The Mysterious Bell – Chapter 181: jodne wala mistri hissa 019 ep181-190
सीढ़ियाँ गिनना भूल गया था मैं।
सच कहूँ तो गिनने की कोशिश भी नहीं की थी। जब सामने अंधेरा हो, नीचे सफ़ेद कुर्ते वाली परछाईं खड़ी हो, और जेब में बत्तीस साल पुरानी घंटी गरम हो रही हो — तो आदमी सीढ़ियाँ नहीं गिनता। आदमी बस अपने पैर देखता है। देखता है कि पैर अब भी उसके साथ हैं या नहीं।
परछाईं ने कहा —
"नाम ठीक बोला। पर गिनती भूल गए।"
मैं रुका। एक पैर सीढ़ी पर, दूसरा हवा में।
नीचे से ठंडी हवा आ रही थी। ऐसी ठंडी, जैसे किसी पुराने तहख़ाने में बरसों से हवा न आई हो और अचानक दरवाज़ा खुल गया हो।
मैंने हँसने की कोशिश की। हँसी गले में अटक गई। मैंने उसे खाँसी में बदल दिया।
"गिनती तो भाई," मैंने कहा, "हमेशा से कमज़ोर रही है। स्कूल में मास्टर जी बोलते थे — अंकुश, अगर तुझे गिनती आती है, तो तेरे बाप का नाम शंकर है। मैं बोलता था — नाम तो है ही।"
परछाईं हिली नहीं।
"पर नाम पूरा याद है," मैंने कहा। "और नाम ही काफ़ी है। गिनती तो दुकान का हिसाब है, साहब। हिसाब भूल जाएँ, पर नाम नहीं। नाम जेब में नहीं रखते। नाम सीने में रखते हैं। और सीना जब तक धड़कता है, नाम भूलता नहीं।"
परछाईं ने धीरे से कहा —
"तो फिर सब बोलो। बारी-बारी। पूरा नाम। बाप। माँ। घर।"
मीरा का हाथ मेरे हाथ में और कस गया। मैंने उसकी उँगलियाँ महसूस कीं — ठंडी, पर काँपती नहीं। मीरा कभी नहीं काँपती। वो डरती है, पर काँपती नहीं। यही फ़र्क़ है मेरे और उसके बीच। मैं डर कर भी हँस देता हूँ। वो डर कर भी चुप रहती है।
मैंने एक गहरी साँस ली।
"अंकुश," मैंने कहा। "अंकुश यादव। बाप — शंकर यादव। माँ — सुशीला यादव। बहन — काजल। गली — साइकिलों की गली। घर — पीपल के नीचे, पत्थर की चबूतरी के सामने, वहाँ जहाँ उस्ताद अली बक्श की सिलाई मशीन टिक-टिक करती है।"
परछाईं चुप रही।
"मीरा," मीरा ने कहा। "मीरा तिवारी। बाप — बड़े थे, अब नहीं हैं। माँ — कमरे में बैठकर मेरा कैमरा संभालती हैं। काम — बस्ती की आवाज़। डर — कि कहीं मैं फिर किसी का घर न तोड़ दूँ।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसने मुझे नहीं देखा। वो सामने देख रही थी — उस सफ़ेद परछाईं को। मैंने सोचा, यह औरत कभी अपने बारे में दो लाइन ऐसे नहीं बोलती। आज बोली। इसे सुनना पड़ेगा, बाद में। अभी नहीं।
"और तुम?" परछाईं ने कहा। "छोटे वाले।"
टिंकू मेरे पीछे था। मैंने सुना कि वो हल्का-सा हिला।
"टिंकू," उसने कहा। फिर रुक गया।
"पूरा," परछाईं ने कहा।
"टिंकू," उसने फिर कहा। "बस टिंकू। बाकी सब… बाप छह महीने पहले चला गया। माँ हैं। और मैं उस्ताद का शागिर्द हूँ। यही मेरा पूरा नाम है।"
मेरे भीतर कुछ हिला। टिंकू ने कभी अपने बाप के बारे में इतने सीधे नहीं कहा था। बच्चे जब सीधे बोलते हैं, तो बड़ों को सहना पड़ता है। और सहते वक़्त मुझे हमेशा लगता है कि मैं किसी चीज़ पर खड़ा हूँ जो हिल रही है।
परछाईं ने फिर धीरे से कहा —
"अच्छा। नाम पूरे हैं।"
और फिर…
वो गायब हो गई।
सच में गायब। जैसे ठंडी हवा का झोंका आया हो और चला गया हो। पहले उसका चेहरा धुंधला पड़ा, फिर उसका सफ़ेद कुर्ता हवा में घुल गया, फिर बस एक ठंडी लकीर बची — जो ऊपर से नीचे तक गई और फिर मिट गई।
टिंकू ने पीछे हटकर मेरी कमीज़ पकड़ी।
"भैया…"
"हाँ," मैंने कहा। "मैंने भी देखा।"
"वो मर गई?"
"पता नहीं यार," मैंने कहा। "मरे हुए लोग सफ़ेद कुर्ते नहीं पहनते। वो बस… चली गई। जैसे कोई पुरानी बात चलती रहती है और अचानक रुक जाती है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"तुम डर नहीं रहे?" उसने पूछा।
"डर रहा हूँ," मैंने कहा। "पर तुम्हारे सामने दिखाता नहीं।"
"क्यों?"
"क्योंकि तुम मेरे सामने नहीं दिखाती," मैंने कहा।
वो हल्की-सी हँसी। बस होंठों पर। और उस हँसी में एक बात थी जो मैंने अब तक नहीं देखी थी — भरोसा। यह भरोसा मैंने कमाया था। एक-एक टूटी चीज़ जोड़कर।
"चलो," मैंने कहा।
हम आगे बढ़े।
सीढ़ियाँ ठंडी थीं। हर कदम पर एक आवाज़ आती — जैसे कोई पुराना पत्थर अंदर से कराह रहा हो। मेरे पैर के नीचे धूल थी। धूल, जिस पर बत्तीस साल से किसी ने कदम नहीं रखा था।
नीचे उतरते-उतरते हवा भारी हो गई। अब सिर्फ़ ठंडी नहीं थी। अब उसमें गंध थी।
जले काग़ज़ की गंध।
और फिनाइल की।
दोनों इतनी मिली हुई थी कि पता नहीं चल रहा था कि पहले कौन आई — जला काग़ज़, या फिनाइल। जैसे किसी ने यहाँ कुछ जलाया हो, और फिर इस डर से कि कहीं कोई सूँघ न ले, ऊपर से फिनाइल डाल दिया हो।
टिंकू ने पीछे से पूछा —
"भैया, रोशनी?"
"रुक," मैंने कहा।
मैंने जेब से घंटी निकालनी चाही, पर फिर याद आया — घंटी बजानी नहीं। यहाँ कुछ भी पता नहीं। हम बंद कमरे में हैं। बत्तीस साल से बंद।
"टिंकू," मैंने कहा, "तेरे पास माचिस है ना?"
"है," उसने कहा। "और बाल्टी भी है।"
"बाल्टी रहने दे। माचिस निकाल।"
उसने माचिस निकाली। मैंने उसकी आवाज़ सुनी — डिब्बी खुलने की, फिर तीली के घिसने की।
छनक।
पीली रोशनी फैली।
और मैंने देखा।
कमरा बड़ा था — जितना मैंने सोचा था उससे बड़ा। छह फुट चौड़ा नहीं, दस फुट चौड़ा शायद। और लंबा — इतना लंबा कि माचिस की रोशनी दूसरी दीवार तक ठीक से नहीं पहुँच रही थी।
दीवारों पर सीलन थी। नीचे फ़र्श पर ईंटें थीं — पुरानी, घिसी हुई, कहीं-कहीं टूटी।
कमरे के एक कोने में पुरानी कुर्सियों का ढेर था।
सच में ढेर। दो नहीं, चार नहीं — शायद बीस, पच्चीस कुर्सियाँ। एक-दूसरे पर चढ़ाई हुई। कोई लकड़ी की, कोई लोहे की। किसी की पीठ टूटी थी, किसी का हाथ। एक कुर्सी ऐसी थी जिसका एक पाया दूसरी कुर्सी की सीट में घुसा हुआ था, जैसे किसी ने गुस्से में पटकी हो।
और दूसरे कोने में — रजिस्टर।
रजिस्टरों का ढेर।
मोटे, लाल जिल्द वाले, कुछ भूरी जिल्द वाले। कुछ पर धूल इतनी थी कि जिल्द का रंग पहचानना मुश्किल था। कुछ खुले पड़े थे, जैसे किसी ने आधा हिसाब देखकर छोड़ दिया हो। एक रजिस्टर उलटा पड़ा था, उसके पन्ने हवा में हल्के-हल्के हिल रहे थे — जबकि हवा कहीं नहीं थी।
मैंने टिंकू की तीली का इंतज़ार किया — फिर अगली जलाई।
अब और साफ़ दिखा।
कमरे की दीवारों पर काग़ज़ चिपके थे। पुराने काग़ज़, पीले, किनारों से मुड़े हुए। कुछ ऐसे जैसे बच्चों के स्कूल के चार्ट हों। कुछ ऐसे जैसे कोई बड़ा घोषणा-पत्र हो। एक काग़ज़ ऐसा था जिस पर सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी — "जो यहाँ आया, वो अब बाहर नहीं जाएगा।" नीली स्याही में। बड़े अक्षरों में।
मेरे पेट में कुछ घूमा।
मीरा ने कहा —
"अंकुश, ये जगह…"
"हाँ," मैंने कहा। "ये जगह चलती है।"
"कैसे?"
"पता नहीं," मैंने कहा। "पर जो कमरा बत्तीस साल से बंद हो, उसमें धूल इतनी होनी चाहिए कि आदमी घुटनों तक धँस जाए। यहाँ धूल है, पर इतनी नहीं। किसी ने सफ़ाई नहीं की, पर किसी ने धूल को जमने भी नहीं दिया।"
टिंकू ने पीछे से कहा —
"भैया, ये कुर्सियाँ… इतनी सारी क्यों?"
मैंने कुर्सियों की तरफ़ देखा। मुझे कुछ याद आया — रज़ा सलीम का रजिस्टर, सात नाम, सात अंगूठे। और कल वो सभा। जहाँ लोग बैठते हैं।
"पता नहीं," मैंने कहा। "पर ये कुर्सियाँ किसी मरम्मत के लिए नहीं रखी गईं, टिंकू। ये बैठने के लिए रखी गई थीं। एक-एक करके।"
"कौन बैठता था?"
"जिनके नाम यहाँ लिखे हैं," मैंने कहा। "और जिनके नाम मिटा दिए गए।"
तभी माचिस बुझ गई। टिंकू ने तीसरी जलाई।
और तीसरी की रोशनी में मैंने देखा — कमरे की सबसे पीछे वाली दीवार पर, ज़मीन से थोड़ा ऊपर, एक चौकोर निशान था।
साफ़ निशान। जैसे वहाँ से कोई चीज़ हटाई गई हो। धूल से अलग रंग — दीवार की सीलन के बीच एक साफ़, सूखा चौकोर।
मैंने अपनी आँखें सिकोड़ीं।
"मीरा, देखो ये।"
वो मेरे पास आई। तीली की रोशनी में उसने देखा।
"कुछ था यहाँ," उसने कहा।
"हाँ," मैंने कहा। "कुछ बड़ा। शायद एक तस्वीर। या कोई तबेला। या—"
और तभी…
टक।
एक आवाज़ आई। बहुत धीमी।
टक।
दूसरी।
टक।
तीसरी।
टिंकू ने डरकर पीछे देखा।
"भैया, कौन?"
मैंने अपने कान सीधे किए। आवाज़ दीवार के अंदर से आ रही थी। पीछे वाली दीवार से। उसी चौकोर निशान के पीछे से।
टक। टक। टक।
तीन धीमी आवाज़ें। जैसे कोई अंदर से दीवार खटखटा रहा हो। बस इतनी धीमी, जैसे ख़ुद भी डर रहा हो कि कहीं कोई सुन न ले।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी गरम थी। इतनी गरम कि कपड़े के बाहर से भी महसूस हुई।
और घंटी ने कहा —
"यहाँ टूटा इंसान नहीं। वादा है।"
मैंने घंटी को जेब से निकाला। तीली की रोशनी में उसका पीतल चमका। उस पर खुदा फूल आज किसी और तरह से दिख रहा था — जैसे वो फूल नहीं, कोई छोटा-सा दरवाज़ा हो।
"कैसा वादा?" मैंने धीरे से पूछा।
"जो तीन बार खटखटाता है," घंटी ने कहा, "वो अपनी बात नहीं कहता। वो सिर्फ़ याद दिलाता है"वो सिर्फ़ याद दिलाता है," घंटी ने कहा।
"क्या याद दिलाता है?" मैंने पूछा।
"कि यहाँ कुछ बंद है," घंटी ने कहा। "और बंद चीज़ें जब बहुत देर तक बंद रह जाएँ, तब वो खटखटाने लगती हैं। खुद को याद दिलाने के लिए नहीं। उनको याद दिलाने के लिए, जो उन्हें भूल गए।"
टिंकू ने तीली को ऊपर उठाया। रोशनी में दीवार का वो चौकोर निशान और साफ़ दिखा।
"भैया," उसने धीरे से कहा। "मुझे यहाँ डर लग रहा है।"
"डर अच्छी चीज़ है, टिंकू," मैंने कहा। "डर बताता है कि तू ज़िंदा है। जो नहीं डरता, वो या तो बहादुर है, या मर चुका है।"
"और तुम?" उसने पूछा। "तुम्हें डर नहीं लगता?"
"मुझे बहुत लगता है," मैंने कहा। "बस मैंने उससे नमस्ते कर ली है। अब वो मेरे साथ चलता है, पीछे नहीं रहता।"
मीरा ने आगे कदम बढ़ाया। उसकी छोटी टॉर्च की बत्ती झिलमिला रही थी। दीवारें अंदर से मोटी थीं — पुराने पत्थर, उनके बीच धूल की सफ़ेद लकीरें, ऊपर से टपकता पानी।
"इसमें हवा नहीं है," उसने कहा। "मतलब यहाँ आख़िरी बार दरवाज़ा खुला, बहुत साल पहले था।"
"और अगर हवा नहीं, तो खटखटाने वाला भी कहाँ से आया?" टिंकू ने पूछा।
"इसीलिए," घंटी ने कहा, "यहाँ टूटा इंसान नहीं। वादा है।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे पूछ रहा हो — भैया, तू ही समझा दे।
मैंने घंटी को जेब में वापस नहीं रखा। हाथ में रखी।
नीचे, सीढ़ी के अगले मोड़ पर, वो सफ़ेद परछाईं अब भी खड़ी थी। अब और पास — सिर्फ़ दो सीढ़ियाँ दूर। उसका चेहरा पूरा नहीं दिख रहा था, पर उसका कुर्ता ऐसा था जैसे बरसों से न धोया गया हो — सफ़ेद, पर पीले की तरफ़ झुका हुआ, किनारों पर ज़र्दी।
और उसने फिर कहा —
"नाम ठीक बोला। अंकुश यादव। बाप शंकर यादव। माँ सुशीला। बहन काजल। पर अंकुश," उसने कहा, "तूने सीढ़ियाँ नहीं गिनीं।"
मेरा दिल ज़ोर से धड़का।
पर मैंने किसी को कुछ महसूस नहीं होने दिया। मैंने सीढ़ी के पत्थर पर पैर जमाया और ऐसे हँसा जैसे कोई पुरानी गली में चाय वाला मज़ाक कर रहा हो।
"सीढ़ियाँ?" मैंने कहा। "भाई साहब, मैं सुबह उठकर सबसे पहले कुछ नहीं गिनता। न सीढ़ियाँ, न चाय के कप, न चप्पल। सीधे काम पर लगता हूँ। गिनती मेरी कभी अच्छी नहीं रही। स्कूल में मास्टर जी कहते थे — अंकुश, तू पहाड़ा भूल जाता है, पर पेंच कसना याद रहता है।"
सफ़ेद परछाईं चुप रही।
"और नाम," मैंने कहा, "नाम मुझे पूरा याद है। बाप, माँ, बहन, गली, दुकान — सब याद है। क्योंकि ये चीज़ें गिनने की नहीं, जीने की होती हैं।"
मेरा हाथ टिंकू के कंधे पर गया।
"बोल, टिंकू," मैंने कहा। "अपना पूरा नाम बोल। ज़ोर से।"
टिंकू ने गला साफ़ किया। पहले उसकी आवाज़ फँसी, फिर खुल गई।
"टिंकू," उसने कहा, फिर रुका, और ज़ोर से बोला, "टिंकू यादव। बाप — वो नहीं हैं। पर माँ — शीला देवी। गली — साइकिलों की गली। उस्ताद — अंकुश भैया।"
मेरी आँखें भर आईं। पर मैंने मुस्कुराकर छुपा लिया।
"मीरा," मैंने कहा।
मीरा ने सीधे परछाईं की तरफ़ देखा — बिना डरे, बिना झुके।
"मीरा तिवारी," उसने कहा। "बस्ती की आवाज़। पापा की बेटी। और जो काग़ज़ मैंने पाँच साल पहले ग़लत छापा था, उसे आज ठीक करने आई हूँ।"
परछाईं ने एक कदम पीछे किया।
फिर बोली — और इस बार उसकी आवाज़ में वो मिठास थोड़ी कम थी।
"नाम जानते हो," परछाईं ने कहा। "पर सीढ़ी गिनने से क्या फ़र्क़ पड़ता है, वो नहीं जानते। शंकर यादव को पता था। वो सीढ़ियाँ गिनते हुए उतरे थे — अट्ठाईस। और इस बार भी अट्ठाईस ही गिनी।"
मैं ठिठका।
"पापा ने गिनी थीं?"
"जिस दिन उन्होंने उस दरवाज़े के नीचे अंगूठा लगाया था, उस दिन भी यहाँ आए थे," परछाईं ने कहा। "पर अंगूठा लगाने से पहले। शायद यही सोचकर कि यहाँ कुछ ऐसा मिलेगा, जो उन्हें रोक देगा।"
मेरे अंदर कुछ ठंडा उतर गया।
मैंने परछाईं को ठीक से देखना चाहा — चेहरा, आँखें, हाथ — पर रोशनी वहाँ तक नहीं पहुँच रही थी। टिंकू की तीली की लौ काँप रही थी, जैसे खुद भी कुछ देखकर डर गई हो।
और फिर…
परछाईं कुछ और नहीं बोली।
बस ठंडी हवा की तरह, एक झोंके में, वो कमरे की दीवार में घुल गई। जैसे किसी ने गहरी साँस ली हो, और साँस के साथ ही वो गायब हो गई।
टिंकू ने पीछे देखा।
"भैया, वो…"
"हाँ," मैंने कहा। "गई।"
"कहाँ?"
"अगर मुझे पता होता," मैंने कहा, "तो मैं तुमसे क्यों पूछता?"
मीरा ने टॉर्च की बत्ती उस जगह पर की जहाँ परछाईं खड़ी थी। ज़मीन पर कुछ नहीं था। बस पत्थर का फ़र्श, और उस पर एक पतला-सा नम निशान — जैसे कोई नंगे पैर से वहाँ खड़ा हुआ हो और फिर हट गया हो।
"ये सूख रहा है," मीरा ने कहा। "मतलब अभी भीगा था।"
"मतलब वो हमसे पहले यहाँ थी," मैंने कहा। "बहुत पहले नहीं।"
हम आगे बढ़े। सीढ़ियाँ खत्म हुईं और हम एक चौड़े, ठंडे तहखाने में उतर आए।
यहाँ हवा में गंध थी — जला हुआ काग़ज़ और उसके ऊपर फिनाइल। दोनों मिलकर एक ऐसी बदबू बना रहे थे, जो नाक में नहीं, सीने में लग रही थी।
टिंकू ने तीसरी तीली जलाई। चौथी, पाँचवीं, छठी — हर बार जल्दी-जल्दी, जैसे अंधेरे को थोड़ी देर और दूर धकेलना हो।
और रोशनी में जो दिखा, उसने मेरा मुँह खामोश कर दिया।
कुर्सियाँ।
बीस-पच्चीस पुरानी लकड़ी की कुर्सियाँ — कुछ की पीठ टूटी, कुछ की टाँगें ज़ंग लगी कीलों से जुड़ी, कुछ पर धूल की इतनी मोटी परत कि लगा चादर ओढ़ी हो। सब एक आयत में रखी हुईं। सब एक-दूसरे से बराबर दूरी पर। जैसे किसी सभा के लिए सजाई गई हों।
और उनके सामने, दीवार से सटी एक लंबी लकड़ी की मेज़।
मेज़ पर रजिस्टरों का ढेर। बीस, तीस, शायद पचास। लाल जिल्द, भूरी जिल्द, कुछ बिना जिल्द के, धागे से सिले। किसी पर मोटी धूल, किसी पर चूने की सफ़ेद बूँदें।
और मेज़ के एक कोने में, एक छोटा पीतल का दीया — बुझा हुआ। उसके नीचे जली हुई रुई और थोड़ा काला तेल।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो पहले से उन रजिस्टरों की तरफ़ बढ़ रही थी, जैसे पत्रकार का हाथ बिना सोचे माइक की तरफ़ बढ़ता है।
"रुको," मैंने कहा। "पहले देख लो कि अंदर कोई ज़िंदा है या नहीं।"
"तुम्हें लगता है, कोई ज़िंदा है?" उसने पूछा।
"इमरान ज़िंदा हुआ तो हो सकता है," मैंने कहा।
हमने टॉर्च घुमाई। कमरा चौकोर था — कोई तीस फुट लंबा, बीस फुट चौड़ा। दीवारें पत्थर की, ऊपर छत पर लोहे के शहतीर, उनसे लटकते टूटे बल्ब। कोई भी बल्ब जला नहीं रहा था।
और एक कोना — सबसे दूर बायां — वहाँ कुर्सियाँ नहीं थीं। वहाँ दीवार से सटाकर एक लकड़ी का संदूक रखा था। उसके ऊपर धूल की मोटी परत। संदूक के पास एक उलटी पड़ी कुर्सी। और उस कुर्सी के पास कुछ…
"मीरा," मैंने धीरे से कहा। "वहाँ रोशनी कर।"
उसने टॉर्च घुमाई।
और अपनी आँखों पर यक़ीन नहीं आया।
इमरान।
वो उस कोने में, संदूक की तरफ़ पीठ किए, फ़र्श पर बैठा था। घुटने सीने से चिपके हुए। सिर नीचा। और दोनों हाथ — दोनों हाथ अपने सिर पर रखे हुए।
वो हिल नहीं रहा था। हाँफ़ भी नहीं रहा था। बस बैठा था — जैसे कोई बच्चा जो खेल में हारकर कोने में बैठ गया हो।
"इमरान!" मैंने कहा और दौड़कर उसकी तरफ़ बढ़ा।
वो उठा नहीं। मैंने उसका कंधा पकड़ा। उसका शरीर ठंडा था — ठंडा नहीं, गर्म नहीं। जैसे किसी कपड़े को रात भर बाहर छोड़ दिया हो।
"इमरान, उठ। हम आए हैं।"
उसने सिर उठाया। आँखें खुली थीं, पर कुछ और देख रही थीं — मुझे नहीं। शायद इस कमरे को भी नहीं। कुछ और दूर।
"तुम्हें पता है," उसने कहा, इतनी धीमी आवाज़ में कि मुझे उसके होंठों की हरकत देखनी पड़ी, "यहाँ हवा का आना-जाना किसी-किसी रात होता है। सिर्फ़ तब, जब बाहर बारिश आती है। और मैंने यहाँ तीन बारिशें सुनी हैं।"
"कितनी देर हो गई, इमरान?" मीरा ने पूछा।
"पता नहीं," उसने कहा। "कमरे में अंधेरा है। ऊपर की सीढ़ी से जो रोशनी आती है, वो भी तो नहीं आ रही।"
"पर तुम बोल रहे हो," मैंने कहा। "मतलब कुछ तो हुआ। कोई तो आया।"
वो चुप हुआ।
फिर बोला — और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ पहचाना-सा डर आया।
"एक आदमी आया," उसने कहा। "सफ़ेद कुर्ते में। यहीं बैठ गया। मेरे सामने। बहुत देर बैठा। कुछ नहीं बोला। फिर उठकर चला गया — और जाते-जाते इतना ही कहा कि तू अंकुश के पास नहीं जाएगा। क्योंकि तू अंकुश को भूल जाएगा।"
"क्या?" मैंने कहा।
"मैंने कहा कि नहीं भूलूँगा," इमरान ने कहा। "तो उसने कहा कि भूल जाएगा, क्योंकि यहाँ अंदर आदमी वक़्त भूल जाता है। पहले दिन, फिर दिन, फिर सब। मैं सोचता रहा कि ये सब क्या बकवास है। पर…" वो रुका। "भैया, मुझे अब याद नहीं आ रहा कि मैं यहाँ कब आया। कल आया था? या उससे पहले? मुझे याद है कि बाहर रोशनी थी और मैं साइट की तरफ़ जा रहा था। फिर यहाँ। फिर कुछ नहीं।"
मेरे पेट में कुछ पत्थर जैसा बैठ गया।
टिंकू ने इमरान का हाथ पकड़ा। इमरान ने उसकी तरफ़ देखा, और पहली बार उसकी आँखों में कुछ जाना-पहचाना आया।
"टिंकू?" उसने कहा। "तू भी यहाँ?"
"मैं तो तुझे लेने आया हूँ, निकम्मे," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ भर्रा गई।
"चलो," मीरा ने कहा। "पहले इसे ऊपर ले चलो। फिर जो देखना है देखेंगे।"
"नहीं," मैंने कहा।
वो रुकी।
"अंकुश—"
"मीरा, अगर हम अभी ऊपर चले गए," मैंने कहा, "तो साहब का आदमी रात भर में ये कमरा एक बार फिर बंद करवा देगा। और अगली बार उस दरवाज़े को खोलने के लिए हमें एक और बत्तीस साल लगेंगे। हमें एक चीज़ चाहिए — सबूत। वो कुछ ऐसा, जो ज़मीन के साथ सीधा जुड़े।"
"रेजिस्टर?" मीरा ने मेज़ की तरफ़ इशारा किया।
"हाँ," मैंने कहा।
मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी गरम थी। बहुत गरम।
"क्या चाहिए?" मैंने धीरे से पूछा।
घंटी चुप रही।
"बोल ना," मैंने कहा।
"तीन," घंटी ने कहा।
"तीन क्या?"
"तीन खटखटाहटें सुन," घंटी ने कहा। "वो तुझे बताएँगी।"
और तभी…
टक।
टिंकू ने अपना हाथ मेरी कलाई पर जोर से दबाया।
टक।
मीरा ने टॉर्च को उस दीवार पर की जिसकी तरफ़ मेरी पीठ थी।
टक।
तीन आवाज़ें। धीमी। बराबर। और बेहद करीब।
दीवार के अंदर से।
मैंने तेज़ी से पीछे मुड़कर देखा। दीवार — बस दीवार। पीछे वाली दीवार जिस पर वो चौकोर निशान नहीं था। सिर्फ़ धूल और पत्थर।
"फिर से?" मैंने कहा।
पर तीन खटखटाहटें फिर नहीं आईं।
घंटी ने कहा — "अब समझा? ये इंसान नहीं। ये वादा है। कोई सात आदमियों ने मिलकर ये ज़मीन दी थी, अस्पताल के नाम पर। और उन सातों ने शर्त लगाई थी कि ज़मीन बिकेगी नहीं। अब किसी ने बेच दी। पर सातों में से एक भी अभी तक चुप है — क्योंकि उसे पता ही नहीं चला। और वो चुप्पी," घंटी ने कहा, "यहाँ दीवार के अंदर बैठी है। वो खटखटाती है। रोज़ नहीं। हर साल नहीं। तीसरे साल।"
"क्यों तीसरे साल?" मीरा ने पूछा।
"क्योंकि तीसरा साल," घंटी ने कहा, "ब्याज का साल होता है।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा — मुँह खुला, आँखें बड़ी।
"भैया, ये क्या बोल रही है?"
"मतलब," मैंने कहा, "ये आवाज़ें कोई डराने के लिए नहीं हैं। ये सिर्फ़ गिनती कर रही हैं। जैसे कोई बंदा हर तीसरे साल दस्तक देता है और पूछता है — किसी को याद है कि ये ज़मीन किसकी है?"
"तो फिर इस बार," मीरा ने कहा, "तीसरा साल क्यों?"
