाने के लिए चुप रहना चुना है।" काजल ने कहा। "पापा ने डर की वजह से चुप रहना चुना। माँ ने पापा को बचाने के लिए। मैंने उस रात को छिपाने के लिए। और तू — "
वो रुकी।
"मैं क्या?"
"तूने सबको हँसी में बदलने के लिए चुप रहना चुना।" उसने कहा। "चारों अलग-अलग वजहें, और नतीजा एक — घर चुप।"
मैं कुछ नहीं बोला।
काजल ने कड़ाही से एक रोटी निकाली, प्लेट में रखी और मेरी तरफ़ बढ़ा दी।
"खा। फिर दुकान जा। मैं माँ को लेकर अस्पताल जाऊँगी।"
"काजल —"
"अभी कुछ मत कह।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "आज सिर्फ़ दो काम करने हैं। माँ का इलाज और उस काग़ज़ का सच। बाकी बातें शाम को।"
मैंने रोटी खाई। और मन में सोचता रहा — घर चुप नहीं है। घर में आवाज़ें हैं, पर सब अपनी-अपनी दीवार की तरफ़ बोल रही हैं।
दुकान पहुँचा तो सुबह के नौ बज रहे थे।
टिंकू पहले से था। बोर्ड के नीचे स्टूल रखकर बैठा था और हाथ में एक पुरानी रिंच पकड़े हुए उसे तेल से रगड़ रहा था। पास में ही एक छोटा सा कपड़ा पड़ा था जिस पर उसने पिछली रात के औज़ार साफ़कर रखे थे। मेरे आने पर वो उठ खड़ा हुआ।
"उस्ताद, मैंने सोचा आज सुबह से ही काम शुरू करूँ।"
"तूने सुबह का नाश्ता किया?"
वो थोड़ा झिझका।
"घर पर चूल्हा नहीं जला था। माँ रात को देर से सोई थीं।" उसका चेहरा थोड़ा नीचे झुक गया। "पर चिंता मत कीजिए, मैं रास्ते में नमकीन ले आया था।"
मैंने अपनी जेब से पाँच रुपये निकाले और उसकी तरफ़ बढ़ाए।
"जा, शबनम आपा के यहाँ से तीन समोसे ले आ। दो तेरे, एक मेरा।"
"उस्ताद —"
"ये सैलरी से कटेगा।" मैंने कहा। "दुकान पर एक नियम सुन ले — जो काम करेगा, वो भूखा नहीं बैठेगा। भले दुकान में एक रुपया न हो।"
वो मुस्कुराया और भागा।
मैं स्टूल पर बैठा। घंटी जेब से निकालकर मेज़ पर रखी। मेज़ पर धूल थी, टिंकू ने साफ़ की थी पर एक कोने में अभी भी छोटी सी धूल की लकीर थी — ठीक वैसे ही जैसे कल के ज़ख़्म के बाद निशान रह जाता है।
मैंने घंटी की तरफ़ देखा।
"सुन," मैंने धीरे से कहा। "काजल की सुबह आ गई है। माँ ने कहा — चुप्पी आदत होती है। यही जवाब है?"
घंटी चुप रही।
"अच्छा, तू बोलेगी तब।" मैंने उसे जेब में रख लिया।
तभी गली के मोड़ से चारों बच्चे आते दिखे। सानिया आगे, उसके पीछे गुड्डू, फिर रफ़ीक़ जिसके घुटने पर वही पट्टी बँधी थी, और सबसे पीछे चिंटू जो दौड़ते हुए अपनी नाक बार-बार पोंछ रहा था।
"उस्ताद!" सानिया ने दुकान के बाहर से ही आवाज़ दी। "उस्ताद, हमें कुछ बताना है!"
"अंदर आओ, पहले साँस ले लो।"
चारों अंदर घुसे। सानिया ने स्टूल खींचा, गुड्डू ज़मीन पर बैठ गया, रफ़ीक़ ने घुटने सीधे किए, और चिंटू मेज़ के कोने से टिक गया।
"उस्ताद," सानिया ने कहा, "आज सुबह हम लोग पीपल के नीचे गए थे। चबूतरी के पीछे।"
"क्यों?"
"वो… वो देखने।" गुड्डू ने कहा। "कि सुबह कौन आता है।"
मैंने चारों को देखा।
"तुम लोग जासूसी कर रहे थे?"
"जासूसी नहीं, उस्ताद।" सानिया ने कहा। "आपने कल कहा था कि हम तेरे कान और आँखें हैं। तो हम सुन रहे थे।"
मैं हँसा।
"अच्छा, तो क्या सुना?"
सानिया ने आगे झुककर आवाज़ धीमी की, जैसे गली का कोई बड़ा राज़ बताने जा रही हो।
"उस्ताद, पीपल के नीचे दो बुज़ुर्ग हैं। एक हाफ़िज़ निसार अहमद — सफ़ेद टोपी वाले, जो चबूतरी के पूरब वाले कोने पर बैठते हैं। और दूसरे पंडित ब्रजकिशोर — पीली धोती और गमछे वाले, जो पश्चिम वाले कोने पर बैठते हैं।"
"मैं जानता हूँ," मैंने कहा। "बुज़ुर्ग हैं। रोज़ आते हैं।"
"पर उस्ताद," रफ़ीक़ ने कहा, "ये दोनों एक-दूसरे से बोलते नहीं। पैंतालीस साल से।"
मैं रुका।
"क्या?"
"पैंतालीस साल से।" चिंटू ने कहा, और उसकी नाक फिर बहने लगी। "मैंने शबनम आपा से पूछा। आपा ने कहा — 'बेटा, जब से मुझे होश है, ये दोनों ऐसे ही बैठते हैं। एक-दूसरे की तरफ़ मुँह नहीं करते। पर दोनों रोज़ आते हैं। बारिश में भी। धूप में भी'।"
मैंने स्टूल पर पीछे टेक लगाई।
पैंतालीस साल। इब्राहीम चाचा और बृजमोहन बाबा का झगड़ा चालीस साल पुराना था और वो कल खुला। बंसी बाबा और रहमत बाबा का पैंतालीस-छियालीस साल पुराना झगड़ा परसों खुला। बाबा कलीम और पंडित रामदीन का पचास साल पुराना।
ये गली क्या है? यहाँ हर बुज़ुर्ग अपनी चुप्पी लेकर बैठा है, जैसे हर किसी ने अपने सीने में एक पत्थर रखा हुआ है और उसे बाहर निकालने से डरता है।
"इनका झगड़ा किस बात का है?" मैंने पूछा।
"यही तो पता नहीं चला, उस्ताद।" सानिया ने कहा। "किसी से भी पूछो, कोई नहीं बताता। शबनम आपा ने भी नहीं बताया। बस इतना कहा — 'उन दोनों के बीच की बात उन दोनों की है'।"
"और एक बात, उस्ताद।" गुड्डू ने कहा। "दोनों की जेब में एक चीज़ है।"
"क्या?"
"एक काग़ज़। या फोटो।" गुड्डू ने धीरे से कहा। "मैंने देखा। हाफ़िज़ बाबा चार बजे आते हैं, बैठते हैं, फिर जेब से एक मोड़ा हुआ काग़ज़ निकालकर देखते हैं। बस एक मिनट। फिर वापस जेब में। और पंडित ब्रजकिशोर भी — ठीक उसी वक़्त, अपनी जेब से एक काग़ज़ निकालते हैं। मैं दूर से देखता हूँ। दोनों का काग़ज़ एक जैसा लगता है। पुराना, पीला।"
मैं उठ खड़ा हुआ।
"तुम चारों —" मैंने कहा, "शबनम आपा के पास जाओ। चार कटोरी चाय ले आओ। और आपा से कहना कि उस्ताद ने भेजा है।"
"उस्ताद, आप चाय पीने जा रहे हैं?" सानिया ने पूछा।
"नहीं।" मैंने कहा। "मैं पीपल के नीचे जा रहा हूँ।"
"हम भी चलें?"
"नहीं।" मैंने कहा। "तुम चारों वहीं बैठो। गुमटी के पीछे। और इस बार — कुछ भी सुनो, चुप रहना। ये दो बुज़ुर्ग अगर सच बोलें तो उन्हें लोगों की भीड़ नहीं चाहिए। सिर्फ़ दो कान चाहिए जो उनकी बात सुन सकें।"
चारों एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराए।
"उस्ताद," चिंटू ने कहा, "यह पहली बार है जब आपने हमसे कुछ कहा और हम सुन रहे हैं।"
"तो पहली बार को याद रखो।" मैंने कहा।
मैं गली में निकला।
धूप पीपल की छाया में फँस गई थी। पत्ते हल्के हिल रहे थे और उनकी छाया ज़मीन पर ऐसे पड़ रही थी जैसे कोई बूढ़ा हाथ चादर बिछा रहा हो। चबूतरी पर दो लोग बैठे थे — एक पूरब के कोने पर, एक पश्चिम के। बीच में कोई सात-आठ फुट की जगह थी, जिसमें सिर्फ़ पत्थर के फ़र्श का रंग बदलता था। जैसे नक्शे पर कोई सरहद हो।
हाफ़िज़ निसार अहमद सफ़ेद टोपी पहने हुए थे, हाथ में तस्बीह, और आँखें आधी बंद। पंडित ब्रजकिशोर पीली धोती में, गमछा कंधे पर, और उनके पास लाठी रखी थी। दोनों के चेहरे पर वक़्त ने ऐसी लकीरें खींची थीं जैसे कोई पुराना मुंशी खाता बंद कर रहा हो।
मैं चबूतरी के पास पहुँचा।
"हाफ़िज़ बाबा, सलाम। पंडित जी, प्रणाम।"
हाफ़िज़ बाबा ने आँखें खोलीं।
"अंकुश बेटा," उन्होंने कहा। "आज सुबह कैसे?"
"ठीक हूँ, बाबा। पर दोनों यहाँ बैठे हैं, मैं आप दोनों से एक बात पूछना चाहता हूँ।"
पंडित ब्रजकिशोर ने मेरी तरफ़ देखा, फिर हाफ़िज़ बाबा की तरफ़, और फिर फिर मेरी तरफ़।
"क्या बात है?" उन्होंने कहा।
"आप दोनों — पिछली बार कब बोले थे?"
चबूतरी पर सन्नाटा छा गया। पीपल के पत्ते भी कुछ देर के लिए रुक गए, जैसे उन्हें भी जवाब सुनना हो।
हाफ़िज़ बाबा ने तस्बीह की माला धीरे से रख दी।
"ये क्या पूछ रहा है?" उन्होंने पंडित जी की तरफ़ देखा। "क्या पूछ रहा है ये?"
"मैं पूछ रहा हूँ," मैंने कहा, "कि पैंतालीस साल से आप दोनों रोज़ यहाँ आते हैं। एक-दूसरे की तरफ़ मुँह नहीं करते। पर आते हैं। रोज़। इसका मतलब कोई बात बाकी है।"
पंडित ब्रजकिशोर ने लाठी उठाई और उसे दोनों हाथों से पकड़ लिया।
"बेटा," उन्होंने कहा, "ये बात तेरे समझने की नहीं।"
"तो किसके समझने की है?"
"पुरानी बात है।" हाफ़िज़ बाबा ने कहा। "जा, अपना काम कर। हमें बूढ़ों को उनकी बात पर छोड़ दे।"
मैं कुछ देर खड़ा रहा।
फिर मैंने वो किया जो मैंने पिछले तीन दिन में सीफिर मैंने वो किया जो मैंने पिछले तीन दिन में सीखा था — मैंने उनसे बहस नहीं की। मैं चुपचाप चबूतरी के बीच वाली उस खाली जगह पर, ठंडे पत्थर पर बैठ गया।
दोनों बुज़ुर्ग एक साथ हिले, जैसे किसी की ज़मीन पर किसी ने क़दम रख दिया हो।
"अरे — तू कहाँ बैठ गया?" हाफ़िज़ बाबा ने कहा। उनकी आवाज़ में पहली बार कुछ और था — घबराहट।
"यहीं, बाबा। आप दोनों के बीच।"
"उठ यहाँ से," पंडित ब्रजकिशोर ने लाठी टिकाई। "ये जगह खाली है।"
"पैंतालीस साल से खाली है, पंडित जी।" मैंने कहा। "पर खाली रहने की जगह नहीं है ये। ये जगह भरी हुई है। दो लोग रोज़ आते हैं, इसके दोनों तरफ़ बैठते हैं, और दोनों इसके अंदर कुछ डालकर जाते हैं। क्या डालते हैं, पता है आपको?"
दोनों चुप रहे।
"ज़रा सोचिए," मैंने कहा। "पैंतालीस साल। रोज़। एक-दूसरे की तरफ़ मुँह नहीं करते। न सलाम, न नमस्ते। न आँख मिलाते। पर आते हैं। रोज़। बारिश में भी। धूप में भी। बुखार में भी। ये आदत नहीं है, बाबा। ये ज़िद है।"
पंडित जी ने लाठी को दोनों हाथों से पकड़ा। उनकी उँगलियाँ सफ़ेद पड़ गईं।
"तू क्या कहना चाहता है?" उन्होंने कहा। आवाज़ धीमी थी, जैसे किसी पुराने दरवाज़े की चरचराहट।
"मैं कुछ नहीं कहना चाहता, पंडित जी। सिर्फ़ एक बात पूछनी है।" मैंने हाफ़िज़ बाबा की तरफ़ देखा, फिर पंडित जी की तरफ़। "आपको याद है, झगड़ा किस बात पर हुआ था?"
हाफ़िज़ बाबा ने तस्बीह की माला उँगलियों में लपेटी।
"हुआ था," उन्होंने कहा। "पता है हुआ था।"
"किस बात पर?"
वो कुछ देर सोचते रहे, फिर बोले, "उसके बेटे ने कुछ कहा था।"
"झूठ बोल रहे हो," पंडित जी ने कहा। "तेरी बेटी ने कुछ कहा था।"
"मेरी बेटी ने क्या कहा था?"
"वही तो — मुझे भी याद नहीं।"
दोनों एक-दूसरे को देखने लगे। पहली बार। पैंतालीस साल में पहली बार, एक-दूसरे की आँखों में सीधे।
और उस पल मुझे याद आया कि हाफ़िज़ बाबा को पिछली ईद पर बंसी बाबा और रहमत बाबा के साथ बैठकर चाय पीते देखा था। वो चबूतरी के उस पार बैठे थे, सफ़ेद कुर्ते में, और उनकी आँखें धुँधली थीं। रहमत बाबा गुज़रे थे तीन साल पहले। उनके साथ पैंतालीस साल की चुप्पी छोड़कर हाफ़िज़ बाबा अकेले रह गए थे।
"बाबा," मैंने धीरे से कहा। "आप दोनों को याद भी नहीं है, किस बात पर झगड़े थे। पर आप दोनों ये जगह नहीं छोड़ सके। कोई ये मानेगा कि ये दुश्मनी है? नहीं। ये आदत है। आपको आदत पड़ गई है एक-दूसरे की तरफ़ मुँह न करने की। और अब आपको डर है कि अगर आदत छूट गई, तो पता नहीं क्या होगा।"
मैंने रुककर साँस ली।
"आपको पता है पैंतालीस साल में किसने ये झगड़ा सबसे ज़्यादा सहा है? आपने। आप दोनों ने। बेटे-बेटियाँ चले गए अपनी ज़िंदगी में। बीवियाँ गुज़र गईं। बस आप दो बचे। और आपने पैंतालीस साल बर्बाद कर दिए। पर एक बात जान लो — आपने बर्बाद नहीं किए। आपने रोज़ चुना है बर्बाद करने का। हर सुबह। क्योंकि हर सुबह कोई आदमी ये चुन सकता है कि वो जाए और कहे, 'अरे, वो बात भूल जा।' पर आपने वो नहीं चुना। आपने ये चुना।"
पंडित जी की लाठी हिली। एक बार।
फिर मैंने वो कहा जो मैंने कल शाम देखा था और छुपा लिया था।
"पंडित जी, कल शाम आप उठे। जब हाफ़िज़ बाबा यहाँ से उठ चुके थे। आपने जेब से रुमाल निकाला — नहीं, वो नहीं। उनका रुमाल ज़मीन पर गिरा था। आपने उसे उठाया। झाड़ा। और उनकी जगह पर — उसी पत्थर पर — रख दिया। और फिर मुँह फेरकर चले गए।"
पंडित ब्रजकिशोर का चेहरा सफ़ेद हो गया।
"तेरे देख लिया," उन्होंने धीरे से कहा, जैसे ये बात अपने आप निकल गई हो।
"हाँ, देख लिया। और आप बता दीजिए, हाफ़िज़ बाबा, कल शाम आपने जो किया, वो भी बता दें?"
हाफ़िज़ निसार अहमद ने आँखें झुका लीं।
"मैं — मैंने कुछ नहीं किया।"
"आपने किया। जब पंडित जी उठकर बाहर जा रहे थे, आपने देखा कि उनके पाँव के नीचे जंगली बेर का एक पत्ता था। काँटेदार। आपने चुपचाप अपना खड़ाऊँ उस पत्ते पर रख दिया, ताकि वो उस पर न चढ़ें। फिर हटा दिया। ये क्या था, बाबा?"
हाफ़िज़ बाबा के हाथ काँपने लगे। तस्बीह की माला ज़मीन पर गिरी और फिसल गई।
मैंने उठाकर उन्हें पकड़ाई।
"पैंतालीस साल की दुश्मनी में कोई अपने दुश्मन के पैर के नीचे से काँटा नहीं हटाता, बाबा। मैंने सुना है आप दोनों ने मिलकर ये चबूतरी बनवाई थी। दादाजी ने बताया था। आधे-आधे पैसे। और फिर किसी बात पर दोनों ने रिश्ता तोड़ लिया। बात भूल गई, पर चबूतरी याद रह गई। क्योंकि चबूतरी तोड़ नहीं सके। तोड़ने का मन नहीं हुआ। तो आप दोनों ने एक काम किया — चबूतरी नहीं तोड़ी, ख़ुद को तोड़ लिया।"
मैंने दोनों की तरफ़ देखा।
"आज मैं आपको एक बात कहता हूँ। आप दोनों को याद नहीं है क्यों झगड़े थे। पर मैं जानता हूँ क्यों नहीं छोड़ पाए — क्योंकि दोनों के अंदर एक ही दर्द बैठा है। दोनों को लगता है कि दूसरे ने कुछ कहा था, कुछ किया था। और दोनों को ये डर है कि अगर पता चला कि दूसरे ने कुछ नहीं किया, तो पैंतालीस साल किस बात के लिए गए? इसीलिए दोनों चुप हैं। दोनों को दुश्मन चाहिए। क्योंकि दुश्मन के बिना, बचे हुए पैंतालीस साल सहने पड़ेंगे।"
चबूतरी पर सन्नाटा ऐसा छा गया कि दूर किसी स्कूटर की आवाज़ भी साफ़ सुनाई दी। पीपल का एक पत्ता गिरा। सूखा। खड़ा खड़ा। और हवा ही नहीं थी।
फिर हाफ़िज़ बाबा बोले। आवाज़ बहुत धीमी थी, जैसे किसी कुएँ से आ रही हो।
"कल — कल मैंने तेरे लिए एक काम किया था, ब्रजकिशोर।"
पंडित जी ने उनकी तरफ़ देखा।
"क्या?"
"तेरे हाथ की लाठी — जो नीचे से चटक गई थी — मैंने किसी को बता नहीं, पर मैंने उसे रात को उठाकर अपने घर ले जाकर, गोंद से जोड़ दिया और वापस रख दिया। तुझे पता है मैंने क्यों किया? क्योंकि मुझे पता था कि तू उसी लाठी पर टिकता है।"
पंडित ब्रजकिशोर ने अपनी लाठी को देखा। फिर अपने हाथ को। फिर हाफ़िज़ बाबा को।
"मुझे — मुझे लगा कि नीचे से वो मज़बूत हो गई।"
"हाँ," हाफ़िज़ बाबा ने कहा। "हो गई।"
पंडित जी उठे। एक हाथ लाठी पर, दूसरा हवा में। जैसे कुछ पकड़ना चाहते हों। उनका हाथ थम गया।
फिर उन्होंने कहा, "मेरे घर में — घर के पीछे की कोठरी में — तेरे बाप का बनाया हुआ एक मूँड़ा रखा है। पैंतालीस साल से। कपड़े में लपेटा हुआ। मैंने उसे ठीक नहीं किया। नहीं ठीक कर सका।"
हाफ़िज़ बाबा की आँखें भर आईं।
"तूने वो मूँड़ा क्यों रखा?"
"क्योंकि मैं उसे वापस नहीं कर सकता था।"
"क्यों?"
"क्योंकि मुझे नहीं पता था कि उसे ठीक कैसे करूँ।" पंडित जी की आवाज़ काँप गई। "मैंने तीस लोगों से पूछा। कोई ठीक नहीं कर सका। तेरे बाप का बनाया था। उसकी बनावट ऐसी थी कि — कोई नहीं जानता था। और मैं तुझसे कह नहीं सकता था, क्योंकि तब तक हम बोलना बंद कर चुके थे। तो वो कोठरी में रह गया। पैंतालीस साल।"
हाफ़िज़ बाबा ने तस्बीह एक जेब में रखी और दूसरी जेब से एक पुराना, फटा रुमाल निकाला। माथा पोंछा।
"तो — तो वो रुमाल वाली बात —"
"वो रुमाल भी तेरा ही था," पंडित जी ने कहा। "तेरे बाप का। तेरे बाप ने इस चबूतरी पर मेरे बाप के साथ चाय पी थी, और रुमाल भूल गए थे। मैंने रख लिया था। पैंतालीस साल। रोज़।"
मैंने घंटी जेब से निकाली। नहीं — घंटी ने ख़ुद ही जेब में हल्की सी आवाज़ की। जैसे किसी ने साँस छोड़ी हो।
और फिर दोनों बुज़ुर्ग एक साथ बैठ गए। नहीं — गिर गए। जैसे पैंतालीस साल की थकान एक साथ आ गई हो। हाफ़िज़ बाबा ने अपना हाथ आगे बढ़ाया। पंडित जी ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।
मध्य में, चबूतरी के ठंडे पत्थर पर, दो झुर्रियों वाले हाथ मिले। पैंतालीस साल बाद।
मेरी जेब में घंटी बजी।
एक बार। छोटी सी। साफ़।
और जैसे ही बजी, पूरा पीपल का पेड़ हिल गया — पत्ते, जो एक मिनट पहले तक स्थिर थे, अब बहुत तेज़ी से हिलने लगे। जैसे कोई देख रहा हो। हवा नहीं थी, पर पत्ते नाच रहे थे।
और मेरे कान में घंटी बोली।
कुल अंक — अड़तालीस।
मैंने साँस रोक ली।
"उतने?" मैंने धीरे से कहा, जैसे अपने आप से।
अड़तालीस — पैंतालीस साल का जोड़। कोई कहानी नहीं — कोई पैसा नहीं — बस दो हाथ जो आपस में मिले।
मैंने घंटी जेब में वापस रखी और चबूतरी से उठ गया।
दोनों बुज़ुर्ग वैसे ही बैठे थे। एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए। कुछ नहीं बोल रहे थे। बस बैठे थे।
मैं चुपचाप वहाँ से हट गया।
पीछे मुड़कर नहीं देखा।
मैंने शबनम आपा की गुमटी की तरफ़ चलना शुरू किया।
सुबह नौ बजे के आसपास पीपल के नीचे से दो बुज़ुर्गों की सुलह की खबर पूरी गली में फैल गई। मैं शबनम आपा की गुमटी पर पहुँचा तो वो एक कटोरी समोसे मेरी तरफ़ सरका रही थीं।
"तूने कर दिया," उन्होंने कहा। कटोरी को नहीं, मुझे देख रही थीं।
"क्या?"
"वो दोनों।" एक कटोरी चाय भी सामने रख दी। "अभी-अभी हाफ़िज़ बाबा की बहू सब्ज़ी लेने आई थी। बोली, ससुर जी घर आए हँसते हुए — और बोले कि रात को कोई दावत लगेगी। पैंतालीस साल में पहली बार।"
शबनम आपा ने चिमटी उठाई और एक कड़ाही नोची।
"क्या कहा तूने उनसे?"
"कोई बात नहीं कही, आपा। सिर्फ़ उनके बीच बैठ गया।"
"बैठ गया?" उन्होंने हँसी दबा ली। "ये भी कोई उपाय है?"
"आपा, पैंतालीस साल से आप दोनों के बीच कोई नहीं बैठा था। जगह खाली पड़ी थी। मैं बैठ गया। बस।"
वो कुछ देर मुझे देखती रहीं। चाय में से एक घूँट लिया।
"तेरी माँ ठीक है?"
"ठीक हैं, आपा। दवा बदली है, जाँचें होंगी।"
वो चुप रहीं। फिर बोलीं, "और तू?"
"मैं?"
"तू ठीक है?"
मैंने चाय पीना शुरू किया। शबनम आपा से ज़्यादा कोई नहीं पूछता था — तू ठीक है? सबको लगता था कि अंकुश ठीक ही है। उसकी दुकान चल रही है, हँसता है, मज़ाक करता है, बस।
"ठीक हूँ, आपा।"
"झूठ," उन्होंने कहा और पलट गईं, चूल्हे की तरफ़।
तभी छत से आवाज़ आई।
"उस्ताद!"
मैंने ऊपर देखा। सानिया गुमटी की टीन की छत पर चढ़ी थी, उसके बाल उलझे हुए थे, चेहरे पर कोयले की कालिख। उसके पीछे गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू भी आ गए। चिंटू की नाक बह रही थी। रफ़ीक़ के घुटने पर पट्टी साफ़ दिख रही थी — सोमवार की, आज बुधवार था।
"क्या कर रहे हो छत पर?" मैंने कहा।
"कुछ नहीं," गुड्डू ने कहा, बहुत ज़ोर से झूठ बोलकर। "ऊपर से सब दिखता है। झंडा लगाने जैसा मज़ा आता है।"
"उतरो।"
वो चारों उतरे। नीचे उतरते वक़्त सानिया ने मेरे कान के पास झुककर कहा, "उस्ताद, हमने कुछ देखा है।"
"क्या देखा?"
"पंडित जी के घर के पीछे वाली कोठरी की खिड़की से हमने देखा — एक पुराना मूँड़ा, कपड़े में लपेटा हुआ। और उसके ऊपर एक चीज़ रखी है — लाल रंग का कुछ।"
मेरे हाथ से चाय का गिलास हल्का काँपा।
"तुम्हें कब दिखा?"
"कल रात," रफ़ीक़ ने कहा, अपने घुटने को सहलाते हुए। "हम तब आए जब उस्ताद ने हमें चाय के पैसे दिए थे। पंडित जी की गली में ज़्यादा रोशनी नहीं थी, बस एक टिमटिमाता बल्ब। पर खिड़की का शीशा खुला था। हमने देखा।"
"और वो लाल क्या था?"
"अख़बार," चिंटू ने कहा, नाक खींचते हुए। "उस्ताद, अख़बार पर कुछ लिखा था। पेंसिल से। हमने पढ़ा नहीं।"
"क्यों नहीं पढ़ा?"
"क्योंकि अख़बार पुराना था, उस्ताद। देखा — पीला।"
मैं एक पल के लिए चुप बैठा रहा।
फिर मैंने पूछा, "तो उस अख़बार को तुमने वापस ऐसे ही रखा?"
सानिया ने हाथ जेब में डाला और एक चीज़ निकाली। एक छोटी सी माचिस की डिब्बी। उसके ऊपर कुछ लिखा था — पेंसिल से। असली अख़बार नहीं लाई थी वो। उसने माचिस के डिब्बे पर जो लिखा था, वो लिख लिया था।
"ये क्या है?" मैंने माचिस की डिब्बी पलटकर देखी।
"वही जो उसकी लाठी पर लिखा था," सानिया ने कहा। उसकी आवाज़ में अचानक उम्र से ज़्यादा समझदारी थी। "उसके नाम का पहला अक्षर — अ। और नीचे एक तारीख़। पैंतालीस साल पहले की।"
मैंने माचिस की डिब्बी को जेब में रखा।
"ये तुमने कब निकाला?"
"जब उस्ताद चबूतरी पर थे।"
"तुम उसके घर के पीछे क्या कर रहे थे?"
"सब देखते हैं," सानिया ने कहा, बहुत सीधी आवाज़ में। "पूरी गली हम देखते हैं। कोई हमें नहीं देखता, पर हम सब देखते हैं।"
शबनम आपा ने चिमटी एक तरफ़ रखी और मेरी तरफ़ देखा।
"ये बच्चे कल से कुछ और बड़े हो गए हैं, अंकुश। इन्हें काम पर रख ले।"
"मैंने सोचा था," मैंने कहा, कप को मुँह से लगाकर।
"तो सोचना छोड़ और कर," उन्होंने कहा, कटोरी की तरफ़ इशारा करके। "कुछ चाहिए इनको?"
"चार कटोरी चाय," मैंने कहा। "और समोसे — पूरे, आधे नहीं।"
शबनम आपा मुस्कुराईं। पहली बार आज सुबह। फिर चूल्हे की तरफ़ पलट गईं।
मैंने चारों बच्चों को पास बैठाया।
"अब बताओ — और क्या देखा तुमने?"
"पंडित जी के घर के पीछे, उस्ताद," गुड्डू ने कहा। "उस कोठरी के नीचे एक चूहादानी है। पुरानी। उस पर एक रस्सी है। जब मैं कल रात खिड़की से झाँक रहा था, तो पंडित जी आए और उस रस्सी को छुआ। और फिर रोए।"
"तुमने देखा कि वो रोए?"
"उस्ताद, हमें सब पता है," सानिया ने कहा। "वो रोज़ रोते हैं। चार बजे के बाद। जब हाफ़िज़ बाबा चबूतरी पर आते हैं। हमने बहुत बार देखा है। पंडित जी अपने घर की खिड़की से उन्हें देखते हैं और रोते हैं।"
मैंने माचिस की डिब्बी को जेब में दबाया।
इतनी देर में बाज़ार की गली में चहल-पहल बढ़ गई थी। सब्ज़ी वाली आ गई थी, ट्रक वाला, दूध वाला। मैंने चारों बच्चों को चाय दी।
"अब सुनो," मैंने कहा। "तुम चारों अब से मेरी टीम हो। कुछ भी होगा गली में — तुम्हें सबसे पहले पता चलेगा। मुझे बताओगे। पर एक शर्त है।"
"क्या?" चारों ने एक साथ पूछा।
"कोई भी बात बढ़ा-चढ़ाकर नहीं। जो देखा है वही बताओगे। कोई कहानी नहीं बनाओगे।"
"पक्का," गुड्डू ने कहा, और रफ़ीक़ ने "मेरी कसम" कहकर हाथ ऊपर उठाया, और चिंटू ने कहा, "मैं एक बात कहूँ, उस्ताद?"
"कहो।"
"कभी-कभी कहानी सच से बेहतर होती है।"
मैं हँस पड़ा।
शबनम आपा ने समोसे लाकर रखे। "ये सब मेरी तरफ़ से," उन्होंने कहा। "और इस चीज़ के लिए — जो तूने चबूतरी पर किया — तू आज से मेरी गुमटी पर चाय का पैसा मत देना।"
"आपा —"
"मुझे मत सुन। मैं तेरी माँ के टिफ़िन से पैसे भी नहीं लेती। फिर तू कौन है?"
वो हँसी। एक छोटी सी हँसी। पर पैंतालीस साल वाली नहीं थी। नई थी।
तभी बाहर गली में एक आवाज़ आई।
सिलाई मशीन की आवाज़ आनी रुकी।
टिक-टिक-टिक…
रुकी।
जैसे किसी ने सुई को बीच में छोड़ दिया हो।
मैंने गुमटी से बाहर झाँका।
उस्ताद अली बक्श अपनी दुकान के बाहर खड़े थे।
उनके हाथ में मोटा चश्मा था — अधूरा पहना हुआ। उनकी सफ़ेद दाढ़ी में आज सुबह की चाय की बूँद नहीं थी, जैसे उन्होंने चाय छोड़ दी हो।
वो बाहर आए थे। बिल्कुल बाहर। उनकी दुकान से गुमटी की तरफ़। जो पचास साल में उन्होंने नहीं किया था — बिना बिना बुलाए गली में निकलना।
और वो गुमटी से पांच का पत्थर दूर रुक गए। जैसे किसी अदृश्य सीमा पर।
उनका चेहरा — मैंने उन्हें कभी ऐसा नहीं देखा था।
उनकी आँखें मेरी तरफ़ नहीं थीं। मेरी जेब की तरफ़ थीं।
"अंकुश," उन्होंने कहा। आवाज़ बहुत धीमी, पर गली के हर कोने तक पहुँची।
मैं उठा। कटोरी में चाय छोड़कर। गुमटी से बाहर निकला।
"उस्ताद?"
"तूने घंटी बजाई?"
"मैंने?" मैंने कहा। "नहीं, उस्ताद। मैंने तो —"
"घंटी बजी," उन्होंने कहा। "मैंने सुनी। अभी। वहीं। उसी तरह।"
उनका हाथ काँप रहा था। गली में कुछ लोग रुके। शबनम आपा गुमटी से बाहर आईं।
उस्ताद ने मेरी कलाई पकड़ी और मुझे गुमटी के पीछे खींच ले गए, जहाँ गली से नज़र नहीं आता। जहाँ सिर्फ़ पुरानी दीवार थी, और उस पर काई लगी थी।
"क्या हुआ?" मैंने कहा।
"ये घंटी तो नहीं बजी, अंकुश," उन्होंने कहा। "ये घंटी नहीं बजी। ये — ये कुछ और बजा। एक और घंटी। दूर। बहुत दूर।"
"उस्ताद, मैं समझा नहीं।"
"पचास साल पहले," उन्होंने धीमे से कहा, "मेरे पास भी यही घंटी थी। और मेरे भाई इलियास के पास इसकी एक और — बिल्कुल ऐसी। एक जोड़। दो घंटी। एक माने दो सवाल नहीं पूछेगी। एक बजे तो दूसरी काँपती है। आज दूसरी बजी। पचास साल बाद।"
"कहाँ?"
"मुझे नहीं पता।" उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा। "तूने अभी कुछ किया है?"
मैंने चबूतरी वाली बात बताई। छोटी सी। दो हाथ। अड़तालीस अंक। वो सुनते रहे।
"हाफ़िज़ और ब्रजकिशोर," उन्होंने कहा। "वो दो — पैंतालीस साल से — अच्छा। मतलब — घंटी ने सुना। और घंटी ने सुनाया। और उस पार — जहाँ भी इलियास है — उसकी घंटी ने भी सुना। ये अच्छा नहीं है, अंकुश। ये बहुत अच्छा नहीं है।"
"क्यों?"
"क्योंकि इलियास अब मुझे ढूँढेगा।" उन्होंने मेरी आँखों में देखा। "पचास साल बाद। बूढ़ा हो चुका होगा। पर ढूँढेगा। और जब वो ढूँढेगा, तो यहाँ कुछ ऐसा मिलेगा जो उसे खुश नहीं करेगा।"
"क्या?"
"मैं ख़ुद," उन्होंने कहा। "मैं ख़ुद उसके सामने ये नहीं कह सकता कि मैंने क्या किया था। पचास साल पहले।"
"उस्ताद —"
"नहीं।" उन्होंने हाथ उठाया। "आज नहीं। बाद में।" वो पलटे, फिर रुके। "अंकुश, सुन — तूने वो कहा जो मैंने पिछली बार पूछा था?"
"क्या?"
"तेरा घर इतना चुप क्यों है।"
मेरे अंदर कुछ ठंडा गया।
"उस्ताद, घंटी ने कहा है — अभी मत पूछना। जब काजल की सुबह आए।"
"तो काजल की सुबह आई या नहीं?"
मैं कुछ देर चुप रहा।
"आई," मैंने कहा। "वो आज सुबह अस्पताल गई। कहकर गई कि माँ की परची लेकर जाएगी और डॉक्टर से सब कुछ पूछेगी — पूरा सच।"
"तो फिर तू अब क्यों खड़ा है यहाँ? जा। जब तेरा घर खुल रहा है, तू बाहर के घर जोड़ रहा है। जा।"
मैंने सिर हिलाया।
"पर उस्ताद — आप वो बात — काली साइकिल —"
"काली साइकिल वाली बात भी बाद में। पहले अपना घर।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "एक बात याद रखना। जब तेरा घर खुलेगा, तो उसमें जो निकलेगा, वो तेरे हाथ में नहीं होगा। तुझे लगता है तू तैयार है। पर तू तैयार नहीं है। जो चीज़ें बहुत देर तक बंद रहती हैं, उनमें से जब खुलती हैं तो बदबू भी आती है, अंकुश। और वो बदबू हर उस चीज़ पर लग जाती है जो उस घर के अंदर है।"
"आप डरा रहे हैं?"
"हाँ," उन्होंने कहा। "क्योंकि जो डरता नहीं, वो तैयार नहीं होता।"
वो गली में वापस आए। लोगों ने उन्हें देखा। कोई कुछ बोला नहीं। वो अपनी दुकान में गए। सिलाई मशीन फिर शुरू हुई।
मैं गुमटी के पीछे से बाहर निकला।
तभी गली के मुहाने की तरफ़ से एक आवाज़ आई।
"अंकुश यादव!"
मैंने मुड़कर देखा।
मीरा तिवारी आ रही थी। कैमरा कंधे पर, बैग कंधे पर, और चेहरे पर वो भाव जो पिछले दो दिनों से मेरी तरफ़ नहीं बदला था — घृणा, शक, और कोई बहुत गहरा गुस्सा जो उसका अपना था, पर मेरे ऊपर निकल रहा था।
"मीरा —"
"चुप," उसने कहा। "आज मैं बोलूँगी। तू सुन।"
वो मेरे सामने आकर रुकी। कुछ लोग रुके। कुछ दुकानों से सिर निकले। फ़िरोज़ा बेगम ने खिड़की से झाँका।
"तुमने कल शाम मुझे बोला था — दस अंक — टूटने से पहले की आवाज़ — कुछ बकवास — मैंने सुना। आज सुबह फिर दो बुज़ुर्गों का तमाशा। जो तुमने किया। तुमने उन्हें एक-दूसरे से जोड़ दिया — बहुत अच्छा। पर तुमने किसी को कुछ बताया? नहीं। तुमने मुझे बताया? नहीं। तुम आस-पास घूमते हो, बच्चों को इकट्ठा करते हो, बुज़ुर्गों को बैठाते हो, और फिर जब कोई रोता है तो तुम वहाँ खड़े होते हो, गवाह की तरह। और कल को तुम कहोगे — देखो, मैंने ये किया।"
"मीरा, मैंने किसी को —"
"मैंने तुम्हारी जाँच की," उसने कहा। उसने बैग से एक काग़ज़ निकाला। "तुम्हारी दुकान — दुकान नंबर सात — ये दुकान पिछले पंद्रह साल से उसी ट्रस्ट के नाम पर है जिसका मालिक रणवीर भारद्वाज की कंपनी के साथ जुड़ा है। तुम्हें पता था?"
मेरा पेट गिरा।
"क्या?"
"तुम्हारे पापा ने झूठ बोला था — ये दुकान उनकी है? नहीं है। ये दुकान किराए पर है, ट्रस्ट से, और वो ट्रस्ट भारद्वाज कंस्ट्रक्शन का है। तुम्हारे पापा को किराया माफ़ है — क्यों, पता है? क्योंकि तुम्हारे पापा ने किसी काग़ज़ पर अंगूठा लगाया था। वही जो मैंने तुम्हें दिया था। वही लाल निशान। वो इस दुकान और इस घर के बदले में था।"
मैं एक पल के लिए कुछ नहीं बोल सका।
"तो तुम किसका घर बचा रहे हो, अंकुश? यही दुकान? यही दुकान तो पहले से बिकी हुई है। तुम हवा में लटके हो। तुम्हारा पापा हवा में लटके हैं, तुम्हारी माँ, तुम्हारी बहन। और तुम्हें लगता है तुम बुज़ुर्गों का झगड़ा सुलझाकर किसी को बचा रहे हो?"
मैंने काग़ज़ की तरफ़ देखा।
"मैं इस पर विश्वास नहीं करता," मैंने कहा।
"तो जा अपने पापा से पूछ।" उसने काग़ज़ वापस बैग में डाला। "जब पूछ ले, तब मिलना। और तब तक —" उसने कैमरा उठाया। "सब कुछ जो तुम्हारे इर्द-गिर्द हो रहा है, मैं रिकॉर्ड करूँगी। क्योंकि जिस घर में ये सब हो, उसका सच बाहर आना चाहिए। चाहे तुम्हें पसंद आए या न आए।"
"मीरा —"
वो पलट चुकी थी।
फिर मुड़ी और एक और बात कही।
"और अंकुश, एक बात कहूँ? मुझे पता है तुम जो कर रहे हो, वो सही है। पर सही काम भी बुरे हाथों में बुरा होता है। तुम्हें अगर सच को सच की तरह जीना है, तो पहले अपना हिसाब साफ़ कर।"
वो चली गई।
गली में लोग मुझे देख रहे थे। शबनम आपा गुमटी से बाहर आईं और मेरे पास खड़ी हो गईं, हाथ में चिमटी। मीरा की तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़।
"ये लड़की क्यों ऐसी है?" उन्होंने कहा।
"पता नहीं, आपा।"
"और उसका कहा कुछ सच है?"
मैंने मीरा के जाते हुए पीठ को देखा।
"मुझे नहीं पता, आपा।"
तभी मेरे कान के पास घंटी बजी।
छोटी सी। सिर्फ़ इतनी कि मैं सुन सकूँ।
और घंटी ने कहा —
पूछ। अब पूछ। काजल की सुबह आ गई।
मैंने घंटी जेब से निकाली। हथेली पर रखी। गर्म थी। ज़्यादा गर्म।
"क्या पूछूँ?"
तूने उस्ताद से वादा किया था, घंटी ने कहा। पूछ — तेरा घर इतना चुप क्यों है।
मेरे हाथ से चाय का गिलास शबनम आपा ने पकड़ लिया।
"अंकुश?"
"आपा," मैंने धीरे से कहा, "मुझे घर जाना है।"
वो कुछ कहती, उससे पहले मैं चल पड़ा।
गली के मोड़ पर पीपल के नीचे, चबूतरी पर, हाफ़िज़ बाबा और पंडित ब्रजकिशोर अभी भी बैठे थे। एक-दूसरे का हाथ पकड़े। एक-दूसरे की तरफ़ देख रहे थे।
मैं उन्हें देखकर रुका।
एक पल के लिए।
फिर सीधा घर की तरफ़ चल पड़ा।
मुझे पता था — उस घर में जो मिलेगा, वो पिछली बार नहीं मिलेगा।
पर मुझे पता नहीं था कि वो क्या होगा।
हाथ में घंटी थी। गर्म। गर्म होती जा रही थी। जैसे कोई चीज़ जल्दी करा रही हो।
जैसे घर ख़ुद बुला रहा हो।
॥
मैं उनके पास से गुज़र रहा था कि मेरे पैर अपने आप रुक गए।
हाफ़िज़ बाबा का हाथ पंडित ब्रजकिशोर के हाथ में था। दोनों चुप। दोनों की आँखें भरी हुई। पीपल की छाँव में दो बूढ़े आदमी, जैसे दो बच्चे माफ़ी माँगने के बाद थककर हाथ पकड़कर बैठ गए हों। पैंतालीस साल की चुप्पी टूटी थी और उन दोनों के चेहरों पर वो थकान थी जो लंबी लड़ाई के बाद आती है — जीत की नहीं, बस ख़त्म होने की।
मैंने धीरे से कहा, "बाबा।"
हाफ़िज़ बाबा ने मेरी तरफ़ देखा। "आ गया तू," बोले। उनकी आवाज़ में वो पुराना रौब नहीं था। "देख ले। मैं ज़िंदा हूँ। हैरान हूँ ख़ुद पर।"
"हैरानी की बात नहीं, बाबा," मैंने कहा। "आप दोनों ने पैंतालीस साल में पहली बार एक-दूसरे को ग़लत माना। बस इतना काफ़ी था।"
पंडित ब्रजकिशोर जी ने गमछे से आँखें पोंछीं। वो मुझसे नहीं बोले। वो हाफ़िज़ बाबा से बोले, "एक चीज़ है। पीछे की कोठरी में।"
हाफ़िज़ बाबा का हाथ ठिठका।
"अब क्या?" उन्होंने कहा।
"एक चीज़ है," पंडित जी ने दोहराया। आवाज़ धीमी थी, जैसे किसी पुराने ज़ख्म पर उँगली रख रहे हों। "पैंतालीस साल से। ढककर रखी है। मैंने सोचा — आज तुझे दिखा दूँ। या फिर कभी न दिखाऊँ।"
हाफ़िज़ बाबा ने मेरी तरफ़ देखा। फिर उनका हाथ धीरे से पंडित जी के हाथ से छूटा।
"चल," बोले।
हम तीनों उठे। मैं पीछे-पीछे। मेरी जेब में घंटी थी और वो गर्म थी — धीमी गर्म, बुखार जैसी, जो चुपचाप बढ़ती जाती है।
पंडित जी का घर पीपल के पीछे वाली गली में था। पुराना मकान, नीली दराजों वाला, और पीछे की तरफ़ एक छोटी कोठरी — जिसका दरवाज़ा इतना नीचा था कि हाफ़िज़ बाबा को झुकना पड़ा।
अंदर अंधेरा था। धूल की गंध और नारियल के तेल की गंध — दोनों मिली हुई।
पंडित जी ने जेब से माचिस निकाली, दीया जलाया।
और मैंने देखा।
कोने में, कपड़े में लिपटा हुआ, एक मूँड़ा रखा था।
कपड़ा साफ़ था। धूल भरा, पर साफ़ — जैसे किसी ने साल में एक बार उसे खोला हो, पोंछा हो, फिर से लपेट दिया हो।
हाफ़िज़ बाबा दरवाज़े पर खड़े रह गए।
"ये…" उनकी आवाज़ फटी। "ये वही है?"
"हाँ," पंडित जी ने कहा। "वही है।"
"तूने रखा था?"
"पैंतालीस साल।"
हाफ़िज़ बाबा अंदर आए। उन्होंने कपड़े को छुआ। हाथ काँप रहा था — मैं पहली बार उनका हाथ काँपते देख रहा था, और मुझे अच्छा नहीं लगा। डर लगा।
"खोल," बोले।
पंडित जी ने कपड़ा खोला।
लकड़ी का पुराना मूँड़ा। चौकोर, मज़बूत, हाथ से बना हुआ। उसकी एक टाँग थोड़ी हिल रही थी — ज़ोर से खींचो तो निकल जाए। लकड़ी पर हल्की पॉलिश के निशान थे, जैसे कोई बूढ़ा हाथ साल में एक बार तेल लगाता हो।
मूँड़े के नीचे एक पुराना पीला अख़बार था।
और अख़बार पर, पेंसिल से, बहुत बड़े अक्षरों में कुछ लिखा था।
मैंने झुककर देखा। रोशनी कम थी। अक्षर धुँधले थे।
"बाबा," मैंने कहा, "ये मुझे बाहर ले जाने दीजिए। गुमटी पर रोशनी है।"
पंडित जी एक पल रुके। फिर बोले, "हाँ।"
हाफ़िज़ बाबा ने कहा, "संभालकर। ये काग़ज़ पैंतालीस साल पुराना है। इसे फूँक मारो तो उड़ जाएगा।"
मैंने अख़बार दोनों हाथों से उठाया। हल्का था, जैसे कोई सूखा पत्ता।
बाहर निकलते वक़्त मेरी जेब से घंटी एक बार बजी।
और पंडित जी रुक गए।
"क्या बजा?" उन्होंने पूछा।
"कुछ नहीं, बाबा," मैंने कहा। "बटन टकरा गया।"
मैं बाहर निकला और गुमटी की तरफ़ चला।
शाम के छह बज रहे थे। गुमटी पर भीड़ थी — लौटते मज़दूर, स्कूल से छूटे बच्चे, और रोज़ वाले दो बूढ़े जो चाय में बिस्किट डुबाकर खाते हैं।
मैंने अख़बार गुमटी के पीछे वाले लकड़ी के पाट पर रखा।
और मेरे पीछे चार साये आकर खड़े हो गए।
सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू।
"भैया," सानिया ने कहा, "ये क्या है?"
"एक अख़बार है," मैंने कहा। "पैंतालीस साल पुराना। और इस पर पेंसिल से कुछ लिखा है। मुझे पढ़ना है।"
चारों एक साथ झुके। ऐसे झुके जैसे किसी खज़ाने का नक़्शा मिल गया हो।
शबनम आपा ने चिमटी से समोसा उठाया और मुझे देखा।
"ये बच्चे तेरे पीछे क्यों हैं?"
"पता नहीं आपा," मैंने कहा। "शायद मेरे पास कोई खज़ाना है।"
"तेरे पास खज़ाना होता तो तू ये फटी जीन्स पहनता?" वो हँसीं। फिर अख़बार पर नज़र डाली और उनका चेहरा गंभीर हो गया। "ये तो बहुत पुराना है। इसे छूने में डर लगता है।"
"इसीलिए तो बच्चों को बुलाया," मैंने कहा। "छोटे हाथ संभाल लेंगे।"
सानिया ने सबसे पहले उँगली रखी।
"यहाँ लिखा है," उसने कहा। "मूँड़ा… दो रुपये… आठ आने।"
मेरा दिल ज़ोर से धड़का।
"फिर?" मैंने कहा।
चिंटू अपनी नाक पोंछकर आगे आया। "नीचे भी कुछ है भैया। छोटा-सा।"
"पढ़।"
उसने आँखें सिकोड़ीं। "अ… ह… म… द… मियाँ… का… काम। पैसा बाकी।"
चारों ने मेरी तरफ़ देखा।
गुड्डू ने कहा, "भैया, पैसा बाकी का मतलब क्या है?"
मैंने उस काग़ज़ को देखा। पैंतालीस साल पुराना अख़बार, एक मज़दूर के हाथ की लिखाई, और नीचे उसी हाथ से बड़े अक्षरों में दो शब्द — पैसा बाकी।
"मतलब," मैंने धीरे से कहा, "किसी ने किसी का हक़ नहीं दिया। और किसी ने माँगा नहीं।"
रफ़ीक़ ने कहा, "तो अब दे दो न भैया।"
"हाँ," मैंने कहा। "अब दे देंगे।"
मैंने अख़बार उठाया और कोठरी की तरफ़ चला। चारों मेरे पीछे थे, और शबनम आपा भी चिमटी हाथ में लिए पीछे आ रही थीं — जैसे उन्हें भी लगा कि आज गुमटी का काम नहीं, कुछ और होने वाला है।
कोठरी में मैंने अख़बार पंडित जी के हाथों में रख दिया।
"पढ़िए," मैंने कहा।
उन्होंने पढ़ा।
और उनका चेहरा वैसा हो गया जैसा उस आदमी का होता है जिसने पैंतालीस साल एक ताले में बंद कर रखा था, और ताला आज अपने आप टूट गया।
हाफ़िज़ बाबा ने उनके हाथ से काग़ज़ लिया। देखा। पढ़ा। फिर उन्होंने आँखें बंद कर लीं।
"बाप का हाथ," उन्होंने कहा। "ये मेरे बाप की लिखाई है।"
कोठरी में चुप्पी छा गई।
मैंने धीरे से पूछा, "अहमद मियाँ आपके पापा थे, बाबा?"
"हाँ," हाफ़िज़ बाबा ने कहा। आँखें अभी बंद थीं। "मिस्त्री थे। लकड़ी का काम करते थे। ये मूँड़ा उन्होंने अपने हाथ से बनाया था।" उन्होंने काग़ज़ खोला। "और ये उसने अख़बार पर लिखा — कि पैसा बाकी है। यानी उसने माँगा भी। पर किसी ने दिया नहीं।"
पंडित ब्रजकिशोर जी ने कुछ कहा — बहुत धीमी आवाज़ में।
"नहीं," वो बोले। "माँगा नहीं था। ये मेरे बाप का अख़बार है। ये लिखाई अहमद भाई की है, पर पैसा मेरे बाप ने भेजा था। नाप कम पड़ गई थी। बारह आने कम रख लिए गए। अहमद भाई ने कहा — भाई, कम है। मेरे बाप ने कहा — अगली बार।"
वो रुके।
"अगली बार नहीं आई," उन्होंने कहा। "दो महीने बाद अहमद भाई चल बसे। और मेरे बाप ने ये मूँड़ा उठाकर घर के पीछे रख दिया और कहा — जिसका हक़ नहीं दे सका, उसकी चीज़ अपने घर में मत रख। फिर वो ख़ुद तीन साल में चले गए। और मैंने ये मूँड़ा न हटाया, न लौटाया। पैंतालीस साल उसे कपड़े में लपेटकर रखा। हर साल एक बार तेल लगाया। जैसे कोई क़र्ज़ हो जिसे चुका न सको, तो कम से कम उसका निशान न मिटने दो।"
हाफ़िज़ बाबा ने आँखें खोलीं।
"और मैंने कभी माँगा नहीं," वो बोले। "क्योंकि माँगने का मतलब था — मान लेना कि तेरे बाप ने मेरे बाप का हक़ मारा था। और मैं ये मानने को तैयार नहीं था।"
वो मेरी तरफ़ देखने लगे। "देख, लड़के, हमारी लड़ाई पैसों की नहीं थी। हमारी लड़ाई इसलिए थी कि दोनों को अपने-अपने बाप की इज़्ज़त बचानी थी। और इज़्ज़त बचाने के चक्कर में दोनों ने पैंतालीस साल एक-दूसरे से बात नहीं की।"
मैंने कहा, "बाबा, एक बात कहूँ?"
"कह।"
"ये बारह आने का हिसाब नहीं है," मैंने कहा। "हिसाब यह है कि एक इंसान ने मूँड़ा बनाया, और दूसरे ने उसे पैंतालीस साल संभालकर रखा। दोनों ने अपने बाप की इज़्ज़त बचाने की कोशिश की, और दोनों हार गए। अगर आज भी ये हिसाब चुकाना है, तो पैसों से नहीं चुकेगा। इससे चुकेगा कि आप दोनों इस मूँड़े पर एक साथ बैठें।"
मैंने एक पल रुककर आगे कहा — और मैं जानता था कि ये बात मेरे भीतर से आ रही है, बाहर से नहीं।
"मैं भी आपको एक सच बताता हूँ, बाबा। मैं अपने घर में सबसे ज़्यादा छुपाकर एक चीज़ रखता हूँ — ये कि मुझे डर है। ये कि मुझे लगता है कि मैं अपना घर नहीं बचा पाऊँगा। और जब मुझे ये लगता है, तो मैं हँसी में लपेट देता हूँ। ताकि कोई पूछे नहीं। आप दोनों पैंतालीस साल चुप रहे। मैं चौबीस साल का हूँ और मैंने भी वही करना सीख लिया है। आप बताइए — ये सही है? मुझे भी यही करना चाहिए?"
हाफ़िज़ बाबा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ बदला।
"नहीं," बोले। "यही तो गलती है।"
"तो फिर इस मूँड़े पर बैठिए। दोनों।"
पंडित जी ने पहले मेरी तरफ़ देखा। फिर हाफ़िज़ बाबा को दिया हाथ।
और हाफ़िज़ बाबा ने पकड़ लिया।
मैं झुका। मूँड़े की हिलती टाँग देखी। मेरे पास औज़ार नहीं थे — सिर्फ़ मेरी जेब में एक पुराना पेचकस था, जो पापा ने हमेशा रखने को कहा था। मैंने उसे निकाला। टाँग के जोड़ में लकड़ी का छोटा-सा चीर था। मैंने अंदर हाथ डालकर देखा — अंदर से एक पुरानी कील टूटी पड़ी थी।
"बाबा," मैंने कहा, "इसके अंदर ज़ंग लगी कील है। इसी से टाँग हिल रही है।"
"तो निकाल दे," पंडित जी ने कहा।
"निकाल दूँ तो टाँग लगेगी नहीं।"
"तो जोड़ दे।"
मैंने देखा। अख़बार के नीचे एक छोटी पीतल की पट्टी पड़ी थी — पतली, मुड़ी हुई, जैसे किसी पुराने ताले का टुकड़ा हो।
मैंने उसे उठाया। मापकर मोड़ा। टाँग के जोड़ पर रखा। पेचकस की नोक से दबाया। एक कील के लिए घर में छेद किया — उँगली से, धीरे-धीरे घुमाकर — और पट्टी को दोनों तरफ़ मोड़कर अंदर धँसा दिया।
टाँग कस गई।
मूँड़ा अब नहीं हिलता था।
दोनों बूढ़ों ने उसे उठाया। कोठरी से बाहर लाए। पीपल के नीचे, ज़मीन पर रखा।
और बैठ गए।
दोनों। एक ही मूँड़े पर। दोनों तरफ़।
तभी मेरी जेब में घंटी बजी।
ज़ोर से।
इतनी ज़ोर से कि शबनम आपा के हाथ से चिमटी छूट गई और वो खनककर पत्थर पर गिरी।
और घंटी ने कहा — बीस।
सिर्फ़ इतना। बीस।
मैंने मन में गिना। अड़तालीस और बीस — अड़सठ।
बीस अंक। पैंतालीस साल की चुप्पी के। बारह आने के। एक टूटी टाँग के। और उन दोनों के बैठने के।
मैंने सोचा कि इतने कम? इतने पुराने ज़ख्म के लिए इतने कम?
तभी घंटी ने धीरे से जोड़ा — हिसाब पूरा नहीं हुआ। इनके बाप का हिसाब बाकी है। ये तेरा नहीं।
मैं चुप हो गया।
गुमटी के पीछे से चारों बच्चों ने सिर निकाला।
"भैया," सानिया ने कहा, "आपा कह रही हैं कि आज की चाय उनकी तरफ़ से।"
"मैंने ऐसा नहीं कहा," शबनम आपा ने कहा। पर उन्होंने तुरंत कटोरी से पैसे निकाले और पीछे रख दिए। "जाओ, चार गिलास और ले आओ।"
और तभी — मैंने वो आवाज़ सुनी।
दुकान की सिलाई मशीन। टिक-टिक। टिक-टिक।
फिर बंद।
उस्ताद अली बक्श की दुकान से।
मैं मुड़ा।
उस्ताद अपनी दुकान की देहरी पर खड़े थे। हाथ में कैंची। कान पर पेंसिल। मोटा चश्मा। और उनका चेहरा — मैंने उन्हें पहले कभी ऐसा नहीं देखा था।
वो घंटी की तरफ़ देख रहे थे। जैसे कोई पुरानी आवाज़ पचास साल दूर से लौटकर आई हो और उनके सामने खड़ी हो।
फिर वो धीरे-धीरे सीढ़ी उतरकर आए। गली पार की। पीपल के नीचे आए।
और वहाँ, चबूतरी पर, हाफ़िज़ बाबा और पंडित जी को एक ही मूँड़े पर बैठा देखकर रुक गए।
उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस मेरी तरफ़ देखा और सिर हिलाया — एक छोटा-सा इशारा, जिसका मतलब मैं समझ गया।
बाद में।
मैंने भी सिर हिलाया।
तभी गली के मोड़ से तेज़ क़दमों की आवाज़ आई।
मीरा।
कैमरा तिपाई पर, बैग कंधे पर, बाल हवा में उड़ते हुए। वो सीधी मेरी तरफ़ आई और गली के बीच में रुक गई, ठीक उस जगह पर जहाँ सब देख सकें।
"अंकुश," उसने कहा। आवाज़ ऊँची थी, साफ़ थी, और उसमें वो चीज़ थी जो पत्रकारों में होती है — सच का हथियार उठाकर चलने वाला घमंड। "मुझे तुमसे कुछ पूछना है। सबके सामने।"
"पूछो," मैंने कहा।
"तुम ये क्या कर रहे हो?"
"मूँड़ा ठीक कर रहा था।"
"मत हँसो," उसने कहा। "मैं गंभीर हूँ।"
"मैं भी गंभीर हूँ, मीरा। मूँड़ा सच में ठीक कर रहा था। टाँग हिल रही थी। अब नहीं हिलती। आपा, आप कहिए — हिल रही है?"
शबनम आपा ने कहा, "नहीं हिल रही।"
मीरा ने आँखें सिकोड़ीं। "मैं मज़ाक नहीं कर रही। तुमने आज सुबह भी दो बुज़ुर्गों को बैठाया और शाम को दो और को। तुम इन बुज़ुर्गों के पुराने ज़ख्मों को तमाशा बना रहे हो। तुम्हारे पास कोई जवाब नहीं है कि तुम ये क्यों कर रहे हो — इसलिए तुम हँसी में लपेट देते हो।"
गली में लोग जमा होने लगे। कोई दुकान से, कोई घर के दरवाज़े से, कोई खिड़की से।
"मैंने तुम्हें सुबह एक काग़ज़ दिखाया था," मीरा ने कहा। "दुकान नंबर सात। ट्रस्ट। भारद्वाज कंस्ट्रक्शन। किराया माफ़ — तुम्हारे पापा के अंगूठे की कीमत पर। तुमने पूछा भी नहीं। तुम सीधे यहाँ आ गए, और इन बुज़ुर्गों को नचाने लगे। तुम्हें ये नहीं लगता कि पहले तुम्हें अपना हिसाब साफ़ करना चाहिए?"