"क्योंकि इस बार," मैंने कहा, "सातवें आदमी की चुप्पी को भी कुछ महसूस हुआ है। मेरे दादा जगदीश यादव।"
और उसी वक़्त, आख़िरी खटखट के बाद, दीवार के उसी हिस्से से एक पतली दरार फूटी — जैसे चूने के नीचे कुछ साँस ले रहा हो। दरार से धूल का एक पतला झोंका नीचे गिरा।
मैंने मीरा का हाथ पकड़ा।
"उठाओ इमरान को," मैंने कहा। "पहले ऊपर ले चलो। फिर उतरेंगे।"
"और रजिस्टर?" उसने पूछा।
"रजिस्टर का एक भी पन्ना," मैंने कहा, "बिना मेज़ के बताए नहीं उठेगा। मुझे देखना है कि कौन सा रजिस्टर खुद को उठने देता है।"
हमने इमरान को बीच में लिया — एक तरफ़ मैं, दूसरी तरफ़ टिंकू, और मीरा आगे टॉर्च लिए। हम सीढ़ियाँ चढ़ने लगे।
और जैसे ही मैंने पहली सीढ़ी पर पैर रखा, इमरान ने मेरे कान के पास धीरे से कहा —
"अंकुश भैया, एक बात।"
"हूँ।"
"उस आदमी ने जाते वक़्त एक चीज़ छोड़ी थी," उसने कहा। "एक चीज़ जो मैंने उस संदूक के नीचे छिपा दी है, क्योंकि मुझे लगा कि अगर मैं उसे अपने पास रखूँगा, तो वो मुझे ले जाएगा। वो काग़ज़ नहीं थी। वो एक चीज़ थी।"
"क्या चीज़?" मैंने पूछा।
"पीतल की सीटी," इमरान ने कहा। "बिल्कुल वैसी ही, जैसी बंसीलाल चाचा की है।"
मैं एक पल के लिए रुका।
मैंने ऊपर सीढ़ी की तरफ़ देखा — जहाँ से रोशनी आ रही थी। जहाँ बंसीलाल को खड़ा होना चाहिए था।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो पहले से ऊपर की तरफ़ देख रही थी। उसके चेहरे पर जो था, वो मैंने पहचान लिया — पत्रकार का डर नहीं था, इंसान का डर था।
हम ऊपर पहुँचे। दरवाज़ा खुला था। बाहर लोहे के फाटक की तरफ़ से हबीब चाचा की आवाज़ आ रही थी — "अंकुश! जल्दी आ!"
और सीढ़ी पर, ठीक उसी दूसरी सीढ़ी पर जहाँ बंसीलाल खड़े थे…
सिर्फ़ उनकी पीतल की सीटी पड़ी थी।
पीली पीतल, पुरानी, घिसी, छोटे छल्ले पर लाल धागा बँधा हुआ। सीढ़ी के पत्थर पर एकदम सीधी रखी, जैसे किसी ने जान-बूझकर रखी हो।
बंसीलाल नहीं थे। चारों तरफ़ सिर्फ़ अंधेरा था, और उस अंधेरे में फाटक की तरफ़ जाती हवा की एक पतली सरसराहट।
मेरी छाती धड़कने लगी।
"बंसीलाल भाई!" मैंने ज़ोर से पुकारा।
कोई जवाब नहीं।
"बंसीलाल भाई!"
सिर्फ़ हवा।
मीरा ने टॉर्च घुमाई — सीढ़ी के नीचे, ऊपर, बगल के गलियारे में। कहीं कोई परछाईं नहीं। कोई पैर का निशान नहीं। जैसे कोई कभी वहाँ था ही नहीं।
मैंने धीरे से सीटी उठाई।
वो ठंडी थी। और उस पर वही पुरानी धूल थी — जो सीढ़ी के पत्थर पर बरसों से जमी थी। मतलब वो सीटी वहाँ बहुत देर से नहीं रखी गई थी। या तो वो बंसीलाल के हाथ से गिरी थी, या फिर…
"भैया," टिंकू ने धीरे से कहा। "पीछे।"
मैंने मुड़कर देखा।
और मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
सीटी — मेरे हाथ में थी। मैं उसे पकड़े हुए था। और वो…
बज रही थी।
अपने आप। न मेरे फूँकने से, न हिलने से। बस एक पतली, लंबी सीटी — जैसे दूर किसी पहाड़ी पर कोई रेलगाड़ी सीटी दे रही हो।
मैंने सीटी को नीचे किया।
सीटी बंद हो गई।
मैंने फिर ऊपर उठाया।
फिर बजी।
"अंकुश," मीरा ने धीरे से कहा। "ये सीटी—"
"मुझे पता है," मैंने कहा। "ये मेरे हाथ से बज रही है। पर मैं फूँक नहीं रहा।"
"फिर कौन फूँक रहा है?"
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला।
घंटी अब और गरम थी। इतनी गरम कि मुझे लगा कि कपड़ा जल जाएगा।
"घंटी," मैंने धीरे से कहा। "कह क्या रही है?"
घंटी ने फुसफुसाया — इतना धीमे कि मुझे लगा शायद सिर्फ़ मैंने ही सुना।
"जो सीटी बजा रहा है," घंटी ने कहा, "वो सीढ़ी पर नहीं है।"
मैंने गला सूखता महसूस किया।
"तो कहाँ है?"
घंटी रुकी।
फिर बोली, इतने ठंडे स्वर में कि लगा खुद भी डर गई हो —
"दीवार के पीछे।"
मैंने पीछे देखा — वो दीवार, जिस पर वो चौकोर निशान था। जिसके पीछे से तीन खटखटाहटें आई थीं।
और उसी वक़्त, सीटी फिर बजी — इस बार सिर्फ़ एक झटका। फिर दो। फिर तीन। तीन लंबी सीटियाँ, जैसे कोई अंदर से मदद माँग रहा हो। या जैसे कोई अंदर से कह रहा हो कि अभी मैं यहाँ हूँ, और तुम अभी बाहर।
टिंकू ने मेरा हाथ पकड़ा।
"भैया," उसने धीरे से कहा। "मुझे घर जाना है।"
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। मेरा हाथ भी काँप रहा था। पर मैंने मुस्कुराकर कहा —
"टिंकू, एक बात याद रख।"
"क्या?"
"अगर यहाँ कोई मदद माँग रहा है, तो मतलब वो हमारा दुश्मन नहीं है। दुश्मन मदद नहीं माँगता। दुश्मन सिर्फ़ चुप रहकर गोली चलाता है।"
सीटी फिर बजी — इस बार बहुत धीमी। जैसे थक गई हो।
और फिर, सीढ़ी के नीचे के अंधेरे में, मुझे कुछ सुनाई दिया। कोई धीरे-धीरे रेंग रहा था। किसी के शरीर का भार पत्थर पर सरक रहा था। धीरे। बहुत धीरे। जैसे कोई घायल हो, पर जान छोड़ने को राज़ी न हो।
मीरा ने टॉर्च उस आवाज़ की तरफ़ घुमाई।
और बंसीलाल की आवाज़ आई — हाँफ़ती, टूटी, पर ज़िंदा —
"अंकुश… यहाँ मत आना। वो सीटी मेरी नहीं है। मेरी सीटी तुम्हारे हाथ में है।"
और उसी पल, मेरे हाथ में जो सीटी थी, उसने एक और सीटी दी — लंबी, पतली, और इस बार…
इस बार उसमें से एक आवाज़ निकली।
बहुत दूर से। धीमी। पर इतनी साफ़ कि मैंने उसे पहचान लिया।
वो आवाज़ पापा की थी।
और पापा कह रहे थे —
"बेटा, वो सीटी फेंक दे। वो मेरी नहीं है। वो तेरी माँ की है।"
॥
सीटी मेरे हाथ में ठंडी हो गई।
पापा की आवाज़ गई, और उसके साथ वो लंबी पतली सीटी भी चली गई, जैसे किसी ने दूर जाकर दरवाज़ा बंद कर दिया हो।
मैं सीढ़ी पर खड़ा रह गया। हाथ में पीतल का वो छोटा टुकड़ा, जो अभी तक मेरे हाथ में बज रहा था, अब चुप था। बिल्कुल चुप। जैसे कभी बजा ही न हो।
"भैया," टिंकू ने मेरी कमीज़ खींची। "नीचे कोई है।"
मैंने कान लगाया।
हाँ। कोई था। कोई रेंग रहा था। किसी के घुटने पत्थर पर सरक रहे थे। धीरे। बहुत धीरे। जैसे कोई घायल जानवर हो, जिसे पता हो कि अगर वो रुका, तो मर जाएगा।
"बंसीलाल चाचा," मैंने नीचे की तरफ़ आवाज़ दी। "आप हैं?"
रेंगने की आवाज़ रुकी।
फिर बंसीलाल की आवाज़ आई — हाँफ़ती हुई, टूटी हुई, पर ज़िंदा।
"अंकुश… यहाँ मत आना।"
"क्यों?"
"क्योंकि जो नीचे है, वो मेरी सीटी से बोल रहा है। और जो मेरी सीटी से बोलता है, वो मेरी आवाज़ नहीं है।"
मीरा ने टॉर्च नीचे की तरफ़ की। रोशनी सीढ़ियों पर फिसलती हुई नीचे गई, और फिर मैंने देखा — सीढ़ी के नीचे, आख़िरी पत्थर पर, एक हाथ था। सिर्फ़ हाथ। झुर्रियों वाला, काँपता हुआ हाथ, जिसकी उँगलियाँ ज़मीन को पकड़े हुए थीं, जैसे ज़मीन ही उसका आख़िरी सहारा हो।
"चाचा, अपना हाथ ऊपर करो," मैंने कहा।
"नहीं।"
"चाचा —"
"नहीं, अंकुश। मैं ऊपर नहीं आऊँगा। मैं ऊपर आया तो वो मेरी नौकरी ले लेगा। और नौकरी गई तो बेटी की शादी किससे करूँगा?"
मैंने एक गहरी साँस ली।
इमरान मेरे पीछे बैठा था, सीढ़ी के कोने पर, दोनों हाथ गोद में रखे। उसकी आँखें खुली थीं, पर कुछ देख नहीं रही थीं। मीरा ने उसे पानी पिलाया था, और उसने पिया था, और फिर वो वापस वहीं बैठ गया था, जैसे बैठना उसने कहीं से सीखा हो।
"इमरान," मैंने धीरे से कहा। "तुम ठीक हो?"
उसने मेरी तरफ़ देखा।
फिर उसने वो कहा जो मुझे आज तक नींद नहीं लेने देगा।
"अंकुश भाई… अंदर एक आदमी था। वो मुझसे पूछ रहा था — तेरा नाम क्या है। मैंने कहा, इमरान। उसने कहा, पूरा नाम। मैंने कहा, इमरान हबीब अली।"
वो रुका।
"और फिर… फिर मुझे अपना नाम याद नहीं आया।"
टिंकू ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
"मैं अपना नाम भूल गया था, अंकुश भाई," इमरान ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो डर था जो बच्चों की आँखों में होता है, बड़ों के शब्दों में नहीं। "मैं वहाँ बैठा था और सोच रहा था — मैं कौन हूँ। मुझे सिर्फ़ इतना याद था कि मेरे बाप का एक आँगन है और उस आँगन में एक सूखा हैंडपंप है।"
मीरा ने अपना दुपट्टा उतारकर उसके कंधों पर रख दिया। इमरान ने उसे पकड़ लिया, जैसे ठंड लगी हो। पर उस शाम गली में गर्मी थी।
"चलो, ऊपर चलते हैं," मैंने कहा।
हम ऊपर आए। बंसीलाल नीचे से नहीं आए। मैंने कई बार आवाज़ दी। आख़िरी बार सिर्फ़ इतना सुनाई दिया — "मैं अपने आप आ जाऊँगा। तुम अपना काम देखो।" और फिर सीढ़ी के नीचे सन्नाटा।
ऊपर बरामदे में हमने इमरान को बंसीलाल की चारपाई पर बिठाया। वो बैठा, और फिर वो धीरे से कहने लगा — "काला। काला। काला।" एक ही शब्द, बार-बार, जैसे कोई पुराना रेडियो एक ही स्टेशन पर अटक गया हो।
मीरा मेरे पास आई।
"इसे घर भेजना पड़ेगा," उसने कहा।
"मैं खुद छोड़कर आता हूँ," मैंने कहा। "तू यहीं रुक, मैं बंसीलाल चाचा को भी देख लेता हूँ।"
मैंने मुड़कर देखा।
चारपाई खाली थी।
इमरान का पीला हेलमेट चारपाई पर पड़ा था, और चारपाई के पास की ज़मीन पर पानी गिरा था, जैसे कोई जल्दी में उठकर भागा हो।
टिंकू दौड़कर फाटक तक गया, फिर लौटा, हाँफता हुआ।
"भैया, बाहर कोई नहीं।"
मैंने आसमान की तरफ़ देखा। रात खत्म हो रही थी। पूरब में वो मैली सी लकीर आ रही थी जो हमारी गली में सुबह कहलाती है।
और मुझे उस वक़्त पता नहीं था कि सुबह होते-होते ये गली पूरी तरह बदल जाएगी।
सुबह मैं दुकान पर बैठा था, और मैंने चाय नहीं बनाई।
ये बात आज पहली बार हुई थी। मैं रात भर सोया नहीं, और जब इंसान रात भर न सोए, तो सुबह उसके हाथ पहले चाय की तरफ़ जाते हैं। पर मेरे हाथ नहीं गए। क्योंकि गुमटी की तरफ़ से धुआँ नहीं उठ रहा था।
शबनम आपा ने चूल्हा बंद रखा था। कल रात उन्होंने कहा था — सच खुलने तक चाय नहीं बनेगी। और मैंने सोचा था कि ये गुस्से की बात है, सुबह तक ठंडी हो जाएगी।
पर सुबह हुई, और चूल्हा ठंडा था।
गली की सुबह की जो आवाज़ होती है — चिमटी की खनक, केतली का छनकना, किसी का "दो कटोरी, एक मीठी" — वो सब गायब था। सिर्फ़ नल की टपक और दूर किसी कुत्ते का रोना बचा था।
मैं दुकान के बाहर स्टूल पर बैठा था, हाथ में वो सीटी थी। मैंने उसे कपड़े में लपेटकर जेब में रख लिया था, पर अब निकालकर देख रहा था। पीतल। छोटी। पुरानी। कोई नाम नहीं, कोई फूल नहीं, कोई निशान नहीं। बस एक सादा सीटी, जो कल रात मेरे हाथ में पापा की आवाज़ बनकर बोली थी।
"तेरी माँ की है।"
मेरी माँ अस्पताल के नीचे वाले कमरे में थीं। उनकी दवा के दो पत्ते बचे थे। और मैं यहाँ बैठा एक ऐसी सीटी को घूर रहा था, जो मेरी माँ की थी, और जिसके बारे में मैंने आज तक कभी नहीं सुना था।
तभी मैंने देखा — कोई आ रहा है।
सफ़ेद कुर्ता, टोपी, हाथ में एक गाँठ बँधा रूमाल। चाल में वो धीमापन था जो उम्र के साथ आता है, पर आज उसमें कुछ और भी था। पैर जैसे ज़मीन पर रखे ही नहीं जा रहे थे।
हबीब चाचा।
वो सीधे मेरी दुकान तक आए। मेरी दुकान पर वो आज तक एक बार भी नहीं आए थे। उनका आँगन मोड़ से हटकर था, और उनका काम उसी आँगन तक सीमित था।
वो मेरे सामने खड़े हो गए।
और फिर उन्होंने दोनों हाथ जोड़ लिए।
"चाचा —" मैं उठा।
"सुन ले," उन्होंने कहा। आवाज़ में वो कड़वाहट नहीं थी जो कल थी। सिर्फ़ थकान थी। "सुन ले, बेटा। फिर मैं चला जाऊँगा।"
"आप पहले बैठिए।"
"नहीं —"
"चाचा, बैठिए।" मैंने उनका हाथ पकड़ा। उनका हाथ ठंडा था, सुबह की ठंड में। "ये दुकान है। यहाँ हाथ जोड़कर खड़े नहीं होते। यहाँ लोग पंचर कराने आते हैं, और कभी-कभी अपनी टूटी चीज़ें छोड़ जाते हैं। बैठिए।"
मैंने उन्हें अंदर की स्टूल पर बिठाया। पीछे के कमरे से स्टोव निकाला। केतली चढ़ाई। मैंने खुद चाय बनाई — गुमटी की नहीं, अपनी। और जब मैंने वो काली चाय स्टील के गिलास में डालकर उनके हाथ में दी, तो उन्होंने गिलास को दोनों हाथों से पकड़ा, जैसे वो जाड़े में दी गई चाय हो।
"इमरान कल रात से घर नहीं आया," उन्होंने कहा।
मेरे हाथ रुक गए।
"मैं कल रात उसे लेकर आया था," मैंने कहा। "अस्पताल से। वो वहाँ था, चाचा। नीचे, बंद कमरे में। हमने उसे निकाला। वो ठीक नहीं था, वो… वो सिर्फ़ डरा हुआ था। मैंने उसे चारपाई पर बिठाया था। और मैं कुछ देर के लिए मुड़ा, और —"
"वो घर नहीं आया," हबीब चाचा ने कहा। और फिर वो चुप हो गए।
मैंने उनके हाथ में गिलास देखा। वो काँप रहा था, और चाय उस काँप के साथ हल्की लहरें बना रही थी।
"मैंने उसे सुना नहीं," उन्होंने कहा। "तीस साल। मैंने उसे एक बार भी पूरा नहीं सुना। जब वो छोटा था, तो मैंने कहा, बड़ा होकर बताएगा। जब वो बड़ा हुआ, तो मैंने कहा, अब क्या बताएगा, आदमी हो गया। जब उसने चिट्ठियाँ लिखीं, तो मैंने उन्हें खोला ही नहीं। सात चिट्ठियाँ, अंकुश। सात। मैंने उन्हें संदूक में रख दिया और सोचा, बेटा आएगा तो मुँह पर कहेगा।"
उन्होंने गिलास नीचे रख दिया, बिना पिया।
"वो आया। रोज़ आया। मैंने उसे देखा, पर उसकी आवाज़ नहीं सुनी। कल रात मैं घर में अकेला बैठा था और मैंने सोचा — मुझे उसकी आवाज़ याद करनी है। बस एक बार। सिर्फ़ इतना याद करना है कि वो कैसे बोलता था।"
वो मेरी तरफ़ देखने लगे।
"अंकुश, मुझे उसकी आवाज़ याद नहीं आ रही।"
दुकान में सन्नाटा था। पीछे के कमरे का बल्ब गुनगुना रहा था। मेरे हाथ में चाय का गिलास था और मुझे लगा कि मैं उसे ज़मीन पर रख दूँ, क्योंकि मेरे हाथ भी अब काँप रहे थे।
"तीस साल में मैंने उसकी आवाज़ सुनी ही नहीं," हबीब चाचा ने कहा। "तो अब याद क्या आएगी? याद तो उसी की आती है जिसे सुना हो।"
मैंने गिलास रखा और उनके सामने बैठ गया। स्टूल पर नहीं, नीचे ज़मीन पर बिछी बोरी पर। उनके घुटनों के पास।
"चाचा," मैंने कहा। "एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"आपके घर की मुंडेर पर सात लिफ़ाफ़े पड़े थे। उनमें से किसी में उसने लिखा था कि वो कहाँ है?"
उन्होंने सिर हिलाया। "आख़िरी में। आख़िरी वाले में उसने लिखा था — बाबा, मैं साइट पर हूँ, पर साइट के नीचे भी एक साइट है। मैं उसके नीचे जाता हूँ। और मैं वहाँ से कुछ लेकर आता हूँ जो आपके आँगन में रखना है।"
मेरी पीठ ठंडी हो गई।
"नीचे," मैंने दोहराया।
"नीचे," उन्होंने कहा। "मैंने उसे पढ़ा और सोचा, बेटा बड़ी बातें करने लगा है। और मैंने वो काग़ज़ वापस पोटली में रख दिया। और उस रात वो घर नहीं आया।"
कुछ देर दोनों चुप रहे। फिर उन्होंने धीरे से कहा, इतने धीमे कि जैसे ये बात खुद से कह रहे हों, मुझसे नहीं —
"मैं बूढ़ा हूँ, अंकुश। मेरी उम्र में आदमी कोशिश नहीं करता, दुआ करता है। पर आज सुबह मैंने दुआ नहीं की। आज सुबह मैंने सोचा, अगर मैं सच में कुछ कर सकता हूँ, तो वो एक ही चीज़ है — मैं उस आदमी के पास जाऊँ जो मेरे बेटे को ढूँढ सकता है।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"तू वही है ना?"
मैंने उनके हाथों को अपने दोनों हाथों में ले लिया।
"हाँ, चाचा," मैंने कहा। "मैं वही हूँ।"
और फिर मैंने वो कहा जो मैंने आज तक किसी से इतने यक़ीन से नहीं कहा था, शायद इसलिए कि आज तक मुझे इतना डरा हुआ कोई नहीं मिला था, जिसके सामने मैं खुद को सीधा रख सकूँ।
"मैं इमरान को लाऊँगा, चाचा। ज़िंदा। और बोलता हुआ। और उस दिन आप उसकी आवाज़ सुनेंगे, और आपको याद रखने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि वो आपके सामने बोलेगा।"
हबीब चाचा की आँखों में पानी आ गया। उन्होंने उसे पोंछा नहीं। उन्होंने बस गिलास उठाया और पहली बार चाय पी।
"कड़वी है," उन्होंने कहा।
"मैंने चीनी कम डाली है।"
"अच्छा किया," उन्होंने कहा। "जब बेटा मिलेगा, तब मीठी पी लूँगा।"
मैं हँसा। और मुझे लगा कि आज पहली बार कुछ ठीक हुआ है।
तभी गली के मुँह से मीरा आई।
उसका कैमरा कंधे पर था, बाल बिखरे हुए, और वो सीधे मेरी दुकान की तरफ़ आई। हबीब चाचा को देखकर वो एक पल रुकी, फिर मेरी तरफ़ देखकर बोली —
"इमरान का नंबर बंद है।"
"बंद?" मैंने कहा।
"नहीं, ये कहने से बात पूरी नहीं होती।" मीरा ने अपना फटा बैग खोला और उसमें से एक काग़ज़ निकाला, जिस पर उसने अपने हाथ से कुछ लिखा था। "जब मैंने नंबर मिलाया, तो उस तरफ़ से आवाज़ आई — ये नंबर अब किसी के नाम पर नहीं है।"
मैंने हबीब चाचा की तरफ़ देखा। वो मेरी तरफ़ देख रहे थे, और उनके चेहरे पर वो भाव था जो इंसान के चेहरे पर तब आता है जब पता चले कि दुश्मन सिर्फ़ लड़ाई नहीं कर रहा, वो तैयारी भी कर रहा है।
"एक दिन में नंबर कैसे बंद हो जाता है?" चाचा ने पूछा।
मीरा ने धीरे से कहा, "जब कोई उसे जान-बूझकर बंद करवा दे, तो हो जाता है।"
"और साइट का चौकीदार," मैंने कहा। "उसने कुछ बताया?"
मीरा ने सिर हिलाया। "मैं सुबह छह बजे वहाँ गई थी। चौकीदार ने कहा कि इमरान सुबह ही आया था। अपना पीला हेलमेट उठाया, और पीछे के फाटक की तरफ़ चला गया। चौकीदार ने कहा — और उसके पीछे-पीछे एक आदमी भी गया। जिसके पैरों में लकड़ी के जूते थे।"
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी गरम थी, पर हल्की।
"लकड़ी के जूते," मैंने कहा। "वही जूते जिनके निशान अस्पताल की पीछे वाली दीवार से फाटक तक बने थे।"
"हाँ," मीरा ने कहा।
"मतलब वो इमरान को कहीं ले नहीं रहा था," मैंने कहा। "वो उसे कहीं भेज रहा था। जान-बूझकर। जैसे कोई चिट्ठी भेजता है।"
हबीब चाचा ने मेरी तरफ़ देखा। "मतलब?"
"मतलब, चाचा, आपका बेटा उनके लिए कोई कैदी नहीं है।" मैंने कहा। "वो उनके लिए एक संदेश है। और संदेश का मतलब होता है कि वो मुझसे कुछ कहना चाहते हैं।"
तभी गली के मुँह से शोर आया।
मैंने देखा — पाँच जोड़ी चप्पलें, एक काला चश्मा, एक टूटा हुआ चश्मा, और एक सिर पर बँधा हुआ गुलाबी दुपट्टा। मेरी माँ का दुपट्टा। टिंकू।
वो दौड़ते हुए आए।
"भैया!" टिंकू ने कहा, और वो इतना हाँफ रहा था कि उसे पहले साँस लेने देनी पड़ी। सानिया उसके पीछे थी, गुड्डू सबसे पीछे, और चिंटू के हाथ में एक टूटी रिम थी, जिसे वो हर हाल में साथ लाता था।
"अरे, पहले साँस ले," मैंने कहा। "कहीं आग लगी है?"
"आग नहीं," टिंकू ने कहा। "पानी।"
"पानी?"
"अस्पताल के पीछे वाली पानी की टंकी। बंसीलाल चाचा वहाँ बैठे हैं।"
मैं उठ खड़ा हुआ।
"टंकी के पीछे," सानिया ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो गर्व था जो सिर्फ़ चौदह साल की उम्र में होता है। "मैंने उन्हें देखा। वो बोरी ओढ़कर बैठे थे और काँप रहे थे। फिर एक सफ़ेद गाड़ी गली के मुँह पर आई, तो वो उठकर टंकी के पीछे चले गए और फिर बाहर नहीं आए।"
मैंने हबीब चाचा की तरफ़ देखा।
"चाचा, आप यहीं बैठिए। टिंकू आपके साथ रहेगा।"
"नहीं," चाचा ने कहा, और वो उठ खड़े। "मैं साथ चलूँगा। मैं घर में बैठकर इंतज़ार नहीं करूँगा। मैंने तीस साल इंतज़ार में गँवा दिए।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनकी कमर झुकी थी, पर आँखें सीधी थीं।
"ठीक है," मैंने कहा। "पर चाचा, वहाँ जो भी हो, आप शांत रहिएगा। अगर वो डरा हुआ है, तो हमें भी डरा हुआ नहीं दिखना है।"
वो सिर हिलाकर मान गए।
अस्पताल के पीछे वाली पानी की टंकी — मैंने उसे देखा था। बड़ी, काली, लोहे के चार पायों पर टिकी। उसके नीचे सूखी घास उग आई थी, और उस घास में शीशे के टुकड़े और पुरानी पत्तियाँ पड़ी थीं। टंकी से पानी नहीं टपकता था। बरसों से नहीं टपकता था। यही उसकी सबसे अजीब बात थी। टंकी हो और आवाज़ न करे।
जब हम वहाँ पहुँचे, तो धूप सिर पर आ गई थी।
और टंकी के पीछे, ज़मीन पर, बंसीलाल बैठे थे।
उम्र के हिसाब से वो इस तरह नहीं बैठते। वो अपने घुटनों को सीने से लगाकर बैठे थे, बोरी सिर पर ओढ़े हुए, और उनके हाथ ज़मीन पर रखे थे, जैसे वो गिरकर उठे हों और फिर उठने का हौसला न हुआ हो।
"चाचा," मैंने कहा।
वो चौंके। पूरी देह से चौंके, जैसे किसी ने उन पर पानी डाल दिया हो।
"मैं — मैं कुछ नहीं बोलूँगा," वो तुरंत बोले। "मैं कुछ नहीं बोलूँगा। मैंने कुछ देखा नहीं। मैं रात से यहीं हूँ।"
"चाचा, मैं आपसे कुछ पूछने नहीं आया," मैंने कहा, और मैं उनके सामने वैसे ही बैठ गया जैसे सुबह हबीब चाचा के सामने बैठा था। नीचे। घुटनों के पास। "मैं आपका सीटी लौटाने आया हूँ।"
मैंने जेब से वो पीतल की सीटी निकाली, कपड़े खोला और उनकी तरफ़ बढ़ा दी।
बंसीलाल ने उसे देखा, और उनका चेहरा बदल गया।
"ये मेरी है," उन्होंने कहा। और फिर बहुत धीरे से, जैसे खुद को ही सुन रहे हों, "पर कल रात ये बजी नहीं थी।"
"मतलब?"
उन्होंने सीटी अपने दोनों हाथों में ली। उनकी उँगलियाँ उस पीतल को सहला रही थीं, जैसे कोई पुराना ज़ख़्म सहलाता है।
"तीस साल से ये सीटी मेरे पास है," उन्होंने कहा। "मैं रात दो बजे गश्त लगाता हूँ। जब भी कोई चोर दिखता है या कोई आवाज़ आती है, मैं इसे फूँकता हूँ। पर ये खुद कभी नहीं बजी। एक बार भी नहीं।"
वो मेरी तरफ़ देखने लगे, और उनकी आँखों में वो डर था जो उम्र से नहीं आता, जो सिर्फ़ समझने से आता है।
"कल रात ये तुम्हारे हाथ में बजी। और जो आवाज़ इससे निकली, वो मेरी नहीं थी।"
मेरा गला सूख गया।
"तो वो किसकी थी, चाचा?"