मैंने उसकी आँखों में देखा। वो सच कह रही थी। उसे नहीं पता था कि सच कहकर भी आदमी ग़लत हो सकता है — या शायद उसे पता था, और इसीलिए वो इतनी ज़ोर से बोल रही थी।
मैंने कहा, "तुम सही हो। मुझे पूछना चाहिए था। और मैं पूछूँगा — आज रात, अपने पापा से, आमने-सामने। तुम चाहो तो आ जाना। सुन लेना।"
मीरा एक पल के लिए रुकी। उसे ये उम्मीद नहीं थी।
तभी पीछे से आवाज़ आई।
"बेटी।"
पंडित ब्रजकिशोर जी उठे थे। मूँड़े से उठे — धीरे, दोनों हाथों से टेक लगाकर। उनकी आवाज़ काँप रही थी, पर वो खड़े थे।
"बेटी," उन्होंने फिर कहा। "मुझे पैंतालीस साल हो गए इस गली में रहते। तू छोटी थी तब, तूने मुझे कभी हँसते नहीं देखा। आज सुबह इस लड़के ने मुझे हाफ़िज़ का हाथ पकड़ना सिखाया। और अभी — अभी इसने मेरे बाप का क़र्ज़ खोला।"
वो रुके। गमछे से मुँह पोंछा।
"ये तमाशा नहीं था, बेटी। ये मेरा हिसाब था। और मैं इसे पैंतालीस साल से नहीं चुका पा रहा था।"
हाफ़िज़ बाबा भी उठे।
"और मेरा," उन्होंने कहा। "मैं जानता था मेरे बाप का पैसा बाकी रह गया था। मैंने कभी नहीं पूछा, क्योंकि पूछने में मुझे अपने बाप की इज़्ज़त जाती लगी। पैंतालीस साल में मैंने एक बार भी इस आदमी से ये नहीं कहा — भाई, मेरे बाप की चीज़ लौटा दे। और आज ये लड़का एक मूँड़े के जोड़ में जान डालकर मुझे बता गया कि मैंने पैंतालीस साल अपने ही बाप की इज़्ज़त के पीछे छुपकर बिता दिए।"
मीरा का कैमरा नीचे आ गया।
"बाबा," उसने धीरे से कहा।
"तू अपना काम कर, बेटी," हाफ़िज़ बाबा ने कहा। "तू सवाल पूछती है, ये अच्छी बात है। पर सवाल पूछने वाले को भी इतनी जगह छोड़नी चाहिए कि जवाब आ सके।"
गली में किसी ने ताली नहीं बजाई। कोई शोर नहीं हुआ। बस लोग चुपचाप खड़े रहे, और वो चुप्पी ताली से ज़्यादा बड़ी थी।
मीरा ने कैमरा बंद किया।
"मैं आज रात आऊँगी," उसने मुझसे कहा। "तुम्हारे पापा के सामने। और मैं तुम्हारे साथ खड़ी रहूँगी। पर तुम्हें सच बोलना पड़ेगा। पूरा।"
"बोलूँगा," मैंने कहा।
वो मुड़ी और चली गई। इस बार जल्दी में नहीं। धीरे। जैसे किसी चीज़ के बारे में सोच रही हो।
भीड़ छँटने लगी।
मैंने पंडित जी और हाफ़िज़ बाबा को प्रणाम किया। वो दोनों फिर मूँड़े पर बैठ गए — और मुझे अच्छा लगा कि उनमें से किसी ने भी जाने की जल्दी नहीं दिखाई।
मैं गुमटी की तरफ़ मुड़ा ही था कि उस्ताद का हाथ मेरे कंधे पर आया।
"दुकान चल," उन्होंने कहा।
आवाज़ इतनी धीमी थी कि सिर्फ़ मैंने सुनी।
हम उनकी दुकान में गए। अंदर कपड़ों की गंध थी, चाक के निशान, और सिलाई मशीन पर टँगा एक पुराना नीला धागा।
उस्ताद ने दरवाज़ा बंद किया।
फिर मेरी तरफ़ मुड़े।
"निकाल," उन्होंने कहा।
मैंने घंटी निकाली।
उस्ताद ने उसे अपने हाथ में नहीं लिया। बस देखा — बहुत देर तक।
"मैंने ये आवाज़ पचास साल बाद सुनी," वो बोले। "आज। पीपल के नीचे।"
"आप जानते हैं ये क्या है, उस्ताद?"
उन्होंने चश्मा उतारा। पोंछा। फिर से पहना।
"जानता हूँ," कहा। "और यही मेरी मुसीबत है।"
वो अपनी कुर्सी पर बैठे। मुझे बैठने का इशारा किया।
"सुन, बेटा। ये चीज़ तेरे पास कहाँ से आई, ये बाद में। पहले ये समझ — ये घंटी किसी की मिरासी होती है।"
"मिरासी?"
"विरासत में मिली चीज़।" उन्होंने कुर्सी की बाँह पकड़ी। "पर एक बात सुन ले। घर की विरासत का हिसाब आसान होता है — अलमारी मिली, संदूक मिला, गिन लिया। पर इस तरह की मिरासी का हिसाब भारी होता है। ये तुझे मिली है, पर ये तेरी नहीं है। ये तेरे पास रखी गई है। और जो चीज़ तेरे पास रखी गई हो, उसे बाज़ार में नहीं दिखाते।"
"उस्ताद —"
"सुन पहले।" उन्होंने हाथ उठाया। "आज तूने ये घंटी पीपल के नीचे बजने दी। गली के बीस आदमियों ने सुना। कल बत्तीस सुनेंगे। परसों चारों तरफ़ सुनाई देगा। और जो चीज़ चारों तरफ़ सुनाई देती है, उसके पीछे लोग पड़ते हैं। कुछ लोग लेने के लिए। कुछ लोग छीनने के लिए। और कुछ लोग —" वो रुके। "कुछ लोग इसलिए, क्योंकि वो इसे पहले से जानते हैं।"
मेरी रीढ़ में ठंडी सुई जैसी चीज़ चली।
"आप किसकी बात कर रहे हैं?"
"बबलू आया था ना? काले फ़्रेम की बात करके गया?"
"हाँ।"
"तो उसने तुझे एक चीज़ बता दी है जो मुझे पचास साल में किसी ने नहीं बताई। उस आदमी के कमरे में, सीढ़ी के पास, एक काग़ज़ टँगा है। और उस काग़ज़ पर ये घंटी बनी है। अब बता — एक ठेकेदार के कमरे में घंटी की तस्वीर क्यों टँगी होगी?"
मैं चुप रहा।
"क्योंकि वो उसे जानता है," उस्ताद ने कहा। "और जो जानता है, वो ढूँढता भी है।"
"तो मैं क्या करूँ? इसे कहीं छिपा दूँ?"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। बहुत देर।
"नहीं," बोले। "छिपाने से चीज़ें बड़ी हो जाती हैं। घंटी को ऐसे रख जैसे वो तेरी रोज़ की चीज़ है — जेब में, साइकिल पर, औज़ारों के साथ। पर बाज़ार में नहीं बजाना। और जो अंगूठा लेने वाले घूमते हैं, उनके सामने नहीं खोलना। मैं तुझे एक बात बताता हूँ जो मैंने पचास साल पहले सीखी थी —"
वो रुक गए। उनकी आवाज़ बदली।
"घंटी को लोग सिर्फ़ आवाज़ समझते हैं। ये आवाज़ नहीं है। ये हिसाब है। और इसका हिसाब जो भी रखता है, वो अकेले नहीं रख पाता। मुझे भी यही लगा था कि मैं अकेला रख लूँगा।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"आज तूने पीपल के नीचे दो बूढ़ों को जोड़ा। अच्छा किया। पर तूने ये नहीं बताया कि उन्हें जोड़ने के बाद तेरे भीतर क्या हुआ। जब हाफ़िज़ ने पंडित का हाथ पकड़ा, तो तेरे अंदर कुछ टूटा या जुड़ा?"
मैंने सोचा।
"मुझे… मुझे अपने घर की याद आई," मैंने कहा। "और मुझे ये भी लगा कि मैं इनके सामने सच बोल रहा हूँ, जबकि अपने घर में मैं कुछ नहीं बोलता।"
उस्ताद ने सिर हिलाया।
"तो जाकर पूछ।"
"किससे?"
"तंत्र से।" उन्होंने ठुड्डी घंटी की तरफ़ उठाई। "जाकर पूछ — तेरा घर इतना चुप क्यों है।"
मेरी जेब में घंटी गर्म हुई। एक बार बजी।
उस्ताद ने वो आवाज़ सुनी। फिर वो उठे और मेरी तरफ़ पीठ करके खड़े हो गए।
"जा," उन्होंने कहा। "और बेटा —"
"हाँ, उस्ताद।"
"अगर कल तू मुझसे कहे कि सभा में खड़े होकर सच बोलना है — तो मैं आ जाऊँगा। पर एक शर्त है। मैं पहले अपनी चुप्पी बोलूँगा। किसी और की नहीं। अपनी।"
मैं दुकान से बाहर निकला।
गली में अंधेरा उतर रहा था। गुमटी के लाल बल्ब में पीपल का पत्ता हिलता दिख रहा था। पीछे की दुकानों में बत्तियाँ जल रही थीं।
मैं अपने घर की तरफ़ चला।
रास्ते में मेरी जेब की घंटी गर्म होती गई। ज़्यादा गर्म। जैसे किसी ने उसे आग पर रख दिया हो।
मैंने रास्ते में ही, चलते-चलते, धीरे से पूछा — "मेरा घर इतना चुप क्यों है?"
और घंटी ने जवाब दिया।
तेरे घर में तीन लोग हैं। और तीनों ने एक-एक सच अंदर बंद कर रखा है।
मैं रुक गया।
"कौन से तीन?"
तेरे पापा का सच तुझे पता है। तेरी माँ का सच तुझे पता है।
और तीसरा?
घंटी चुप हो गई।
"बोल," मैंने कहा। "तीसरा कौन?"
घंटी एकघंटी ने कहा — एक…
और फिर चुप।
मैं गली के बीचोबीच खड़ा रह गया। घंटी हाथ में थी। ठंडी। अभी एक मिनट पहले जो गर्म थी, अब वो बर्फ़ जैसी लग रही थी।
"अरे," मैंने धीरे से कहा, "एक क्या? एक क्या बोल रही थी? पूरा बोल ना।"
कुछ नहीं।
"तीसरा सच किसका है? माँ का तो पता है, पापा का पता है। तीसरा कौन?"
घंटी ने जवाब नहीं दिया।
मैंने उसे जेब में रखा। एक कदम चला। फिर रुक गया। क्योंकि पीछे से आवाज़ आई।
"उस्ताद!"
सानिया भागी आ रही थी। उसके पीछे गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू। चारों साथ में। सानिया के बाल हवा से उड़ रहे थे और चिंटू की नाक बह रही थी, जैसे वो दौड़ते हुए आया हो और रास्ते में भूल गया हो कि नाक भी है।
"उस्ताद, उस्ताद, आप जल्दी चलो।"
"क्या हुआ?"
"वो दो बाबा," गुड्डू ने कहा। उसकी आँखें बड़ी हो गई थीं। "वो दो बाबा फिर बैठे हैं।"
"कौन से दो बाबा?"
"अरे वही," सानिया ने कहा, जैसे मैं दुनिया का सबसे बड़ा बेवकूफ़ हूँ। "हाफ़िज़ बाबा और ब्रजकिशोर पंडित जी। जिनका आपने आज सुबह झगड़ा सुलझाया था।"
मेरा पेट गिरा।
"वो तो सुलह कर गए थे। गले मिले थे। मैंने देखा था।"
"देखा था," रफ़ीक़ ने कहा। उसने घुटने पर बँधी पट्टी को सहलाया। "पर अब वो फिर अलग-अलग बैठे हैं। दोनों तरफ़। बीच में पूरा चबूतरा खाली है। और —"
"और क्या?"
"और वो बोल रहे हैं," चिंटू ने कहा। "धीरे-धीरे। पर बोल रहे हैं। और हाफ़िज़ बाबा की आवाज़ ऐसी है जैसे कोई रो रहा हो।"
मैंने एक पल सोचा।
तो सुलह होना काफ़ी नहीं था। सुलह सिर्फ़ पहला दरवाज़ा था। असली कमरा अंदर था, बंद, और उसकी चाबी किसी और जेब में।
"चलो," मैंने कहा।
हम पाँचों पीपल की तरफ़ चले। गुमटी के पास से गुज़रते हुए शबनम आपा ने चिमटी हवा में उठाई।
"अंकुश, चाय ठंडी हो रही है।"
"आपा, एक मिनट।"
"एक मिनट में चाय नहीं, आदमी ठंडे होते हैं," उन्होंने कहा। "जा। जा देख। मैं चाय गरम रखती हूँ।"
पीपल के नीचे अंधेरा थोड़ा सघन था। दूर बल्ब की पीली रोशनी यहाँ तक तीन-चार कदम आकर दम तोड़ देती थी। चबूतरी की सफ़ेदी पर पेड़ की पत्तियों की परछाई हिल रही थी, जैसे कोई ऊपर से हाथ फेर रहा हो।
और चबूतरी पर, बिल्कुल दो सिरों पर, दो बूढ़े बैठे थे।
हाफ़िज़ निसार अहमद सफ़ेद टोपी में, तस्बीह हाथ में, होंठ हिल रहे थे पर आवाज़ नहीं आ रही थी। दूसरी तरफ़ पंडित ब्रजकिशोर, पीली धोती, गमछा कंधे पर, लाठी उनके पास खड़ी। वो आँखें बंद किए हुए बैठे थे, पर उनके हाथ की उँगलियाँ गोद में कुछ गिन रही थीं जो वहाँ नहीं था।
मैंने बच्चों को इशारा किया — रुको।
मैं धीरे से आगे बढ़ा। पीपल के तने के पीछे से मैंने सुना।
"मैंने तेरा इंतज़ार किया था," पंडित जी कह रहे थे। आवाज़ धीमी, पर साफ़। "उस दिन। तीन दिन। तेरे लिए थाली रखी थी। तेरे लिए पानी का लोटा अलग रखा था। मैंने अपने भतीजे से कहा था — हाफ़िज़ भाई के लिए अलग बैठक। वो बाहर आया, वो तेरे घर से आया। पर तू नहीं आया।"
हाफ़िज़ बाबा ने तस्बीह रोक दी।
"मैं आया था," उन्होंने कहा।
पंडित जी ने आँखें खोलीं।
"क्या?"
"मैं आया था," हाफ़िज़ बाबा ने दोहराया। "मैं तेरे दरवाज़े तक आया था। तेरा भतीजा दरवाज़े पर खड़ा था। उसने मुझे देखा और कहा — अब आए हो? अब क्या करोगे? उसने मेरा हाथ पकड़ा और बाहर कर दिया।"
"मुझे… मुझे कोई नहीं बोला।"
"कौन बोलता?" हाफ़िज़ बाबा ने कहा। "मैं बोलने गया था कि तुम्हारे घर में कोई मर गया है, मैं क्या बोलता? मैं उस दिन पूरा दिन पीपल के नीचे बैठा रहा। तेरे घर के बाहर से जो आवाज़ आ रही थी, वो मैंने सुनी। दिन ढलने तक मैं सुनी। तेरे घर से कोई भी नहीं आया। तो मैं उठकर चला गया।"
पंडित ब्रजकिशोर कुछ देर चुप रहे।
"तो तू आया था," उन्होंने कहा। आवाज़ टूट गई।
"हाँ।"
"और मैंने चालीस साल तुझे कहा कि तू नहीं आया।"
"हाँ।"
"तूने एक बार भी नहीं बोला कि मैं आया था।"
"क्या बोलता?" हाफ़िज़ बाबा ने कहा। "तेरे भतीजे ने मुझे बाहर किया था। मैं क्या कहता — तेरा भतीजा ऐसा है? मैं तेरे घर की बात उठाता? मैं चुप रहा। चुप रहना मेरे लिए आसान था।"
मेरे पीछे रफ़ीक़ ने बहुत धीरे से कहा, "उस्ताद—"
"श्ह," मैंने कहा।
मैं सामने आया।
दोनों बूढ़ों ने मेरी तरफ़ देखा। पंडित जी ने अपना गमछा उठाया और आँखें पोंछीं। हाफ़िज़ बाबा ने तस्बीह फिर से चलानी शुरू की, जैसे तेज़ी से हाथ चला कर कोई सबूत खो रहे हों।
"बैठ, बेटा," पंडित जी ने कहा।
मैं उनके बीच में बैठ गया। चबूतरी ठंडी थी।
"आप दोनों ने सुबह गले मिलकर सब खत्म कर दिया था," मैंने कहा। "मैंने देखा था। लोगों ने देखा था। तालियाँ भी बजी थीं।"
"हमने भी सोचा था कि खत्म हो गया," पंडित जी ने कहा। "शाम तक ऐसा ही लगा। फिर मैं घर गया, चाय पी, और मुझे याद आया कि उस दिन मैं हाफ़िज़ भाई के लिए थाली क्यों रख रहा था। और मैं बैठा रह गया।"
"और मैं," हाफ़िज़ बाबा ने कहा, "शाम को यहाँ आया। बैठा। और मुझे याद आया कि उस दिन मेरे हाथ में तेरे बेटे के लिए मिठाई का डिब्बा भी था। जो मैं लौटाते वक़्त किसी को दे आया था।"
मैं कुछ देर चुप बैठा।
घंटी मेरी जेब में अब गर्म होने लगी थी। धीरे-धीरे। जैसे कोई दूर से आग जला रहा हो।
"बाबा," मैंने कहा, "एक बात कहूँ?"
"कह।"
"मैं आप दोनों को सिर्फ़ जोड़ने नहीं आया था। मैं आप दोनों से कुछ छुपाकर आया हूँ।"
दोनों ने देखा।
"मैंने आज सुबह आपको जोड़ा था, तब मैं आपको हँसाते हुए देख रहा था। और मेरे भीतर कुछ और चल रहा था। मैं अपने पापा से नहीं बोलता, बाबा। बोलता हूँ तो सिर्फ़ हिसाब की बात। कभी हँसी में, कभी टालने के लिए। आज पापा रोए। मेरे सामने रोए। और मैंने उन्हें गले नहीं लगाया। मैं वहाँ खड़ा रहा। मैंने कह दिया — ठीक है — और बाहर आ गया।"
मेरी आवाज़ धीमी हो गई।
"मैं डर गया था, बाबा। इतना डरा कि मैं हँसी भी नहीं निकाल पाया। और जब मुझे हँसी नहीं निकालनी होती, तो मैं चुप हो जाता हूँ। और मेरा चुप होना मेरे पापा को सज़ा देता है। यही मेरा सच है। बाकी सब सजावट है।"
पंडित जी ने मेरी तरफ़ देखा। कुछ देर तक।
फिर उन्होंने कहा — "उठ।"
"क्या?"
"उठ, बेटा।"
वो खुद उठे। उन्होंने अपनी लाठी उठाई। हाफ़िज़ बाबा की तरफ़ बढ़े। दो कदम चले। फिर रुके। फिर लाठी को अपने बगल में रखा, दोनों हाथों से।
"हाफ़िज़ भाई," पंडित जी ने कहा। "मैंने तुझे चालीस साल मन से निकाल दिया था। और तू चबूतरी पर हर रोज़ आता रहा। हर रोज़। मैं देखता था। मैं जानता था। मैं मन में सोचता था कि ये आदमी नहीं गया, ये यहाँ बैठा है। पर मैंने एक बार भी नहीं पूछा। मैं बूढ़ा हूँ, हाफ़िज़ भाई। मैं सच को बोलने से पहले थकने लगा हूँ। आज ये लड़का यहाँ बैठा है, ये बोल रहा है। अब मैं भी बोलूँगा।"
हाफ़िज़ बाबा उठे। तस्बीह उन्होंने जेब में रखी। दोनों आमने-सामने खड़े हो गए।
"तेरे बेटे का नाम," हाफ़िज़ बाबा ने कहा, "मुझे याद है।"
पंडित जी की आँखें भर आईं।
"तूने उस दिन मिठाई का डिब्बा लाया था?"
"लाया था। मैं उसे रास्ते में किसी को दे आया। आज तक सोचता हूँ, काश लाकर तेरे आँगन में रख दिया होता। रखा होता तो कोई न कहता कि हाफ़िज़ आया नहीं।"
दोनों गले मिले। इस बार पहले से धीमे। पहले से भीगे हुए। पहले एक-दूसरे की पीठ थपथपाई, फिर सिर झुका कर कंधे पर सिर रख दिया।
मेरी जेब में घंटी बजी।
एक बार। फिर गर्म। फिर ज़्यादा गर्म।
इक्कीस अंक।
मैंने गिना और साँस रोक ली।
दोनों बाबा अलग हुए। पंडित जी ने गमछे से मुँह पोंछा। मुस्कुराए। हाफ़िज़ बाबा ने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
"तेरे घर में क्या हो रहा है, बेटा?"
मैंने कुछ सोचा।
"पता नहीं, बाबा," मैंने कहा। "पर मुझे लगता है ये घंटी जानती है।"
मैंने घंटी की तरफ़ देखा।
"अच्छा," हाफ़िज़ बाबा ने कहा। "तो जब पता चले, आकर बताना।"
मैं हँसा।
"अभी बता देता हूँ," मैंने कहा। "मैं डरा हुआ हूँ।"
"अच्छा," पंडित जी ने कहा। "अच्छा है। डरा हुआ आदमी ही गली छोड़कर भागता नहीं है।"
…
यहाँ से आगे तीसरा दृश्य — गुमटी का।
बच्चे मेरे पीछे खड़े थे, चारों मुँह खुले। सानिया ने कहा — "उस्ताद, आपने कर दिया।"
"नहीं," मैंने कहा। "उन्होंने किया। मैं तो मात्र बैठा था।"
फिर मैं चल पड़ा। चारों मेरे पीछे आए।
गुमटी पर शबनम आपा चाय गरम रखे खड़ी थीं। उन्होंने मुझे देखा और बिना कुछ पूछे एक गिलास आगे बढ़ा दिया।
"ले। और ठंडी मत करना। मैं इसे दोबारा नहीं गरम करूँगी।"
मैंने लिया।
बच्चों को बैठने की जगह थी — बेंच पर। चारों बैठ गए। शबनम आपा ने उन्हें चार कटोरियों में चाय डाली, और एक में पूड़ियाँ।
"ये तुम्हें मुफ़्त नहीं है," उन्होंने कहा। "ये तुम्हारी नींद की कीमत है। आज रात जागोगे तो कल स्कूल में मुँह मत दिखाना।"
"आपा," सानिया ने कहा, "हम स्कूल खुद नहीं जाते।"
"हाँ," शबनम आपा ने कहा। "तुम्हारे बारे में मुझे सब पता है, सानिया। मैं भी एक बार तेरी उम्र की थी। मैं भी कई स्कूलों में ऐसे ही पहुँची हूँ। हाँ, कई स्कूलों में। क्योंकि मेरी माँ भी यही कहती थी कि बेटी पढ़ले, और माँ खुद चूल्हे पर जलती रही।"
वो मुस्कुराईं, फिर चिमटी उठाकर एक समोसा निकाला।
मैंने चाय का गिलास पीते-पीते बच्चों की तरफ़ देखा।
"एक काम करोगे?" मैंने कहा।
चारों के कान खड़े हो गए। चिंटू ने अपनी नाक गमछे से पोंछी।
"हाँ हाँ, उस्ताद," गुड्डू ने कहा।
"पीछे की तरफ़, पिछली गली के बाद, जहाँ पीछे प्लॉट है। वहाँ ट्रक आते हैं। मुझे पता है रोज़ मिट्टी डालते हैं। पर कितने, किस वक़्त, कौन ड्राइवर, किसके पास काग़ज़ — ये किसी को नहीं पता। तुम चारों मुझे ये बता सकते हो?"
सानिया ने आँखें सिकोड़ीं।
"ये तो हम रोज़ करते हैं," उसने कहा। "हम रोज़ देखते हैं। गुड्डू को ड्राइवर के बच्चे का नाम भी पता है।"
"तो फिर काग़ज़ पर लिखो।" मैंने तीन काग़ज़ के टुकड़े जेब से निकाले। "कल शाम तक। हर ट्रक का नंबर, गाड़ी की शक्ल, वक़्त — सब।"
रफ़ीक़ ने काग़ज़ लिया। "मुझे लिखना नहीं आता," उसने कहा, थोड़ा शरमाया हुआ।
"मैं लिखूँगा," सानिया ने कहा। "तुम सब याद रखो, मैं लिखूँगी।"
"क्यों याद रखो? सीधा लिख लो।"
"उस्ताद," चिंटू ने कहा, "हमारे पास काग़ज़ कहाँ है?"
मैंने एक पल सोचा।
"आपा," मैंने कहा। "आपकी गुमटी में पुराने पैसे छोड़ने वाली कटोरी है ना?"
"है।"
"उसमें से कुछ काग़ज़ के पैसे निकाल दीजिए। बच्चों के लिए।"
शबनम आपा ने चुपचाप कटोरी उठाई। कुछ सिक्के निकाले। उन्होंने बच्चों के हाथों पर रख दिए।
"ये तुम्हें दिया है," उन्होंने कहा। "उधार नहीं। पैसे कमाने के लिए नहीं होते। कभी-कभी लोग पैसे दे देते हैं, बस इसलिए कि उन्हें देने की ज़रूरत होती है। तुम कल काग़ज़ ले लेना। और हिसाब लिखते वक़्त अपना भी नाम लिखना। बेटे।"
बच्चे खुश हो गए। चारों वहीं बैठकर एक-दूसरे से काग़ज़ का हिसाब करने लगे कि किसको कितना मिला, किसको कितना रखना है।
मैंने चाय खत्म की। गिलास रखा।
और तभी बगल से आवाज़ आई — सुई की टिक-टिक।
नहीं। नहीं। टिक-टिक नहीं।
दरवाज़ा।
उस्ताद अली बक्श अपनी दुकान से बाहर आए थे।
दुकान का दरवाज़ा धीरे से बंद हुआ। मोटा चश्मा नाक पर। कान के पीछे पेंसिल। हाथ में कपड़े का एक टुकड़ा, जैसे उसे लपेट रहे हों।
वो मेरी तरफ़ आए। धीरे। हर कदम पर सोचते हुए।
"उस्ताद," मैंने कहा।
वो रुके। मेरे पास। बहुत करीब।
"कितने बजे थे?"
"क्या?"
"आख़िरी बार घंटी बजी, कितनी देर पहले?"
मैंने कहा, "अभी। पाँच मिनट पहले।"
"कितनी बार?"
"एक।"
"जब बजी," उस्ताद ने कहा, "तब तेरे पास कौन था?"
मैंने पीछे की तरफ़ देखा। पीपल। बाबा लोग। फिर गुमटी। बच्चे।
"दो बूढ़े," मैंने कहा।
उस्ताद ने आँखें बंद कीं।
"मैं दुकान के अंदर था," उन्होंने कहा। "मैं सुई चला रहा था। मेरे कान पर पेंसिल थी। और मेरे हाथ पहले धीमे चल रहे थे। फिर मैंने वो आवाज़ सुनी। मेरा हाथ रुक गया। मैंने सुई को मेज़ पर रखा और सीधा उठकर दरवाज़े तक आया।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"मुझे लगा," उन्होंने धीरे से कहा, "कि पचास साल बाद मेरी दुकान पर फिर से वही घंटी बजी है।"
वो पीपल की तरफ़ देखने लगे।
"तुमने मुझसे कहा था," उन्होंने कहा, "कि यह घंटी तुम्हारे पास है। मैंने उस वक़्त मज़ाक में उड़ा दिया। मैंने सोचा — बच्चा है, कहानी बना रहा है। पर आज सुनकर मेरे हाथ काँप रहे हैं।"
"उस्ताद —"
"एक मिनट।" वो गुमटी की तरफ़ मुड़े। "शबनम, एक चाय।"
"उस्ताद, आप चाय नहीं पीते।"
"आज पीऊँगा।"
वो बेंच पर बैठे। मैं उनके पास बैठा। बच्चों ने उन्हें जगह दी। सानिया ने अपना समोसा उनकी तरफ़ बढ़ाया — उस्ताद ने हाथ से मना किया, पर मुस्कुरा दिए।
"तुम बच्चों को क्या सिखा रहे हो?" उन्होंने मुझसे कहा।
"हिसाब," मैंने कहा। "ट्रक। गाड़ियाँ।"
उस्ताद ने बच्चों को देखा।
"कभी भी सड़क पर अकेले मत खड़े होना," उन्होंने कहा। "ट्रक के पीछे पहिए के पास मत जाना। ड्राइवर के सामने आधी सड़क खाली रखना। मरे हुए आदमी का ग़म ड्राइवर ढोता है — तुम उसे मत ढोने देना।"
बच्चों ने सिर हिलाया, आधा समझकर, आधा डरकर।
तभी दूर से आवाज़ आई।
"अंकुश!"
मैंने मुड़कर देखा।
मीरा आ रही थी। बैग कंधे पर। कैमरा हाथ में। हवा में बाल, आँखों में वो हिसाब जो किसी को भी दोषी साबित कर देता है।
उसने गुमटी पर आकर कदम रोके।
"गुमटी बंद करो," उसने शबनम आपा से कहा। "यहाँ अभी टेलीविज़न है।"
"हाँ, तो बंद कर दो," शबनम आपा ने कहा। "मैं होली नहीं खेल रही।"
मीरा मेरी तरफ़ बढ़ी।
"अंकुश, मेरे पास कुछ सवाल हैं। और इनका जवाब तुम्हें अभी, यहीं, इसी चबूतरी पर, इन बच्चों के सामने देना है।"
मैंने चाय का गिलास रखा।
"पूछो।"
"एक। तुम किस हक़ से लोगों की निजी बातें उनके सामने लाते हो? आज सुबह तुमने दो बुज़ुर्गों को जोड़ा। क्या उन्होंने तुमसे कहा था कि आ जाओ, उनका दर्द सुलझाओ?"
"नहीं।"
"दो। तुमने उनकी निजी बात इन बच्चों और इन लोगों के सामने क्यों खोली?"
"मैंने नहीं खोली। उन्होंने खोली।"
"उन्होंने खोली, क्योंकि तुमने मंच बनाया। तुमने पीपल के नीचे का चबूतरा सबको दिखने वाली जगह बना दिया। तुमने उन्हें बताया कि यहाँ सब देख रहे हैं, अब बोलो।"
मैंने एक पल सोचा।
"हाँ," मैंने कहा। "मैंने उन्हें यहाँ बैठाया था।"
"क्यों?"
"क्योंकि वो चालीस साल से अलग-अलग बैठ रहे थे। कोई उन्हें जोड़ने नहीं जा रहा था। और उनके बीच जो बात थी, वो सिर्फ़ उनके बीच ही मर रही थी। मुझे लगा अगर बात मरेगी, तो आदमी मरेंगे।"
मीरा ने कैमरा उतारा। उसने उसे बंद किया।
"तीन," उसने कहा। "तुम्हारे पास कोई डिग्री नहीं, कोई ट्रेनिंग नहीं, कोई काम नहीं। तुम साइकिल मरम्मत करते हो। और आज पूरी गली कह रही है कि तुम लोगों के घाव भर देते हो। तुम्हें नहीं लगता कि इसमें कुछ गड़बड़ है?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"गड़बड़ है," मैंने कहा। "मुझे भी लगता है।"
"तो छुपा क्यों रहे हो?"
"छुपा नहीं रहा। मैं रोज़ साइकिल ठीक करता हूँ, मीरा। लोग मेरे पास पंचर लेकर आते हैं और अपनी बातें भी छोड़ जाते हैं। मैं नहीं बुलाता। वो आते हैं। मैं उन्हें चाय नहीं पिलाता। वो बैठ जाते हैं। मैं क्या करूँ? दुकान बंद करके भाग जाऊँ?"
"अगर तुम्हें पता है कि तुम लोगों को ठीक नहीं कर सकते — तो करते क्यों हो?"
"क्योंकि कोई और करने वाला नहीं है," मैंने कहा।
मेरी आवाज़ थोड़ी तेज़ हो गई थी। मैंने उसे धीमा किया।
"मीरा, आज शाम तुमने मुझसे कहा था — तुम बुज़ुर्गों का ज़ख़्म तमाशा बना रहे हो। मैंने सुना। मैंने सोचा। मैंने सच में सोचा कि तुम सही हो। तुम जानती हो क्या हुआ? वो दो बूढ़े शाम को फिर अलग-अलग बैठ गए थे। मैंने उन्हें जोड़ा था, पर उनके बीच का असली दरवाज़ा बंद था। और आज रात मैंने उनकी बात सुनी। और जब मैं उनसे सच बोला — अपने पापा के बारे में — तब वो खुले। तुम चाहे इसे तमाशा कहो, पर उस चबूतरी पर तीन आदमी सच बोल रहे थे। और कोई कैमरा नहीं था।"
वो कुछ देर चुप खड़ी रही।
फिर उसने कहा — "मुझे तुम्हारे पास कोई सवाल नहीं है। मुझे तुम्हारी दुकान के काग़ज़ पर सवाल हैं।"
"तो काग़ज़ दिखाओ।"
"पहले अपने पापा से पूछो।"
मैंने कहा, "मैंने पूछ लिया।"
वो रुकी।
"क्या?"
"मैंने पूछ लिया। आज शाम। मेरे पापा ने सब बताया। अंगूठा उन्होंने लगाया था। डरके। माँ के इलाज के लिए। वो काग़ज़ उन्होंने पढ़ा नहीं था। उन्हें लगा ऊपर की शीट ही सब कुछ है। नीचे का बंडल उन्होंने छुआ तक नहीं।"
मीरा ने कुछ नहीं कहा।
"और हाँ," मैंने कहा, "दुकान ट्रस्ट के नाम पर है। और शायद वो ट्रस्ट भारद्वाज से जुड़ा है। और शायद किराया माफ़ है। मुझे यह नहीं पता था। पर मैं जान लूँगा। और जो सच होगा, वो तुम्हारे सामने भी आएगा। पर मीरा —"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"जब तुमने आज सुबह कहा था कि मेरे पापा ने गली बेची — तुमने मेरे पापा की आवाज़ सुनी थी? एक बार? कभी?"
मीरा ने नज़रें हटा लीं।
"तुम्हें पता है मीरा," मैंने धीरे कहा, "जिस आदमी ने पूरी गली बेची हो वो आज शाम अपने घर में बैठकर अपने बेटे के सामने रोया। मैं वहाँ था। मैंने देखा।"
वो पलट गई। चली गई।
गुमटी पर सन्नाटा था। बच्चे मुँह झुकाए बैठे थे। शबनम आपा ने चिमटी को तवे पर पटक दिया।
"अब सुनो," उन्होंने कहा। "मैं एक बात साफ़ कह देती हूँ। ये लड़की ग़लत नहीं है। डर गई है। और डरा हुआ आदमी सबसे पहले सच्चे आदमी पर हमला करता है, क्योंकि उसे लगता है सच्चा आदमी उसका अपना झूठ उजागर कर देगा।"
उस्ताद ने चाय का गिलास खत्म किया। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"चल," उन्होंने कहा। "मेरी दुकान में।"
…
दुकान के अंदर तीन बत्तियाँ थीं — एक सिलाई मशीन पर, एक दराज़ के ऊपर, एक दीवार पर टँगे कैलेंडर के नीचे। टीन की छत पर बारिश नहीं थी, पर रात की हवा आवाज़ कर रही थी।
उस्ताद ने दरवाज़ा बंद किया।
वो मशीन के पास गए। कुर्सी खींची। बैठ गए। मुझे उनके सामने वाली कुर्सी पर बैठने का इशारा किया।
फिर उन्होंने अपने मोटे चश्मे को उतारा। आँखों के नीचे की त्वचा भूरी, झुर्रीदार थी। बिना चश्मे के वो अलग लग रहे थे — छोटे, थके हुए।
"यह घंटी," उन्होंने कहा। "किसी की मिरासी है।"
मैंने सिर हिलाया।
"मिरासी का मतलब?"
"विरासत में मिली चीज़," उन्होंने कहा। "पर घर की नहीं। ज़ुबान की। जो चीज़ पीढ़ियों से एक हाथ से दूसरे हाथ में जाती है। और उसका हिसाब भारी होता है।"
"किसकी विरासत?"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा।
"यह मैं तुझे अभी नहीं बताऊँगा," उन्होंने कहा। "क्योंकि जब तू जानेगा, तब तू उसे ढूँढने निकलेगा। और अभी तू ढूँढने के लायक़ तैयार नहीं है।"
"उस्ताद —"
"मेरी बात सुन।" उन्होंने उँगली उठाई। "एक चीज़ साफ़ समझ ले। यह घंटी जिसकी मिरासी है, वह ज़िंदा है। या उसका कोई ज़िंदा है। और जब उसे पता चलेगा कि घंटी तेरे पास है, वो आएगा। और वो हाथ जोड़कर नहीं आएगा।"
"वो क्या करेगा?"
"जो मिरासी वाला करता है। वो कहेगा — यह मेरी है। दे दे। और जब तू देने से मना करेगा, तो वो कहेगा — तो तू चोर है।"
"मगर ये मेरे पास से खुद आई। मैंने किसी से कुछ नहीं छीना।"
"यही तो दिक्कत है, बेटा।" उस्ताद ने कुर्सी की पीठ पर टेक लगाई। "चीज़ें अपने मालिक के पास नहीं होतीं तो लोग उसे चोरी कहते हैं। चाहे चीज़ खुद आई हो। बाज़ार में कोई यह नहीं पूछता कि चीज़ कैसे पहुँची। बाज़ार सिर्फ़ यह देखता है कि चीज़ किसके पास है।"
मैंने घंटी जेब से निकाली। हथेली पर रखी। गर्म थी, पर हल्की। जैसे जवाब देने से पहले सोच रही हो।
"इसे बाज़ार में मत दिखाना," उस्ताद ने कहा। "किसी सभा में मत ले जाना। अभी नहीं।"
"पर मुझे इसे लोगों को दिखाना पड़ेगा। जब मैं सच बोलूँगा —"
"तब तब दिखाना जब सच पूरा हो। आधा सच बोलकर चीज़ें दिखाना आदमी को मार देता है।"
उन्होंने उठकर मेरी तरफ़ आकर मेरे कंधे पर हाथ रखा। हाथ हल्का था, पर वज़न था।
"और एक बात," उन्होंने कहा।
"हाँ?"
"तेरा घर चुप क्यों है?"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"मैंने आज सुबह पूछा था," उन्होंने कहा। "तूने टाल दिया। मैंने शाम पूछा। तूने मुस्कुरा कर बात बदल दी। मैं फिर पूछ रहा हूँ। तेरा घर चुप क्यों है?"
मैंने घंटी को हथेली में दबाया।
"पापा नहीं बोलते," मैंने कहा। "माँ नहीं बोलतीं। काजल नहीं बोलती। और मैं — मैं हँसी में छुप जाता हूँ। सबको लगता है हम ठीक हैं, क्योंकि हम हँसते हैं।"
"तो तू तंत्र से क्यों नहीं पूछता?"
"मैंने पूछा था," मैंने कहा। "आज रास्ते में। चलते-चलते।"
"क्या बोला?"
"बोला कि घर में तीन लोग हैं। और तीनों ने एक-एक सच अंदर बंद कर रखा है। मैंने पूछा — तीसरा कौन? और घंटी ने कहा — एक…"
"फिर?"
"फिर चुप।"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा।
"तंत्र ने तुझे आधा जवाब देकर छोड़ दिया," उन्होंने कहा। "यही तंत्र का सबसे बड़ा तरीक़ा है। वो पूरी बात नहीं बोलता। वो तुझे अधूरा छोड़ता है, ताकि तू खुद जाकर उसे पूरा करे। जो जवाब मिल जाता है, वो जवाब नहीं होता। जवाब वही होता है जो तू मेहनत से बनाता है।"
उन्होंने मेरी हथेली पर रखी घंटी की तरफ़ देखा।
"अब जा," उन्होंने कहा। "घर जा। और तंत्र से पूछ — तेरा घर इतना चुप क्यों है। इस बार पूरा जवाब माँग। बैठकर। अकेले। और जो जवाब आए, उसे सुनना। उसे टालना मत।"
मैंने दरवाज़ा खोला।
बाहर गली में अंधेरा था। गुमटी का लाल बल्ब बुझ चुका था। बच्चे जा चुके थे। शबनम आपा गुमटी समेट रही थीं।
मैंने पीपल की तरफ़ देखा। चबूतरी खाली थी। दोनों बाबा जा चुके थे। पर चबूतरी पर एक चीज़ छूटी थी — हाफ़िज़ बाबा की तस्बीह, और उसके बगल में पंडित जी का गमछा। दोनों साथ रखे हुए।
मैं मुस्कुराया।
फिर अपने घर की तरफ़ चला।
मेरी जेब में घंटी फिर गर्म होने लगी थी।
और इस बार, बजने से पहले, उसने जैसे मेरे कान के पास हवा बदल दी। जैसे कह रही हो — अब आ। अब तैयार हो जा। अब मैं तुझसे तेरे ही घर का सवाल पूछूँगी।
मैंने कदम तेज़ किए।
घर के दरवाज़े पर पहुँचकर, बाहर ही, हाथ दरवाज़े पर रखकर, मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली।
हथेली पर रखी।
"बोल," मैंने कहा। "मेरा घर इतना चुप क्यों है?"
घंटी बजी।
एक बार।
फिर धीरे से।
फिर उसने कहा — तूने पूछा। अच्छा किया। अब सुन। तीसरा सच…
दरवाज़ा अंदर से खुला।
काजल सामने खड़ी थी।
उसके हाथ में माँ की हिसाब की कॉपी थी।
और उसकी आँखें लाल थीं।
॥
दरवाज़ा खुला और काजल सामने खड़ी थी। उसके हाथ में माँ की हिसाब की कॉपी थी। वो कॉपी जिस पर माँ रोज़ रात झुकती हैं, जिसके पन्नों पर चावल, दाल, तेल और टिफ़िन के दाम लिखे रहते हैं। काजल की आँखें लाल थीं। और उसके पैरों पर छोटे-छोटे सफ़ेद निशान थे, जैसे नंगे पैर कंकड़ों पर भागकर आई हो।
"तूने ये कहाँ से निकाली?" मैंने पूछा।
"रसोई की दीवार पर टँगी थी," उसने कहा। "मैं अंधी नहीं हूँ।"
"काजल —"
"अंदर आ।" वो मुड़ी। "और दरवाज़ा बंद कर।"
मैंने दरवाज़ा बंद किया। हाथ में घंटी थी, गर्म। जैसे वो भी अंदर आना चाहती हो, पर चुप।
काजल ने कॉपी खोली। पन्ने उलटे। जल्दी-जल्दी नहीं, धीरे। जैसे कोई पुरानी चोट पर पट्टी खोल रहा हो।
"ये देख," उसने कहा।
कॉपी के पिछले हिस्से में, आख़िरी पन्नों पर, माँ का हिसाब नहीं था। माँ की लिखाई थी। पर वो हिसाब की लिखाई नहीं थी। वो धीमी लिखाई थी। जैसे लिखते वक़्त हाथ काँप रहा हो और आँखें बंद हों।
वहाँ लिखा था —
आज शंकर ने अंगूठा लगाया। मैं दरवाज़े से देख रही थी। मैंने पूछा नहीं। मेरी भी ग़लती है।
मैंने उस लाइन को दो बार पढ़ा। तीसरी बार पढ़ते वक़्त मेरे हाथ ठंडे हो गए।
नीचे तारीख़ थी। पाँच साल पुरानी।
"माँ को पता था," मैंने धीरे से कहा। "उस दिन से।"
"पाँच साल से," काजल ने कहा। "और वो हमें बताती नहीं थीं।"
मैंने आगे के पन्ने पलटे। उसके बाद हर महीने की एक लाइन थी। छोटी। जैसे कोई रोज़ दीया जलाकर कुछ माँगता हो।
बचत। वकील के लिए।
कुछ महीनों में पंद्रह रुपये। किसी में बारह। किसी में बीस। एक महीने में सिर्फ़ पाँच, और उसके आगे लिखा था — इस महीने दवा महँगी थी।
और आख़िरी पन्ने पर एक लिफ़ाफ़ा था। कॉपी के बीच दबा हुआ। पुराना, मैला, कोनों से फटा। उस पर माँ की लिखाई में लिखा था — सात सौ इकहत्तर रुपये।
काजल ने लिफ़ाफ़ा खोला। नोट निकाले। गिने। काँपते हाथों से।
"सात सौ इकहत्तर," उसने कहा। "पूरे।"
लिफ़ाफ़े के अंदर एक काग़ज़ का टुकड़ा भी था। उस पर माँ ने लिखा था —
अगर मेरी जाँच में कुछ निकले तो ये लिफ़ाफ़ा काजल को देना। अंकुश को नहीं। वो लड़ जाएगा और पैसा बचाना भूल जाएगा।
मैं बैठ गया। चारपाई पर। सीधा खड़ा नहीं रह पाया।
"माँ ने मुझे इसलिए नहीं दिया," मैंने कहा, "क्योंकि मैं लड़ जाऊँगा।"
"माँ तुझे जानती है," काजल ने कहा। उसकी आवाज़ टूट रही थी, पर वो हँसी। "और वो सही जानती है।"
तभी पीछे से चप्पल की आवाज़ आई। माँ। हाथ में गीला कपड़ा, जो उन्होंने सिर्फ़ उतारने के लिए पकड़ रखा था। उनकी नज़र कॉपी पर पड़ी। फिर लिफ़ाफ़े पर। फिर काजल के हाथ पर।
वो कुछ नहीं बोलीं।
"माँ," काजल उठी।
"बैठ जा," माँ ने कहा। आवाज़ धीमी थी। वैसी धीमी जो गुस्से से नहीं, थकान से आती है।
वो आकर चारपाई के किनारे बैठीं। कपड़ा गोद में रखा। और मेरी तरफ़ देखा, फिर काजल की तरफ़।
"पाँच साल से जानती हूँ," उन्होंने कहा। "उस रात तेरे पापा रोए थे। मैंने सुना। पर मैंने दरवाज़ा नहीं खोला, क्योंकि अगर मैं खोल देती तो उन्हें कहना पड़ता कि उन्होंने क्या किया। और मैं उन्हें वो कहते हुए नहीं देख सकती थी।"
"तो तुमने चुप रहना चुन लिया," काजल ने कहा।
"मैंने सोचा, चुप रहूँगी तो इलाज चलेगा। काजल की पढ़ाई चलेगी। अंकुश की दुकान चलेगी।" माँ ने मेरी तरफ़ देखा। "और तू मुझे बचाने में लगा रहेगा, बिना ये जाने कि मैं खुद तेरे पीछे एक काग़ज़ पर अंगूठा लगवा चुकी हूँ।"
मेरे गले में कुछ फँस गया। मैंने कुछ नहीं कहा।
"ये पैसे किसलिए?" काजल ने पूछा।
माँ ने लिफ़ाफ़े को हाथ में लिया। उसे सीधा किया। उसकी तहें ठीक कीं, जैसे कोई कपड़ा तह कर रहा हो।
"वकील के लिए," उन्होंने कहा।
"वकील साहब को दिखाने के लिए?" मैंने पूछा। "माँ, वो चंद्रेश —"
"चंद्रेश को नहीं," माँ ने कहा। उनकी आवाज़ पहली बार तेज़ हुई। "मैं उस आदमी को अपना पैसा नहीं दूँगी। मैं इसलिए बचा रही हूँ कि जिस काग़ज़ पर शंकर का अंगूठा है, उसके ऊपर कोई और अंगूठा न लग सके।" उन्होंने लिफ़ाफ़ा मेरी गोद में रख दिया। "अंगूठा लगवाने के लिए नहीं, मिटाने के लिए।"
कमरा चुप हो गया।
तभी पीछे से पापा आए। वो दरवाज़े के पास खड़े थे, पता नहीं कब से। चश्मा टेप से बँधा हुआ, हाथ में पेचकस। उन्होंने माँ की तरफ़ देखा। माँ ने उनकी तरफ़।
और मुझे लगा — ये दोनों आज पंद्रह साल बाद पहली बार एक-दूसरे को ठीक से देख रहे हैं।
"बोलिए," मैंने कहा। "दोनों। एक-एक सच्ची बात। आज। यहीं।"
"अंकुश —" पापा ने कहा।
"एक बात," मैंने कहा। "बस एक।"
पापा ने पेचकस मेज़ पर रखा। उन्होंने माँ की तरफ़ देखा।
"मैंने तुझे बताया नहीं," उन्होंने कहा। "यही मेरी ग़लती थी। ग़लती अंगूठे की नहीं, चुप्पी की थी।"
माँ ने अपना कपड़ा गोद से उठाया। फिर रख दिया।
"मैंने जानकर भी तुझसे नहीं कहा," उन्होंने कहा। "मैंने सोचा तुझे शर्म आएगी। शर्म नहीं देनी चाहिए थी, साथ देना चाहिए था। यह मेरी ग़लती थी।"
और मेरी जेब में घंटी बजी।
एक बार। छोटी सी।
फिर उसने कहा — यह जोड़ पुराना नहीं था। यह टूटा भी नहीं था। यह बंद था। बंद चीज़ का हिसाब छोटा होता है। नौ अंक।
काजल ने मेरी जेब की तरफ़ देखा।
"नौ अंक?" उसने धीरे से पूछा।
"नौ अंक," मैंने कहा। "पर माँ, ये दस अंक से कम है, और मैं तुम्हें बताता हूँ कि ये सबसे कीमती नौ हैं।"
माँ ने मेरी जेब की तरफ़ देखा। उन्होंने कुछ नहीं पूछा। बस मेरे सिर पर हाथ रखा और उठकर रसोई में चली गईं।
काजल ने मेरी तरफ़ देखा।
"अब क्या?" उसने पूछा।
"अब सुबह," मैंने कहा। "और सुबह पीपल के नीचे कुछ है।"
सुबह गली में धूप टूट रही थी, पर पीपल की छाँव में अभी ठंडक बची थी। शबनम आपा की गुमटी पर कड़ाही चढ़ चुकी थी और समोसे की खुशबू पूरी गली में फैल रही थी। मैंने साइकिल मोड़ी और गुमटी के सामने रोक दी।
चारों जासूस वहीं बैठे थे। सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू। सानिया के हाथ में एक लाल कवर वाली कॉपी थी, जिस पर उसने अपने गोल अक्षरों में कुछ लिखा हुआ था। चिंटू की नाक बह रही थी और वो उसे अपनी आस्तीन से पोंछ रहा था। रफ़ीक़ के घुटने पर पट्टी थी, जो हर हफ़्ते नई हो जाती है।
"उस्ताद!" गुड्डू चिल्लाया। "हमने काम कर लिया!"
"कौन सा काम?" मैंने पूछा। "और पहले ये बता, तूने मेरी साइकिल की हवा निकाली क्यों?"
"मैंने नहीं निकाली।"
"तो पिछले हफ़्ते किसने निकाली थी?"
"वो पिछले हफ़्ते था," गुड्डू ने कहा, बड़े आत्मविश्वास से। "अब मैं जासूस हूँ। जासूस साइकिल की हवा नहीं निकालते।"
शबनम आपा ने चिमटी से समोसा निकाला और मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"ले," उन्होंने कहा। "और इन चारों को सुन। ये तीन दिन से तेरे लिए ख़ुफ़िया काम कर रहे हैं। मुझे तो ये बताते भी नहीं थे, आज पकड़े गए।"
सानिया ने कॉपी खोली।
"देखो," उसने कहा। "मैंने सब लिखा है। तारीख़, वक़्त, कौन आया, क्या बोला।"
मैंने कॉपी पकड़ी। उसमें सच में लिखा था। उसकी लिखाई टेढ़ी थी, हिज्जे कई जगह ग़लत थे, पर हर लाइन में वो चीज़ थी जो बड़ी किताबों में नहीं होती — मेहनत।
"ये क्या है?" मैंने पूछा, एक लाइन पर उँगली रखकर।
"वही तो!" चिंटू उछल पड़ा। "वो मैंने देखा! मैंने देखा!"
"क्या देखा?"
सानिया ने कहा, "किराने की दुकान वाले बूढ़े काका रोज़ शाम गुमटी पर आते हैं। एक गिलास चाय। कटोरी में पैसे डालते हैं। और हमेशा एक रुपया ज़्यादा डालते हैं।"
"ज़्यादा क्यों?"
"क्योंकि," गुड्डू ने कहा, बड़ी नाटकीय आवाज़ में, "वो कहते हैं — उस नीली शर्ट वाले के लिए रख देना।"
मेरे हाथ रुक गए।
"नीली शर्ट वाले?" मैंने पूछा।
"दुबे अंकल," रफ़ीक़ ने कहा। "जो थाने के बाहर कुर्सी पर बैठते हैं। वो भी आते हैं। और वो भी एक रुपया ज़्यादा डालते हैं। और कहते हैं — उस बुड्ढे काका के लिए रख देना।"
मैंने शबनम आपा की तरफ़ देखा।
वो कड़ाही में चमचा घुमा रही थीं। उन्होंने आँख नहीं उठाई।
"चौदह साल से," उन्होंने कहा। "चौदह साल से दोनों यही कर रहे हैं। एक बार भी नहीं पूछा कि दूसरे का हिसाब क्या हुआ।"
"और तुमने बताया नहीं?" मैंने पूछा।
"मैं गुमटी चलाती हूँ, अदालत नहीं," उन्होंने कहा। "अगर मैं बता देती तो ये दोनों शायद आज तक एक-दूसरे को नहीं देखते। चुप्पी भी एक रिश्ता है, अंकुश। बुरा रिश्ता, पर रिश्ता है।"
मैंने समोसा खाया। फिर उठा।
"कहाँ जा रहे हो?" सानिया ने पूछा।
"पीपल के नीचे।"
चारों मेरे पीछे चल पड़े।
"नहीं," मैंने कहा। "तुम लोग यहीं रहो। गुमटी पर। अगर बबलू आए तो मुझे खबर करना।"
"कैसे?" चिंटू ने पूछा।
"तुम चारों मिलकर ज़ोर से गाना शुरू कर देना," मैंने कहा। "बबलू को गाना पसंद नहीं है। बस उसकी शक्ल देखकर गाना शुरू कर देना।"
"कौन सा गाना?" गुड्डू ने पूछा।
"जो स्कूल में सीखा है।"
"मैंने कोई नहीं सीखा," गुड्डू ने कहा। "मैं स्कूल ही नहीं जाता।"
"तो कोई भी," मैंने कहा। "सबसे ऊँची आवाज़ में।"
पीपल के नीचे चबूतरी पर दोनों बुज़ुर्ग बैठे थे। और मैंने पहली बार ध्यान दिया — वो दोनों एक ही चबूतरी पर बैठते हैं, पर एक-दूसरे से इतनी दूर कि बीच में दो लोगों की जगह बची रहती है। दुबे अंकल दाहिनी तरफ़, अपनी नीली शर्ट में, जो अब वर्दी नहीं थी पर वर्दी जैसी ही लगती थी। और बाईं तरफ़ बूढ़े काका, अपनी किराने की दुकान से आए हुए, हाथ में एक छोटा कपड़ा जिसे वो बार-बार मोड़ते और खोलते रहते थे।
दोनों ने मुझे देखा।
"अंकुश," दुबे अंकल ने कहा। "कैसे हो बेटा?"
"ठीक हूँ," मैंने कहा। "और आप दोनों?"
दोनों चुप हो गए।
मैं बीच में बैठ गया। उसी खाली जगह पर, जो चौदह साल से खाली थी। मेरे बैठते ही बीच की जगह भर गई, और दोनों को थोड़ा सरकना पड़ा। दोनों असहज हुए।
"तू यहाँ क्यों बैठा है?" काका ने पूछा।
"गर्मी है," मैंने कहा। "छाँव अच्छी है।"
"ये मेरी जगह है," दुबे अंकल ने कहा।
"और ये चबूतरी किसकी है?" मैंने पूछा।
"गली की है," काका ने कहा।
"तो फिर जगह किसकी?" मैंने कहा।
दोनों चुप।
मैंने घंटी जेब से निकाली। घुमाई। जैसे बस हाथ में पकड़कर खेल रहा हूँ। उसकी ठंडक मेरी हथेली में जम रही थी।
"काका," मैंने कहा। "एक सवाल पूछूँ?"
"पूछ।"
"आप रोज़ शाम गुमटी पर एक रुपया ज़्यादा क्यों डालते हैं?"
काका का हाथ रुक गया। कपड़ा मुट्ठी में बंद हो गया।
"शबनम ने बताया?" उन्होंने पूछा।
"नहीं। बच्चों ने देखा।"
काका ने दुबे अंकल की तरफ़ देखा। पहली बार। पूरे चौदह साल में पहली बार। और दुबे अंकल ने भी उनकी तरफ़ देखा।
"और अंकल," मैंने कहा, "आप भी एक रुपया ज़्यादा क्यों डालते हैं?"
दुबे अंकल ने मुँह फेर लिया।
"मुझे पानी पिला," उन्होंने कहा।
"पहले बताइए।"
"बेटा —"
"दोनों एक-दूसरे के लिए पैसे डालते हैं," मैंने कहा, "और दोनों एक-दूसरे से बोलते नहीं। मुझे ये समझ नहीं आता।"
काका ने गहरी साँस ली। उन्होंने कपड़ा खोला, फिर मोड़ा।
"मैं नहीं जानता तू क्या खेल खेल रहा है," उन्होंने कहा। "पर सुन ले। चौदह साल पहले, मेरी दुकान की ज़मीन का काग़ज़ लेकर दो आदमी आए थे। सफ़ेद कुर्ते में। कहा कि दुकान बिक चुकी है। मैंने कहा मैंने नहीं बेची। उन्होंने काग़ज़ दिखाया। मैंने पढ़ा नहीं, क्योंकि मैं पढ़ नहीं सकता।"—उनकी आवाज़ धीमी हो गई—"मैं डर गया था। उस दिन आँखों में पानी था। उसी दिन ये आया —" उन्होंने ठुड्डी से दुबे अंकल की तरफ़ इशारा किया — "अपनी बेटी की शादी का सामान माँगने।"
दुबे अंकल ने कुछ कहना चाहा। काका ने हाथ उठाया।
"मैंने मना कर दिया," काका ने कहा। "पर मैंने कारण नहीं बताया। मैंने ये नहीं कहा कि मेरी दुकान का काग़ज़ लेकर दो आदमी आए हैं और मैं डरा हुआ हूँ। मैंने बस कह दिया — आज नहीं। और मेरी आवाज़ में जो डर था, उसे इसने गुस्सा समझा।"
दुबे अंकल बैठे रहे। उनका चेहरा पत्थर जैसा था, पर उनकी उँगलियाँ घुटने पर कस गई थीं।
"अंकल," मैंने कहा। "अब आप।"
"मैं क्या बोलूँ?" उन्होंने कहा। आवाज़ कड़क थी, पर उसके नीचे कुछ और था।
"आपने उस दिन क्या देखा?"
"मैंने क्या देखा?"
"आप उस दिन दुकान पर गए थे। आपने कुछ देखा था।"
दुबे अंकल ने मेरी तरफ़ देखा। फिर पीपल की तरफ़। फिर मेरी तरफ़।
"मैंने देखा," उन्होंने कहा, "कि उसके हाथ काँप रहे थे। मैंने सोचा, बूढ़ा है, हाथ काँपते हैं।"—उन्होंने रुककर साँस ली—"मैंने देखा कि उसकी दुकान के अंदर रोशनी नहीं थी, जबकि उस वक़्त दिन था। मैंने सोचा, दुकान बंद कर रहा होगा। मैंने देखा कि वो कुछ छिपा रहा था बोरियों के नीचे। मैंने सोचा, क्या छिपा रहा है।"
उन्होंने काका की तरफ़ देखा।
"मैंने तुझसे पूछा नहीं," उन्होंने कहा। "मैंने कहा कि मेरी बेटी की शादी है, मुझे सामान चाहिए, और तू मना कर रहा है। और मैं वहाँ से चला आया। और मैंने अपने आप से कह दिया — ऐसे आदमी से मैं फिर नहीं बोलूँगा।"
"पर तूने कटोरी में पैसे डाले," काका ने धीरे से कहा।
"वो अलग बात है," दुबे अंकल ने कहा।
"कैसे अलग?"
"क्योंकि बोलना अलग है और देना अलग है।"
"वो सफ़ेद कुर्ते वाले," मैंने कहा, "उन्होंने तुम्हें क्या दिया था?"