वो चुप रहे। उन्होंने टंकी के पीछे देखा, फिर अस्पताल की दीवार की तरफ़, फिर अपने हाथों की तरफ़।
"बेटा," उन्होंने कहा। "मैं बोलूँगा तो मेरी नौकरी जाएगी।"
"नौकरी जाए तो जाए," हबीब चाचा बोले। वो मेरे पीछे खड़े थे, और उनकी आवाज़ में वो कड़क थी जो मैंने उनमें आज तक नहीं सुनी थी। "जान जाए तो?"
बंसीलाल ने उनकी तरफ़ देखा।
"तुम कौन हो?"
"मैं वो हूँ जिसका बेटा कल रात से घर नहीं आया," हबीब चाचा ने कहा। "और मैं तीस साल से अपने आँगन में यही सोच रहा हूँ कि मैं किसी की मदद क्यों नहीं करता। आज सुबह मुझे जवाब मिल गया। क्योंकि जब तक इंसान खुद डरता है, वो किसी और को हिम्मत नहीं दे सकता।"
बंसीलाल ने अपनी बोरी खींचकर और ऊपर कर ली, जैसे ठंड लग रही हो।
"मेरी बेटी की शादी अगले महीने है," उन्होंने कहा। "मेरे पास दो हज़ार रुपये हैं। बस। तीस साल की नौकरी, दो हज़ार। अगर मैं आज बोलूँगा, तो कल किसी और को इस गेट पर खड़ा मिलेगा। और वो मुझसे बदला लेगा, क्योंकि मैं इकलौता हूँ जिसने देखा है।"
"क्या देखा है, चाचा?" मैंने पूछा।
वो चुप रहे।
मैंने उनके सामने वैसे ही बैठे-बैठे कहा, धीरे से, बिना ज़ोर दिए —
"चाचा, मैं आपको कुछ नहीं कहूँगा। न हुक्का, न दुआ, न कोई बड़ी बात। मैं सिर्फ़ इतना कहूँगा कि डर कोई जवाब नहीं होता। डर एक सवाल होता है।"
उन्होंने सिर उठाया।
"सवाल?"
"हाँ, चाचा। जवाब का मतलब होता है — बात खत्म। अब आगे बढ़ो। पर डर खत्म नहीं होता। डर बार-बार पूछता है। रात को पूछता है, सुबह पूछता है, चाय पीते वक़्त पूछता है। और अगर आप उसका जवाब नहीं देंगे, तो वो ज़िंदगी भर पूछता रहेगा।"
मैंने उनके हाथ में पड़ी सीटी की तरफ़ देखा।
"मैं आपसे सभा में खड़े होने को नहीं कह रहा। मैं आपसे काग़ज़ पर अंगूठा लगाने को नहीं कह रहा। मैं सिर्फ़ इतना पूछ रहा हूँ — इमरान कहाँ है?"
बंसीलाल ने आँखें बंद कर लीं।
बहुत देर तक बंद रखीं। इतनी देर कि मुझे लगा वो सो गए हैं, या हमसे बचने के लिए कोई बहाना सोच रहे हैं। पीछे टिंकू खड़ा मेरी तरफ़ देख रहा था, और उसकी आँखों में सवाल था — भैया, ये बोलेगा या नहीं?
फिर बंसीलाल ने आँखें खोलीं।
"साहब," उन्होंने कहा। और आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुझे आगे झुकना पड़ा।
"साहब?" मैंने दोहराया।
"रणवीर भारद्वाज," उन्होंने कहा, और ये नाम उनके मुँह से ऐसे निकला जैसे कोई भारी बोरी उतार रहा हो। "वो कई रातों से नीचे वाले कमरे में जाता है।"
मैंने साँस रोक ली।
"अकेला?"
"अकेला," बंसीलाल ने कहा। "और बत्ती नहीं जलाता। वो सीढ़ी उतरता है और मैं ऊपर सुनता रह जाता हूँ। कभी-कभी वो चार-पाँच मिनट में लौट आता है। कभी-कभी घंटे भर। और जब लौटता है, तो उसके जूते पर धूल होती है, और उसके हाथ ठंडे होते हैं। मैंने एक बार उसके हाथ की तरफ़ देखा था, और उसने मेरी तरफ़ ऐसे देखा कि मुझे लगा मेरी नौकरी आज रात खत्म।"
"कल रात?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ भारी हो रही थी।
बंसीलाल ने मेरी तरफ़ देखा।
"कल रात मैंने इमरान को उसी सीढ़ी पर खड़ा देखा।"
टंकी के नीचे से हवा का एक झोंका आया और बोरी का कोना हिल गया।
"तीसरी सीढ़ी पर," बंसीलाल ने कहा। "वो खड़ा था, और वो हँस रहा था।"
मेरे पीछे हबीब चाचा की साँस टूटी। मैंने उनकी तरफ़ मुड़कर देखा — उनका हाथ मुँह पर था।
"हँस रहा था?" चाचा ने कहा। उनकी आवाज़ काँप रही थी। "इमरान? मेरा इमरान?"
"हाँ, चाचा," बंसीलाल ने कहा। "हँस रहा था। जैसे कोई बच्चा हँसता है जब उसे कोई ऊँची जगह पर बिठा दे।"
मुझे कुछ ठंडा सा महसूस हुआ। मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी अब गरम भी नहीं थी, ठंडी भी नहीं थी। वो बस बैठी थी, जैसे कोई सुन रहा हो।
"और उसके पीछे?" मैंने पूछा।
बंसीलाल ने गला साफ़ किया।
"उसके पीछे एक आदमी खड़ा था," उन्होंने कहा। "जिसके पैरों में लकड़ी के जूते थे।"
उन्होंने सीटी को अपनी जेब में रख लिया और अपनी झुर्रियों वाली गर्दन ऊपर की।
"अब मैं बोल दिया," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो खालीपन था जो इंसान के अंदर से डर निकलने के बाद बचता है। "अब जो होगा, देख लेंगे।"
मैं उठा।
और उस वक़्त मेरी जेब से घंटी ने बिना बजे कहा —
"सवाल बदल गया है।"
मैंने धीरे से कहा, "क्या मतलब?"
घंटी ने कहा —
"अब इमरान को मत ढूँढ।"
"तो किसको?"
घंटी एक पल चुप रही।
फिर बोली, इतने धीमे स्वर में कि टंकी के नीचे की हवा भी उससे तेज़ लगी —
"उस आदमी को ढूँढ जो उसके पीछे खड़ा था। क्योंकि इमरान तेरे पास लौट आएगा। पर वो आदमी इमरान के साथ लौटेगा।"
॥
मैं कुछ देर वहीं खड़ा रह गया। पानी की टंकी के नीचे की हवा धीमी थी, और बंसीलाल की पुरानी बोरी का कोना एक-एक करके हिल रहा था, जैसे कोई उसे अंदर से खींच रहा हो। मेरे हाथ में लोहे की काली चाबी थी — वही जो सुबह उन्होंने मुझे दी थी — और अब उसका वज़न कुछ और बढ़ गया लगा।
घंटी जेब में बैठी थी। न बज रही थी, न गरम थी। बस बैठी थी, जैसे कोई बूढ़ा आदमी चबूतरी पर बैठकर सामने की गली देख रहा हो और सोच रहा हो कि क्या बोलूँ, कितना बोलूँ।
बंसीलाल ने पहले दाएँ देखा, फिर बाएँ। फिर फाटक की तरफ़ देखा, जहाँ से हम आए थे। फिर ऊपर फाटक के पीछे की दीवार की तरफ़, जहाँ से रात में किसी का साया दिख सकता था।
"यहाँ कोई नहीं है, बंसीलाल भाई," मैंने धीरे से कहा। "टिंकू फाटक पर खड़ा है। मीरा पीछे है। हबीब चाचा आपके सामने हैं। बस हम हैं।"
बंसीलाल ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें लाल थीं, और अब उनमें वो तेज़ी नहीं थी जो सुबह थी — चाबी देते वक़्त जो तेज़ी आई थी। अब बस थकान थी। बूढ़ी, घिसी हुई थकान।
"तुम जानते हो," उन्होंने कहा, "मेरी बेटी की शादी अगले महीने है?"
मैंने सिर हिलाया। बोला नहीं।
"दो हज़ार रुपये की बात है," उन्होंने कहा। "बस दो हज़ार। मेरे पास नहीं हैं। तीस साल यहाँ चौकीदारी की, और शादी पर दो हज़ार नहीं हैं।" वो हँसे — एक छोटी, खोखली हँसी, जो गले से ज़्यादा आगे नहीं गई। "और ये साहब, ये रणवीर भारद्वाज, इनके पास इतना पैसा है कि इनके जूते की धूल खरीद लूँ। मगर यहाँ एक बात कहने के लिए — बस एक छोटी बात — मुझे तीस साल लग गए।"
वो टंकी की छाया में, बोरी पर सरका और बैठ गए। मैं भी पास में चबूतरी के कोने पर बैठ गया। हबीब चाचा दो कदम पीछे खड़े रहे — न बैठे, न बोले। उनका हाथ अपनी लाठी पर था, और उनकी आँखें बंसीलाल पर।
"अब सुनो," बंसीलाल ने कहा। "और सुनते वक़्त मेरी तरफ़ मत देखना। सामने देखना। मेरी आवाज़ में कुछ निकलता हो तो तुम उसे देख मत लेना।"
मैंने नज़र फाटक की तरफ़ कर दी।
"रात," बंसीलाल ने कहा। "वो कई रातों से नीचे जाता है। हर बार वो सीने से एक पीली फाइल चिपकाए होता है — मोटी, किनारे से फटी हुई। और जब नीचे उतरता है, तो सीढ़ी पर उसके क़दम की आवाज़ ऐसी आती है जैसे कोई बोझ उठाए जा रहा हो। फिर नीचे अंधेरा हो जाता है। बिलकुल। मैं ऊपर सुनता रह जाता हूँ कि कब कुछ आवाज़ आए।"
"कुछ आती है?" मैंने पूछा।
बंसीलाल ने गला साफ़ किया।
"कभी काग़ज़ पलटने की आवाज़," उन्होंने कहा। "कभी बक्सा खुलने की। और कभी… कभी ऐसी आवाज़ जैसे किसी की लंबी साँस छूट रही हो। एक बार मैंने सुना कि वो नीचे किसी से बोल रहा है। पर उस कमरे में उसके सिवा कोई नहीं होता। मैंने भगवान की कसम खाई है, उस कमरे में उसके सिवा कोई नहीं होता।"
मेरे पीछे हबीब चाचा ने अपनी लाठी ज़मीन पर थोड़ी सी टिकाई, और वो टिक-टिक की आवाज़ उस रात की चुप्पी में बहुत तेज़ लगी।
"और जब ऊपर आता है?" मैंने पूछा।
"जब ऊपर आता है," बंसीलाल ने कहा, और उनकी आवाज़ धीमी हो गई, "तो उसके कपड़ों से जले काग़ज़ की गंध आती है।"
मैंने अपनी घुटने पर रखा हाथ कस लिया।
"जले काग़ज़ की?"
"हाँ," बंसीलाल ने कहा। "मैं जानता हूँ वो गंध। हमारे यहाँ गाँव में… पुराने ज़माने में काग़ज़ कोयले के चूल्हे पर सुखाते थे। वो गंध कभी नहीं भूलती। एक बार मैं उसके जूतों पर भी देखा था — काली राख की पतली लकीरें थीं, जैसे किसी ने जूते से राख कुचल दी हो।"
मैंने धीरे से साँस ली। घंटी जेब में सरकी, बस सरकी — बजी नहीं।
"फाइल में क्या होता है?" मैंने पूछा।
बंसीलाल ने सिर हिलाया — दुखी ढंग से, जैसे अफ़सोस हो कि ये सवाल जवाब नहीं जानता।
"कभी देखा नहीं," उन्होंने कहा। "एक बार बस दूर से झलक मिली थी। पीले काग़ज़, कुछ लाल स्याही, और… और ऊपर जो पहला काग़ज़ था, उस पर कुछ लिखा था, पर पढ़ नहीं सका। पर जब वो उसे लेकर जाता है, तो वो पीली फाइल जैसी नहीं लगती। वो जैसे लाल लगती है। मुझे नहीं पता कैसे, पर उस फाइल को देखकर लगता है कि उसका रंग बदल गया है। जैसे उसने ख़ून लिया हो।"
फाटक पर टिंकू खड़ा था, और मैंने उसकी तरफ़ देखा — वो बिलकुल ठंडा नहीं लग रहा था। बच्चा है, अभी तेरह साल का, उसके हाथ से टॉर्च फिसलने को थी।
मैंने नज़र फिर बंसीलाल पर की।
"और चाबी?" मैंने कहा। "मैंने सुबह वो चाबी ली है। वो क्या है?"
बंसीलाल ने अपनी जेब में हाथ डाला। धीरे से, ऐसे जैसे कोई जानवर को काबू में ले रहा हो। फिर उन्होंने एक और काली चाबी निकाली — लोहे की, छोटी, घिसे हुए दाँते, और छल्ले पर लाल धागा।
"ये," उन्होंने कहा, और चाबी उनकी हथेली पर रख दी, "ये असली वाले कमरे की चाबी नहीं है। ये उस कमरे की बगल में, दीवार के अंदर छिपाई गई एक लकड़ी की अलमारी की है। बत्तीस साल पहले जब ये कमरा सील हुआ था, तब एक बूढ़ा चौकीदार यहाँ था — बिस्मिल्लाह खान, अल्लाह उसे जन्नत दे। उसने ये मुझे दी थी और कहा था — ये वो कमरा नहीं खोलेगी, ये उस काग़ज़ की तरफ़ ले जाएगी जो उस कमरे से पहले है।"
मैंने हाथ बढ़ाया, और उन्होंने चाबी रख दी।
जैसे ही मेरी उँगलियों पर चाबी आई, जेब में घंटी एक बार हल्की सी काँपी।
"कौन सा काग़ज़?" मैंने कहा।
"मुझे नहीं पता," बंसीलाल ने कहा। "बिस्मिल्लाह ने बस यही कहा था — जब वक़्त आए, इस अलमारी में वो काग़ज़ मिलेगा जो सबको साफ़ कर देगा। और सबका मतलब उसने बाद में समझाया था — मेरा, तुम्हारा, ऊपर वाले साहब का, और उस आदमी का भी जो अब दिन में सीढ़ी पर नहीं दिखता।"
उन्होंने एक पल रुककर मेरी तरफ़ देखा। फिर आवाज़ बिलकुल नीची करके बोले —
"पर एक शर्त है।"
मैंने सिर हिलाया।
"रात बारह बजे के बाद," उन्होंने कहा, "वो कमरा कभी मत खोलना। बस वो शर्त। रात बारह के बाद वो कमरा मत खोलना, अंकुश।"
"क्यों?"
बंसीलाल ने कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने बस टंकी के ऊपर देखा, जहाँ एक तार से बँधी बत्ती झूल रही थी, बंद। फिर उनकी आवाज़ और धीमी हो गई।
"क्योंकि रात बारह के बाद वो कमरा सिर्फ़ कमरा नहीं रहता," उन्होंने कहा।
चुप्पी।
पूरी चुप्पी, ऐसी कि पीछे मीरा के कैमरे की लाल बत्ती भी पल भर के लिए बुझी-सी लगी।
फिर बंसीलाल ने गला साफ़ किया, और मुझे लगा कि वो अब उठेंगे और चले जाएँगे। पर नहीं। वो बैठे रहे। और उन्होंने एक और बात कही, जिसके लिए मैं तैयार नहीं था।
"तुम्हारे पापा को जानता हूँ," उन्होंने कहा।
मैं एक पल सुनता रह गया।
"शंकर यादव। पाँच साल पहले, एक रात, मैंने उन्हें भी उसी सीढ़ी पर देखा था।"
मेरे अंदर कुछ होने लगा। कुछ अनजाना। कुछ ऐसा, जिसकी मुझे उम्मीद नहीं थी।
"उस रात वो रो रहे थे," बंसीलाल ने कहा, और उनकी आवाज़ में कोई तरस नहीं थी, बस एक सीधी सी बात थी। "मैं ऊपर खड़ा था। वो नीचे से ऊपर आए। उनका हाथ जला हुआ था।"
मैंने कुछ नहीं कहा। नहीं कह सका।
"दाहिना हाथ," बंसीलाल ने कहा। "और जब मैंने पूछा कि क्या हुआ, तो उन्होंने कहा — कुछ नहीं। बस काग़ज़ छू गया।"
जले काग़ज़ की गंध। वो बात जो बंसीलाल ने अभी ऊपर कही — रणवीर के कपड़ों से जले काग़ज़ की गंध आती है।
और पापा का दाहिना हाथ।
मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं। और मुझे वो सफ़ेद निशान याद आ गया जो पापा के हाथ पर है — दाहिने हाथ के पीछे, कलाई के नीचे, एक छोटा-सा सफ़ेद निशान। मैंने बचपन में कई बार पूछा था कि ये क्या है। और पापा हर बार कहते थे — लोहे से छू गया था।
लोहे से छू गया था।
अब मुझे कुछ और समझ आने लगा। धीरे-धीरे। जैसे अंधेरे कमरे में एक-एक करके बत्तियाँ जल रही हों।
"बंसीलाल भाई," मैंने धीरे से कहा, "उस रात वो किस चीज़ को छूने गए थे?"
बंसीलाल ने मेरी तरफ़ देखा। और पहली बार उस रात उनकी आँखों में मुझे कुछ और दिखा — सिर्फ़ डर नहीं, कुछ और भी था। कुछ जैसे अपराधबोध।
"मैंने कभी नहीं पूछा," उन्होंने कहा। "क्योंकि वो रात जब मैंने उनसे पूछने की हिम्मत की, तो वो ऐसे हँसे जैसे उनका दिल टूट गया हो। फिर वो ऊपर छत के रास्ते बाहर चले गए। और अगले दिन से… अगले दिन से वो सीढ़ी की तरफ़ नहीं आए।"
मैंने कुछ देर फाटक की तरफ़ देखा। टिंकू अब भी खड़ा था। उसकी टॉर्च की रोशनी ज़मीन पर पड़ रही थी और उसमें धूल के कण नृत्य कर रहे थे, जैसे किसी पुरानी फिल्म का दृश्य हो।
हबीब चाचा ने अपनी लाठी और ज़ोर से टिकाई।
"बस," उन्होंने कहा। "बंसीलाल भाई, अब देर नहीं करनी चाहिए। हमें कुछ करना है। मेरा इमरान… मेरा इमरान कहीं इसी सीढ़ी पर है।"
बंसीलाल ने चाचा की तरफ़ देखा। फिर धीरे से बोले — "मैं जानता हूँ, चाचा। और यही अफ़सोस है।"
तभी जेब में घंटी ने कहा। बहुत धीमे। इतने धीमे कि मुझे लगा मैंने ख़ुद सोचा है।
"दिन में जाओ।"
मैंने सिर हिलाया। और धीरे से बोला, "क्या?"
घंटी ने फिर कहा, उतने ही धीमे स्वर में —
"दिन में जाओ, अंकुश। रात में नहीं।"
मैंने आँखें मूँद लीं।
"क्यों?"
घंटी एक पल चुप रही। फिर बोली —
"क्योंकि जो रात में उस सीढ़ी पर उतरा, वो ऊपर वापस वो नहीं होता जो वो था।"
मेरे अंदर कुछ ठंडा सा फैल गया। और मैंने उस ठंडे को अपने अंदर बैठने दिया, क्योंकि उसे डर कहते हैं, और डर घंटी की आवाज़ में आज पहली बार साफ़ था।
मैंने बंसीलाल की तरफ़ देखा — वो उठने की तैयारी कर रहे थे। अपनी बोरी समेट रहे थे। और उसी वक़्त मुझे पीछे अंधेरे में कुछ हिलता दिखा।
एक काला धुआँ। जैसे कोई बहुत पुराना धुआँ, जो कई साल किसी दबे हुए काग़ज़ के अंदर बंद था, और अब बाहर निकलने की कोशिश कर रहा हो। वो बंसीलाल के पीछे, पानी की टंकी की दाईं तरफ़, अंधेरे और फाटक के बीच से सरकता हुआ आगे आ रहा था। तंग, ऊँचा, धीमा। जैसे कोई पुराना धुआँ सीधी लकीर में ऊपर उठता है।
बंसीलाल ने वो देखा।
उनका शरीर एक पल में बदल गया। वो बोरी पर बैठे थे, और अब उठने लगे — पर उठे नहीं। बस अपनी जेब पर अपनी काँपती उँगलियाँ रख दीं और उसे कसकर पकड़ लिया। मुझे लगा वो चाबी वाली जेब नहीं पकड़ रहे — वो अपनी ज़िंदगी वाली जेब पकड़ रहे हैं।
"बंसीलाल भाई," मैंने धीरे से कहा। "क्या हुआ?"
वो बोले नहीं।
पर उनके होंठ हिल रहे थे, और उनकी आँखें अंधेरे में उस काले धुएँ पर टिकी थीं, जो अब टंकी की छाया के किनारे पर पहुँच गया था और रुक गया था — जैसे कोई शिकार को देख रहा हो।
मीरा पीछे से आई और मेरे कंधे पर हाथ रख दिया।
"अंकुश," उसने धीरे से कहा, "मुझे वो धुआँ बंद कमरे के दरवाज़े के नीचे से आता दिखा था। जब हम उतरे थे। मुझे लगा आँख का धोखा है।"
मैंने हाथ उठाया। बोला नहीं। बस इशारा किया कि चुप रहे।
काला धुआँ टंकी की छाया के किनारे पर रुक गया, और धीरे-धीरे अपने आप अंदर की तरफ़ सिकुड़ गया — जैसे कोई साँप दरार में लौट रहा हो। और फिर वो गया। बिलकुल गया। जैसे हो ही नहीं था।
मैं साँस लेने लगा।
बंसीलाल ने अपनी आँखें बंद कर लीं और फिर खोल दीं।
"अब तुमने भी देख लिया," उन्होंने कहा। "इसलिए दिन में जाओ। दिन में ये नहीं आता। ये सिर्फ़ रात में आता है।"
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
"मैं नहीं जानता," बंसीलाल ने कहा। "मैं बस इतना जानता हूँ कि ये उसी कमरे से आता है जिसकी मैं तुम्हें चाबी नहीं दे रहा। और ये तब आता है जब कोई उस कमरे के दरवाज़े के करीब आता है।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखें अब सीधी थीं, बिना झिझक।
"दो बातें याद रखो, अंकुश," उन्होंने कहा। "पहली — दिन में जाओ, जब धूप सीधी छत से टंकी तक आए। दूसरी… और ये सबसे ज़रूरी है…"
वो रुके। उन्होंने गला साफ़ किया। उनकी उँगलियाँ जेब पर और कस गईं।
"दूसरी — रात बारह बजे के बाद अगर वो कमरा खुला रह गया, अगर किसी वजह से वो दरवाज़ा खुला रह गया, तो जो अंदर है, वो बाहर आ जाएगा।"
मैंने कुछ कहने के लिए मुँह खोला, पर वो मुझे बोलने नहीं दिए। उन्होंने अपना हाथ उठाया और मेरे सीने के सामने रोक दिया।
"और," उन्होंने कहा, और अब उनकी आवाज़ में वो थकान गायब थी, सिर्फ़ एक पतला, ठंडा डर बचा था, "और जब वो बाहर आएगा, तो अकेला नहीं आएगा। वो अपने साथ किसी का नाम भी लेकर आएगा।"
आस-पास की हवा रुक गई।
"किसका नाम?" मैंने पूछा।
बंसीलाल ने मेरी तरफ़ देखा।
"जो उस कमरे से सबसे ज़्यादा जुड़ा हो," उन्होंने कहा। "जो सबसे पहले उस कमरे में गया हो। जो सबसे पहले उससे मिला हो।"
और वो खड़े हो गए।
मैं भी खड़ा हो गया। पीछे हबीब चाचा ने अपनी लाठी सीधी की। मीरा ने अपना कैमरा बंद कर दिया, और उसकी लाल बत्ती जो बुझी, तो अंधेरा और गहरा लगा।
"बंसीलाल भाई," मैंने कहा, "आपका नाम?"
बंसीलाल ने पहले मेरी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने कुछ ऐसा किया जो मुझे उम्मीद नहीं थी — वो हँसे। एक अजीब सी हँसी, जिसमें डर था, पर साथ में एक अजीब सी बेफ़िक्री भी थी।
"बंसीलाल," उन्होंने कहा। "बंसीलाल प्रसाद। बत्तीस साल का चौकीदार। बेटी की शादी अगले महीने। दो हज़ार रुपये की ज़रूरत। और अब…" उन्होंने अपनी जेब को एक बार और टटोला, "…अब देखते हैं, इस नाम के साथ क्या होता है।"
वो फाटक की तरफ़ बढ़े, फिर रुके, और मुड़कर बोले — "अंकुश, सुनो।"
"हाँ?"
"तुम्हारे पापा ने उस रात मुझसे एक बात कही थी। मैंने अब तक किसी को नहीं बताया।"
मैंने साँस रोक ली।
"क्या बात?"
बंसीलाल ने एक गहरी साँस ली।
"उन्होंने कहा था — बंसीलाल भाई, अगर मेरा बेटा कभी इस सीढ़ी पर आए, उसे ऊपर न रोकना। उसे नीचे जाने देना। मगर उससे पहले… उससे पहले उसे अपने दादा का नाम याद दिला देना।"
मेरे अंदर कुछ टूटा। फिर जुड़ा। फिर फिर टूटा।
दादा का नाम। जगदीश यादव। जो मुझे पीतल की पट्टी पर मिला था, अस्पताल के पिछले प्लॉट के गड्ढे में, उस पीली पट्टी पर जिसे बत्तीस साल किसी ने नहीं छुआ था। और जिस पट्टी में मेरे गले की चाबी तीन चौथाई तक फिट हो गई थी।
घंटी जेब में बजी। बहुत धीमे। इतने धीमे कि जैसे कोई मेरे कान के बहुत पास फुसफुसा रहा हो।
"अब जाना है," उसने कहा। "दिन में। धूप में। सीढ़ी पर, धूप के साथ।"
मैंने सिर हिलाया।
"कल?" मैंने पूछा।
घंटी ने कहा — "कल नहीं। आज। आज दोपहर। जब धूप टंकी के ऊपर आए।"
मैंने फाटक की तरफ़ देखा। टिंकू अब भी खड़ा था। मीरा अब भी मेरे पीछे थी। हबीब चाचा अब भी सामने।
और उस वक़्त मुझे महसूस हुआ कि ये एपिसोड कुछ और नहीं — ये सिर्फ़ एक बात का एपिसोड भी नहीं है। ये उस सीढ़ी की तरफ़ उतरने से पहले वाला आख़िरी सुकून है। जो अब खत्म हो रहा है।
मैंने बंसीलाल की तरफ़ देखा।
"आप आज दोपहर साथ चलोगे?"
बंसीलाल ने एक पल सोचा। फिर उन्होंने सिर हिलाया। "बस फाटक तक," उन्होंने कहा। "उससे आगे नहीं। मेरी हिम्मत वहीं तक है।"
"बहुत है," मैंने कहा।
उस रात जब मैं लौटा, तो टंकी के नीचे की ज़मीन पर बंसीलाल की बोरी का एक कोना बचा रह गया था — रात की हवा में हिलता हुआ, जैसे अभी भी कोई उसे बाँधकर रखे हुए हो।
मैं घर पहुँचा, तो छत पर पापा बैठे थे। बिना किसी काम के। सिर्फ़ बैठे हुए। उनके हाथ में पुरानी रिंच थी, और वो उसे घुमा नहीं रहे थे — बस पकड़े हुए थे।
मैं उनके पास बैठ गया। कुछ देर कुछ नहीं बोला।
फिर मैंने कहा, "पापा, आपका वो दाहिने हाथ का निशान… वो उस सीढ़ी पर आया था, न?"