काका ने कपड़ा जेब में ठूँसा।
"एक काग़ज़," उन्होंने कहा। "जिस पर लिखा था कि दुकान बिक चुकी है। मैंने उसे नहीं जलाया। मैंने उसे दाल की बोरी के नीचे रख दिया। और मैं चौदह साल से उस बोरी पर नहीं बैठा।"
"क्यों नहीं जलाया?" मैंने पूछा।
"क्योंकि," काका ने कहा, "अगर मैं जला देता, तो मेरे पास कोई सबूत नहीं बचता कि मैंने कभी दुकान बेची नहीं। मैं जब भी उस बोरी के पास से गुज़रता, लगता कि कोई मेरा नाम बोल रहा है।"
मैंने उन दोनों को देखा। एक आदमी चौदह साल से बोरियों के नीचे एक काग़ज़ दबाए बैठा था। और दूसरा चौदह साल से उसी गली में एक कुर्सी पर बैठा था, तीन सौ कदम दूर।
"अब मेरी बात सुनो," मैंने कहा। "दोनों की।"
मैंने घंटी हथेली पर रखी।
"काका, अंकल ने आपको उस दिन रोते हुए देखा था। और वो ये नहीं बता पाए कि उन्होंने देखा। इसलिए वो आज तक गुस्से में बैठे हैं।"—मैंने दुबे अंकल की तरफ़ देखा—"और अंकल, काका उस दिन डरे हुए थे। और वो ये नहीं बता पाए कि वो डरे हुए हैं। इसलिए वो आज तक डरे हुए हैं। चौदह साल से दोनों एक ही बात के दो आधे हिस्से पकड़कर बैठे हैं, और दोनों सोच रहे हैं कि दूसरे ने पूरा राज़ छिपा रखा है।"
काका की आँखें भर आईं। उन्होंने पलकें झुकाईं।
"और कटोरी?" काका ने कहा। "मैंने तुझे मना किया था, फिर भी मैंने तेरे लिए पैसे डाले। ये क्या था?"
दुबे अंकल ने अपना सिर उठाया।
"यह कि मैं भी तुझसे नफ़रत नहीं करता था," उन्होंने कहा। "मैं बस तुझसे बोलने का रास्ता नहीं ढूँढ पाया।"
दोनों ने एक-दूसरे की तरफ़ हाथ बढ़ाया।
दुबे अंकल ने पहले हाथ बढ़ाया। काका ने झिझक कर, फिर पकड़ लिया। दोनों बूढ़े हाथ, झुर्रीदार, नसों में उभरी हुई। एक क्षण पहले तक ये हाथ दो अलग दुनियाओं में थे।
और मेरी हथेली में घंटी बजी।
लंबी। साफ़। जैसे कोई दरवाज़ा खुला हो, और उसके पीछे से हवा आ रही हो।
तेईस अंक। यह जोड़ चौदह साल पुराना था। इसका हिसाब बड़ा है।
मैंने मुँह में ही कहा — एक सौ इक्कीस।
"क्या हुआ?" दुबे अंकल ने पूछा। "तेरा मुँह क्यों खुला है?"
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "मन में हिसाब कर रहा था।"
"तू मन में हिसाब करता है?" दुबे अंकल ने कहा। "फिर तेरी दुकान का हिसाब कौन देखता है?"
"इसीलिए तो दुकान का हिसाब कभी मिलता नहीं," मैंने कहा।
काका हँसे। चौदह साल बाद। हँसी छोटी थी, खुरदुरी थी, जैसे पुराना ताला घिस कर खुला हो।
तभी मुझे पीछे से एक आवाज़ आई।
"घंटी।"
मैं मुड़ा।
उस्ताद अली बक्श अपनी दुकान के दरवाज़े पर खड़े थे। मोटा चश्मा, कान पर पेंसिल, हाथ में कैंची। वो हिल नहीं रहे थे। बस खड़े थे। उनकी सिलाई मशीन की टिक-टिक बंद थी।
"उस्ताद," मैंने कहा।
वो नहीं बोले। उन्होंने घंटी की तरफ़ देखा। फिर मेरे हाथ की तरफ़। फिर दोनों बुज़ुर्गों की तरफ़, जो अभी भी एक-दूसरे का हाथ पकड़े बैठे थे।
और मैंने देखा — उस्ताद की आँखों में पानी था।
एक झलक। फिर बुझ गया। जैसे दीये की लौ पर किसी ने अँगुली रख दी हो।
उन्होंने कैंची अपनी जेब में डाली। फिर धीरे से, बिना कुछ कहे, अपनी दुकान के अंदर चले गए और टिक-टिक फिर शुरू हो गई। तेज़। इस बार बहुत तेज़।
तभी गुमटी की तरफ़ से ऊँची आवाज़ें आईं।
मैंने सुना — चिंटू चिल्ला रहा था, बिल्कुल सुर में नहीं। गुड्डू उसके साथ। सानिया और रफ़ीक़ भी।
बबलू आया था।
मैंने दोनों बुज़ुर्गों से कहा, "आप लोग बैठिए," और भागकर गुमटी की तरफ़ बढ़ा। पर रास्ते में मुझे वो नहीं मिला जिसकी मुझे उम्मीद थी।
बबलू नहीं था।
मीरा थी।
वो गुमटी के सामने खड़ी थी, कंधे पर कैमरा, हाथ में फटा बैग, और उसने बच्चों को ऐसी नज़र से देखा था कि सब गाना भूल गए थे।
"मीरा," मैंने कहा। "तूने बच्चों को डराया?"
"मैंने कुछ नहीं किया," उसने कहा। "मैं तेरे पास आई हूँ। और तुझे मेरे सवालों के जवाब देने पड़ेंगे। आज, यहीं, इसी गली में।"
"पूछ।"
उसने बैग से काग़ज़ निकाले। बहुत सारे। एक-एक करके गिनाकर, जैसे गोलियाँ रख रही हो।
"तेरी दुकान का काग़ज़," उसने कहा। "भारद्वाज कंस्ट्रक्शन से जुड़ा ट्रस्ट। तेरे पापा का अंगूठा। किराया माफ़। अब बता — ये सब एक ही कहानी के टुकड़े हैं या तूने इन्हें अलग-अलग रखकर गली को बेवकूफ़ बनाया है?"
"मैंने किसी को बेवकूफ़ नहीं बनाया," मैंने कहा।
"तो फिर तूने बुज़ुर्गों को पीपल के नीचे बैठाकर उनके पुराने ज़ख़्म क्यों खुलवाए? तेरे पास कौन सा हक़ है कि तू किसी से कहे — बोल, तेरी चुप्पी का कारण क्या है? कौन बनाया तुझे जज?"
बच्चे चुप खड़े थे। शबनम आपा कड़ाही के पास खड़ी थीं, चिमटी हाथ में, और उन्होंने एक शब्द नहीं कहा — पर उनकी नज़र मीरा पर थी।
"तेरा सवाल सही है," मैंने कहा। "जवाब भी दूँगा। पहला — काग़ज़ पर पापा का अंगूठा है। उन्होंने लगाया। उन्होंने ऊपर की शीट पढ़ी, नीचे का बंडल नहीं देखा। माँ के इलाज के डर में लगाया। वो ग़लती थी, वो उसका नाम सबके सामने लेंगे, मैं उन्हें छिपा नहीं रहा। दूसरा — ट्रस्ट और किराया माफ़ की बात मैं आज नहीं जानता। कल तक मुझे भी नहीं पता थी कि दुकान पापा के नाम पर थी। मैं जानूँगा। तीसरा —" मैंने उसकी आँखों में देखा — "मैंने बुज़ुर्गों से उनका ज़ख़्म नहीं खुलवाया। मैंने उनसे कहा कि वो अपना ज़ख़्म खुद खोलें। और जिसने खोला, उसने खोला। जिसने नहीं खोला, वो आज भी चुप है। तू जिन लोगों को बचाने की बात कर रही है, उनमें से दो आज पीपल के नीचे हाथ पकड़कर बैठे हैं। जाकर पूछ ले।"
मीरा एक क्षण रुकी। उसने काग़ज़ वापस बैग में ठूँसे। फिर उसने कहा, बहुत धीमी आवाज़ में —
"मैं पूछूँगी। पर मैं तुझे ये भी बताने आई हूँ — मेरे पास वो काग़ज़ है जिसमें तेरी दुकान सातवें नंबर पर है। और उसकी कॉपी मेरे पास है। और कल शाम तक मेरे पास ट्रकों के नंबर होंगे। और मैं ये सब सिर्फ़ इसलिए नहीं कर रही कि मैं तुझे पसंद करती हूँ।"
"जानता हूँ," मैंने कहा। "तू इसे इसलिए कर रही है क्योंकि पाँच साल पहले तूने एक आधी सच खबर छापी थी और उससे किसी का घर टूट गया था।"
मीरा पत्थर की तरह खड़ी रह गई।
"तूने ये कहाँ से सुना?"
"मैंने कहीं नहीं सुना," मैंने कहा। "मैंने तेरे चलने का ढंग देखा है। तू हर खबर के पीछे ऐसे भागती है जैसे कोई तुझे पीछे से पकड़कर खींच रहा हो। कोई इंसान अपना पूरा दिन दूसरों की ग़लतियाँ खोजने में इसलिए नहीं लगाता कि वो ठीक है। वो इसलिए लगाता है कि उसे अपनी एक ग़लती धोनी है।"
मीरा ने कुछ नहीं कहा। उसने कैमरा बंद किया। और वो सीधे मेरी आँखों में देखे बिना बोली —
"मैं आज रात तेरे पापा के सामने आऊँगी। जैसा वादा था।"
"आ जा," मैंने कहा।
वो गई। चलने में फिर जल्दबाज़ थी।
मैं मुड़ा। उस्ताद अपनी दुकान के दरवाज़े पर फिर खड़े थे।
"अंदर आ," उन्होंने कहा। "कुछ बात करनी है।"
अंदर दुकान में सिलाई मशीन की खुशबू थी — तेल, धूल और कपड़े की। उस्ताद ने दरवाज़ा नहीं बंद किया, पर आवाज़ धीमी कर दी। जैसे गली के अंदर गली वाली बात कर रहे हों।
"तूने वो क्या किया पीपल के नीचे?" उन्होंने पूछा।
"बात करवाई।"
"घंटी बजी," उन्होंने कहा। "मैंने बाहर से सुना। साफ़ सुना। जैसे कोई मेरे कान के पास बोल रहा हो।"—उन्होंने मेरी तरफ़ देखा—"घंटी कोई सेट करके नहीं बनती। वो नहीं गा सकती, समय नहीं बता सकती, अपनी मर्ज़ी से नहीं बजती। जब अंदर कुछ जुड़ता है, तब बाहर कुछ बजता है। यह उसके पुराने मालिक का हिसाब है।"
"पुराने मालिक का?" मैंने पूछा।
"मालिक कभी एक नहीं होता," उन्होंने कहा। "यह चीज़ दो हाथों के बीच की चीज़ है। जब एक हाथ चला जाता है, चीज़ दूसरे हाथ में छूट जाती है। पर चीज़ यह नहीं भूलती कि वो दो हाथों की थी।"
वो एक स्टूल पर बैठ गए। सामने कपड़े का ढेर था। उन्होंने उसमें से एक टुकड़ा उठाया, सीधा किया, और फिर रख दिया। ऐसे, जैसे बात कहने से पहले हाथ को कुछ करना पड़ता हो।
"अंकुश," उन्होंने कहा। "यह चीज़ जिसके पास है, वो मालिक नहीं है। वो रखवाला है। पर रखवाले का हिसाब भारी होता है। और जिस चीज़ का एक मालिक होता है, उसका एक मरा हुआ भी मालिक होता है और एक ज़िंदा वारिस भी।"
"इलियास," मैंने कहा।
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस स्टूल से उठे और अलमारी की तरफ़ गए।
"काग़ज़ पर इसे मत टाँगना," उन्होंने कहा। "मेज़ पर मत रखना। बाज़ार में इसे मत पकड़कर घूमना। लोग देखेंगे, पहचानेंगे, और जो पहचानेगा वो माँगेगा। जो माँगेगा, वो चीज़ नहीं माँगेगा — वो तुझसे तेरा हक़ माँगेगा। और तेरे पास देने को हक़ नहीं है। तेरे पास सिर्फ़ ज़िम्मा है।"
"उस्ताद," मैंने कहा। "आपने पचास साल पहले यह चीज़ छोड़ी थी। क्यों?"
वो अलमारी के सामने खड़े रहे। उनका हाथ दराज़ के हैंडल पर था।
"पचास साल," उन्होंने कहा। फिर उन्होंने हाथ नीचे कर दिया। "एक बात का जवाब देने के लिए पहले एक बात माननी पड़ती है। और मैं उसे अभी मानने तैयार नहीं हूँ। आज नहीं।"
"कब?"
"जब तू अपने घर की तरफ़ देखेगा," उन्होंने कहा। "आज तक तू बाहर के सारे बंद दरवाज़े खोलता रहा। गली के, चबूतरी के, दुकानों के। तू एक भी दरवाज़ा अपने घर का नहीं खोला।"—उन्होंने मेरी तरफ़ देखा—"तेरा घर इतना चुप क्यों है?"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"मैंने आज सुबह पूछा था," उन्होंने कहा। "तूने बात बदल दी। मैंने शाम पूछा। तूने मुस्कुराकर कह दिया कि सब ठीक है। मैं फिर पूछ रहा हूँ। तेरा घर इतना चुप क्यों है?"
"पापा नहीं बोलते," मैंने कहा। "माँ नहीं बोलतीं। काजल नहीं बोलती। और मैं — मैं हँसी में छिप जाता हूँ। सबको लगता है हम ठीक हैं, क्योंकि हम हँसते हैं।"
"तो तंत्र से क्यों नहीं पूछता?"
"मैंने पूछा था," मैंने कहा। "आज रास्ते में। चलते-चलते। बोला कि घर में तीन लोग हैं और तीनों ने एक-एक सच अंदर बंद कर रखा है। मैंने पूछा, तीसरा कौन? और घंटी ने कहा — एक।"
"फिर?"
"फिर चुप।"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा।
"तंत्र ने तुझे आधा जवाब देकर छोड़ दिया," उन्होंने कहा। "यही उसका सबसे बड़ा तरीक़ा है। वो पूरी बात नहीं बोलता। वो तुझे अधूरा छोड़ता है, ताकि तू खुद जाकर उसे पूरा करे। जो जवाब मिल जाता है, वो जवाब नहीं होता। जवाब वही होता है जो तू मेहनत से बनाता है।"
"तो मैं क्या करूँ?"
उन्होंने मेरी हथेली पर रखी घंटी की तरफ़ देखा।
"घर जा," उन्होंने कहा। "आज रात। अकेले नहीं — पूरे घर को बैठाकर। और तंत्र से पूछ। इस बार पूरा जवाब माँग। बैठकर। घंटी को हाथ में रखकर। और जो जवाब आए, उसे सुनना।"
उन्होंने अपना चश्मा ठीक किया।
"क्योंकि," उन्होंने कहा, "जिस घर में तीन सच बंद हों, वो घर टूटता नहीं — वो धीरे-धीरे चुप हो जाता है। और चुप होता हुआ घर आवाज़ सुनना बंद कर देता है। फिर बाहर चाहे जितने दरवाज़े खुल जाएँ, अंदर कोई नहीं खुलता।"
"तंत्र से पूछूँ — मेरा घर इतना चुप क्यों है?"
"पूछ," उन्होंने कहा। "पर सुनने की हिम्मत रख। क्योंकि तंत्र वही बताएगा जो तू सबसे कम सुनना चाहता है। यही उसका काम है। वो सच बताता है, और सच कभी ख़ुशी के लिए नहीं होता। सच सिर्फ़ इलाज के लिए होता है।"
मैंने घंटी जेब में रखी।
दरवाज़े पर पहुँचकर मैंने मुड़कर पूछा। "उस्ताद, आपके भाई का नाम क्या था?"
वो कुर्सी पर खड़े थे। उनका हाथ सिलाई मशीन के पहिये पर था। पहिया एक चक्कर घूमा। फिर रुक गया।
"इलियास," उन्होंने कहा।
बस इतना। और उन्होंने अपना मुँह फेर लिया।
मैं बाहर निकला। शाम गली में उतर रही थी। शबनम आपा गुमटी समेट रही थीं। बच्चे चले गए थे — और मैंने देखा, चबूतरी पर हाफ़िज़ बाबा की तस्बीह और पंडित जी का गमछा अब भी साथ रखे थे, और उनके पास एक नई चीज़ रखी थी — दुबे अंकल की कुर्सी से उतरा हुआ पुराना रूमाल, और बूढ़े काका का एक कपड़ा, दोनों साथ।
मैं मुस्कुराया।
फिर मेरे हाथ में घंटी गर्म होने लगी। जैसे बाहर से आती हुई कोई आवाज़ अंदर बैठ जाना चाहती हो।
मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में गया। दरवाज़ा बंद किया। चारपाई पर बैठा। और घंटी हथेली पर रखी।
"अब," मैंने कहा। "मेरा घर इतना चुप क्यों है?"
घंटी बजी। एक बार। फिर जैसे हवा बदल गई, और मेरे कान के पास कोई बहुत धीमे से बोला — तूने पूछा। अच्छा किया। अब सुन, तेरे घर का तीसरा सच…
॥
अब सुन, तेरे घर का तीसरा सच…
घंटी की आवाज़ वहीं रुक गई। जैसे किसी ने दरवाज़ा खोला हो, अंदर झाँका हो, और फिर बिना कुछ कहे दरवाज़ा बंद कर दिया हो।
मैंने साँस रोक ली। हथेली पर घंटी रखी थी। वो गर्म थी। मैंने धीमे से कहा, "क्या हुआ? बोल ना। तीसरा सच क्या है?"
घंटी फिर बजी। एक बार। बहुत हल्का। जैसे कोई थककर बैठ गया हो।
फिर आवाज़ आई — तेरे घर का तीसरा सच तेरे घर में नहीं है।
मैं उठकर बैठ गया। "मतलब?"
मतलब, तेरे घर की चुप्पी घर से शुरू नहीं हुई। बाहर से आई है। पीपल के नीचे। दो आदमी। दोनों बैठे हैं, पर दोनों के बाप एक-दूसरे को चोर कहकर मरे। दोनों बेटे आज तक चुप। जा।
"मैं तुझसे अपने घर का सच पूछ रहा हूँ," मैंने कहा। "और तू मुझे पीपल के नीचे भेज रही है?"
घर की चुप्पी कभी घर से शुरू नहीं होती। बाहर से आती है। जा। और इस बार बीच में मत बोलना।
घंटी ठंडी हो गई।
मैंने चारपाई पर पड़ी अपनी कमीज़ पहनी। जेब में घंटी डाली। दरवाज़ा खोला। बाहर शाम और गहरी हो चुकी थी। गली में बत्तियाँ जल रही थीं, पर पीपल के नीचे अंधेरा जल्दी बैठ जाता है। जैसे वो पेड़ अपने नीचे की हवा किसी और को नहीं देता।
मैं सीधे पीपल की तरफ़ नहीं गया। पहले शबनम आपा की गुमटी की तरफ़ मुड़ा। वहाँ से बच्चों की आवाज़ आ रही थी। सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू। चारों गुमटी के बाहर वाले बेंच पर बैठे थे। सामने समोसे के दो प्लेट रखे थे और बीच में सानिया की लाल कवर वाली कॉपी खुली थी।
शबनम आपा चिमटी से समोसे निकाल रही थीं। मुझे देखकर बोलीं, "आ गया साइकिल वाला। तेरे बच्चे मेरी गुमटी को दफ़्तर बना बैठे हैं। चार समोसे खा गए, और अब कह रहे हैं कि अंकल, एक और।"
"आपा, आप इन्हें चाय में डुबो दीजिए," मैंने कहा। "फिर देखिए कैसे चुप हो जाते हैं।"
चिंटू ने मुँह भरकर कहा, "हम काम कर रहे हैं।"
"काम?" मैंने कहा। "कौन सा काम? समोसे खत्म करने का?"
सानिया ने अपनी कॉपी उठाई। "मीरा दीदी ने कहा था, ट्रकों के नंबर, शक्ल, वक़्त — सब लिखो। हम लिख रहे हैं। आज सुबह से पीछे के प्लॉट पर तीन ट्रक मिट्टी डालकर गए। एक पर पीला पत्थर लिखा था, एक पर लाल पट्टी, और एक पर कुछ समझ नहीं आया।"
"तुम लोगों ने इतना देखा?" मैंने कहा।
गुड्डू ने सीना फुलाया। "हमें क्या, हम तो गली के जासूस हैं।"
रफ़ीक़ ने कहा, "और अंकुश भाई, आज हमने एक चीज़ ढूँढी है।"
"क्या?"
चिंटू ने अपना हाथ पीछे छिपाया। "पहले बताओ, हमें क्या मिलेगा?"
"समोसा," मैंने कहा। "और अगर चीज़ काम की निकली, तो एक-एक पंचर मुफ़्त।"
चारों एक साथ बोले, "पक्का?"
"पक्का।"
तब चिंटू ने अपने पीछे से एक जंग लगा टिन का डिब्बा निकाला। छोटा, चौकोर, ऊपर से दबा हुआ। डिब्बे पर मिट्टी लगी थी और एक कोना टूटा हुआ था।
"यह पीपल के नीचे मिला," सानिया ने कहा। "मेरी बॉल पेड़ की जड़ में चली गई थी। जब चिंटू हाथ डालकर निकाल रहा था, तब यह मिला। जड़ के नीचे, पत्थर के पास दबा हुआ था।"
मैंने डिब्बा हाथ में लिया। भारी नहीं था। अंदर कुछ खड़खड़ा रहा था।
"खोलो," रफ़ीक़ ने कहा।
"यह तुम लोगों को मिला है," मैंने कहा। "तुम खोलो।"
चारों ने एक-दूसरे को देखा। फिर सानिया ने डिब्बा अपने हाथ में लिया। ढक्कन ज़ोर से खींचा। जंग चरचराई और ढक्कन खुल गया।
अंदर एक मोटा, पीला, मुड़ा हुआ काग़ज़ था। काग़ज़ का किनारा जला हुआ था। नीचे एक छोटा पीतल का सिक्का जैसा कुछ था, जिस पर कोई अक्षर घिस गया था।
मैंने काग़ज़ बाहर निकाला। ध्यान से खोला। वो किसी पुराने रजिस्टर का पन्ना था। ऊपर हाथ से लिखा था — मरम्मत का हिसाब। नीचे दो नाम थे। एक नाम के आगे लिखा था — साइकिल वाला। दूसरे नाम के आगे — कपड़ा वाला। और उसके नीचे एक लाइन — साइकिल मिल गई। थाने में। किसी ने चुराई नहीं थी, भूल से दूसरी दुकान पर खड़ी थी।
मेरा हाथ रुक गया।
"यह क्या है?" सानिया ने पूछा।
"यह," मैंने धीमे से कहा, "दो बुज़ुर्गों की चुप्पी का काग़ज़ है।"
मैंने बच्चों की तरफ़ देखा।
"तुम लोगों ने आज पहली बार मेरे काम में हाथ बँटाया है," मैंने कहा। "और सीधा वही चीज़ लाकर रख दी जो मुझे चाहिए थी।"
चिंटू ने कहा, "तो हमें क्या मिलेगा?"
"चार समोसे," मैंने कहा। "और एक राज़।"
शबनम आपा ने चिमटी हवा में घुमाई। "राज़ मत बाँट। पहले पैसे दे। मेरी गुमटी में उधार नहीं चलता।"
मैंने जेब से पैसे निकाले और उनकी हथेली पर रखे। फिर डिब्बा और काग़ज़ लेकर पीपल की तरफ़ चला।
पीपल के नीचे पत्थर की चबूतरी थी। उसके एक सिरे पर बाबा कलीम बैठे थे। सफ़ेद टोपी, हाथ में तस्बीह। दूसरे सिरे पर पंडित रामदीन। पीली धोती, कंधे पर गमछा। दोनों के बीच में इतनी जगह थी कि एक और आदमी आराम से बैठ जाए। पर दोनों ऐसे बैठे थे जैसे बीच की जगह में कोई दीवार हो।
मैं जानता था, ये दोनों अब मिल चुके हैं। पीतल के डिब्बे का राज़ खुलने के बाद इन्होंने एक-दूसरे का हाथ पकड़ा था। पर आज शाम ये फिर चुप बैठे थे। ऐसी चुप्पी जो मिलने के बाद भी चलती रहती है। जैसे सुलह हो गई हो, पर कुछ बात अब भी बीच में पड़ी हो।
मैंने बीच की जगह पर पैर रखा। बाबा कलीम ने नज़र उठाई। पंडित रामदीन ने तस्बीह पर हाथ रोक दिया।
"अंकुश," बाबा कलीम ने कहा। "आज मत बैठ। हम दोनों थक गए हैं।"
"मैं बैठने नहीं आया," मैंने कहा। "मैं कुछ लाया हूँ।"
"क्या?"
मैंने टिन का डिब्बा उनके बीच रख दिया।
दोनों ने देखा। बाबा कलीम का हाथ तस्बीह पर जम गया। पंडित रामदीन ने गमछे को कसकर पकड़ लिया।
"यह कहाँ से आया?" पंडित जी ने पूछा। आवाज़ धीमी थी।
"पीपल की जड़ के नीचे से," मैंने कहा। "बच्चों को मिला। अंदर एक काग़ज़ है। उस पर दो नाम हैं। एक साइकिल वाला, एक कपड़ा वाला। और एक लाइन — साइकिल मिल गई, थाने में।"
चबूतरी पर बैठे दोनों बुज़ुर्गों के चेहरे बदल गए। बाबा कलीम ने आँखें बंद कर लीं। पंडित रामदीन ने आसमान की तरफ़ देखा, जैसे वहाँ कोई जवाब लिखा हो।
"यह बात पुरानी है," बाबा कलीम ने कहा। "इसे छोड़ दे।"
"कितनी पुरानी?" मैंने पूछा।
"पचास साल," पंडित जी ने कहा। फिर चुप।
"आप दोनों ने मुझे बताया था कि आपका झगड़ा पीतल के डिब्बे का था," मैंने कहा। "वो खुल गया। फिर यह क्या है?"
बाबा कलीम ने तस्बीह घुमाई। "यह उससे भी पुराना है।"
"तो बताइए।"
"क्या बताएँ?" पंडित जी ने कहा। "जो बात बाप ने शुरू की, उसे बेटा क्या बताए?"
मैंने काग़ज़ उनके बीच रखा।
"आपका बाप," मैंने बाबा कलीम की तरफ़ देखकर कहा, "और आपका बाप," पंडित जी की तरफ़ देखकर, "दोनों साथी थे। एक साइकिल की दुकान, एक कपड़े की दुकान। एक दिन एक ग्राहक की साइकिल गायब हो गई। एक बाप ने दूसरे को चोर कहा। दूसरे ने पहले को झूठा कहा। बात बढ़ गई। दुकानें अलग हो गईं। घर अलग हो गए। और बाद में पता चला कि साइकिल थाने में थी। किसी ने चुराई नहीं थी।"
बाबा कलीम ने आँखें खोलीं। उनकी आँखों में पानी था, पर वो गिरा नहीं।
"तू कैसे जानता है?" उन्होंने पूछा।
"यह काग़ज़ कह रहा है," मैंने कहा। "और आपके चेहरे कह रहे हैं।"
पंडित रामदीन ने धीमे से कहा, "मेरे बाप ने उस रात कहा था — अब उस घर से कोई बात नहीं। और मैंने सिर हिला दिया। मैं बारह साल का था। मुझे क्या पता था कि एक रात की बात पचास साल चलेगी।"
बाबा कलीम ने कहा, "मेरे बाप ने कहा था — जो चोर का साथ दे, वो भी चोर। मैंने सुना और चुप रहा। फिर मैं बड़ा हुआ। बाप मर गया। पर उनकी बात मेरे अंदर ज़िंदा रही।"
दोनों के बीच चुप्पी बैठ गई। इतनी भारी कि पीपल की पत्तियों की आवाज़ भी दब गई।
मैंने कहा, "आप दोनों ने अपने बाप की एक गलती को अपनी चुप्पी से पचास साल ज़िंदा रखा।"
बाबा कलीम ने मेरी तरफ़ देखा।
"तू क्या कहना चाहता है?"
"मैं कुछ नहीं कहना चाहता," मैंने कहा। "मैं बस इतना चाहता हूँ कि आप दोनों एक-एक सच्ची बात एक-दूसरे से कह दें। बस एक। जो अंदर दबी है।"
"क्या कहें?" पंडित जी ने कहा। "सब पुराना है।"
"पुराना है, इसीलिए तो कहना है," मैंने कहा। "नया होता तो माफ़ी में देर नहीं लगती। पुराना इसीलिए है कि उसे कोई छूता ही नहीं।"
चबूतरी के पास बच्चे आ गए थे। सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू। वो दूर खड़े थे, पर कान सीधे हमारी तरफ़ थे। शबनम आपा भी गुमटी से झाँक रही थीं।
बाबा कलीम ने तस्बीह मुठ्ठी में ली। फिर धीमे से बोले, "मेरे बाप ने तुम्हारे बाप को चोर कहा था।"
पंडित रामदीन ने गमछा उतारा। माथा पोंछा। फिर बोले, "मेरे बाप ने तुम्हारे बाप को झूठा कहा था।"
दोनों रुक गए।
"और मैंने," बाबा कलीम ने कहा, "उस दिन के बाद तुमसे बात करना बंद कर दिया। हालाँकि मुझे पता था कि तुमने कुछ नहीं किया था।"
"और मैंने," पंडित जी ने कहा, "तुम्हारे घर के सामने से गुज़रना बंद कर दिया। हालाँकि मुझे पता था कि तुम्हारा बाप भी जानता था कि साइकिल थाने में मिल गई।"
"तो फिर चुप क्यों रहे?" बाबा कलीम ने पूछा।
"क्योंकि बाप की बात को झूठ कहने के लिए ज़ुबान चाहिए थी," पंडित जी ने कहा। "और मेरे पास वो नहीं थी।"
बाबा कलीम ने हाथ बढ़ाया। पंडित जी ने पकड़ा। दोनों की उँगलियाँ काँप रही थीं।
"माफ़ कर दिया," बाबा कलीम ने कहा।
"माफ़ कर दिया," पंडित जी ने कहा।
उस वक़्त मेरी जेब में घंटी बजी। एक बार। फिर दोबारा। और मेरे कान के पास आवाज़ आई — बीस अंक। दो बाप की गलती, दो बेटों की चुप्पी, और एक सच्ची माफ़ी। जोड़ पूरा।
मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी गर्म थी।
उसी वक़्त दर्ज़ी की दुकान से टिक-टिक की आवाज़ आई। फिर रुक गई। दरवाज़ा खुला और उस्ताद अली बक्श बाहर आए। उनके कान पर पेंसिल थी, हाथ में मोटा चश्मा। उन्होंने गली में देखा। मेरी तरफ़ देखा। मेरी जेब पर नज़र पड़ी और वो वहीं रुक गए। जैसे किसी ने उनके सीने में हाथ रख दिया हो।
"उस्ताद?" मैंने कहा।
उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। बस पीपल के नीचे बैठे दो बुज़ुर्गों को देखा। फिर मुझे। फिर अपनी दुकान की तरफ़ मुड़ गए। पर जाने से पहले उन्होंने धीमे से कहा, "बाद में आ। अभी नहीं।"
और वो अंदर चले गए।
मैं समझ गया कि घंटी की आवाज़ सिर्फ़ मैंने नहीं सुनी थी। उस्ताद ने भी सुनी थी। और उनका चेहरा कह रहा था कि यह आवाज़ उनके लिए नई नहीं थी।
तभी गली के मुहाने से मीरा आई। उसके कंधे पर कैमरा था। हाथ में वही फटा बैग। वो सीधे मेरी तरफ़ आई। उसके चेहरे पर वो भाव था जो तब आता है जब कोई पत्रकार सच से ज़्यादा अपने सवालों पर भरोसा करने लगे।
"अंकुश," उसने कहा। "तुम्हें शर्म नहीं आती?"
पीपल के नीचे बैठे बुज़ुर्गों ने सिर उठाया। बच्चे पीछे हट गए।
"किस बात की शर्म?" मैंने पूछा।
"तुम इन बुज़ुर्गों का ज़ख़्म तमाशा बना रहे हो," उसने कहा। "पहले बंसी बाबा, रहमत बाबा। फिर हाफ़िज़ बाबा, पंडित जी। फिर इब्राहीम चाचा, बृजमोहन बाबा। अब ये दोनों। तुम इन्हें आपस में मिलवाकर अपने आप को क्या समझते हो? कोई संत? कोई जादूगर?"
"मीरा," मैंने कहा। "मैं कुछ नहीं समझता।"
"तो यह सब क्या है?" उसने कैमरा ऊपर किया। "ये बुज़ुर्ग रो रहे हैं, और तुम जेब में हाथ डाले खड़े हो। क्या तुम इनके आँसुओं का वीडियो बनाओगे? क्या यही तुम्हारा धंधा है?"
"मीरा, कैमरा नीचे कर," मैंने कहा।
"क्यों? सच सामने आएगा तो दिक्कत क्या है?"
"सच सामने आएगा," मैंने कहा। "पर इनके आँसू तुम्हारे चैनल के लिए नहीं हैं।"
"मेरे चैनल का नाम बस्ती की आवाज़ है," उसने कहा। "मैं बस्ती की आवाज़ हूँ। और तुम बस्ती को बेवकूफ़ बना रहे हो।"
उसने बैग से एक काग़ज़ निकाला। मेरी दुकान के सातवें नंबर वाला काग़ज़। जो उसे किसी ने भेजा था। जिस पर दुकान का नाम ट्रस्ट के हिसाब से लिखा था।
"यह क्या है?" उसने पूछा। "तुम्हारी दुकान का काग़ज़ भारद्वाज कंस्ट्रक्शन से जुड़ा है। तुम्हारे पापा के अंगूठे के बदले किराया माफ़ है। और तुम यहाँ लोगों को जोड़ने का नाटक कर रहे हो। क्या तुम्हारे पापा ने गली बेची है?"
गली में सन्नाटा बैठ गया। शबनम आपा ने चिमटी नीचे रख दी। बच्चों ने मुँह खोल दिया। बाबा कलीम ने तस्बीह पकड़ ली।
मैंने मीरा की आँखों में देखा।
"मेरे पापा ने गली नहीं बेची," मैंने कहा। "मेरे पापा के हाथ से एक अंगूठा लिया गया। और मैं उस अंगूठे को मिटाने की कोशिश कर रहा हूँ।"
"किससे मिटवाओगे?" उसने पूछा। "इन बुज़ुर्गों से? इन्हें क्या पता है कि तुम्हारे पापा ने क्या किया?"
"इन्हें नहीं पता," मैंने कहा। "पर इन्हें यह पता है कि चुप्पी क्या करती है। और आज इन्होंने अपनी चुप्पी तोड़ी। तुम्हारे चैनल के लिए नहीं। अपने लिए।"
मीरा ने कैमरा नीचे किया। उसके हाथ काँप रहे थे।
"तुम मुझे जवाब दो," उसने कहा। "तुम्हारी जेब में क्या बजता है? वो घंटी क्या है? तुम लोगों को कैसे मिलाते हो? क्या तुम कोई जादू करते हो?"
मैं चुप रहा।
"देखा?" उसने कहा। "तुम सवालों से भागते हो। तुम्हारे पास जवाब नहीं हैं।"
"जवाब हैं," मैंने कहा। "पर अभी नहीं।"
"कब?"
"जब इन जवाबों से किसी का घर बचेगा," मैंने कहा। "अभी दूँगा तो सिर्फ़ तुम्हारा वीडियो बनेगा। और मेरे पापा का अंगूठा और गहरा धँस जाएगा।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में गुस्सा था, पर उसके पीछे कुछ और भी था। डर। वो डर जो सच के सामने खड़े होने पर आता है।
"तुम मुझे बेवकूफ़ समझते हो," उसने कहा।
"नहीं," मैंने कहा। "मैं तुम्हें वो समझता हूँ जो तुम हो — एक पत्रकार, जिसने एक बार आधा सच छापा और उससे किसी का घर टूटा। और अब वो हर सच को पूरा किए बिना नहीं छोड़ना चाहती।"
मीरा पीछे हटी। जैसे मैंने उसके चेहरे पर थप्पड़ मार दिया हो।
"तुम्हें क्या पता?" उसने धीमे से कहा।
"मुझे नहीं पता," मैंने कहा। "पर तुम्हारी आँखें बता रही हैं।"
वो एक पल खड़ी रही। फिर उसने कैमरा बैग में डाला। पीछे मुड़ी। जाते-जाते रुकी।
"मैं तुम्हें गलत साबित करूँगी," उसने कहा। "या तुम्हें सही। दोनों में से एक। पर तुम्हारे पास जवाब होने चाहिए। सबके सामने।"
"होंगे," मैंने कहा।
वो चली गई।
बाबा कलीम ने मेरी तरफ़ देखा। "यह लड़की तेरे पीछे पड़ गई है।"
"जानता हूँ," मैंने कहा।
"सच बोल दे," पंडित जी ने कहा। "सच बोलने में क्या जाता है?"
"सच बोलने में सब जाता है," मैंने कहा। "इसीलिए सोचकर बोलना पड़ता है।"
मैंने दोनों को प्रणाम किया और दुकान की तरफ़ चला। रास्ते में बच्चे मेरे साथ चल पड़े।
"अंकुश भाई," सानिया ने कहा। "मीरा दीदी को तुमने डरा दिया?"
"नहीं," मैंने कहा। "उसने खुद को याद दिला दिया।"
"क्या?"
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "तुम लोग घर जाओ। आज का काम हो गया।"
"पर ट्रकों वाली कॉपी?" चिंटू ने कहा।
"कल सुबह लाना," मैंने कहा। "अभी जाओ।"
वो भाग गए। मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में गया। दरवाज़ा बंद किया। चारपाई पर बैठा। घंटी हथेली पर रखी।
"बीस अंक," मैंने कहा। "कुल कितने हुए?"
घंटी बजी। आवाज़ आई — एक सौ इकतालीस।
मैं मुस्कुराया। "और क्या मिलेगा इन अंकों से?"
घंटी चुप रही।
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। मैंने दरवाज़ा खोला। उस्ताद अली बक्श बाहर खड़े थे। उनके हाथ में एक छोटा कपड़े का पोटली था। चेहरा गंभीर।
"उस्ताद," मैंने कहा। "अंदर आइए।"
वो अंदर आए। चारपाई पर बैठे। पोटली खोली। उसमें एक पुरानी सिलाई की सुई थी, एक छोटा पीतल का टुकड़ा और एक मोड़ा हुआ काग़ज़।
"मैंने आज दुकान से तेरी घंटी सुनी," उन्होंने कहा। "बहुत सालों बाद।"
"आपने पहले भी सुनी थी?"
"सुनी थी," उन्होंने कहा। "जब मैं तेरी उम्र का था।"
वो रुके। उन्होंने चश्मा उतारा। आँखें बंद कीं।
"यह घंटी किसी की मिरासी होती है," उन्होंने कहा। "इसे बाज़ार में मत दिखाना।"
"मिरासी?"
"मिरासी का मतलब है," उन्होंने धीमे से कहा, "वो चीज़ जो विरासत में मिले, पर उसका हिसाब भारी हो। इसे दो हाथ पकड़ते हैं। एक हाथ जो पहले पकड़ता है, दूसरा जो बाद में। अगर एक हाथ छोड़ दे, तो दूसरा हाथ जल जाता है।"
"आपको कैसे पता?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"क्योंकि मैंने एक बार यह हाथ छोड़ दिया था," उन्होंने कहा। "और मेरा भाई इलियास आज तक मुझसे नहीं बोलता।"
मैंने घंटी जेब से निकाली। उनके सामने रखी।
"यही घंटी है?"
उन्होंने देखा। उनकी उँगली घंटी के ऊपर रुकी। छुआ नहीं। बस हवा में रुकी रही।
"यही है," उन्होंने कहा। "या इसकी बहन।"
"बहन?"
"इलियास के पास दूसरी है," उन्होंने कहा। "दोनों एक साथ बजें, तो बात पूरी होती है। अकेली बजे, तो सिर्फ़ आधी।"
वो उठे। दरवाज़े की तरफ़ बढ़े। फिर रुके।
"अंकुश," उन्होंने कहा। "तूने आज जो किया, वो ठीक नहीं था।"
"क्या?"
"तूने दो बुज़ुर्गों का ज़ख़्म खोला," उन्होंने कहा। "उन्हें मिलाया। यह अच्छा है। पर तूने उन्हें अपने सामने रोया। यह ठीक नहीं।"
"तो क्या करता?"
"उन्हें अकेला छोड़ देता," उन्होंने कहा। "माफ़ी दो लोगों के बीच की चीज़ है। तीसरा देखने वाला हो, तो माफ़ी थोड़ी कम हो जाती है।"
मैं चुप रहा।
"अब बता," उन्होंने कहा। "तूने मुझसे आज सुबह पूछा था — तेरा घर इतना चुप क्यों है।"
"हाँ," मैंने कहा। "घंटी ने कहा कि तीसरा सच बाहर है।"
"तो अब पूछ," उन्होंने कहा। "तंत्र से पूछना — तेरा घर इतना"अब सुन, तेरे घर का तीसरा सच…"
घंटी की आवाज़ मेरे कान के पास आकर रुक गई। जैसे कोई दरवाज़े पर आकर खड़ा हो और अंदर आए बिना चला जाए।
"कौन सा सच?" मैंने पूछा। "बोल न।"
"तेरे घर में तीन सच हैं," घंटी बोली। "पापा का, माँ का, और तीसरा।"
"तीसरा क्या है?"
"तीसरा वो है जो सबसे ज़ोर से चुप है।"
मैंने घंटी को हथेली पर घुमाया। पीतल ठंडा था।
"मेरा सच?"
घंटी नहीं हँसी। घंटी कभी नहीं हँसती। बस एक छोटी सी झनझनाहट हुई, जैसे पुरानी तार पर हवा चल गई हो और वो बोलने से पहले सोच रही हो।
"कल सुबह पीपल के नीचे जा," उसने कहा। "दो आदमी बैठे हैं। पच्चीस साल से एक-दूसरे को देखते हैं, और नहीं देखते। उनका सच सुन।"
"उनका सच सुनकर मेरा घर कैसे खुलेगा?"
"जो अपने घर का सच नहीं सुन सकता," घंटी बोली, "वो दूसरे का घर सुनकर सीखता है। घर सबके एक जैसे होते हैं। बस दरवाज़ों के नंबर अलग होते हैं।"
"और मेरा तीसरा सच?"
"अभी नहीं।"
"क्यों?"
"क्योंकि अभी तू उसे सुनकर मुस्कुरा देगा," घंटी ने कहा। "और जो सच मुस्कुराकर सुना जाए, वो सुना नहीं जाता, टाल दिया जाता है।"
फिर चुप। पूरी चुप।
मैं चारपाई पर बैठा रहा। ऊपर बल्ब गुनगुना रहा था, जैसे बूढ़ा आदमी नींद में कोई पुरानी लोरी गा रहा हो। कमरे में ग्रीस की गंध थी, मिट्टी की गंध थी, और एक तीसरी गंध थी जिसका नाम मुझे नहीं पता था। मुझे लगा, सच की भी कोई गंध होती होगी। पुरानी अलमारी खोलने पर जैसी आती है।
दरवाज़े पर तीन हल्की दस्तकें हुईं।
"अंकुश?"
काजल थी। हाथ में टिफ़िन।
"माँ ने भेजा है," उसने कहा। "और माँ ने कहा है कि अगर तू फिर बोला कि भूख नहीं है, तो वो खुद आएँगी।"
"मैं खा लूँगा।"
"झूठ।"
उसने टिफ़िन मेज़ पर रख दिया। कमरे में चारों तरफ़ नज़र घुमाई। मेरी चारपाई, मेरा ट्रंक, मेरे औज़ार, मेरी टूटी घड़ी। फिर मेरे चेहरे पर।
"तू ठीक है?"
"मैं ठीक हूँ।"
"तू बेहतर झूठ बोल सकता है," उसने कहा। "जब मैं छोटी थी, तब भी तू यही बोलता था — जब मेरी साइकिल का पहिया मोड़ पर फँस जाता था, तब भी।"
"तब सच में ठीक होता था।"
"नहीं होता था।" वो दरवाज़े की तरफ़ मुड़ी। "तू बस मेरा डरा हुआ चेहरा नहीं देखना चाहता था।"
वो गई। दरवाज़ा बंद करके गई, पर मैंने सुना — बंद करने से पहले वो एक पल रुकी, यह सुनने के लिए कि मैंने टिफ़िन खोला या नहीं।
मैंने खोला।
रोटी ठंडी हो रही थी। मैंने फिर भी खाई। आचार के नीचे माँ ने गुड़ का एक टुकड़ा रखा था। माँ को पता था कि बुरे दिन में गुड़ पहले खाया जाता है, बात बाद में होती है।
मैंने गुड़ खाया और बत्ती बुझा दी।
सुबह सात बजे शबनम आपा की गुमटी पर चारों जमा थे।
सानिया, हाथ में लाल कवर की कॉपी। गुड्डू, मुँह में आधा समोसा और आधा शक। रफ़ीक़, जो हर बात के बाद "सच में" कहता था। और चिंटू, सबसे छोटा, सबसे भूखा, और सबसे पहले खबर लाने वाला।
"उस्ताद," सानिया ने कहा, "सूची तैयार है।"
"कौन सी सूची?"
"ट्रकों की।" उसने कॉपी खोली। "कल शाम से रात तक पीछे के प्लॉट पर छह ट्रक मिट्टी डालने आए"उस्ताद," सानिया ने कहा, "सूची तैयार है।"
"कौन सी सूची?"
"ट्रकों की।" उसने लाल कवर की कॉपी खोली। "कल शाम से रात तक पीछे के प्लॉट पर छह ट्रक मिट्टी डालने आए। छह। एक भी कम नहीं। और हर ट्रक पर पीली पट्टी चिपकी थी, जिस पर काली स्याही से लिखा था — भारद्वाज कंस्ट्रक्शन।"
गुड्डू ने आधा समोसा मुँह से निकालकर कहा, "मैंने अपनी आँखों से देखा, उस्ताद। दो ट्रक ऐसे थे जिनके पीछे लोहे का बड़ा डिब्बा था, और उस डिब्बे से मिट्टी ऐसे गिर रही थी जैसे कोई घाव से खून बहा रहा हो।"
"तूने पीछे क्या कर रहा था?" मैंने पूछा।
"मैं पीपल की जड़ के नीचे बैठा था, चाचा। मेरी गेंद पीछे भाग गई थी। तो देखा कि ट्रक आ रहे हैं।"
रफ़ीक़ ने कहा, "और उस्ताद, एक ट्रक वाले का हाथ में सोने की मोटी चेन थी। मोटी। जैसे किसी खानदानी बैल के गले में घंटी। मुझे पता है ऐसी चेन पहनने वाले दो ही तरह के लोग होते हैं — या तो दूल्हा होता है, या ऐसा जो अपना वज़न बढ़ाने के लिए चेन पहनता है।"
"तूने दूल्हे को देखा क्या?" सानिया ने टोका।
"नहीं, पर मैंने चेन वाले को देखा। वो असली दूल्हा है।"
चिंटू, जो सबसे छोटा था और अब तक अपनी जेब से मूँगफली निकालकर खा रहा था, उसने मुँह भरे हुए कहा, "उस्ताद, मुझे एक और चीज़ मिली।"
"क्या?"
"रात आठ बजे एक सफ़ेद गाड़ी प्लॉट के मुहाने पर आई थी। बड़ी गाड़ी, जैसी बड़े साहब की होती है। उसमें से कोई उतरा नहीं। खिड़की खुली, अंदर बैठा आदमी कुछ देर देखता रहा, फिर गाड़ी चल दी। मैं उस वक़्त गुड्डू के साथ था, और हम दोनों एक बोरी के पीछे छिपे थे।"
"तूने अंदर का आदमी पहचाना?"
"नहीं। पर उसके हाथ में जो चीज़ थी, वो मैंने देखी।" चिंटू ने समोसे का आख़िरी हिस्सा निगला और आगे झुका। "फ़ोन के अलावा। उसके हाथ में एक काग़ज़ था, उस्ताद। मोड़ा हुआ। और वो उसे बार-बार खोलकर देख रहा था, जैसे कोई माँ बच्चे की तस्वीर देखती हो।"
मेरे पेट में कुछ ठंडा उतर गया।
"कौन सा काग़ज़ था वो?"
"अंधेरा था, उस्ताद। मैं इतना ही बता सकता हूँ कि उस काग़ज़ पर ऊपर की तरफ़ कुछ लिखा था, और नीचे एक लाल चीज़ चिपकी थी। लाल। जैसे किसी ने हाथ से लाल स्याही की बूँद लगाई हो।"
मैंने सानिया की तरफ़ देखा। सानिया ने अपनी कॉपी के पन्ने उलटकर कुछ दिखाया।
"और उस्ताद," उसने कहा, "छह ट्रक में से चार तो आठ बजे तक आ गए थे। बाकी दो रात नौ बजे के बाद आए। उन दोनों में एक अलग बात थी — उन्होंने मिट्टी प्लॉट के बीच में नहीं डाली, बल्कि एक तरफ़ ज़मीन पर बड़ा गड्ढा खोदने लगे। मिट्टी से ऊपर भरने की जगह वो नीचे खोद रहे थे।"
"तूने किससे पूछा?"
"मैंने नहीं पूछा," सानिया ने निर्दोष चेहरा बनाया। "मैंने सिर्फ़ देखा। मैं तो पीपल पर बैठी थी, अपनी चप्पल उतारकर, जैसे कोई फ़िल्म में छिपी नायिका होती है।"
चारों बच्चे मेरी तरफ़ देखने लगे। मैंने सोचा।
"सानिया," मैंने कहा, "ये गड्ढा कहाँ खोद रहे थे?"
"प्लॉट के उस कोने में, जहाँ से नूर अस्पताल की पिछली दीवार दिखती है।"
मेरे पीछे शबनम आपा ने समोसे की कढ़ाही को ज़ोर से रखा। लोहे की चिमटी चटकी।
"अरे बाप रे," वो बोलीं। "सारी गली की ज़मीन चाटने आए हैं। अस्पताल की दीवार से सटकर गड्ढा। अब समझ में आया कि सफ़ेद कुर्ते वाले लोग रोज़ सुबह चौक से लेकर अस्पताल तक क्यों पैदल घूमते हैं।"
"आपको दिखते हैं?" मैंने पूछा।
"मुझे सब दिखता है," शबनम आपा ने कहा। "चाय वाली को सब दिखता है। वो जो समोसे खाते हैं, वो सोचते हैं कि हम सिर्फ़ समोसे गिनते हैं।" उन्होंने चिमटी उठाई। "हम लोग भी गिनते हैं।"
मैं मुस्कुराया। "आपा, आपकी इसी खूबी के लिए तो गली आपको नहीं छोड़ती।"
"छोड़ना तो दूर," उन्होंने कहा। "अब बात कर तो सही। इन बच्चों ने मेहनत की है। कुछ करने का?"
मैंने सोचा।
"कुछ करने से पहले," मैंने कहा, "मुझे ये जानना है कि उनका अगला कदम क्या है।"
सानिया ने तुरंत कहा, "अगला कदम ये है कि कोई ट्रक आए तो हम तुरंत खबर लाएँ। हमें सिर्फ़ ये बताना है कि किस वक़्त, कितने ट्रक, और कौन उतरा।" उसने अपनी कॉपी दिखाई। "देखिए, मैंने तीन कॉलम बनाए हैं। एक — वक़्त। दो — ट्रक की शक्ल। तीन — अंदर कौन बैठा था।"
मैंने कॉपी देखी। तीन कॉलम सच में थे। नीचे एक चौथा बना रहा था जिस पर लिखा था — "कोई पहचान दिखी तो।"
"तू कितनी बड़ी हो गई है," मैंने कहा।
"उस्ताद," उसने कहा, "मैं चौदह साल की हूँ, बड़ी नहीं हुई। पर इतना पता है कि जो मिट्टी समोसे के पैसे से ज़्यादा तेज़ी से गिर रही है, वो प्लॉट नहीं, गली भर रही है।"
शबनम आपा ने एक लंबी साँस ली। "बच्चे बड़े हो गए," उन्होंने कहा। "अब इनके सवालों का जवाब सिर्फ़ तू दे सकता है।"
फिर गुड्डू ने कुछ याद किया। "अरे हाँ, उस्ताद। पीपल के नीचे दो बुज़ुर्ग पिछले चालीस साल से बैठे हैं।"
"पिछले चालीस साल?" मैंने कहा। "मुझे तो लगता था वहाँ बंसी बाबा और रहमत बाबा थे।"
"वो अब मिल गए हैं," चिंटू ने कहा। "वो बात पुरानी हो गई। अब वहाँ दो नए बैठे हैं। एक किनारे पर, दूसरा दूसरे किनारे पर। दोनों के बीच में पूरा पीपल।"
"और वो बात नहीं करते?"
"उस्ताद," रफ़ीक़ ने कहा, "ये बात ही नहीं करते। पर रोज़ शाम को दोनों आते हैं। एक पूरब से, एक पश्चिम से। एक अपनी लाठी रखता है, दूसरा अपना रूमाल। फिर बैठते हैं। और चाय!"
"चाय?"
"हाँ," सानिया ने कहा। "और यही सबसे बड़ी बात है। दोनों एक-दूसरे को देखते भी नहीं। पर शबनम आपा की गुमटी से हर शाम दो कटोरी चाय जाती है, एक पूरब वाले के पास, एक पश्चिम वाले के पास। और चाय का पैसा दोनों के कटोरे में से आधा-आधा आता है।"
मैंने शबनम आपा की तरफ़ देखा। वो चिमटी से समोसा उठा रही थीं। रुकीं।
"हाँ," उन्होंने कहा। "चालीस साल से।"
"आपने कभी पूछा नहीं?"
"मैंने पूछा था," उन्होंने कहा। "बहुत पहले। जवाब मिला था कि ये दोनों उस्ताद हैं। संगीत वाले उस्ताद। एक हारमोनियम बजाता है, दूसरा तबला। और मुझे बताया गया कि संगीत वाले लोग बोलते कम हैं, सुनते ज़्यादा हैं।"
"लेकिन ये चालीस साल से?"
शबनम आपा ने चिमटी कड़ाही पर रखी।
"मैं सिर्फ़ चाय वाली हूँ," उन्होंने कहा। "मैं इतना नहीं जानती कि दोनों के बीच क्या हुआ था। पर मैं इतना जानती हूँ कि एक शाम जब ऊपर बादल थे और मैंने उन दोनों को एक-दूसरे की तरफ़ देखते देखा — मैंने अपने हाथ से चाय ज़्यादा गरम बना दी थी। क्योंकि मुझे लगा कि अगर चाय ज़्यादा गरम होगी, तो शायद उन्हें ज़ुबान मिल जाएगी।"
मैं कुछ देर चुप बैठा रहा।
"कौन हैं वो?"
"एक का नाम उस्ताद तुफ़ैल है," सानिया ने कहा। "पूरब वाला। सफ़ेद दाढ़ी, एक आँख कमज़ोर, हाथ में लाठी। दूसरा मास्टर प्यारेलाल — पश्चिम वाला। पतला, मोटा चश्मा, चश्मे के हैंडल पर काले धागे से टेप लिपटा हुआ है।"
"और आपने कभी नहीं सुना कि इनका झगड़ा किस बात का था?"
"सुना था," गुड्डू ने कहा, "पर सुना है, देखा नहीं। मेरी दादी बताती थीं कि एक शादी में दोनों साथ बजाते थे। बहुत पुरानी बात है। उस शादी में कुछ हुआ था। क्या हुआ, ये कोई नहीं बताता।"
मैं उठ खड़ा हुआ।
"कहाँ जा रहे हो?" शबनम आपा ने पूछा।
"पीपल के नीचे," मैंने कहा। "चाय पीने।"
"अभी सुबह के दस बजे हैं। वो दोनों दोपहर के बाद आते हैं।"
"तो मैं उनसे मिलने जाऊँगा," मैंने कहा। "किसी के घर। मुझे पता है ऐसे लोगों को कहाँ ढूँढना चाहिए।"
—
उस्ताद तुफ़ैल का घर पीपल के पूरब वाली गली में था। एक छोटा सा कमरा, बाहर आँगन, और आँगन में सुखी हुई मिर्च की लाल लड़ियाँ टँगी थीं। दरवाज़े पर मैंने दस्तक दी।
"कौन?"
"अंकुश। साइकिल वाला।"
कुछ देर चुप्पी।
"अंदर आ।"
मैंने दरवाज़ा खोला। कमरे में धूल की गंध थी, पुराने तेल की गंध थी, और एक तीसरी गंध थी जो मुझे पहचान नहीं आई। बाद में समझ आया — वो हारमोनियम की गंध थी। पुराने लकड़ी की, पुराने रीड की, जिस पर सालों से कोई हाथ नहीं फिरा।
कमरे के कोने में एक हारमोनियम रखा था। ढका हुआ था, एक सफ़ेद पुराने कपड़े से, जिस पर पीले धब्बे पड़ गए थे।
उस्ताद तुफ़ैल चारपाई पर बैठे थे। सफ़ेद दाढ़ी, जिसे कंघी नहीं की गई थी। एक आँख पर पुराना सा पर्दा, और हाथ में वो लाठी जिसके साथ सानिया ने कहा था वो रोज़ आता है।
"बैठ," उन्होंने कहा।
मैं बैठ गया। ज़मीन पर, उनके पैरों के पास। मुझे लगा कि ऐसे आदमी के सामने कुर्सी पर नहीं बैठना चाहिए।
"तू वही है," उन्होंने कहा, "जो पीपल के नीचे बुज़ुर्गों को मिलाता है?"
"ऐसा ही कहते हैं लोग।"
"मुझे नहीं मिला।"
"आप मिलने नहीं आ रहे," मैंने कहा।
उन्होंने लाठी की नोक ज़मीन पर रखी।
"मैं आता हूँ," उन्होंने कहा। "रोज़।"
"मिलने के लिए?"
"उस पेड़ को देखने।"
"और वो दूसरे?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"तू सीधा बोलता है," उन्होंने कहा। "यही अच्छा है। पर सीधा बोलने वाले को सीधा जवाब नहीं मिलता।"
"तो टेढ़ा पूछूँ?"
वो मुस्कुराए। बहुत हल्का। मुश्किल से होंठ हिले।
"तुझे क्या जानना है?"
"चालीस साल पहले क्या हुआ था?"
उन्होंने अपनी लाठी उठाई और उसकी नोक से ज़मीन पर एक लकीर खींची। फिर उसे मिटा दिया, उंगली से।
"उस वक़्त मैं तीस का था," उन्होंने कहा। "वो भी। हमने पहली बार साथ बजाया था — इसी गली में। किसी के घर शादी थी। उस दिन से हम जुड़ गए। गली के बाहर भी जाने लगे। शहर-शहर।" उन्होंने रुककर ज़मीन पर पड़ी धूल में उंगली फिराई। "मैं उसके बिना हारमोनियम नहीं बजाता था। और वो मेरे बिना तबला नहीं छेड़ता था।"
"फिर?"
"फिर एक रात," उन्होंने कहा, "हम बड़े शहर में बजा रहे थे। उस रात बहुत भीड़ थी। बीच में, ठीक उस वक़्त जब वो बजा रहा था, उसकी एक ताल टूट गई। छोटी सी बात थी। एक आदमी बैठा था — न जाने कौन, किसी का जीजा या चचेरा। उसने बीच में चुटकी बजाई और कहा, "हारमोनियम जैसा तबला कोई नहीं बजाता। तबले की तो छुट्टी है।"
"और आपने?"
"मैं हँसा नहीं था," उन्होंने कहा। धीमे से। "मेरी आँखों में पानी आ गया था। मुझे उसकी जगह अगर कोई कुछ बोलता तो मैं उसे छोड़ता नहीं। वो मेरा सबसे अच्छा साथी था। मेरा भाई। मुझसे ज़्यादा मेरी माँ उसे प्यार करती थी। और मैं — मैं उस रात हँस नहीं रहा था। मेरी आवाज़ नहीं निकल रही थी।"
"तो प्यारेलाल बाबा ने क्या समझा?"
"उसने मेरा चेहरा देखा ही नहीं," तुफ़ैल उस्ताद ने कहा। "उसने सिर्फ़ मेरी तरफ़ से कुछ सुना — शायद मेरी आवाज़ में एक हल्की सी हवा। मुझे लगता है उसे लगा कि मैं हँस रहा हूँ। वो तबला उठाकर बाहर चला गया।"
"और फिर?"
"फिर वो कभी नहीं बजाया," उन्होंने कहा। "वो कभी नहीं बजाया। दो लोगों की रात का काम था, और एक ही रह गया तो बंद हो गया। उसने तबला पीपल के कोटर में छुपा दिया — मुझे पता है, वो आज भी वहीं है। और मैंने हारमोनियम उठाकर सफ़ेद कपड़े से ढक दिया।"
"आपने बात क्यों नहीं की?"
"मैंने बहुत बार पूछना चाहा," उन्होंने कहा। "पहले महीने में तीन बार उसके दरवाज़े तक गया। तीनों बार हाथ दरवाज़े पर रखकर लौट आया। फिर साल भर गया। फिर दो। फिर ऐसे ही चालीस।"
"क्यों?"
"क्योंकि मैंने सोचा — जो इंसान तबला उठाकर चला जाए, वो अगर बात करना चाहे तो खुद आएगा।"
"और उन्होंने?"
"वो भी यही सोचता रहा होगा," उस्ताद तुफ़ैल ने कहा। "हम दोनों अब बूढ़े हो गए हैं, बेटा। हम दोनों ने अपनी-अपनी ज़ुबान को पेड़ पर टाँग दिया और चले गए। बोलने वाला कोई नहीं बचा। फिर हम चाय पीते हैं, हारमोनियम पर हाथ नहीं रखते, और एक-दूसरे की तरफ़ नहीं देखते।"
"पर आप एक-दूसरे के लिए चाय मँगवाते हैं।"
"वो मेरी नहीं होती," उन्होंने कहा। "वो उसकी होती है। वो मेरे लिए मँगवाता है, मैं उसके लिए। हम दोनों ने एक ही रोज़ शुरू किया था। एक-दूसरे से पूछे बिना।"
मैं कुछ देर बैठा रहा।
फिर मैंने कहा, "उस्ताद, आप मुझे एक चीज़ दे सकते हैं?"
"क्या?"
"एक बात। जो आपने अब तक किसी से नहीं कही।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। सफ़ेद दाढ़ी के नीचे उनका मुँह हिला।
"तू क्या करेगा उस बात का?"
"मैं उसे आपके सामने रखूँगा। पीपल के नीचे।"
—
शाम पाँच बजे मैं पीपल के नीचे था।
उस्ताद तुफ़ैल पूरब से आए। लाठी टेकते हुए। मास्टर प्यारेलाल पश्चिम से आए। पतला शरीर, चश्मा, पुराना रूमाल। दोनों अपनी जगह बैठे। दोनों ने एक-दूसरे को देखा नहीं। दोनों के बीच में मैं बैठा था, और चारों बच्चे पीछे, चबूतरी के नीचे, चुपचाप।
शबनम आपा ने चाय भेज दी। दो कटोरियाँ। एक पूरब, एक पश्चिम। मैंने कहा, "आज एक कटोरी और भेजिए। तीसरी। मेरे लिए।"
पाँच मिनट तक कोई नहीं बोला।
फिर मैंने कहा, "तुफ़ैल उस्ताद, आप मेरे सामने एक बात कहना चाहते थे। कहिए।"
उस्ताद तुफ़ैल ने चाय का कटोरा नीचे रखा।
"मैं उस रात हँसा नहीं था," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। "मैं रो रहा था। मेरी आँखों में पानी था और मैं उसे छुपा रहा था। तेरा तबला टूटा देखकर मुझे अपना हारमोनियम टूटा लगा था।"
मास्टर प्यारेलाल की उँगलियाँ रुक गईं। वो चाय के कटोरे पर थीं।
"मैंने चालीस साल तुझे हँसता हुआ सोचा," उन्होंने कहा। रूखी आवाज़। "चालीस साल। मैंने सोचा कि तू मेरा तमाशा देखकर हँसा और चला गया। मैंने उसी रात तय कर लिया कि मैं तबला नहीं छेड़ूँगा। किसी के सामने नहीं।"
"तूने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं था," तुफ़ैल उस्ताद ने कहा। "तूने सिर्फ़ आवाज़ सुनी।"
"मैंने सुना," प्यारेलाल ने कहा। "मैंने सिर्फ़ आवाज़ सुनी। और मैं चला गया। मैंने तुझसे पूछा भी नहीं।"
कुछ देर चुप्पी रही।
फिर मास्टर प्यारेलाल ने धीमे से कहा, "तू मेरे लिए रोज़ चाय मँगवाता है।"
"तू भी," तुफ़ैल उस्ताद ने कहा।
"मैंने सोचा था तू मुझे माफ़ नहीं किया।"
"मैंने सोचा था तू मुझे।"
"मैंने तुझे कभी नहीं छोड़ा, बेवकूफ़," प्यारेलाल ने कहा। उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो चालीस साल बाद फूट रहा था। "मैं तबला उठाकर चला गया, पर मैं तुझे कभी नहीं भूला। मैं रोज़ उस कोने से गुज़रता हूँ जहाँ हम बजाते थे। मैं रोज़ सोचता हूँ कि अगर एक बार तू हारमोनियम उठा ले, तो मैं चुपचाप आकर पीछे बैठ जाऊँगा।"
"मेरा हारमोनियम सफ़ेद कपड़े में ढका है," तुफ़ैल उस्ताद ने कहा। "चालीस साल से।"
"और मेरा तबला," प्यारेलाल ने कहा, "इसी पीपल के कोटर में है। धूल में। मैं उसे साल में एक बार छूता हूँ — किसी दिन जब कोई न देख रहा हो।"
मेरे हाथ में घंटी गरम हो गई।
बजी। एक बार। और मेरे कान के पास कोई धीमे से बोला — अठारह। फिर रुककर — बारह। फिर — कुल तीस।
तो इसमें कोई झगड़ा ही नहीं था। सिर्फ़ एक आवाज़ थी, जो दोनों ने अलग-अलग सुनी।
मैंने देखा, दोनों बुज़ुर्गों की आँखें भर गई थीं। मास्टर प्यारेलाल ने अपना रूमाल निकाला और मुँह छुपाया। उस्ताद तुफ़ैल ने लाठी पर दोनों हाथ रख दिए और सिर झुका लिया।
फिर प्यारेलाल ने उस्ताद तुफ़ैल की तरफ़ हाथ बढ़ाया।
चालीस साल बाद।
और उस्ताद तुफ़ैल ने उनका हाथ थाम लिया।
"तेरा तबला कोटर में क्यों है?" प्यारेलाल ने कहा। "उसे उठा। घर चल। मैं आज हारमोनियम निकालूँगा।"
"आज?"
"आज," प्यारेलाल ने कहा। "चालीस साल हो गए। कल का कोई भरोसा नहीं।"
—
उसी वक़्त मेरे कान में एक आवाज़ आई, जो घंटी की नहीं थी।
दुकान की सिलाई मशीन की आवाज़।
टिक-टिक। और फिर — बंद।
मैंने मुड़कर देखा। पीपल के पीछे, उस्ताद अली बक्श अपनी दुकान के बाहर खड़े थे। मोटा चश्मा, कान पर पेंसिल। हाथ में कैंची। पर कैंची खुली थी, और वो हवा में रुकी हुई थी।
वो मेरी तरफ़ देख रहे थे।
या मेरी जेब की तरफ़।
मैंने अनदेखा करने की कोशिश की, पर उन्होंने आँखें नहीं हटाईं। उनका चेहरा सफ़ेद था। वो कुछ देर वैसे ही खड़े रहे। फिर उन्होंने कैंची अपनी मेज़ पर रखी, दुकान का दरवाज़ा खुला छोड़ा, और चले गए — गली की उस तरफ़, दुकानों के पीछे।
मुझे लगा कि मेरे पेट में कुछ ठंडा हिला।
मास्टर प्यारेलाल और उस्ताद तुफ़ैल एक-दूसरे का हाथ थामे उठ रहे थे। बच्चे चबूतरी के नीचे से निकल आए थे। सानिया ने अपनी कॉपी निकाली और नीचे नीचे कुछ लिख दिया — शायद उसने अंक गिन लिए थे, न जाने कैसे।
मैंने उन दोनों को जाते देखा। उस्ताद तुफ़ैल लाठी टेक रहे थे और मास्टर प्यारेलाल उनका हाथ थामे हुए थे — जैसे दो बच्चे स्कूल जा रहे हों। वो पीपल के कोटर की तरफ़ नहीं गए। वो सीधे उस्ताद तुफ़ैल के घर की तरफ़ गए। हारमोनियम पहले।
तभी मेरी जेब से फिर घंटी बजी।
अठारह अंक।
कुल — अठारह और बारह, यानी तीस। पहले के तीस में जोड़कर — साठ।
पर मैंने उन्हें गिना नहीं। मैं उस्ताद अली बक्श के उस चेहरे को देख रहा था जो मैंने उन पर कभी नहीं देखा था।
—
गुमटी पर वापस लौटा तो शबनम आपा ने मुझे रोका।
"उस्ताद अली बक्श तुझे ढूँढ रहे थे," उन्होंने कहा।
"कहाँ हैं?"
"पीछे। अपनी दुकान के पीछे वाले कमरे में। बोले कि अंकुश आए तो सीधे भेजना। किसी और को नहीं।"
मैं पीछे गया। उस्ताद की दुकान के पीछे वाला कमरा। मैंने दरवाज़ा खटखटाया।
"अंदर आ," उनकी आवाज़ आई।
कमरे में रोशनी कम थी। एक बल्ब जल रहा था, जो पीला था। उस्ताद कुर्सी पर बैठे थे, उनके सामने मेज़ पर एक पुराना ट्रंक खुला था। उनके हाथ ट्रंक के अंदर थे।
"बैठ," उन्होंने कहा।
मैं बैठ गया।
वो कुछ देर चुप रहे। फिर उन्होंने ट्रंक मेंउस्ताद अली बक्श ने ट्रंक में हाथ डाला और एक कपड़े में लिपटी चीज़ निकाली। चीज़ छोटी थी, एक हथेली भर। उन्होंने उसे मेज़ पर नहीं रखा। अपनी जाँघ पर रखा और दोनों हाथों से ढक लिया, जैसे कोई बच्चा चिड़िया को पकड़ता है और डरता है कि कहीं उड़ न जाए।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
"अभी नहीं।"
"उस्ताद, आपने मुझे बुलाया। मैं आया। अब कहिए कि ये क्या है।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। बल्ब पीला था और उनके चश्मे पर एक गोल चमक बन रही थी।
"मैंने तुझे बुलाया नहीं," उन्होंने कहा। "मैं तो बैठा था। अपना हिसाब देख रहा था। और फिर मैंने वो सुना।"
"क्या सुना?"
"घंटी।"
मेरी जेब में घंटी थी, पर उस वक़्त वो चुप थी।
"इससे पहले मैंने तुझसे पूछा था कि तेरा घर इतना चुप क्यों है," उन्होंने कहा। "उसका जवाब मुझे नहीं चाहिए था। मुझे यह देखना था कि तू उस सवाल को कितनी देर अपने अंदर रख पाता है। तूने रख लिया। अच्छा किया।"
"उस्ताद—"
"आज रात तूने घंटी से पूछा था ना?" उन्होंने कहा। "बैठकर। अकेले। हाथ में रखकर।"
"आपको कैसे पता?"
"क्योंकि आज रात घंटी ने मेरी दुकान की खिड़की के पास से आवाज़ दी," उन्होंने कहा। "और वो इतनी दूर बजी, इतना दूर, कि मुझे लगा कि मेरे कान मुझसे मज़ाक कर रहे हैं। मैं सत्तर साल का हूँ, मेरे कान अब कम सुनते हैं। पर आज मैंने वो सुना। जो चीज़ कम सुनाई देती है, वो ज़्यादा सच बोलती है।"
वो चुप हुए।
"फिर मैंने सुना कि घंटी ने कहा — तेरा घर चुप क्यों है।"
मेरी नाड़ी फड़की।
"उस्ताद, आपने वो सुना?"
"मैंने वो सुना जो मुझे सुनना था," उन्होंने कहा। "बाकी मत पूछ। वो जवाब मेरा नहीं, तेरा है।"
उन्होंने जाँघ पर रखी चीज़ की तरफ़ देखा। फिर ट्रंक बंद किया। उसकी चेन घिसी और चटकी। उन्होंने उसे खटखटाया, जैसे कोई घड़ी ठीक करता है।
"अभी ये नहीं," उन्होंने कहा। "जब तेरा घर खुलेगा, तब ये खुलेगी।"
"उस्ताद, ये सिलसिला क्या है? आप कुछ बताते हैं, फिर रोक देते हैं। मेरे पापा भी यही करते हैं। मैं आधी-आधी बातों के बीच में जी रहा हूँ।"
उन्होंने मेरी तरफ़ अपना पूरा चेहरा घुमाया।
"अंकुश," उन्होंने कहा। "मैं तुझे आधी बात इसलिए नहीं कहता कि मैं तुझे अधूरा छोड़ना चाहता हूँ। मैं तुझे आधी बात इसलिए कहता हूँ क्योंकि तंत्र भी वही करता है। और तंत्र जो करता है, वो सिर्फ़ मज़ाक नहीं है। वो तरीक़ा है। जो आदमी आधी बात में आगे बढ़ जाता है, वो पूरी बात का हक़दार नहीं होता। तू अभी आधी बात से पूरी बात तक पहुँचने का सफ़र कर रहा है। मैं उस सफ़र में तेरे पास बैठा हूँ, तेरे आगे नहीं चल रहा।"
मैं कुछ नहीं बोला।
"अब सुन," उन्होंने कहा। "पीपल के नीचे दो बुज़ुर्ग बैठते हैं। एक को छड़ी है, एक के हाथ में तस्बीह। पचास साल से दोनों उसी चबूतरी पर आते हैं, एक साथ आते हैं, पर अलग-अलग बैठते हैं। और पचास साल से उस चबूतरी के बीच में एक हाथ भर की जगह खाली है। कोई वहाँ नहीं बैठता। न बच्चे, न बूढ़े। मैं भी नहीं बैठा, पचास साल में एक बार भी नहीं।"
"क्यों?"
"क्योंकि बीच में बैठने वाला जोड़ता है," उन्होंने कहा। "और जोड़ने के लिए तुझे उन दोनों की बात सुननी पड़ेगी, जो पचास साल से कोई नहीं सुन रहा।"
"उनका नाम?"
"बाबा नूर मोहम्मद," उन्होंने कहा। "और लाला रामकिशन।"
उन्होंने अपना चश्मा उतारा और मेज़ पर रख दिया। उनकी आँखें थकी हुई थीं, पर तेज़ थीं।
"जा," उन्होंने कहा। "और जब उन दोनों के बीच बैठे, तो चुप मत बैठना। तंत्र तुझे अंक देगा। पर पहले वो तेरे हाथ में गर्म होगा, और तब गर्म होगा जब तू उनके बीच पहुँच जाएगा।"
मैं उठा।
"उस्ताद," मैंने दरवाज़े पर मुड़कर कहा। "आपके ट्रंक में जो कपड़े में लिपटी चीज़ है — क्या वो भी घंटी है? इलियास की दूसरी घंटी?"
उनका हाथ ट्रंक पर था। उन्होंने उँगली से उसकी धूल हटाई।
"जा," उन्होंने बस इतना कहा।
—
बाहर निकला तो शाम पूरी तरह गली में उतर चुकी थी। पीपल के पत्तों में हवा घुसकर ऐसी आवाज़ कर रही थी जैसे कोई दूर से बच्चे को बुला रहा हो। शबनम आपा की गुमटी पर लालटेन जल चुकी थी, और उसकी कटोरी में दिन भर के सिक्के टनटन कर रहे थे।
मैं गुमटी के पास पहुँचा।
"तेरे लिए नहीं है," शबनम आपा ने सिर उठाए बिना कहा। "मेरी चाय उनके लिए है जो सीधे आते हैं, तिरछे सवालों के साथ नहीं।"
"आपा, एक चाय।"
"अब आया समझ में।"
उन्होंने चाय का गिलास मेरे सामने रखा। फिर मेरी तरफ़ देखा।
"तूने आज शाम गली में क्या किया, मुझे पता है," उन्होंने कहा। "मैं वहाँ नहीं थी, पर मुझे पता है। इस गली में जो भी होता है, मुझे आधे घंटे में पता चल जाता है। कोई बताता नहीं, हवा बताती है।"
"कुछ नहीं किया। बस दो लोग अपनी बात कह रहे थे।"
"अपनी बात कहने से बात नहीं खुलती," उन्होंने कहा। "बात खुलती है जब कोई सुनता है। तू सुनता है। यही तेरी सबसे अच्छी आदत है। और सबसे खतरनाक भी।"
"क्यों खतरनाक?"
"क्योंकि जो सुनता है, उसके पास बहुत बोलते हैं," उन्होंने कहा। "और जिसके पास बहुत बोलते हैं, उस पर बोझ बढ़ता जाता है। तेरे पापा भी सुनने वाले आदमी थे। आज तक किसी को कुछ नहीं बोले।"
वो गमले की तरफ़ मुड़ गईं। मैंने बात बदली, क्योंकि वो मुझे पता थी और अभी इसका वक़्त नहीं था।
"आपा, बच्चे कहाँ हैं?"
"कहाँ होंगे। पीछे।"
"बुला दीजिए। मुझे उनसे काम है।"
उन्होंने मुझे ऐसे देखा जैसे मैंने कुछ गलत कह दिया हो।
"काम?" उन्होंने कहा। "ये दस-चौदह साल के बच्चे हैं। इनका काम पढ़ना है, क्रिकेट खेलना है, और मेरी गुमटी के पीछे बैठकर दुनिया के सबसे बड़े झूठ बोलना है। तू इन्हें क्या काम देगा?"
"आपा, यही तो बात है," मैंने कहा। "मैं इन्हें काम नहीं दूँगा। मैं इनसे मदद माँगूँगा। फ़र्क़ है दोनों में।"
वो एक क्षण रुकीं। फिर पीछे की तरफ़ खड़ी होकर बोलीं।
"ओए! चारों, इधर आ।"
चारों आए। सानिया आगे, उसके पीछे उसका भाई चिंटू, जिसका घुटना फिर से पट्टी में था, फिर गुड्डू जो अपनी जेब से बादाम निकालकर खा रहा था, और सबसे पीछे रफ़ीक़, जो हमेशा ऐसे चलता है जैसे किसी की नक़ल कर रहा हो।
"उस्ताद!" चिंटू बोला। "पंचर?”
"आज नहीं," मैंने कहा।
"तो फिर क्यों बुलाया?"
"क्योंकि आज मुझे तुम चारों की ज़रूरत है।"
चारों एक-दूसरे को देखने लगे। सानिया ने अपनी लाल कवर वाली कॉपी छाती से लगा ली।
"हमसे?" उसने कहा। "आप हमसे मदद माँग रहे हैं?"
"हाँ।"
"बड़े लोग बच्चों से मदद नहीं माँगते।"
"बड़े लोग बेवकूफ़ होते हैं," मैंने कहा। "मैं भी बड़ा हूँ। इसलिए मैं पूछ रहा हूँ।"
गुड्डू ने बादाम चबाते हुए कहा, "क्या करना है?"
"पीपल के नीचे वो चबूतरी है," मैंने कहा। "उसके नीचे, उसके किनारे, उसकी दरारों में — कुछ लिखा है क्या? कुछ खुदा है? कोई नाम, कोई निशान?"
"क्यों?" रफ़ीक़ ने पूछा।
"क्योंकि पचास साल से वहाँ दो बुज़ुर्ग बैठते हैं और बीच की जगह खाली रहती है," मैंने कहा। "और मुझे लगता है कि वो जगह पहले खाली नहीं थी।"
सानिया की आँखें चमकीं। वो कॉपी खोलकर तेज़ी से कुछ लिखने लगी।
"मुझे पता है," वो बोली। "मैंने एक बार देखा था। पत्थर के कोने पर, नीचे की तरफ़, काई के नीचे। मुझे लगा पत्थर की लकीर है। पर वो लकीर नहीं थी।"
"तो जाओ," मैंने कहा। "अंधेरा आ गया है, लालटेन ले जाओ। मुझे वो देखना है। और हाँ — जल्दी। क्योंकि बुज़ुर्ग अभी चबूतरी पर हैं, और मुझे उनके होते हुए ही वहाँ पहुँचना है।"
चारों भागे। शबनम आपा ने उनके पीछे देखा, फिर मेरी तरफ़।
"तू इन बच्चों को किस लाइन में खड़ा कर रहा है, अंकुश?" उन्होंने धीमी आवाज़ में पूछा।
"पता नहीं आपा," मैंने सच कहा। "पर जब मैं छोटा था, कोई मुझे लाइन में नहीं खड़ा करता था। और मुझे लगता है कि इसीलिए मैं आज भी खुद को किसी लाइन में नहीं खड़ा कर पाता।"
वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखती रहीं।
"तेरी माँ आज सुबह आई थी," उन्होंने कहा। "रोटी देने। और उसने मुझसे कहा कि काजल की आँखें लाल हैं और वो कुछ बोलती नहीं।"
मेरा पेट कसा।
"आपा—"
"मैं नहीं कह रही कि तू कुछ कर," उन्होंने कहा। "मैं बस कह रही हूँ कि तू बाहर की चीज़ें जोड़ रहा है और घर की चीज़ें अनजोड़ी पड़ी हैं। जो पहले जुड़ेगा, वही बाद में मज़बूत रहेगा। सोच ले।"
—
बच्चे लौटे। उनके हाथ में लालटेन थी और आँखों में वो चीज़ थी जो बड़ों की आँखों में नहीं होती — बिना डरे देखने की आदत।
"मिला," सानिया ने कहा और कॉपी खोली। "पत्थर के कोने पर, काई के नीचे। दो नाम। एक तरफ़ 'नूर', दूसरी तरफ़ 'राम'। और बीच में —" वो रुकी, अपनी उँगली से काग़ज़ पर बना निशान दिखाया। मैंने उसे देखा। दो हाथ जुड़े हुए, जैसे कोई मिलता है।
"ये निशान क्या है?" गुड्डू ने पूछा।
"ये दोस्ती का निशान है," मैंने कहा। "ये लोग पत्थर पर अपने नाम साथ खुदवाते हैं जब वो अलग नहीं होना चाहते।"
"तो ये दोनों दोस्त थे?"
"हाँ," मैंने कहा। "और शायद अब भी हैं। बस भूल गए हैं।"
चिंटू ने पूछा, "उस्ताद, भूलने से दोस्ती टूटती है?"
मैं एक पल रुका। अच्छा सवाल था। दस साल के बच्चे अच्छे सवाल पूछते हैं, क्योंकि वो अभी नहीं सीखे कि कौन सा सवाल डर पैदा करता है।
"नहीं," मैंने कहा। "भूलने से दोस्ती नहीं टूटती। भूलने से बस दोस्ती पुरानी हो जाती है। टूटती है जब कोई याद करके भी नहीं बोलता।"
—
चबूतरी पर पहुँचा तो दोनों वहाँ थे। बाबा नूर मोहम्मद एक सिरे पर, सफ़ेद टोपी, हाथ में तस्बीह, आँखें बंद। लाला रामकिशन दूसरे सिरे पर, पीली धोती, गमछा कंधे पर, छड़ी उनके बगल में खड़ी। बीच में वो जगह — एक हाथ भर, खाली। ऐसी खाली कि देखने वाले का दिल भर आए।
मैंने एक कदम बढ़ाया। मुझे लगा कि कोई मुझे रोकेगा। किसी ने नहीं रोका। मैं उनके बीच में गया और बैठ गया।
बाबा नूर ने आँखें खोलीं। लाला जी ने छड़ी कीछड़ी की नोक ज़मीन पर टिकाई और मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे कोई अनजाना आदमी उनके घर के आँगन में बैठ गया हो।
"तू कौन है?" लाला जी ने पूछा। आवाज़ में वो खुरदुरापन था जो सत्तर पार करने के बाद आता है, और उसमें वो चीज़ भी थी जो हर बुज़ुर्ग में होती है — डर और अकड़, दोनों एक साथ।
"अंकुश," मैंने कहा। "साइकिल मरम्मत वाला। गली में दुकान है।"
"साइकिल वाले का यहाँ क्या काम?"
"आप दोनों के बीच में बैठना है," मैंने कहा।
दोनों एक साथ मेरी तरफ़ देखने लगे। मैंने कुछ और नहीं कहा। सिर्फ़ अपना हाथ उस पत्थर पर रख दिया जो मेरे सामने था — जिसके एक कोने पर काई के नीचे नूर खुदा था और दूसरे कोने पर राम, और बीच में वो निशान जिसे बच्चे अभी-अभी लेकर आए थे। दो हाथ जुड़े हुए। एक-दूसरे को पकड़े हुए। जैसे कोई मिलता है और फिर कभी नहीं छोड़ना चाहता।
"ये पत्थर बहुत पुराना है," मैंने कहा। "आप दोनों ने इस पर अपने नाम साथ खुदवाए थे। जो आदमी अपना नाम किसी और के साथ पत्थर पर खुदवाता है, वो उससे दूर नहीं जा सकता। भले बैठक अलग कर ले, भले रास्ते अलग कर ले। नाम तो साथ का साथ रहता है।"
बाबा नूर ने आँखें पूरी खोलीं। उनका हाथ तस्बीह पर रुक गया।
"तूने ये कहाँ देखा?" उन्होंने पूछा।
"बच्चों ने ढूँढा। पत्थर के कोने पर, काई के नीचे।"
लाला जी ने छड़ी फिर ज़मीन पर टिकाई। इस बार ज़ोर से। जैसे कोई अपने ही कमरे में दरवाज़ा बंद करता है।
"अब ये सब बातें पुरानी हैं," वो बोले। "पुरानी बातें जलाकर राख कर देनी चाहिए, ताकि नई हवा आ सके।"
"राख में भी अंगारा बचा रह जाता है, लाला जी," मैंने कहा। "और अंगारा हवा से और भड़कता है। आप दोनों चालीस साल से इस चबूतरी पर बैठते हैं। दो हाथ के फ़ासले पर। न आपने उनसे बात की, न उन्होंने आपसे। ये दुश्मनी नहीं है। दुश्मनी में तो आदमी लड़ता है, चीखता है, कभी-कभी हाथ भी चल जाता है। मगर आप दोनों — आप दोनों चुप हैं। चालीस साल की चुप्पी। इतनी लंबी चुप्पी में आदमी अपने दुश्मन का चेहरा भूल जाता है, बस दुश्मनी याद रहती है। और ये सबसे बड़ी सज़ा है — जब आपको याद भी न रहे कि किस बात पर लड़े थे।"
लाला जी का हाथ छड़ी पर कसा। बाबा नूर ने तस्बीह के दाने उँगलियों में दबा दिए।
मैंने इंतज़ार किया। मुझे पता था, अब मुझे कुछ नहीं कहना है। अब उन्हें बोलना है। मैं सिर्फ़ वो आदमी हूँ जो बीच में बैठा है, जिसने रास्ता बनाया है, और अब रास्ते पर खड़ा है।
तभी लाला जी ने कुछ कहा। बहुत धीमे। मुझे सुनने के लिए आगे झुकना पड़ा।
"उसने मेरा पतंग बेच दिया था।"
मैं एक पल के लिए रुक गया। "पतंग?"
बाबा नूर ने तस्बीह नीचे रख दी। उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
"हमारी पतंगों की दुकान थी," वो बोले। "इसी गली के मोड़ पर। 'नूर-राम पतंग महल'। दोनों ने मिलकर खोली थी। बीस साल चलाई। हमारी पतंगें दूर-दूर तक जाती थीं। शादियों में, मेलों में, त्योहारों में। लोग कहते थे कि इस गली की पतंगें आसमान को भी हँसा देती हैं।"
लाला जी ने मुँह फेर लिया। "मेरी पतंगें," उन्होंने सुधारा। "मैंने बनाई थीं।"
"हमने बनाई थीं," बाबा नूर ने कहा। "तू काग़ज़ लाता था, मैं बाँस चीरता था। तेरे हाथ के कटाव और मेरे हाथ की माँज। दोनों मिलकर पतंग बनती थी।"
"अब ये सब क्या—"
"लाला जी," मैंने बीच में कहा, "आगे बताइए। क्या हुआ?"
लाला जी ने छड़ी उठाई, फिर रख दी। "उस साल शहर में पतंगबाज़ी का बड़ा मुक़ाबला था। पाँच सौ रुपये का इनाम। हम दोनों ने महीने भर मेहनत की — एक पतंग बनाई। एक ख़ास पतंग। इतनी हल्की कि हवा से बातें करे, इतनी मज़बूत कि रेशम का धागा भी न काटे। हमने उसका नाम रखा — 'दोस्ती'।"
बाबा नूर ने आँखें बंद कर लीं।
"मुक़ाबले से एक रात पहले," लाला जी ने कहा, "वो पतंग गायब हो गई। मैंने सारी गली छानी। फिर उसे पता चला — इसने बेच दी थी। एक अमीर आदमी को। तीन सौ रुपये में। उसने मुझे बताया ही नहीं। मैंने पूछा, वो चुप रहा। मैंने उसका गला पकड़ा, वो कुछ नहीं बोला। बस मुँह फेरकर बैठ गया। अगले दिन मैंने दुकान का ताला डाल दिया। हम दोनों वहाँ से हट गए। उसने दूसरी जगह दुकान खोली, मैंने नहीं खोली। चालीस साल हो गए।"
मैंने बाबा नूर की तरफ़ देखा।
"आप कुछ नहीं कहेंगे?"
वो चुप रहे। तस्बीह के दाने उनके हाथ में लुढ़कते रहे।
"आज तक नहीं बताया," मैंने कहा। "आपने आज तक नहीं बताया कि पतंग क्यों बेची।"
"कहता तो क्या फ़र्क़ पड़ता?"
"पड़ता," मैंने कहा। "चालीस साल का फ़र्क़ पड़ता।"
बाबा नूर की आँखें खुलीं। उनमें पानी था, पर वो रो नहीं रहे थे। बुज़ुर्ग रोते नहीं, उनकी आँखें बस भर जाती हैं। और फिर वो भरी आँखों से बोलते हैं।
"उस साल मेरी बीवी बीमार पड़ी," उन्होंने कहा। "अस्पताल वालों ने तीन सौ रुपये माँगे। इतने पैसे मेरे पास नहीं थे। दुकान से हमें जितना मिलता था, उससे घर चल जाता था, बचता कुछ नहीं था। तीन दिन मैंने हर किसी के दरवाज़े खटखटाए। नहीं मिले। फिर उस अमीर आदमी की नज़र उस पतंग पर पड़ी — वो बाज़ार में घूमने आया था। उसने पाँच सौ दिए। मैंने बेच दी।"
"फिर तुमने मुझे क्यों नहीं बताया?" लाला जी की आवाज़ ऊपर उठी। "आज तक क्यों नहीं बताया?"
"क्योंकि तू मुझसे पूछता भी नहीं," बाबा नूर ने कहा। "तूने मुझे चोर कह दिया। मुझे पूछा भी नहीं। बस गला पकड़ लिया। बोलना चाहता था, मगर तेरे हाथ में इतनी ताक़त थी कि मेरे गले से आवाज़ निकलती तो दुखती। इसलिए मैं बैठ गया। मैंने सोचा, जो दोस्त बिना पूछे गला पकड़ ले, उसे बताने से क्या फ़ायदा।"
लाला जी की छड़ी हाथ से छूट गई। ज़मीन पर गिरी और लुढ़क गई। वो नहीं उठाए। वो मेरी तरफ़ देखने लगे, जैसे मुझसे कोई जवाब चाहते हों।
"ये सच है?" उन्होंने पूछा।
"आप पूछिए," मैंने कहा।
उन्होंने मुँह फेरकर बाबा नूर की तरफ़ देखा। चालीस साल में पहली बार। सीधे आँखों में।
"सच है?" उन्होंने फिर पूछा।
बाबा नूर ने सिर हिलाया। "चालीस साल से सच ही था। बस तूने कभी पूछा नहीं, मैंने कभी कहा नहीं। दोनों बराबर के गुनहगार हैं।"
बच्चे पीछे खड़े थे। मैंने देखा, चिंटू ने छड़ी उठाकर लाला जी की तरफ़ बढ़ा दी। सानिया ने अपनी लाल कवर कॉपी जेब में रख दी, जैसे कोई तमाशा पूरा हो गया हो। गुड्डू और रफ़ीक़ आगे आकर चबूतरी के किनारे बैठ गए।
लाला जी ने छड़ी पकड़ी, फिर उसे बगल में रख दिया। छड़ी की ज़रूरत उन्हें उस वक़्त नहीं थी। वो ख़ुद खड़े हुए। दो कदम बढ़ाए। बाबा नूर ने भी तस्बीह जेब में रखी और खड़े हुए।
और फिर वो दोनों एक-दूसरे के सामने खड़े थे। चालीस साल बाद। दो हाथ के फ़ासले पर। एक ने हाथ बढ़ाया। दूसरे ने पकड़ा।
मेरी जेब में घंटी बजी। एक बार, फिर दूसरी बार, फिर लगातार — जैसे कोई ताली बजा रहा हो। आवाज़ हल्की और गर्म थी। मैंने हाथ जेब में डाला तो लगा कि घंटी धीमी-धीमी गुनगुना रही है।
"पैंतीस," घंटी ने कहा। बस इतना। फिर चुप।
पैंतीस अंक। एक सौ इक्कीस में पैंतीस जोड़ो तो एक सौ छप्पन होते हैं। इतने अंक पहले कभी एक बैठक में नहीं मिले थे।
मैंने दोनों को गले लगते देखा।
लाला जी की छड़ी फिर ज़मीन पर पड़ी थी, मगर इस बार किसी ने उठाई नहीं। क्योंकि अब उसकी ज़रूरत नहीं थी।
मैं उठा। मेरी आँखों के कोने में कुछ था, पर मैंने साफ़ करने की ज़रूरत नहीं समझी।
मैंने चारों बच्चों की तरफ़ देखा।
"अच्छा किया," मैंने कहा। "अगर आप लोग पत्थर नहीं लाते, ये कभी नहीं खुलता।"
सानिया का चेहरा चमक उठा। "तो अब हम तुम्हारे साथ काम करेंगे, उस्ताद?"
"तुम लोग पहले से ही मेरे साथ काम कर रहे हो," मैंने कहा। "बस अब तुम्हें इसका पता चल गया है।"
चिंटू ने छलाँग लगाई। गुड्डू ने सानिया को कोहनी मारी। रफ़ीक़ हँसने लगा।
तभी मैंने आवाज़ सुनी। बहुत धीमी। बहुत चिकनी। कैंची के फिसलने की आवाज़ जैसी। मैंने मुड़कर देखा।
उस्ताद अली बक्श अपनी दुकान के दरवाज़े पर खड़े थे। सफ़ेद दाढ़ी हवा में झूल रही थी, मोटा चश्मा नाक पर फिसला हुआ, कान पर पेंसिल झूल रही थी। उनका एक हाथ दरवाज़े की चौखट पर था, दूसरा हवा में। जैसे किसी ने उन्हें चलते-चलते पकड़ लिया हो।
वो मेरी तरफ़ नहीं देख रहे थे। वो मेरी जेब की तरफ़ देख रहे थे।
मैंने चारों बच्चों को विदा किया, "जाओ, आपा की गुमटी पर जाकर बैठो, मैं आता हूँ," और उस्ताद की तरफ़ बढ़ा।
मगर उस्ताद ने रास्ता रोक दिया।
"यहाँ मत आ," उन्होंने कहा।
मैं रुक गया।
"रुक जा," उन्होंने कहा, आवाज़ धीमी पर धारदार। "जहाँ खड़ा है, वहीं रुक जा। मेरी दुकान के सामने मत आ। अंदर मत आ। समझा?"
"उस्ताद—"
"मैंने तुझे बोला था न, घंटी को बाज़ार में मत लाना," उन्होंने कहा। "तूने उसे बजने दिया। पूरे चबूतरी पर। पूरे मोहल्ले के सामने। तेरी अक्ल कहाँ गई थी?"
मैं खामोश। मेरे पास जवाब नहीं था। तंत्र के नियम मैं खुद तोड़ नहीं सकता था, पर उस्ताद के नियम भी मेरे अपने नहीं थे। और आज उन्होंने मुझे साफ़ शब्दों में बोला था — बाज़ार में मत लाना। और मैंने आज सरेआम घंटी बजवा दी।
"जो हो गया, सो हो गया," उस्ताद ने कहा। "अब सुन — जब तक पीपल के नीचे सब ख़त्म कर, तू मेरी दुकान के सामने खड़ा मत होना। यही नहीं, गली के मोड़ से भी आगे मत आना। और आज शाम को मेरी दुकान के पीछे आना। अकेले। बात करनी है।"
"अभी क्यों नहीं?"
"क्योंकि देख," उन्होंने सिर हिलाया, दूर कुछ देखते हुए।
मैंने मुड़कर देखा।
गली के मोड़ पर, पीपल की दूसरी तरफ़ से, एक कदम आगे बढ़ता हुआ कोई आ रहा था। छोटा कद, कंधे तक कटे बाल, कैमरा हाथ में, बैग कंधे पर, चाल में जल्दबाज़ी।
मीरा।
वो सीधी मेरी तरफ़ आ रही थी। पीछे दो लड़के थे, जिन्हें मैंने पहले नहीं देखा था — दोनों के हाथ में छोटे काग़ज़ थे।
"अंकुश यादव," उसने चलते हुए ही कहा, आवाज़ तेज़, साफ़, पूरी गली में गूँजती हुई। "मुझे तीन सवालों के जवाब चाहिए। और इस बार मैं खाली हाथ नहीं जाऊँगी।"
लोग चबूतरी पर मुड़कर देखने लगे। बाबा नूर और लाला जी, जो अभी-अभी गले मिले थे, हाथ पकड़े हुए मेरी तरफ़ देख रहे थे। बच्चे गुमटी से भागकर आए। शबनम आपा ने समोसे का तसला नीचे रखकर आँखें सिकोड़ लीं।
"पहला सवाल," मीरा ने कहा और मेरे सामने आकर खड़ी हो गई। "तुमने ये लोगों को क्या बना रखा है? तमाशा? ये दो बुज़ुर्ग चालीस साल से चुप थे। चालीस साल। तुमने एक शाम में उन्हें नचा दिया।"
"मैंने नहीं नचाया," मैंने कहा। "मैंने बस—"
"बस क्या?" उसने काटा। "बस उनका ज़ख़्म खोल दिया? बस उनकी पुरानी बात पूरी गली के सामने बिखेर दी? किस हक़ से? तुम कौन हो? कोई पंच हो? कोई जज हो? कोई भगवान हो?"
लोग खामोश। मैं खामोश। यही वो सवाल था जो मैंने खुद से कई रात पूछा था, पर कभी जवाब नहीं दिया था।
"दूसरा सवाल," मीरा ने आगे कहा और अपना कैमरा ऊपर उठाया। "ये बताओ, तुम्हारी दुकान का काग़ज़ भारद्वाज कंस्ट्रक्शन के ट्रस्ट के नाम पर क्यों है? तुम्हारे पापा ने अंगूठा क्यों लगाया? और ये सब करते-करते तुम लोगों को सच बता रहे हो? लोगों को भरोसा दे रहे हो? जब तुम्हारा ही घर अंगूठे के नीचे दबा है?"
मेरा पेट कसा। ये वो सवाल था जो मैं नहीं चाहता था कि यहाँ पूछा जाए। पर मीरा इंतज़ार करने वाली लड़की नहीं थी।
"तीसरा सवाल," उसने कहा और एक कदम और आगे आई। "तुम्हारी जेब में क्या है जो बजता है? जब भी कोई यहाँ सुलह करता है, तुम्हारी जेब में कुछ बजता है। मैंने आज ध्यान दिया। पिछली बार भी बजा था। पहले भी। तुम छुपा क्या रहे हो, अंकुश यादव?"
मैंने एक गहरी साँस ली।
उस्ताद की तरफ़ देखा। उन्होंने नज़रें फेर लीं और दुकान के अंदर चले गए। पर सिलाई की मशीन की आवाज़ नहीं आई। उनका दरवाज़ा भी बंद नहीं हुआ।
लोग इंतज़ार कर रहे थे। मीरा सामने खड़ी थी, कैमरा उठाए। मैं जानता था — इस बार सच बोलना पड़ेगा। सच के बिना मैं आगे नहीं चल सकता।
"मीरा," मैंने कहा। "तीनों सवालों का जवाब दूँगा। पर एक बात पहले — आज रात पापा के सामने आना, तुमने खुद बोला था। मैं भी वही कह रहा हूँ। आज रात, मेरे घर पर, पापा तुम्हारे सवालों के जवाब देंगे। माँ देंगी। काजल देंगी। मैं दूँगा। पर ये सब पूरी गली के सामने नहीं। एक बार, हमारे घर में। बस।"
मीरा एक पल रुकी। कैमरा धीमा हुआ।
"अच्छा," उसने कहा। "आज रात आठ बजे।"
"ठीक।"
"और ये घंटी वाला सवाल?"
"आज रात," मैंने कहा। "फिर नहीं छिपाऊँगा।"
मीरा ने मेरी आँखों में देखा। कुछ देर। फिर अपना कैमरा बंद किया।
"अगर आज रात आधा भी झूठ निकला, तो कल सुबह पूरे शहर में ये रिकॉर्डिंग चली जाएगी," उसने कहा। "ये तुम्हारा घर उजड़ जाएगा। तुम्हारी दुकान उजड़ जाएगी। और जो लोग आज यहाँ तुम पर भरोसा कर रहे हैं, वो कल तुम्हारे नाम से मुँह फेर लेंगे। सोच लेना।"
वो मुड़ी और चली गई। पीछे वाले दो लड़के भी चले गए।
लोग धीरे-धीरे बिखरने लगे। पर चबूतरी पर बाबा नूर और लाला जी एक-दूसरे का हाथ पकड़े, मेरी तरफ़ देख रहे थे।
मैंने सिर हिलाया — जैसे कह रहा हूँ, सब ठीक है।
वो समझ गए। हाथ नहीं छोड़ा।
—
शाम गहरी हो रही थी। मैं गुमटी की तरफ़ गया। शबनम आपा समोसे का तसला वापस रख रही थीं। मुझे देखते ही बोलीं, "क्या तमाशा लगा रखा है तूने?"
"आपा—"
"मैं तुझे बुरा नहीं कह रही," उन्होंने कहा। "पर सुन। आज सुबह से लेकर शाम तक जो तू कर रहा है, वो बातें अच्छी हैं। मगर हर अच्छी बात का एक भाव होता है। क्या तू भाव चुका रहा है, अंकुश?"
"कौन सा भाव, आपा?"
"घर का भाव," उन्होंने कहा। "जो तू बाहर के दरवाज़े खोल रहा है, वो अंदर के दरवाज़े के लिए है या भूलने के लिए? जो लोगों की चुप्पी तोड़ रहा है, क्या उसने अपनी चुप्पी तोड़ी है? तेरे घर में तीन लोग हैं। तीनों ने एक-एक सच बंद कर रखा है। और तू बाहर के तीन सच खोलकर खुश हो रहा है?"
मैं खामोश। मेरी जेब में घंटी ठंडी थी।
"ये घंटी क्या है?" उन्होंने पूछा।
"पता नहीं, आपा," मैंने सच बोला। "अभी तक पूरा पता नहीं चला।"
"तो जब पता चले," उन्होंने कहा, "तब बताना। मुझे नहीं, अपने घर को।"
शबनम आपा ने मेरी तरफ़ देखा। लंबा। फिर बोलीं, "बैठ, एक कटोरी में समोसे रखे हैं। गरम हैं। खा।"
मैं बैठ गया।
—
मैं उस्ताद की दुकान के पीछे पहुँचा तो रात हो गई थी। दुकान बंद थी। पीछे वाला कमरा खुला था, दरवाज़ा थोड़ा खुला, अंदर पीली रोशनी।
अंदर गया। उस्ताद कुर्सी पर बैठे थे। सिलाई मशीन बंद थी। उनके सामने एक स्टूल रखा था, जैसे वो मेरा इंतज़ार कर रहे थे।
"बैठ," उन्होंने कहा।
मैं बैठ गया।
"आज दिन भर में तूने चार जोड़े जोड़े," उन्होंने कहा। "बंसी-रहमत, कलीम-रामदीन, इब्राहीम-बृजमोहन, हाफ़िज़-ब्रजकिशोर, और अब नूर-रामकिशन। पाँच। एक ही दिन में पाँच। और हर जोड़े पर घंटी बजी।"
"आपने सुना?"
"मैंने सब सुना," उन्होंने कहा। "मेरी दुकान गली के उस कोने में है, पर मेरे कान चबूतरी के पास हैं। मुझे पता था कि आज कुछ बड़ा होने वाला है। इसीलिए मैं तुझसे कहने वाला था — पर मैं देर कर बैठा।"
वो एक पल चुप हुए। फिर बोले, "अब सुन।"
उन्होंने अपने चश्मे को उतारा, रुमाल से पोंछा, और फिर पहने बिना ही मेरी तरफ़ देखा। मुझे उनका चेहरा पहली बार ऐसा दिखा। चश्मे के बिना वो कुछ और लग रहे थे। छोटा। भुरभुरा। जैसे सत्तर साल का लड़का।
"ये घंटी," उन्होंने कहा, "किसी की मिरासी है।"
"मिरासी?"
"विरासत," उन्होंने कहा। "बाप से बेटे को मिलने वाली चीज़। पर सब विरासतें खुशी की नहीं होतीं। कुछ विरासतें ज़िम्मेदारी की होती हैं। और जो विरासत ज़िम्मेदारी की हो, उसका हिसाब भारी होता है।"
उन्होंने घंटी की तरफ़ इशारा किया, जो मेरी जेब में थी।
"ये घंटी किसी एक आदमी की नहीं है। ये दो हाथों की मिरासी है। दो लोगों ने इसे बनाया था। दो लोगों ने इसे चलाया था। और जब वो अलग हुए, तो घंटी भी आधी रह गई — आधी कहीं, आधी कहीं। तेरे हाथ में जो आई है, वो एक हिस्सा है। दूसरा किसी और के पास है।"
"किसके पास?"
"ये मैं अभी नहीं बता सकता," उन्होंने कहा। "क्योंकि अभी तेरे लिए ये जानना ठीक नहीं। अभी तू जितना जानेगा, उससे तेरा काम बढ़ेगा, घटेगा नहीं।"
"उस्ताद—"
"सुन," उन्होंने कहा और हाथ उठाया। "ये जो तू आज कर रहा है, ये अच्छा है। पर एक बात सुन ले। जो घंटी सारे मोहल्ले को सुना दे, वो अपना घर क्यों नहीं सुन पाती?"
मैं ठिठक गया।
"मैंने तुझे आज सुबह पूछा था," उन्होंने कहा। "तेरा घर इतना चुप क्यों है। तूने टाल दिया।"
"उस्ताद—"
"अब टाल मत। जा घर। आज रात। बैठकर। पापा के सामने, माँ के सामने, काजल के सामने, घंटी को हाथ में लेकर पूछ। और सुन। पूरा सुन। तंत्र से पूछ — तेरा घर इतना चुप क्यों है।"
"पूछूँगा," मैंने कहा। "पर आप भी तो कुछ छिपा रहे हैं। आपने घंटी के बारे में सब नहीं बताया। आपके भाई इलियास की बात भी आपने अधूरी छोड़ी।"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। लंबा। फिर वो मुस्कुराए।
"अब सही सवाल पूछा," उन्होंने कहा। "पर आज नहीं। आज तेरे घर का नंबर है। मेरा नंबर बाद में आएगा। जब तेरा घर जुड़ेगा, तब मेरा घर टूटकर सामने आएगा। यही तंत्र का तरीक़ा है। एक-एक करके।"
उन्होंने चश्मा फिर पहन लिया।
"जा," उन्होंने कहा। "देर मत कर। आज रात का सच अगर कल सुबह तक नहीं खुला, तो कुछ ऐसा टूटेगा जो फिर शायद न जुड़े।"
मैं उठ खड़ा हुआ।
दरवाज़े पर पहुँचा, तो उस्ताद ने फिर कहा।
"अंकुश।"
मुड़ा।
"जब पूछे, तो हिम्मत रखना। क्योंकि तेरे घर का तीसरा सच," उन्होंने कहा, "शायद तू खुद हो।"
मैं घर की तरफ़ चला।
पीछे सिलाई मशीन की आवाज़ आई। एक बार। फिर बंद हो गई।
और मेरी जेब में घंटी ठंडी थी। इतनी ठंडी कि मैंने हाथ जेब से बाहर निकाल लिया।
॥
घर की तरफ़ चलते हुए मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी। इतनी ठंडी कि लगा किसी ने उसे रात भर पत्थर के टैंक में डुबोकर रखा हो। मैंने उसे हल्का हिलाया तो अंदर कुछ खड़खड़ाया।
बचपन में मुझे लगता था कि घंटी के पेट में कोई कीड़ा रहता है। माँ कहती थीं, बेवकूफ़ है, घंटी के अंदर लोहा होता है, कीड़ा नहीं। पर आज लगा कि कीड़ा नहीं, कोई बात रहती है अंदर। बात जो बजती है।
उस्ताद की दुकान से गुज़रते वक़्त मैंने पीछे देखा। शटर आधा गिरा था और अंदर पीली रोशनी में सिलाई मशीन चमक रही थी। मशीन चल नहीं रही थी, बस जली हुई थी। जैसे कोई बैठा हो और सुई को हाथ से पकड़कर रोक रहा हो।
घर पहुँचा तो दरवाज़ा खुला था।
माँ रसोई में थीं। चूल्हे की आँच पर उनका चेहरा लाल दिख रहा था। पापा चारपाई के किनारे बैठे थे, हाथ में वही पुराना पेचकस, जिसे वो पिछले कुछ दिनों से पकड़े रहते हैं, जैसे वो कोई हथियार हो। काजल दरवाज़े के पास खड़ी थी, हाथ में माँ की हिसाब की कॉपी।
तीनों ने एक साथ मेरी तरफ़ देखा।
तुम सोच रहे होगे कि अब मैं घंटी निकालूँगा और पूछूँगा — मेरा घर चुप क्यों है। सच कहूँ? मैं घंटी निकालने ही वाला था। हाथ जेब तक गया भी। पर फिर रुक गया।
क्योंकि दरवाज़े पर दस्तक हुई।
ठक। ठक। ठक।
तीन बार। कोई गली वाला तीन बार नहीं खटखटाता। गली वाला दो बार खटखटाता है, और फिर बिना जवाब का इंतज़ार किए अंदर आ जाता है।
मैंने दरवाज़ा खोला।
मीरा खड़ी थी। कंधे तक कटे बाल, कैमरा कंधे पर, हाथ में वही फटा बैग, और आँखों में वो चमक जो किसी को फँसा हुआ देखकर आती है। उसके पीछे गली के मोड़ पर दो लड़के खड़े थे, हाथ में छोटे काग़ज़ लिए। उन्होंने अपने नाम नहीं बताए, और मैंने पूछा भी नहीं।
"आठ बज गए," मीरा ने कहा। "तुमने कहा था, आज रात।"
"पानी पी लो," मैंने कहा। "गली के मोड़ से यहाँ तक आने में भी पसीना आ जाता है, ऐसी गर्मी है।"
"मज़ाक मत करो।"
"मैं मज़ाक नहीं कर रहा, मीरा। मैं सच में पानी का गिलास ऑफर कर रहा हूँ। ये भी एक चीज़ है।"
वो अंदर आई। पापा के सामने खड़ी हो गई। पापा ने उसकी तरफ़ देखा और पेचकस चारपाई पर रख दिया। माँ ने आँच कम की और रसोई से बाहर आकर दरवाज़े की सीख पर टिक गईं।
"तीन सवाल," मीरा ने कहा। "और मुझे सीधे जवाब चाहिए।"
"पूछो।"
"पहला, पीपल के नीचे जो आज हुआ, वो क्या था? बुज़ुर्गों के पुराने ज़ख़्मों को तुम तमाशा बना रहे हो। चालीस साल की चुप्पी, पैंतालीस साल की चुप्पी — और तुम बीच में बैठकर माइक जैसी बातें करते हो। ये क्या है?"
"ये सच है," मैंने कहा।
"सच तमाशा नहीं होता।"
"सही कहा। तमाशा नहीं होता। इसीलिए मैंने किसी को बुलाया नहीं था। वो लोग खुद आए, खुद बैठे, खुद बोले। मैंने सिर्फ़ उनके बीच बैठकर एक सवाल पूछा था। बाकी सब उनका था।"
"दूसरा सवाल। तुम्हारी दुकान उस सूची में सातवें नंबर पर है। ट्रस्ट के नाम पर है। भारद्वाज कंस्ट्रक्शन से जुड़ी है। और तुम्हारे पापा ने उस काग़ज़ पर अंगूठा लगाया है। इसका मतलब?"
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
पापा ने बहुत धीरे कहा, "कल सुबह। दस बजे। दुकान पर।"
मीरा ठिठक गई।
"मैं खुद बोलूँगा," पापा ने कहा। "काग़ज़ दिखाऊँगा। अंगूठा दिखाऊँगा। पर एक बात रखूँगा — जब मैं बोलूँ, तब गली के सब लोग सुनें। मेरे बेटे को बदनाम करके तुम अपना काम नहीं चला सकती।"
मीरा की आँखें थोड़ी सिकुड़ीं। मैंने देखा कि उसका हाथ कैमरे पर गया और फिर हट गया।
"तीसरा सवाल," उसने कहा और सीधे मेरी जेब की तरफ़ देखा। "तुम्हारी जेब में क्या बजता है?"
कमरे में चुप्पी आ गई। माँ ने साड़ी का पल्लू कसकर पकड़ लिया।
मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी। उसने कुछ नहीं कहा।
"कुछ नहीं बज रहा," मैंने कहा। "और अगर कभी बजे, तो ये सवाल का जवाब तुम्हें सबके सामने मिलेगा। कल सुबह। दस बजे। दुकान पर।"
मीरा ने मुझे देखा। लंबा। फिर उसने अपना बैग कंधे पर सरकाया।
"कल सुबह अगर तुमने एक भी बात घुमाई," उसने कहा, "तो मैं सब कुछ शहर भर में डाल दूँगी। जो रिकॉर्डिंग मेरे पास है, वो तुम्हारे हिसाब से नहीं चलेगी।"
"ठीक है," मैंने कहा। "पर एक बात मेरी भी सुन लो। तुम सच की तलाश में हो या सिर्फ़ अपने चैनल के लिए?"
उसका चेहरा कसा।
"क्योंकि," मैंने कहा, "अगर सच चाहिए, तो कल सुबह दस बजे आ जाओ, कैमरा लेकर। और अगर सिर्फ़ खबर चाहिए, तो भी आ जाओ। फ़र्क़ ये पड़ेगा कि तुम किस चीज़ को सामने रखोगी — माइक को या उन लोगों को।"
वो कुछ नहीं बोली। मुड़ी और चली गई। दरवाज़े से बाहर निकलते वक़्त उसने कहा, "अंकुश। जो आदमी सबको जोड़ रहा हो, वो अपने घर से क्यों नहीं शुरू करता?"
और वो चली गई।
मैं दरवाज़े पर खड़ा रह गया।
पीछे से काजल ने कहा, "वो बात वो भी पूछ रही है, भैया। जो उस्ताद पूछ रहे हैं।"
रात को मैंने रोटी खाई। ठंडी थी, पर खाई। माँ ने कुछ नहीं कहा, बस मेरे सामने एक गिलास पानी रखकर चली गईं। पापा देर तक चारपाई पर बैठे रहे, फिर लेट गए।
और मैं सारी रात घंटी को टटोलता रहा, पर उसने कुछ नहीं कहा।
सुबह जब मैं दुकान खोलने निकला, तो हवा में कुछ अलग था। गर्मी वैसी ही थी, पीपल वैसा ही, नाली वैसी ही। पर गली की आवाज़ बदली हुई थी। जो लोग रोज़ 'राम-राम' कहकर निकल जाते थे, वो आज रुक रहे थे। मुझे देख रहे थे। कुछ हँस रहे थे, कुछ पूछ रहे थे — बेटा, कल तो कुछ बड़ा हुआ पीपल के नीचे?
क्या हुआ था, ये कोई ठीक से नहीं बता रहा था। सबको लग रहा था कि कुछ हुआ है और कुछ नहीं हुआ।
शबनम आपा की गुमटी पर बच्चों की टोली जमा थी। सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू। चारों के हाथ में चाय के गिलास और आँखों में वो भाव जो बड़ों के चेहरे पर दस साल बाद आता है।
मैं वहाँ गया।
"उस्ताद," सानिया ने कहा और मुझे किनारे खींच लिया। "आज हमने कुछ काम किया है। सच में।"
"क्या काम?"
"पहले बताओ, चाय पियोगे?"
"पहले बताओ क्या काम।"
चिंटू आगे आया। उसकी आँखों में वो चमक थी जो पुलिस वालों के चेहरे पर फ़िल्मों में होती है।
"चबूतरी पर दो बुज़ुर्ग हैं," उसने कहा। "एक मंज़ूर चाचा, दूसरे बसंत काका। दोनों एक ही पीपल के नीचे बैठते हैं, दोनों एक ही दिशा में देखते हैं, पर बारह साल से एक-दूसरे से एक शब्द नहीं बोले।"
"बारह साल?" मैंने कहा।
"बारह साल," सानिया ने कहा। "और सबसे अजीब बात — दोनों दोनों के लिए चाय मँगाते हैं। मंज़ूर चाचा चाय का पैसा देते हैं और कहते हैं, वो वाले को भी दे दो। मतलब बसंत काका को। और बसंत काका भी वही करते हैं।"
"और मुझे लगता है," चिंटू ने कहा, "कि ये सब एक कटोरे की वजह से है।"
मैं रुक गया।
"कटोरा?"
"मैंने देखा है," गुड्डू ने कहा। "मंज़ूर चाचा के घर में, दरवाज़े के ऊपर वाले खूँटे पर, मिट्टी के कटोरे का आधा हिस्सा टँगा है। और उस पर फूल रखा है। सूखा फूल। जैसे कोई तस्वीर हो।"
"और बसंत काका के घर में भी," रफ़ीक़ ने कहा। "मेरी बहन उनके यहाँ झाड़ू लगाती है। वो कहती है, बाबा के पलंग के नीचे मिट्टी के कटोरे का आधा टुकड़ा काग़ज़ में लपेटकर रखा है और किसी को छूने नहीं देते।"
मैंने घंटी को जेब में छुआ। अभी भी ठंडी।
"आपा," मैंने कहा, "इनके लिए चाय और समोसे। मेरे हिसाब से।"
शबनम आपा ने चिमटी उठाई। "ले। पर सुन — आज तेरे हिसाब से नहीं, आज बच्चों के हिसाब से। इन्होंने कल शाम से मेरे पास आकर चार खबरें दी हैं। इनमें से एक खबर भी झूठी नहीं है। ये पहली बार है।"
चारों बच्चे मुस्कुरा दिए।
"एक बात कहूँ, अंकुश?" आपा ने धीरे से कहा। "बाहर के सच खोलते-खोलते घर का भाव मत बेच देना। सच बिकता नहीं, पर भाव बिक जाता है। और मैंने सुना है कल रात तेरे घर कोई आई थी।"
"मीरा आई थी।"
"और काजल की आँखें लाल थीं। ये मैंने देखी हैं। तू उन्हें सजा न समझ। बच्चे जब दूर तक जाते हैं, तो घर में कोई बैठा रह जाता है।"
वो चाय बनाने लगी।
मैं चबूतरी की तरफ़ चला।
पीपल के नीचे दोनों बुज़ुर्ग बैठे थे। मंज़ूर चाचा एक सिरे पर, सफ़ेद कुर्ता, कंधे पर रुमाल, हाथ में वो लोहे की बैसाखी जिसे वो चलने के लिए नहीं, सहारा देने के लिए पकड़ते हैं। बसंत काका दूसरे सिरे पर, दुबले, टोपी आँखों तक, हाथ में एक छोटा सा कपड़ा जिसे वो बार-बार मोड़ रहे थे।
दोनों के बीच में पत्थर का वो हिस्सा खाली था, जहाँ कोई नहीं बैठता। बारह साल से कोई नहीं बैठा।
मैं गया और बीच में बैठ गया।
दोनों ने मेरी तरफ़ देखा।
"बैठना है?" मंज़ूर चाचा ने कहा। "बैठ जा। पर ये जॉइंट तेरे बाप ने नहीं बनाया, इसलिए यहाँ मुफ़्त में कुछ ठीक नहीं होगा।"
"मैं चीज़ ठीक नहीं करने आया, चाचा," मैंने कहा।
"तो?"
"मैं कटोरा लेने आया हूँ।"
दोनों एक साथ रुक गए।
बसंत काका का हाथ जो कपड़ा मोड़ रहा था, वहीं रुक गया। मंज़ूर चाचा ने बैसाखी को ज़मीन पर सीधा रखा।
"कौन सा कटोरा?" मंज़ूर चाचा ने कहा।
"वो जो आपके दरवाज़े के ऊपर खूँटे पर टँगा है। फूल के साथ।"
मंज़ूर चाचा का चेहरा बदल गया। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, फिर बसंत काका की तरफ़। और बसंत काका ने भी उनकी तरफ़ देखा।
बारह साल में पहली बार।
"अंकुश," मंज़ूर चाचा ने कहा, और उनकी आवाज़ पहली बार सख़्त थी। "इस गली में मैंने आज तक किसी को अपने घर की चीज़ों के बारे में बात करते नहीं देखा। ये बात बाहर कैसे गई?"
"बच्चों ने देखा," मैंने कहा। "बच्चे सब देखते हैं, चाचा। ये इस गली की सबसे तेज़ आँखें हैं।"
"तो बच्चों को बंद कर।"
"क्यों?"
"क्योंकि वो मेरा है।"
"और आधा?" मैंने कहा और बसंत काका की तरफ़ देखा। "वो भी आपका है?"