पापा ने रिंच पर अपनी पकड़ कस ली।
और बिना मेरी तरफ़ देखे, उन्होंने एक ही वाक्य कहा — "कल दोपहर, बारह बजे के बाद चलना। धूप में। अंधेरे में नहीं।"
और मैंने कुछ नहीं पूछा। क्योंकि अब मुझे समझ आ गया था कि पापा उस सीढ़ी के बारे में सब कुछ जानते हैं। सब कुछ।
बस बोलना नहीं चाहते।
॥
दोपहर के ठीक बारह बजे, धूप टंकी की छत पर चढ़ गई थी।
मैंने देखा — पहले टंकी का किनारा चमका, फिर पूरा लोहा गरम लोहे जैसा दिखने लगा। और उसी वक़्त घंटी ने जेब में एक छोटी सी हरकत की। बजी नहीं। बस हिली। जैसे कोई कहे — अब।
बंसीलाल भाई फाटक से लगभग पंद्रह कदम दूर खड़े थे। उन्होंने अपनी बोरी साफ़ की, चारपाई की तरफ़ देखा, फिर हमारी तरफ़। उनके हाथ में वही पीतल की सीटी थी जो सीढ़ी पर मिली थी, और जिसे उन्होंने अब तक जेब में नहीं रखा था — नीचे की तरफ़ पकड़े हुए थे, जैसे पकड़ने में ही उससे दूरी बनी रहे।
मीरा ने अपना कैमरा उठाया। फिर नीचे किया। फिर दोबारा उठाया।
"चलेगा?" मैंने पूछा।
"बैटरी एक आख़िरी बार लगी है," उसने कहा, "और वो भी उधार की। तीन मिनट से ज़्यादा नहीं चलेगी।"
"तीन मिनट काफ़ी हैं," मैंने कहा। "बस तीन मिनट में मुझे कोई लात नहीं मिल जाए, बाक़ी देख लेंगे।"
मीरा हँसी। पर उसकी हँसी में वो आवाज़ थी जो हँसते वक़्त भी अंदर गिनती करती रहती है।
टिंकू ने अपना काला एक काँच वाला चश्मा ठीक किया। कल का दुपट्टा अब भी उसके गले में लिपटा था, और उस पर धूल की एक सीधी लकीर बन गई थी, जैसे उसने दुपट्टे से ज़मीन साफ़ की हो।
"उस्ताद," उसने कहा, "चाबी दोनों हैं ना?"
"हैं," मैंने कहा। "एक बंद कमरे की, एक उस दीवार के पीछे वाली अलमारी की।"
"और तीसरी?"
"तीसरी क्या?"
"मतलब… स्कूल के छत वाले ताले की तीसरी।" टिंकू ने अपना मोज़ा टटोला। "वो तो मेरे पास है। सोचा, तीन चाबियाँ साथ रहें तो किस्मत भी साथ चलेगी।"
बंसीलाल ने उसे घूरकर देखा।
"बेटा," उन्होंने कहा, "किस्मत चाबी से नहीं चलती। नाम से चलती है।"
टिंकू ने चश्मे के ऊपर से उन्हें देखा। "कौन सा नाम, बंसीलाल काका? पूरा वाला या छोटा वाला?"
"पूरा," बंसीलाल ने कहा, और उनकी आवाज़ सूख गई। "पूरा नाम बोलकर जाना। तीनों। ज़ोर से।"
यही वो बात थी जो वो इस पूरे आधे घंटे में चौथी बार कह रहे थे।
कभी वो कहते — "नाम बोलकर जाना।" कभी कहते — "सीढ़ी पर पैर रखने से पहले।" कभी कहते — "अंदर जाकर जो पूछे, उसे अपना पूरा नाम बताना, आधा नहीं।" और एक बार, बहुत धीमे उन्होंने कहा था — "मैं तीन साल से सो नहीं पाया, बेटा। तुम्हें नींद से जगाने के लिए नहीं भेज रहा, खुद के साथ जोड़ रहा हूँ।"
मीरा ने अपना पर्स टटोला और निकाला — एक नीली स्याही वाली पुरानी कलम।
"ये किसलिए?" टिंकू ने पूछा।
"जब भी कोई चीज़ मिले," मीरा ने कहा, "उसी वक़्त लिख लेंगे। नाम, तारीख़, कहाँ मिली। मुझे पाँच साल पहले यही सीख मिली थी — देर से लिखी बात आधी बात होती है।"
मैंने अपनी जेब से सफ़ेद चॉक का टुकड़ा निकाला।
"मैं सीढ़ियाँ गिनूँगा," मैंने कहा। "हर पाँचवीं पर चॉक का निशान। अगर रास्ता पलटे या दीवार बदल जाए, निशान बता देंगे।"
बंसीलाल ने एक लंबी साँस ली।
"सीढ़ियाँ अट्ठाईस हैं," उन्होंने कहा। "तुम्हारे पापा ने भी गिनी थीं। मुझे उस रात याद है — उन्होंने मेरे हाथ पर उँगली से गिनकर कहा था, बंसीलाल भाई, अट्ठाईस, सही।"
मेरे हाथ में चॉक थोड़ा काँपा।
"आपने मुझे यह पहले क्यों नहीं बताया?" मैंने पूछा।
"इसलिए," उन्होंने कहा, "क्योंकि तब तुम्हारा नाम पूरा बोलने लायक नहीं था। अब है।"
फाटक की तरफ़ से हम बढ़े।
रास्ता वही था जो कल रात मैंने घंटी की रोशनी में देखा था — दीवार के साथ सूखी नाली, टूटी बाउंड्री, और उसके बाद लोहे का पुराना फाटक, जिसकी कई पट्टियाँ अब भी किसी के धक्के से अंदर की तरफ़ मुड़ी हुई थीं। फाटक के बाएँ पाए के नीचे, उमस में चिपकी पड़ी, टेढ़ी काई लगी ईंट थी — जिसके नीचे आठवाँ पन्ना बताया जाता था, और जिसे अकेले खोदने से रजिस्ट्री का बूढ़ा मना कर गया था।
मैंने उस ईंट को देखा और आगे बढ़ गया। खुदाई अगले काम की चीज़ थी। पहले दरवाज़ा।
दरवाज़ा वहाँ था — लोहे का, काले रंग का, जिसका रंग ऊपर से उतर चुका था और नीचे से ज़ंग में बदल गया था। उसके बीच में एक पुराना कुंडा था। और उस कुंडे के नीचे, कल रात की धूल में, वही निशान — ज़ंग लगे नाखून जैसा, जैसे किसी ने उँगली से दबाकर धक्का दिया हो।
मैंने बंसीलाल की दी हुई काली चाबी जेब से निकाली। छल्ले पर लाल धागा बँधा था। चाबी पुरानी थी, दाँते घिसे हुए, और उसकी गर्दन पर एक जगह चमक बची थी — वह जगह जहाँ बत्तीस साल में किसी ने उसे बहुत बार घुमाया था।
"रुको," बंसीलाल ने कहा।
हम रुके।
"तीनों अपने पूरे नाम बोलो। ज़ोर से। जैसे गली में किसी को बुलाते हो।"
मीरा ने पहले कहा। उसकी आवाज़ में वो कड़कपन था जो खबर लिखते वक़्त आता है — "मीरा तिवारी।"
टिंकू ने दूसरे नंबर पर कहा, पर पहले वो सीना तानकर खड़ा हुआ, जैसे स्कूल में हाज़िरी लगा रहा हो — "टिंकू!"
"पूरा नाम," बंसीलाल ने कहा।
टिंकू का चेहरा एक पल के लिए उतरा। फिर उसने सीना और ताना और कहा — "टिंकू। बस टिंकू। बाक़ी लोग टिंकू ही बुलाते हैं, काका।"
बंसीलाल ने उसे देखा। मीरा ने उसे देखा। और मैंने देखा कि टिंकू की आँखों में कुछ ऐसा था जो वो इस वक़्त नहीं खोलना चाहता था — कि उसके नाम की दो कड़ियाँ कहीं और दबी पड़ी हैं, जो घर में पड़े किसी काग़ज़ पर लिखी हैं और जो अब किसी को याद नहीं।
"ठीक है," बंसीलाल ने कहा। "टिंकू ही सही। पर पूरे मुँह से बोला है, इसलिए गिना जाएगा।"
फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
मैंने साँस ली।
"अंकुश यादव," मैंने कहा। "जगदीश यादव का पोता। शंकर यादव का बेटा।"
बंसीलाल ने आँखें बंद कर लीं।
"अब खोलो," उन्होंने कहा।
चाबी कुंडे में गई। पहले वो अटकी। फिर दो मिलीमीटर आगे गई, फिर अटकी, फिर मैंने थोड़ा ज़ोर लगाया — और अंदर कुछ ऐसा टूटा कि पूरे ताले से एक लंबी, दुबली आवाज़ निकली, जैसे कोई बूढ़ा आदमी उठते वक़्त कराह रहा हो।
दरवाज़ा खुला।
और जो पहली चीज़ बाहर आई, वो रोशनी नहीं थी। गंध थी।
जले काग़ज़ की गंध।
एक ऐसी गंध जो पुरानी राख की होती है — न तेज़, न ताज़ी। बस दबी हुई। जैसे किसी ने बहुत पहले यहाँ कुछ जलाया था, फिर दरवाज़ा बंद कर दिया, और वो गंध चारदीवारी में बैठकर बत्तीस साल से इंतज़ार कर रही थी कि कोई दरवाज़ा खोले तो वो बाहर निकले।
मैंने पीछे मुड़कर बंसीलाल को देखा। वो फाटक से सटकर खड़े थे, दोनों हाथ पीतल की सीटी पर।
"मैं यहीं हूँ," उन्होंने कहा। "बस यहीं तक।"
"ठीक है," मैंने कहा।
फिर हम तीनों अंदर गए।
अंदर पहले तो कुछ नहीं दिखा। सिर्फ़ अंधेरा, और अंधेरे में धूल जो रोशनी की पतली लकीर में चल रही थी। मैंने काजल की टॉर्च जलाई। उसकी रोशनी बहुत तेज़ नहीं थी, पर इतनी थी कि सीढ़ियों का पहला हिस्सा दिख जाए।
सीढ़ियाँ लकड़ी की नहीं, पत्थर की थीं। और उन पर बत्तीस साल की धूल इतनी बैठी थी कि पहला क़दम रखते ही पैर फिसलने लगा।
"रुको," मीरा ने कहा। "मैं गिनती लिखती हूँ।"
"तुम गिनती लिखो," मैंने कहा, "मैं चॉक लगाता हूँ।"
टिंकू सबसे पीछे था। वो एक क़दम उतरा, फिर रुका, फिर बोला — "उस्ताद?"
"हाँ?"
"अगर नीचे कुछ ऐसा हो जो बोले, तो हम क्या करेंगे?"
"जवाब देंगे," मैंने कहा।
"और अगर वो हमारा नाम पूछे?"
"तो पूरा नाम बताएँगे," मैंने कहा। "और अगर वो अपना नाम बताए, तो लिख लेंगे। मीरा के पास कलम है।"
टिंकू ने कुछ सोचा। फिर उसने कहा — "उस्ताद, मुझे लगता है आप डर को भी हिसाब में लिखवा लेंगे।"
"लिखवा लेंगे," मैंने कहा। "डर भी एक काग़ज़ है। जिस दिन उसका हिसाब लग जाए, वो बेकार हो जाता है।"
हम उतरते गए।
हर पाँचवीं सीढ़ी पर मैं चॉक से दीवार पर एक छोटी लकीर खींचता। आवाज़ बहुत हल्की थी — जैसे कोई चूहा दीवार खुरच रहा हो। पर हर लकीर के साथ मुझे एक अजीब सा सुकून मिलता कि मैं वापस आ सकता हूँ।
चौथी सीढ़ी पर गंध और गहरी हो गई।
आठवीं पर ऐसा लगा कि नीचे कहीं कोई बैठा पानी उबाल रहा है — पर वो पानी नहीं थी। वो सीलन थी, जो पत्थर में बैठकर कभी-कभी फुसफुसाती है।
बारहवीं पर टिंकू ने कहा, "उस्ताद, मेरे पैर के नीचे कुछ चटका।"
"क्या?"
"लगता है काँच।"
मैंने टॉर्च नीचे की। हाँ। काँच का एक छोटा टुकड़ा, जो धूल में चमक रहा था। और उसके पास ही एक और, और उसके पास एक और।
"टॉर्च कराने से लगता है," मीरा ने कहा, "यहाँ कुछ गिरा था। तस्वीर का काँच?"
"या खिड़की का," मैंने कहा।
पर मुझे पता था। बंद कमरे में मैंने टूटे काँच वाली तस्वीर देखी थी — जिसमें जवान जगदीश यादव, जवान उस्ताद और जवान सलीम, तीनों काली साइकिल के साथ खड़े थे। ये काँच उसी तस्वीर के टूटने की आवाज़ नहीं थी। ये उस तस्वीर के टूटने के बाद की चुप्पी थी, जो बत्तीस साल में ज़मीन पर पड़ी रही।
सोलहवीं सीढ़ी पर हवा बदल गई। ऊपर की गरम, सूखी हवा चली गई और नीचे से एक ठंडी, भारी हवा आई, जिसमें धूल और राख दोनों थे।
बीसवीं पर मीरा ने कहा — "अंकुश।"
"हाँ?"
"मैंने पहले कभी इतनी पुरानी चुप्पी नहीं सुनी।"
"कैसी चुप्पी?"
"ऐसी," उसने कहा, "जैसे कोई बहुत ज़ोर से चिल्लाया हो और फिर बीच में रुक गया हो। इस कमरे की चुप्पी में चिल्लाहट का हिस्सा बचा है।"
मैं रुक गया। मीरा की बातें कभी-कभी बहुत सीधी होती थीं। इतनी सीधी कि आदमी को सँभलने का वक़्त नहीं मिलता।
"तो हम चिल्लाहट वापस पूरी करेंगे," मैंने कहा। "आधी नहीं छोड़ेंगे।"
चौबीसवीं सीढ़ी के बाद अंधेरा घना हुआ और फिर, बाईस सीढ़ियों के बाद, नीचे का फ़र्श दिखा।
अट्ठाईसवीं सीढ़ी पर मैंने पैर रखा, और मेरे जूते के नीचे कुछ ऐसा चरचराया जो सिर्फ़ काग़ज़ नहीं था। राख थी।
"रुको," मैंने कहा। "कोई जल्दी न करे।"
टॉर्च की रोशनी में मैंने ज़मीन देखी।
फ़र्श पर एक जगह गोल सी काली परत थी — जैसे किसी ने यहाँ काग़ज़ों का ढेर जलाया हो और फिर राख को पैर से बराबर कर दिया हो। राख के बीच काग़ज़ की सींकें अब भी बची थीं — पतली, काली, किसी की छोड़ी हुई लकीरें।
और उसी राख के किनारे पर, गिरी हुई कुर्सियाँ थीं।
कम से कम आठ-दस कुर्सियाँ। कुछ की टाँगें बाहर, कुछ का पीछा अलग, कुछ पूरी तरह टूटकर दो हिस्सों में। सब पर धूल। और उनके बीच में — रजिस्टर।
बहुत सारे रजिस्टर।
इतने कि पहले तो मुझे लगा यहाँ कोई दफ़्तार चलता था। फिर मैंने करीब जाकर देखा — रजिस्टर एक जैसे नहीं थे। कुछ मोटे, कुछ पतले। कुछ की जिल्द लाल थी, कुछ की भूरी, कुछ की काली। कुछ के कोने जले हुए थे तो कुछ के सिरेफ़े साफ़, जैसे किसी ने उन्हें छुआ ही न हो।
टिंकू ने एक रजिस्टर उठाने के लिए हाथ बढ़ाया, और उसी वक़्त उसकी जेब से माचिस निकलकर गिरी।
"अरे," उसने कहा, और उसे उठाकर अपने सामने देखा।
फिर उसने एक तीली जलाई।
पीली रोशनी कमरे में फैली, और मैंने देखा कि टिंकू का चेहरा उस रोशनी में काला-पीला लग रहा है, पर उसकी आँखों में डर नहीं था। उसमें खोज थी।
"उस्ताद," उसने कहा, "देखिए, यहाँ के चूहे भी शायद रजिस्टर में हिसाब रखते हैं।"
"क्यों?"
"क्योंकि —" उसने एक रजिस्टर की तरफ़ इशारा किया जिस पर कीड़े की लकीरें बनी थीं — "इस पर इतनी सफ़ाई से कुतरा है कि मुझे लगता है यहाँ का चूहा भी गली का ही था। हिसाब लीक से हटकर नहीं लिखा।"
मीरा ज़ोर से हँसी।
और उस हँसी के साथ कमरे में कुछ बदला। मुझे ऐसा लगा जैसे इस कमरे में बत्तीस साल बाद पहली बार हँसी आई है, और वो हँसी दीवारों से टकराकर लौटकर हम पर आ रही है।
"टिंकू," मीरा ने कहा, "तुम्हें पता है, तुम जब भी कुछ गलत बोलते हो, तुम्हारी आवाज़ दुगनी सच्ची हो जाती है?"
"क्योंकि मैं गलत कम बोलता हूँ," टिंकू ने कहा।
"नहीं," मीरा ने कहा। "क्योंकि तुम गलत बोलते वक़्त डरते नहीं।"
टिंकू ने तीली बुझा दी और टॉर्च की रोशनी में उसने अपना चश्मा ठीक किया।
"डरता हूँ," उसने कहा। "पर जब पेट में डर हो और हँसी भी आ रही हो, तो हँसी को आगे कर देना चाहिए। डर अपनी जगह रहता है, हँसी बाहर चली जाती है, और कमरा थोड़ा छोटा लगने लगता है।"
मैंने टिंकू के सिर पर हाथ रखा। छोटा सिर। बड़ी बात।
"चलो," मैंने कहा। "रजिस्टर बाद में। पहले देखें ये राख किसकी है।"
हम राख के उस गोले के पास गए। टॉर्च की रोशनी में मैंने देखा — राख के बीच एक लोहे का बक्सा था। छोटा, मज़बूत, जिसका ढक्कन आधा खुला था और जिसके किनारों पर पुरानी ज़ंग थी।
"इसे कोई यहाँ लाया," मीरा ने कहा। "आग से बचाने के लिए।"
"या आग लगाने के लिए," मैंने कहा।
बक्से का ढक्कन उठाया। अंदर सबसे ऊपर एक मैला कपड़ा था, जिसे खोलते ही कपड़े के महीन टुकड़े उड़ने लगे। उसके नीचे — काग़ज़।
मोटा। पीला। और हाथ से लिखा हुआ।
मीरा ने तुरंत अपनी कलम खोली।
मैंने काग़ज़ खोला और पहली लाइन पढ़ी।
"यह ज़मीन," मैंने पढ़ा, और मेरी आवाज़ कुछ अजीब लगी, "यह ज़मीन सिर्फ़ गरीबों के इलाज के लिए रहेगी। जो यहाँ रोगी आए, उससे कभी कुछ न माँगा जाए। न मोल, न रिश्वत, न अहसान।"
रुक गया।
"आगे," टिंकू ने कहा। उसकी आवाज़ धीमी थी।
"यह ज़मीन कभी बिकेगी नहीं," मैंने पढ़ा। "कभी गिरवी नहीं रखी जाएगी। कभी किसी ऐसे हाथ में नहीं जाएगी जो इसे दुकान या मकान बनाने के लिए ले। और अगर कोई ऐसा करे — तो इस ज़मीन की शर्त बोलेगी।"
"शर्त बोलेगी," मीरा ने कहा। उसने वही शब्द अपनी कलम से लिखे। "यही शब्द है जो रज़ा सलीम ने कहा था।"
मैंने आगे देखा। नीचे की तरफ़ हस्ताक्षर की जगह थी। और अंगूठों की जगह।
कुछ जगहों पर धुंधले निशान — नीली स्याही में, पुरानी, फीकी।
"इसमें से एक पन्ना गायब है," मीरा ने अचानक कहा।
मैंने उसके हाथ में देखा। वो काग़ज़ के किनारे को अपनी उँगली से सहला रही थी।
"कैसे पता?"
"सिलाई के छेद हैं," मीरा ने कहा। "देखो — तीन जगह, एक सीध में। और किनारे पर नीले धागे का एक रेशा बचा है। इसका मतलब यह काग़ज़ किसी सिली हुई फाइल में था, और इसे वहाँ से निकाला गया — पर पूरा नहीं निकाला। एक पन्ना पहले ही निकाला जा चुका था।"
"उस पन्ने पर क्या था?"
"शर्त," मीरा ने कहा। "और गवाहों के नाम।"
मेरे हाथ में काग़ज़ काँपा।
और फिर मैंने नीचे देखा — जहाँ हस्ताक्षर थे, वहाँ से थोड़ा ऊपर, बाईं तरफ़, एक नाम आधा कटा हुआ था।
पढ़ने लायक बचा था — "जगदीश या…"
मेरी आँखें उस आधे नाम पर जम गईं।
कमरे में सब चुप हो गए।
मैंने काग़ज़ को थोड़ा और ऊपर किया, जैसे बेहतर रोशनी से वो आधा नाम पूरा हो जाएगा।
नहीं हुआ।
"जगदीश यादव," मैंने बहुत धीमे कहा।
"अंकुश," मीरा ने कहा।
"यह मेरे दादा का नाम है," मैंने कहा। "और ये काग़ज़… ये काग़ज़ मेरे दादा के हाथ का लिखा हुआ लग रहा है।"
टिंकू ने एक क़दम आगे रखा।
"उस्ताद, आप पक्का कैसे कह रहे हैं?"
"पता नहीं," मैंने कहा। "बस जानता हूँ।" मैंने अपनी उँगली उस लिखाई पर रखी। "मेरे दादा की लिखाई में जो 'ग' आता था, वो नीचे से हल्का टूटता था। यहाँ देख — जगदीश का ग। टूटा हुआ है।"
मेरे गले में एक गाँठ बन गई।
मैंने काग़ज़ नीचे किया और एक पल के लिए आँखें बंद कर लीं।
सामने अंधेरे में मुझे अपने दादा दिखे — जिन्हें मैंने कभी नहीं देखा। सिर्फ़ सुना था। बुखार में गए थे, दवा देर से आई थी, और यही बात मेरी माँ के घर में किसी भी बात से ज़्यादा भारी थी। दादा जिनकी साइकिल की घंटी अब मेरी जेब में धागे से बँधी है।
जेब में घंटी हिली।
और उसने कहा, बहुत धीमे, करीब से — "यहाँ टूटा इंसान नहीं है। वादा टूटा है।"
मैंने आँखें खोलीं।
"क्या कहा?" मीरा ने पूछा। वो मेरे चेहरे को देख रही थी।
"घंटी," मैंने कहा। "कह रही है — यहाँ इंसान नहीं टूटा। वादा टूटा है।"
मीरा ने एक गहरी साँस ली और काग़ज़ पर झुक गई।
"फिर वो वादा जोड़ना पड़ेगा," उसने कहा। "और वादा जोड़ने के लिए दो इंसान चाहिए, अंकुश। एक नहीं।"
मैंने सिर हिलाया।
"पता है," मैंने कहा। "यही तो सबसे मुश्किल हिस्सा है।"
हमने उस काग़ज़ को सावधानी से बक्से के ऊपर रखा और आस-पास देखने लगे। राख का गोला, टूटी कुर्सियाँ, रजिस्टरों के ढेर — और अब बाईं तरफ़ की दीवार, जिस पर टॉर्च की रोशनी जाने पर एक लंबी, पतली, सीधी आकृति दिखी।
"मीरा," मैंने कहा। "वहाँ रोशनी कर।"
रोशनी गई।
दीवार में एक लकड़ी की अलमारी थी। छोटी, पर चौड़ी। उसका दरवाज़ा बंद था और उस पर एक पुराना ताला लगा था, जो इस कमरे के बाक़ी सामान से ज़्यादा देखा-भाला लग रहा था। साफ़। जैसे किसी ने हाल में उसे पोंछा हो।
"यही है," मैंने कहा। "बंसीलाल की दूसरी चाबी।"
मैंने जेब से दूसरी काली चाबी निकाली — वो जिस पर भी लाल धागा बँधा था, पर थोड़ा हल्का। ये छोटी थी, दाँते और घिसे हुए, और उसकी गर्दन पर एक पुराना निशान था — जैसे किसी ने उसे बहुत बार अलमारी में घुमाया हो।
पर मैं अभी ताले तक नहीं पहुँचा।
क्योंकि उसी वक़्त कुछ हुआ।
कमरे के कोने में, उस अलमारी के पीछे की तरफ़, एक और लोहे की आलमारी थी — बड़ी, दो पटों वाली, जिसका रंग काला था और जिस पर ज़ंग के फूल खिले हुए थे। वो अंधेरे में इतनी मिली हुई थी कि टॉर्च की रोशनी उस पर पहली बार पड़ी।
और उसी बड़ी आलमारी से — बहुत धीमी, बहुत सोची हुई — तीन खटखटाहटें आईं।
ठक।
ठक।
ठक।
टिंकू ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
मीरा ने अपनी कलम रोक दी और एक कदम पीछे हटी। मैंने उसकी तरफ़ देखा — उसके चेहरे पर एक भी हरकत नहीं थी, जो बहुत अजीब बात थी, क्योंकि मुझे पता था वो अंदर से काँप रही थी।
मैंने टॉर्च उस आलमारी की तरफ़ सीधी की।
तीन खटखटों के बाद कमरा एक अजीब तरह की चुप्पी में चला गया। न राख हिल रही थी, न धूल। जैसे कमरे ने भी अपनी साँस रोक ली हो।
और तभी जेब में घंटी बजी।
पहले बहुत धीमे, फिर साफ़, और फिर उसकी आवाज़ में वो रूखापन आ गया जो हमेशा सच बोलते वक़्त आता है।
उसने कहा — "अब जो जगा है, वो सोने का नाटक कर रहा है।"
मैंने चाबी को हाथ में कस लिया।
"क्या मतलब?" मैंने धीरे से पूछा।
"मतलब," घंटी ने कहा, "अभी तक जो सोया था, वो जाग गया है। और जागकर आँख बंद करके बैठा है, ताकि तुझे लगे कि वो कभी था ही नहीं।"
मैंने आलमारी की तरफ़ एक क़दम रखा।
टिंकू ने मेरा हाथ और कसा।
"उस्ताद," उसने कहा। "मैं डरा हुआ हूँ।"
"मैं भी," मैंने कहा।
"आप भी?"
"हाँ," मैंने कहा। "पर देख — डर के साथ मैं जा क्यों रहा हूँ? क्योंकि डर के पीछे कुछ बैठा है जो मुझे नाम से बुलाना चाहता है। और अगर वो मेरे नाम से बुलाना चाहता है, तो मुझे उसका नाम भी सुनना पड़ेगा।"
मीरा ने अपनी कलम की छोटी सी ढक्कन वापस लगाई और जेब में रखी।
"अंकुश," उसने कहा। "मैं रिकॉर्ड नहीं कर रही। बैटरी जवाब दे रही है। पर जो अभी बोलेगा, मैं याद रखूँगी। और मुझे याद रखने की आदत है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके माथे पर पसीना था, पर उसकी आँखें साफ़ थीं।
"यही काफ़ी है," मैंने कहा।
मैंने एक और क़दम रखा। राख चरचराई। मेरा जूता काग़ज़ की एक आधी जली पट्टी पर पड़ा और वो लिपट गई।
और ठीक उसी वक़्त, बड़ी आलमारी से एक चौथी आवाज़ आई।
पर यह खटखटाहट नहीं थी।
यह किसी चीज़ के खिसकने की आवाज़ थी। जैसे अंदर कोई बैठा हो और अपनी जगह बदल रहा हो।
टिंकू ने एक लंबी साँस छोड़ी और फिर — मुझे यक़ीन नहीं हुआ — हँस दिया।
एक छोटी, सूखी हँसी।
"क्या हुआ?" मीरा ने पूछा।
"कुछ नहीं," टिंकू ने कहा। "बस सोच रहा हूँ — जब हम बाहर निकलेंगे, तो सबको बताऊँगा कि मैंने एक बार एक आलमारी को करवट बदलते देखा था।"
मीरा ने उसके सिर पर हल्की चपत लगाई। "सोच समझकर बोलना।"
"सोचकर ही बोला," टिंकू ने कहा। "अब बताइए, उस्ताद — पहले कौन सा ताला खुलेगा? दीवार वाली अलमारी का, या इस बड़ी काली वाली का जो अभी जागी है?"
मैंने दोनों चाबियाँ हाथ में उठाईं।
"दीवार वाली का," मैंने कहा। "क्योंकि वो शांत है। और जो शांत है, वो पहले सच बोलता है।"
मैंने दीवार वाली अलमारी की तरफ़ क़दम बढ़ाया।
और पीछे, अंधेरे में, बड़ी काली आलमारी फिर चुप हो गई। इतनी चुप कि मुझे लगा वो हमारी बातें सुन रही है, और अपनी साँस गिन रही है।
और जेब में घंटी ने एक आख़िरी बात कही —
"तेज़ चल। धूप अभी टंकी पर है। जब ढलेगी, तो ये कमरा बोलेगा।"
॥
मैंने दीवार वाली अलमारी की तरफ़ क़दम बढ़ाया और मेरे जूते के नीचे राख फिर चरचराई। वो आवाज़ इतनी अजीब थी न — जैसे कोई बहुत पुराना आदमी करवट बदल रहा हो और उसकी हड्डियाँ बोल रही हों।
तीन क़दम। बस तीन ही क़दम थे।
और फिर मैं उसके सामने खड़ा था।
जिसे घंटी ने दीवार कहा था, वो दीवार नहीं थी। मैंने टॉर्च उस पर सीधी की और मुझे अपनी आँखों पर यक़ीन नहीं हुआ। पत्थर के जिस हिस्से को मैंने अभी तक सिर्फ़ सीलन भरी दीवार समझा था, उस पर एक लकड़ी का चौखटा था। इतना पुराना कि उसका रंग दीवार के रंग में मिल गया था। ऊपर से कोई चित्रकारी नहीं, कोई नक्काशी नहीं। बस सादा लकड़ी, जिस पर बरसों की धूल इतनी मोटी जमी थी कि वो भी पत्थर लगती थी।
और उस चौखटे के बीच में एक ताला था।
छोटा सा, काला, मोटा। जिस पर ज़ंग इतनी चढ़ी थी कि लगता था ताला नहीं, ज़ंग का ही एक गोला टँगा है।
मैंने जेब से बंसीलाल की दी हुई दूसरी काली चाबी निकाली।
"रुको," मीरा ने कहा।
मैंने हाथ रोक लिया।
"क्या?"