बसंत काका ने कपड़ा मोड़ना बंद कर दिया। उन्होंने मुझे देखा। दुबले चेहरे पर वो चुप्पी थी जो इंसान को तोड़ती नहीं, बस अंदर धँसाती रहती है।
"बेटा," उन्होंने कहा, "तू नया है इस बात में। छोड़ दे।"
"नहीं छोड़ूँगा।"
"क्यों नहीं छोड़ेगा?"
"क्योंकि आप दोनों बारह साल से एक ही पीपल के नीचे बैठते हैं," मैंने कहा। "एक ही छाँव में। और एक-दूसरे को देखते भी नहीं। ये सज़ा नहीं है, चाचा। ये आदत है। और आदत का तोड़ना तंत्र का काम है, मेरा नहीं।"
दोनों चुप हो गए।
मैंने सीधे बात की, क्योंकि इन दोनों के सामने घुमाने का कोई फ़ायदा नहीं था।
"मुझे भूरा के बारे में बताइए।"
मंज़ूर चाचा का हाथ बैसाखी पर कस गया। बसंत काका ने अपना मुँह दूसरी तरफ़ कर लिया।
"किसने कहा?" मंज़ूर चाचा ने धीमे से कहा।
"किसी ने नहीं कहा। मैंने अंदाज़ा लगाया। आप दोनों रोज़ चबूतरी पर आते हैं और दोनों रोज़ रोटी के टुकड़े लाते हैं जो कोई नहीं खाता। मैंने तीन दिन से देखा है। रोटी यहीं पड़ी सूखती है। आप दोनों किसी को खाना खिलाते थे।"
चबूतरी पर लंबी चुप्पी छाई।
बसंत काका ने कपड़ा हाथ में लपेटा और बोले, "भूरा एक कुत्ता था। गली का। किसी का नहीं था। पर दो लोगों का था।"
"मैं रोज़ उसे दूध देता था," मंज़ूर चाचा ने कहा, और उनकी आवाज़ अचानक नरम हो गई। "और ये रोज़ रोटी देता था। हम दोनों की आपस में कभी बात नहीं हुई, पर भूरा एक दिन में दो घर खाता था। और खाते वक़्त पूँछ हिलाता था। वो पूँछ — वो पूँछ किसी कीमत पर नहीं बिकती।"
"फिर क्या हुआ?" मैंने पूछा।
बसंत काका ने कहा, "ग्यारह दिसंबर की रात थी। या बारह। मुझे याद नहीं। ठंड बहुत थी। भूरा नाली के उस पार गिरा पड़ा था, टेम्पो ने उसे बुरी तरह मारा था। मैं पहले पहुँचा। फिर ये आया।"
"और तुम खड़े रहे," मंज़ूर चाचा ने कहा।
मैंने देखा — उन्होंने बारह साल में पहली बार उसे सीधे देखकर कहा था।
"तुम खड़े रहे," मंज़ूर चाचा ने दोहराया। "मैंने सोचा तुम उठाओगे। तुम बड़े हो, तुम्हारी ज़ुबान चलती है, तुम बोल लोगे। मैंने सोचा ये उठाएगा। पर तुमने हाथ नहीं बढ़ाया।"
"मैंने हाथ नहीं बढ़ाया," बसंत काका ने कहा, और उनकी आवाज़ काँप गई, "क्योंकि मुझे लगा कि तू पहले पहुँचा था, तो तू उठाएगा। और मैं अगर हाथ बढ़ा दूँ, तो तू कहेगा — देखो, ये तो पहले भी नहीं आया था, आज आ गया। बात की बात में बारह साल की बात बन गई।"
मैं चुप बैठा रहा।
"फिर एक आदमी आया," मंज़ूर चाचा ने कहा। "अगली गली का। उसने भूरा को उठाया और अपने टेम्पो में रख लिया। हम दोनों खड़े देखते रहे। और वो चला गया।"
"और उसके बाद?"
"उसके बाद," मंज़ूर चाचा ने कहा, "मैंने ये कटोरा पटका।" उन्होंने बसंत काका की तरफ़ देखा। "तेरे पैरों पर। और तूने आधा उठा लिया। और मैंने आधा। और हम दोनों ने सोचा कि हम दुश्मन हैं।"
"हम दुश्मन नहीं थे," बसंत काका ने कहा। "हम शरमिंदे थे। और शरमिंदा आदमी दूसरे पर गुस्सा करके अपनी शर्म छिपाता है।"
मैंने दोनों की तरफ़ देखा और अपनी जेब से घंटी निकाल ली। उसे चबूतरी पर रखा। वो ठंडी थी।
"एक बात कहूँ?" मैंने कहा। "आप दोनों मुझसे बड़े हैं, मैं आपको सिखाने नहीं आया। पर मैंने आज आपकी गली में कई लोगों को देखा, जो अपने बच्चों की ग़लती को पूरे जीवन ढोते रहे और कभी मुँह नहीं खोला। और एक बात मैं जान गया हूँ — माफ़ी माँगने के लिए बड़ा होना पड़ता है। और सच बोलने के लिए उससे भी बड़ा।"
दोनों खामोश रहे।
"चाचा," मैंने कहा, "आपके घर के खूँटे पर कटोरे का आधा टुकड़ा है। उस पर सूखा फूल रखा है। ये सज़ा नहीं है। ये इंतज़ार है। और इंतज़ार इंसान की आधी ज़िंदगी खा जाता है।"
"और तेरे पास क्या है?" बसंत काका ने पूछा। "तेरे पास कुछ है जो तू किसी पुराने खूँटे पर टाँगकर रखता है?"
मैं रुक गया।
"हाँ," मैंने कहा। "बहुत कुछ। इसीलिए मैं आपको समझ सकता हूँ।"
मंज़ूर चाचा ने मेरी तरफ़ देखा। फिर वो धीरे से उठे। बैसाखी ली और बिना कुछ कहे घर की तरफ़ चले। बसंत काका ने उन्हें जाते देखा।
"नहीं," मैंने धीरे से कहा, "वो जा रहे हैं, भाग नहीं रहे। देखिए, वो खूँटे वाली तरफ़ जा रहे हैं।"
बसंत काका बैठे रहे।
मंज़ूर चाचा कुछ मिनट में लौटे। हाथ में कटोरे का आधा हिस्सा था, काग़ज़ में लपेटा हुआ, ऊपर सूखा गुलाब।
बसंत काका खुद उठे। कुछ नहीं बोले। अपने घर गए। लौटे तो हाथ में दूसरा आधा था, मिट्टी के रंग का, किनारे से चटका हुआ।
मैंने दोनों को चबूतरी के बीच रखने को कहा।
दोनों हिस्से रखे गए। बीच में उँगली जितनी दरार थी।
मैंने घंटी उठाई। और छोटी सी आवाज़ में बजा दी।
टन।
दोनों ने ध्यान से देखा।
घंटी ने कहा — "पूछ।"
"मंज़ूर चाचा," मैंने कहा। "एक सच बोलिए। अपना। अपने बारे में। दूसरे के बारे में नहीं।"
मंज़ूर चाचा ने बसंत काका की तरफ़ देखा। उनका गला सूख रहा था। उन्होंने बैसाखी पर हाथ रखा और बोले, और आवाज़ बहुत धीमी थी, जैसे घर के अंदर से आ रही हो।
"उस रात मैंने कटोरा पटका, ये मैंने तुझे इल्ज़ाम देने के लिए नहीं किया था। मैं अपने आप पर गुस्सा था। क्योंकि जब भूरा पड़ा था, तो मैंने हाथ बढ़ाने से पहले एक बात सोची थी। मैंने सोचा — अगर मैंने इसे गोद में उठा लिया, तो गली के लोग क्या कहेंगे? एक बुड्ढा, एक कुत्ते को उठाकर रो रहा है। मैं उम्र भर की इज़्ज़त को उस पल से बड़ा मान बैठा। और आज बारह साल बाद मैं कहता हूँ — मुझे उस दिन रोना चाहिए था। इज़्ज़त का क्या है, वो दिन के साथ बदल जाती है। पर वो कुत्ता था, वो नहीं बदलता।"
बसंत काका ने आँखें बंद कर लीं।
"मेरी बारी," उन्होंने कहा। "मैंने उस दिन हाथ नहीं बढ़ाया क्योंकि मैंने सोचा कि तू उठाएगा। और मैंने मन में ये भी सोचा — ये अगर उठा ले, तो मुझे कहना पड़ेगा कि तूने उठाया, तू बड़ा आदमी है। मुझे अपनी जगह छोटी लगी। तीस साल का पड़ोसी है, पर उस दिन मैंने अपनी जगह को भूरा से बड़ा मान लिया। ये मेरी ग़लती थी। मैं माफ़ी माँगता हूँ।"
मंज़ूर चाचा ने उनका हाथ पकड़ लिया।
और तभी चबूतरी पर एक आवाज़ आई। बहुत छोटी। जैसे दो मिट्टी के टुकड़े एक-दूसरे को छूकर मान गए हों।
दरार बंद हो गई थी।
मैंने कटोरा उठाया। जुड़ा हुआ था, पर बीच में एक पतली लकीर दिख रही थी, जैसे किसी पुराने ज़ख़्म का निशान।
"ये निशान क्यों रह गया?" मंज़ूर चाचा ने पूछा।
"क्योंकि जुड़ी चीज़ पर निशान रहता है, चाचा," मैंने कहा। "निशान मिटाना झूठ होता। निशान रहने देना सच।"
और घंटी बजी।
दो बार। छोटी। और फिर उसने कहा — "अठारह।"
मैंने घंटी को हाथ में लिया। अब वो गर्म थी।
पीछे से किसी ने खाँसा।
मैं मुड़ा।
उस्ताद अली बक्श अपनी दुकान के दरवाज़े पर खड़े थे। हाथ में कैंची। मोटा चश्मा कान पर, पेंसिल उसी चश्मे में फँसी हुई। वो बाहर निकले थे — आधे कदम गली में, आधे दुकान में, जैसे कोई चलते-चलते रुक जाए।
वो चबूतरी की तरफ़ देख रहे थे। उनकी नज़र मेरे हाथ पर थी। घंटी पर।
और उनका चेहरा — मैंने उनका चेहरा पहले कभी ऐसा नहीं देखा था। वो पीला नहीं पड़े थे, वो भूरे पड़ गए थे — जैसे किसी पुराने काग़ज़ पर पानी गिर जाए और स्याही फैल जाए।
फिर उन्होंने कैंची दुकान की मेज़ पर रखी। बिना आवाज़। बहुत धीरे। जैसे काँच की चीज़ रखते हों।
और फिर बोले, "अंदर आ।"
मैं चबूतरी से उठा। कटोरा मंज़ूर चाचा के हाथ में दिया। बसंत काका कुछ कहने को हुए, पर मैंने सिर हिला दिया — अभी नहीं।
उस्ताद की दुकान के अंदर हमेशा जैसी हवा होती है — कपड़े की, इस्तरी की, और उस पुरानी सिलाई मशीन के तेल की। ऊपर टीन की छत पर दोपहर की धूप पड़ी थी, तो अंदर भट्ठी जैसी गरमी थी। पर उस्ताद को गरमी से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। वो सत्तर साल से इसी भट्ठी में सिलते आ रहे हैं।
उन्होंने दरवाज़ा आधा बंद किया।
फिर मेरी तरफ़ देखा।
"घंटी निकाल।"
मैंने जेब से घंटी निकाली। दोपहर की रोशनी में वो पीतल और भी पुराना लग रहा था, जैसे दादा के हाथों की चमक अभी भी उस पर महीन परत बनकर बैठी हो।
उस्ताद ने घंटी को हाथ नहीं लगाया। सिर्फ़ देखा। देखते हुए उनकी साँस तेज़ हो गई।
"तूने इसे चबूतरी पर क्यों बजने दिया?"
"मैंने नहीं बजाई, उस्ताद। वो खुद बजी।"
"खुद?"
"मैं कटोरा जोड़ रहा था। मंज़ूर चाचा और बसंत काका मिल रहे थे। तभी बजी। मैंने हाथ भी नहीं लगाया।"
उस्ताद ने आँखें बंद कीं। होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं आई। जैसे कोई पुरानी नमाज़ पढ़ रहे हों, या कोई पुरानी चीज़ याद कर रहे हों।
फिर बोले, "मैंने कहा था — बाज़ार में मत दिखाना।"
"पर ये आपकी गली है, उस्ताद। बाज़ार तो आगे है।"
उन्होंने आँखें खोलीं और मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैंने कुछ बहुत बड़ी बेवकूफ़ी कह दी हो।
"गली भी बाज़ार है, बेटा। जिस दिन गली में दस आदमी बैठे हों, उस दिन गली बाज़ार है। और जिस दिन चबूतरी पर एक भी आदमी बैठा हो, उस दिन भी गली बाज़ार है। बाज़ार जगह नहीं होता। बाज़ार आँखें होता है। जितनी आँखें, उतना बाज़ार।"
वो अपनी कुर्सी पर बैठ गए। मशीन के पास वाली कुर्सी। लकड़ी की, जिसकी एक टाँग में काग़ज़ दबाया हुआ है।
"तेरे हाथ में क्या होता है?" उन्होंने पूछा।
"मतलब?"
"जब बजती है। तेरे हाथ में। कुछ होता है?"
मैं ठिठका। मैंने कभी सोचा नहीं था कि किसी को यह दिखता होगा।
"गरम हो जाती है," मैंने कहा। "जब बजती है, तो जेब में गरम हो जाती है। जैसे कोई हाथ पकड़कर खींच रहा हो।"
उस्ताद ने धीरे से सिर हिलाया। एक बार। फिर दूसरी बार। जैसे किसी पुरानी बात की पुष्टि हो रही हो।
"कितने अंक?" उन्होंने कहा।
मैंने घंटी को देखा।
"अठारह।"
"अठारह," उन्होंने दोहराया। "और पहले?"
"तीस।"
"तीस कहाँ से?"
"इकतालीस और अट्ठारह से…"
उस्ताद ने हाथ उठाया।
"रुक। मुझे अंकों का हिसाब मत सुना। मैंने पचास साल पहले वो हिसाब छोड़ दिया था। अब मुझे हिसाब नहीं, सिर्फ़ तेरी आवाज़ सुननी है। अंक तेरे हैं। हिसाब तेरा। पर एक बात याद रख — अंक कभी सीधी लाइन में नहीं चलते। वो खड़े होते हैं, गिरते हैं, फिर खड़े होते हैं। जो आदमी अंकों को सीढ़ी समझता है, वो गिर जाता है। जो नदी समझता है, वो बहता रहता है।"
मैंने घंटी जेब में रख ली। अब वो ठंडी थी।
"उस्ताद," मैंने कहा, "आपने पचास साल पहले ये घंटी चलाई थी।"
वो चुप रहे।
"आपने बताया था — मिरासी, दो हाथों की चीज़, भाई इलियास, दूसरी घंटी। पर आपने ये नहीं बताया कि आपने इसे क्यों छोड़ा। और ये भी नहीं बताया कि जब मैंने आज इससे बुज़ुर्गों के जोड़े किए, तब आप दरवाज़े पर खड़े क्यों थे। आप सुन रहे थे। हर बार सुन रहे थे।"
उस्ताद ने अपना मोटा चश्मा उतारा। रुमाल निकाला। पोंछा। फिर पहना।
"मैं सुन रहा था," उन्होंने कहा। "क्योंकि ये आवाज़ मैंने पचास साल से नहीं सुनी थी। और आज जब सुनी, तो लगा कि मेरी उम्र के पचास साल मेरे सामने से वापस चले गए, एक-एक करके, जैसे कोई पुरानी फ़िल्म उलटी चल रही हो।"
वो उठे। कपड़ों के ढेर के पास गए। उसमें से एक पुराना कुर्ता उठाया, फिर रख दिया। जैसे कुछ ढूँढ रहे हों जो वहाँ नहीं है।
"आज मत पूछ," उन्होंने कहा। "आज तेरा दिन है।"
"पर उस्ताद—"
"अंकुश।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "तेरे घर से बात शुरू होती है। मेरी बात बाद में होगी। पहले तू अपना घर खोल। फिर मेरा घर। यही तंत्र का तरीक़ा है।"
मैं कुछ कहने को था कि दरवाज़े पर खटपट हुई।
दरवाज़ा खुला और चार सिर एक के ऊपर एक दिखाई दिए।
चिंटू सबसे नीचे। उसके ऊपर रफ़ीक़। उसके ऊपर गुड्डू। और सबसे ऊपर सानिया, जिसकी लाल कवर कॉपी उसके हाथ में थी और आँखों में ऐसी चमक कि लगा किसी ने उसे ताज पहना दिया हो।
"उस्ताद!" सानिया ने कहा। "शबनम आपा ने बुलाया है। कह रही हैं चाय ठंडी हो रही है और आपका चेहरा देखना है।"
उस्ताद ने बच्चों को देखा। फिर मुझे देखा।
"जा," उन्होंने कहा। "चाय पी। और बच्चों को अपने साथ रख। आज के बाद ये तेरे हाथ हैं।"
मैं बाहर निकला।
गली में दोपहर अब भी तेज़ थी। पीपल की छाया उस वक़्त थोड़ी दूर चली गई थी, जैसे कोई चादर समेट रहा हो।
शबनम आपा की गुमटी पर भाप उठ रही थी।
और शबनम आपा खुद चिमटी हाथ में लिए खड़ी थीं, आँखें सिकुड़ी हुईं — वो चेहरा, जो कहता है कि हालत ठीक नहीं है लेकिन मैं अभी पूछने वाली नहीं।
"आ," उन्होंने कहा। "बैठ। चारों को भी बैठा।"
मैं बैठा। बच्चे मेरे आसपास। चिंटू ने मेरा घुटना छुआ और फिर हाथ खींच लिया, जैसे माफ़ी माँग रहा हो।
"अंकुश," शबनम आपा ने कहा, "काजल आज सुबह यहाँ से गुज़री थी। उसकी आँखें लाल थीं। रोई हुई। मुझसे बोली कुछ नहीं, पर मैं अंधी नहीं हूँ।"
मैंने चाय का गिलास उठाया। एक घूँट लिया। जल गया, पर कुछ नहीं बोला।
"माँ का सच है," मैंने कहा। "घर में।"
शबनम आपा के हाथ में चिमटी रुकी।
"तो तुम सब चबूतरी पर क्या कर रहे थे? मंज़ूर और बसंत का झगड़ा? उस बुड्ढे कटोरे का?"
"कटोरा अब जुड़ गया।"
"हूँ।"
"आपा," मैंने कहा, "आपने कभी सोचा कि ये गली इतनी जल्दी क्यों भर जाती है? जब कुछ होता है, तो सब पहले से वहाँ क्यों होते हैं?"
"क्योंकि कोई काम नहीं है," उन्होंने कहा। "जब कोई काम नहीं होता, तो आदमी की सबसे बड़ी नौकरी पड़ोसी की खबर हो जाती है।"
"तो अब काम है," मैंने कहा।
मैंने सानिया की लाल कवर कॉपी उठाई। उसमें छह ट्रक, पीली पट्टी, अस्पताल की दीवार के पास गड्ढा, रात आठ बजे की सफ़ेद गाड़ी — सब लिखा था। सानिया की लिखाई टेढ़ी थी, पर साफ़। जैसे उसने हर अक्षर सोच-सोचकर लिखा हो।
"चारों," मैंने कहा।
चारों सीधे हो गए।
"आज मुझे तुम्हारी ज़रूरत है। पहली बार। सच में।"
सानिया की आँखें भड़कीं।
"क्या करना है?"
"मुझे पीपल के नीचे देखना है। नबी चाचा और श्यामलाल काका। दोनों आज सुबह से वहाँ हैं। दोनों ने एक-दूसरे को नहीं देखा। दोनों ने एक-दूसरे की तरफ़ पीठ करके चबूतरी पर जगह ली है। और मुझे लगता है, ये बात पचास साल पुरानी है।"
शबनम आपा ने चिमटी नीचे रखी।
"नबी और श्यामलाल?" उन्होंने कहा। "मैंने उन्हें बीस साल से ऐसे ही देखा है। मुझे लगा हमेशा से ऐसे ही रहे होंगे।"
"नहीं, आपा," सानिया ने कहा। "मेरी दादी कहती थीं। वो दोनों कभी एक साथ ठेला चलाते थे। सुबह से रात तक। एक ही ठेले पर चाय और बिस्किट। और फिर एक दिन ठेला बंद हो गया। दादी कहती थीं — उस दिन के बाद दोनों ने एक-दूसरे को देखना बंद कर दिया।"
"क्यों?" मैंने पूछा।
"दादी को भी नहीं पता था," सानिया ने कहा। "बस इतना कहती थीं कि एक डिब्बा गायब हो गया था।"
"डिब्बा?"
"पैसों का डिब्बा।"
मैं थोड़ा आगे झुका।
तुम सोच रहे होगे कि एक डिब्बे का क्या है — औरत दादी के ज़ुबान से निकली बात, साठ साल पुरानी। पर सुनो, गली में डिब्बे सिर्फ़ पैसे नहीं रखते। डिब्बे झगड़े भी रखते हैं। और जो डिब्बा चोरी हो, वो ताउम्र चोरी नहीं रहता, वो ताउम्र एक सवाल बन जाता है। और सवाल जिसके सिर पर टिक जाए, उसका जीना मुश्किल हो जाता है।
"गुड्डू," मैंने कहा।
गुड्डू सीधा बैठ गया, जैसे स्कूल में उस्ताद ने नाम पुकारा हो।
"तू उनके सबसे नज़दीक बैठता है। कल क्या हुआ था?"
"कल कुछ नहीं," गुड्डू ने कहा। "आज सुबह हुआ। श्यामलाल काका आए और बैठते हुए बोले — ये चबूतरी ठंडी है। और नबी चाचा ने कहा — ठंडी नहीं है, तुम्हारी नज़र में ठंडी है।"
"फिर?"
"फिर दोनों चुप हो गए। दो घंटे। मैंने गिना।"
"रफ़ीक़?"
"बाद में नबी चाचा ने अपनी तस्बीह उठाई और तस्बीह की एक गोली चबूतरी पर गिर गई, वो मेरे पास आई। मैंने उन्हें देने के लिए उठाया, तो श्यामलाल काका ने कहा — रख दे वहीं, वो अपनी चीज़ें खुद उठाते हैं। और नबी चाचा ने सुना और कुछ नहीं बोले।"
"चिंटू?"
चिंटू सबसे छोटा है। उसने उत्साह से कहा, "मैंने एक बात देखी!"
"बता।"
"श्यामलाल काका की छड़ी का नीचे वाला रबर घिसा हुआ है। और जब वो उठे, तो उन्होंने छड़ी नबी चाचा की तरफ़ रखी — नहीं, मतलब, ज़मीन पर। और नबी चाचा ने छड़ी उठाकर अपनी तरफ़ रख दी, जैसे कहीं गिर न जाए। दोनों ने एक-दूसरे को नहीं देखा। पर दोनों को पता था।"
मैंने चारों को देखा।
शबनम आपा ने चाय के चार और गिलास रखे। कोई नहीं बोला।
"तो सुनो," मैंने कहा। "मुझे तुम चारों से एक काम चाहिए। आज शाम तक नबी चाचा के घर के पास जाना है और पता करना है कि उनका कोई बेटा, भतीजा, कोई जो उस वक़्त का हो, क्या कहता है। पूछना ऐसे — जैसे बच्चे पूछते हैं। बड़ों की तरह मत पूछना।"
"मैं पूछता हूँ," सानिया ने कहा।
"और सुबह आठ बजे गुमटी पर मिलना। नौ नहीं। आठ। अपनी कॉपी लाना। जो कोई भी बोले, लिखना। जो कोई भी कुछ छुपाए, वो भी लिखना।"
चारों उठ गए, जैसे कोई सेना हो।
शबनम आपा ने उनके पीछे देखा और फिर मेरी तरफ़ आईं।
"अंकुश," उन्होंने धीरे से कहा। "ये गली का काम है। तू इसमें बच्चों को क्यों ला रहा है?"
"क्योंकि आपा," मैंने कहा, "आज सुबह मुझे पता चला कि मैं अकेले कुछ नहीं कर सकता। और मुझे इसका आदी होना पड़ेगा। जल्दी।"
शबनम आपा मेरी तरफ़ देखती रहीं।
"तू बदल रहा है," उन्होंने कहा। "पर सुन। बदलना अच्छा है, बस उतना ही बदलना जितना संभाल सके।"
मैं गुमटी से उठा और पीपल के नीचे चला।
मंज़ूर चाचा और बसंत काका जा चुके थे। अब चबूतरी पर दो लोग बैठे थे — एक सिरा, एक आदमी, सफ़ेद टोपी, पीली तस्बीह, होंठ हिलते हुए; दूसरा सिरा, दूसरा आदमी, गमछा, छड़ी, आँखें बंद।
और बीच में, दोनों के बीच, चबूतरी का वो हिस्सा खाली था जो सबसे ज़्यादा बोल रहा था।
मैं उनके बीच नहीं बैठा।
मैं पीपल के तने के पास जाकर खड़ा हो गया। हाथ जेब में। घंटी छू रहा था।
"नबी चाचा," मैंने कहा।
नबी चाचा ने तस्बीह पर अंगूठा रोका। फिर मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें धुँधली थीं, पर तेज़।
"बोल बेटे।"
"मुझे आपसे एक बात पूछनी है। और अगर आप बुरा मानें, तो अभी माफ़ी।"
"पूछ।"
"आपने श्यामलाल काका से आख़िरी बार कब बात की थी?"
चबूतरी पर चुप्पी पसर गई।
श्यामलाल काका की आँखें खुलीं। वो मेरी तरफ़ नहीं देखा। पीपल की जड़ की तरफ़ देखता रहा।
"बेटे," नबी चाचा ने कहा, "तू वो सवाल पूछ रहा है जो इस चबूतरी पर पचास साल से बैठा है और किसी ने नहीं पूछा।"
"तो आज पूछ लीजिए।"
"क्या पूछूँ?"
"मैं नहीं जानता। पर आप जानते हैं। और वो भी जानते हैं।" मैंने श्यामलाल काका की तरफ़ देखा। "काका?"
श्यामलाल काका ने छड़ी को हाथ में घुमाया।
"बच्चा है," उन्होंने कहा। "जाने दे।"
"मैं बच्चा नहीं हूँ, काका," मैंने कहा। "मैं चौबीस साल का हूँ। और मैं तीन दिन से उसी चीज़ पर चल रहा हूँ जिसके बारे में चबूतरी पर बैठे आदमी पचास साल से चुप हैं।"
मैंने एक कदम आगे बढ़ाया।
"अब सुनिए। मैं आपको अभी कुछ बताता हूँ, और ये मेरी गवाही है। आज से तीन दिन पहले, इसी चबूतरी पर, बंसी बाबा और रहमत बाबा ने एक फ्रेम का टुकड़ा मिलाकर एक तस्वीर जोड़ी। वो तस्वीर चालीस साल पहले टूटी थी। उस दिन दोनों ने अपनी चुप्पी को पचास साल पुरानी कर दिया और अब दोनों गले मिल चुके हैं।"
दोनों ने मेरी तरफ़ देखा।
"कल, हाफ़िज़ निसार अहमद और पंडित ब्रजकिशोर वहीं बैठे, और उन्होंने मूँड़े की ज़ंग लगी कील निकालकर चालीस साल पुरानी बात कह दी। उसके नीचे जो काग़ज़ मिला, वो उनके बापों का हिसाब था।"
मैंने साँस ली।
"और आज सुबह मंज़ूर चाचा और बसंत काका ने एक कटोरा जोड़ा जो कोई भूल गया था।"
नबी चाचा की तस्बीह का अंगूठा रुक गया।
"तू कहना क्या चाहता है?" उन्होंने कहा।
"मैं कहना चाहता हूँ," मैंने कहा, "कि इस गली में चुप रहना आसान है। पर चुप रहने की कीमत अब गिनी जा रही है। और अगर मैं उस कीमत को नहीं गिनूँगा, तो कोई दूसरा गिनेगा। बस, यही कहना है।"
श्यामलाल काका ने छड़ी चबूतरी पर रखी।
"तू ठीक कहता है," उन्होंने कहा। "पर तेरे पास दो शब्द हैं जो इस चबूतरी के नीचे दबे पड़े हैं। और मैं तुझे दो शब्द का जवाब नहीं दूँगा।"
"तो पूरे दो शब्द?" मैंने कहा। "काका, मैं आपके ज़ुबान से पूरी कहानी नहीं चाहता। मैं सिर्फ़ इतना चाहता हूँ कि आप एक बार बोलें। बाकी चीज़ें वक़्त खोलेगा।"
"क्या बोलूँ?"
"वो जो आपने पचास साल से नहीं बोला।"
श्यामलाल काका चुप हुए।
फिर उन्होंने अपनी जेब से एक रूमाल निकाला। भीगा रूमाल। और गला पोंछा।
"पचास साल पहले," उन्होंने कहा, "हम दोनों का एक ठेला था। चाय, बिस्किट, कभी पान। नबी ठेले पर बैठता, मैं दूध लाता। हमारी शामें एक साथ होती थीं, और रातें — रातों को हम एक ही बेंच पर सोते थे।"
नबी चाचा ने आँखें खोल लीं।
"एक दिन मेरे बड़े बेटे को बुखार आया," श्यामलाल काका ने कहा। "तेज़ बुखार। डॉक्टर ने दवा लिखी थी, और दवा के पैसे उस दिन नहीं थे। मैंने ठेले के डिब्बे से आधे पैसे निकाले। मैंने सोचा था, अगले हफ़्ते रख दूँगा।"
मैंने साँस रोक ली।
"उस शाम नबी ने डिब्बा खोला," श्यामलाल काका ने कहा, "और चुप हो गया। उसने मुझसे नहीं पूछा। एक बार भी नहीं पूछा। पर उसने ऐसी नज़र से देखा कि मैं जवाब नहीं दे पाया। मुझे लगा कि जो अच्छा दोस्त होता है, वो पूछता नहीं। फिर मैंने भी चुप रहना चुना। दोनों चुप रहे। और चुप्पी पचास साल बढ़ती गई।"
मैंने नबी चाचा की तरफ़ देखा।
"मेरी बारी," नबी चाचा ने कहा। उनकी आवाज़ सूखी थी, जैसे बहुत दिन से नहीं बोले हों। "उस दिन डिब्बा खोला और पैसे कम थे। मैंने कुछ नहीं पूछा। क्योंकि मुझे लगा कि मेरे पूछने से अगर श्यामलाल ने हाँ कह दिया, तो हमारी दोस्ती में एक बोझ आ जाएगा। और अगर उसने मना कर दिया, तो मुझे उस पर यक़ीन करना पड़ेगा, और मैं उस वक़्त यक़ीन नहीं कर पा रहा था। मुझे उस दिन अपने दिल में शक था। और मुझे शक अपने दिल से मिटाना था, उससे नहीं। से सवाल करता, तो शायद बात बन जाती। पर मैंने सवाल नहीं किया। मैंने शक इकट्ठा किया और उसे ढोता रहा। और ढोते-ढोते दोस्ती गिर गई।"
श्यामलाल काका ने उनकी तरफ़ देखा।
"तूने सोचा था कि मैंने कहा नहीं," काका ने कहा। "मैं कहता भी तो सच में दवा थी।"
"मैं जानता हूँ," नबी चाचा ने कहा। "आज पचास साल बाद जानता हूँ। पर उस दिन मैं नहीं जानता था। और मेरे भीतर का आदमी आज भी नहीं जानता था, जब तक तूने यहाँ आकर नहीं कहा।"
मैंने जेब से घंटी निकाली।
"अंकुश," श्यामलाल काका ने कहा, "तू मुझसे कुछ बताने को कह रहा था। तो सुन।"
उन्होंने छड़ी उठाई।
"मैंने उस दिन के बाद भी डिब्बे से पैसे निकाले। तीन बार। और तीनों बार नबी के ठेले से, जब वो सो रहा था। और तीनों बार मैंने वो पैसे वापस उसी डिब्बे में डाल दिए, जब मैं कमा लेता। किसी ने नहीं देखा। और मैंने भी कभी नहीं बताया। तीसरी बार के बाद मैंने ठेला छोड़ दिया। क्योंकि मुझे लगा कि जिसके डिब्बे से मैं चोरी करके वापस रख रहा हूँ, उसके साथ खड़े रहना मेरे बस की बात नहीं।"
नबी चाचा की आँखें भर आईं।
"श्यामलाल," उन्होंने कहा, "मैं उस डिब्बे को पचास साल तक देखता रहा। मेरे पास वो आज भी है। घर की अलमारी में। बंद। इसलिए बंद कि मेरे भीतर का बुज़ुर्ग नहीं चाहता कि कोई उसे खोले।"
"तो खोल आज," श्यामलाल काका ने कहा।
दोनों चुप हुए।
और मैंने कहा — जो मुझे अभी तक नहीं कहना चाहिए था, पर घंटी ने मुझे नहीं रोका, और जब घंटी नहीं रोकती, तो सच बोलना पड़ता है।
"मैं भी अपने घर में उसी डिब्बे को ढो रहा हूँ," मैंने कहा। "मेरी माँ बीमार है। मेरे पापा ने कहीं अंगूठा लगाया है और अब पच्चीस साल से चुप हैं। और मैं हँसी में उनकी चुप्पी को ढक देता हूँ, जैसे कोई टूटी खिड़की पर परदा डाल दे। आप दोनों पचास साल से चुप बैठे हैं, और मैं तीन दिन से ऐसे चल रहा हूँ जैसे मेरा घर ठीक है। मेरा घर ठीक नहीं है, चाचा।"
दोनों ने मेरी तरफ़ देखा।
और फिर, बिना किसी के कहे, नबी चाचा ने हाथ बढ़ाया। श्यामलाल काका ने हाथ पकड़ा।
पुराने हाथ। झुर्रियों में दबी उँगलियाँ। एक-दूसरे को पचास साल बाद छूते हुए, जैसे दो बच्चे।
"माफ़ कर," श्यामलाल काका ने कहा।
"मैंने तुझे कभी दोष नहीं दिया," नबी चाचा ने कहा। "मैंने खुद को दिया। पचास साल।"
"तो आज देना बंद कर।"
और तभी घंटी बजी।
मेरी जेब में। एक बार। लंबी। गरम।
बच्चे वहीं थे, गुमटी के पास। उन्होंने सुना। शबनम आपा ने सुना और चिमटी हाथ में लेचिमटी हाथ में ले ली और मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चमक थी जो तब आती है जब गली की कोई औरत किसी राज़ की खबर सुन लेती है।
"अंकुश," उसने कहा, "ये क्या बजा?"
"घंटी, आपा," मैंने कहा और जेब से हाथ निकाल लिया। घंटी गरम थी, जैसे अभी किसी के हाथ से निकली हो।
"घंटी?" शबनम आपा ने चिमटी को कमर पर टिकाया। "तेरी जेब में घंटी? तू स्कूल का लड़का है कि मंदिर का पुजारी?"
बच्चे हँसे। चिंटू ने कहा, "आपा, ये घंटी खुद बजती है। हमने सुना।"
"तू चुप कर," शबनम आपा ने कहा, पर उसकी आवाज़ में डाँट नहीं थी। "तू तो वो है जो पिछले हफ़्ते मेरी गुमटी से समोसे चुराकर भागा था।"
"मैंने चुराए नहीं थे," चिंटू ने कहा। "मैंने उधार लिए थे।"
"उधार भी नहीं। तूने तो प्लेट ही उठा ली थी।"
सानिया ने चिंटू को कोहनी मारी और आगे आई। उसके हाथ में लाल कवर वाली कॉपी थी, जो अब उसकी जान बन गई थी। "अंकुश भैया, हमने देखा। जब आप पीपल के पास गए थे, तो नबी चाचा और श्यामलाल काका अलग-अलग बैठे थे। चाचा तो रोज़ वहीं बैठते हैं, पर आज दोनों एक-दूसरे को देख भी नहीं रहे थे। गुड्डू ने कहा कि कुछ तो है।"
"मैंने कहा था," गुड्डू ने सीना फुलाकर कहा। "मैंने कहा था कि इन दोनों में कुछ पुराना है।"
"तूने तो कहा था कि चाचा के पैर में दर्द है," रफ़ीक़ ने कहा।
"वो भी था," गुड्डू ने कहा। "दो बातें एक साथ हो सकती हैं।"
मैं मुस्कुराया। ये बच्चे। इनके पास हर चीज़ का जवाब था, चाहे सवाल कोई भी हो। और आज पहली बार मुझे लगा कि ये सिर्फ़ खबरें लाने वाले नहीं, काम करने वाले भी हैं।
नबी चाचा अब भी श्यामलाल काका का हाथ पकड़े हुए थे। उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं, पर वो छोड़ नहीं रहे थे। श्यामलाल काका की आँखों से आँसू बह रहे थे और वो कोई पोंछने की कोशिश नहीं कर रहे थे। जैसे पचास साल का सूखा एक बार में बह रहा हो।
"बेटा," नबी चाचा ने मेरी तरफ़ देखा। "ये तूने क्या किया?"
"मैंने कुछ नहीं किया, चाचा," मैंने कहा। "आपने एक-दूसरे को देखा। बस।"
"पचास साल बाद," श्यामलाल काका ने कहा। "पचास साल हम एक ही गली में रहे, एक ही पीपल की छाया में बैठे, और एक-दूसरे से दो शब्द नहीं बोले।"
"क्यों?" सानिया ने पूछा। बच्चों में यही बात थी — जो बड़े नहीं पूछते, वो पूछ लेते थे।
नबी चाचा ने उसकी तरफ़ देखा, जैसे पहली बार देखा हो। फिर बोले, "क्योंकि हम दोनों ने एक बात मान ली थी जो सच नहीं थी।"
"कौन सी बात?"
"ये कि हम एक-दूसरे के दुश्मन हैं," श्यामलाल काका ने कहा। "और जब आदमी किसी बात को पचास साल तक मान ले, तो वो सच हो जाती है। भले ही वो झूठ हो।"
शबनम आपा ने गहरी साँस ली और चिमटी को स्टैंड पर रख दिया। "अब मेरी बात सुनो," उसने कहा। "तुम दोनों यहीं बैठो। मैं चाय लाती हूँ। और अंकुश, तू भी बैठ। तेरी जेब में जो बज रहा है, वो बाद में। पहले चाय।"
"आपा, मुझे—"
"बैठ," उसने कहा। वो शब्द इतने सीधे थे कि मैं बैठ गया।
वो गुमटी के अंदर गई और मैंने देखा कि उसके हाथ थोड़े काँप रहे थे। उसने कटोरी से चाय के पत्ते निकाले, चीनी डाली, और फिर एक पल के लिए रुकी। उसकी आँखें कहीं और थीं। मैंने सोचा, क्या उसे भी कुछ याद आया? क्या उसकी बहन से पंद्रह साल की चुप्पी का कोई धागा इस घंटी से जुड़ा है?
पर मैंने पूछा नहीं। कभी-कभी तंत्र का सबसे बड़ा नियम यही होता है — जो सामने है, उसे पहले होने दो।
चाय आई। मिट्टी के कुल्हड़ों में। भाप उठ रही थी। नबी चाचा ने कुल्हड़ दोनों हाथों से पकड़ा, जैसे कोई बच्चा गिलास पकड़ता है। श्यामलाल काका ने पहली घूँट ली और आँखें बंद कर लीं।
"शबनम," श्यामलाल काका ने कहा, "तेरी चाय में आज कुछ और है।"
"क्या है?" शबनम आपा ने पूछा।
"माफ़ी की महक," उन्होंने कहा।
शबनम आपा ने कुछ नहीं कहा। बस मुड़कर अपने बर्तन समेटने लगी। पर मैंने देखा कि उसने आँख का कोना साफ़ किया।
और तभी घंटी फिर बजी।
इस बार मेरी जेब में नहीं थी। मैंने उसे जेब से निकालकर हथेली पर रख लिया था। वो मेरी हथेली में बजी। एक बार। छोटी सी आवाज़, जैसे किसी ने दूर से प्यार से बुलाया हो।
सब रुक गए।
"बजी," चिंटू ने आँखें बड़ी करके कहा। "अंकुश भैया, फिर बजी। बिना हाथ लगाए।"
और फिर घंटी ने कहा। मेरी हथेली में, इतनी धीमी आवाज़ में कि सिर्फ़ मैंने सुना। पर बच्चों ने मेरी आँखें देखीं और समझ गए कि कुछ कहा गया है।
"क्या कहा?" सानिया ने फुसफुसाकर पूछा।
मैंने उसकी तरफ़ देखा। बच्चों से झूठ नहीं बोलना चाहिए, पर तंत्र की बात भी हर किसी से नहीं कही जाती। मैंने कहा, "कुछ ऐसा जो मैं समझ नहीं पाया।"
घंटी ने कहा था — "पचास। दो हाथ। अब घर।"
पचास क्या? पचास साल? पचास अंक? दो हाथ — नबी चाचा और श्यामलाल काका के? या उस्ताद के? और "अब घर" — कौन सा घर? मेरा घर? या यह पीपल? या गली?
मैंने हथेली बंद कर ली। घंटी ठंडी होने लगी थी।
"अंकुश," शबनम आपा ने कहा, और उसकी आवाज़ अब सख़्त थी। "तेरी जेब में जो चीज़ है, उसे कभी दुकान के बोर्ड पर मत टाँगना। और किसी के हाथ में मत देना।"
"आपको कैसे पता?"
"क्योंकि मेरी दादी कहती थीं," उसने कहा, "कि जो चीज़ बिना हाथ लगाए बजे, वो या तो बहुत पुरानी है या बहुत भूखी। और दोनों से बचकर रहना चाहिए।"
"भूखी?" गुड्डू ने कहा, और उसकी आवाज़ में डर था।
"भूखी मतलब जो भूखी हो," चिंटू ने कहा, बड़े होने का नाटक करते हुए। "जैसे मैं समोसे के लिए भूखा हूँ।"
"तू सबसे ज़्यादा भूखा है," रफ़ीक़ ने कहा, "पर तू बजता नहीं।"
"चुप करो," शबनम आपा ने कहा, और बच्चे चुप हो गए। "अंकुश, तू मेरी बात सुन। ये जो बुज़ुर्गों को तू जोड़ रहा है, ये अच्छा काम है। पर इस गली में ऐसे भी लोग हैं जो जोड़ना नहीं, तोड़ना चाहते हैं। और वो तेरी घंटी सुन सकते हैं। तू उसे छिपाकर रख।"
मैंने सिर हिलाया। मैंने उसे जेब में डाला, पर पहले एक बार उसकी सतह देखी। पीतल। जंग लगा। जैसे किसी बहुत पुराने हाथ ने इसे बनाया हो और फिर भूल दिया हो।
नबी चाचा ने चाय खत्म की और कुल्हड़ रखा। "बेटा," उन्होंने कहा, "अब मुझे जाना होगा। मेरी बीवी इंतज़ार कर रही होगी।"
"और मुझे भी," श्यामलाल काका ने कहा। "पर सुन, कल सुबह मैं तेरी दुकान पर आऊँगा। मेरी साइकिल का पिछला पहिया घिस गया है।"
"मैं ठीक कर दूँगा, काका," मैंने कहा।
"पैसे लेगा?"
"पैसे तो लूँगा," मैंने कहा। "पर एक शर्त पर। कल जब आए, तो नबी चाचा को भी साथ लाए। दोनों की साइकिलें साथ रखेंगे।"
दोनों हँसे। पचास साल बाद। और वो हँसी देखकर लगा कि घंटी ठंडी क्यों हो गई — उसका काम हो गया था।
बच्चे उन्हें छोड़ने गए। सानिया ने मेरी तरफ़ देखा और कहा, "अंकुश भैया, हम कल सुबह आएँ?"
"आओ," मैंने कहा। "पर पहले शबनम आपा की गुमटी से समोसे का हिसाब चुकाना।"
"अंकुश!" शबनम आपा ने कहा, पर वो मुस्कुरा रही थी।
बच्चे भाग गए। चिंटू ने भागते हुए कहा, "आपा, कल का हिसाब कल देखेंगे।"
"देखेंगे," शबनम आपा ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो प्यार था जो गली की औरतें बच्चों पर बरसाती हैं, चाहे ज़ुबान कितनी भी तेज़ हो।
मैं उठा और अपनी दुकान की तरफ़ बढ़ा। शाम हो रही थी और गली में छाया गहरी हो रही थी। मुझे मीरा के सवालों का जवाब देना था। मैंने सोचा कि घर जाऊँ, पापा से बात करूँ, तैयारी करूँ।
पर तभी उस्ताद अली बक्श की दुकान से आवाज़ आईपर तभी उस्ताद अली बक्श की दुकान से आवाज़ आई — "अंकुश, ज़रा अंदर आ।"
रुक गया। आवाज़ तेज़ नहीं थी, पर उसमें एक वज़न था। मैं मुड़ा और उनकी दुकान की तरफ़ बढ़ा। दरवाज़ा आधा खुला था। सिलाई मशीन चुप थी। उस्ताद छोटे से स्टूल पर बैठे थे, चश्मा उतारकर आँखें मल रहे थे।
"बैठ," उन्होंने कहा।
मैं उनके सामने फर्श पर बैठ गया।
उन्होंने देर तक मेरी तरफ़ देखा। फिर बोले, "तूने आज घंटी बजाई?"
"नहीं, उस्ताद। घंटी अपने आप बजी।"
"अपने आप?" वो आगे झुके। "कब?"
"जब नबी चाचा और श्यामलाल काका मिले।"
उन्होंने धीरे से सिर हिलाया। "मुझे लगा था। मैं दुकान पर था। सिलाई मशीन चला रहा था। तभी मेरे कान में एक आवाज़ आई। बहुत हल्की। जैसे कोई दूर से घंटी बजा रहा हो। मैंने मशीन रोक दी। फिर सुना। फिर तू आया।"
वो उठे। दरवाज़े तक गए और बाहर गली को देखने लगे। मैंने भी देखा। गली खाली थी। शाम की छाया लंबी हो रही थी।
"अंकुश," उन्होंने बिना मुड़े कहा, "ये घंटी किसी की मिरासी है।"
"आपने पहले भी कहा था।"
"पहले मैंने सिर्फ़ इशारा किया था। अब पूरी बात सुन।" वो मुड़े। "मिरासी का मतलब होता है विरासत। पर हर विरासत खुशी की नहीं होती। कुछ विरासतें ज़िम्मेदारी की होती हैं। और जो ज़िम्मेदारी की हो, उसका हिसाब भारी होता है।"
वो वापस आकर बैठ गए। "ये घंटी किसी एक आदमी की नहीं है। ये दो हाथों की मिरासी है। दो लोगों ने इसे बनाया। दो लोगों ने इसे चलाया। और जब वो अलग हुए, तो घंटी भी आधी रह गई — आधी कहीं, आधी कहीं। तेरे हाथ में जो है, वो एक हिस्सा है। दूसरा किसी और के पास है।"
"किसके पास?"
"ये मैं अभी नहीं बता सकता।" उन्होंने हाथ उठाया। "क्योंकि अभी तेरे लिए ये जानना ठीक नहीं। अभी तू जितना जानेगा, उससे तेरा काम बढ़ेगा, घटेगा नहीं।"
"उस्ताद—"
"सुन।" उनकी आवाज़ तेज़ थी। "ये जो तू आज कर रहा है, ये अच्छा है। पर एक बात सुन ले। जो घंटी सारे मोहल्ले को सुना दे, वो अपना घर क्यों नहीं सुन पाती?"
मैं ठिठक गया।
"मैंने तुझे आज सुबह पूछा था। तेरा घर इतना चुप क्यों है। तूने टाल दिया।"
"उस्ताद—"
"अब टाल मत। जा घर। आज रात। बैठकर। पापा के सामने, माँ के सामने, काजल के सामने, घंटी को हाथ में लेकर पूछ। और सुन। पूरा सुन। तंत्र से पूछ — तेरा घर इतना चुप क्यों है।"
"पूछूँगा," मैंने कहा। "पर आप भी तो कुछ छिपा रहे हैं। आपने घंटी के बारे में सब नहीं बताया। आपके भाई इलियास की बात भी आपने अधूरी छोड़ी।"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। लंबा। फिर वो मुस्कुराए। "अब सही सवाल पूछा। पर आज नहीं। आज तेरे घर का नंबर है। मेरा नंबर बाद में आएगा। जब तेरा घर जुड़ेगा, तब मेरा घर टूटकर सामने आएगा। यही तंत्र का तरीक़ा है। एक-एक करके।"
उन्होंने चश्मा फिर पहन लिया। "जा। देर मत कर। आज रात का सच अगर कल सुबह तक नहीं खुला, तो कुछ ऐसा टूटेगा जो फिर शायद न जुड़े।"
मैं उठ खड़ा हुआ। दरवाज़े पर पहुँचा, तो उस्ताद ने फिर कहा, "अंकुश।"
मुड़ा।
"जब पूछे, तो हिम्मत रखना। क्योंकि तेरे घर का तीसरा सच," उन्होंने कहा, "शायद तू खुद हो।"
मैं घर की तरफ़ चला। पीछे सिलाई मशीन की आवाज़ आई। एक बार। फिर बंद हो गई।
और मेरी जेब में घंटी ठंडी थी। इतनी ठंडी कि मैंने हाथ जेब से बाहर निकाल लिया।
रात मैंने सोचा कि घंटी से पूछूँगा, पर पूछ नहीं पाया। पापा चुप थे, माँ हिसाब की कॉपी में उलझी थीं, काजल अपनी किताब लेकर बैठी थी। मैंने रोटी खाई और सो गया।
सुबह उठा तो गली में चहल-पहल थी। बच्चे पीपल के नीचे जमा थे। शबनम आपा की गुमटी पर चाय की भाप उठ रही थी। सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू बेंच पर बैठे थे, पैर हिला रहे थे।
चिंटू ने मुझे देखा और चिल्लाया, "अंकुश भैया! आपा की चाय पीओ। आज हमारी तरफ़ से।"
"क्या बात है?" मैंने पूछा। "लॉटरी लगी?"
"नहीं," सानिया ने आँखें घुमाईं। "पर आज हमें एक नई खबर मिली है।"
उसने अपनी लाल कवर कॉपी निकाली। "पीपल के नीचे दो बुज़ुर्ग हैं। एक बाबा शरीफ़, एक लाला बसंतलाल। पचास साल से नहीं बोले।"
"पचास साल?" मैं बेंच पर बैठ गया।
"हाँ," गुड्डू बोला। "मैंने सुना है कि पहले दोनों एक ही दुकान चलाते थे। कबाड़ की। फिर कुछ चोरी हो गई। दोनों ने एक-दूसरे पर इल्ज़ाम लगाया। फिर लड़ाई। फिर बस।"
"क्या चोरी हुई थी?"
"पता नहीं," रफ़ीक़ ने कहा। "कोई कहता है पीतल का घड़ा, कोई कहता है सोने की चेन।"
"क्या बकवास है," मैंने कहा। "चोरी तो किसी ने की होगी।"
"पर वो आज तक पता नहीं चला," सानिया ने कहा। "और अब दोनों बूढ़े हो गए हैं। एक पीपल के इस तरफ़ बैठता है, दूसरा उस तरफ़। एक-दूसरे को देखते भी नहीं।"
मैंने पीपल के पेड़ की तरफ़ देखा। दो बुज़ुर्ग बैठे थे। एक के पास सफ़ेद कुर्ता और टोपी थी। दूसरे के पास पीली धोती और गमछा। दोनों में फासला था। सुबह की धूप उन पर पड़ रही थी।
"मैं जाता हूँ," मैंने कहा।
"हम भी आएँ?" चिंटू ने पूछा।
"तुम लोग यहाँ रहो," शबनम आपा ने कहा। "अंकुश, तू जा। पर ध्यान से। ये दोनों बुज़ुर्ग हैं। इनकी बेज़ुबान दुश्मनी है। जुबान से नहीं, चुप्पी से। और चुप्पी वाली दुश्मनी सबसे मुश्किल होती है।"
मैंने सिर हिलाया और पीपल की तरफ़ बढ़ा। मैंने दोनों के बीच में बैठने की कोशिश की। नबी चाचा और श्यामलाल काका वाली जगह से थोड़ा दूर। सफ़ेद कुर्ते वाले बाबा शरीफ़ ने मेरी तरफ़ देखा। दूसरे लाला बसंतलाल ने ज़मीन पर नज़रें जमा रखी थीं।
"बाबा," मैंने कहा। "मैं अंकुश हूँ। साइकिल वाला।"
"जानता हूँ," बाबा शरीफ़ ने कहा। "तू वही है जो बुज़ुर्गों को जोड़ रहा है।"
"आज आप दोनों को जोड़ने आया हूँ।"
लाला बसंतलाल ने सिर उठाया। उनकी आँखें धुँधली थीं। "हमें मत जोड़। हम जुड़ चुके हैं। ज़मीन से। हम दोनों यहीं रहेंगे। पर एक-दूसरे से नहीं बोलेंगे।"
"क्यों?"
"क्योंकि वो मेरा दुश्मन है," उन्होंने कहा।
"दुश्मन?" मैंने कहा। "आपने उसका क्या बिगाड़ा?"
"उसने मेरा पीतल का घड़ा चुराया।"
"नहीं!" बाबा शरीफ़ अचानक गुस्से में बोले। "तूने मेरी चेन चुराई।"
"चेन तो मैंने कभी देखी ही नहीं!"
"तू झूठ बोल रहा है!"
"तू बूढ़ा हो गया है, दिमाग़ खराब है!"
"चुप!" मैंने कहा। दोनों चुप हो गए। मैंने गहरी साँस ली। "बाबा, लाला, सुनो। मैं आपकी चोरी के बारे में नहीं जानता। पर मैं एक बात जानता हूँ। पचास साल हो गए। आप दोनों ने एक-दूसरे से एक शब्द नहीं बोला। क्या आपने कभी सोचा कि अगर चोरी किसी और ने की हो?"
दोनों मेरी तरफ़ देखने लगे।
"किसी तीसरे ने," मैंने कहा। "किसी ऐसे ने जिसे आप दोनों जानते भी न हों।"
बाबा शरीफ़ हिल गए। लाला बसंतलाल ने फिर ज़मीन देखी।
"मैं आपसे एक सच्ची बात कहने को कह रहा हूँ," मैंने कहा। "एक-दूसरे से। चाहे वो कितनी भी छोटी हो। चाहे वो कितनी भी शर्मनाक हो। बस सच।"
वो दोनों चुप रहे। बहुत देर तक। फिर बाबा शरीफ़ बोले। उनकी आवाज़ रूखी थी। "मैंने…" वो रुके। "मैंने उस रात तुझे चोरी करते नहीं देखा था।"
लाला बसंतलाल ने उनकी तरफ़ देखा। "क्या?"
"मैंने तुझे नहीं देखा था," बाबा शरीफ़ ने कहा। "मैंने बस मान लिया था। क्योंकि उस रात तू दुकान के पास था।"
"तो तूने मुझ पर इल्ज़ाम क्यों लगाया?"
"क्योंकि सबने कहा कि तूने किया। और मैंने सोचा कि अगर मैं तेरा बचाव करूँ, तो लोग मुझे भी चोर समझेंगे।"
लाला बसंतलाल की आँखें भर आईं। "और मैंने सोचा कि तूने मुझ पर इल्ज़ाम लगाया, तो मैं क्यों तेरी परवाह करूँ। मैंने भी तेरे बारे में ऐसी बातें फैलाईं।"
"पर मैंने कभी नहीं कहा कि तूने चुराया," बाबा शरीफ़ ने कहा। "मैंने बस यह कहा कि तू दुकान के पास था।"
"और मैंने सोचा कि इसका मतलब वही है।"
अब दोनों रो रहे थे। चुपचाप। सुबह की धूप उनके चेहरों पर थी।
"मैं माफ़ी माँगता हूँ," बाबा शरीफ़ ने कहा। "मैंने तुझे इल्ज़ाम दिया। बिना सोचे।"
"मैं भी," लाला बसंतलाल ने कहा। "मैंने तेरे बारे में बुरा बोला। और फिर पचास साल तक तेरे साथ बैठा, तेरे बिना।"
उन्होंने एक-दूसरे को देखा। बाबा शरीफ़ ने हाथ बढ़ाया। लाला बसंतलाल ने उसे थाम लिया।
मेरी जेब गर्म हुई। मुझे पता था कि घंटी बजने वाली है। पर वो ज़ोर से नहीं बजी। बस काँपी। मैंने महसूस किया। ऊर्जा। जुड़ाव।
घंटी की आवाज़ आई, बहुत धीमी। "पैंतालीस अंक।"
मैं मुस्कुराया। दोनों बुज़ुर्ग अभी भी हाथ पकड़े हुए थे। उन्होंने ध्यान नहीं दिया।
तभी मेरे पीछे से आवाज़ आई। "तो यही तुम्हारा तमाशा है?"
मैं मुड़ा। मीरा खड़ी थी। कंधे पर कैमरा था, पर लेंस कवर लगा था। वो गुस्से में लग रही थी। उसके साथ दो अनजान लड़के थे जिनके हाथ में काग़ज़ थे।
"मीरा," मैंने कहा। "तुम यहाँ?"
"मैं कल रात आठ बजे तुम्हारे घर आई थी," उसने कहा। "तुम नहीं थे। तुम्हारे पापा ने कहा कि तुम किसी काम से बाहर हो। और आज सुबह मुझे पता चला कि तुम यहाँ हो, बुज़ुर्गों को नचा रहे हो।"
"मैं नचा नहीं रहा।"
"नहीं?" वो आगे आई। "तुमने इन दोनों को रुला दिया। ये पचास साल से नहीं बोले। तुमने इन्हें एक घंटे में रुला दिया। और तुम्हें लगता है ये असली है?"
"मीरा, ये असली है।"
"असली?" वो हँसी। "तुम्हारे पास क्या है? एक पुरानी घंटी। जो तुम्हारी जेब में बजती है। और तुम लोगों को बेवकूफ़ बनाते हो कि यह जादू है।"
मेरी जेब में घंटी ठंडी हो गई। वो गुस्से में थी। उसकी आवाज़ तेज़ थी। दोनों बुज़ुर्ग चौंककर देखने लगे।
"मीरा, शांत हो।"
"मैं शांत हूँ!" वो चिल्लाई। "मैं तुमसे सवाल पूछ रही हूँ। तुमने मुझे कल रात बुलाया था। याद है? तुमने कहा था कि मुझे पूरा सच बताओगे। तो बताओ। यह क्या है? यह घंटी क्या है? और तुम लोगों को क्यों जोड़ रहे हो? किसके लिए? ट्रस्ट के लिए? भारद्वाज कंस्ट्रक्शन के लिए? या अपने पापा के अंगूठे को छिपाने के लिए?"
पीछे खड़े दोनों लड़कों ने काग़ज़ ऊपर किए। एक बोला, "ये दुकान के काग़ज़ हैं। ट्रस्ट के नाम पर। हस्ताक्षर उस्ताद अली बक्श के।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "तुम्हारी दुकान किसी ट्रस्ट की है। वही ट्रस्ट जो भारद्वाज से जुड़ा है। तुम्हारे पापा ने अंगूठा लगाया था। और तुम आज बुज़ुर्गों को जोड़कर सबको यह दिखा रहे हो कि तुम अच्छे हो।"
मैं चुप था। घंटी ठंडी थी।
"मैं तुम्हें रोक नहीं रही," उसने कहा। "पर जब तक तुम मेरे सवालों का जवाब नहीं देते, तुम्हारा यह सब नाटक है। और मैं इसे शहर भर में दिखाऊँगी।"
वो मुड़ी और चली गई। दोनों लड़के उसके पीछे चले। बुज़ुर्ग अभी भी हाथ पकड़े हुए थे, हैरान।
मैं वहीं खड़ा रहा। जेब में घंटी ठंडी थी।
शाम को मैं अपनी दुकान में बैठा था, दीवार को देख रहा था। घंटी मेज़ पर रखी थी। सुबह से ठंडी थी। मैंने उससे अंकों के बारे में पूछा। उसने जवाब नहीं दिया। मैंने मीरा के बारे में पूछा। उसने जवाब नहीं दिया।
तभी उस्ताद अली बक्श अंदर आए। उन्होंने दरवाज़ा खटखटाया नहीं। बस धकेला और अंदर आ गए। हाथ में चश्मा था।
"उस्ताद?" मैं उठ खड़ा हुआ।
"बैठ," उन्होंने कहा। वो स्टूल पर बैठ गए। "मुझे पता है मीरा ने क्या किया। उसके लड़के मेरे पास भी आए थे। उन्होंने मुझसे पूछा कि ये दुकान किसकी है।"
"और आपने क्या कहा?"
"मैंने कहा कि ये दुकान उस आदमी की है जो इसे चलाता है।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "अंकुश, वो काग़ज़ सच है। ट्रस्ट सच है। पर वो ट्रस्ट भारद्वाज का नहीं। वो ट्रस्ट उस आदमी का है जिसने ये घंटी बनाई थी। और वो आदमी तेरा दादा नहीं था।"
मैं उन्हें देखता रह गया।
"ये घंटी," उन्होंने मेज़ से उठाई। "ये किसी की मिरासी है। और मिरासी का मतलब विरासत। पर हर विरासत खुशी की नहीं होती। कुछ विरासतें ज़िम्मेदारी की होती हैं। और जो ज़िम्मेदारी की हो, उसका हिसाब भारी होता है।"
उन्होंने घंटी वापस रखी। "मैंने तुझे पहले भी चेताया था। इसे बाज़ार में मत दिखा। इसे सभा में मत बजा। ये दो हाथों की चीज़ है। जब तक दोनों हाथ न हों, ये अधूरी है।"
"दूसरा हाथ कौन है?"
"मैंने कहा था, अभी नहीं।" वो उठे। "पर एक बात सुन। मीरा के सवालों का जवाब देने से पहले तू अपने घर के सवालों का जवाब दे। जा घर। आज रात। घंटी को हाथ में ले। और पूछ — तेरा घर इतना चुप क्यों है।"
"उस्ताद—"
"और अंकुश," उन्होंने कहा, "अगर तूने आज रात नहीं पूछा, तो कल सुबह मैं तुझे यह घंटी वापस करने आऊँगा। और फिर तू इसे कभी नहीं बजा पाएगा।"
वो बाहर चले गए। दरवाज़ा बंद हो गया। मेज़ पर घंटी ठंडी थी। पर जैसे ही मैंने उसे उठाया, वो अचानक गर्म हो गई। इतनी गर्म कि मैंने लगभग गिरा दी।
फिर वो बोली। "अब पूछ।"
मैंने गला साफ़ किया। "मेरा घर इतना चुप क्यों है?"
घंटी चुप रही। फिर बोली, "क्योंकि तेरे घर का सबसे बड़ा सच तू है।"
और फिर वो ठंडी हो गई।
मैं वहीं बैठा रहा, घंटी हाथ में, और पहली बार मुझे डर लगा कि मैं क्या पाऊँगा।
बाहर गली में शाम की आवाज़ें आ रही थीं। शबनम आपा की गुमटी से चाय की खुशबू। बच्चों की हँसी। पीपल के पत्तों की सरसराहट। पर मेरे अंदर सन्नाटा था। वो सन्नाटा जो तब होता है जब आपको पता हो कि अब कुछ ऐसा खुलेगा जो आपने खुद से भी छिपाया है।
मैंने घंटी जेब में रखी और उठा। घर जाना था। पापा से बात करनी थी। माँ से। काजल से। और मीरा को जवाब देना था।
पर सबसे पहले — मुझे खुद से पूछना था कि मेरे घर का सबसे बड़ा सच क्या है। और क्या वो सच मैं हूँ?
मैंने दुकान का दरवाज़ा बंद किया। पीछे वाले कमरे से गुनगुनाता बल्ब बंद कर दिया। और गली में कदम बढ़ा दिए।
पीपल के नीपीपल के नीचे पहुँचा तो शाम ठीक अपनी जगह पर थी। पत्तों के बीच से आख़िरी धूप छनकर चबूतरी पर गिर रही थी, जैसे किसी ने पीले काग़ज़ के टुकड़े फाड़कर बिखेर दिए हों। चाय की भाप गुमटी से उठकर हवा में घुल रही थी और दूर कहीं स्कूल की छत से किसी बच्चे की पतंग की डोर कट गई थी, जिस पर चार-पाँच आवाज़ें एक साथ चिल्लाईं।
मैंने कदम धीमे कर दिए।
चबूतरी पर आज कोई नहीं था। न बंसी बाबा, न रहमत बाबा, न कलीम बाबा। बस दो आदमी थे। एक सिरे पर एक, दूसरे सिरे पर दूसरा। दोनों की पीठ एक-दूसरे की तरफ़। बीच में पत्थर का इतना हिस्सा ख़ाली कि उस पर चार लोग बैठ सकें।
मैं रुक गया।
ये दोनों मुझे रोज़ दिखते थे। हर शाम। इतने सालों से। और मैंने कभी सोचा ही नहीं कि ये दोनों कौन हैं और पीठ करके क्यों बैठे हैं।
एक के हाथ में लाठी थी और सिर पर सफ़ेद टोपी। चेहरा चौड़ा, मूँछें सफ़ेद, आँखें ऐसी जैसे बहुत दूर कुछ देख रही हों। वो अपने अंगूठे से लाठी की नोक पर गोल-गोल घेरे बना रहे थे। चुप। बिल्कुल चुप।
दूसरे का कद छोटा था, कमर झुकी हुई, और एक हाथ हमेशा जेब पर। जैसे अंदर कोई चीज़ रखी हो और वो उसे भूलना चाहते हों पर उनका हाथ भूलता न हो।
मैंने सोचा, क्यों नहीं जानता मैं इन्हें? मेरी गली है। मेरा पीपल है। और मैं इन दोनों के नाम भी नहीं जानता।
मैं मुड़ा और गुमटी की तरफ़ चल दिया।
शबनम आपा गुमटी के अंदर थीं। चिमटी से समोसे उलट रही थीं और कड़ाही से आवाज़ आ रही थी, जैसे कोई बहुत थका हुआ आदमी बड़बड़ा रहा हो। सामने बेंच पर बच्चों की टोली बैठी थी। सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू। चारों के हाथ में एक-एक कटोरी और बीच में एक ही प्लेट में समोसे रखे थे, जिस पर चारों की नज़र बराबर बँटी हुई थी।
सानिया के हाथ में अपनी लाल कवर वाली कॉपी थी। वो कॉपी उसने आज छुपाई नहीं थी, खुली रखी थी, जैसे किसी को दिखाना चाहती हो।
मैंने गुमटी की सीढ़ी पर पैर रखा तो चारों ने एक साथ सिर उठाया।
चिंटू बोला, उस्ताद, आपकी जेब में फिर बजा?
मैंने कहा, नहीं।
उसने कहा, झूठ बोल रहे हो। मैंने सुना था।
सानिया ने उसकी कटोरी खींच ली और कहा, चुप कर और खा।
मैं बैठ गया। शबनम आपा ने मेरी तरफ़ देखे बिना एक गिलास चाय मेरी तरफ़ सरका दी, जैसे उन्हें पहले से पता था कि मैं आऊँगा और क्या पीऊँगा।
मैंने कहा, आपा, चबूतरी पर दो लोग बैठे हैं। एक सिरे पर एक, दूसरे सिरे पर दूसरा। पीठ करके। कौन हैं?
शबनम आपा ने चिमटी कड़ाही के किनारे रखी। एक लंबी साँस ली। और बोलीं, तू आज तक उन्हें जानता नहीं?
मैंने कहा, नहीं।
उन्होंने कहा, तो सुन। एक खेलू है, एक बेलू। दोनों सगे भाई। दोनों के खेत पीछे हैं, दोनों की बैलगाड़ियाँ गली से रोज़ गुज़रती हैं। और दोनों ने तीस साल से एक-दूसरे से बात नहीं की।
तीस साल।
मैंने गिलास पकड़े हुए पूछा, क्यों?
शबनम आपा ने कटोरी उठाई, उसमें गली के लोगों के छोड़े पैसे खनके। उन्होंने उसे वापस रखा और बोलीं, ये मैं नहीं बताऊँगी। कोई भी नहीं बताएगा। तीस साल से न कोई पूछता है, न कोई बोलता है। गली इतनी आदत डाल चुकी है कि उसे लगता है ये ऐसे ही होना चाहिए।
सानिया ने कॉपी खोली। उसने पन्ना पलटा और अपनी उँगली एक लाइन पर रख दी।
उसने कहा, उस्ताद, मैं रोज़ देखती हूँ। खेलू काका रोज़ शाम आते हैं और जेब से एक काग़ज़ की पुड़िया निकालते हैं। छोटी सी। पीली, मैली। उसे खोलते नहीं। बस देखते हैं, फिर वापस जेब में डाल देते हैं।
गुड्डू बोला, और बेलू काका रोज़ एक कॉपी निकालते हैं। मैंने एक दिन पीछे से झाँका था। हर महीने की एक तारीख़ पर वो एक लाइन लिखते हैं।
रफ़ीक़ ने कहा, मैंने एक बार ध्यान से देखा था, वो लिखते हैं, लौटाया — और फिर उँगली दबाकर कुछ लिखते हैं जो पढ़ा नहीं जाता। पर हर महीने वही लिखते हैं।
मेरे हाथ में चाय ठंडी होने लगी थी।
मैंने कहा, सानिया, तेरी कॉपी में ये सब लिखा है?
उसने कहा, हाँ। छह ट्रक पीछे। और ये दो काका। दोनों अलग पन्ने पर।
चिंटू ने अचानक कहा, उस्ताद, और एक बात है। खेलू काका के पैर में तीस साल पुराना निशान है। मुझे मालूम है क्योंकि स्नान के दिन मैंने देखा था, पैर के अंगूठे के पास एक टेढ़ी लकीर है।
शबनम आपा ने चिंटू को घूरा।
चिंटू ने कहा, क्या हुआ? मैंने देखा था तो बताया।
शबनम आपा ने धीरे से कहा, बेटा, बात पैर के निशान से नहीं, दिल के ज़ख़्म से चलती है।
मैंने गिलास रख दिया। चाय छोड़कर उठा।
शबनम आपा ने पीछे से कहा, अंकुश।
मैं रुका।
उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा, तू अभी चार बुज़ुर्गों की सुलह कर आया है। पाँच। और अब छठी करने जा रहा है। पर सुन। बाहर के सच खोलकर तू अपने घर का भाव मत चुका दे।
मैंने कहा, आपा, मुझे घर जाना है। पापा से बात करनी है।
उन्होंने कहा, तो जा। पर पहले इन दोनों को निपटा। क्योंकि जब तू पीपल के नीचे से गुज़रता है और इन दोनों को इस तरह बैठा छोड़ जाता है, तो पीपल तेरी तरफ़ देखता है। और मुझे नहीं पसंद कि पीपल किसी लड़के की तरफ़ शिकायत से देखे।
बच्चे एक साथ उठ खड़े हुए।
सानिया ने कहा, हम चलते हैं।
मैंने कहा, क्यों?
उसने कहा, क्योंकि इस बार हमारा काम है। अब तक हम सिर्फ़ खबर लाते रहे हैं। आज हम अंदर जाएँगे।
चिंटू ने कहा, मैं खेलू काका के पास जाऊँगा।
गुड्डू ने कहा, फिर मैं बेलू काका के पास।
रफ़ीक़ ने कहा, और मैं दोनों के बीच खड़ा रहूँगा, ताकि कोई उठकर भाग न जाए।
मैं हँस पड़ा। पहली बार दिन भर में। फिर मैंने कहा, ठीक है। फिर तीन तरफ़ से होकर आते हैं।
हम चारों दिशाओं से पीपल की तरफ़ बढ़े।
पहले खेलू के पास पहुँचा, तो मैं अकेला था।
करीब जाकर मैंने देखा कि उनकी आँखें बंद नहीं थीं। वो दूर बैलगाड़ी के पहियों को देख रहे थे, जो गली के मुहाने पर खड़ी थी।
मैंने कहा, खेलू काका।
वो मेरी तरफ़ नहीं मुड़े। बस बोले, क्या है बेटा। मैं इनकी तरफ़ देख रहा था। मेरी गाड़ी है। मैं तीस साल से इनकी तरफ़ देखता हूँ और ये आज तक मेरी तरफ़ नहीं देखा।
मैं उनके बगल में बैठ गया। पत्थर ठंडा था।
मैंने कहा, काका, मैं वो काग़ज़ की पुड़िया देख सकता हूँ?
उनका हाथ एक बार जेब पर गया, फिर रुका। फिर वो धीरे से निकाला।
पुड़िया सच में पीली और मैली थी। इतनी मैली कि उसके तह कहाँ खत्म होते थे, समझना मुश्किल था। उन्होंने उसे मेरी हथेली पर रख दिया।
मैंने खोला।
अंदर एक ही चीज़ थी। एक पुराना सिक्का। उस पर गंदगी जमी थी और बीच से घिस गया था, जैसे किसी ने उसे हज़ार बार अंगूठे से रगड़ा हो।
मैंने कहा, यह क्या है।
खेलू काका ने कहा, उधार। ये रिश्ते का उधार है। तीस साल से मैं रोज़ इसे लेकर आता हूँ। रोज़ सोचता हूँ, आज लौटा दूँगा। रोज़ ये काग़ज़ मेरी जेब से नीचे आता है, और रोज़ बेलू के पास जाने की हिम्मत नहीं होती।
मैंने कहा, बात क्या थी, काका। सच बोलिए। मुझे नहीं चाहिए कोई तमाशा। मुझे बस यह चाहिए कि जब मैं पीपल के नीचे से गुज़रूँ, तो मुझे शिकायत वाली पीठ न दिखे।
खेलू काका चुप रहे। बहुत देर।
फिर बोले, तीस साल पहले मेला था। बड़े तालाब पर। रात। झूले पर मेरा बेटा घायल हो गया। सिर फूट गया, खून बह रहा था। मैं गोद में लेकर भागा। डॉक्टर ने कहा, पैसे पहले, औरत ने कहा, चार बीस रुपये।
मेरे पास पैसे थे। जेब में थे।
उन्होंने रुककर मेरी तरफ़ देखा।
मैंने कहा, तो आपने क्यों नहीं दिए।
मैंने इसलिए नहीं दिए क्योंकि उस वक़्त मेरे पास भी वही पैसे थे जो मेरे बेटे की जान थे। और मुझे लगा, अगर मैं इसे दे दूँगा, तो बचेगा क्या हाथ में? जब ज़िंदगी में सब कुछ जाता रहा हो, तो आदमी आख़िरी चीज़ पर बैठ जाता है। मैं बैठ गया।
तो फिर बेलू ने दिए?
उन्होंने कहा, बेलू ने दिए। पर उसने पैसे गिनते हुए कहा — तेरे पास तो बारह आने भी नहीं। ये ले। और याद रखने, ये उधार है।
खेलू काका ने सिक्का मुट्ठी में बंद कर लिया।
मैंने कहा, और उस एक लाइन से तीस साल बर्बाद हो गए।
उन्होंने कहा, वो लाइन से नहीं हुआ। मेरी उस चुप्पी से हुआ। उस रात मेरे बेटे का सिर सिल रहा था और मैं बाहर खड़ा यह सोच रहा था कि भाई ने बारह आने कहकर मेरी बेच दी। मुझे शर्म आई। शर्म से गुस्सा बनता है, बेटा। और गुस्से से चुप्पी।
मैंने कहा, और ये सिक्का?
उसने कहा, अगले दिन मैंने बेलू के दरवाज़े पर ये सिक्का रख दिया। आधा हिस्सा। सोचा, बाक़ी भी दूँगा, पूरा हिसाब करूँगा। पर अगली सुबह वो लौटकर यही सिक्का मेरी चौखट पर रख गया। दोनों ने एक-दूसरे को कुछ नहीं कहा। बस सिक्का दरवाज़ों के बीच घूमता रहा। फिर मैंने इसे जेब में रख लिया। तीस साल से लौटाने निकलता हूँ, और वो सिक्का जेब में ही रह जाता है।
मैं उठ खड़ा हुआ।
वो बोले, कहाँ जा रहे हो?
मैंने कहा, आपसे एक वादा चाहिए।
कैसा वादा?
अब आप उस सिरे पर बेलू काका के सामने बैठिए और सच बोलिए। पूरा सच। सिक्के की कहानी।
उन्होंने कहा, तीस साल बाद मैं उसके सामने क्या कहूँगा ये छोटा लड़का?
मैंने कहा, यही छोटा लड़का आपसे कह रहा है — कुछ छोटा ही कहिए। बड़ा बोलने की ज़िम्मेदारी मेरी है।
वो हँसे। तीस साल में पहली बार, मुझे पता नहीं, पर मुझे लगा वो हँसे।
वो उठे और मेरे साथ चले।
दूसरी तरफ़ गुड्डू बेलू काका के साथ खड़ा था। बेलू काका के हाथ में एक मोटी कॉपी थी, जिसका रंग अब पीला पड़ गया था। रफ़ीक़ बिल्कुल बीच में ज़मीन पर बैठा पत्थर से खेल रहा था, और सानिया चबूतरी के किनारे पर बैठी कॉपी खोल के बीच फँसे पन्ने देख रही थी। चिंटू गुमटी की तरफ़ भाग गया था। पाँच मिनट बाद वो लौटा, हाथ में एक कटोरी में गरम समोसे और शबनम आपा की एक पुरानी चादर।
शबनम आपा बाहर खड़ी थीं। उन्होंने तौलिया कमर में खोंसा हुआ था और हाथ में चिमटी थी।
खेलू काका चबूतरी के दूसरे सिरे पर पहुँचे। बेलू काका ने सिर उठाया।
दोनों ने एक-दूसरे को देखा। तीस साल में पहली बार, आँखों में। और चबूतरी पर जो सन्नाटा फैला, वो शोर से बड़ा था।
बेलू काका ने पहले कहा, बैठ।
खेलू काका बैठ गए।
मैं बीच में नहीं बैठा। मैं पीछे खड़ा रहा, पीपल के तने से पीठ टिकाकर। सानिया मेरे पास आई। शबनम आपा ने चादर सिर पर रख ली और आँगन में से जाती हुई औरतों की तरह खड़ी रहीं।
खेलू काका ने पुड़िया उनकी तरफ़ सरका दी। काग़ज़ फटा हुआ था। सिक्का उसके अंदर से बाहर गिरा और चबूतरी पर खनका।
बेलू काका ने उसे देखा।
उन्होंने कहा, ये तो… ये तो मैं… ये मैं तेरी चौखट पर रख आया था।
खेलू काका ने कहा, और मैंने जेब में रख लिया। तीस साल के लिए।
बेलू काका ने कॉपी मेज़ से… माफ़ कीजिए, चबूतरी से उठाई। खोली। उन्होंने उल्टे हाथ से, धीरे-धीरे पन्ने पलटे। हर पन्ने पर एक लाइन थी। हर महीने की तारीख़ पर एक ही लाइन। लौटाया।
मैंने पूछा, काका, ये क्या है।
बेलू काका धीरे बोले, मेरी तरफ़ से जवाब।
खेलू काका ने पूछा, किसका।
बेलू काका ने कहा, तेरे सिक्के का। जब तूने चौखट पर रखा, मैंने सोचा, भाई ने पैसे लौटाने की कोशिश की। मैंने सोचा, ये आधा है। आधा लौटाकर किसी ने क्या इज़्ज़त बचाई। मैंने सोचा, जब पूरा आएगा, तब बात करूँगा। फिर साल बीत गया। फिर तीस। और मैं हर महीने की पहली तारीख़ को ये कॉपी खोलता हूँ और लिखता हूँ — लौटाया। मैं कुछ लौटाया नहीं। बस लिखता हूँ। जैसे खुद को सज़ा दे रहा हूँ।
कुछ देर कुछ नहीं बोला गया।
फिर खेलू काका ने कहा, बेलू।
बेलू काका ने कहा, हूँ।
खेलू काका ने कहा, उस रात मेरे पास पैसे थे। जेब में थे। मैंने देने से पहले एक बार सोचा। और यही सोच मुझे तीस साल ले डूबा।
बेलू काका ने सिर झुका लिया।
उन्होंने कहा, और मैंने उस रात कह दिया था। तेरे पास बारह आने नहीं। मैंने कहा था। मैंने पैसे देने से पहले कहा था। मुझे लगा तू हँसी में उड़ा देगा। और तब मैं डर गया कि अगर मैं इतनी देर से पैसे दूँगा तो तू समझेगा कि मैंने तेरे बेटे की जान पर एहसान किया है। इसलिए मैंने पहले एक कड़वी बात कह दी, ताकि दोनों बराबर रहें।
खेलू काका की आँखें भर आईं।
उन्होंने कहा, तूने मुझे तीस साल उधार दिया और मैंने तुझे तीस साल शक दिया।
बेलू काका ने कहा, और मैंने सोचा कि मेरे रहते तेरे पास पैसे नहीं थे। मैंने सोचा, एहसान करने की इच्छा से मैंने कह दिया। इसके लिए मैं कभी माफ़ी नहीं माँगी, क्योंकि माफ़ी माँगने का मतलब होता कि मैंने सच में कहा था। और मुझे वो सच झेलना नहीं था।
अब अंकुश की बारी थी।
मैं आगे आया। मैंने सिक्का उठाया। दोनों के बीचों-बीच रखा।
मैंने कहा, अब यहाँ एक बात होगी। दोनों एक-एक बात बोलेंगे। सच्ची। माफ़ी नहीं, सिर्फ़ सच। माफ़ी अपनी जगह खुद आ जाएगी।
बेलू काका ने पहले कहा, मुझे इतना डर था कि मैंने पहली बार में ही उधार का ज़हर घोल दिया।
खेलू काका ने कहा, मुझे इतनी शर्म आई कि मैंने तेरा रास्ता हमेशा के लिए बंद कर दिया।
फिर दोनों एक साथ बोले। एक ने कहा, मुझे माफ़ कर दे, दूसरे ने कहा, मैंने तेरे बेटे की जान बचाई थी, अब मेरा दिल बचा ले।
और फिर कुछ ऐसा हुआ जो मैंने पहले किसी में नहीं देखा।
बेलू काका झुके और उन्होंने खेलू काका के पैर के अंगूठे के पास वो टेढ़ी लकीर अपने हाथ से छुई। जैसे तीस साल पुराना ज़ख़्म पढ़ रहे हों। और खेलू काका ने अपना हाथ उनके सिर पर रख दिया।
दोनों रोए। बस दो मिनट।
तभी मेरी जेब में घंटी बजी।
उतनी देर में गली में जितने लोग थे, सब रुक गए। चाय की गुमटी पर शबनम आपा की चिमटी रुक गई। स्कूल की छत से पतंग उड़ाने वाले बच्चे रुक गए। उस्ताद तुफ़ैल के कमरे से कुछ देर बाद हारमोनियम की पहली सुर निकली और रुक गई।
घंटी बोली, अड़तालीस।
मैंने फुसफुसाकर कहा, अड़तालीस किस चीज़ के।
घंटी बोली, तेरे हाथ में। अब भी गिनता है? मैंने उलझनों को जोड़ दिया, तेरे हाथ से नहीं, तेरे सब्र से। अड़तालीस।
मैंने पूछा, अब कुल कितने।
घंटी ने कहा, गिनती भूल जा। जिस दिन घर जुड़ेगा, उस दिन गिनेंगे। आज तू बस इतना सुन ले — पीपल के नीचे ये आख़िरी नहीं है।
मैंने कहा, क्या मतलब।
घंटी ने कहा, आज रात तेरे घर में जो है, वो पीपल के नीचे के किसी भी सच से बड़ा है।
और वो फिर ठंडी हो गई।
मैं हाथ जेब से बाहर निकाल ही रहा था कि दर्ज़ी की दुकान का दरवाज़ा खुला।
उस्ताद अली बक्श बाहर आए।
न चश्मा पहना हुआ, न पेंसिल कान पर। एक हाथ अलमारी के किवाड़ पर, जैसे अभी-अभी उठे हों और उन्हें सहारा चाहिए। उनकी सिलाई मशीन की टिक-टिक बंद थी। गली की सारी आवाज़ें आज अचानक कम हो गईं, जैसे घंटी के बजने के बाद गली खुद को चुप कर लेना चाहती हो।
उस्ताद ने एक बार चारों तरफ़ देखा। चबूतरी पर दोनों भाइयों को देखा। बच्चों को देखा। शबनम आपा को देखा। और फिर मुझे।
उनकी आँखों में कुछ था जो मैंने कभी नहीं देखा था। गुस्सा नहीं। डर।
उन्होंने कहा, अंकुश।
मैंने कहा, उस्ताद, मैंने घंटी नहीं बजाई।
वो मेरी तरफ़ आए। धीरे। उनके हाथ मेरे कंधे पर पड़े और उन्होंने मुझे चबूतरी से दूर, दर्ज़ी की दुकान के कोने में खींच लिया। मेरे पीछे सानिया और चिंटू भागने लगे, पर शबनम आपा ने हाथ उठाकर उन्हें रोक दिया।
उस्ताद ने कहा, मैंने तुझसे कहा था नहीं बजाना। तूने बजा दी।
मैंने कहा, उस्ताद, खुद बजी। मैंने जेब में हाथ डाला भी नहीं।
वो एक पल मेरी तरफ़ देखते रहे। फिर उनका हाथ मेरे कंधे से हटा।
उन्होंने धीमे से कहा, खुद बजी। यानी घंटी ने खुद को सुना दिया।
मैंने कहा, क्या गलती की मैंने।
उन्होंने कहा, आज तक ऐसा नहीं हुआ था।
उन्होंने पीपल की तरफ़ देखा और एक लंबी साँस ली।
उन्होंने कहा, घंटी दो हाथों की मिरासी है। ये मैंने तुझे कल शाम कहा था। पर एक बात कहना भूल गया। मिरासी सिर्फ़ चीज़ नहीं होती। मिरासी एक दस्तूर होती है। और दस्तूर कहता है कि जब घंटी खुद बजे, तो उसका मतलब है कि अब उसे दिखना पड़ेगा। छुपी घंटी से बजी घंटी बड़ी होती है।
मैंने कहा, तो अब।
उन्होंने कहा, अब मेरी एक ही सलाह है। अभी किसी सभा में मत जा। अभी बाज़ार में इसे लेकर मत खड़ा हो जा। अभी बस घर जा। क्योंकि जो घंटी खुद बजी है, वो बाहर की सभा के लिए नहीं, घर के सन्नाटे के लिए बजी है।
मैंने कहा, उस्ताद, मीरा आठ बजे आ रही है। मेरे घर।
वो हँसे। एक छोटी सी हँसी।
उन्होंने कहा, तो मीरा को भी बैठा लेना उसी बातचीत में।
मैंने कहा, वो मुझ पर इल्ज़ाम लगाएगी। वो कहेगी कि मैं लोगों को बेवकूफ़ बना रहा हूँ।
उन्होंने कहा, अंकुश, अगर तेरे पास सच है, तो बेवकूफ़ वही बनेगा जो इल्ज़ाम लगाता है। तेरे काम को नहीं, तेरे सच को सामने रखना। और जब वो तेरे बाबा के अंगूठे के काग़ज़ की बात करे, तो उसे वो काग़ज़ देखने को कह।
मेरा दिल ज़ोर से धड़का।
मैंने कहा, उस्ताद, आपका नाम उस काग़ज़ पर गवाह की जगह है।
उन्होंने कहा, मुझे पता है।
मैंने कहा, और आपने कहा था कि पचास साल पहले जो आपने छोड़ा था वो यही घंटी थी।
उन्होंने कहा, हाँ।
मैंने कहा, आपने घंटी क्यों छोड़ी।
कुछ देर वो चुप रहे।
तभी गली के मुहाने से एक सफ़ेद गाड़ी की रोशनी आई। बड़ी, चमकदार। गाड़ी धीमी हुई, थोड़ी रुकी, तब किसी ने अंदर से खिड़की उतारी और बाहर झाँका। मैंने सिर्फ़ एक हाथ देखा। सफ़ेद कुर्ते की आस्तीन और हाथ में एक काग़ज़, जिसे वो रोशनी में देख रहे थे। फिर खिड़की चढ़ी, गाड़ी आगे बढ़ गई, और गली में धूल का एक बादल पीछे छोड़ गई।
उस्ताद ने उस गाड़ी को देखा। उनका जबड़ा कसा।
उन्होंने कहा, अंकुश, अंदर चल।
हम दुकान के पीछे वाले कमरे में गए। उन्होंने दरवाज़ा बंद किया। एक पुराना बल्ब जल रहा था, उसकी लाइट फीकी थी और मकड़ी के जाले उसके कोने को जोड़कर दीवार तक गए थे। मेज़ पर कपड़े की गोलियाँ रखी थीं।
उन्होंने ट्रंक की तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़।
उन्होंने कहा, आज रात जब तू घर बैठेगा और घंटी से पूछेगा, तो मैं चाहता हूँ कि तू एक बात याद रखे। घंटी तेरे घर के तीसरे सच की तरफ़ इशारा कर रही है। अब तक तूने गली के बुज़ुर्गों के दो-दो सच खोले। आज तक के सारे सच बाहर के थे। घर का सच भीतर का होता है। और भीतर का सच तू बिना लड़े नहीं खोल पाएगा। क्योंकि भीतर के सच पर तेरा अपना हाथ होता है।
मैंने कहा, मेरा हाथ?
उन्होंने कहा, तू कल सुबह से पूछ रहा है कि घर चुप क्यों है। मैंने तुझे तीन बार यही पूछा। तू टालता रह
॥
"तू टालता रहा।"
उस्ताद ने यह वाक्य ऐसे कहा जैसे कोई पुरानी सिलाई मशीन आख़िरी टाँका लगाकर रुक गई हो।
मैं चुप खड़ा रहा। कमरे में पुराने कपड़े की, धूल की और थोड़ी सी सीलन की गंध थी। ऊपर लटकता बल्ब धीमी साँस ले रहा था, और मकड़ी का जाला उसके कोने से दीवार तक इस तरह जुड़ा था जैसे कोई बूढ़ा हाथ पकड़कर चल रहा हो।
"मैंने तुझसे तीन बार पूछा," उस्ताद ने चश्मा उतारते हुए कहा, "घर चुप क्यों है। पहली बार तूने कहा, दुकान का हिसाब देख रहा हूँ। दूसरी बार कहा, टिंकू अकेला है। तीसरी बार तू चुप ही रहा।"
मैंने कहा, "उस्ताद, उस वक़्त…"
"चौथी बार तू खुद पूछने आया है।" उन्होंने कमीज़ के कोने से चश्मा पोंछा और फिर पहन लिया। "अब सुन। भीतर का सच बाहर के सच जैसा नहीं होता। बाहर के सच में तू दर्ज़ी है। भीतर के सच में तू कपड़ा है। दर्ज़ी कपड़े को काट सकता है, अंकुश। कपड़ा खुद को नहीं काटता।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
मैंने कहा, "तो मैं घर का सच कैसे खोलूँगा?"
उन्होंने ट्रंक की तरफ़ देखा। ट्रंक खुला था, अंदर कपड़े की गोलियाँ पड़ी थीं और सबसे ऊपर वो काग़ज़, जिस पर मेरे पापा का अंगूठा था। उस्ताद ने उसे नहीं छुआ। जैसे उस काग़ज़ को छूने में कोई पुराना दर्द फिर जाग जाएगा।
"घर का सच तू बैठकर नहीं खोलेगा," उन्होंने कहा। "वो सच तेरे हाथ से निकलेगा, तेरे मुँह से निकलेगा, और सबसे पहले तेरे अपने कान को सुनना पड़ेगा। और अंकुश, सबसे मुश्किल सच वो होता है जो तू खुद को बोले और खुद हँसकर टाल दे।"
मैंने कहा, "आप मुझे डरा रहे हैं।"
उन्होंने कहा, "डरा नहीं रहा। बचा रहा हूँ। जा, सो जा। सुबह दिमाग़ ठंडा रहता है।"
मैंने दरवाज़े की तरफ़ कदम बढ़ाया। फिर रुका।
मैंने कहा, "उस्ताद, वो सफ़ेद गाड़ी। उसमें जो हाथ काग़ज़ देख रहा था…"
उस्ताद ने मेरी बात काटी। "उस गाड़ी का नंबर मत गिनवा। उसका रंग मत पहचान। उसका नाम मत रख। केवल इतना याद रख, कि उसमें बैठा आदमी काग़ज़ पढ़ रहा था, गाड़ी से उतरकर देख नहीं रहा था। जो आदमी गाड़ी में बैठकर काग़ज़ पढ़ता है, वो काग़ज़ से डरता है। और जो काग़ज़ से डरता है, वो कभी न कभी उस काग़ज़ को खोलकर देखेगा।"
उन्होंने मेरे कंधे पर हल्का हाथ रखा।
"कल गली में खड़ा होना," उन्होंने कहा। "पीपल के नीचे। सबसे किनारे वाले दो बुज़ुर्गों को देखना। जो एक-दूसरे की तरफ़ नहीं देखते। मक़बूल और रामस्वरूप। तूने कभी नाम सुना है?"
मैंने कहा, "नहीं।"
"तो सुन। बारह साल से उनके बीच एक कुत्ता बैठा है। और दोनों उस कुत्ते को हटाने की बात नहीं करते।"
मैंने पूछा, "कुत्ता?"
उन्होंने कहा, "कालू। जो अब नहीं है। मरा है। पर बैठा है। बारह साल से।"
मैं कुछ देर खड़ा रहा। फिर मैंने कहा, "उस्ताद, आपका नाम उस काग़ज़ पर गवाह की जगह लिखा है। कल सुबह जब मेरे पापा बोलेंगे, तो…"
"तो मुझे भी बोलना पड़ेगा," उन्होंने कहा। "मैं जानता हूँ। मैं बार-बार यही सोच रहा हूँ कि बोलूँगा क्या। पचास साल की चुप्पी के बाद ज़ुबान पहले बोलती नहीं, काँपती है। पर जिस दिन बोलेगी, उस दिन उसका आवाज़ सबसे ऊँची होगी।"
मैं दरवाज़े से बाहर निकला।
रात आधी से ज़्यादा बीत चुकी थी। गली में बत्ती की रोशनी पीली और थकी हुई पड़ी थी। पीपल का पेड़ अंधेरे में इतना बड़ा लग रहा था जैसे गली पर किसी ने हाथ रख दिया हो।
मैं घर पहुँचा तो दरवाज़ा खुला था। माँ दरवाज़े के पास बैठी थीं, हाथ में हिसाब की कॉपी, पर आँखें उस पर नहीं थीं।
मैंने कहा, "माँ, इतनी रात तक क्यों जाग रही हो?"
उन्होंने कहा, "चूल्हा बंद करके कॉपी देखने बैठी थी। और कॉपी देखते-देखते सोचने लगी। सोचने में वक़्त कैसे निकल गया, पता नहीं चला।"
काजल भी जाग रही थी। वो चारपाई पर बैठी थी और उसके हाथ में कोई किताब नहीं थी। यही सबसे बड़ी बात थी। काजल के हाथ में किताब न होना, जैसे चाय में चीनी न हो।
मैंने पूछा, "क्या हुआ?"
काजल ने कहा, "पापा ने कुछ नहीं खाया। रोटी रख दी, ठंडी हो गई, फिर भी नहीं उठाए।"
मैंने पापा की तरफ़ देखा। वो अंधेरे कोने में बैठे थे, घुटने मोड़कर, दोनों हाथ घुटनों पर। पंखा उनके सामने फर्श पर खुला पड़ा था, तार टूटा हुआ। वो उसे ठीक नहीं कर रहे थे। बस उसे देख रहे थे।
मैं उनके पास बैठ गया।
कुछ देर कोई कुछ नहीं बोला। माँ ने धीरे से कॉपी बंद की। काजल ने चारपाई पर लेटने की जगह बदली।
मैंने कहा, "पापा, कल सुबह दस बजे।"
उन्होंने सिर हिलाया।
मैंने कहा, "आप बोलेंगे ना?"
उन्होंने कहा, "बोलूँगा।"
फिर वो चुप हो गए। और उस चुप्पी में जो बोला गया, वो यह था कि बोलना उनके लिए इतना आसान नहीं था जितना मैं समझ रहा था।
मैंने कहा, "मैं कल पीपल के नीचे मक़बूल चाचा और रामस्वरूप काका के पास बैठूँगा।"
पापा ने पहली बार सिर उठाया।
उन्होंने कहा, "मक़बूल?"
"हाँ। उस्ताद ने बताया।"
पापा ने धीरे से कहा, "मक़बूल चाचा मेरे पापा के दोस्त थे। जब दादा का बुखार चढ़ा था, उस रात मक़बूल चाचा ही पास बैठे थे। दवा लाने के पैसे वो भी जोड़ रहे थे।"
मैं स्तब्ध रह गया।
"फिर बारह साल से वो किसी से नहीं बोलते?"
पापा ने कहा, "बोलते हैं। रामस्वरूप से नहीं बोलते। बाकी सबसे बोलते हैं।"
काजल ने चारपाई से कहा, "दादा के जाने के बाद पापा तीन दिन गली में नहीं आए। तीन दिन?"
पापा ने कहा, "चार दिन।"
माँ ने कहा, "चार दिन रोटी को हाथ नहीं लगाया।"
यह बात माँ ने ऐसे कही जैसे आज भी उनका गला भर रहा हो।
मैं उठा। माँ ने मेरी तरफ़ देखा और कहा, "कुछ ठंडा पड़ा है, खा ले।"
मैंने कहा, "माँ, सुबह खाऊँगा।"
"सुबह तू उसी दुकान पर भाग जाएगा।"
"तो टिफ़िन में डाल देना।"
"टिफ़िन में डालूँगी तो तू उसे खोलेगा नहीं।"
"तो खोलूँगा।"
"अंकुश…"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो बात थी जो जाँच के बाद से आई थी और अब जाने का नाम नहीं ले रही थी।
मैंने कहा, "माँ, कल जाँच है। मैं साथ चलूँगा।"
उन्होंने कहा, "तू अपना काम कर। काजल है ना।"
काजल ने कहा, "मैं हूँ।"
मैंने कहा, "अच्छा।"
मैं पीछे वाले कमरे में गया। चारपाई पर लेटा। छत की तरफ़ देखा। छत पर दरारें थीं जो मुझे बचपन में नक्शे जैसी लगती थीं। आज वो दरारें सवाल जैसी लग रही थीं।
जेब में घंटी थी। ठंडी। बिल्कुल चुप।
मैंने धीरे से कहा, "आज मत बोल। मैं सोना चाहता हूँ।"
घंटी नहीं बोली। बस थोड़ी गरम हुई, जैसे कहे हो, ठीक है, पर सुबह तेरी खैर नहीं।
सुबह मैंने दुकान सात बजे खोली। यानी गली में सबसे पहला झटका। मैंने मेज़ पर औज़ार रखे, टब में पानी डाला, बोर्ड की तरफ़ देखा। बोर्ड पर धूल जमी थी। मैंने उसे कपड़े से पोंछा तो नीचे पुराने अक्षर उभरकर आए।
"शंकर यादव और बेटे।"
मैं उसी को देख ही रहा था कि दौड़ते कदमों की आवाज़ आई।
चिंटू पहले आया, पीछे गुड्डू, और सबसे पीछे रफ़ीक़, जो इस तरह हाँफ रहा था जैसे पूरी गली दौड़कर आया हो।
चिंटू ने कहा, "भाई, वो दोनों फिर आ गए।"
"कौन दोनों?"
सानिया दरवाज़े पर आई, हाथ में लाल कवर वाली कॉपी। उसने कहा, "मक़बूल चाचा और रामस्वरूप काका। दोनों सुबह-सुबह आ गए। एक इस कोने पर बैठे हैं, दूसरा उस कोने पर। पीपल के नीचे। और भाई, आज कुछ अलग हुआ।"
मैंने कहा, "क्या हुआ?"
चिंटू ने कहा, "काका ने दो गिलास पानी लाया। एक खुद पिया, दूसरा चुपचाप चाचा के पास रख दिया।"
रफ़ीक़ ने कहा, "और चाचा ने कुछ नहीं कहा। बस पी लिया।"
सानिया ने कहा, "मैंने लिख लिया है। तीन दिन से यही हो रहा है। सोमवार, मंगल, बुध।"
मैंने कहा, "तुम चारों डिटेक्टिव हो या चुगलखोर?"
चिंटू ने बिना झिझक कहाचिंटू ने बिना झिझक कहा, "भाई, हम चुगलखोर नहीं हैं। हम गली के कान हैं। कान में दिमाग़ नहीं होता, इसलिए हम सुनते ज़्यादा हैं, बोलते कम।"
मैं हँस पड़ा। "यह ज्ञान तुझे कहाँ से आया?"
"रफ़ीक़ के भाई की किताब से।"
रफ़ीक़ ने तुरंत कहा, "वो किताब लौटानी है, चिंटू। अभी तक मेरे घर की अलमारी में रखी है, और मेरे भाई को पता भी नहीं।"
"लौटा देंगे।" चिंटू ने हाथ हिलाया। "पहले भाई को बता दें।"
सानिया ने लाल कवर वाली कॉपी खोली और कंधे तक ऊपर उठाकर मेरे सामने रख दी। पन्ने पर उसकी साफ़-साफ़ लिखाई थी। तारीख़, वक़्त, कौन किस कोने पर बैठा, कितनी देर बैठा।
मैंने कहा, "तुम यह सब रोज़ लिखती हो?"
"जो दिखे, वो लिखती हूँ। जो न दिखे, वो बाद में पूछती हूँ।"
"और मैं सोच रहा था कि तुम चारों सिर्फ़ ट्रक गिनने का काम करते हो।"
रफ़ीक़ ने गर्व से कहा, "ट्रक गिनना हमारा पहला काम है, भाई। यह दूसरा है।"
सानिया ने उँगली रखी। "देखो, चार दिन से यही हो रहा है। मक़बूल चाचा सुबह सात बजे आते हैं, पीपल के इस कोने पर चबूतरी पर बैठते हैं। रामस्वरूप काका सात बजकर दस मिनट पर आते हैं, और उस कोने पर बैठते हैं। दोनों के बीच पूरी चबूतरी खाली रहती है। कोई नहीं बैठता।"
मैंने कहा, "कोई नहीं बैठता या कोई बैठने नहीं देता?"
चिंटू ने कहा, "बच्चे बैठते हैं भाई। पर जैसे ही कोई बीच में बैठता है, दोनों की नज़रें ऐसी हो जाती हैं जैसे उस बच्चे ने कुछ बहुत बड़ी ग़लती कर दी हो। इसलिए अब कोई नहीं बैठता।"
सानिया ने कहा, "पर कल कुछ नया हुआ। रामस्वरूप काका उठे, चाचा की लाठी उठाई जो गिर गई थी, और चुपचाप उनके पास रख दी। चाचा ने देखा। कुछ नहीं बोले। पर मैंने देखा, चाचा ने आँखें बंद कर लीं। जैसे कोई दुआ पढ़ रहे हों।"
मेरे अंदर कुछ हिला।
मैंने कहा, "कितने साल से ऐसा है?"
सानिया ने कॉपी बंद की। "मैंने पूछा तो चाचा ने कहा, बारह साल। और फिर वो उठकर चले गए। मुझसे ऐसे जैसे मैंने कुछ ग़लत पूछ लिया हो।"
जेब में घंटी गरम हुई। एक झटका, फिर ठंडी।
मैंने चुपचाप हाथ जेब में डाला और पीछे वाले कमरे की तरफ़ बढ़ा। दरवाज़ा बंद किया, बल्ब जलाया। गुनगुनाता पुराना बल्ब, जैसे हर रात अपनी ही धुन में हो।
मैंने घंटी निकाली। हथेली पर रखी।
मैंने धीरे से कहा, "बारह साल। क्या है यह?"
घंटी ने कहा, "क़ब्र पर बैठे हैं दोनों।"
मेरा हाथ रुक गया।
"क़ब्र? गली में क़ब्र?"
"पीपल के नीचे। जड़ के पास। पत्थर उठा।"
और फिर चुप।
मैंने कहा, "और कुछ?"
"जब पत्थर उठे, तब पूछना। तब मैं बोलूँगी, अभी नहीं।"
मैंने घंटी जेब में रखी और बाहर आया। सुबह काजल माँ को जाँच के लिए अस्पताल ले गई थी। घर में पापा अकेले थे, और वो भी पुराने पंखे के सामने बैठे थे जिसका तार टूटा हुआ था और जिसे वो तीन दिन से ठीक करने के बहाने छू भी नहीं रहे थे। घर आज सच में चुप था। और मैं जानता था कि यह चुप्पी बीमारी की नहीं है, यह उस चीज़ की है जो हम सब मिलकर ढो रहे हैं।
मैं गली में निकला।
मैंने बच्चों से कहा, "तुम चारों पीपल के नीचे जाओ। जड़ के पास एक पत्थर है, जो बाकी ज़मीन से थोड़ा ऊपर है और जिस पर काई जमी है। उसे उठाओ। पर ज़ोर से नहीं। जैसे कोई बुज़ुर्ग का हाथ उठा रहे हो।"
चिंटू ने कहा, "अंदर क्या है?"
"मुझे भी नहीं पता। इसीलिए तुम भेज रहा हूँ।"
वे चारों भागे। मैं धीरे-धीरे उनके पीछे गया।
पीपल की छाँव सुबह भी ठंडी होती है। पक्षी ऊपर शोर कर रहे थे और नीचे चबूतरी पर सिर्फ़ दो आदमियों की साँसें थीं।
मक़बूल चाचा इस कोने पर। सत्तर के आसपास, सफ़ेद दाढ़ी, सिर पर हल्की टोपी, हाथ में पीली तस्बीह जो उनकी उँगलियों में घूम रही थी, पर होंठ नहीं हिल रहे थे। कमर थोड़ी झुकी हुई, जैसे सालों से किसी चीज़ के नीचे दबी हो।
रामस्वरूप काका उस कोने पर। दुबले, गमछा कंधे पर, घुटने पर हाथ रखे हुए, और उनका घुटना सूजा हुआ था जो वो छुपाने की कोशिश कर रहे थे। लाठी उनके बगल में खड़ी थी, बिल्कुल सीधी, इस तरह जैसे कोई सिपाही खड़ा हो।
दोनों के बीच चबूतरी खाली थी। न सिर्फ़ जगह खाली थी, बात भी खाली थी। और जिस चबूतरी पर हर शाम पूरी गली बैठती है, वहाँ सिर्फ़ दो लोगों की चुप्पी बैठी थी और वो चुप्पी बारह साल की थी।
मैंने कहा, "चाचा, सलाम।"
मक़बूल चाचा ने सिर हिलाया। "बेटा, तू आज वक़्त से पहले आ गया।"
"आज मेरा वक़्त किसी और का है।"
काका ने मेरी तरफ़ देखा। "किसका?"
"आप दोनों का। पर आप दोनों में से कोई बोलता नहीं। इसलिए मैं सोच रहा हूँ, आज मैं उस चीज़ से पूछूँ जो बोलती है।"
तभी चिंटू की आवाज़ आई। छोटे हाथ पत्थर उठा रहे थे और रफ़ीक़ कंधा लगा रहा था।
पत्थर हटा।
नीचे मिट्टी थी, और मिट्टी में एक चीज़ गड़ी हुई थी। मिट्टी का टूटा कटोरा। आधा पत्थर के नीचे दबा, आधा बाहर। और कटोरे के बगल में एक पतली सी लकीर थी, जिसे किसी ने पत्थर के कोने पर खरोंचकर बनाया था। पाँच अक्षर।
भूरा।
मैंने कटोरा उठाया। भीतर सूखी रोटी के टुकड़े थे, जो कई साल पुराने थे और मिट्टी बन चुके थे।
मक़बूल चाचा उठ खड़े हुए। एक झटके में, जैसे कमर का दर्द कहीं भूल गए।
उनकी आवाज़ काँपी। "यह मत छेड़ो।"
रामस्वरूप काका भी खड़े हो गए। उनके हाथ लाठी पर कस गए।
उन्होंने कहा, "चाचा, बच्चों ने किया है। इन्हें मालूम नहीं।"
मक़बूल चाचा ने कहा, "मुझे मालूम है इन्हें मालूम नहीं। पर तू तो जानता है।"
और यही वो वाक्य था। बारह साल की चुप्पी में पहली दरार।
मैंने देखा, रामस्वरूप काका का चेहरा बदल गया। वो कुछ कहने को हुए, फिर रुक गए, फिर मुड़कर जाने लगे।
मैंने कहा, "काका, एक मिनट।"
वो रुके, पर पलटे नहीं।
मैंने कहा, "आज मैं आपसे कुछ पूछने नहीं आया। आज मैं आपको कुछ बताने आया हूँ।"
काका चुप रहे।
"मैंने आज सुबह अपने पापा से पूछा कि घर इतना चुप क्यों है। पापा ने कुछ नहीं कहा। पर उनका हाथ काँप रहा था। और मैं सोच रहा था, पूरी गली में हर बुज़ुर्ग के पास एक ऐसा सच है जिसे उसने अकेले ढोया है, और उस सच का वज़न उसने अपनी चुप्पी से नापा है। चाचा, आपका सच किस वज़न का है?"
मक़बूल चाचा फिर बैठ गए। धीरे से। जैसे किसी ने उनके कंधों से कोई बोझ नहीं उतारा, बल्कि और रख दिया हो।
रामस्वरूप काका भी बैठ गए। एक कदम पीछे, पर बैठ गए।
मैं बीच में बैठ गया। आज पहली बार उस चबूतरी के बीच में कोई बैठा और किसी ने नज़रें नहीं तानीं।
मैंने कहा, "चाचा, भूरा कौन था?"
बारह साल की चुप्पी उस लम्हे में इतनी भारी हो गई कि पीपल के पत्ते भी रुक गए।
मक़बूल चाचा ने होंठ हिलाए, फिर बंद कर लिए।
रामस्वरूप काका ने पहली बार उनकी तरफ़ सीधा देखा। उनकी आँखों में कुछ था जो डर नहीं था। शर्म थी।
मैंने कहा, "मैं आप दोनों से यह नहीं कहूँगा कि ग़लती किसकी है। मैं सिर्फ़ इतना कहूँगा कि चबूतरी के इस कोने से उस कोने तक जो फ़ासला है, वो दो हाथ का है। और आप दोनों उस फ़ासले को बारह साल से नाप रहे हैं। वो फ़ासला आज भी दो हाथ का ही है। बढ़ा नहीं। घटा भी नहीं। यानी वो फ़ासला कभी था ही नहीं।"
मक़बूल चाचा की आँखें भर आईं।
उन्होंने कहा, "भूरा…" और फिर रुक गए। नाम पूरा करने में उन्हें डर लग रहा था, जैसे नाम लेने से चीज़ वापस आ जाएगी और फिर से चली जाएगी।
"भूरा हमारा कुत्ता नहीं था।" उन्होंने धीरे से कहा। "गली का था। किसी का नहीं। पर सुबह चार बजे मेरे दरवाज़े पर आ जाता था, क्योंकि चार बजे मैं रोटी खाता हूँ और उसे पता था कि मेरी रोटी का आधा हिस्सा उसका है। मैं उसका इंतज़ार करता था। कभी-कभी जल्दी खा लेता था ताकि यह न लगे कि मैं उसके लिए बैठा हूँ।"
रामस्वरूप काका ने कहा, "और सुबह वो मेरे घर के बाहर दूध पीता था।"
दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।
मक़बूल चाचा ने कहा, "तुझे पता था कि वो मेरे यहाँ भी आता है?"
"पता था।" काका ने कहा। "पूरी गली को पता था। बस हम दोनों को नहीं पता था कि दूसरे को पता है।"
मैं हँसा। हल्का सा। "यही तो।"
काका ने आगे कहा, "वो गली में आने वाले हर टेम्पो के पीछे भागता था। भौंकता हुआ। हम सब हँसते थे। बच्चे उसे 'टेम्पो इंस्पेक्टर' कहते थे।"
सानिया ने धीरे से कहा, "हमें किसी ने नहीं बताया।"
मैंने कहा, "क्योंकि इन दोनों ने उसका नाम ही बंद कर दिया था।"
फिर आया वो लम्हा जिसके लिए मैं बैठा था।
रामस्वरूप काका ने लाठी दोनों हाथों से पकड़ी, जैसे उससे अपना वज़न सँभाल रहे हों, और कहा, "वो दिन… वो दिन सावन का था। दोपहर। मैं नीम के पत्ते झाड़ने के लिए लाठी लेकर निकला था। तभी गली के मुहाने से एक टेम्पो आया। तेज़। पीली पट्टी वाला। भूरा उसके पीछे भागा, जैसे रोज़ भागता था। मैंने लाठी उठाई। मैंने सोचा, इस बार मैं ड्राइवर को चेताने के लिए लाठी टेम्पो की लोहे की बॉडी पर मारूँगा। आवाज़ होगी, वो रुकेगा।"
वो रुके। उनका गला सूख रहा था। मैंने पीछे वाले कमरे से एक स्टील का गिलास पानी लाकर उनके हाथ में रखा। उन्होंने पूरा पी लिया।
फिर कहा, "लाठी टेम्पो पर नहीं पड़ी। भूरा अचानक पलटा। मेरी ही लाठी उस पर पड़ी। पीछे से। वो चीखा और सड़क पर गिरा। और उसी वक़्त टेम्पो का पहिया —"
काका ने हाथ से अपना मुँह ढक लिया। "मैंने आँखें बंद कर लीं। बस एक पल के लिए। जब खोलीं, तो सब ख़त्म था। और मेरे हाथ में लाठी थी, ऊपर उठी हुई, हवा में।"
चबूतरी पर सन्नाटा। एक बच्चा भी नहीं हिला। चिंटू के होंठ काँप रहे थे और वो किसी को नहीं बता रहा था।
मक़बूल चाचा ने धीरे से कहा, "और मैं उसी वक़्त दरवाज़े पर आ गया था। मैंने तुझे उसी हालत में देखा। लाठी उठी हुई। मैंने सोच लिया।"
"तूने कभी पूछा नहीं।" रामस्वरूप काका ने कहा।
"तूने कभी बताया नहीं।"
दोनों में से कोई नहीं बोला। यही तो दिक्कत है। एक ने पूछना छोड़ दिया, दूसरे ने बताना छोड़ दिया, और बीच में बारह साल बैठ गए।
मैंने कहा, "काका, अब आगे।"
काका ने मेरी तरफ़ देखा। "आगे क्या?"
"आपने रात को क्या किया।"
काका की आँखों से पानी बह रहा था और वो उसे पोंछ भी नहीं रहे थे। "रात को मैं वापस आया। अपनी बीवी की चादर लेकर, ताकि कोई देख न ले। मैंने उसे अपने हाथों से उठाया। पीपल के नीचे गड्ढा खोदा। खुद। और उसे उसी कटोरे के साथ दफ़ना दिया जिसमें मैं उसे दूध देता था। फिर लकीर खरोंची। नाम लिखा। और मैं उसी रात से यहाँ बैठता हूँ। उसी जगह पर। उसके सिरहाने।"
मक़बूल चाचा ने बीच में कहा, "फिर तूने मुझे बताया क्यों नहीं?"
"क्योंकि मैं डर गया था।" काका ने सीधा कहा, बिना लाग-लपेट। "मैंने सोचा, अगर मैं बताऊँगा कि मेरी लाठी भी उस पर पड़ी थी, तो तू कहेगा कि मैंने मारा। और मैं वो सुनने को तैयार नहीं था। मैं तेरे ग़म से नहीं डरा। मैं अपने पर लगे इल्ज़ाम से डरा। और यह डर तेरे ग़म से बड़ा निकला। यह मेरी ग़लती है, मक़बूल। सिर्फ़ मेरी।"
मक़बूल चाचा ने तस्बीह हाथ से रखी और काका का हाथ पकड़ा। "नहीं।"
"क्या नहीं?"
"ग़लती सिर्फ़ तेरी नहीं है। मैंने एक बार भी नहीं पूछा। मैंने देखा और मान लिया। बारह साल मैंने तुझे सज़ा दी, बिना एक बार तेरी ज़ुबान सुने। मैं तुझसे रोज़ मिलता हूँ। तेरे घर के सामने से गुज़रता हूँ। तेरे बच्चे की शादी में गया। तेरी बीवी के जाने पर मैं तेरे दरवाज़े पर खड़ा रहा और एक शब्द नहीं बोला। और मैं अंदर से जलता रहा कि तूने मेरा कुत्ता मारा।" उनकी आवाज़ टूटी। "मेरा कुत्ता। जो तेरा भी था। जिसे मैंने कभी तेरा हिस्सा नहीं माना।"
फिर वो दोनों उठे। और चबूतरी पर, पीपल के नीचे, उस छोटी सी क़ब्र के पास, जिस पर चबूतरी बनी थी और जिस पर बारह साल से कोई नहीं बोला था, दो आदमी एक-दूसरे से लिपट गए। दोनों रो रहे थे, बच्चों की तरह, बिना कोई शब्द, बस कंधे हिल रहे थे।
रामस्वरूप काका ने कहा, "मुझे माफ़ कर दे।"
मक़बूल चाचा ने कहा, "तेरे बिना यह गली मुझे अधूरी लगती थी, भाई। माफ़ी की बात ही क्या। तू बैठ जा।"
और सच में, उन्होंने एक-दूसरे से माफ़ी नहीं माँगी। उन्होंने एक-दूसरे को चबूतरी पर बैठने की जगह दी। माफ़ी तो बस साथ में आ गई।
उसी पल मेरी जेब में घंटी बजी।
इतनी तेज़ कि चिंटू उछल पड़ा। "अरे, कुछ बजा!"
घंटी ने कहा, "बयालीस।"
और फिर इतना ही। "दो बेज़ुबान बैठे थे। एक ज़ुबान मिली।"
मैंने होंठ दबाकर मुस्कुराया। बच्चों ने मेरी जेब की तरफ़ देखा, यहाँ तक कि चबूतरी पर बैठे दोनों भी देखने लगे।
मक़बूल चाचा ने कहा, "यह क्या था?"
मैंने कहा, "चाचा, यह मेरी साइकिल की घंटी है। कभी-कभी बूढ़ी च…ीज़ें अपनी मर्ज़ी से बोल देती हैं। ज़ंग लगी हो तो ज़ुबान भी ज़ंग खा जाती है।"
मक़बूल चाचा ने माथा खुजाया, कुछ कहना चाहा, फिर चुप कर गए। रामस्वरूप काका ने मेरी जेब की तरफ़ देखा, ऐसे जैसे किसी बच्चे की जेब में चिड़िया बैठी हो और वो उड़ न जाए।
तभी चिंटू बोला, "अंकुश भाई, चाय की गुमटी पर आपकी मीरा दीदी खड़ी हैं और उनका कैमरा चालू है।"
मेरा पेट एक झटके में ठंडा हो गया।
मैंने चबूतरी से उठते हुए कहा, "चिंटू, वो मेरी नहीं है। और कैमरा चालू है तो और भी अच्छा, मुझे भी अपनी शक्ल देख लेने दो।"
बच्चे हँसे। मक़बूल चाचा ने कहा, "बेटा, मैं और रामस्वरूप अब रोज़ यहीं बैठेंगे। जब भी बुलाना, हम दोनों एक साथ आएँगे।"
"एक साथ आना ही तो सब कुछ है, चाचा।"
मैं पीपल से निकला और सामने देखा।
मीरा शबनम आपा की गुमटी के सामने खड़ी थी। तिपाई पर कैमरा, लाल बत्ती जल रही थी, और वो अपने फटे बैग से माइक निकाल रही थी। आपा उसके सामने हाथ में लोहे की चिमटी पकड़े खड़ी थीं, ऐसे जैसे कोई कैमरा नहीं, कोई तमाशा रोक रही हों।
मैं वहाँ पहुँचा तो मीरा ने माइक सीधा मेरे मुँह के सामने कर दिया।
"अंकुश यादव, गली के लोगों को बताइए, आप आज किस नाटक की तैयारी में हैं?"
मैंने माइक को हल्के से नीचे किया। "मीरा, कम से कम चाय तो पी लेतीं। आपा की चाय ठंडी नहीं होती, पर आपकी बातें ज़रूर ठंडी कर देती हैं।"
आपा ने तुरंत कहा, "सही कहा भाई। मैं इसे दो बार चाय दे चुकी हूँ, यह पीती नहीं, सिर्फ़ पूछती है।"
मीरा ने आपा की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। उसके माथे पर पसीना था, और उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो सिर्फ़ सच से डरने वाले लोगों की आँखों में होती है — अपने ही हाथों से कुछ टूट जाने का डर।
"अंकुश, आपने कल रात अपने घर में एक सभा की। पापा ने सबके सामने कुछ कबूला। मुझे वो पूरा सुनना है, शब्द-दर-शब्द। लोगों को लगता है यह सब बुज़ुर्गों की सुलह है। मुझे लगता है यह सब आपकी दुकान बचाने की चाल है।"
मैंने कहा, "आपकी बात में एक बात सही है।"
वो चौंकी। "कौन सी?"
"दुकान बचाने की बात। मुझे यह दुकान बचानी है। यह मेरे पापा की है। और यह गली मेरी है।"
"और जो लोग आपके पास आते हैं, जो बुज़ुर्ग रोते हैं — वो सब?"
"वो सब मेरे पास नहीं आते, मीरा। वो अपने पास आते हैं। बारह साल, चालीस साल, पचास साल से जो बोझ किसी ने उतारा नहीं, वो आज उतरा है। इसमें मेरा काम सिर्फ़ इतना है कि मैंने उन्हें बैठने की जगह दी।"
"कैसे दी?"