"पहले मैं रिकॉर्ड कर लूँ," उसने कहा। "बैटरी तीन मिनट की है। मैं चाहती हूँ कि जो अगला दरवाज़ा खुले, वो कैमरे में हो। ठीक बीच में।"
मैं हँस पड़ा। जगह देखकर हँसी नहीं आई, पर आ गई।
"तू ठीक है न?" मैंने पूछा।
"नहीं," मीरा ने कहा। "बिल्कुल ठीक नहीं हूँ। पर कैमरा ठीक है, और इस वक़्त मुझे कैमरे पर ज़्यादा भरोसा है।"
टिंकू ने मेरी जेब से टॉर्च छीन ली और अपनी तरफ़ से रोशनी दीवार पर डाल दी। उसकी रोशनी में चौखटा और साफ़ दिखने लगा।
"उस्ताद," उसने कहा। "आपने देखा? इस लकड़ी पर कोई खुदाई नहीं है। कोई नाम नहीं, कोई फूल नहीं। ऊपर वाला दरवाज़ा था, उस पर भी कुछ नहीं था। ये लोग चीज़ें छिपाते तो थे, पर उन्हें बताते नहीं थे कि छिपा क्या है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"तू ठीक कह रहा है," मैंने कहा। "जो लोग नाम नहीं लिखते, वो डरते हैं कि नाम पढ़ लिया जाएगा।"
टिंकू ने अपनी जेब में हाथ डाला।
"उस्ताद," उसने कहा। "एक चीज़ दिखानी है।"
"अब?"
"अब," उसने कहा, और एक काग़ज़ की मोड़ी हुई पुरानी पर्ची निकाली।
वो पर्ची पीली पड़ चुकी थी, किनारों से चुभोई हुई यानी बहुत ज़्यादा खोली-बंद हुई थी। उस पर बच्चों की बड़ी लिखाई में कुछ लिखा था। टिंकू ने टॉर्च नीचे की और मुझे वो पर्ची पढ़ने को दी।
मैंने पढ़ा।
और मेरे भीतर कुछ ठंडा सा उतर गया।
उस पर लिखा था — जो नीचे जाएगा, वो ऊपर नहीं आएगा।
"ये कहाँ से आई?" मैंने पूछा।
टिंकू ने कंधे उठाए।
"सानिया ने दी," उसने कहा। "उसने शाम को स्कूल के स्टोर में एक डिब्बे के नीचे से निकाली थी। उस पर कोई तारीख़ नहीं, कोई नाम नहीं। बस यही लाइन।"
मीरा ने पर्ची अपने हाथ में ली और दोनों तरफ़ से देखी, फिर पलटकर पीठ देखी।
"पीठ पर कुछ नहीं," उसने कहा। "सिर्फ़ ये धब्बा है, जैसे किसी ने गीला हाथ रखा हो।"
टिंकू ने हाथ आगे किया।
"वापस दो," उसने कहा। "मैं इसे सम्भालकर रखूँगा।"
"क्यों?" मीरा ने पूछा।
"क्योंकि," टिंकू ने कहा — और उसकी आवाज़ में एक अजीब सा संजीदा भाव आ गया, जो बच्चों की आवाज़ में नहीं आना चाहिए — "अगर कल कोई कहे कि ऐसी पर्ची कभी थी ही नहीं, तो मैं इसे दिखा दूँगा।"
फिर उसकी आवाज़ वापस हल्की हो गई।
"और मैंने वैसे भी वापसी का टिकट नहीं लिया," उसने कहा। "माँ के पास पैसे नहीं थे।"
मीरा ने उसे घूरा।
"ये मज़ाक का वक़्त नहीं है," उसने कहा।
"पता है," टिंकू ने कहा। "इसीलिए मज़ाक कर रहा हूँ। जब मज़ाक नहीं करूँगा, तब तुम समझ जाना कि मैं डर गया हूँ।"
मीरा कुछ कहती, उससे पहले ही मैंने उसकी तरफ़ हाथ बढ़ाया।
"छोड़," मैंने कहा। "ये ठीक कह रहा है।"
मैंने दीवार पर वापस ध्यान दिया। चाबी हाथ में थी। ताला सामने था।
मैं झुका और ताले को देखा।
मेरा हाथ ताला छूने ही वाला था कि मीरा ने कहा —
"रुको। पहले मैं पीछे देख लूँ।"
"पीछे?" मैंने कहा। "अलमारी के पीछे?"
"हाँ," उसने कहा और बिना मेरा जवाब सुने वो अलमारी की तरफ़ बढ़ गई।
अलमारी दीवार से बहुत थोड़ी दूर हटी थी। इतनी कम जगह कि इंसान तो क्या, बच्चा भी ठीक से घुस न पाए। पर मीरा ने अपना बैग ज़मीन पर रखा, और बिना किसी लाग-लपेट के घुटनों पर बैठ गई।
"लाइट," उसने कहा।
टिंकू ने टॉर्च उसकी तरफ़ की।
मीरा ने सिर झुकाया, गाल दीवार से सटाया, और आँख एक अंधेरे कोने में डाल दी, जो दरवाज़े और दीवार के बीच था।
फिर उसने एक लंबी साँस ली।
"अंकुश," उसने कहा। "यहाँ कुछ है।"
मैंने हाथ डाला। पर मेरा हाथ वहाँ तक नहीं गया। मेरी कलाई मोटी हो गई थी — या जगह उतनी नहीं थी।
"रुक," मीरा ने कहा। "मैं निकाल लेती हूँ।"
उसने अपनी कलाई अंदर डाली और कुछ देर बाद वो बाहर लाई।
एक दस्ताना।
पुराना, फटा हुआ, गंदा दस्ताना।
कपड़े का दस्ताना, जिसका एक उँगली वाला हिस्सा पूरा टूटा हुआ था, और बाक़ी कपड़ा जगह-जगह से उधड़ा हुआ था। उस पर धूल नहीं, सीमेंट की सफ़ेद परत जमी थी।
टिंकू ने टॉर्च उस पर सीधी की।
"ये इमरान का है," मैंने कहा।
मैंने कैसे कहा? मुझे खुद पता नहीं। शायद इसलिए कि दस्ताने की कलाई पर जो पीली रस्सी या धागे जैसा लिपटा था, वो वही दिख रहा था जो साइट पर काम करने वाले लोग पहनते हैं।
"पक्का?" मीरा ने पूछा।
"नहीं," मैंने कहा। "पर ऐसे दस्ताने दूसरे कौन पहनता है? यहाँ के किसी आदमी का नहीं है। ये साइट का है। और इमरान साइट पर काम करता है।"
टिंकू ने दस्ताना अपने हाथ में लिया और उसे पलटकर देखा।
"उस्ताद," उसने कहा। "अंदर की तरफ़ देखिए।"
मैंने देखा।
दस्ताने के अंदर, कलाई के पास, किसी पतली चीज़ से कुछ खुरचा हुआ था। बहुत महीन, बहुत छोटा। जैसे किसी सुई से लिखा गया हो।
मैंने आँखें सिकोड़ी।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
"नाम का पहला अक्षर लगता है," मीरा ने कहा। "पर मैं पक्का नहीं कह सकती। दस साल से ज़्यादा पुराना नहीं हो सकता, कपड़ा नया है। पर लिखाई ऐसी है जैसे किसी ने जल्दी में की हो।"
मैंने वो अक्षर देखा।
वो मुड़ा हुआ था। आधा बना था। जैसे किसी ने लिखना शुरू किया हो और फिर रुक गया हो।
"इसे सम्भाल," मैंने मीरा से कहा। "अभी नहीं सोचेंगे। पहले दरवाज़ा।"
मीरा ने दस्ताना अपने बैग में रखा और उतनी ही जल्दी से उठी।
और तभी मेरी नज़र दीवार पर गई।
मैंने चारों तरफ़ देखा। ये वही दीवार थी जिस पर कुछ देर पहले मैं आलमारी की तरफ़ जाते वक़्त आँख डाली थी। पर अब, टिंकू की टॉर्च की ठीक उस कोण पर, मुझे एक लकीर दिखी।
सफ़ेद लकीर।
चाक की लकीर।
"टिंकू," मैंने कहा। "टॉर्च यहाँ से ज़रा नीचे की।"
उसने की।
लकीर साफ़ दिखी। पतली, सीधी, एक जगह से शुरू होकर दूसरी जगह पर खत्म हो रही थी।
मैंने उँगली उस पर फेरी। सफ़ेद चूरा उँगली पर लग गया।
"ये चाक है," मैंने कहा। "और ये आज की नहीं है। इस पर धूल की पतली परत है, पर इतनी नहीं जितनी बाक़ी दीवार पर। इसे बार-बार बनाया गया है।"
मीरा मेरे पास आई और उसी लकीर को देखने लगी।
"कहाँ जाती है?" उसने पूछा।
"रुक," मैंने कहा। "इसी लकीर को आँख से पकड़े हुए चलते हैं।"
लकीर दीवार के एक हिस्से से शुरू होकर धीरे-धीरे नीचे जाती थी, फिर बाईं तरफ़ मुड़ती थी, और फिर अचानक गायब हो जाती थी — ठीक उसी जगह पर जहाँ अलमारी का दरवाज़ा था।
नहीं।
नहीं, वो वहाँ गायब नहीं होती थी।
वो अलमारी के नीचे से गुज़रती थी।
"ये लकीर सीधी उस दरवाज़े की तरफ़ जाती है जो अभी खुला नहीं है," मीरा ने कहा।
"हाँ," मैंने कहा। "और ये चाक किसने खींची, ये भी अब आसान है — उसने क्योंकि उसे रास्ता याद रखना था।"
मैंने चाबी फिर हाथ में उठाई।
और तभी जेब में घंटी बजी।
पर इस बार उसकी आवाज़ में वो पहले वाली सफ़ाई नहीं थी। धीमी थी, दबी थी, जैसे वो खुद भी कुछ कहने से डर रही हो।
"यह दीवार नहीं," उसने कहा।
मैंने रुककर सुना।
"दरवाज़ा है," घंटी ने कहा।
मैंने मीरा को देखा। उसके हाथ में कैमरा था, वो छोटा लाल बत्ती वाला वाला हिस्सा जल रहा था।
"पीछे क्या है?" मैंने घंटी से पूछा।
घंटी एक पल चुप रही।
"वादा टूटा पड़ा है," उसने कहा।
"किसका?"
"जो यहाँ बत्तीस साल पहले टूटा था," घंटी ने कहा। "और जो तेरे दादा ने अपनी लिखाई से बचाना चाहा था।"
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। उसका चेहरा पीला पड़ गया था। उसने पर्ची अपनी मुट्ठी में कस ली थी, जैसे वो पर्ची अब उसका सहारा हो।
"उस्ताद," उसने कहा। "गली में एक बात कहते हैं। पुराने लोग कहते थे — जो दरवाज़ा बंद होकर नाम बोलता है, वो कभी अपने आप नहीं खुलता। उसे खोलने वाला भी उसमें से होकर गुज़रना पड़ता है।"
"तू ये बातें कहाँ से लाता है?" मीरा ने पूछा।
"माँ कहती थी," टिंकू ने कहा। "पापा के जाने के बाद वो रातों को बैठकर ऐसी बातें कहती थी। मुझे लगता था वो पागल हो गई है। अब लगता है वो कुछ ऐसी चीज़ें देख रही थी जो मैं नहीं देख रहा था।"
मैंने एक लंबी साँस ली।
फिर मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"कैमरा चालू है?"
"चालू है," उसने कहा। "दो मिनट बाक़ी।"
"अच्छा," मैंने कहा। "जब खुले, तो जो अंदर हो, उसे अपना नाम बोलना पड़ेगा। हम नाम बोलेंगे, और वो भी बोलेगा। अगर वो न बोले, तो हम अंदर नहीं जाएँगे।"
मीरा ने सिर हिलाया।
टिंकू ने अपनी जेब से एक छोटा पेचकस निकाला। वो मेरी औज़ार पेटी से उठाया हुआ था, जो कल रात ही मैंने उसे दिया था।
"तुम ये क्यों लाए?" मीरा ने पूछा।
"क्योंकि," टिंकू ने कहा, "अगर ताला नहीं खुलेगा, तो पेचकस से खोलेंगे। और अगर पेचकस से नहीं खुलेगा, तो हम हाथ से खोलेंगे। और अगर हाथ से भी नहीं खुलेगा — तो हम उसी दरवाज़े को बोलेंगे कि वो खुद बताए उसे क्या चाहिए।"
मैं उसकी तरफ़ मुड़ा।
"तू अब कमाल का बच्चा होता जा रहा है," मैंने कहा।
"मैं पहले से था," टिंकू ने कहा। "बस आप देख नहीं रहे थे।"
मैं हँसा।
और उसी हँसी में मैंने चाबी ताले में डाल दी।
चाबी घुसी। पर घूमी नहीं।
मैंने ज़ोर लगाया।
नहीं घूमी।
"ज़ंग," मीरा ने कहा। "मैंने कहा था।"
"ज़ंग नहीं," मैंने कहा और झुककर देखा। "ताला अंदर से जाम है। कोई चीज़ फँसी है।"
मैंने टिंकू से पेचकस लिया और ताले के अंदर महीन सी जगह में डालकर थोड़ा हिलाया।
कुछ खटका।
फिर ज़ोर लगाया।
ताला खुला।
वो छोटी सी आवाज़ — ठस — और मेरे हाथ में ताला बेजान होकर लटक गया।
मैंने ताला उतारा और अपनी जेब में डाल दिया।
और फिर मैंने दरवाज़े पर हाथ रखा।
लकड़ी ठंडी थी। इतनी ठंडी कि लगा जैसे मैंने बर्फ को छुआ हो। मैंने उँगलियाँ उस पर फैलाई और धीरे से धक्का दिया।
दरवाज़ा चरचराया और एक इंच क़रीब खुल गया।
अंदर से एक गंध निकली।
ये जले काग़ज़ की गंध नहीं थी। ये कुछ और था। ये सीलन और लोहे और… और किसी ऐसी चीज़ की गंध थी जिसे मैं पहचानता थी पर नाम नहीं बता सकता था। जैसे माँ के कपड़े की अलमारी में बंद रखे पुराने काग़ज़ की गंध हो, जो तीस साल से खुले ही न हों।
मैंने दरवाज़ा थोड़ा और खोला।
और मेरे पीछे किसी के पैर की आहट आई।
मैंने दरवाज़ा पकड़े हुए ही पलटकर देखा।
मीरा ने अपना कैमरा पलट दिया।
टिंकू ने पेचकस कसकर पकड़ लिया।
ऊपर, सीढ़ियों के मुँह पर, एक आदमी खड़ा था।
मोटा शरीर। काला कोट। बिना सोने की चेन। बिना पानदान। हाथों में कुछ नहीं था और… और वो हाथ काँप रहे थे।
बबलू पांडे।
मैंने कुछ देर उसे देखा।
उसकी हालत देखकर मुझे पहले तो लगा कि वो कोई नाटक कर रहा है। पर नहीं। उसका माथा पसीने से भरा था। उसकी आँखें हमेशा की तरह छोटी नहीं थीं, वो फैली हुई थीं। और उसकी जीभ लगातार होंठों के कोनों पर आ रही थी, जैसे उसने पान चबाया हो और अब थूकने की जगह न मिल रही हो।
"बबलू भाई," मैंने धीरे से कहा। "इतनी जल्दी तुम्हारा ऊपर आना। मैंने तो सोचा था तुम सीढ़ियों पर बैठे रहोगे।"
"मैं सीढ़ियों पर था," बबलू ने कहा।
उसकी आवाज़ भी वो वाली नहीं थी। वो खुरदरी, धमकाने वाली आवाज़ जो हमेशा बड़े साहब की चमकीली सीटी जैसी लगती थी, वो अब बस फुसफुसाहट जैसी थी।
"तो फिर नीचे क्या करने आए?" मीरा ने कहा।
बबलू ने उसकी तरफ़ देखा भी नहीं। उसका ध्यान मेरे पीछे था — उस आधे खुले दरवाज़े पर, जिससे अभी गंध आ रही थी।
"अंकुश," उसने कहा। "मैं तुमसे एक बात पूछूँगा।"
"पूछो," मैंने कहा।
"पर तुम हँसना मत," उसने कहा।
मैं उसकी तरफ़ देखकर रह गया।
मैंने उस आदमी से ज़िंदगी में इतनी नरम आवाज़ कभी नहीं सुनी थी। मुझे लगा जैसे वो अंदर से बहुत दूर किसी चीज़ के पास खड़ा हो और बोल रहा हो।
"हँसूँगा नहीं," मैंने कहा।
बबलू ने एक क़दम नीचे रखा।
फिर रुक गया।
"तुमने बक्सा देखा क्या?" उसने पूछा।
मैंने कुछ नहीं कहा।
"जो उस राख में पड़ा था," बबलू ने कहा। "लोहे का। छोटा। जिसमें कुछ पीला काग़ज़ निकला था।"
मैंने अभी भी कुछ नहीं कहा।
बबलू ने मेरी आँखों में सीधे देखा — और उसकी आँखें सच में काँप रही थीं, मैं झूठ नहीं बोल रहा, आदमी की आँखें काँप रही थीं।
"अगर देखा है," उसने कहा — और उसकी आवाज़ टूट गई — "तो भूल जाओ।"
मैंने एक लंबी साँस ली और पीछे टिंकू की तरफ़ हाथ बढ़ाया, ताकि वो चुप रहे। फिर मैंने दरवाज़ा छोड़ा और एक क़दम बबलू की तरफ़ बढ़ा।
"बबलू भाई," मैंने कहा। "तुम ये बात किसके डर से कह रहे हो?"
उसने जवाब नहीं दिया।
"मैंने तो सुना था," मैंने कहा, "तुम वो हो जो दूसरों को डराता है। आज तुम्हारी आवाज़ क्यों काँप रही है?"
बबलू ने अपना एक हाथ उठाया। मुझे लगा वो मुझे धमकाने के लिए पकड़ने आ रहा है। पर उसने कुछ और किया — उसने अपना हाथ सामने फैला दिया और देखा।
उसका हाथ काँप रहा था।
और वो खुद अपने हाथ को देखकर ऐसे चौंका जैसे पहली बार देखा हो।
"मैं डर नहीं रहा," उसने खुद से कहा, जैसे मुझसे नहीं, खुद से बात कर रहा हो। "मैं डर नहीं रहा। मैंने तो देखा है।"
"क्या देखा?" मीरा ने पीछे से पूछा।
बबलू ने जवाब नहीं दिया। उसने अपना हाथ नीचे किया और उसे कोट की जेब में घुसा दिया, जैसे छिपाना चाहता हो।
"तुम्हारे हाथ में रूमाल था," मैंने कहा। "कल। पीपल पर। जब तुम बिना चेन के आए थे।"
बबलू ने मेरी तरफ़ देखा।
"वो रूमाल चला गया," उसने कहा।
"कहाँ गया?"
"पता नहीं," उसने कहा। "पता नहीं। मैंने उसे सोते समय किसी से बँधवाया था, और सुबह उठा तो… नहीं था। सिर्फ़ मेरी हथेली पर ये निशान था।"
उसने अपना हाथ फिर निकाला और मुझे दिखाया। हथेली के किनारे पर एक उभरी हुई लाल लकीर थी, जैसे कोई धागा रात भर बँधा रहा हो और अब उसकी छाप छोड़ गया हो।
"बबलू भाई," मैंने कहा। "तुम ऐसे आदमी नहीं हो।"
"मैं क्या आदमी हूँ," उसने कहा। "मुझे खुद नहीं पता।"
वो सीढ़ियों पर बैठ गया। बैठा भी नहीं, गिरा। उसका मोटा शरीर धड़ाम से सीढ़ी के पत्थर पर बैठ गया और उसने अपना सिर दोनों हाथों में पकड़ लिया।
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया — रुको।
मैं बबलू के सामने बैठ गया।
"सुनो," मैंने कहा। "तुम कल से यही कह रहे हो — तुमने बक्सा देखा है। अब साफ़ बोलो। क्या देखा?"
बबलू ने सिर उठाया।
उसकी आँखों में पानी था। जी हाँ। बबलू पांडे की आँखों में पानी था, वो आदमी जो मुझे कल गुमटी पर गला पकड़कर उठा लिया था।
"तुम्हारे पापा," उसने कहा।
मैं सकपका गया।
"क्या?"
"तुम्हारे पापा," उसने फिर कहा। "पाँच साल पहले। शंकर यादव। मैंने उन्हें देखा था।"
"कहाँ देखा?"
"यहाँ नहीं," बबलू ने कहा। "ऊपर। भारद्वाज भवन में। चंद्रेश सक्सेना के दफ़्तर में।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा और मेरे भीतर कुछ ऐसा उठा जो बहुत समय से दबा हुआ पड़ा था।
"मुझे बताओ," मैंने कहा।
बबलू ने गला साफ़ किया।
"मैं उस रात वहाँ था," उसने कहा। "पर मैं उस कमरे में नहीं था। मैं बाहर, गलियारे में था। मुझे साहब ने कहा था कि दरवाज़े पर खड़े रहना। अंदर कोई आए तो मुझे बुलाना। मैंने दरवाज़े से झाँका। तुम्हारे पापा वहाँ बैठे थे और सक्सेना उनसे कुछ कह रहे थे।"
"क्या कह रहे थे?"
"मैं पूरा नहीं सुना," बबलू ने कहा। "पर जितना सुना, वो यह था — यादव, तुम्हारा अंगूठा लगेगा तो तुम्हारी औरत का इलाज चलेगा। नहीं तो तुम्हारी औरत को कल अस्पताल से निकाल देंगे।"
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।
"फिर?" मैंने कहा।
"फिर," बबलू ने कहा, "तुम्हारे पापा ने काग़ज़ उठाया। उनके हाथ काँप रहे थे। वो देख रहे थे जैसे कोई आदमी ये तय न कर पा रहा हो कि गिर जाऊँ या खड़ा रहूँ।"
"और फिर उन्होंने अंगूठा लगा दिया," मैंने कहा।
"नहीं," बबलू ने कहा।
मैंने सिर उठाया।
"क्या?"
"नहीं," बबलू ने दोहराया। "उन्होंने अंगूठा नहीं लगाया। उन्होंने काग़ज़ वापस मेज़ पर रख दिया और कहा — मैं अपने बेटे के नाम से कुछ नहीं लिखूँगा।"
मैं स्तब्ध रह गया।
"क्या कहा तुमने?"
"उन्होंने कहा," बबलू ने कहा, आवाज़ भर्राई हुई थी, "मैं अपने बेटे के नाम से कुछ नहीं लिखूँगा। बेटा बड़ा होकर मेरे काग़ज़ों से शर्मिंदा न हो।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। मेरे गले में कुछ भर गया।
"पर उनका अंगूठा उस काग़ज़ पर है," मीरा ने पीछे से कहा — धीरे से, बहुत धीरे से।
"हाँ," बबलू ने कहा। "वो बाद में आया।"
"कब?" मैंने पूछा।
"उसी रात," बबलू ने कहा। "दो घंटे बाद। अलग कमरे में। सक्सेना ने उन्हें दूसरे कमरे में बुलाया। वहाँ गोविंद भाई थे, मुनीम। और उनके अलावा… एक और आदमी था।"
"कौन?"
बबलू ने अपना सिर उठाया और मेरी आँखों में देखा।
"काले कोट में," उसने कहा। "और उसकी उँगली में एक काली अंगूठी थी।"
मैं खड़ा हो गया।
मैं नहीं जानता क्यों खड़ा हो गया। शायद इसलिए कि बैठकर सुनना अब मुश्किल हो रहा था। शायद इसलिए कि मेरे घुटने काँप रहे थे और मैं उन्हें छिपाना चाहता था।
"वो आदमी," मैंने कहा। "क्या वो ही था जिसने पापा से अंगूठा लगवाया?"
बबलू ने सिर हिलाया।
"उसने कहा," बबलू ने कहा, "यादव जी, तुम्हारी औरत की जाँच में जो आया है, वो सब ठीक है। बस एक काग़ज़ में तुम्हारा नाम आ रहा है। हम उसे ठीक कर देंगे। बस तुम 'यहाँ' अंगूठा लगा दो।"
"और पापा ने लगा दिया?"
"नहीं," बबलू ने कहा। "पहली बार नहीं। उन्होंने कहा — मुझे पहले पूरा काग़ज़ दिखाओ।"
मैंने साँस रोक ली।
"तो?"
"तो वो आदमी हँसा," बबलू ने कहा। "और उसने काग़ज़ सामने रख दिया। और मैंने… मैंने देखा कि उस काग़ज़ पर दो नाम थे।"
मेरे भीतर कुछ ठहर गया।
"कौन से दो नाम?" मीरा ने पूछा। वो मेरे पीछे आ गई थी और उसकी आवाज़ बहुत साफ़ थी।
बबलू ने उसकी तरफ़ देखा।
"एक शंकर यादव," उसने कहा। "और दूसरा अंकुश यादव।"
उस कमरे में हवा जैसे रुक गई।
"मेरा नाम?" मैंने कहा।
"हाँ," बबलू ने कहा। "तुम्हारे पापा ने जब ये देखा, तो उन्होंने काग़ज़ वापस मेज़ पर पटक दिया। उन्होंने कहा — मेरा बेटा उन्नीस साल का है। तुम उसका नाम कैसे लिख सकते हो? उसने तो कोई काग़ज़ देखा भी नहीं।"
"फिर?" मीरा ने पूछा।
"फिर वो आदमी उठा," बबलू ने कहा। "और उसने कहा — यादव जी, उसका नाम इसलिए लिखा है क्योंकि ये चीज़ बेटे के नाम पर है। ये तुम्हारी गली वाली दुकान नहीं है। ये तुम्हारे बेटे की दुकान है। शंकर यादव का नाम तो बस ऊपर लिखा है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"क्या?" मैंने कहा।
बबलू ने मेरी आँखों में देखा।
"उसने यही कहा था," बबलू ने कहा। "और तुम्हारे पापा ने… उन्होंने कोई लड़ाई नहीं की। वो बैठ गए। उन्होंने अपना हाथ मेज़ पर रखा और बस रो दिए।"
मैंने आँखें बंद कर लीं।
"और फिर उन्होंने अंगूठा लगाया?" मीरा ने पूछा, बहुत सावधानी से, जैसे फ़र्श पर बहुत धीरे क़दम रख रही हो।
"उन्होंने कहा," बबलू ने कहा, "कि मेरी औरत के इलाज के बदले मेरा अंगूठा ले लो। पर मेरे बेटे की लाइन खाली छोड़ दो।"
"और वो आदमी?"
"वो नहीं माना," बबलू ने कहा। "उसने कहा कि दोनों नाम रहेंगे या कोई नहीं।"
मैंने पीछे मुड़कर मीरा को देखा। उसके हाथ में कैमरा अभी भी चालू था, पर उसकी लाल बत्ती काँप रही थी, जैसे बैटरी जवाब दे रही हो।
"अंकुश," मीरा ने कहा। "तू ठीक है?"
"हाँ," मैंने कहा।
झूठ बोला।
मैं ठीक नहीं था।
मैंने अपना हाथ दीवार पर रखा, इसलिए नहीं कि मुझे सहारा चाहिए था — इसलिए कि मुझे कुछ ऐसा छूना था जो हिले नहीं, और मेरे भीतर सब कुछ हिल रहा था।
"बबलू भाई," मैंने कहा। "तुमने ये बात आज तक किसी को क्यों नहीं बताई?"
बबलू कुछ देर चुप रहा।
"क्योंकि," उसने कहा, "उस कमरे से निकलते वक़्त उस आदमी ने मेरा कंधा थामा और कहा — जो तुमने देखा है वो तुम्हारी नींद में ही रहना चाहिए। सो जाओ, बबलू।"
"और तुम सो गए?" मैंने पूछा।
"मैं रोज़ सोता हूँ," उसने कहा। "पर मेरी नींद नींद नहीं होती। वो डर होता है जो आँख बंद करके भी जागता है।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा।
"उस्ताद," उसने धीरे से कहा। "फिर तो… हमें बक्सा वापस रखना पड़ेगा। अगर बबलू भाई कह रहे हैं कि भूल जाओ, तो मतलब कुछ तो है उसमें।"
"हाँ," मैंने कहा। "कुछ है। और वो कुछ हमारे हाथ में है, इसीलिए बबलू भाई इतने डरे हुए हैं।"
मैं बबलू की तरफ़ मुड़ा।
"बबलू भाई," मैंने कहा। "मैं तुमसे एक बात कहूँ?"