मैंने जेब से हाथ निकाला। "चाय पीजिए, फिर बताता हूँ।"
उसने माइक नीचे नहीं किया। "मैं आपकी चाय में आपके अंगूठे नहीं लगवाना चाहती।"
शबनम आपा की चिमटी हवा में उठी। "मीरा! बात का भी एक हद होती है। मेरे यहाँ दाल में पानी नहीं, बात में भी नहीं। यह लड़का सुबह से खड़ा है और तू…"
"आपा, रहने दीजिए।" मैंने आपा का हाथ धीरे से नीचे किया। "मीरा जी जो पूछ रही हैं, उनका हक़ है पूछने का। मैं आपको वही बताता हूँ जो कल रात मेरे घर में हुआ। बात बनाने की नहीं, सच कहने की।"
उसने कैमरे की तरफ़ देखा, लाल बत्ती अभी भी जल रही थी। फिर मेरी तरफ़। "बोलिए।"
"मेरे पापा ने पच्चीस साल पहले एक काग़ज़ पर अंगूठा लगाया था। मेरे दादा को बुखार था। दवा के पैसे नहीं थे। सफ़ेद कुर्ते वाला एक आदमी उस काग़ज़ को लेकर आया था। नाम विजय भारद्वाज। शर्त थी — तीस दिन के अंदर। तीस दिन के अंदर दवा आ जाती तो दादा बच जाते। दवा देर से आई।"
मीरा का चेहरा बदला। "आप कह रहे हैं कि काग़ज़…"
"मैं कुछ नहीं कह रहा हूँ। मेरे पापा ने कहा। मेरे सामने। मेरी माँ के सामने। काजल के सामने। आपके सामने।"
"वो काग़ज़ कहाँ है?"
"मेरे पास।"
"दिखाइए।"
मैंने उसकी आँखों में देखा। उसकी आँखें माइक पर थीं, पर उसके हाथ काँप रहे थे।
"मीरा, आप कल रात मेरे घर आई थीं। कैमरा बंद करके आई थीं। आपने पापा की पूरी बात सुनी। आपने माना कि सिर्फ़ पापा की ग़लती नहीं है। आपने वो पुरानी फोटो दिखाई, जिसमें चेन पर घंटी जैसी चीज़ लटकी है। और आज सुबह आप वही सब भूलकर मेरे दरवाज़े पर माइक लेकर खड़ी हैं। ऐसा क्यों?"
उसका हाथ थोड़ा ढीला पड़ा। उसने कैमरे की तरफ़ देखा, फिर उसे बंद कर दिया।
शबनम आपा ने कहा, "अच्छा किया बेटी। मेरी गुमटी तमाशागाह नहीं है।"
मीरा ने माइक बैग में रखा। उसकी आवाज़ धीमी हुई। "अंकुश, अगर तुम्हारे पास सच है, तो मुझे सिर्फ़ एक चीज़ चाहिए। वो सच काग़ज़ पर हो, तारीख़ के साथ, गवाह के साथ। मेरी खबर के लिए नहीं। मेरे अपने लिए। क्योंकि मैं एक बार आधा सच छाप चुकी हूँ और उसे रमा मैडम का घर टूट गया था। मैं अब दोबारा वो नहीं करूँगी।"
मैंने कहा, "तो फिर साथ चलिए, मीरा। मैं आपको काग़ज़ दिखाता हूँ। मेरे पास रखा है।"
हम पैदल उसकी गुमटी से मेरी दुकान की तरफ़ चले। रास्ते में बच्चे दौड़कर आए।
सानिया ने कहा, "अंकुश भाई, अंकुश भाई, सुबह से एक सफ़ेद कुर्ते वाला आपको दो बार ढूँढ चुका है।"
गुड्डू ने कहा, "वो कह रहा था — बोलो इस लड़के से कि दुकान का हिसाब साफ़ करे।"
रफ़ीक़ ने कहा, "मैंने उसे पीछे का रास्ता लेते देखा। उसके हाथ में फ़ाइल थी।"
चिंटू ने कहा, "और उस्ताद काका की दुकान का दरवाज़ा खुला है। उस्ताद काका अंदर बैठे हैं। पर वो बोल नहीं रहे। सिर्फ़ सिलाई मशीन घुमा रहे हैं। बिना धागे के!"
मैं रुक गया।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "उस्ताद अली बक़्श कल से गायब थे।"
"पता है।"
"आपको लगता है वो…"
"मीरा, आप चार बच्चों के साथ गुमटी पर रुकिए। मैं उस्ताद से मिलकर आता हूँ।"
सानिया ने कहा, "हम साथ चलें?"
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। "तुम चारों आज मेरा सबसे ज़रूरी काम करो। गुमटी पर बैठो। जब भी कोई सफ़ेद कुर्ते वाला दिखे, चाय का पतीला गिरा देना। मुझे खबर मिल जाएगी।"
चिंटू ने कहा, "पतीला गिराना गलत बात है, अंकुश भाई। हम पतीला नहीं गिराएँगे। हम चिल्ला देंगे कि कोई चोर आया है। इससे भी तो काम चल जाएगा।"
मैं हँस पड़ा। "ठीक है। चिल्ला देना।"
मैं उस्ताद की दुकान की तरफ़ चला।
दुकान का दरवाज़ा खुला था, पर अंदर अंधेरा था। सिलाई मशीन की टिक-टिक आ रही थी, पर उसमें कोई धागा नहीं था। उस्ताद अपनी लकड़ी की कुर्सी पर झुके बैठे थे, चश्मा नाक पर, और उनके हाथ मशीन के पहिये पर रुके हुए थे।
मैंने दरवाज़े पर दस्तक दी। "उस्ताद।"
वो उठे नहीं। सिर्फ़ इतना कहा, "आ जा।"
मैं अंदर गया। दुकान में कपड़ों के बंडल रखे थे, कुछ अधूरी शर्ट, कुछ बचे हुए बटन, और कान पर पेंसिल यूँ ही फँसी थी।
मैंने कहा, "उस्ताद, कल रात आपकी दुकान बंद थी। मैंने चाबी निकाली। पीछे का कमरा खोला। ट्रंक खोला।"
वो चुप रहे।
"ट्रंक में सबसे ऊपर काग़ज़ रखा था। पापा का अंगूठा था उस पर। गवाह की जगह आपका नाम। और नीचे नाम था — विजय भारद्वाज।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनका हाथ मशीन के पहिये पर कस गया।
"उस्ताद, आपने मुझे कल कहा था कि आपका नाम उस काग़ज़ पर है। आप नहीं आए। आप चले गए। दुकान बंद कर दी। मुझे सिर्फ़ एक काग़ज़ मिला — जिसमें आपने लिखा था कि तेरा घर का तीसरा सच तू है। और चौथा सच भी तू है, वो सच पापा के हाथ में।"
वो मशीन से उठे। धीरे से कुर्सी से खड़े हुए, दीवार पर टँगा एक हल्का बैग उठाया, उसमें से एक चीज़ निकाली, और मेरी तरफ़ बढ़ा दी।
वो एक पुरानी घंटी थी।
मेरी घंटी नहीं थी। इसका रंग थोड़ा अलग था, ज़्यादा गहरा, और उस पर एक छोटा सा फूल खुदा हुआ था।
"यह किसकी है?" मैंने पूछा।
"यह मेरी है। और यह तेरी तरह बोलती नहीं। यह सिर्फ़ सुनती है।"
उन्होंने घंटी मेरी हथेली पर रख दी। उनका हाथ काँप रहा था।
"उस्ताद, यह तो…"
"पचास साल पहले, मेरे पास दो घंटी थीं। दो। यह छोटी और तेरी वाली बड़ी। मेरे भाई इलियास के पास यह जोड़ी थी। हमने यह तंत्र साथ चलाया था।"
उनकी आवाज़ धीमी थी, जैसे कोई बहुत पुरानी डायरी पढ़ रहा हो।
"और फिर?" मैंने पूछा।
"और फिर झगड़ा हुआ। घंटी ने एक सच कहा और हम दोनों की उम्मीदें अलग-अलग हो गईं। मैंने अपनी घंटी ली, उन्होंने अपनी। और हम अलग हो गए। यह घंटी पिछले पचास साल से यही धूल में बंद है।"
मैंने उस घंटी को गौर से देखा। दरवाज़े की तरफ़ से आती हुई सुनहरी लाइट एक आख़िरी पल के लिए मेरी आँखों में गई।
"उस्ताद, अगर ये घंटी भी मिरासी है, तो ये बोलती क्यों नहीं?"
"क्योंकि मिरासी खुद नहीं बोलती। उसे दो ज़ुबानें चाहिए — एक जो देती है, एक जो लेती है। हम दोनों एक-दूसरे से नहीं बोले, तो घंटी क्या बोलेगी?"
वो कुर्सी पर लौटकर बैठे। उनकी आँखें भरी थीं, पर आँसू नहीं आ रहे थे। उनकी आवाज़ सूखी थी, जैसे कोई रेत को पानी समझकर पीता रहा हो।
"अंकुश, अब मैं तुझे बताता हूँ कि कल रात मैं क्यों भागा। तेरे काग़ज़ पर मेरा नाम देखा मैंने। पचास साल बाद।"
उन्होंने अपनी जेब से एक काग़ज़ निकाला, मोड़ा हुआ, किनारों से फटा हुआ।
"मैंने पचास साल पहले इस जाल में पैर रखा था। मैं, इलियास, विजय — हम तीन थे। हम तीनों ने मिलकर एक सभा में लोगों को जोड़ने का अभियान शुरू किया था। हमारे पास दो घंटी थीं, हम तीन थे। एक घंटी इलियास की थी, एक मेरी थी। विजय के पास कुछ नहीं था। पर विजय के पास ज़ुबान थी। और ज़ुबान ने हमें बाँट दिया।"
मैंने कहा, "कैसे?"
"उसने हमसे कहा — घंटी किसी एक की होनी चाहिए। तीन लोगों में नहीं चलती। और जब टूटने लगी, तो इलियास ने मुझ पर इल्ज़ाम लगाया कि मैंने विजय से हाथ मिला लिया है। विजय ने इलियास से कहा कि मैं घंटी बेचना चाहता हूँ। मैंने किसी को कुछ नहीं बेचा था। पर उस समय मैं किसी से नहीं बोला। और जो नहीं बोलता, उसके खिलाफ़ कही हुई बात सच लगने लगती है।"
उन्होंने दीवार पर टँगी एक पुरानी तस्वीर को देखा। तस्वीर में एक दुकान थी, दो कुर्सियाँ थीं, और बाहर खड़े हुए लोग — तीन।
"मैं उस दिन चुप रहा। मैं चुप रहा, और मेरे भाई ने मुझे छोड़ दिया। इलियास दिल्ली चला गया। मैं यहाँ रह गया। और घंटी जोड़ने से लेकर आज तक मैंने एक बार भी इस्तेमाल नहीं की।"
मैंने कहा, "पर कल आपने मुझे बताया कि घंटी दो हाथों की मिरासी है।"
"हाँ। मैंने सिर्फ़ इतना कहा — यह कोई एक हाथ की नहीं है। दो हाथों की है। मैंने यह नहीं कहा कि दो हाथ मेरे और इलियास के हैं। दो हाथ तेरे और तेरी गली के हैं।"
वो उठे और मेरे सामने आकर खड़े हुए।
"अंकुश, यह घंटी किसी की मिरासी होती है। मतलब यह इंसान की नहीं, दस्तूर की होती है। जो इसे जानता है, वो इसे छुपाता है। जो इसे दिखाता है, वो इसे खो देता है। मैंने पचास साल पहले इसे बाज़ार में दिखाया था — और घंटी खो गई। सिर्फ़ इसलिए नहीं कि विजय ने छीना। इसलिए भी कि मैंने खुद उसे इतना बेशकीमती बना दिया कि कोई भी उसे लेने की सोचने लगा।"
उनकी आवाज़ में वो कड़वाहट थी जो अब सिर्फ़ इतनी सी बच गई थी — धीमी, पर सच्ची।
"इसे बाज़ार में मत दिखाना। अंगूठे लेने वालों से दूर रखना। यह घंटी सिर्फ़ उसके लिए है जो इसे सुनता है, न कि उसके लिए जो इसे लूटता है।"
मैंने कहा, "मैं समझ गया, उस्ताद।"
वो मुस्कुराए। एक बार फिर। छोटी सी मुस्कान।
"तू समझ गया तो अच्छा है। अब जा। तेरा घर इंतज़ार कर रहा है।"
मैंने पूछा, "क्या आप चलेंगे?"
"कल।"
"कल क्या?"
"कल मैं तेरी सभा में आऊँगा। चुप नहीं रहूँगा। काग़ज़ देखूँगा। मेरा नाम जहाँ है, वो काग़ज़।"
वो मेरे कंधे पर हाथ रखने के लिए झुके। फिर हाथ वापस ले लिया। जैसे किसी पुरानी आदत को अभी भी जगह चाहिए, पर वो जगह खाली हो गई है।
मैं बाहर निकला।
दुकान के बाहर आते ही मेरी जेब से घंटी बजी।
इस बार आवाज़ में वो तीखापन नहीं था। इतनी धीमी, जैसे कोई बूढ़ा आदमी अपनी कहानी बता रहा हो।
घंटी ने कहा, "तेरा उस्ताद पचास साल से चुप था। उसकी चुप्पी में मेरी आधी जान थी। आज उसने खुद सच कहा, तभी मैं खुली।"
मेरा गला भर आया। मैंने देखा, घंटी मेरे हाथ में गरम नहीं थी। ठंडी थी।
मैंने कहा, "घंटी, मैं पूछना चाहता हूँ।"
"अभी मत पूछ। तेरी गली में आज तीन धागे और हैं तोड़ने। पहले उन्हें जोड़। फिर मैं बोलूँगी।"
"कौन से तीन?"
"जा और देख। मैं बताऊँगी भी तब कब, जब तू खुद देखेगा।"
मैं हँसा। "ठीक है, बूढ़ी। तेरे हिसाब से ही चलूँगा।"
मैं गुमटी की तरफ़ चला।
वहाँ चारों बच्चे, मीरा, और शबनम आपा — पाँच लोग बैठे थे। और एक नया आदमी भी था।
बूढ़ा, झुका हुआ, हाथ में लाठी। उसने सिर उठाया तो मैंने देखा — वो उस्ताद का भाई नहीं था। वो वही इलियास नहीं था। वो एक आदमी था जिसके गले में एक पुरानी घड़ी लटकी थी, जिसके काँटे रुके हुए थे।
उसने मुझे देखा और बोला, "तू अंकुश है ना?"
"जी, कहिए।"
उसने सामने मेज़ पर एक छोटा सा कपड़े में लिपटा बंडल रख दिया।
"मैंने तेरे बाप को पच्चीस साल पहले एक साइकिल बेची थी। उस साइकिल पर एक घंटी थी। पीतल की। मैं उसे लेने आया हूँ।"
मेरा खून ठंडा हुआ।
मैंने धीरे से कहा, "घंटी बिकती नहीं।"
उसने कहा, "बेची नहीं थी। गिरवी रखी थी। और गिरवी की भी एक तारीख़ होती है, बेटा। पच्चीस साल हो गए। ब्याज़ भी लगेगा।"
मैंने पीछे देखा। मीरा का हाथ कैमरे पर था। आपा की चिमटी हवा में थी। बच्चों की आँखें बड़ी थीं।
उसी वक़्त मेरी जेब में घंटी ज़ोर से बजी।
घंटी ने कहा, "यह तीसरा धागा है। और सबसे पुराना। बोल, अंकुश। बोल, तेरा घर इतना चुप क्यों है?"
मैंने आँखें बंद कीं। खोलीं।
मैंने उस आदमी की आँखों में देखा और कहा, "बैठिए। चाय पहले। फिर हिसाब।"
वो हँसा। "तेरे बाप भी यही कहते थे। चाय पहले।"
"तो आप पापा को जानते हैं।"
"जानता हूँ। और तेरे दादा को भी जानता हूँ। जिस रात उन्हें बुखार आया था, उस रात मैं उनके सिरहाने बैठा था।"
हवा एक पल के लिए रुक गई।
फिर उसने वो कपड़े में लिपटा बंडल खोला। उसमें एक और काग़ज़ था। पीला। मुड़ा हुआ। नीली स्याही। और नीचे एक लाल अंगूठा।
मीरा ने धीरे से कहा, "दूसरा अंगूठा…"
मैंने उस काग़ज़ को देखा। उस पर पापा का नाम नहीं था। उस पर लिखा था — शंकर यादव के पिता।
मेरा दिल धड़कना बंद करने को था।
बूढ़े ने कहा, "यह वो काग़ज़ है जिसे तेरे दादा ने अपने बेटे से छुपाकर रखा था। दुकान का काग़ज़। दुकान तेरे दादा ने नहीं बेची थी, अंकुश। दुकान तेरे दादा ने मेरे हाथ गिरवी रखी थी। और जब वो मरे, तो काग़ज़ पापा के पास आया। और पापा ने वो काग़ज़ विजय भारद्वाज को दे दिया।"
मेरी जेब में घंटी बजी।
"अब पूछ," घंटी ने कहा। "अब पूछ, तेरा घर इतना चुप क्यों है।"
मैंने साँस ली और उस बूढ़े की आँखों में देखकर कहा, "बाबा, आपका नाम क्या है?"
उसने कहा, "मेरा नाम क्या है, इससे पहले यह पूछ कि तेरा घर चुप क्यों है — यह काग़ज़ मेरे पास क्यों है, यह किसने रखा, और आज तक मैं इसे लेकर क्यों नहीं आया।"
मैं चुप खड़ा रहा। गली में धूल उठ रही थी। पीपल की पत्तियाँ हिल रही थीं।
बूढ़े ने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"क्योंकि, अंकुश, यह काग़ज़ तेरे दादा ने मरने से पहले मुझे दिया था। और उस वक़्त उन्होंने एक बात कही थी, जो मैं पच्चीस साल से सुनता आ रहा हूँ।"
"क्या कही थी?"
उसने आँखें ऊपर उठाईं, जैसे कोई पुराना अफ़साना बता रहा हो।
उसने कहा, "यह घंटी तेरे बेटे के पास जाएगी। उससे पहले मत देना। वो इस घंटी को नहीं, इस गली को सँभालेगा। और जिस दिन यह घंटी उसके हाथ में सच बोलेगी, उस दिन यह गली चुप हो जाएगी — क्योंकि चुप होना ही सच होने से पहले की सबसे बड़ी आवाज़ होती है।"
मैंने पीछे मुड़कर देखा। शबनम आपा की चाय ठंडी हो रही थी। मीरा का कैमरा बंद था। बच्चे बिना पलक झपकाए मेरी तरफ़ देख रहे थे।
और घंटी… घंटी खुद बज रही थी।
धीरे-धीरे।
जैसे कोई बूढ़ा आदमी सीढ़ी से उतर रहा हो, एक-एक कदम, एक-एक आवाज़।
मैंने वो काग़ज़ अपने दोनों हाथों में लिया। मैंने आसमान की तरफ़ देखा। गली के ऊपर एक पतंग उड़ रही थी। पीली। किसी बच्चे ने छत से उड़ाई थी।
मैंने कहा, "बाबा, चाय पीजिए। हिसाब बाद में। पहले मैं यह जानना चाहता हूँ कि आपका नाम क्या है।"
उसने कहा, "मेरा नाम मक़बूल नहीं है। मेरा नाम मंज़ूर भी नहीं है। मेरा नाम… मेरा नाम इलियास है।"
मेरी घंटी ज़ोर से बजी। और उस घंटी के बजने की आवाज़ में, बूढ़े की घड़ी के रुके हुए काँटे एक बार हिले।
और फिर रुक गए।
और मेरी जेब से आवाज़ आई, पहली बार दो शब्दों में, जैसे कोई बहुत दूर से बुला रहा हो —
"अब समझा।"
॥
"अब समझा।"
बस दो शब्द। और मेरे हाथ से चाय का गिलास काँप गया।
इलियास बाबा ने अपनी रुकी हुई घड़ी की तरफ़ देखा। जैसे वो घड़ी भी उन दो शब्दों को सुन रही हो और अपना हिसाब माँग रही हो।
मैंने गिलास मेज़ पर रखा। शबनम आपा की गुमटी में अचानक इतनी चुप्पी हो गई कि समोसे के तवे की आवाज़ दूर की किसी गली से आती लगी।
मैंने कहा, "बाबा, आप उस्ताद अली बक्श के भाई हैं।"
इलियास बाबा ने चाय की चुस्की ली। फिर बोले, "तेरी घंटी ने यह नहीं कहा। तूने खुद पहचाना।"
"पहचाना नहीं। अंदाज़ा लगाया।"
"अंदाज़ा ही तो पहचान होती है, बेटा। बाकी सब तो लोगों का कहा हुआ होता है।"
मैं चुप हो गया। शबनम आपा ने चुपचाप एक और गिलास मेरी तरफ़ सरका दिया। बिना कुछ पूछे। मैंने सिर हिलाया, धन्यवाद की जगह।
इलियास बाबा ने वो पीला काग़ज़ मेरे सामने रखा। उस पर नीली स्याही में लिखा था और नीचे लाल अंगूठा। मैंने उसे उँगली से छुआ। काग़ज़ सूखा था, पर मुझे लगा जैसे अभी भी गीला है।
"बाबा, एक बात साफ़ कर दीजिए। आप पच्चीस साल से यह काग़ज़ लेकर क्यों नहीं आए?"
उन्होंने उँगली उठाई। "पहले यह बता कि तेरे घर में पिछले एक हफ़्ते से क्या हो रहा है।"
"घर में मेरे पापा ने कबूल किया कि उन्होंने अंगूठा लगाया था। माँ ने कबूल किया कि वो पाँच साल से जानती थीं। मैंने कबूल किया कि मैं आज तक खुद को बच्चा समझता रहा।"
इलियास बाबा ने मेरी आँखों में देखा। उनकी आँखें बहुत धीमी थीं, जैसे कोई पुराना कुआँ हो जिसमें बरसों से रस्सी नहीं गई।
उन्होंने कहा, "तो तेरा घर अब बोल रहा है।"
"बोल तो रहा है। पर बात पूरी नहीं हो रही।"
"पूरी नहीं होगी। घर की बात कभी पूरी नहीं होती, बेटा। वो बस शुरू हो जाती है। और शुरू होने के लिए ही तो किसी को बोलना पड़ता है।"
मैंने उस काग़ज़ को दोनों हाथों से समेटा और जेब में रखा। मेरी दूसरी जेब में बड़ी घंटी थी, जो अब ठंडी हो चुकी थी, जैसे कुछ कहकर थक गई हो।
"बाबा, कल सुबह दस बजे दुकान पर सभा है। पापा बोलेंगे। उस्ताद बोलेंगे। आप आएँगे?"
इलियास बाबा ने अपनी रुकी घड़ी की तरफ़ देखा।
"मैं सभा में नहीं बोलूँगा।"
मेरा दिल धड़का। "तो काग़ज़?"
"काग़ज़ मैं रख दूँगा। मेज़ पर। सबके सामने। जिसे पढ़ना हो, पढ़े।" उन्होंने चाय ख़त्म की और गिलास रखा। "मैं पच्चीस साल से बोलता आया हूँ, अंकुश। बस सुनने वाला नहीं था। अब सुनने वाले आ गए हैं, तो मेरी ज़ुबान की ज़रूरत नहीं। काग़ज़ काफ़ी है।"
वो उठे। उनकी घड़ी ज़ोर से एक बार टिकी — जैसे सालों बाद किसी ने उसे छेड़ दिया हो — और फिर रुक गई।
जाते-जाते उन्होंने कहा, "हाँ, एक बात। तेरी घंटी ने अभी मेरा नाम लिया। मैंने सुना।"
"और?"
"और मैं पच्चीस साल से इस आवाज़ से डरता आया हूँ। क्योंकि यह घंटी बजती नहीं, गिनती करती है। और जिस दिन इसकी गिनती पूरी हो जाएगी, उस दिन यह गली में उस आदमी का नाम बोलेगी जो सबसे ज़्यादा चुप है।"
वो गुमटी के पीछे मुड़ गए, जहाँ शबनम आपा का छोटा कमरा है। मैं वहीं बैठा रहा, और मेरे अंदर एक हिसाब चलता रहा।
बयालीस अंक। तीन धागे बाकी। पापा का डरा हुआ चेहरा। मीरा का कैमरा। सफ़ेद गाड़ी। अस्पताल की दीवार के पास खोदा जा रहा गड्ढा। और अब एक और नाम — इलियास।
मैं उठा और अपनी दुकान की तरफ़ चला। रास्ते में पीपल के नीचे से गुज़रा, तो देखा कि चबूतरी के दोनों सिरों पर दो बुज़ुर्ग बैठे थे। दोनों ने मेरी तरफ़ नहीं देखा। दोनों ने एक-दूसरे की तरफ़ भी नहीं देखा।
उस वक़्त मुझे क्या पता था कि अगली सुबह मेरा पूरा दिन इन्हीं दोनों का होगा।
सुबह मैंने दुकान जल्दी खोली। बोर्ड पर अब धूल नहीं थी, और "शंकर यादव और बेटे" साफ़ दिख रहा था। मैंने उसे देखकर हाथ जोड़े, जैसे मंदिर में करते हैं। फिर अपने आप पर हँसा और पोंछा लेकर ट्यूब में हाथ डाल दिए।
लगभग ग्यारह बजे चारों जासूस आए।
सानिया आगे, हाथ में लाल कवर वाली कॉपी। उसके पीछे गुड्डू, जो चलते-चलते ट्रकों की गिनती कर रहा था। उसके पीछे रफ़ीक़, जो अपनी जेब से कुछ निकालकर छुपा रहा था। और सबसे पीछे चिंटू, जिसकी नाक बह रही थी और जो उसे आस्तीन से पोंछ रहा था।
सानिया ने कॉपी खोली और सीधे बोली, "उस्ताद, हमने काम कर लिया।"
"कौन सा काम?"
"जो आपने नहीं दिया।"
मैं रिंच हाथ में लिए खड़ा रह गया। "अच्छा। सुनाओ।"
सानिया ने काग़ज़ पलटा। "पीपल के नीचे दो बुज़ुर्ग हैं। एक बाबा हाशिम, एक काका हरनाम। दोनों रोज़ शाम चार बजे आते हैं। दोनों एक ही वक़्त पर आते हैं, पर एक-दूसरे को देखते नहीं।"
गुड्डू बोला, "मैंने गिना है। इकतालीस दिन से मैंने गिना है। एक भी दिन ऐसा नहीं गया जब कोई एक आया हो और दूसरा न आया हो।"
रफ़ीक़ ने जेब से एक टुकड़ा निकाला। "यह बाबा हाशिम की लाठी के नीचे से गिरा था। इस पर कुछ लिखा है।"
मैंने देखा। लोहे की छोटी पत्ती थी, जिस पर खुदा था "हा"।
चिंटू ने अपनी नाक पोंछी और बोला, "और काका हरनाम के लोटे के नीचे भी कुछ खुदा है। वो लोटा कभी नहीं धोता, उस्ताद। कभी नहीं।"
मैंने रिंच रख दी।
"सानिया, कहाँ से लाई हो यह सब?"
सानिया ने गर्व से कहा, "हमने सुना था कि दोनों बुज़ुर्ग पहले साझेदार थे। तो हमने शबनम आपा से पूछा।"
"और आपा ने बता दिया?"
"आपा ने डाँटा। फिर चुप हुई। फिर गुमटी के पीछे से एक लकड़ी का बोर्ड निकालकर दिया और कहा — ले जाओ, अब इसे मेरे पीछे मत छुपाओ।"
मेरा दिल ज़ोर से बजा।
"बोर्ड कहाँ है?"
"गुमटी में। आपा ने कहा कि लेने तुम खुद आना। किसी बच्चे के हाथ में नहीं दूँगी।"
मैंने कपड़े से हाथ पोंछे और सीधे गुमटी पहुँचा।
शबनम आपा तवे पर समोसे रख रही थीं। मुझे देखकर बिना रुके बोलीं, "बोर्ड पीछे है। उसी दीवार के साथ। और हाँ, चार बजे से पहले मुझसे कुछ मत पूछना। चार बजे मैं खुद वहाँ रहूँगी।"
"आपा—"
"अंकुश, वो दोनों मेरे पापा के दोस्त थे। मेरे पापा ने यह गुमटी खोलने के लिए उन्हीं से उधार लिया था। और जब उनकी दुकान बंद हुई, तो मेरे पापा ने यह बोर्ड उतारकर रख लिया था। कहा था — जिस दिन ये दोनों फिर बोलेंगे, उस दिन यह बोर्ड फिर टँगेगा।" उन्होंने चिमटी उठाई। "इकतालीस साल हो गए। मेरे पापा भी नहीं रहे। बोर्ड अब भी पड़ा है।"
मैं पीछे गया। दीवार से टिका बोर्ड धूल और मकड़ी के जाल से ढका था। मैंने उसे खींचकर बाहर लाया और कपड़े से रगड़ा।
धूल हटी, तो नीली स्याही और पीली लकड़ी में लिखा उभरा —
"हाशिम और हरनाम। साइकिल के पुर्ज़े। पुराना बाज़ार।"
मैंने उसे देखा और मुझे अपना बोर्ड याद आ गया। "शंकर यादव और बेटे"। दो नाम, एक दुकान, और बीच में एक सवाल।
मैं बोर्ड उठाकर पीपल की तरफ़ चला।
चार बजे से दस मिनट पहले मैंने वो बोर्ड पीपल के तने से टिका दिया। ज़मीन पर रखा, ऊपर की तरफ़ उसका लिखा हुआ हिस्सा। फिर मैं दूर जाकर अपनी दुकान के सामने खड़ा हो गया, जैसे कुछ न किया हो।
चार बजे बाबा हाशिम आए। लाठी के सहारे, धीरे-धीरे कदम। कान में रुई थी, और उनके होंठ हमेशा हिलते रहते थे, जैसे अंदर ही अंदर कोई हिसाब कर रहे हों।
उन्होंने बोर्ड देखा।
और वहीं रुक गए।
दो कदम और चले, फिर फिर रुके। मैंने देखा कि उनका हाथ लाठी पर कस गया।
तभी काका हरनाम आए। पीली धोती, सिर पर टोपी, हाथ में पीतल का पुराना लोटा। उन्होंने भी बोर्ड देखा और वहीं जम गए।
दोनों बीच में बोर्ड था, और दोनों के बीच में इकतालीस साल।
मैं धीरे-धीरे पास गया। मैंने कुछ नहीं कहा। मैं बस बोर्ड के पास खड़ा हो गया और अपनी जेब में हाथ डाल दिया।
घंटी ठंडी थी। चुप थी।
काका हरनाम ने पहले बोला। आवाज़ में वो भारीपन था जो सिर्फ़ बूढ़े लोगों की आवाज़ में आता है, जब वो कुछ ऐसा बोलते हैं जो बरसों दबा था।
"यह बोर्ड तो जल गया था।"
बाबा हाशिम ने कान की रुई को छुआ, जैसे सुना हो और यक़ीन न आया हो।
"क्या कहा?"
"मैंने कहा, यह बोर्ड जल गया था। मैंने खुद जलाया था।"
बाबा हाशिम ने लाठी ज़मीन पर टिकाई और बहुत धीरे बोले, "तूने जलाया था?"
"हाँ। उस रात। जिस रात दुकान बंद की।"
"मैंने भी उस रात कुछ जलाया था।" बाबा हाशिम ने कहा। "मैंने अपनी कॉपी जलाई थी।"
दोनों चुप हो गए।
मैंने साँस ली और बीच में बोला, "बाबा, काका, मैं अंकुश हूँ। इस गली में साइकिल ठीक करता हूँ। मुझे कुछ पूछना है।"
काका हरनाम ने मेरी तरफ़ देखा, फिर टोपी ठीक की। "तू शंकर का बेटा है?"
"हाँ।"
"तेरे पापा बैठते थे यहाँ? पीपल के नीचे? बच्चा था तब?"
"हाँ, बैठता था।"
"हूँ।" उन्होंने कहा। और उनकी आवाज़ में कुछ नरम पड़ गया। "शंकर बैठता था। चुपचाप। कुछ नहीं बोलता था। बस हम दोनों को देखता रहता था।"
बाबा हाशिम ने कहा, "वो अब भी चुप है।"
मेरा गला भर आया। मैंने जल्दी से कहा, "बाबा, इकतालीस साल पहले क्या हुआ था?"
दोनों चुप।
मैंने कहा, "मैं जानता हूँ कि मुझे पूछने का हक़ नहीं है। यह आप दोनों का ज़ख़्म है। पर इस गली में जो हो रहा है, वो देखिए। रोज़ कोई न कोई बूढ़ा उठकर यहाँ आता है और अपनी चुप्पी का हिसाब देता है। मुझे नहीं पता कि यह सही है या ग़लत। मुझे बस इतना पता है कि चुप्पी अब और नहीं चलेगी।"
काका हरनाम ने लोटा ज़मीन पर रखा।
"हम साझेदार थे।" उन्होंने कहा। "पुर्ज़ों की दुकान थी। दोनों के नाम से। गल्ला एक था। हिसाब एक था। चाय हाशिम लाता था, समोसे मैं लाता था। दस साल ऐसे ही निकल गए।"
बाबा हाशिम ने सिर हिलाया। "दस साल।"
काका हरनाम बोले, "फिर एक दिन गल्ले में पैसे कम मिले। दो सौ उन्नीस रुपये कम। मैंने गिना, दोबारा गिना, तीन बार गिना। कम थे।"
"और तूने मुझसे पूछा नहीं।" बाबा हाशिम ने कहा। यह सवाल नहीं था। यह बयान था।
"नहीं पूछा।"
"क्यों?"
काका हरनाम ने अपनी टोपी के नीचे से पसीना पोंछा। "क्योंकि मैं डरता था कि तू हाँ कह देगा।"
चबूतरी पर बैठे दो-तीन और बुज़ुर्ग चुप हो गए। दूर स्कूल की छत से एक पतंग उड़ रही थी और किसी बच्चे की चिल्लाहट आ रही थी, पर यहाँ सब ठहर गया था।
बाबा हाशिम ने लाठी छोड़ दी और दोनों हाथों से अपना घुटना पकड़ लिया।
"मैंने उस दिन गल्ले से दो सौ उन्नीस रुपये निकाले थे।"
सन्नाटा।
"मेरी बीवी के पेट में दर्द उठा था। रात को। डॉक्टर के पास ले जाना था। दुकान बंद करके, घर जाकर, ताले में से अपने पैसे निकालने का वक़्त नहीं था। मैंने गल्ले से निकाले। सोचा, सुबह लौटा दूँगा।"
"और?"
"और सुबह लौटाने की बात कहते हुए मुझसे कही नहीं गई।" उन्होंने अपनी आँखें बंद कीं। "मैं शर्मिंदा था, हरनाम। मैं दस साल का साझेदार था, और मुझे अपनी बीवी के लिए दुकान के गल्ले से पैसे लेने पड़ रहे थे। मैंने सोचा, चुप रहूँगा, कल देखेंगे। और कल तूने मुझसे कुछ पूछा ही नहीं। और मैंने सोचा कि तू जान गया है, और तू मुझे इज़्ज़त दे रहा है।"
काका हरनाम ने आँखें ऊपर कीं।
"और मैंने सोचा कि तू जान गया है, और तू मुझे शक की नज़र से देख रहा है।"
दोनों ने एक-दूसरे को देखा। पहली बार। इकतालीस साल में पहली बार।
काका हरनाम की आवाज़ टूटी। "मैंने इकतालीस साल इंतज़ार किया कि तू पूछेगा। तू कह देगा — हरनाम, वो पैसे मैंने लिए थे। और मैं कहता — हाँ, हाशिम, क्यों नहीं लिए। पता नहीं क्यों मैं खुद कभी नहीं पूछा।"
"मैंने भी नहीं पूछा।"
"नहीं पूछा।"
"बस इसी चुप्पी ने हमारी दुकान ख़त्म कर दी।"
"नहीं।" काका हरनाम ने कहा। "इस चुप्पी ने हमें ख़त्म कर दिया। दुकान तो बहाना थी।"
तब बाबा हाशिम ने कुछ किया जो मैं भूलूँगा नहीं। उन्होंने अपनी जेब से एक छोटा, फटा, मुड़ा हुआ काग़ज़ निकाला और उसे सीधा किया। उसमें से एक दो-दो रुपये का सिक्का निकाला और काका हरनाम की तरफ़ बढ़ा दिया।
"दो रुपये बाकी थे। उस दिन मैंने गिनती में उन्नीस के साथ दो रुपये अपने पास रख लिए थे — चाय के लिए। भूल गया था। ये पूरे हो गए।"
काका हरनाम ने सिक्का नहीं लिया। उन्होंने लोटा उठाया और उसे पलट दिया। उसके नीचे लोहे की छोटी पत्ती जड़ी थी, जिस पर खुदा था — "शिम"।
"यह मैंने उसी दिन जड़वाई"यह मैंने उसी दिन जड़वाई थी," काका हरनाम ने कहा, "अपने लोटे के नीचे। ताकि मेरे होठों से कुछ न निकले, पर मेरा लोटा हर दिन बोले। हर बार पानी भरो, तो नीचे से आवाज़ आए — शिम।"
बाबा हाशिम ने वो पत्ती देखी। उनका हाथ काँपा। फिर उन्होंने अपना लोटा उठाया, उसमें पानी भरा और पीया। धीरे। बहुत धीरे। जैसे पानी नहीं, कोई पुरानी दुआ पी रहे हों।
"पानी में मेरे हिस्से का नाम है," उन्होंने कहा।
"पानी में तेरा नाम है," काका हरनाम ने कहा। "मेरे लोटे का पानी इकतालीस साल से तेरे नाम का है, हाशिम।"
दोनों चुप बैठ गए।
ये चुप्पी अलग थी। पहले वाली चुप्पी में चुभन थी, शक था, हिसाब था। इस चुप्पी में बस एक-दूसरे को देखना था। जैसे दो आदमी जो इकतालीस साल अंधेरे में चलते रहे और अब अचानक एक कमरे में आमने-सामने बैठ गए हों, और उन्हें समझ नहीं आ रहा हो कि पहले क्या कहें।
मैंने सोचा, मुझे कुछ नहीं कहना चाहिए।
घंटी मेरी जेब में ठंडी हो रही थी, फिर गर्म। गर्म, फिर ठंडी। जैसे कोई गिनती कर रहा हो। मैंने हाथ जेब पर रखा तो लगा जैसे घंटी अंदर से मुस्कुरा रही है।
तभी वो बजी। धीरे से। मेरे कान के पास। इतनी धीमी कि लगा किसी ने साँस ली हो।
"छत्तीस," उसने कहा।
मैंने मन में गिना। पहले बयालीस थे। छत्तीस जुड़ गए। कुल अठहत्तर।
मैंने बाबा हाशिम को देखा। उनके हाथ में अब भी वो दो रुपये का सिक्का था। काका हरनाम ने अपना हाथ उनके हाथ पर रखा और सिक्का उनकी हथेली में बंद कर दिया।
"ये तेरे पास रहेगा," काका हरनाम ने कहा। "मेरे पास तो छियालीस साल का पानी है। ये सिक्का तेरे पास रहेगा।"
"और तेरा लोटा?"
"लोटा दोनों का।"
बाबा हाशिम ने सिर हिलाया। फिर वो उठे। उनकी कमर झुकी थी, उम्र ने झुकाई थी। पर उस वक़्त वो सीधे खड़े थे। उन्होंने अपना हाथ आगे बढ़ाया।
काका हरनाम ने भी हाथ बढ़ाया।
दोनों हाथ मिले। पहले धीरे। फिर ज़ोर से। फिर दोनों गले लग गए।
पीपल की पत्तियाँ ऊपर से गिरीं। चबूतरी पर बैठे और बुज़ुर्गों ने देखा। किसी ने कुछ नहीं कहा। बस एक बूढ़े ने अपना रूमाल निकाला और आँखें पोंछीं। दूसरे बूढ़े ने उसका कंधा थपथपाया।
मैं वहाँ से खिसक लिया।
मेरे पैर हल्के थे। चार जोड़ हो चुके थे इस एक शाम में। पहले चबूतरी पर, फिर पीपल के नीचे, फिर भूरा कुत्ता, फिर खेलू और बेलू — और अब ये। अठहत्तर अंक। मैंने कभी सोचा नहीं था कि घंटी इतनी उदार हो सकती है।
जब मैं गुमटी की तरफ़ बढ़ा, तो पीछे से काका हरनाम की आवाज़ आई, "अंकुश!"
मैं रुका।
"कल आना। दुकान पर। मेरे पास तेरे लिए एक और लोटा है। और उसमें तेरा भी नाम खुदवाऊँगा।"
मैंने हाथ उठाया और मुस्कुरा दिया। चल दिया।
शबनम आपा की गुमटी पर पहुँचा तो शाम हो चुकी थी। कड़ाही में तेल चटक रहा था, समोसे की महक पूरी गली में फैल रही थी। ऊपर आसमान में पीली रोशनी थी जो धीरे-धीरे नीली हो रही थी।
चारों बच्चे — सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू — गुमटी के सामने पत्थर पर बैठे थे। सानिया के हाथ में लाल कवर वाली कॉपी थी, जिसमें वो ट्रकों की तारीख़, वक़्त और शक्ल लिखती थी। गुड्डू के हाथ में एक टूटा पेंसिल था, जिसे वो उँगली पर घुमा रहा था। रफ़ीक़ गुमटी की छत पर लगे पुराने टायर की तरफ़ देख रहा था। और चिंटू — चिंटू अपने घुटने पर पट्टी बाँध रहा था।
मुझे देखकर चिंटू उठा। "उस्ताद! उस्ताद! हमने कुछ ढूँढा है!"
"क्या ढूँढा?"
सानिया ने कॉपी खोली। पन्ना पलटा। "बड़े साहब के दफ़्तर के बाहर दो आदमी रोज़ सुबह आठ बजे आते हैं। सफ़ेद कुर्ता। हाथ में फ़ाइल। और वो गली की तरफ़ नहीं, पीछे के पुराने बिजलीघर की तरफ़ जाते हैं।"
गुड्डू बोला, "मैंने एक बार देखा। वो बिजलीघर के दरवाज़े पर दो बार खटखटाते हैं, फिर अंदर जाते हैं। दरवाज़ा बाहर से बंद रहता है, पर अंदर कोई है। मुझे लगता है कोई बैठा है।"
रफ़ीक़ ने कहा, "और उस्ताद, एक बात है। बबलू भैया ने कल रात किसी से फ़ोन पर कहा — 'उन्हें बोल दो, घंटी वाला लड़का बहुत हो गया। उसका काम तमाम करो।'"
मेरा हाथ अपने आप जेब पर गया।
"किससे कहा?"
"पता नहीं। पर बबलू का चेहरा डरा हुआ था। और बबलू डरता नहीं है, उस्ताद। बबलू किसी से नहीं डरता।"
मैं कुछ देर चुप खड़ा रहा। जेब में घंटी ठंडी थी। उसने कुछ नहीं कहा। जब घंटी चुप रहती थी, तो मतलब वो खुद सुन रही होती थी। जैसे कोई बूढ़ा आदमी अपने चश्मे के ऊपर से देखता है।
शबनम आपा ने चाय का गिलास मेरी तरफ़ बढ़ाया। "ले। चार बच्चों ने मिलकर ये इकट्ठा किया है। और ये चारों कल से तेरी दुकान पर काम करेंगे। मैंने कह दिया।"
"आपा—"
"बहाने मत बना। तू अकेला सब नहीं करेगा। और ये चारों बेकार बैठे हैं। इनके हाथ में कुछ देना है।"
मैंने चारों को देखा।
सानिया ने कहा, "उस्ताद, हम डरते नहीं हैं। सच में। हमने एक बार ट्रकों के नीचे साइकिल डाली थी।"
"क्या?"
गुड्डू हँसा। "नहीं उस्ताद, ऐसा कुछ नहीं। सानिया मज़ाक कर रही है। हम सिर्फ़ देखते हैं। छुपकर। पीछे से।"
मैंने चाय पी। गर्म। बहुत अच्छी।
"ठीक है," मैंने कहा। "कल सुबह सात बजे। दुकान पर। पहला काम — मेरे औज़ारों की सफ़ाई। दूसरा काम — जो भी बाहर से आए, उसका नाम और काम पूछना। बिना डरे। और तीसरा काम—"
मैं रुका। चारों ने कान खड़े किए।
"तीसरा काम — किसी को कुछ नहीं बताना। जो दुकान में हो, दुकान में रहे। जो आपा की गुमटी पर हो, गुमटी पर रहे।"
सानिया ने हाथ बढ़ाया। "पक्का।"
मैंने उससे हाथ मिलाया। फिर गुड्डू से। फिर रफ़ीक़ से। फिर चिंटू से। चिंटू का हाथ छोटा था, पर पकड़ मज़बूत थी — जैसे किसी पुराने मिस्त्री का हाथ। मैंने उसकी तरफ़ देखा तो वो मुस्कुरा दिया।
शबनम आपा ने देखा और मुस्कुराई। "अब जा। तेरी माँ इंतज़ार कर रही होगी।"
मैं उठा। रास्ते में सोच रहा था कि मैंने अभी क्या किया। चार बच्चों को अपने साथ जोड़ लिया। मैं, जो खुद अकेले सब करने की ज़िद में जी रहा था। जिसे लगता था कि मदद माँगना कमज़ोरी है। और अब देखो — दो साल के टिंकू की जगह चार बच्चे, और मुझे कुछ अजीब-सा अच्छा लग रहा था।
तभी मेरी जेब में घंटी बजी। ज़ोर से।
मैं रुक गया।
गुमटी के सामने वाली गली में एक आदमी खड़ा था। सत्तर के ऊपर, सफ़ेद दाढ़ी, मोटा चश्मा, कान पर पेंसिल।
उस्ताद अली बक्श।
वो अपनी दुकान से बाहर आए थे। उनका हाथ सिलाई मशीन के हैंडल पर था, जैसे अभी भी सिलाई कर रहे हों — पर मशीन बंद थी। उनकी आँखें मेरी जेब पर थीं। सीधी। बिना पलक झपकाए।
"घंटी," उन्होंने कहा। सिर्फ़ एक शब्द। धीमा। भारी। जैसे कोई पत्थर कुएँ में गिरा हो।
मैं सीधा खड़ा रहा।
उस्ताद ने एक कदम बढ़ाया। फिर रुके। फिर पलटकर अपनी दुकान की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। जैसे दो रास्तों के बीच खड़े हों। जैसे उन्हें खुद नहीं पता हो कि अंदर जाएँ या बाहर आएँ।
"अंकुश।"
"जी उस्ताद।"
"कौन बजा रहा था?"
"कुछ नहीं उस्ताद। हवा।"
"हवा।" उन्होंने चश्मे के ऊपर से देखा। "हवा से घंटी बजती है, अंकुश। पर हवा से घंटी बोलती नहीं है। और मैंने अभी बोलते सुना है।"
मैं चुप रहा।
उस्ताद ने चारों बच्चों को देखा, जो अब चुप बैठे थे। शबनम आपा ने चिमटी उठाई और समोसे की कड़ाही में डाल दी, पर उनकी आँखें भी उस्ताद पर थीं।
उस्ताद एक और कदम बढ़े। फिर रुके। उन्होंने अपना चश्मा उतारा, रुमाल से पोंछा, और वापस पहना।
"अंदर आ।"
"उस्ताद—"
"अंदर आ, अंकुश। दुकान में। अभी।"
मैं उनके पीछे-पीछे गया। उस्ताद ने दरवाज़ा खोला और मुझे अंदर जाने का इशारा किया। मैं अंदर गया तो सिलाई मशीन की टिक-टिक बंद हो गई थी। मशीन के ऊपर कपड़ा रखा था, आधा सिला हुआ। सुई ऊपर थी, जैसे किसी ने काम बीच में छोड़ दिया हो। पास में पेंसिल रखी थी। एक तरफ़ दराज़ खुली थी।
उस्ताद ने दरवाज़ा बंद किया।
फिर मेरी तरफ़ मुड़े।
"क्या लिया तू उसमें?"
"क्या लियामैंने काग़ज़ मेज़ पर रखा और उस्ताद की तरफ़ देखा। उनका चश्मा अब भी नाक पर फिसला हुआ था, और उनके हाथ सिलाई मशीन के हैंडल पर टिके थे — जैसे वो मशीन से बात कर रहे हों।
"उस्ताद," मैंने कहा। "आपने मुझे अभी तक नहीं बताया कि इस काग़ज़ का मतलब क्या है।"
उस्ताद ने चश्मा उतारा। रुमाल से पोंछा। फिर बोले, "इसका मतलब ये है कि तेरे दादा ने दुकान बेची नहीं थी। उन्होंने गिरवी रखी थी। और गिरवी रखने वाला आदमी मुझे जानता था। मैं उस वक़्त जवान था, अंकुश। मेरी दाढ़ी काली थी और मेरे पास भी एक घंटी थी।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — जैसे कोई बहुत पुराना ज़ख्म अचानक खुल गया हो।
"उस्ताद, आपके पास भी घंटी थी?"
"हाँ। और वो घंटी मेरे भाई इलियास के पास थी।"
मैं सीधा बैठ गया।
"इलियास आपका भाई है?"
उस्ताद ने सिर हिलाया। एक बार। बस एक बार। जैसे ये बात कहने में उन्हें पूरी ताक़त लगी हो।
"पचास साल पहले, अंकुश, हम तीन थे। मैं, इलियास और विजय। विजय भारद्वाज। रणवीर का बाप।" उन्होंने रुककर साँस ली। "हम तीनों ने मिलकर ये घंटी चलाई थी। एक ही घंटी, तीन हाथ। हम गली-गली घूमकर टूटे रिश्ते जोड़ते थे। कोई हमें जानता नहीं था। हम बस कहते थे — हम दर्ज़ी हैं, हम साइकिल वाले हैं, हम कुछ भी हैं। और लोग हमें बुलाते थे।"
उनकी आवाज़ धीमी हो गई।
"फिर एक दिन विजय ने कहा कि ये घंटी हमें अमीर बना सकती है। हम इसे बाज़ार में ले चलें। लोग इसके लिए पैसे देंगे। मैंने मना किया। इलियास ने मना किया। पर विजय नहीं माना।"
"फिर क्या हुआ?"
"फिर एक रात विजय ने घंटी चुरा ली। उसने उसे बाज़ार में दिखाया। उसने लोगों को बताया कि ये घंटी चमत्कार करती है। और शहर भर से लोग आए। कुछ लोगों के रिश्ते जुड़े, कुछ के टूटे। और जो टूटे, उन्होंने विजय को कोसा। विजय ने कहा कि घंटी में दोष है, वो अधूरी है। उसने घंटी को तोड़ दिया।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"तोड़ दिया?"
"तोड़ दिया।" उस्ताद ने कहा। "उसने घंटी को दो हिस्सों में बाँट दिया। एक हिस्सा उसने अपने पास रखा, जो अब रणवीर के पास है। और दूसरा हिस्सा उसने इलियास को दे दिया, ये कहकर कि तू इसे संभाल, मैं इसे बाज़ार में नहीं लाऊँगा। इलियास ने घंटी ली और दिल्ली चला गया। और मैं —" उन्होंने रुककर अपने हाथ देखे — "मैं चुप रहा। मैंने विजय से नहीं लड़ा। मैंने इलियास को रोका नहीं। मैंने बस अपनी दुकान बंद कर दी और यहाँ बैठ गया।"
"उस्ताद—"
"पचास साल, अंकुश। पचास साल मैंने इस दुकान में सुई चलाई और हर बार सोचा कि मैंने क्या किया। और अब तू आया है, तेरे हाथ में वो घंटी है, और इलियास वापस आ गया है। और मुझे लगता है कि ये सब व्यर्थ नहीं है।"
वो उठे। उन्होंने दराज़ से एक पुराना पीतल का डिब्बा निकाला — छोटा, जंग लगा, ढक्कन पर फूल खुदा हुआ। उन्होंने उसे खोला। उसमें एक छोटी सी घंटी थी। बहुत छोटी। फूल वाली।
"ये मेरी घंटी है," उन्होंने कहा। "इलियास वाली नहीं। ये मेरी अपनी थी। ये बोलती नहीं है। ये सिर्फ़ सुनती है। जब तेरी घंटी बोलती है, ये सुनती है। और आज रात, जब मैंने इसे उठाया, तो ये गरम थी।"
उन्होंने घंटी मेरी हथेली पर रख दी।
"ये मैं तुझे दे रहा हूँ।"
"उस्ताद, ये आपकी—"
"ये तेरी है।" उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में कोई नरमी नहीं थी, बस एक पुराना फ़ैसला था। "मैंने पचास साल इसे संभाला। अब तू संभाल। और अंकुश," उन्होंने मेरी तरफ़ झुककर कहा, "अगर इलियास से मिले, तो उससे कहना कि मैंने उसके लिए एक जोड़ा कुर्ता सिला है। पचास साल से मेज़ पर रखा है। और मैं उसे पहनकर उसका इंतज़ार कर रहा हूँ।"
मैंने वो छोटी घंटी अपनी जेब में रखी। वो बड़ी घंटी के ठीक बगल में थी, और मुझे लगा जैसे दोनों एक-दूसरे को पहचान रही हों।
"एक बात और," उस्ताद ने कहा। "तूने आज नबी और श्यामलाल को जोड़ा। अच्छा किया। पर एक ग़लती की।"
"क्या?"
"तूने उनके बीच सिक्का रखा। सही था। पर तूने ये नहीं सोचा कि जब तक वो दोनों खुद न बोलें, सिक्का चुप रहेगा। अंकुश, तंत्र तेरे हाथ में है, पर बात उनके मुँह से निकलनी चाहिए। तू सिर्फ़ दरवाज़ा खोलता है। अंदर वो जाते हैं।"
"तो मैं क्या करूँ?"
"जब अगली बार कोई टूटा रिश्ता सामने आए, तो पहले पूछ — तुम दोनों में से कौन पहले बोलेगा? और जो पहले बोले, उसे सबके सामने बोलने देना। तेरा काम सिर्फ़ इतना है कि तू उन्हें एक ही मेज़ पर बैठा दे।"
वो फिर मशीन के पास गए। उन्होंने कैंची उठाई और कपड़े का एक टुकड़ा काटने लगे, जैसे बात खत्म हो गई हो।
मैंने दरवाज़ा खोला।
"उस्ताद," मैंने पलटकर कहा। "आपने कहा था कि घर का सच मेरे अपने मुँह और हाथ से निकलेगा। वो क्या सच है?"
उस्ताद ने कैंची रोक दी। उन्होंने बिना देखे कहा, "वो सच ये है कि तू अपने बाप से डरता है। और वो सच ये है कि तेरे बाप खुद अपने आप से डरते हैं। और ये दोनों डर एक ही दरवाज़े पर खड़े हैं। उस दरवाज़े को एक बार पूरा खोलना पड़ेगा। खिड़की से नहीं। दरवाज़े से।"
मैं बाहर निकला।
गली में अंधेरा उतर चुका था, और शबनम आपा गुमटी के बल्ब की तरफ़ देख रही थीं, जो आज हल्का-हल्का काँप रहा था।
मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में गया। मैंने दोनों घंटियाँ मेज़ पर रखीं — बड़ी और छोटी। बड़ी घंटी चुप थी, पर छोटी घंटी से एक हल्की-सी गरमाहट आ रही थी, जैसे किसी ने उसे अभी छुआ हो।
फिर मैंने बड़ी घंटी को उठाया और धीरे से कहा, "अब बताओ। मेरे घर में सबसे ज़्यादा सच क्या है जो मेरे पास है?"
घंटी ने कहा, "तू ये जानता है कि तेरे पापा ने अंगूठा लगाया था। तुझे ये भी पता है कि तेरे दादा ने दुकान गिरवी रखी थी। तुझे ये भी पता है कि इलियास ने काग़ज़ क्यों नहीं दिया। और सबसे बड़ी बात — तुझे ये पता है कि तेरे पापा कोई कमज़ोर आदमी नहीं है, वो बस डरा हुआ है।"
"तो फिर सच क्या है?"
"सच ये है कि तू भी डरा हुआ है। तू जानता है कि अगर तेरे पापा ने अंगूठा लगाया, तो उन्होंने यह भी सोचा होगा कि तेरा क्या होगा। तू सिर्फ़ ये नहीं सोचता कि वो कितने दुखी हैं। तू ये भी सोचता है कि वो तुझे बचा नहीं पाए। और तू ये नहीं सोचता कि तू खुद भी उन्हें बचा नहीं पाया।"
मैंने घंटी को वापस जेब में रखा। मेरे हाथ काँप रहे थे, और मुझे ये एहसास हुआ कि कमरे में बैठा बल्ब भी मुझे देख रहा है।
बाहर गली में किसी की आवाज़ आई — मीरा की। वो शबनम आपा से कुछ पूछ रही थी। फिर मेरी दुकान के दरवाज़े पर दस्तक हुई।
मैंने दरवाज़ा खोला। मीरा खड़ी थी। उसके हाथ में कोई काग़ज़ नहीं था, कोई कैमरा नहीं था। बस खाली हाथ थे।
"मैंने टेप रिकॉर्डर बंद कर दिया," उसने कहा। "सिर्फ़ तेरे उस्ताद की वजह से नहीं। मैं आज शाम यहाँ रुकी और मैंने तुम्हें देखा। तुमने उन दोनों को जोड़ा — नबी और श्यामलाल को। और तुमने उनके सामने झूठ नहीं बोला। तुमने काग़ज़ नहीं दिखाया, तुमने कोई करतब नहीं किया। तुमने बस कटोरे रखे।"
"तो?"
"तो मैं कल सुबह दस बजे आऊँगी।" उसने कहा। "और मैं सिर्फ़ काग़ज़ी सच लूँगी। और अगर तेरे पापा बोलने से डरें, तो तुम उन्हें मेरे सामने मत लाना। पहले उन्हें अपने आप से मिलवा देना। फिर मुझसे।"
वो पलटी। दो कदम चली। फिर रुकी।
"अंकुश," उसने कहा। "वो मेरा आज का आख़िरी सवाल नहीं है। पर मैं जानना चाहती हूँ — तेरी घंटी, वो वाकई बोलती है?"
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी, जैसे चुप।
"कभी-कभी," मैंने कहा।
वो हँसी। पहली बार, छोटी-सी हँसी।
"मुझे लगा तू कहेगा कि वो चमत्कार है।"
"वो चमत्कार नहीं है, मीरा। वो सिर्फ़ ये याद दिलाती है कि लोग एक-दूसरे से बात क्यों नहीं करते।"
मीरा चली गई। मैंने दरवाज़ा बंद किया और मेज़ पर रखा काग़ज़ उठाया — वो पीला काग़ज़ जिस पर मेरे दादा का अंगूठा था। मैंने उसे उजाले में रखा और पढ़ा।
उस पर लिखा था — दुकान गिरवी, तारीख़, और नीचे एकदम छोटे अक्षरों में — "इसका हिसाब मेरे बेटे शंकर से माँगना।"
मेरा सीना भारी हो गया।
फिर मैंने घंटी को हथेली पर रखा और कहा, "मेरा घर इतना चुप क्यों है?"
घंटी ने जवाब दिया — "क्योंकि तेरा घर अब भी उस रात को ढो रहा है जिस रात तेरे दादा ने घंटी इलियास को दी थी, और तेरा बाप उस रात को ढो रहा है जिस रात उसने अंगूठा लगाया था। दो रातें, एक छत। और बीच में एक बेटा जो दोनों से हँसकर बात करता है, पर किसी से सच नहीं कहता।"
"तो क्या करूँ?"
"जब कल सुबह दस बजे सब बैठें, तो पहले तू अपना सच कह। पापा से पहले।"
"मैं क्या कहूँ?"
"यही कि तू डरता है। कि तू अकेले सब ठीक करना चाहता है। कि तू दुकान की साइन तक पढ़कर रोया था, पर किसी को नहीं बताया। यही तेरा सच है।"
मैंने घंटी को जेब में रखा और कुर्सी पर बैठ गया। दुकान के बाहर गली जैसे सो रही थी। शबनम आपा गुमटी का बल्ब बुझा रही थीं। पीपल की छाया दीवार पर झूल रही थी।
तभी मेरी जेब में घंटी बजी — धीमी, पर साफ़।
"क्या?" मैंने कहा।
"बढ़," घंटी ने कहा।
"कितना?"
"साठ से सत्तर। क्योंकि तूने आज पहली बार उस्ताद से उसकी अपनी बात कहलवाई। उसने तुझे छोटी घंटी दी, और ये मिरासी में कम नहीं होता।"
"अब क्या?"
"अब जा और सो। कल सुबह जो होगा, वो अब तक के सबसे भारी जोड़ों में से एक होगा। और अंकुश —"
"हाँ?"
"कल जब तेरे पापा बोलेंगे, तब तू पहले नहीं बोलना। उन्हें पूरा होने देना। पहली बार।"
॥
रात के ग्यारह बज चुके थे। मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में चारपाई पर पड़ा था, पर नींद कहीं दूर थी।
छत का पुराना बल्ब गुनगुना रहा था, जैसे कोई बूढ़ा आदमी नींद में कोई पुरानी लोरी गा रहा हो। दीवार पर सालों की ग्रीस के निशान जमे थे, जो मैंने कभी साफ़ नहीं किए, क्योंकि मुझे लगता था कि ये भी दुकान का हिस्सा हैं। मेज़ पर पीला काग़ज़ रखा था — दादा का। जिस पर नीली स्याही में लिखा था, दुकान गिरवी, एक तारीख़, और नीचे एकदम छोटे अक्षरों में — इसका हिसाब मेरे बेटे शंकर से माँगना।
मैंने करवट बदली। जेब में घंटी थी, ठंडी। छोटी फूल वाली घंटी — जो उस्ताद ने आज दी थी — तकिये के नीचे रखी थी, जैसे कोई बच्चा अपना सबसे कीमती खिलौना छुपा लेता है, कि कहीं कोई छीन न ले।
"तू सोता क्यों नहीं," मैंने घंटी से कहा। धीमे, क्योंकि कमरे के बाहर गली जैसे सो रही थी।
"तू सोता क्यों नहीं," घंटी ने वही बात लौटा दी। मुझे लगा कि आज उसका मूड भी भारी है।
"मैं सोच रहा हूँ, कल दस बजे पापा क्या बोलेंगे।"
"जो वो बोलेंगे, वो तेरे कानों ने पहले कभी नहीं सुना होगा। इसीलिए तू डर रहा है। डर ठीक है। डर के बिना लोग सच नहीं बोलते।"
"और तूने कल जो कहा था — साठ से सत्तर की बढ़त — उसका हिसाब क्या हुआ? मुझे अब तक पूरा अंक नहीं पता।"
घंटी एक पल चुप रही। फिर बोली, "अब तक जोड़ा — एक सौ अठासी। बाकी तेरे दिमाग़ के फेर में था।"
"एक सौ अठासी," मैंने धीरे से दोहराया। जैसे कोई बच्चा अपनी जेब में रखे पैसे गिनता है और यक़ीन नहीं कर पाता कि इतने ज़्यादा हैं।
"कल सुबह एक और आएगा," घंटी ने कहा। "सो जा।"
"कौन सा?"
पर वो चुप हो गई। बस हल्की-सी ठंडक हुई, और फिर वो भी ख़त्म।
मैं कब सो गया, पता नहीं चला। सुबह पाँच बजे माँ के चूल्हे की खड़खड़ मेरे कानों तक आई, चार गलियाँ छोड़कर भी। यादव के घर में चूल्हा पाँच बजे जलता है, चाहे घर में कोई बीमार हो, चाहे कोई लड़ाई हो, चाहे कोई सच खुलने वाला हो। माँ कहती हैं — चूल्हा नहीं जलेगा तो सच बोलने की ताक़त कहाँ से आएगी।
मैं उठा, मुँह धोया, शटर आधा उठाया। गली में कुहासा था और शबनम आपा की गुमटी से चाय की गर्म भाप उठ रही थी, जैसे गली सुबह-सुबह आँखें मल रही हो।
छह बजे सामने की दुकान का ताला खुला। उस्ताद अली बक्श बाहर आए। मोटा चश्मा, कान पर पेंसिल, हाथ में कैंची। उन्होंने मुझे देखा, बस सिर हिलाया, और सिलाई मशीन पर बैठ गए। टिक-टिक शुरू हो गई। मुझे लगा पूरी गली की नब्ज़ चलने लगी है।
सात बजे से पहले मेरी दुकान के बाहर चार जोड़ी चप्पलें आ गईं।
सानिया सबसे आगे थी, हाथ में लाल कवर वाली कॉपी। उसके पीछे गुड्डू, रफ़ीक़ और सबसे पीछे चिंटू, जो चलते-चलते अपने घुटने पर बँधी पट्टी देख रहा था।
"उस्ताद," सानिया ने कहा, "हम सात बजे आ गए। आपने कहा था काम देंगे।"
मैं मुस्कुराया। "आ जाओ। पहला काम — ये ट्रंक। इसमें पेच, नट, बोल्ट सब मिले-जुले पड़े हैं। मुझे साइज़ के हिसाब से अलग चाहिए। बड़े वाले एक तरफ़, छोटे दूसरी तरफ़।"
"बस इतना?" गुड्डू ने कहा, जैसे उसे धोखा मिला हो।
"बस इतना नहीं," मैंने कहा। "जो गलत साइज़ वाले बोल्ट सही जगह नहीं लगते, वो या तो छेद बड़ा कर देते हैं या गाड़ी में ढीले रह जाते हैं। और ढीला बोल्ट सबसे ख़तरनाक चीज़ है। पहली गड्ढे में पता चलता है, और तब तक देर हो चुकी होती है। तुम लोग आज से मेरी दुकान के हिसाब रखने वाले हो।"
सानिया की आँखें चमकीं। चारों ट्रंक के पास बैठ गए, जैसे कोई खज़ाना मिला हो। रफ़ीक़ ने बड़े बोल्ट वाला डिब्बा उठाया और छोटों में डाल दिया, तो चिंटू ने उसका हाथ पकड़ लिया — "अरे नहीं, ये बड़ा है, इसका घर दूसरी तरफ़ है।"
मैं उन्हें देखता रहा और मुझे अचानक याद आया कि तेरह साल की उम्र में मैं भी ऐसा ही बैठा था, दादा के औज़ारों के सामने, और मुझे लगता था कि मैं दुनिया का सबसे बड़ा काम कर रहा हूँ।
आठ बजे मैंने कहा, "चलो, चाय पिलाता हूँ।"
चारों एक साथ चिल्लाए। हम शबनम आपा की गुमटी पर गए।
"अरे," शबनम आपा ने चिमटी उठाकर कहा, "आज पूरी फ़ौज आ गई।"
"आपा," सानिया ने कहा, "हम अंकुश उस्ताद के साथ काम करते हैं।"
"अच्छा?" आपा ने मेरी तरफ़ देखा। "तो अब तेरे पास चेले भी हैं।"
"छह महीने पहले मेरे पास कुछ नहीं था," मैंने कहा। "अब चार चेले हैं, एक ट्रंक, और एक घंटी।"
आपा हँसीं। उन्होंने पाँच कप चाय डाली, और चारों के आगे समोसे का प्लेट रख दिया। "ये मेरी तरफ़ से," उन्होंने कहा। "गली के बच्चे जब काम करने लगें, तो चाय मेरी।"
सानिया ने तुरंत अपनी लाल कॉपी खोली। "आपा, मैंने ये कॉपी रखी है। इसमें ट्रकों की तारीख़, वक़्त और शक्ल लिखी है। कल छह ट्रक आए थे। पीली पट्टी पर भारद्वाज लिखा था। और एक ट्रक ने अस्पताल की दीवार के पास मिट्टी डाली, पर वो मिट्टी लाल थी, बाकी सब पीली।"
मैंने चाय का कप नीचे रख दिया। "लाल मिट्टी?"
"हाँ। जैसे खुदाई की मिट्टी।"
रफ़ीक़ ने कहा, "और उस्ताद, पीपल के नीचे दो बूढ़े आते हैं। एक सुबह आता है, एक शाम। दोनों एक-दूसरे को देखते हैं, पर बोलते नहीं। बत्तीस साल से।"
"कौन?" मैंने पूछा।
"बाबा क़ादिर," चिंटू ने कहा, और मुँह में समोसा ठूँस लिया।
"और लाला बद्रीप्रसाद," गुड्डू ने कहा।
मैंने शबनम आपा की तरफ़ देखा। उनके हाथ की चिमटी रुक गई।
"क़ादिर और बद्री," आपा ने धीरे से कहा, जैसे कोई पुराना नाम याद कर रही हों। "हलवाई के दो साझेदार। बाज़ार में उनकी दुकान थी — क़ादिर और बद्री की हलवाई। पेड़े, बर्फ़ी, और एक ऐसा कलाकंद कि लोग दूर से आते थे।"
"तो फिर?" मैंने पूछा।
"तो फिर एक रात," आपा ने कहा, "एक बड़ा ऑर्डर आया। शादी का। पाँच सौ पेड़े। और सुबह जब लोगों को बाँटा गया, तो वो पेड़े बासी थे। या कम थे। या… मुझे पूरा नहीं पता। बस इतना पता है कि उस दिन के बाद दुकान बंद हो गई। और दोनों ने बत्तीस साल से एक-दूसरे से बात नहीं की।"
"किसने किस पर इल्ज़ाम लगाया?" मैंने पूछा।
"यही तो नहीं पता," आपा ने कहा। "किसी ने किसी से पूछा ही नहीं। दोनों ने बस एक-दूसरे को देखना बंद कर दिया। और गली ने भी पूछना बंद कर दिया। यही गली की सबसे बड़ी बीमारी है, अंकुश — हम पूछना बंद कर देते हैं।"
मैंने चाय ख़त्म की और खड़ा हो गया।
"तुम चारों," मैंने कहा, "मुझे एक काम चाहिए। बाबा क़ादिर के घर जाओ। उनकी अलमारी में एक लोहे का बाट रखा है, कपड़े में लिपटा। और लाला बद्री के आँगन में एक पुराना काँटा टँगा है, ज़ंग लगा। मुझे दोनों चाहिए। कहना कि अंकुश मिस्त्री ने भेजा है, वो काँटा ठीक करेगा।"
"और अगर वो न दें?" सानिया ने पूछा।
"तो वापस आ जाओ। किसी से झगड़ना नहीं। और हाँ — जो भी दें, दोनों हाथ से लेना। कभी भी किसी बूढ़े के हाथ से चीज़ खींचकर मत लेना। हम मरम्मत करते हैं, लूट नहीं।"
चारों भाग गए।
मैं घर की तरफ़ चला। आठ बजकर पंद्रह। सभा दस बजे थी। माँ अब तक अस्पताल से लौट आई होंगी या काजल के साथ निकल गई होंगी।
घर का दरवाज़ा खुला था। अंदर पापा फ़र्श पर बैठे थे। सामने टूटा पंखा खुला पड़ा था — तार टूटा हुआ, ब्लेड हिलते हुए। उन्होंने आधी रात से उसी पंखे को देखा था, मुझे लगता है। कह रहे थे कि ठीक करूँगा, पर कुछ नहीं किया।
"पापा," मैंने कहा।
उन्होंने सिर उठाया। आँखें सूजी हुई थीं। चश्मा कान पर टेप से बँधा था, टेप की एक परत खुल गई थी।
"रोटी रखी है," उन्होंने कहा। "माँ ने रखी है। तू खा ले।"
"आपने खाई?"
चुप्पी।
मैंने पानी का गिलास भरकर उनके आगे रख दिया। फिर उनके बगल में बैठ गया। दोनों चुप। बस पंखे का खुला तार दीवार पर पड़ा था, जैसे कोई उँगली।
"पापा," मैंने कहा, "दस बजे मैं आपको नहीं बोलने दूँगा कि क्या बोलना है। आप जो बोलेंगे, बोलेंगे।"
उन्होंने पानी उठाया। एक घूँट पिया। फिर बोले, "तूने बोर्ड साफ़ किया।"
"हाँ।"
"क्या लिखा था उस पर?"
"शंकर यादव और बेटे।"
पापा ने गिलास नीचे रख दिया। उनका हाथ काँप रहा था, और उन्होंने उसे दूसरे हाथ से दबा लिया। "मैंने वो बोर्ड अपने हाथ से टाँगा था," उन्होंने कहा। "बीस साल पहले। और जिस दिन अंगूठा लगाया, उस दिन उसी बोर्ड के नीचे खड़े होकर मैंने सोचा था कि मैं इस लायक़ नहीं हूँ।"
मैं कुछ नहीं बोला। घंटी ने कहा था, पहले सुनना।
"अच्छा," उन्होंने कहा, "जा। तेरे पास काम है। तेरी घंटी बोल रही है, है ना?"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। मैंने कभी नहीं कहा था कि घंटी बोलती है। पर उन्होंने अपने हाथ में झाड़ू पकड़ी हुई थी और वो काँप रही थी, इसलिए मैंने कोई सवाल नहीं किया।
"बोल रही है," मैंने कहा। "पीपल के नीचे।"
उन्होंने सिर हिलाया। "फिर जा। और अंकुश —"
"हाँ।"
"टूटे हुए को जोड़ने से पहले कभी यह मत सोचना कि कौन सही है। यह मत सोचना कि किसने ग़लती की। सिर्फ़ यह देख कि कौन चुप है। क्योंकि जो चुप है वो अंदर से बोल रहा है, बस किसी ने पूछा नहीं।"
मैंने उनका हाथ पकड़ा। वो पहली बार नहीं छूटा।
मैं पीपल के नीचे पहुँचा तो सुबह की धूप छनकर आ रही थी। चारों बच्चे पहले से वहाँ थे, और उनके हाथ में कुछ था — सानिया के हाथ में कपड़े में लिपटा बाट, और गुड्डू के हाथ में लंबा ज़ंग लगा काँटा, जिसके दोनों पलड़े सूखी हुई दाल की पत्तियों से भरे थे।
चबूतरी पर इस सुबह सिर्फ़ दो लोग थे। एक सिरे पर बाबा क़ादिर बैठे थे — लंबा सफ़ेद कुर्ता, टोपी सामने खिसकी, हाथ में तस्बीह। दूसरे सिरे पर लाला बद्रीप्रसाद — पीली धोती, गमछा, लाठी बगल में रखी।
बीच में खाली जगह थी। जिस पर कोई नहीं बैठता था। बत्तीस साल से।
मैंने काँटा उठाया और बीच की खाली जगह पर रख दिया। फिर उसके बगल में बाट रखा।
दोनों बुज़ुर्गों ने देखा। और दोनों के चेहरे पर वही भाव आया, जो किसी की कब्र पर उसका अपना नाम देखकर आता है।
"ये काँटा लाला जी के आँगन से आया है," मैंने कहा। "और ये बाट बाबा क़ादिर की अलमारी से। दोनों अलग-अलग रखे बत्तीस साल से। और बत्तीस साल तक कोई चीज़ सही नहीं तोली गई — न मिठाई, न रिश्ता, न ग़लती।"
क़ादिर बाबा ने तस्बीह रोक दी। "बेटा, तू कौन है?"
"मैं अंकुश हूँ। साइकिल मिस्त्री।" मैंने कहा। "मैं मरम्मत करता हूँ। बस। और मेरा एक नियम है — मैं किसी की ज़ुबान नहीं बोलता। मैं सिर्फ़ वो जोड़ता हूँ जो टूटा है। बाकी बात आप दोनों को ख़ुद बोलनी होगी।"
लाला बद्री ने लाठी उठाई। "हमें कुछ नहीं बोलना।"
"तो ये काँटा उठा लीजिए," मैंने कहा। "और घर ले जाइए। पर पहले ये बाट अपने पलड़े पर रखिए और देखिए कि तोलता है या नहीं। क्योंकि बिना बाट का काँटा झूठ बोलता है, लाला जी। और बिना काँटे का बाट किसी काम का नहीं। दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। जैसे एक ही दुकान के दो साझेदार।"
गली में सन्नाटा था। शबनम आपा गुमटी से झाँक रही थीं। उस्ताद की सिलाई मशीन रुक गई थी।
क़ादिर बाबा ने धीरे से कहा, "मैं बोलूँगा।"
लाला बद्री ने उनकी तरफ़ देखा। पहली बार बत्तीस साल में, सीधे आँखों में।
"मैं बोलूँगा," क़ादिर बाबा ने फिर कहा, आवाज़ काँप रही थी। "क्योंकि मैं बत्तीस साल से इसे अंदर दबाकर मर रहा हूँ।"
वो खड़े हुए। काँपते हुए काँटे तक आए। "उस रात," उन्होंने कहा, "मैं दुकान पर अकेला था। तू बोला था कि तेरी बीवी को बुखार है, तू घर जा। मैंने कहा, जा, मैं सँभाल लूँगा। पर तेरी बीवी की दवा भी ख़त्म हो गई थी स्टोर से। तो मैं दुकान बंद करके दवा लेने गया। पीछे से। तुझे बताए बिना।"
लाला बद्री का मुँह खुला रह गया।
"क्यों नहीं बताया?" उन्होंने कहा, आवाज़ फटी हुई।
"क्योंकि मैंने सोचा था कि तू कहेगा कि मैंने दुकान खाली छोड़ दी।" क़ादिर बाबा ने कहा। "और जब मैं लौटा, तो पता चला कि उसी बीच तेरा लड़का आया था, मिठाई लेने, और उसने काँटे पर से पेड़ों की टोकरी उठा ली थी। उसने सोचा कि तौली हुई है, पर वो आधी थी। और शादी में चालीस किलो कम निकली।"
"तूने मुझे क्यों नहीं बताया?" लाला बद्री ने कहा — और अब उनकी आवाज़ में गुस्सा नहीं, सिर्फ़ दर्द था।
"क्योंकि तूने उस दिन कह दिया था," क़ादिर बाबा ने धीरे से कहा, "कि तू मेरा हिस्सा खा गया। और मुझे लगा कि अगर मैं कहूँगा कि मैं तेरी बीवी की दवा लेने गया था, तो तुझे लगेगा कि मैं तेरे ऊपर एहसान जता रहा हूँ। इसलिए मैं चुप रह गया। और चुप्पी बत्तीस साल लंबी निकल गई।"
लाला बद्री ने लाठी ज़मीन पर टिका दी। उनका गमछा हाथ से छूट गया। "और मैंने," उन्होंने कहा, — "मैंने कभी पूछा नहीं। तू रात को दुकान से कहाँ गया था। मैंने बस यह मान लिया कि तू गया तो अपने घर। और मैंने यह मान लिया कि मैं ठगा गया।"
"और मुझे भी कभी यह पूछना नहीं चाहिए था कि तुझे मेरी बात पर शक क्यों हुआ," क़ादिर बाबा ने कहा। "मुझे पूछना चाहिए था — लाला, तुझे क्या लगा? और वहीं बात ख़त्म हो जाती। पर मैंने सवाल नहीं पूछा। मैंने घाव को बंद कर दिया, बिना साफ़ किए। और वो अंदर से सड़ता रहा।"
दोनों एक-दूसरे के सामने खड़े थे। बत्तीस साल की दूरी के बाद, बीच की खाली जगह भर गई थी।
लाला बद्री ने काँटा उठाया। क़ादिर बाबा ने बाट उठाया। उन्होंने बाट काँटे के पलड़े पर रखा। मैंने अपना हाथ ऊपर उठाया — ज़ंग लगा काँटा अचानक झूलने लगा, जैसे उसमें जान आ गई हो। पलड़ा नीचे झुका, फिर सीधा हो गया, फिर बराबर पर आकर रुक गया। दोनों तरफ़ बराबर। पूरी तरह बराबर।
क़ादिर बाबा ने काँटे को सीने से लगा लिया। लाला बद्री ने उनका हाथ पकड़ लिया।
"माफ़ कर," क़ादिर बाबा ने कहा।
"तू माफ़ कर," लाला बद्री ने कहा। "मैंने बत्तीस साल सिर्फ़ इसलिए बर्बाद किए कि मैंने एक सवाल नहीं पूछा।"
तभी मेरी जेब में घंटी बजी। ज़ोर से, पहली बार इतनी तेज़, जैसे पूरी गली को जगाना चाहती हो।
चारों बच्चे चौंककर पीछे हट गए। चिंटू ने मेरा कुर्ता पकड़ लिया। शबनम आपा गुमटी से बाहर निकल आईं।
और उसी वक़्त सामने की दुकान का दरवाज़ा खुला।
उस्ताद अली बक्श बाहर आए। चश्मा, कैंची, और हाथ में एक कपड़ा जो उन्होंने काटना छोड़ दिया था। वो दरवाज़े के बाहर रुक गए। सिर्फ़ रुके रहे। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, फिर मेरी जेब की तरफ़, फिर पीपल की तरफ़। फिर उनका हाथ काँपा — वो वही हाथ जिसमें पेंसिल थी।
उन्होंने कुछ नहीं कहा। मीरा की तरह कुछ नहीं कहा। बस एक बार ज़ोर से साँस ली, और दुकान के अंदर चले गए। पर जाते वक़्त उन्होंने दरवाज़े का बोर्ड उल्टा कर दिया — जिस पर लिखा था कि दुकान खुली है।
मुझे समझ नहीं आया। मैंने उन्हें पहले ऐसा कभी नहीं देखा।
घंटी फिर बजी। "लगभग चालीस," उसने कहा। "किसी की दुआ है। कुल अब दो सौ अठाईस।"
"इस पर तुझे कोई भाव नहीं?"
"भाव है," घंटी ने कहा। "इसीलिए उस्ताद ने दुकान बंद कर दी।"
इतने में गली के मोड़ से मीरा आई, हाथ में कैमरा और वो फटा बैग। वो सीधे पीपल की तरफ़ चली, और उसने कैमरा दोनों हाथों से पकड़कर ज़मीन पर झुका दिया — सबूत के लिए नहीं, गुस्से के लिए।
"अंकुश," उसने कहा, और बहुत ऊँची आवाज़ में नहीं, पर ऐसे जैसे बर्फ़ पर चल रही हो। "तुम क्या कर रहे हो?"
"मरम्मत," मैंने कहा।
"कीमत पर?"
"कीमत नहीं।"
"और यह क्या था?" उसने काँटे की तरफ़ इशारा किया। "बत्तीस साल बाद तुमने दो बुज़ुर्गों को रुला दिया। किस चीज़ के लिए? एक पेड़ के नीचे कोई चमत्कार दिखाने के लिए। मैंने तुम्हें सुबह बोलने से पहले सोचना सिखाया था। नबी और श्यामलाल के बाद मैंने सोचा था कि तुम सच में कुछ हो। और आज तुमने बीच बाज़ार दो बुज़ुर्गों का घाव खोल के रख दिया।"
"मीरा," मैंने कहा।
"मुझे यह मत कहना कि घंटी बजी थी," उसने कहा। "क्योंकि मैंने सुना। मैं गुमटी के पीछे खड़ी थी और मैंने सुना, अंकुश। मैंने अपने कानों से सुना। और मुझे यह जानना है कि तुम्हारी जेब में क्या है, क्योंकि अगर तुम एक बार और मुझे बेवकूफ़ बनाओ, तो मैं वो रिकॉर्डिंग सारे शहर को दिखा दूँगी और तुम तीन दिन में पागलों की तरह बदनाम हो जाओगे।"
मैंन उसकी आँखों में देखा। मुझे लगा कि वो गुस्से में है, पर उसका हाथ काँप रहा था। मैंने सीधे तौर पर कुछ नहीं कहा।
"मैं तुम्हें कुछ नहीं दिखाऊँगा," मैंने कहा। "क्योंकि मैंने वादा किया था कि मैं तुम्हें काग़ज़ी सच दूँगा, और मैं वो दूँगा। घंटी काग़ज़ नहीं है। घंटी मेरी है।"
"तो घंटी किसी और की क्यों नहीं हो सकती?"
मैं चुप रहा।
वो पलटी। दो कदम चवो पलटी। दो कदम चली।
फिर रुकी, बिना पलटे। उसकी आवाज़ पीछे से आई, ठंडी, साफ़, जैसे सुबह की पहली सड़क।
"अंकुश, मैं तुझे दो दिन दे रही हूँ। दो दिन में अगर तूने मेरे सामने कोई पक्का काग़ज़ नहीं रखा, कोई गवाह नहीं खड़ा किया, तो मैं यह पूरी कहानी अपने चैनल पर डाल दूँगी। और मैं इसे ऐसे नहीं डालूँगी जैसे तू हीरो है। मैं इसे ऐसे डालूँगी जैसे एक बेवकूफ़ लड़का बूढ़ों की आँखें भरकर अपनी दुकान चमका रहा है। इतना याद रख।"
वो चली गई। इस बार नहीं रुकी।
मैं पीपल के नीचे खड़ा रहा। दो बुज़ुर्ग — इक़बाल चाचा और भोलानाथ काका — अपनी-अपनी लाठी पर झुके बैठे थे। उनकी आँखें अभी भी गीली थीं। बत्तीस साल बाद उन्होंने एक-दूसरे का हाथ पकड़ा था, और उस पकड़ में एक पूरी उम्र की चुप्पी बंद थी।
इक़बाल चाचा ने सिर उठाया।
"बेटा," वो बोले। "ये घंटी तेरी है?"
"हाँ, चाचा।"
"मेरे बाप के पास भी थी एक घंटी," उन्होंने कहा। "ट्रक चलाते थे। हर मोड़ पर दबाते थे। मरने से पहले उसने मुझे दी थी। पर मैंने इसे कभी नहीं बजाया। खौफ़ लगता था। लगता था कि बजाओगे तो कोई ऐसी खबर आएगी जो तुम नहीं सुनना चाहते।"
"और भोलानाथ काका?"
भोलानाथ काका ने नीचे देखा। "मेरी बीवी के पास थी एक। छोटी, पीतल की। हमारे झगड़े के बाद उसने उसे कबाड़ी को दे दिया। कहा कि जिस घर में घंटी चुप हो जाए, उस घर में न घंटी रखो, न याद।"
दोनों ने एक-दूसरे को देखा। इक़बाल चाचा हल्के से हँसे। भोलानाथ काका भी मुस्कुराए। फिर दोनों चुप हो गए, और उस चुप्पी में अब कुछ कड़वा नहीं था।
मेरी जेब में घंटी गरम हो गई। मैंने उसे हथेली पर निकाला।
"अब मत बोल," मैंने धीरे से कहा। "ये लोग अभी खुद बोल रहे हैं।"
घंटी ने धीमी आवाज़ में कहा, "मैंने कुछ नहीं कहा। बस यह बता रही हूँ कि तूने आज ज़मीन से पहला काँटा निकाला है। यह काँटा गहरा था, अंकुश। इसे निकालने में तेरे हाथ कटे, उनके हाथ कटे, और मीरा की ज़ुबान भी कटी। पर निकला।"
"अब क्या?"
"अब बच्चे आ रहे हैं," घंटी ने कहा। "देख, गली के मोड़ पर।"
मैंने पलटकर देखा। गली के मोड़ से चार साये भागते हुए आ रहे थे। सानिया आगे, उसके पीछे गुड्डू, रफ़ीक़, और सबसे पीछे छोटा चिंटू, जो अपनी पैंट का घुटना पकड़कर दौड़ रहा था।
सानिया के हाथ में वो लाल कवर कॉपी थी, जिस पर उसने खुद मोटे अक्षरों में लिखा था — नाम नहीं, बस एक घेरा और उसके अंदर चार तारीख़ें।
"उस्ताद!" वो चिल्लाई, साँस फूली हुई। "उस्ताद, तीन और ट्रक!"
"धीरे," मैंने कहा। "पहले साँस ले।"
"नहीं, सुनो," उसने कहा, कॉपी खोलते हुए। "सुबह सात बजे वाला ट्रक — पीली पट्टी, भारद्वाज का नाम। फिर नौ बजे — वही। फिर ग्यारह बजे — वही। तीन ट्रक, तीनों खाली आए, भरे हुए गए। मैंने शक्ल भी लिखी है। एक पर पीली मिट्टी थी, दूसरे पर सीमेंट की बोरियाँ, तीसरे पर… कुछ समझ नहीं आया। दबा हुआ था। बोरे से ढका हुआ।"
"कहाँ से आए?"
गुड्डू आगे आया। उसने अपनी जेब से एक काग़ज़ का टुकड़ा निकाला, जिस पर उसने कोयले से कुछ लिखा था — जैसे कोई नक्शा।
"पुराने बिजलीघर की तरफ़ से नहीं आए," उसने कहा। "नए बाज़ार की तरफ़ से आए। तीनों। और वापस भी उसी तरफ़ गए। पर एक बार वो पीछे के प्लॉट में रुके। जहाँ अस्पताल की पिछली दीवार दिखती है। वहाँ चालीस मिनट रुके। मैंने गिना।"
रफ़ीक़ ने कहा, "और उस्ताद, वहाँ एक आदमी खड़ा था। सफ़ेद कुर्ता, हाथ में फ़ाइल। वो ट्रक वालों से कुछ बोल रहा था। दूर से दिख रहा था, पर सुनाई नहीं दे रहा था। फिर वो गाड़ी में बैठकर चला गया। सफ़ेद गाड़ी।"
चिंटू ने अपनी जेब से एक टॉफ़ी निकाली, उसे खोला, मुँह में डाला, और फिर बोला, "और उस्ताद, वो सफ़ेद गाड़ी वाला आदमी आज दुकान की तरफ़ भी देख रहा था। मैंने देखा। वो धीरे चला रहा था, फिर खिड़की से बाहर झाँका, फिर चला गया।"
मेरी नज़र सानिया पर गई। वो मुस्कुरा रही थी, और उसकी आँखों में वो चमक थी जो बच्चों की आँखों में तब आती है जब उन्हें पहली बार लगता है कि उनकी बात किसी ने सच में सुनी है।
"अच्छा किया," मैंने कहा। "अब सुनो। तुम चारों ने जो किया है, वो आसान नहीं था। पर अब काम और मुश्किल है।"
चारों एक साथ सीधे खड़े हो गए। जैसे फौजी।
"कल सुबह सात बजे से पहले दुकान पर आ जाना। मैं तुम्हें एक काग़ज़ दूँगा — तारीख़, वक़्त, गाड़ी का रंग, कहाँ रुकी, कितनी देर। सब लिखना। और जो तुम देख न सको, उसे अनुमान से मत लिखना। खाली जगह छोड़ देना। खाली जगह भी एक जवाब है। समझे?"
"समझे, उस्ताद," सानिया ने कहा।
"और एक बात," मैंने कहा। "ये काम खतरनाक हो सकता है। अगर कोई तुमसे पूछे कि तुम क्या कर रहे हो, तो कहना स्कूल का प्रोजेक्ट है। झूठ नहीं, प्रोजेक्ट। तुम सच में प्रोजेक्ट कर रहे हो। बस इसे किसी को पूरा मत बताना।"
"उस्ताद," चिंटू ने कहा, टॉफ़ी चबाते हुए, "अगर वो हमें पकड़ लें तो?"
"तो मेरा नाम मत लेना," मैंने कहा। "कहना कि तुम खुद देख रहे थे। बच्चों को देखने का हक है।"
"और अगर वो डराएँ?" गुड्डू ने पूछा।
"तो उन्हें कहना कि डरने के लिए तुम्हें अभी उम्र नहीं मिली। डर बड़ों की चीज़ है। तुम्हारा काम देखना है, डरना नहीं।"
सानिया हँसी। गुड्डू भी। फसानिया हँसी। गुड्डू भी। फिर रफ़ीक़ और चिंटू भी हँसने लगे। और मैंने देखा कि उनकी हँसी में वो बात थी जो बड़ों की हँसी में नहीं होती — न कोई हिसाब, न कोई डर। बस खुली हँसी, जैसे गली में पहली बारिश के बाद बच्चों के पैर फिसलते हैं और वो गिरकर भी हँसते हैं।
"अच्छा, अब जाओ," मैंने कहा। "सुबह सात बजे आना। और हाँ, याद रखना — पहले देखो, फिर लिखो। जो दिखे वही लिखो। जो न दिखे, उसके आगे खाली जगह छोड़ दो। खाली जगह भी एक जवाब होता है।"
"उस्ताद," चिंटू ने कहा, मुँह में टॉफ़ी घुमाते हुए, "कल सुबह मैं तुम्हारे लिए एक चीज़ लाऊँगा।"
"क्या?"
"पता नहीं। पर लाऊँगा।"
मैं हँस पड़ा। यही तो फ़र्क़ है बच्चों और बड़ों में। बड़े कहते हैं, "मैं कुछ लाऊँगा" तो पहले दस बार सोचते हैं कि लाएँगे या नहीं। बच्चे कहते हैं और अगली सुबह चीज़ हाथ में होती है, चाहे वो एक टूटा हुआ पत्थर ही क्यों न हो।
वो चले गए। मैंने दुकान का दरवाज़ा बंद किया, पीछे वाले कमरे में गया और चारपाई पर गिर पड़ा। शरीर थका हुआ था, पर दिमाग़ में एक ही आवाज़ घूम रही थी — उस्ताद की वो बात कि घर का तीसरा सच भीतर का है, बिना लड़े नहीं खुलेगा।
मैंने जेब से घंटी निकाली। चाँद की रोशनी में पीतल चमक रहा था। मैंने उसे हथेली पर रखा और देर तक देखता रहा।
"सो जा," घंटी ने धीमे से कहा। "कल भारी दिन है।"
"कितना भारी?"
"जितना तू सोच नहीं सकता।"
"यही तो तेरी आदत है," मैंने कहा। "कभी सीधा जवाब नहीं देती।"
"सीधा जवाब सुनने की हिम्मत रखता है तू?"
"रखता हूँ।"
"तो सुन। कल पीपल के नीचे दो आदमी बैठे होंगे। दोनों ने पचास साल से एक-दूसरे की शक्ल तक नहीं देखी। उनके बीच जो टूटा है, वो तेरे उस्ताद के झगड़े से भी पुराना है। और उसे जोड़ने के लिए तुझे वो बात कहनी पड़ेगी जो तूने आज तक किसी को नहीं कही।"
"कौन सी बात?"
पर घंटी चुप हो गई। ठंडी हो गई, जैसे कोई पत्थर।
मैंने करवट बदली। नींद नहीं आई।
सुबह पाँच बजे माँ की चूल्हे की आवाज़ आई। मैं उठा, मुँह धोया, और दुकान खोलने लगा। सात बजे से पहले चारों बच्चे आ गए — सानिया के हाथ में लाल कवर कॉपी, गुड्डू के हाथ में एक छोटी पेंसिल, रफ़ीक़ के हाथ में टूटा हुआ प्लास्टिक का स्केल, और चिंटू के हाथ में… एक पत्थर।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
"पत्थर," चिंटू ने गर्व से कहा।
"देख तो रहा हूँ। पर किसलिए?"
"तुमने कहा था न, खाली जगह भी जवाब होती है। तो मैंने सोचा, अगर कल कुछ न दिखे, तो ये पत्थर रख देंगे उस जगह।"
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। "तू बड़ा होकर या तो बहुत बड़ा आदमी बनेगा, या बहुत बड़ा सिरदर्द।"
"दोनों," उसने कहा, और टॉफ़ी चबाने लगा।
मैंने उन्हें काग़ज़ दिए। चार काग़ज़, चार हाथ। ऊपर तारीख़, वक़्त, गाड़ी का रंग, कहाँ रुकी — सब खाने बनाए थे।
"अब सुनो," मैंने कहा। "आज सिर्फ़ एक काम है। पीपल के नीचे चबूतरी पर दो बुज़ुर्ग बैठते हैं। एक कोने में बाबा इक़बाल, दूसरे कोने में लाला बद्रीनाथ। दोनों के बीच कोई नहीं बैठता। कोई एक-दूसरे की तरफ़ नहीं देखता। मुझे जानना है कि क्यों।"
"पता है मुझे," सानिया ने कहा, और मैंने देखा कि उसकी आँखों में वो चमक फिर आ गई थी।
"कैसे?"
"शबनम आपा ने बताया था। पर पूरा नहीं बताया। बोलीं कि अभी तुम छोटी हो, बाद में बताऊँगी।"
"तो जाओ," मैंने कहा। "शबनम आपा के पास जाओ। चाय पीने के बहाने बैठो। और जो वो बताएँ, ध्यान से सुनो।"
वो चले गए। मैं दुकान के बाहर खड़ा रहा, हाथ में पेचकस। आसमान साफ़ था, पीपल की पत्तियाँ हल्की हवा में हिल रही थीं। मैंने दूर से देखा — चबूतरी पर दो सफ़ेद आकृतियाँ बैठी थीं, एक-दूसरे से दूर, जैसे एक ही चबूतरी पर दो अलग दुनिया।
थोड़ी देर बाद बच्चे लौटे। सानिया आगे थी, और उसके चेहरे पर वो भाव था जो बच्चों के चेहरे पर तब आता है जब उन्हें कोई बड़ा राज़ मिल जाए।
"उस्ताद," उसने कहा, "शबनम आपा ने बताया — दोनों के बेटे थे। साथ पढ़ते थे। एक साइकिल पर स्कूल जाते थे।"
"फिर?"
"तो एक दिन साइकिल पलट गई। दोनों गिरे। लाला बद्रीनाथ के बेटे के सिर पर चोट लगी। बाबा इक़बाल के बेटे का हाथ टूटा। और दोनों बापों ने… एक-दूसरे पर इल्ज़ाम लगा दिया।"
"क्या इल्ज़ाम?"
"बाबा इक़बाल ने कहा कि लाला बद्रीनाथ का बेटा ही साइकिल चला रहा था। उसने लापरवाही की, इसलिए मेरे बेटे का हाथ टूटा। और लाला बद्रीनाथ ने कहा कि बाबा इक़बाल का बेटा चला रहा था। उसने साइकिल मोड़ने में ग़लती की।"
"और फिर?"
"और फिर दोनों ने बात करनी बंद कर दी। बस। पचास साल से।"
मैंने गहरी साँस ली। इतनी सी बात। इतनी सी बात पर पचास साल।
"एक बात और," गुड्डू ने कहा, जो अब तक चुप था। "शबनम आपा ने कहा कि लाला बद्रीनाथ का बेटा, वो अब दिल्ली में रहता है। और वो दो साल पहले गली में आया था। किसी से मिलने।"
"किससे?"
"शबनम आपा को नहीं पता।"
मैंने घंटी को जेब में टटोला। वो ठंडी थी।
"चलो," मैंने कहा। "तुम चारों गुमटी पर रुको। और आज जो भी हो, मेरे पास मत आना। जब मैं बुलाऊँ, तब आना।"
वो समझ गए। बच्चों को एक बात समझानी नहीं पड़ती — जब बड़ा कहता है "रुको", तो रुकना होता है।
मैं पीपल की तरफ़ चला। धूप अब तेज़ हो रही थी। चबूतरी पर बाबा इक़बाल बैठे थे — सफ़ेद दाढ़ी, सफ़ेद टोपी, हाथ में तस्बीह, आँखें बंद। दूसरे कोने पर लाला बद्रीनाथ — दुबले, पीली धोती, गमछा कंधे पर, लाठी के सहारे, आँखें खुली पर दूर कहीं।
मैं बीच में जाकर खड़ा हो गया।
"बाबा इक़बाल," मैंने कहा। "लाला बद्रीनाथ। मैं अंकुश हूँ। यहाँ गली में दुकान है मेरी।"
बाबा इक़बाल ने आँखें खोलीं। देखा। फिर बंद कर लीं। "जानता हूँ तुझे," उन्होंने धीमे से कहा। "तू वही है जो इन बुज़ुर्गों को जोड़ता फिरता है।"
"काम यही है मेरा।"
"काम?" लाला बद्रीनाथ ने कहा, बिना मेरी तरफ़ देखे। "यह काम नहीं है, बेटा। यह तमाशा है।"
"हो सकता है," मैंने कहा। "पर आप दोनों को देखकर लगता है कि तमाशा नहीं, सन्नाटा है। और सन्नाटा तमाशे से भारी होता है।"
दोनों चुप हो गए।
"मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ," मैंने कहा। "आप दोनों के बेटे थे। वो अब कहाँ हैं?"
बाबा इक़बाल ने तस्बीह पर उँगली रोक दी। "मेरा बेटा भोपाल में है। दूसरी गली में रहता है। पर… आता नहीं।"
"क्यों?"
"क्योंकि मैंने उसे मना किया था। मैंने कहा था — उस घर मत जाना, उस आदमी से मत बोलना।"
"और आपका बेटा?" मैंने लाला बद्रीनाथ की तरफ़ देखा।
"दिल्ली," उन्होंने कहा, और आवाज़ में कुछ ऐसा था जैसे कोई बहुत पुरानी चीज़ उठा रहा हो। "दो साल पहले आया था। फिर चला गया।"
"आपने उससे बात की थी?"
"क्या बात करता? वो आया, मुझे देखा, चला गया। दस मिनट भी नहीं बैठा।"
मैंने एक कदम आगे बढ़ाया। "लाला जी, आपके बेटे ने शबनम आपा से कुछ पूछा था। वो आज सुबह मेरे पास आया। और मैंने सोचा कि आपको बताना चाहिए।"
लाला बद्रीनाथ ने पहली बार मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें धुँधली थीं, पर अंदर कुछ तेज़ था।
"क्या पूछा था?"
"उन्होंने पूछा था कि बाबा इक़बाल अभी भी उसी चबूतरी पर बैठते हैं? और क्या वो अभी भी गुस्से में हैं?"
चबूतरी पर सन्नाटा छा गया। बाबा इक़बाल ने आँखें खोल लीं। उनकी तस्बीह हाथ से छूटकर पत्थर पर गिरी।
"उसने मेरा नाम लिया?" उन्होंने पूछा, आवाज़ काँप रही थी।
"हाँ," मैंने कहा। "और एक बात और। उसने शबनम आपा से यह भी कहा था कि वो उनसे मिलना चाहता है। पर डरता है।"
"किससे डरता है?"
"शायद इससे कि आप अभी भी उसे ग़लत मानते हैं।"
लाला बद्रीनाथ ने लाठी उठाई और फिर रख दी। उनके हाथ काँप रहे थे।
"मैं नहीं मानता," वो धीमे से बोले। "मैंने तो कभी उसके बेटे को ग़लत नहीं कहा। मैंने तो बस यह कहा था कि बच्चे ध्यान से चलाएँ।"
"तो आपने मुझे पचास साल तक यह क्यों नहीं बताया?" बाबा इक़बाल ने कहा। उनकी आवाज़ अब धीमी नहीं थी, दर्द से भरी थी। "तुमने मुझे कहा था — तुम्हारा बेटा लापरवाह है। तुमने मुझ पर इल्ज़ाम लगाया था।"
"मैंने इल्ज़ाम नहीं लगाया था, इक़बाल। मैंने बस… मैंने बस यह कहा था कि तेरा बेटा भी उस साइकिल पर था। मैंने यह नहीं कहा कि उसने धक्का दिया।"
"तुमने कहा था कि सिर्फ़ मेरे बेटे की वजह से तुम्हारे बेटे का सिर फूटा।"
"क्योंकि मुझे तब गुस्सा आ रहा था। मेरे बेटे का सिर फूटा था, ख़ून बह रहा था। मैं डर गया था।"
दोनों के बीच पहली बार कुछ ऐसा हुआ जो पचास साल में नहीं हुआ था — दोनों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा। सीधे।
और उसी पल मेरी जेब में घंटी बजी। ज़ोर से। इतना ज़ोर से कि मैं चौंक गया।
मैंने घंटी निकाली। वो गरम थी, हाथ जलाने लगी थी।
"क्या?" मैंने धीरे से कहा।
"बोल," घंटी ने कहा। "अब तेरी बारी। उनसे वो बात कह जो तूने आज तक किसी को नहीं कही।"
मेरा गला सूख गया। मैं समझ गया कि घंटी क्या कह रही है।
"बाबा इक़बाल," मैंने कहा। "लाला बद्रीनाथ। मैं आप दोनों को एक बात कहना चाहता हूँ। जो मैंने कभी किसी को नहीं कही।"
दोनों ने मेरी तरफ़ देखा।
"मैं अपने घर को नहीं बचा पाऊँगा, ऐसा मुझे लगता है। रोज़ लगता है। सुबह उठते ही लगता है। मैं हँसता हूँ, आप दोनों के सामने भी हँस रहा हूँ, पर अंदर एक डर है कि जब ज़रूरत पड़ेगी, तब मैं अकेला रह जाऊँगा। मैं सब ठीक करना चाहता हूँ, अकेले। और मुझे पता है कि अकेले कुछ नहीं ठीक होगा। यह बात मैंने अपने पापा से भी नहीं कही। आज आपसे कह रहा हूँ, क्योंकि आप दोनों पचास साल से उसी डर में बैठे हैं — कि कहीं सामने वाला मान न ले, कहीं उसे पता न चल जाए कि मैं कमज़ोर हूँ।"
चबूतरी पर सन्नाटा। इतना गहरा कि पीपल की पत्ती की आवाज़ भी सुनाई दे रही थी।
बाबा इक़बाल ने पहली बार अपनी तस्बीह उठाई और उसे जेब में रखा। फिर धीमे से बोले, "मैंने पचास साल तक सोचा कि मैंने अपने बेटे को उस आदमी से बचाया है। पर सच यह है कि मैंने उसे उसके दोस्त से दूर कर दिया।"
लाला बद्रीनाथ ने लाठी को दीवार से टिकाया। "और मैंने पचास साल तक सोचा कि मैं सही हूँ। पर सच यह है कि मैं चुप रह गया, क्योंकि मुझे लगा कि अगर मैंने कहा कि दोनों बच्चे बराबर के ज़िम्मेदार थे, तो मेरा बेटा भी ग़लत साबित होगा। और मैं अपने बेटे को ग़लत नहीं देखना चाहता था।"
"तो अब?" मैंने पूछा।
"अब क्या?" बाबा इक़बाल ने कहा। "अब हम क्या करें? पचास साल हो गए।"
"अब एक बात कहिए," मैंने कहा। "एक सच्ची बात। जो आपने आज तक नहीं कही।"
दोनों एक-दूसरे को देखने लगे। बाबा इक़बाल ने पहले घुटने टेके, फिर उठे, और लाला बद्रीनाथ की तरफ़ बढ़े।
"बद्री," वो बोले, और आवाज़ टूट गई। "मुझे माफ़ कर दे। मैंने तेरे बेटे को कभी ग़लत नहीं समझा। मैंने बस अपने बेटे के हाथ का दर्द तेरे गुस्से पर उतार दिया।"
लाला बद्रीनाथ ने लाठी छोड़ दी। वो खड़े हुए, काँपते हुए, और बाबा इक़बाल का हाथ पकड़ लिया।
"मैंने तुझे कभी माफ़ नहीं किया था," उन्होंने कहा। "क्योंकि मैंने खुद को माफ़ नहीं किया था। मैंने उस दिन तेरे बेटे को डाँटा था। याद है? मैंने कहा था — तू बड़ा है, तुझे ध्यान रखना चाहिए था। और वो रोया था। मैंने एक बच्चे को रुलाया था, और फिर अपने गुस्से को सही ठहराने के लिए तुझसे बोलना बंद कर दिया।"
दोनों की आँखें भर आईं। और फिर वो गले मिले — पचास साल बाद, उसी चबूतरी पर जहाँ पचास साल से दोनों अलग-अलग बैठते थे।
घंटी मेरे हाथ में ठंडी हो गई।
"अंक," घंटी ने कहा, "बयालीस।"
"बयालीस?"
"हाँ। यह जोड़ पचास साल पुराना था। और इसमें तेरी अपनी बात भी शामिल है। तूने वो कहा जो तूने आज तक नहीं कहा। यह अंक तेरे हैं।"
मैंने गहरी साँस ली। "कुल?"
"बयालीस जुड़कर अब एक सौ बीस।" मैंने मन में हिसाब लगाया — पिछले अठहत्तर थे, अब बयालीस और जुड़े, यानी एक सौ बीस। घंटी ने आगे कहा, "पर यह अभी पूरा नहीं हुआ। इन दोनों के बेटों को भी बुलाना पड़ेगा। असली जोड़ तब होगा जब दोनों बेटे इस चबूतरी पर बैठेंगे।"
"मैं करूँगा," मैंने कहा। "आज ही शाम को।"
उसी वक़्त पीपल के पीछे से एक आवाज़ आई।
"अंकुश।"
मैं पलटा। उस्ताद अली बक्श खड़े थे। उनका चश्मा कान पर टेढ़ा था, हाथ में कैंची थी, और चेहरे पर वो भाव था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — जैसे किसी ने उनके सीने में हाथ डाल दिया हो।
"उस्ताद?" मैंने कहा। "आप यहाँ?"
वो मेरी तरफ़ बढ़े। उनकी चाल में जल्दबाज़ी थी, जो उनकी उम्र में कभी नहीं देखी। वो मेरे करीब आए और मेरे हाथ से घंटी उठाई।
"यह आवाज़," उन्होंने कहा, आवाज़ काँप रही थी। "मैंने तेरी दुकान से आते हुए सुनी। यह… यह वही घंटी है?"
"हाँ, उस्ताद। यही है।"
"मैंने पचास साल बाद सुनी," उन्होंने कहा। "आज सुबह दुकान पर बैठा था, सुई चला रहा था, और अचानक लगा कि कोई मेरे कान के पास बजा। मैं बाहर आया। तुझे देखा। और तेरे हाथ में यह।"
उन्होंने घंटी को देखा, फिर मेरी तरफ़। "बता, तूने क्या किया?"
मैंने उन्हें सब बताया — बाबा इक़बाल और लाला बद्रीनाथ की सुलह, घंटी का बजना, बयालीस अंक।
उस्ताद ने घंटी मेरे हाथ में रख दी और पीपल के पेड़ के तने पर हाथ रखकर खड़े हो गए। "पचास साल," वो बोले। "मैंने सोचा था कि यह घंटी अब किसी काम की नहीं। मैंने सोचा था कि जब मैंने अपनी दुकान बंद की, तब यह भी सो गई। लेकिन तूने इसे जगा दिया।"
"उस्ताद, आपने मुझे छोटी फूल वाली घंटी दी। मैंने सोचा था कि वो भी बोलती होगी। पर वो चुप है।"
"वो बोलती नहीं," उस्ताद ने कहा। "वो सुनती है। और वो तेरे पास इसलिए है कि तू भी सुन सके। यह घंटी जो बोलती है, वो मिरासी है। मिरासी में सिर्फ़ देने की बात नहीं होती। देने वाले को पता होना चाहिए कि वो क्या दे रहा है। और तूने आज उन दोनों को दिया — बिना हिसाब के। इसलिए घंटी ने तुझे अंक दिए।"
वो पलटे। फिर रुके। "एक बात याद रख। यह घंटी बाज़ार में मत दिखाना। जो इसे देखेगा, वो इसे लेने की कोशिश करेगा। और जो लेने की कोशिश करेगा, वो खुद को नहीं बचा पाएगा।"
उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा, और फिर धीमी आवाज़ में कहा, "और तेरे घर का सच… उसे घंटी से पूछना। पूछना — तेरा घर इतना चुप क्यों है। मगर पहले अपने पापा से वो बात कहना जो आज तूने इन दोनों से कही। बाप को बेटे का डर सबसे पहले सुनना चाहिए।"
वो चले गए। मैं चबूतरी पर खड़ा रहा, हाथ में घंटी, और देखता रहा कि बाबा इक़बाल और लाला बद्रीनाथ अब साथ बैठे हैं — एक-दूसरे से सटकर, जैसे पचास साल का सन्नाटा उन्हें अब थका रहा हो।
तभी पीछे से तेज़ कदमों की आवाज़ आई। मैं पलटा।
मीरा आ रही थी। उसके हाथ में माइक था, कंधे पर कैमरा, और आँखों में वो चमक थी जो शिकारी की आँखों में होती है।
"तो यह है तेरा चमत्कार," उसने कहा, और माइक मेरे सामने कर दिया। "जादुई घंटी। जो बुज़ुर्गों के आँसू पोंछती है। और तू उन्हें यह समझाता है कि यह सब तेरी वजह से हुआ है।"
"मीरा," मैंने कहा, "माइक नीचे कर।"
"क्यों? क्योंकि तेरा नाटक खुल जाएगा?" उसने माइक और ऊपर उठाया। "सुनो, सुनो! गली के जोड़ने वाले उस्ताद! जो बुज़ुर्गों को जोड़ते हैं, पर किसी को नहीं बताते कि उनका अपना घर क्यों टूटा हुआ है!"
मैंने उसका हाथ पकड़ा और माइक नीचे किया। "मीरा, तुम्हें क्या चाहिए?"
"सच," उसने कहा, और आवाज़ में वो कड़वाहट थी जो पाँच साल पुरानी थी। "मुझे सच चाहिए। तू इन बुज़ुर्गों के ज़ख़्मों को दिखाकर अपनी दुकान बचा रहा है। तू जानता है न, तेरी दुकान उस ट्रस्ट के नाम है, जिसका मालिक वो आदमी है जिसने तेरे पापा से अंगूठा लिया था। और तू यहाँ नाटक कर रहा है।"
"तुम्हारे पास जो काग़ज़ है," मैंने कहा, "वो मुझे दो।"
"क्यों? ताकि तू उसे फाड़ दे?"
"नहीं। ताकि मैं उसे सबके सामने रखूँ। कल दस बजे। उसी सभा में।"
वो रुकी।
"मैं तुमसे झूठ नहीं बोलूँगा, मीरा," मैंने कहा। "पर सच है कि मेरे पास सब जवाब नहीं हैं। मेरे पापा ने अंगूठा लगाया था। मेरी माँ पाँच साल से जानती थी। मैंने कल रात तक यह सब नहीं जानता था। अब जानता हूँ। और जब आपको कोई सच पता चलता है, तो पहले लगता है कि दुनिया खत्म हो गई। फिर लगता है कि शायद यही असली दुनिया है।"
"यह बहुत अच्छी बात है," उसने कहा, पर उसकी आवाज़ में तेवर कम हो गया था। "पर सुन — मैं तुम्हें एक और मौका नहीं दूँगी। कल अगर मुझे पूरा सच नहीं मिला, तो मैं यह सारा रिकॉर्डिंग शहर को दिखा दूँगी।"
"ठीक है," मैंने कहा। "पर एक बात। आज शाम को जब मैं इन दोनों के बेटों को यहीं बुलाऊँ, तो तुम भी आना। कैमरा लेकर। और जो देखो, वो रिकॉर्ड करना।"
उसने मुझे देखा। "तू मुझे अपने नाटक में बुला रहा है?"
"मैं तुम्हें सच दिखाने बुला रहा हूँ। जानती हो, तुम्हारी सबसे बड़ी ग़लती क्या है? तुम्हें हर किसी पर शक करने की आदत है। चलो आज मैं तुम्हें बता दूँ — तुम शक करने में इतनी लग गई हो कि भरोसे की जगह ही नहीं बची।"
वो एक पल चुप रही। फिर उसने माइक बंद किया, कैमरा उतारा, और धीमी आवाज़ में कहा, "मेरे पास भरोसे की जगह नहीं बची, अंकुश। क्योंकि पाँच साल पहले मैंने एक आधा सच छापा था और एक टीचर का घर टूट गया। तब से मैंने खुद से वादा किया कि अब सिर्फ़ पूरा सच छापूँगी। पूरा। या कुछ नहीं।"
"तो आज शाम आना," मैंने कहा। "और मैं तुमसे वादा करता हूँ — पूरा सच।"
वो पलटी और चली गई। पर जाते-जाते रुकी और बोली, "मैं तेरे पापा से आज नहीं मिलूँगी। उन्हें वक़्त दे।"
"क्यों?"
"क्योंकि मैंने तेरे पापा की तरह लोगों को डरते देखा है। और इंसान जब डरता है, तो सच नहीं बोलता। मैं उनका डर नहीं खोलना चाहती।"
वो चली गई। मैं चबूतरी पर खड़ा रहा। बाबा इक़बाल और लाला बद्रीनाथ अब एक-दूसरे से धीमे-धीमे बात कर रहे थे। कभी हँसते, कभी चुप होते। पचास साल का सन्नाटा ऐसे ही नहीं जाता — उसे धीरे-धीरे, शब्द-दर-शब्द खुलना पड़ता है।
मैं घर लौटा। पापा आँगन में बैठे थे, फिर भी पंखे के सामने। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। मैंने देखा कि उनकी आँखों में वो डर अभी भी था जो कल रात से था।
मैं उनके पास बैठ गया। चुप।
फिर बोला, "पापा, मैं आज दो बुज़ुर्गों को मिलाया। पचास साल बाद। बाबा इक़बाल और लाला बद्रीनाथ को।"
पापा ने देखा। कुछ नहीं बोले।
"पापा, जब मैं उनसे बात कर रहा था, तब मुझे लगा कि मैं आपसे बात कर रहा हूँ। क्योंकि वो दोनों भी पचास साल से एक ही बात दबाए बैठे थे — कि हमने एक-दूसरे को दोष दिया, और दोष झूठा था। और मैंने सोचा… मैंने सोचा कि जब तक मैं आपसे वो नहीं कहूँगा जो मुझे कहना चाहिए, तब तक मैं भी उन्हीं दो बुज़ुर्गों जैसा रहूँगा।"
पापा ने फिर भी कुछ नहीं कहा। पर उन्होंने मेरी तरफ़ पूरा मुँह कर लिया। यह उनके लिए बहुत था।
"पापा, मुझे डर लगता है। रोज़ लगता है। जब से घंटी मिली है, मुझे लगता है कि मैं सब ठीक नहीं कर पाऊँगा। कि एक दिन ऐसा आएगा जब मैं अकेला रह जाऊँगा। मैं मज़ाक इसलिए करता हूँ, पापा, ताकि कोई मुझसे पूछ न ले कि मैं कैसा हूँ।"
मेरी आवाज़ टूट गई। मैंने हाथ से मुँह छिपाया।
पापा ने कोई शब्द नहीं कहा। उन्होंने बस अपना हाथ बढ़ाया और मेरे सिर पर रख दिया। वो हाथ काँप रहा था। और उनकी आँखों में पानी था — पहली बार, मैंने उन्हें रोते देखा।
"मैं भी डरता हूँ," वो बोले। इतना ही कहा। पर इतना काफ़ी था।
उसी पल मेरी जेब में घंटी बजी।
"अंक," उसने कहा, "यह अलग जोड़ है। यह घर का जोड़ है। लेकिन यह अभी पूरा नहीं हुआ। यह तब पूरा होगा जब तेरा बाप उस सभा में खड़ा होकर बोलेगा। तब तक तेरा घर चुप रहेगा।"
"फिर मैं क्या करूँ?"
"इंतज़ार कर। और आज शाम को जो तू करने जा रहा है, वो कर। दोनों बेटों को बुला। उनकी सुलह भी इसी सिलसिले की कड़ी है।"
मैंने पापा के हाथ को पकड़ा। वो चुप बैठे रहे, पर इस बार उनकी चुप्पी पहले जैसी नहीं थी। इस बार वो चुप्पी बोल रही थी।
मैं उठा। दुकान की तरफ़ चला। रास्ते में उस्ताद अली बक्श की दुकान से आवाज़ आई — सिलाई मशीन की टिक-टिक। पचास साल बाद आज फिर आवाज़ आ रही थी। और मुझे लगा कि आज गली में कुछ बदल रहा है — धीरे-धीरे, पर बदल रहा है।
मैंने दुकान खोली और मेज़ पर छोटी फूल वाली घंटी रखी — वो जो उस्ताद ने दी थी। उसे देखा। वो चुप थी, पर मुझे लगा जैसे वो मेरी तरफ़ देखकर कह रही हो — "अब बड़ी घंटी से पूछ।"
मैंने बड़ी घंटी निकाली, उसे हथेली पर रखा और धीमे से पूछा, "मेरा घर इतना चुप क्यों है?"
घंटी ने जवाब दिया। और इस बार उसका जवाब छोटा नहीं था। इस बार उसने पूरा कहा।
"तेरा घर चुप है क्योंकि उस घर में दो आदमी हैं जो एक-दूसरे से प्यार करते हैं, पर एक-दूसरे को बताना नहीं जानते। तेरा बाप पचास साल से एक अंगूठे का बोझ ढो रहा है, और तेरी माँ पाँच साल से उसे देख रही है। तू बीच में खड़ा है, दोनों से हँसकर बात करता है, और दोनों को लगता है कि तू ठीक है। पर तू ठीक नहीं है, अंक। तेरा घर इसलिए चुप है क्योंकि तीनों ने एक-दूसरे को बचाने की कोशिश में खुद को बचाना भूल दिया है।"
मेरी आँखें भर आईं। मैंने घंटी को जेब में रखा और दुकान के दरवाज़े पर खड़ा हो गया। बाहर गली में शाम उतर रही थी। शबनम आपा गुमटी का पहला दीया जला रही थीं। पीपल की छाया लंबी हो रही थी। और दूर कहीं, गली के मुहाने पर, एक सफ़ेद गाड़ी धीरे से गुज़री और रुक गई।
मैंने साँस ली। आज शाम दो बेटों को बुलाना था। और उसके बाद, कल सुबह दस बजे, सबसे बड़ा सच सबके सामने रखना था।
पर तभी मुझे लगा कि घंटी फिर गरम हो रही है। मैंने उसे निकाला।
"क्या?" मैंने पूछा।
"अंक," घंटी ने कहा, "आज शाम को जो होगा, वो सिर्फ़ सुलह नहीं है। वो एक औरत की ज़िंदगी का सच है जो अभी तक तेरे पास नहीं आया। और आज शाम वो तेरे दरवाज़े पर आने वाला है।"
"कौन?"
पर घंटी चुप हो गई। सिर्फ़ इतना कहा, "दरवाज़ा देख।"
मैंने दरवाज़े की तरफ़ देखा।
बाहर गली में एक औरत खड़ी थी। सिर पर सफ़ेद दुपट्टा, हाथ में छोटा बैग, और चेहरे पर वो थकान जो सिर्फ़ उन लोगों की होती है जिन्होंने बहुत लंबा सफ़र किया हो।
मैं उसे नहीं पहचानता था। पर घंटी पहचानती थी।
और तभी उस औरत ने कदम बढ़ाया, दुकान की तरफ़, और धीमी आवाज़ में कहा, "तुम शंकर के बेटे हो न?"
मैंने सिर हिलाया।
वो मुस्कुराई। पर उसकी मुस्कान में कुछ ऐसा था जो बोल रहा था — "मैं तुम्हारे पापा की उस रात की गवाह हूँ जिस रात उन्होंने अंगूठा लगाया था।"
मैंने दुकान का दरवाज़ा पूरा खोल दिया।
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