उसने सिर उठाया।
"मैं बक्सा नहीं भूलूँगा," मैंने कहा।
उसका चेहरा बदला।
"मैं नहीं भूलूँगा," मैंने दोहराया, "क्योंकि जो बक्सा तुमने देखा है और भूल गए, वो अब भी उसी राख में पड़ा है। और जो काग़ज़ उसमें है, उस पर मेरे दादा की लिखाई है। तुम्हें पता है, मेरे दादा की लिखाई में 'ग' नीचे से टूटता था? मैंने वो आज देखा। और मेरा हाथ काँपा।"
बबलू ने मुझे देखा।
"तू अपने पापा की बात सुनकर काँपा है," उसने कहा।
"हाँ," मैंने कहा। "वो भी।"
"तो फिर," बबलू ने कहा, "तू उस काग़ज़ को वापस क्यों नहीं रख देता? ताकि तेरे पापा को कोई दिक्कत न हो।"
मैंने एक गहरी साँस ली।
"बबलू भाई," मैंने कहा। "तुमने कभी सोचा है कि मेरे पापा ने पाँच साल में एक बार भी मुझे क्यों नहीं बताया कि मेरा नाम उस काग़ज़ पर है?"
उसने कुछ नहीं कहा।
"क्योंकि वो मुझे बचाना चाहते थे," मैंने कहा। "पर उन्होंने जो किया, वो बचाना नहीं था। वो बस छुपाना था। और छुपाने से कुछ ठीक नहीं होता। मैं अब वो काग़ज़ उठाने आया हूँ — ताकि मैं उसे खुद देख सकूँ, और उसके बाद जो करना है, खुद सोच सकूँ।"
बबलू ने अपना सिर हिलाया।
"पर तू समझता नहीं," उसने कहा। "वो काग़ज़ सिर्फ़ काग़ज़ नहीं है।"
"तो क्या है?"
"वो," बबलू ने कहा, और उसकी आवाज़ लड़खड़ाई, "वो मेरा नाम भी है।"
मैं चौंका।
"तेरा नाम?"
"मेरा नाम उस काग़ज़ पर है," बबलू ने कहा। "बीस साल पहले मैं उस दुकान का काग़ज़ उठाने गया था। मुझे पता नहीं था कि क्या लिखा है। सिर्फ़ इतना पता था कि साहब कहेगा और मैं उठा लाऊँगा। और मैंने उठा लिया।"
वो फिर अपना सिर झुकाकर हाथों में ले लिया।
"तो अब," मैंने कहा। "तू उस काग़ज़ पर अपना नाम देखकर डर रहा है।"
"हाँ," उसने कहा। "क्योंकि अगर वो काग़ज़ किसी को मिल जाए, तो मैं भी अंदर जाऊँगा। और मैंने सुना है कि साहब की गाड़ियाँ जिनको ले जाती हैं, वो लौटकर नहीं आते।"
मैं उसके सामने झुका।
"बबलू," मैंने कहा — धीरे से, बिना किसी ताने के — "मैं तुझे एक बात कहूँ? बीस साल से तू उस काग़ज़ पर अपना नाम लिए घूम रहा है। आज वो काग़ज़ हमारे हाथ में है। अगर तू चाहे, तो हम इसे ऐसे इस्तेमाल कर सकते हैं कि तेरा नाम तेरे फ़ायदे में आए।"
बबलू ने सिर उठाया।
उसकी आँखों में कुछ बदला।
"कैसे?" उसने पूछा।
"ये अभी नहीं," मैंने कहा। "पहले तुझे मेरे साथ आना पड़ेगा। और मेरे साथ आने का मतलब है — मुझसे कुछ छिपाना नहीं।"
वो कुछ देर मेरी आँखों में देखता रहा।
फिर उसने एक लंबी साँस छोड़ी।
"ठीक है," उसने कहा। "मैं आऊँगा। पर मैं तुझे एक बात बताता हूँ।"
"क्या?"
"अब घंटी किसके पास रहेगी वाली पर्ची," बबलू ने कहा, "वो मेरे रूमाल में मैंने रखी थी। और सुबह वो नहीं थी।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"तो?"
"तो ये मत सोचना," बबलू ने कहा, "कि सिर्फ़ मैं तुम्हारे पीछे हूँ। उस कमरे में कोई और भी है जो तुम्हारी घंटी के पीछे है। और वो, मेरी जान, बहुत जल्दी आएगा।"
उसकी आवाज़ गिर गई और वो सीढ़ियों पर अपना सिर टिकाकर बैठ गया।
मैंने पीछे मुड़कर दरवाज़े को देखा।
आधा खुला दरवाज़ा। वो अंधेरा, जो अब थोड़ा और गहरा लग रहा था। और उससे आती सीलन भरी गंध।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने अपना कैमरा बंद कर दिया था और उसकी बैटरी खत्म होने की लाल बत्ती बुझ रही थी।
"तीन मिनट पूरे," उसने कहा। "अब बस यादें हैं।"
टिंकू ने अपना पेचकस अपनी जेब में डाल लिया और मेरे पास आया।
"उस्ताद," उसने कहा। "मैं एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"उस दरवाज़े के पीछे," उसने कहा, "हम तीन लोग जा रहे हैं। पर अगर वहाँ कोई और हो, तो उसे कैसे पता चलेगा कि हम तीन हैं, और हम उससे कम या ज़्यादा हैं?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा और मुस्कुराया।
"उसे पता नहीं चलेगा," मैंने कहा। "क्योंकि हम ऐसे जाएँगे कि लगे कोई आया ही नहीं।"
टिंकू ने सिर हिलाया।
"अच्छा," उसने कहा। "ये ठीक है। मुझे बुरा लग रहा था कि सिर्फ़ मैं डर रहा हूँ। पता चला, तुम भी डर रहे हो।"
मैंने उसे घूरा।
"तू बहुत बोलता है," मैंने कहा।
"माँ भी यही कहती है," उसने कहा। "पर बोलने से ही तो पता चलता है कि आदमी ज़िंदा है।"
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।
और फिर मैंने सीढ़ियों की तरफ़ देखा, जहाँ बबलू बैठा था। उसने अपना सिर उठाया और मेरी तरफ़ देखा — बिना हँसी, बिना चालाकी। सिर्फ़ एक आदमी की तरह, जो बहुत बरसों बाद सच बोलकर थका हुआ है।
"बबलू भाई," मैंने कहा। "तुम ऊपर जाओ और बंसीलाल से कहो कि दरवाज़ा खुल गया है। और अगर तुम मेरी बात मानो, तो अपना स्कूटर भी वहाँ से हटा दो।"
बबलू ने पूछा, "क्यों?"
"क्योंकि," मैंने कहा, "अगर वो कमरा बोलेगा, तो पहले बाहर वालों को बुलाएगा। और मुझे नहीं लगता कि उसे तेरी गाड़ी पसंद आएगी।"
बबलू ने मुझे देखा। फिर खड़ा हुआ, एहतियात से, जैसे उसकी टाँगें भी अब साथ न दे रही हों।
और जाते-जाते उसने अपनी जेब से कुछ निकाला और मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
एक माचिस का डिब्बा।
"इसमें," उसने कहा, "वो काग़ज़ नहीं है। बस ज़रूरत का सामान है। तीन बत्तियाँ हैं। अगर अंदर टॉर्च बुझे, तो काम आएँगी।"
मैंने माचिस ली।
"बबलू," मैंने कहा। "ये तूने कब रखा था?"
"आज सुबह," उसने कहा। "जब मुझे लगा कि मैं शायद इस बार किसी की मदद कर सकता हूँ।"
वो सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।
मैंने दरवाज़े की तरफ़ मुड़कर देखा।
दरवाज़े के पीछे से अब भी वही गंध आ रही थी, और साथ में एक नई आवाज़ — बहुत धीमी, बहुत लंबी, जैसे कोई काग़ज़ का पन्ना फर्श पर खिंच रहा हो।
"मीरा," मैंने कहा।
"हाँ?"
"तेरी कलम," मैंने कहा। "नीली स्याही वाली। जब हम अंदर जाएँ, तू हर चीज़ के नाम, तारीख़ और जगह उसी वक़्त लिखती जाना। काग़ज़ न मिले तो अपनी हथेली पर लिखना। पर लिखना।"
उसने अपनी जेब से कलम निकाली और मेरी तरफ़ देखा।
"तू मुझे बता," उसने कहा। "क्या तुझे अंदर जाने से डर लग रहा है?"
"बहुत," मैंने कहा।
"अच्छा," उसने कहा और कलम खोल ली। "मुझे भी। अब चल।"
मैंने दरवाज़ा ज़ोर से धक्का दिया।
दरवाज़ा खुला।
और अंदर, अंधेरे में, जेब में घंटी ने अपनी आख़िरी बात कही —
"अंदर जो है, वो तेरा नाम नहीं पूछेगा। वो तेरे दादा का नाम पूछेगा। और उसे बोलना पड़ेगा ठीक वैसे ही जैसे वो बोलते थे — नहीं तो वो तुझे तेरे नाम से भी नहीं पहचानेगा।"
॥
दरवाज़ा जितना खुला, उतना ही अंधेरा बाहर आया।
मैंने टॉर्च आगे की। रोशनी की पतली सुई अंधेरे में घुसी और धूल के कणों में लटकती दिखी, जैसे हवा में कोई पुरानी स्याही घुल रही हो। अंदर की छत नीची थी। इतनी नीची कि अगर मैं हाथ ऊपर करता तो उँगलियाँ छत को छू लेतीं। दीवार का पलस्तर उखड़ा हुआ था, और जहाँ उखड़ा था वहाँ से ईंटों की लाली ऐसे दिख रही थी जैसे किसी ने अंदर से खून पोंछ दिया हो।
गंध तीन तरह की थी। सीलन की, जले हुए काग़ज़ की, और एक चौथी — हल्की सी मीठी, जैसे बहुत पुरानी गुड़ की डली किसी कोने में पड़ी सड़ रही हो।
"उस्ताद," टिंकू ने धीरे से कहा।
"हूँ।"
"मेरे पैर के नीचे कुछ है।"
मैंने टॉर्च नीचे की। टिंकू की चप्पल के नीचे एक काग़ज़ दबा था, और जैसे ही उसने पैर हटाया, वो काग़ज़ फ़र्श पर सरक गया। बस वही आवाज़ थी। वही लंबी, धीमी, खिंचती हुई आवाज़, जो दरवाज़े के बाहर से सुनाई दे रही थी।
मैंने राहत की साँस ली। कम से कम भूत काग़ज़ नहीं होता।
"गिरा हुआ काग़ज़ है," मैंने कहा। "चल।"
हम तीन कदम अंदर गए।
कमरा बड़ा नहीं था। इतना ही कि एक मेज़, एक कुर्सी और एक आदमी के खड़े होने की जगह बचे। बीच में लकड़ी की मेज़ थी, जिसकी एक टाँग छोटी थी, इसलिए नीचे ईंट दबी थी। मेज़ पर काग़ज़ों का ढेर था — ऊपर से नीचे तक एक ही तरह के काग़ज़, जैसे किसी ने एक ही चीज़ बार-बार लिखकर जमा कर दी हो।
मैंने ऊपर का काग़ज़ उठाया।
उस पर एक ही लाइन लिखी थी, हाथ से, किसी काँपती उँगली से — माफ़ कर दिया।
मैंने दूसरा उठाया। उस पर भी वही। तीसरा, चौथा, पाँचवाँ — सब पर वही दो शब्द। किसी की लिखाई गोल थी, किसी की टेढ़ी, किसी की ऐसी जैसे लिखते वक़्त हाथ रोया हो। पर शब्द वही थे।
मीरा ने मेरे कंधे के ऊपर से झाँका।
"ये क्या है?" उसने फुसफुसाया।
"माफ़ी," मैंने कहा।
"माफ़ी?"
"नक़ली माफ़ी," मैंने कहा। "जो कही गई होगी, पर कभी मानी नहीं गई।"
मेरी जेब में घंटी ठंडी थी। ठंडी और चुप। जैसे वो भी ये काग़ज़ पढ़ रही हो और पढ़कर चुप हो गई हो।
तभी सीढ़ियों की तरफ़ से आवाज़ आई।
"देखा?" बबलू की आवाज़ थी। भारी, फूली हुई, जैसे वो दौड़कर आया हो। "बक्सा दिखा?"
मैं मुड़ा। बबलू दरवाज़े पर खड़ा था। उसका सफ़ेद रूमाल अब भी हाथ पर बँधा था, पर उसकी चेन नहीं थी, पानदान नहीं था, और चेहरे पर वो चीज़ नहीं थी जो हमेशा रहती थी — घमंड। चेहरे पर सिर्फ़ पसीना था।
"कौन सा बक्सा, बबलू भाई?" मैंने कहा।
"बड़ा बक्सा," उसने कहा। "लोहे का। भारी। जिसमें साहब की चीज़ें रहती हैं।"
मैंने अपनी टॉर्च कमरे में घुमाई। मेज़। कुर्सी। काग़ज़। दीवार पर एक कील, जिससे सड़ी रस्सी लटक रही थी। फ़र्श पर एक चौकोर जगह, जहाँ धूल नहीं थी — साफ़, बिल्कुल साफ़, जैसे किसी ने वहाँ से कुछ उठाया हो और उठाने के बाद जगह को भी पोंछ दिया हो।
"कोई बक्सा नहीं है," मैंने कहा।
बबलू ने एक कदम बढ़ाया और फिर रुक गया।
"नहीं है?"
"नहीं है," मैंने कहा। "बस पुराने काग़ज़ हैं, एक टूटी कुर्सी है, और एक वादा है जो टूटा हुआ पड़ा है। बक्सा नहीं है।"
बबलू दरवाज़े के अंदर आया, पर बस एक कदम। दूसरा कदम नहीं बढ़ाया। ऐसे खड़ा रहा जैसे ज़मीन उसके तलवों को जला रही हो। उसने नीचे देखा, फिर अपने जूते की नोक फ़र्श पर रगड़ी, जैसे कोई गर्म तवा छू रहा हो और छोड़ रहा हो।
"यहाँ नहीं है," उसने कहा। "यहाँ तो सिर्फ़ उनका डर रखा था।"
"मतलब?"
"मतलब," उसने कहा, "बक्सा अब अस्पताल में नहीं है। उन्होंने उसे कहीं और कर दिया है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"कहाँ?"
बबलू ने अपना हाथ उठाया और फिर नीचे गिरा दिया, जैसे जवाब भी उसके पास नहीं था।
"मुझे पक्का नहीं पता," उसने कहा। "पर साहब एक बात कहते हैं, हमेशा। कहते हैं — जहाँ सबसे ज़्यादा शोर होता है, वहाँ सबसे गहरा सन्नाटा रखा जाता है।"
मीरा ने सिर उठाया।
"ये क्या बात हुई?" उसने कहा।
"सीधी बात है," बबलू ने कहा। "जो चीज़ किसी अंधेरे कमरे में रखी हो, वो जल्दी मिल जाती है। कोई न कोई उस कमरे में जाता है। पर जो चीज़ शादी में रखी हो, बाज़ार में रखी हो, जहाँ रोज़ ढोल बजता हो, जहाँ लोग हँसते हों — उसे कोई ढूँढता ही नहीं। क्योंकि सबको लगता है कि ऐसी जगह छिपाने की जगह नहीं होती।"
मैं चुप हो गया।
मेरे अंदर कुछ ऐसा हिला जो शब्दों में नहीं आता। वो आदमी जो हर तस्वीर में हाथ जोड़कर खड़ा होता है, जो त्योहार पर कंबल बाँटता है, जो हर सभा में माइक पकड़कर मुस्कुराता है — वो अपनी सबसे गंदी चीज़ सबसे ज़्यादा भीड़ वाली जगह पर रखता है। क्योंकि भीड़ में सबसे आसान काम है — किसी को कुछ न दिखना।
"तुम मुझे ये सब क्यों बता रहे हो?" मैंने पूछा।
बबलू ने कुछ देर मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने पहले कभी उसके चेहरे पर नहीं देखी थी। डर नहीं। डर तो वो हमेशा दूसरों को दिखाता था। ये कुछ और था। ये वो डर था जो आदमी को रात में उठाकर बैठा देता है, और सुबह उसके हाथ में चाय का कप पकड़ाते वक़्त भी उसका पीछा नहीं छोड़ता।
"क्योंकि," उसने धीरे से कहा, "साहब ने आज मेरे घर का पता भी ले लिया है।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"बीस साल से मैं उनके लिए चबूतरी पर बैठा," उसने कहा। "धमकाया, वसूली की, गला पकड़ा। मुझे लगता था कि मैं उनका आदमी हूँ। पर आज सुबह जब मैंने उन्हें फोन किया, तो उन्होंने मेरा पता पूछा। पूछा — तुम कहाँ रहते हो, बबलू? बीस साल में उन्होंने पहली बार पूछा। और मुझे पता है कि जो लोग साहब के रास्ते में आते हैं, उनके घर के बाहर गाड़ी खड़ी हो जाती है। सुबह तक कोई उतरता नहीं। बस खड़ी रहती है।"
टिंकू ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं, और छोटी, और उनमें वो कंपन था जो बच्चों के हाथों में तब आता है जब उन्हें लगता है कि बड़े भी अब बचाने वाले नहीं रहे।
मीरा ने अपना कैमरा बंद कर दिया। क्लिक की आवाज़ बहुत ज़ोर से हुई, जैसे खुद कमरा चौंक गया हो। उसने कैमरा अपने फटे बैग में रखा और बैग को सीने से लगा लिया। मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। उसने बस इतना कहा, "अब मैं सुन रही हूँ। बिना कैमरे के।"
"तू ठीक है?" मैंने टिंकू से पूछा।
"हाँ," उसने कहा। पर उसकी आवाज़ नहीं थी। सिर्फ़ होंठ हिले।
"टिंकू।"
"उस्ताद," उसने कहा, "मेरी माँ को कोई कुछ नहीं करेगा ना?"
मैंने उसका हाथ कसकर पकड़ा।
"नहीं करेगा," मैंने कहा।
"कैसे पता?"
"क्योंकि," मैंने कहा, "अगर करेगा, तो उसे पहले मेरे घर के बाहर गाड़ी खड़ी करनी पड़ेगी। और मेरे घर के बाहर गाड़ी खड़ी होगी, तो पूरी गली उसे देख लेगी। और जब पूरी गली देख लेती है, तो फिर साहब को अपनी सफ़ेद कार धोनी पड़ेगी — क्योंकि हमारी गली की धूल किसी की सफ़ेदी नहीं झेलती।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर डर था, पर डर के पीछे एक छोटी सी हँसी भी आ गई।
"अच्छा," उसने कहा। "तो हम गाड़ी धो देंगे।"
"हाँ," मैंने कहा। "अब बता, बबलू भाई, ऊपर क्या हो रहा है?"
बबलू ने सीढ़ियों की तरफ़ देखा।
"बंसीलाल ऊपर अकेला है," उसने कहा। "मैं जब ऊपर गया, तो वो फाटक पर नहीं था। मैंने आवाज़ दी, तो कोई जवाब नहीं आया। फिर मैंने देखा — साहब के दो आदमी आए हैं। दोनों लकड़ी के जूते पहने हुए हैं। वो उससे चाबी के बारे में पूछ रहे हैं।"
"चाबी?"
"हाँ," बबलू ने कहा। "वो चाबी जो उसने तुझे दी है।"
मेरी जेब में घंटी हिली।
वो चुप नहीं रही। उसने कुछ नहीं कहा, पर उसकी ठंडक मेरे पूरे पैर तक उतर गई। और फिर उसकी आवाज़ आई, बहुत धीमी, बहुत सपाट, जैसे कोई ठंडे लोहे पर उँगली रगड़ रहा हो।
"डर अब बाहर नहीं है," उसने कहा। "डर सीढ़ी पर खड़ा है।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"ऊपर चलना होगा," मैंने कहा।
"पर अंदर?" मीरा ने कहा। "ये काग़ज़? ये कमरा? हम इतनी मेहनत से आए और सिर्फ़ नक़ली माफ़ियों का ढेर मिला?"
मैंने उन काग़ज़ों की तरफ़ देखा।
कुछ गहरा था यहाँ। मैं समझ नहीं पा रहा था, पर मेरे अंदर एक आवाज़ कह रही थी कि ये काग़ज़ बेकार नहीं हैं। कोई इन्हें जमा कर रहा है। कोई इन्हें गिन रहा है। जैसे कोई बच्चा अपनी गलतियों की गिनती करता है, और हर गिनती पर उसे लगता है कि वो सच्चा होता जा रहा है।
"मीरा," मैंने कहा। "इनमें से कुछ काग़ज़ उठा। ऊपर के दस।"
"क्यों?"
"क्योंकि," मैंने कहा, "जिस आदमी के पास इतनी नक़ली माफ़ियाँ हैं, वो कभी एक भी सच्ची से नहीं डरता — यही उसका भ्रम है। और भ्रम का सबसे अच्छा इलाज है, उसकी गिनती।"
मीरा ने काग़ज़ उठाए। पर जैसे ही उसने उन्हें हिलाया, नीचे से एक और काग़ज़ निकला — थोड़ा मोटा, थोड़ा पीला, और उस पर लिखावट अलग थी।
उस पर एक ही लाइन थी, छोटी सी — "माफ़ कर दिया, क्योंकि मजबूरी थी।"
नीचे तारीख़ थी। और हस्ताक्षर की जगह एक आधा अंगूठा।
मैंने वो काग़ज़ मीरा के हाथ से लिया और अपनी जेब में डाल दिया। उसे छूते ही मेरे हाथ में वो चीज़ आई जो मुझे अपने ही घर से मिलती है — पापा की चुप्पी की गंध।
"ये पीछे से आएगा," मैंने कहा। "पहले ऊपर।"
हम दरवाज़े की तरफ़ मुड़े।
पर मेरे पैर वहीं रुक गए।
मैंने एक बार फिर उस चौकोर साफ़ जगह की तरफ़ देखा, जहाँ से बक्सा उठाया गया था। उस जगह के किनारे-किनारे चाक की एक पुरानी लकीर बनी थी — वही लकीर, जो दीवार पर बनी थी और छिपे दरवाज़े तक जाती थी। लकीर यहाँ फ़र्श पर खत्म नहीं होती थी। वो मुड़कर मेज़ की तरफ़ जाती थी, और मेज़ के नीचे जाकर गायब हो जाती थी।
मैंने झुककर मेज़ के नीचे टॉर्च की।
फ़र्श में एक छोटी सी लोहे की कुंडी बनी थी, जैसे कोई ताखा खींचने का मुँह हो। मैंने उँगली लगाई, पर वो ज़ंग में जाम थी। मैंने ज़ोर लगाया, तो कुंडी हिली — और फिर रुक गई। जैसे नीचे कोई चीज़ भारी पड़ी हो और उसे खींचने से मना कर रही हो।
"क्या है?" मीरा ने पूछा।
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "फ़र्श की कुंडी है। बाद में।"
पर मेरे अंदर कुछ कह रहा था — बाद में नहीं। अभी। पर सीढ़ियों पर डर खड़ा था, और बंसीलाल अकेला था, और साहब के दो आदमी उससे चाबी पूछ रहे थे।
मैंने टॉर्च ऊपर की।
मेज़ के ऊपर, दीवार पर, एक छोटा सा ताखा था, जिसमें एक पुरानी कलम रखी थी। कलम की नोक नहीं थी। सिर्फ़ लकड़ी का हत्था बचा था, और नीचे काग़ज़ पर स्याही की एक सूखी बूँद थी। ठीक उसी जगह पर, जहाँ आज कोई नहीं बैठा था, पर कुर्सी हल्की सी सरकी हुई थी।
मीरा ने मेरी नज़र पकड़ी।
"कोई यहाँ था," उसने कहा।
"हाँ," मैंने कहा। "और वो गया नहीं। वो सिर्फ़ वहाँ चला गया जहाँ हम नहीं देख रहे।"
हम बाहर निकले। बबलू अब भी वहीं खड़ा था, दरवाज़े के अंदर, एक कदम पर। उसने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखें कुछ कह रही थीं जो उसके मुँह से नहीं निकल रहा था।
"अंकुश," उसने कहा।
"हाँ।"
"जब ऊपर जाओ," उसने धीरे से कहा, "तो जो सुनोगे, वो सच नहीं लगेगा। और जो देखोगे, वो तुम्हारे नाम पर लिखा होगा।"
मेरे पैर वहीं रुक गए।
"मतलब?"
पर बबलू ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने बस अपना सिर हिलाया, जैसे वो खुद भी इस बात को समझ नहीं पा रहा हो। फिर वो सीढ़ियों की तरफ़ मुड़ा।
"बबलू," मैंने कहा। "तू ऊपर जा रहा है या भाग रहा है?"
वो रुका।
"दोनों," उसने कहा। "और यही फ़र्क़ है मुझमें और तुझमें। तू ऊपर जाएगा, क्योंकि तुझे लगता है कि तू किसी को बचा सकता है। मैं ऊपर जा रहा हूँ, क्योंकि मुझे अब भी लगता है कि कोई मुझे बचा सकता है।"
वो सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। उसके लकड़ी के जूतों की आवाज़ ऊपर जाती रही — टक, टक, टक — और फिर धीमी पड़ गई। फिर बिल्कुल बंद।
मैंने एक बार पीछे मुड़कर उस कमरे को देखा। मेज़, काग़ज़, कील, रस्सी। और वो चौकोर साफ़ जगह, जहाँ से बक्सा उठाया गया था। मुझे लगा कि वो जगह मुझे देख रही है, जैसे खाली पेट देखता है।
टिंकू ने मेरी कलाई खींची।
"उस्ताद," उसने कहा। "वो सीढ़ी पर जो डर खड़ा है — वो कौन है?"
मैंने सीढ़ियों की तरफ़ देखा।
"वो," मैंने कहा, "वही है जो अब तक हमें नहीं मिला।"
मैंने टॉर्च बमैंने टॉर्च बंद कर दी।
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा, हैरान।
"अंधेरा है, उस्ताद।"
"हाँ," मैंने कहा। "पर अब जो चीज़ें बची हैं, वो रोशनी से नहीं दिखेंगी।"
"तो किससे?"
"सुकून से," मैंने कहा। "पर तू सुकून में नहीं है। इसलिएअंधेरे में मैंने अपनी आँखें बंद कीं।
सुनने की कोशिश की। वो आवाज़ जो दरवाज़े के पीछे से आ रही थी — काग़ज़ का पन्ना फर्श पर खिंचने जैसी — अब भी थी, पर धीमी, बहुत धीमी, जैसे कोई बहुत बूढ़ा आदमी बहुत धीरे-धीरे पन्ने पलट रहा हो।
"उस्ताद," टिंकू ने फुसफुसाया। "कुछ दिख नहीं रहा।"
"अंधेरे में कुछ नहीं दिखता," मैंने कहा। "पर सुनाई देता है।"
"तो क्या सुन रहे हो?"
मैंने उसकी तरफ़ मुड़कर देखा, हालाँकि उसका चेहरा भी नहीं दिख रहा था।
"जो अब तक नहीं सुना," मैंने कहा।
मीरा ने अपनी जेब से कुछ निकाला। एक छोटी सी आवाज़ आई — क्लिक जैसी। फिर मुझे एहसास हुआ कि उसने अपना कैमरा बंद कर दिया है।
"क्यों बंद किया?" मैंने पूछा।
"क्योंकि जो आवाज़ आ रही है," उसने धीरे से कहा, "मुझे नहीं लगता कि वो कैमरे के लिए है।"
मैंने सिर हिलाया।
"ठीक सोचा," मैंने कहा। "कुछ चीज़ें अपनी आवाज़ सबको नहीं देतीं। वो चुनती हैं कि कौन सुनेगा।"
टिंकू ने मेरी कलाई पकड़ ली। उसका हाथ छोटा और गरम था, और उँगलियाँ काँप रही थीं।
"उस्ताद," उसने कहा। "मैं डर रहा हूँ।"
"पता है," मैंने कहा।
"तुम्हें नहीं लगता?"
"लगता है," मैंने कहा। "पर डर के साथ चलना आता है। ऐसे चलो कि डर तुम्हारे पीछे हो, आगे नहीं।"
उसने कुछ नहीं कहा, पर मेरी कलाई पकड़ने वाला उसका हाथ थोड़ा और मज़बूत हो गया।
मैंने थोड़ी देर और इंतज़ार किया। मैं चाहता था कि अंधेरा मुझे अपनी आदत डाल दे, मुझे खुद को सुनने दे। पर मेरी आँखों के सामने अब भी सिर्फ़ काला था, और उस काली के अंदर सिर्फ़ वो खिंचती आवाज़ थी।
आख़िरकार मैंने टॉर्च जला दी।
रोशनी निकली और कमरे ने एक झटके में अपना चेहरा दिखा दिया। रजिस्टरों का ढेर वहीं था। टूटी कुर्सियाँ वहीं थीं। और वो चौकोर साफ़ जगह — जहाँ से बक्सा उठाया गया था — उस धूल में ऐसे खुली पड़ी थी जैसे किसी ने दाँत निकालकर मुँह खोल रखा हो।
मैं उसी जगह की तरफ़ बढ़ा।
मीरा मेरे पीछे आई, और टिंकू भी। हमारी परछाइयाँ दीवारों पर हिल रही थीं, और जैसे-जैसे हम आगे बढ़े, वैसे-वैसे परछाइयाँ छोटी होती गईं, फिर एक ही जगह सिमट गईं।
उस चौकोर जगह के पास पहुँचकर मैं रुक गया।
मुझे सिर्फ़ धूल दिख रही थी। धूल जिसने किसी चीज़ का आकार याद रखा था।
"यहाँ कुछ था," मीरा ने कहा।
"हाँ," मैंने कहा।
"क्या?"
"एक बक्सा," मैंने कहा।
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"तुमने देखा?"
"नहीं," मैंने कहा। "पर जगह बोल रही है। ये धूल आकार में चौकोर है। कोई चीज़ इस पर बैठी थी, बहुत दिन तक। और अब वो नहीं है।"
मैंने घुटने के बल बैठकर उस जगह को उँगली से छुआ। धूल मेरे उँगली पर चिपक गई। सूखी, बहुत सूखी, जैसे बरसों से किसी ने उसे हवा से बचाकर रखा हो।
"अंकुश," मीरा ने कहा। "वो बात जो बबलू ने कही थी। बक्सा यहाँ नहीं।"
मैंने सिर हिलाया।
"हाँ," मैंने कहा। "पर मुझे ये समझना है कि वो यहाँ नहीं है, कि वो यहाँ था। दोनों में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ है।"
मैं उठा। मैंने दीवार वाली छिपी अलमारी की तरफ़ देखा, जिसका ताला अब टूटा खुला था। फिर उस बड़ी काली लोहे की आलमारी की तरफ़, जिससे तीन खटखटें आई थीं।
वो अब भी खड़ी थी। चुप। जैसे जानती हो कि उसकी बारी भी आएगी, पर अभी नहीं।
मैं कुछ कहने ही वाला था कि ऊपर से आवाज़ आई।
लकड़ी के जूतों की आवाज़।
टक। टक। टक।
तेज़, हाँफती हुई।
तीनों ने एक साथ ऊपर देखा। सीढ़ियों की तरफ़।
फिर बबलू दरवाज़े पर आकर रुक गया।
वो अंदर नहीं आया। दरवाज़े के चौखट पर ही खड़ा रह गया। उसका एक कदम अंदर था, पर तीन बाहर। उसकी साँस फूली हुई थी, और उसका चेहरा — पसीने से भीगा हुआ, और उस पसीने में काली धूल की लकीरें थीं।
"बबलू भाई?" मैंने कहा। "तू तो ऊपर गया था।"
"गया था," उसने कहा। फिर बात को काटकर, जैसे उसे ज़्यादा नहीं कहना था, "बंसीलाल ऊपर नहीं है।"
"क्या?"
"वहाँ," उसने हाँफते हुए कहा, "उसकी चारपाई पर दो आदमी खड़े थे। लकड़ी के जूते। और बंसीलाल की चारपाई खाली थी।"
टिंकू का हाथ मेरी कलाई पर और कस गया।
मीरा ने फौरन अपनी जेब से कलम निकाली। पर उसने लिखा नहीं।
बबलू ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में अब वो पुरानी चालाकी नहीं थी, बस एक आदमी की थकान थी।
"अंकुश," उसने कहा। "मैंने तुझसे कहा था — बक्सा अब अस्पताल में नहीं है।"
"तो कहाँ है?"
वो चुप रहा। उसकी नज़र एक बार कमरे के कोने की तरफ़ गई, जहाँ अंधेरा सबसे ज़्यादा काला था, फिर वापस मेरे चेहरे पर आई।
"जहाँ सबसे ज़्यादा शोर होता है," उसने कहा, "वहाँ सबसे गहरा सन्नाटा रखा जाता है। ये साहब की आदत है। वो चीज़ें उस जगह रखता है जहाँ कोई ढूँढने की ज़हमत नहीं करता।"
"इसका मतलब?"
"इसका मतलब," उसने कहा, "कि वो बक्सा यहाँ नहीं है। यहाँ सिर्फ़ उसकी जगह है। और उस जगह को देखकर ही साहब को पता चल गया है कि कोई उसे ढूँढ रहा है।"
मेरे भीतर कुछ ठंडा हुआ। वो ठंडक जो गुस्से से पहले आती है।
"तू ये सब मुझे क्यों बता रहा है, बबलू?" मैंने पूछा। "कल तक तू साहब का हाथ था।"
वो हँसा। छोटी, सूखी हँसी।
"क्योंकि," उसने कहा, "आज सुबह साहब ने मेरे घर का पता भी लिया है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"तेरे घर का?"
"मेरे घर का," उसने कहा। "और ये कोई नई बात नहीं है उसके लिए। ये उसकी आदत है। जो लोग साहब के रास्ते में आते हैं, उनके घर के बाहर एक गाड़ी खड़ी हो जाती है। कोई उतरता नहीं। कोई बात नहीं करता। बस खड़ी रहती है। और फिर एक दिन आदमी को अपने ही घर में लगने लगता है कि वो कोई और है।"
टिंकू ने मेरा हाथ और मज़बूती से पकड़ लिया। मैंने उसे देखा। उसका चेहरा पीला पड़ गया था, और उसकी आँखें बड़ी हो गई थीं। उसने कुछ कहना चाहा, पर मुँह खुला रह गया, आवाज़ नहीं निकली।
मीरा ने कैमरा जेब में रख दिया।
"मैं ये रिकॉर्ड नहीं करूँगी," उसने कहा। "ये बात जो तू अभी कह रहा है, ये कैमरे के लिए नहीं है। ये गली के बाहर की बात है।"
बबलू ने उसकी तरफ़ देखा।
"तू समझ गई," उसने कहा।
"मैं पत्रकार हूँ," मीरा ने कहा। "मुझे समझने में देर नहीं लगती। पर मैं ये भी जानती हूँ कि जो बात कोई डरकर कहता है, उसकी आवाज़ कभी पूरी नहीं होती।"
बबलू ने कुछ नहीं कहा। उसने बस अपनी जेब से रूमाल निकाला — सफ़ेद रूमाल, जिस पर गुलाबी दाग अब सूख चुके थे — और अपना माथा पोंछा।
"बंसीलाल ऊपर अकेला है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ अब भारी थी। "वो दो आदमी उससे चाबी के बारे में पूछने आए हैं। कौन सी चाबी, मुझे नहीं पता। पर बंसीलाल कुछ नहीं बोल रहा। वो उनके सामने अपना मुँह नहीं खोल रहा।"
"और तू?" मैंने पूछा। "तू उनसे कैसे बचकर आया?"
"मैं नहीं बचा," उसने कहा। "उन्होंने मुझे देखा और छोड़ दिया। जान-बूझकर।"
"क्यों?"
"ताकि मैं तुम्हें बता दूँ," बबलू ने कहा। "यही उनका तरीक़ा है। वो किसी को मारते नहीं। वो उससे खबर बनवाते हैं।"
मेरी जेब में घंटी ठंडी हो गई। बहुत ठंडी, जैसे बर्फ़ का टुकड़ा।
और फिर उसकी आवाज़ आई — वो आवाज़ जो अब मुझे पहचानती थी, जो मेरी जेब के कपड़े से भी आर-पार आ जाती थी।
"डर अब बाहर नहीं है," घंटी ने कहा।
मैंने उसे जेब में दबाया, पर वो बोलती रही।
"डर सीढ़ी पर खड़ा है," उसने कहा। "और वो तेरे ही कदम गिन रहा है।"
मेरी रीढ़ से एक ठंडी सुई ऊपर उठी। मैंने एक बार सीढ़ियों की तरफ़ देखा — कुछ नहीं दिखा, पर मुझे लगा कि अंधेरे में कोई खड़ा है, बिल्कुल वैसे ही जैसे कोई सीढ़ी की दसवीं पत्थर पर पैर रखकर साँस रोके हो।
"बबलू," मैंने कहा। "तू ऊपर जा और बंसीलाल को बोल कि वो उन दोनों को कुछ न बताए। और तू खुद उनके सामने कुछ न कहना।"
"और अगर वो मुझसे पूछें कि मैं नीचे क्या कर रहा था?"
"तो कह देना," मैंने कहा, "कि तू मुझसे डरकर भाग रहा था।"
बबलू ने एक पल मुझे देखा। फिर उसके चेहरे पर कुछ ऐसा आया जो बहुत दिनों के बाद आया था — लगभग एक मुस्कुराहट।
"ये सच भी है," उसने कहा।
"हाँ," मैंने कहा। "इसीलिए तो कह रहा हूँ। सच जो हो, वो ही बोलना सबसे आसान है।"
वो हँसा। फिर उसने एक कदम पीछे किया — दरवाज़े से बाहर की तरफ़ — और जैसे ही उसका पैर सीढ़ी की पहली पत्थर पर पड़ा, उसका चेहरा फिर बदल गया।
"अंकुश," उसने कहा, और अब उसकी आवाज़ में वो पुरानी चालाकी नहीं थी, बल्कि कुछ और था — जैसे कोई आदमी अपनी आख़िरी बात कह रहा हो।
"क्या?"
"मैंने तुझसे कहा था," उसने कहा, "कि जब ऊपर जाओगे, तो जो सुनोगे वो सच नहीं लगेगा, और जो देखोगे वो तुम्हारे नाम पर लिखा होगा।"
"हाँ," मैंने कहा। "तूने कहा था।"
"अब जब ऊपर जाओ," उसने कहा, "तो ये भी याद रखना — जो सुनोगे, वो तुमसे कहेगा कि वो तुम्हारा है। और जो देखोगे, वो तुमसे कहेगा कि वो तुम्हारा हो चुका है। दोनों झूठ बोलेंगे। पर एक बात सच होगी।"
"कौन सी?"
"ये," उसने कहा। "कि जो तुम्हारे नाम पर लिखा है, वो तुम्हारा नहीं है। वो उसका है जिसने तुम्हारा नाम लिखवाया था। और वो अब भी तुम्हारे नाम का इस्तेमाल कर रहा है, क्योंकि वो जानता है कि तुम्हारा नाम गली में सबसे ज़्यादा बोला जाता है।"
वो सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।
"बबलू!" मैंने पुकारा।
वो रुका, पर पलटा नहीं।
"तू अभी भी मुझे बचाने वाला ढूँढ रहा है?" मैंने पूछा।
"नहीं," उसने कहा। "अब मैं खुद को बचाने का रास्ता ढूँढ रहा हूँ। और शायद वो रास्ता तुझसे ही होकर जाता है।"
वो चला गया।
टक, टक, टक — और फिर आवाज़ धीमी पड़ गई। फिर बंद।
कमरे में सिर्फ़ हम तीन बचे थे। और वो खिंचती आवाज़, जो अब बंद हो गई थी। जैसे कमरे को अंदाज़ा हो गया हो कि अब हम उसकी बात सुनने को तैयार हैं, और उसने अपनी चुप्पी को और गहरा कर लिया।
मैंने घंटी को जेब से निकाला। वो ठंडी थी, पर अब वो काँप नहीं रही थी। वो स्थिर थी। जैसे किसी ने उसे देख लिया हो और वो इंतज़ार कर रही हो कि मैं क्या करता हूँ।
"अंकुश," मीरा ने कहा। "मैं डर गई हूँ।"
उसकी आवाज़ सामान्य थी, और यही सबसे डरावना था। मीरा जब डरती थी, तो उसकी आवाज़ तेज़ हो जाती थी, कड़वी हो जाती थी। अब वो धीमी थी, और उसमें एक ईमानदारी थी जो मुझे चुभ गई।
"मैं भी," मैंने कहा। "पर डर का इलाज सिर्फ़ एक है — सामने जाना।"
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। वो अब भी मेरा हाथ पकड़े हुए था, पर उसकी पकड़ ढीली हो गई थी। उसके होंठ हिल रहे थे, जैसे वो कुछ गिन रहा हो।
"टिंकू," मैंने कहा। "तू क्या कर रहा है?"
"गिन रहा हूँ," उसने कहा।
"क्या?"
"सीढ़ियाँ," उसने कहा। "अट्ठाईस थीं। हमने उतरते वक़्त गिनी थीं। मैं सोच रहा हूँ कि अगर वो दो आदमी ऊपर आए हैं, तो वो भी अट्ठाईस ही उतरेंगे। और अगर वो अट्ठाईस उतरे, तो मुझे पता चल जाएगा कि वो कहाँ हैं।"
मैंने उसे देखा।
"तू," मैंने कहा, "कभी-कभी मुझे हैरान कर देता है।"
"माँ भी यही कहती है," उसने कहा। "पर वो इसलिए कहती है जब मैं स्कूल नहीं जाता।"
मैं फिर हँसा। थोड़ा सा। पर हँसी इस कमरे में अच्छी नहीं लगी। ये कमरा हँसी के लिए नहीं बना था।
"मीरा," मैंने कहा। "कैमरा फिर से निकाल।"
उसने कुछ कहना चाहा, पर मैंने हाथ उठा दिया।
"पर इस बार," मैंने कहा, "जब हम ऊपर जाएँ, तो तू सिर्फ़ तब रिकॉर्ड करना जब मैं कहूँ। और जब मैं न कहूँ, तो बंद कर देना।"
"क्यों?"
"क्योंकि," मैंने कहा, "अगर वो दो आदमी ऊपर हैं, तो वो सबसे पहले यही देखेंगे कि कोई रिकॉर्ड कर रहा है। और अगर उन्हें लगेगा कि हम उनसे डरकर सब छिपा रहे हैं, तो वो ढीले पड़ जाएँगे।"
उसने सिर हिलाया।
"तू," उसने कहा, "अब कहानी की तरह सोचने लगा है।"
"नहीं," मैंने कहा। "मैं बस अब ऐसे सोचने लगा हूँ जैसे साहब सोचता है। और ये सबसे डरावना हिस्सा है।"
मैंने सीढ़ियों की तरफ़ देखा।
अंत में मैंने अपनी जेब को टटोला। घंटी, माचिस, चॉक, टॉर्च। सब कुछ था।
"चल," मैंने कहा। "पर एक बात।"
"क्या?" मीरा ने पूछा।
"अगर ऊपर जाकर हमें कुछ ऐसा दिखे जो हमारे नाम पर लिखा हो," मैंने कहा, "तो कोई भी उसे छूने से पहले मुझे बताएगा। सबने समझा?"
टिंकू ने सिर हिलाया।
मीरा ने सिर हिलाया और अपना कैमरा बैग में रख लिया।
मैंने अपना पहला कदम सीढ़ी पर रखा।
पत्थर ठंडा था। बहुत ठंडा, जैसे उस पर कभी धूप न आई हो। मैंने दूसरा कदम रखा, फिर तीसरा। मेरे पीछे टिंकू और मीरा आ रहे थे — उनके कदमों की आवाज़ मेरे कदमों से थोड़ी देर बाद आती थी, जैसे वो मेरे कदमों को सुनकर अपना कदम रख रहे हों, कि कहीं मैं गिर तो नहीं गया।
आधी सीढ़ियों पर पहुँचकर मैंने रुककर ऊपर देखा।
दरवाज़े से पीली रोशनी की एक पतली लकीर आ रही थी। रोशनी, जो पहले नहीं थी। जब हम नीचे आए थे, तब ऊपर वाला दरवाज़ा बंद था, और उसके नीचे से कुछ नहीं आ रहा था।
अब वो खुला था।
"उस्ताद," टिंकू ने धीरे से कहा। "दरवाज़ा खुला है।"
"दिख रहा है," मैंने कहा।
"हमने उसे बंद नहीं किया था," मीरा ने कहा। "जब हम नीचे आए, तब वो अपने आप बंद हो गया था।"
"पता है," मैंने कहा। "इसलिए तो बबलू ने कहा था — जो सुनोगे वो सच नहीं लगेगा।"
मैंने एक और कदम रखा।
तभी ऊपर से आवाज़ आई। पर ये बबलू की आवाज़ नहीं थी। ये कोई और था। कोई, जो मेरे नाम से बोल रहा था।
"अंकुश यादव," आवाज़ ने कहा। "जगदीश यादव का पोता। ठीक है। आ जाओ। तुम्हारा ही इंतज़ार था।"
मेरे पैर वहीं रुक गए।
टिंकू ने मेरी कलाई पकड़ ली।
मीरा ने कोई आवाज़ नहीं की, पर मैंने सुना कि उसने साँस रोक ली।
और मेरी जेब में घंटी ने, बिना बजे, बहुत धीरे से कहा —
"जो नाम उसने लिया, वो तेरा है। पर जो बुला रहा है, वो जानता है कि तू आएगा। इसलिए वो तेरा नाम जानता है और तेरे दादा का भी। अब सोच — उसे ये सब किसने बताया?"
मैंने आँखें बंद कीं।
"किसी ने नहीं," मैंने धीरे से कहा। "उसने देखा है। यानी वो उस काग़ज़ पर है, जिस पर मेरा नाम लिखा है।"
"हाँ," घंटी ने कहा। "और अब वो तुझे उसी काग़ज़ के बहाने अंदर बुला रहा है।"
मैंने साँस ली।
"तो चल," मैंने कहा। "जब काग़ज़ ही बुला रहा है, तो काग़ज़ से मिल ही लें।"
मैंने आख़िरी सीढ़ी पर कदम रखा, और ऊपर की तरफ़ बढ़ने लगा।
मेरे पीछे टिंकू ने मेरा हाथ और कसकर पकड़ लिया। और मेरे पीछे मीरा के कदमों की आवाज़ आई — धीमी, पर रुकी हुई नहीं।
मुझे नहीं पता था कि ऊपर क्या है। मुझे सिर्फ़ इतना पता था कि जो भी है, वो मेरे नाम पर लिखा हुआ है — और मुझे उसे पढ़ना है, चाहे वो मुझे कितना भी काटे।
क्योंकि मेरे दादा ने एक बार कहा था — जो चीज़ तेरे नाम पर लिखी हो, उसे तूने खुद लिखा हो या न लिखा हो, तेरे ही नाम पर लौटकर आती है।
और आज वो मेरे नाम पर लौटकर आई थी।
॥
आख़िरी सीढ़ी पर पैर रखते ही मुझे लगा कि हवा बदल गई। नीचे तहखाने की हवा में जो सीलन थी, जो दबी हुई सड़ांध थी, वो ऊपर आते ही छूमंतर हो गई। ऊपर सीढ़ी के मुँह पर सिर्फ़ मिट्टी की गंध थी, धूप में तपी हुई मिट्टी की, और उसमें थोड़ी-थोड़ी सी उबटन लगी हुई चाय की महक। पीछे कहीं कोई चाय बना रहा था, जैसे दुनिया अपने हिसाब से चल रही हो, जैसे नीचे जो कुछ हुआ, वो हुआ ही न हो।
पर जैसे ही मेरा पैर सीढ़ी के आख़िरी पत्थर पर पड़ा, मेरी आँखों ने वो देखा जो मैं नहीं देखना चाहता था।
अस्पताल का पिछला बरामदा। वो लंबा, टूटी बेंचों वाला, धूल भरा बरामदा जहाँ से पिछली दीवार दिखती है। और वहाँ — ठीक बंसीलाल की चारपाई के पास — दो आदमी खड़े थे।
सफ़ेद कुर्ता। सफ़ेद धोती। कंधे पर मोटा सफ़ेद गमछा। दोनों एक जैसे, जैसे किसी दुकान से एक ही थान के कपड़े से कटे हों।
और उनके बीच में, चारपाई के कोने पर, बंसीलाल बैठा था। उसकी गमछा उतर चुका था, कंधों पर पड़ा था, और उसके दोनों हाथ उसकी गोद में थे — कसकर भींचे हुए, जैसे वो अपनी ही उँगलियों को पकड़कर बैठा हो, कि कहीं कोई उँगली उठाकर कुछ कह न दे।
उसका चेहरा सफ़ेद था। बिल्कुल सफ़ेद, जैसे चूने की दीवार को पत्थर से रगड़ दिया गया हो।
एक सफ़ेद कुर्ते वाला झुका हुआ था, बंसीलाल के ठीक सामने, और उसकी उँगली उसके सीने की तरफ़ थी। उसकी आवाज़ मीठी थी। इतनी मीठी कि मेरी जीभ पर कड़वाहट आ गई।
"बंसीलाल जी," वो कह रहा था, "हम तुम्हारे दुश्मन नहीं हैं। तुम तीस साल से यहाँ हो। तीस साल। सोचो, तुमसे ज़्यादा इस अस्पताल को कौन जानता है? हम सिर्फ़ एक चाबी माँग रहे हैं। एक छोटी सी चाबी। जो तुम्हारी है भी नहीं — जो तुम्हें मिली थी, सिर्फ़ रखने को।"
दूसरा, जो सीधा खड़ा था, बोला नहीं। वो सिर्फ़ हाथ पीछे बाँधे खड़ा था और बंसीलाल को ऐसे देख रहा था जैसे कोई तराज़ू वाला बोरी को देखता है — कि इस बोरी में कितना दाना निकलेगा।
बंसीलाल ने कुछ कहने की कोशिश की। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। सिर्फ़ एक खुरखुरी, सूखी साँस निकली, जैसे पुराने पंप में पानी सूखने पर आवाज़ आती है।
उसकी नज़र उठी। मेरे ऊपर पड़ी।
और उसकी आँखों में जो था, वो मैंने पहली बार देखा। बंसीलाल — तीस साल का चौकीदार, जो दिन में दो बार मुझे बताता था कि इस गली का पानी इतना ठंडा है कि बरसात में भी प्यास नहीं बुझती — उसकी आँखों में इतना डर था कि मुझे लगा कि किसी ने उसके अंदर के बंसीलाल को कुएँ में धकेल दिया है।
"ये लो," सफ़ेद कुर्ते वाले ने फिर कहा, "मैं तुम्हें ये कहता हूँ। चाबी दे दो, और हम भूल जाओ कि हम कभी आए थे। घर जाओ, चाय पियो, बेटी की शादी की तैयारी करो। अगले महीने है ना? मुझे पता है। मैं हर चीज़ जानता हूँ, बंसीलाल। यही तो मेरा काम है।"
बंसीलाल ने कुछ नहीं कहा।
तभी मैंने आगे कदम बढ़ाया।
"चाबी तो मेरे पास है।"
मेरी आवाज़ मुझे भी अजीब लगी। इतनी साफ़, इतनी ठंडी। जैसे कोई और बोल रहा हो, और मैं सिर्फ़ सुन रहा हूँ।
दोनों सफ़ेद कुर्ते वाले घूमे। उनकी गर्दन एक साथ घूमी, इतने तालमेल से कि लगा कोई रिहर्सल करके आया है।
मैंने टिंकू का हाथ अपनी कलाई से धीरे से छुड़ाया और आगे बढ़ा। मीरा मेरे पीछे थी, और मैं सुन सकता था कि उसने अपना बैग खोला — वो खोल जिसकी चेन चार बार टूट चुकी है — और कैमरा निकाला।
"अरे," मैंने कहा, जैसे कोई पुराना दोस्त मिल गया हो, "तुम लोग इतनी दूर से आए हो, चाय तक नहीं पी। ये क्या बात हुई?"
एक सफ़ेद कुर्ते वाले ने मुझे देखा। उसकी आँखों में कुछ नहीं था — गुस्सा नहीं, हैरानी नहीं, सिर्फ़ एक पतली सी लकीर, जैसे उसने मेरी शक्ल देखकर अपने दिमाग़ में कोई पन्ना पलटा हो और फिर बंद कर दिया हो।
"तुम अंकुश यादव हो," उसने कहा। और ये सवाल नहीं था। ये बयान था। जैसे कोई काग़ज़ पढ़कर बता रहा हो।
"हाँ," मैंने कहा। "और तुम्हारे काग़ज़ पर मेरा नाम लिखा है, ये मुझे पता है। बस एक बात साफ़ कर लो — मेरा नाम तुमने लिखा है या किसी और ने लिखवाया है?"
उसने मेरी बात सुनी, फिर बंसीलाल की तरफ़ मुड़ा, जैसे मैं बोला ही न हो।
"बंसीलाल जी, आख़िरी बार।"
"नहीं," मैंने कहा। "आख़िरी बार मैं कहूँगा।"
और मैं उनके बीच में खड़ा हो गया। सीधा। मेरी पीठ बंसीलाल की तरफ़ थी और मेरा सीना उन दोनों की तरफ़।
अब मैं आस-पास नहीं देख रहा था। मैं आगे देख रहा था।
मैंने अपना हाथ जेब में डाला और वो घंटी, जो अब भी मेरी जेब में ठंडी पड़ी थी, उँगलियों में पकड़ी। मैंने उसे बजाया नहीं। मैंने सिर्फ़ उसे पकड़ा — पीतल की वो गोलाई, वो जानी-पहचानी परत, वो तीन छोटे गड्ढे जो मेरे अँगूठे की आदत बन चुके हैं।
"देखो," मैंने कहा, "तुम्हारी बात सुन ली। अब मेरी सुनो। ये चाबी, जो तुम्हें चाहिए — ये तुम्हें नहीं मिलेगी। इसलिए नहीं कि हम तुमसे लड़ेंगे। इसलिए कि अब यहाँ का हिसाब अकेला कोई नहीं रखेगा।"
"हिसाब?" दूसरे सफ़ेद कुर्ते वाले ने पहली बार बोला। उसकी आवाज़ पहले वाले से भारी थी, जैसे किसी पुराने दरवाज़े की चरचराहट में शब्द डाल दिए गए हों।
"हाँ, हिसाब," मैंने कहा। "तीस साल का हिसाब, पाँच साल का हिसाब, बत्तीस साल का हिसाब। और ये सब — मेरे अकेले का नहीं है। जिस गली में तुम आए हो, वहाँ का है।"
तभी मेरे पीछे मीरा की आवाज़ आई।
"कैमरा ऑन है।"
मैंने पलटकर देखा। मीरा दोनों हाथों से अपना छोटा कैमरा उठाए खड़ी थी, और कैमरे की लाल बत्ती जल रही थी — वो छोटी, गोल, चुभती हुई लाल बत्ती।
"देखिए," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो कड़क थी जो उस वक़्त आती है जब वो सच में गुस्से में होती है, "ये नूर अस्पताल का पिछला बरामदा है। ये सार्वजनिक जगह है। यहाँ आने-जाने की, साँस लेने की, इलाज कराने की जगह है। और यहाँ जो पूछताछ होगी — वो सबके सामने होगी। मैं बंद कमरे में बात नहीं करती। मैं यही कैमरा लेकर खड़ी हूँ, और जो कुछ भी आज इस बरामदे में बोला जाएगा, वो मेरे चैनल पर जाएगा — बिना काटा, बिना छिपाया।"
दोनों सफ़ेद कुर्ते वाले कैमरे की तरफ़ देखने लगे।
ये वो पल था जब मुझे याद आया कि अगर तुम दिखावे से डरते हो, तो तुम्हारे पास देखने को कुछ नहीं है। पर अगर तुम्हारे पास दिखाने की शक्ति है, तो तुम्हारी सबसे बड़ी ताक़त एक कैमरा है।
पहला सफ़ेद कुर्ता वाला हिला नहीं। दूसरा ज़रूर हिला — एक छोटी सी हरकत, गर्दन के नीचे, जैसे कोई चीज़ उसकी शर्ट के कॉलर में धंस गई हो।
"ये क्या बकवास है?" पहले वाले ने कहा।
"ये बकवास नहीं है," मीरा ने कहा। "ये सवाल है। तुम्हें क्या चाहिए, यहाँ से क्यों खड़े हो, किसके कहने पर खड़े हो, और ये चाबी तुम्हें क्यों चाहिए — सब कैमरे में बोलो।"
दोनों आदमियों ने एक-दूसरे को देखा।
और मैंने देखा — वो देखा जो कुछ भी देखता है। उनके बीच एक आँख का इशारा चला। दो सेकंड से भी कम का। पहले वाले ने आँख से कुछ कहा, दूसरे ने होंठ से नहीं, पलक से कुछ जवाब दिया।
फिर पहला वाला एक कदम आगे आया और उसने वो कहा जो हर वो आदमी कहता है जो जानता भी है कि यहाँ मुझे हार मिली है, पर हार माननी नहीं है।
"साहब का नाम बेकार मत लेना।"
उसने ये धीरे से कहा। सिर्फ़ मेरे लिए। मेरे कान के पास, इतना पास आकर कि मैं उसकी साँस में मिट्टी और तेल जैसी कोई गंध सूँघ सकूँ।
"वो नाम तुम्हें पहले तुम्हारे काम नहीं आया," मैंने भी धीरे से कहा, सिर्फ़ उसके लिए, "और आज भी नहीं आएगा।"
"हम देखेंगे," उसने कहा।
और फिर वो हट गया। दूसरे वाले ने भी कदम पीछे रखे। उन्होंने बंसीलाल की तरफ़ आख़िरी बार देखा — कोई धमकी नहीं, कोई लालच नहीं, सिर्फ़ एक पल के लिए उसके चेहरे को देखा, जैसे किसी तस्वीर को दिमाग़ में बंद कर रहे हों — और फिर वो गली के मुँह की तरफ़ बढ़ गए।
उनके जाने की आवाज़ नहीं आई। सफ़ेद धोती के कोने हवा में थोड़े हिले, वो इतनी सहजता से चले जैसे वो कभी आए ही न हों, रास्ते में किसी दरवाज़े को हाथ नहीं लगाया, किसी चीज़ को छुआ नहीं, कोई निशान नहीं छोड़ा।
जब वो गली के मोड़ पर मुड़े और गायब हुए, तब मैंने अपनी साँस को बाहर जाने दिया।
और तभी मेरे पीछे से एक आवाज़ आई।
बंसीलाल रो रहा था।
बिना आवाज़ के रो रहा था। उसका शरीर काँप रहा था, पर उसके मुँह से कोई आवाज़ नहीं निकल रही थी — जैसे उसने सालों पहले सीख लिया हो कि रोना भी एक चुप्पी है।
उसने अपना हाथ बढ़ाया और मेरी कलाई पकड़ ली।
उसकी पकड़ मज़बूत थी। काम करने वाले आदमी की पकड़ — जिसने तीस साल तक बाल्टियाँ उठाई हों, सीढ़ियाँ चढ़ी हों, बोरियाँ खींची हों।
"बेटा," उसने कहा। उसकी आवाज़ रूखी थी, फटी हुई। "बेटा, मैंने आज तक किसी से कुछ नहीं छिपाया। नौकरी में, घर में, कहीं। मैं चौकीदार हूँ, मेरा काम पहरा देना है। पर आज…"
"आज कुछ नहीं हुआ," मैंने कहा। "तुमने कुछ नहीं छिपाया। तुम गलत नहीं हो।"
"मैं गलत नहीं हूँ," उसने दोहराया, जैसे ये बात उसे मेरे मुँह से सुननी थी। "मैं गलत नहीं हूँ।"
वो उठा। धीरे, पर उठा। उसने अपना गमछा उठाया और मुँह पोंछा। फिर वो घूमा और मेरे सामने सीधा खड़ा हो गया।
"मेरे पास एक चीज़ है," उसने कहा।
"क्या?"
"आज सुबह जब तुम नीचे गए थे, मैं ऊपर बैठा था। मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने सोचा — बंसीलाल, पंद्रह साल से तूने ये बात नहीं बताई, आज मत बता। पर जब वो दोनों आए, तब भी मैंने नहीं बताया। तब मैं सिर्फ़ डरा हुआ था। और अभी…"
उसने अपना हाथ अपनी कमीज़ की जेब में डाला।
वो पुरानी, फटी कमीज़ थी — काली नहीं, सफ़ेद कभी रही होगी, अब हल्की पीली। जेब का कोना एक तरफ़ से सिल गया था, मोटे सफ़ेद धागे से।
उसने उसमें से एक माचिस की डिब्बी निकाली।
छोटी, पुरानी, घिसी हुई। ऊपर का काग़ज़ घुल गया था, कोना मुड़ा हुआ, और उस पर माचिस का बचा हुआ चित्र अधूरा था — सिर्फ़ आधा लाल कोना बचा था।
मैंने उसे देखा।
मैंने उसे देखकर सोचा — ये माचिस की डिब्बी कैसे? और फिर मेरी नज़र उसके हाथ पर गई, जो काँप रहा था, और मैं समझ गया कि ये डिब्बा बंद है क्योंकि इसे पंद्रह साल से खोला नहीं गया।
"इसे खोलो," मैंने कहा।
"मेरे हाथ काँप रहे हैं," उसने कहा।
"कोई बात नहीं," मैंने कहा। "मैं पकड़ता हूँ।"
मैंने अपने दोनों हाथ फैलाए। उसने डिब्बा मेरी हथेली पर रखा। मैंने उसे अपनी उँगलियों से खोला — धीरे से, जैसे पुराने दराज़ को खींचते हैं, कि कहीं टूट न जाए।
अंदर कुछ नहीं था। सिर्फ़ एक छोर से कुछ बचा हुआ — एक काग़ज़ का मुड़ा हुआ टुकड़ा, जिसकी सतह अब काली पड़ गई थी, और उसे देखकर लगा कि इसे किसी ने किसी ऐसी जगह रखा था जहाँ उसे कोई न देख सके — जैसे माचिस की डिब्बी में सबसे सुरक्षित जगह।
मैंने वो काग़ज़ निकाला।
मेरी उँगलियों में वो पहले ही आधा टूट चुका था — लगभग एक इंच चौड़ा, दो इंच लंबा, एक कोना फटा हुआ।
मैंने उसे खोला।
पीला काग़ज़। बहुत पुराना। हाथ से लिखा। नीली स्याही, अब ज़र्द पड़ चुकी।
और उस पर वो नाम लिखा था जिसे मैंने पहली बार देखा होता तो कुछ भी न समझता। पर मैंने अब उसे दो बार पढ़ा था — एक बार अपनी दादी के हाथ की लिखाई में, और एक बार मीरा के बताए हुए रास्ते पर।
जगदीश यादव।
मेरे दादा का नाम।
मेरा हाथ हवा में रुक गया।
नीचे के तहखाने में वो लोहे का बक्सा, जिसमें पीला दान-काग़ज़ मिला था, उस पर भी यही नाम था। पर वहाँ मेरे पास वक़्त नहीं था। वहाँ दीवार से खटखटें आ रही थीं, टिंकू डरा हुआ था, मीरा कैमरा उठाए खड़ी थी। वहाँ मैंने उसे देखा, पढ़ा, और आगे बढ़ गया।
अब यहाँ खड़े-खड़े, इस छोटे से काग़ज़ के टुकड़े को देखकर, पहली बार मेरे अंदर कुछ ऐसा टूटा जो शब्द नहीं था।
वो मेरे दादा थे।
मैं उन्हें कभी नहीं जानता था। मैंने उनकी आवाज़ कभी नहीं सुनी थी। मुझे पता था कि उनकी साइकिल थी, घंटी थी, एक दुकान थी जो अब मेरी है। और मुझे पता था कि वो पच्चीस साल पहले बुखार में चल बसे, दवा देर से आई।
बस इतना। मेरे पास उनका यही हिस्सा था।
पर अब…
मैंने वो काग़ज़ फैलाया और पढ़ा — जितना पढ़ा जा सकता था। लिखाई अधूरी थी। ऊपर का हिस्सा कटा हुआ था। पर नीचे की तीन लाइनें साफ़ थीं।
और मैंने उन्हें पढ़ा।
"यह ज़मीन इलाज के लिए है। इलाज कभी बंद नहीं होगा। जो बंद करेगा — उसका हिस्सा खुद बंद हो जाएगा।"
उसके नीचे, उसी नीली स्याही में, एक और छोटी लाइन थी, जो काट दी गई थी किसी ने। मैं सिर्फ़ दो अक्षर पढ़ पाया — "शर्त…"
और उसके नीचे दादा का अंगूठा। लाल स्याही में, उतरा हुआ, धुँधला। पर था। साफ़। जगदीश यादव का अंगूठा।
और उस अंगूठे के ऊपर वो नाम लिखा था जो मुझे अब ज़िंदगी भर याद रहेगा।
मैंने काग़ज़ को थोड़ा और करीब लाकर देखा।
तभी टिंकू ने कहा, "उस्ताद, आपका हाथ काँप रहा है।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि सच यही था। मेरा हाथ काँप रहा था। और मुझे काँपने की आदत नहीं थी। मैं गली की तमाम मशीनों को काँपते हुए ठीक किया था, पर अपना हाथ कभी काँपता हुआ नहीं देखा था।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसने मेरे चेहरे को देखा। और चूँकि वो मीरा है, उसने कुछ नहीं पूछा। वो चुपचाप मेरे पास आई, मेरे कंधे के पास खड़ी हो गई, और उसने भी वो काग़ज़ देखा।
बंसीलाल मेरे सामने खड़ा था, हाथ जोड़े, आँखें नीची किए।
"यह मेरे पास पंद्रह साल से है," उसने कहा। "मैंने इसे कभी नहीं पढ़ा। मैंने पढ़ाई नहीं की है ज़्यादा। पर एक बार किसी को दिखाया था — एक आदमी को जो तीन साल पहले अस्पताल में दवा लेने आया था। उसने पढ़कर कहा कि ये किसी की ज़मीन का काग़ज़ है। और मैं उसे डरकर संदूक में रख दिया। फिर उसी रात मैंने सोचा — अगर ये ज़मीन का काग़ज़ है, तो ये किसी के काम आ सकता है। और फिर मैंने इसे माचिस के डिब्बे में डाल दिया। क्योंकि माचिस के डिब्बे कोई नहीं खोजता।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में आँसू थे, पर वो अब रोना नहीं चाहता था। वो अपनी बात पूरी करना चाहता था, जैसे पंद्रह साल की चुप्पी का कोई बोझ अब उसके सीने पर नहीं रहना चाहिए।
"तुमने इसे क्यों नहीं दिया किसी को?" मैंने पूछा। "कोई भी होता — डॉक्टर इसरानी, गली के लोग, किसी को?"
"क्योंकि मैं डरता था," उसने सीधा कहा। "यही सच है। अगर मैंने ये किसी को दिया और साहब को पता चल गया — तो मेरी नौकरी जाती, मेरी बेटी की शादी रुक जाती। और मैं डरता था कि अगर मैंने इसे किसी को दिया और वो भी कुछ न कर पाया — तो ये काग़ज़ मेरे हाथ से निकल जाता और ये ज़मीन किसी और के हाथ में। तो मैंने सोचा — इसे मेरे पास ही रहने दो। जब वक़्त आएगा, तब निकलेगा। और मैंने यही सोचकर पंद्रह साल बिता दिए।"
मेरे अंदर कुछ ऐसा हिला जो नाराज़ी नहीं थी। ये कुछ और था। इसे मैं नाम नहीं देना चाहता था, पर मैं जानता था — ये वही डर था जो मेरे पापा के अंदर था। जो बबलू के अंदर था। जो हर उस आदमी के अंदर था जिसने सच देखा था पर सच बोलने से डरा था।
मैंने एक लंबी साँस ली।
"बंसीलाल जी," मैंने कहा, "तुमने ये काग़ज़ नहीं छिपाया। तुमने इसे बचाया है। अगर तुमने इसे पंद्रह साल पहले फाड़ दिया होता, या जला दिया होता, तो आज मुझे अपने दादा का हाथ नहीं दिखता।"
उसने मेरी तरफ़ देखा और फिर उसका मुँह फट गया — रोने का वो पुराना तरीक़ा, जिसमें आवाज़ नहीं आती, सिर्फ़ कंधे हिलते हैं।
मीरा ने अपना कैमरा ऑफ किया। उसने मुझे देखा।
"ये बाहर जाएगा?" मैंने पूछा।
"सिर्फ़ तेरी मर्ज़ी से," उसने कहा। "मैंने इसे ऐसे रिकॉर्ड नहीं किया कि आज सबको दिखा दूँ। मैंने इसे सबूत के लिए रिकॉर्ड किया है।"
"तो ठीक है," मैंने कहा। "अभी नहीं।"
मैंने काग़ज़ को मोड़ा — बहुत धीरे, इतना धीरे जैसे कोई किसी चिड़िया के अंडे को उठा रहा हो — और अपनी कमीज़ की अंदरूनी जेब में रखा, घंटी के ठीक बगल में।
और तभी मुझे याद आया।
"रुको," मैंने कहा।
मैंने घंटी निकाली। उसे हथेली पर रखा।
और फिर मैंने उसे वो काग़ज़ दिखाया।
थोड़ी देर कुछ नहीं हुआ। सिर्फ़ सन्नाटा। पर वो सन्नाटा जिसमें तुम अपनी ही साँस सुनते हो।
फिर घंटी ने कहा — धीमे से, रूखी आवाज़ में, जैसे कोई पुराना आदमी बहुत दूर से बोल रहा हो:
"इसे पढ़ा। उसने बोला था। बात पूरी नहीं हुई।"
"किसने बोला था?" मैंने पूछा।
"तेरे दादा ने। ये आख़िरी काग़ज़ नहीं। आख़िरी काग़ज़ वो है जिसे वो उठाकर नहीं जा सके।"
मैंने घंटी को देखा।
"मतलब?"
"इस टुकड़े के चारों तरफ़ जो था," घंटी ने कहा, "वो अब किसी और के हाथ में है। ये टुकड़ा सिर्फ़ उँगली है। हाथ कोई और है।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो भी मुझे देख रही थी।
"तो असली काग़ज़," मीरा ने धीरे से कहा, "ये टुकड़ा नहीं। ये टुकड़ा उस असली काग़ज़ का हिस्सा है।"
"हाँ," घंटी ने कहा। "और जो असली काग़ज़ है, वो इस टुकड़े को अपने पास बुला रहा है। टुकड़ा कहाँ जाएगा?"
मैंने कुछ नहीं कहा।
मेरे अंदर कुछ हिला। मुझे समझ आया — अगर ये टुकड़ा असली दान-पत्र का हिस्सा है, तो कैसे इस टुकड़े पर सिर्फ़ दादा का नाम और शर्त है? बाक़ी नाम कहाँ गए?
और फिर बंसीलाल ने वो कहा जो मेरी सोच का जवाब था — वो शब्द जो उसने दबी आवाज़ में बोले, पर जो अस्पताल के पूरे बरामदे में गूँज गए।
"असली पन्ना साहब की पीली फाइल में है। और वो फाइल कल रात तक अस्पताल से बाहर जाने वाली है।"
मैंने अपना हाथ रोक लिया।
"तुम्हें कैसे पता?"
"सुबह," वो बोला, "मैं चारपाई पर बैठा था। सामने अस्पताल की नई पट्टी लगी थी। तभी एक टेम्पो आया। उसमें से मनोज उतरा, वो जो काग़ज़ लाया था और फिर गायब हो गया। उसने कहा कि साहब का हुक्म है — पीला फाइल बाक़ी काग़ज़ों से अलग निकालेगा, उसकी नकल नहीं बनेगी, उसकी फोटो नहीं बनेगी, और उसे कल रात बारह बजे से पहले अस्पताल से बाहर पहुँचाना है।"
"कल रात," मैंने दोहराया। "कल रात यानी आज रात।"
"हाँ," उसने कहा। "आज रात।"
मेरे अंदर कुछ चटका।
मीरा ने अपनी कलाई पर बँधी पापा की घड़ी देखी। वो घड़ी नहीं थी — वो मीरा के पापा की घड़ी थी, जो टूटी हुई थी, पर आज सुबह मीरा ने कहा था कि उसने उसे ठीक कराया है और अब सही वक़्त दिखाती है। उसने देखा और उसका चेहरा कस गया।
"अभी चार बजकर सैंतालीस मिनट हुए हैं," उसने कहा।
मैंने मीरा को देखा।
"आज रात तक मतलब सात-आठ घंटे," मैंने कहा। "और वो फाइल किसके पास है? कहाँ है?"
बंसीलाल ने अपना सिर हिलाया।
"मुझे नहीं पता," उसने कहा। "पर एक बात जानता हूँ। मनोज जब आया था, वो अस्पताल के मुख्य दफ़्तर में गया था — टंकी के नीचे वाला कमरा, जहाँ डॉक्टर इसरानी बैठते हैं। वहाँ एक हरी अलमारी है, जिसके ऊपर पुराने काग़ज़ों के बंडल रखे हैं। और वो फाइल आज सुबह वहाँ नहीं थी।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"तो कहाँ है?"
बंसीलाल ने कुछ कहना चाहा, फिर रुक गया, फिर अपने दोनों हाथ जोड़ लिए।
"एक बात है," उसने कहा। "पर उसके लिए तुम्हें मेरी एक बात माननी पड़ेगी।"
"कहो।"
"अगर तुम उस फाइल को लाने निकलो — तो तुम मेरे पास से जाओगे। अस्पताल की पिछली दीवार के साथ। वो रास्ता संकरा है, पर उस पर कोई नहीं आता जाता। मैं तीस साल से वहाँ से किसी को नहीं जाने दिया। आज तुम जाओगे।"
"क्यों?"
"क्योंकि जो आज रात आएगा," उसने धीरे से कहा, "वो आगे के दरवाज़े से आएगा। और अगर तुम आगे से गए, तो वो तुम्हें देख लेगा।"
मैंने उसकी आँखों में देखा।
"बंसीलाल जी," मैंने कहा, "तुमने ये सब इतने साल छिपाया। अब तुम खुलकर क्यों बोल रहे हो?"
वो हँसा — एक छोटी सी, टूटी हुई हँसी।
"क्योंकि तुमने वो किया जो मैं पंद्रह साल से नहीं कर पाया। तुमने चाबी देने से मना किया, जबकि तुम्हारे पास उनके जैसे दो आदमी आए थे। और मैं जानता हूँ कि तुमने क्यों किया — क्योंकि तुम्हारे पास कोई डरने का कारण नहीं था, और मेरे पास था। बेटी की शादी, नौकरी, बूढ़ी बीवी की दवा। पर तुमने देखा कि फर्क क्या है?"
"क्या?"
"तुम्हारे पास भी दवा का कारण था," उसने कहा। "तुम्हारी माँ. और तुमने फिर भी मना किया।"
मैं कुछ नहीं बोला।
क्योंकि अब मेरे पास कहने को कुछ नहीं था।
टिंकू ने मेरे हाथ को फिर पकड़ा। इस बार उसने धीरे से पकड़ा।
"उस्ताद," उसने कहा, "हम फाइल लाएँगे ना?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"हम सब लाएँगे," मैंने कहा। "यही तो हमारा काम है।"
मैंने अपनी जेब को टटोला। घंटी, माचिस, चॉक, टॉर्च, दादा का काग़ज़। और अब एक और चीज़ — बंसीलाल की उस पुरानी माचिस की डिब्बी, जिसे मैंने अपनी जेब में रख लिया था, क्योंकि ये डिब्बी अब वैसी नहीं थी। अब ये डिब्बी एक पुरानी जगह थी, जहाँ से निकला काग़ज़ अब मेरी जेब में था — और डिब्बी उस काग़ज़ की गवाह थी, किसी और नहीं।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"तुम्हारे पास रज़ा सलीम का नंबर है?"
"हाँ।"
"कल दस बजे वो रजिस्टर ला रहा है। पर आज रात बारह बजे कुछ और होगा। और हमें उससे पहले फाइल निकालनी है।"
मीरा ने सिर हिलाया।
"तो अब क्या?" उसने पूछा।
मैंने एक पल सोचा। फिर मैंने बंसीलाल की तरफ़ देखा।
"तुम्हारे पास कोई जगह है जहाँ हम बैठ सकें? ऐसी जगह जहाँ से पिछली दीवार का रास्ता दिखे, पर दिखे भी नहीं?"
बंसीलाल ने सोचा।
"पीछे वाला बरामदा," उसने कहा। "वहाँ से दिखता है। और वहाँ से कोई नहीं देखता क्योंकि वहाँ दवा की खिड़की है, सब वहीं ताकते हैं। पर उसके पीछे एक कोना है — जहाँ सीढ़ी के नीचे पुराने डिब्बे रखे हैं। वहाँ से पूरी दीवार दिखती है।"
"तो चलो," मैंने कहा।
हम पलटे।
तभी बंसीलाल ने मेरा हाथ फिर पकड़ा।
"बेटा," उसने कहा, "एक बात और। आज मैंने तुम्हें जो काग़ज़ दिया… वो पूरा नहीं है। पर जो असली पन्ना है — उस पर सिर्फ़ तुम्हारे दादा का नाम नहीं है। सात नाम हैं। और सातों में से एक आज भी ज़िंदा है।"
मैं रुक गया।
"कौन?"
"यही तो मैं नहीं जानता," उसने कहा। "मैं पढ़ नहीं पाया। पर मनोज ने उस दिन टेम्पो में बैठे-बैठे अपने आदमी से एक नाम लिया था। उसने सिर्फ़ एक नाम लिया। और मैंने सुना — हकीम।"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
"हकीम," मैंने धीरे से दोहराया।
"हाँ," बंसीलाल ने कहा। "पर वो हकीम कौन है, ये मुझे नहीं पता।"
मैंने घंटी को हथेली पर पकड़ा।
"घंटी," मैंने धीरे से कहा, "सुन रही है?"
"हाँ," घंटी ने कहा। "हकीम अली का नाम। पर हकीम अली तो मर चुका। तो ये दूसरा हकीम है। और जो दूसरा हकीम है, वो उसी काग़ज़ पर है — उसी नाम के साथ जो तुझे अभी तक नहीं मिला।"
मैंने गहरी साँस ली।
"तो चल," मैंने कहा। "पहले फाइल, फिर हकीम।"
और मैं पलटा।
पर जब मैं पलटा, तब मेरी नज़र अस्पताल की पिछली दीवार पर पड़ी। और मैंने वहाँ कुछ देखा — जो अभी तक मैंने नहीं देखा था।
दीवार पर एक नया बोर्ड लगा था। पीला, बड़ा। और उस पर साफ़ शब्दों में लिखा था — "भारद्वाज कंस्ट्रक्शन। अस्पताल के काम का आख़िरी दिन। तारीख़ — कल।"
मेरा दिल धक्क से रह गया।
"बंसीलाल," मैंने कहा, "ये बोर्ड कब लगा?"
वो मेरी नज़र से देखने लगा। फिर उसका चेहरा फिर सफ़ेद पड़ गया।
"आज सुबह," उसने कहा। "मैंने इसे पहले नहीं देखा। पर ये अभी लगा है।"
और मैंने देखा — बोर्ड के नीचे, ज़मीन पर, अभी भी ताज़ा सीमेंट के छींटे थे।
किसी ने इसे अभी लगाया था। हमारे नीचे होने के दौरान।
मेरी जेब में घंटी ने कहा —
"अब सवाल ये नहीं कि कल क्या होगा। सवाल ये है कि आज रात से पहले तुझे क्या करना है।"
मैंने घंटी को जेब में रखा।
"मीरा," मैंने कहा। "तुम्हारी कार स्टेशन पर है ना?"
"नहीं," उसने कहा। "मैं पैदल आई हूँ।"
"तो अभी जाओ और ले आओ।"
"क्यों?"
"क्योंकि आज रात हमें कुछ साथ ले जाना पड़ेगा। और मुझे नहीं लगता कि वो कुछ गली की साइकिल पर आएगा।"
मीरा ने कुछ सोचा। फिर उसने सिर हिलाया।
"मैं आधे घंटे में लौटूँगी," उसने कहा।
"इससे पहले आ जाओ," मैंने कहा।
वो गई।
मैंने बंसीलाल की तरफ़ देखा।
"तुम यहाँ रहो। अगर कोई और आए — कोई भी आए — तुम कुछ मत बोलना। तुम बस चुप रहना।"
"और अगर वो फिर चाबी माँगें?"
"तो कहना — चाबी अंकुश के पास है।"
"और अगर वो तुम्हें पकड़ लें?"
मैं मुस्कुराया।
"तो मुझे पकड़े हुए थोड़ा वक़्त लगेगा," मैंने कहा।
वो मेरी बात नहीं समझा।
वो समझता भी कैसे? वो नहीं जानता था कि मेरी जेब में एक घंटी है जो मेरी सबसे बड़ी ताक़त भी है और मेरी सबसे बड़ी कमज़ोरी भी।
मैंने अपने दादा के काग़ज़ को जेब में ऊपर सरकाया — जहाँ घंटी थी, उसके ठीक बगल में।
और मेरे अंदर एक अजीब सी बात हुई।
मुझे लगा कि मेरी कमीज़ की जेब का वज़न कुछ बढ़ गया है।
मुझे लगा कि मैं आज कुछ ढो रहा हूँ।
पर ये ढोना अब पहले जैसा नहीं था।
ये ढोना अब अकेले का नहीं था।
क्योंकि अब मेरे साथ मेरे दादा का अंगूठा भी था।
और जब आदमी के साथ उसके बुज़ुर्गों का अंगूठा चलने लगे, तो उसके कदम जितने भी धीमे हों, किसी गली के मुँह तक पहुँच ही जाते हैं।
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।
"चल," मैंने कहा।
"कहाँ?"
"पहले पीछे वाले बरामदे वाला कोना। फिर तय करेंगे कि आज रात कौन सा दरवाज़ा पहले खोलना है।"
टिंकू ने सिर हिलाया।
और जब हम पलटे, तब मेरे कान में घंटी ने, बहुत ही धीमे से, वो कहा जो मैंने अब तक नहीं सुना था।
"तेरे दादा का अंगूठा तेरी जेब में है। और तेरे दादा की आवाज़ कोई और सुन रहा है।"
मैंने पूछा, "कौन?"
घंटी ने कहा, "आज रात पता चलेगा।"
और वो चुप हो गई।
मैं एक और कदम चला।
अस्पताल की पिछली दीवार की तरफ़।
जहाँ से रास्ता संकरा था, और जहाँ से शायद कोई वापस नहीं आता।
पर मैं आ जाऊँगा — ये मैंने अपने आप से कहा।
क्योंकि अब मेरे पास दादा का अंगूठा था, घंटी थी, टिंकू था, मीरा थी, और सबसे बढ़कर — वो कोना था, जहाँ से पिछली दीवार दिखती थी पर कोई नहीं देखता।
और आज रात मुझे उस कोने से वो फाइल निकालनी थी।
चाहे वो किसी की भी पीली फाइल हो।
॥
अस्पताल की पिछली दीवार के साथ जो संकरा रास्ता था, वो सच में संकरा था — इतना कि मुझे कंधे तिरछे करके चलना पड़ा। दीवार से सटी सीमेंट की पुरानी परत, ऊपर टपकता पानी, और नीचे ज़मीन पर सूखी नाली में पड़े टूटे ईंट के टुकड़े — जैसे किसी ने जान-बूझकर यहाँ कुछ छिपाया हो और फिर भूल गया हो।
टिंकू मेरे पीछे-पीछे आ रहा था, हाथ में छोटी टॉर्च। उसकी रोशनी दीवार पर पड़ रही थी और दीवार हर कदम पर और ऊँची होती जा रही थी।
"उस्ताद," उसने धीरे से कहा, "यहाँ तो कुछ नहीं है।"
"है," मैंने कहा। "बस हमें दिख नहीं रहा।"
तभी मेरे कान में घंटी बोली। बहुत धीमे से, जैसे किसी ने पास आकर फुसफुसाया हो।
"अब नहीं।"
मैं रुका।
"क्या मतलब अब नहीं?"
"शाम को। जब सब हों। तू अकेला नहीं खोलेगा ये दरवाज़ा।"
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। वो अपनी टॉर्च से मेरा चेहरा देख रहा था।
"क्या हुआ?" उसने पूछा।
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "अभी पलटते हैं।"
"पर —"
"टिंकू," मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा, "घंटी कह रही है। और जब घंटी बोलती है, तो मैं सुनता हूँ। तूने भी से सीखना चाहिए — जल्दबाज़ी में लिए गए फ़ैसले बाद में चुकाए जाते हैं।"
हम पलटे और वापस उसी संकरी गली से बाहर आए। पीछे मुड़कर देखा तो दीवार का वो कोना अंधेरे में डूबा हुआ था, जैसे कोई बंद आँख वाला आदमी चुपचाप हमें देख रहा हो।
शाम को मैंने दुकान के पीछे वाला कमरा खोला। ट्रंक से गंदे कपड़े हटाए, पुरानी चारपाई पर एक साफ़ चादर बिछाई और बल्ब जला दिया। वो बल्ब आज भी वैसे ही गुनगुना रहा था जैसे बरसों से रहता आया है — कभी पूरी तरह जलता नहीं, कभी बुझता नहीं। बस इतनी रोशनी देता है कि आदमी अपनी उँगलियाँ देख सके और ये भूल जाए कि बाहर अंधेरा कितना गहरा है।
सब आ गए।
उस्ताद अली बक्श सबसे पहले — अपनी सिलाई की दुकान की कुर्सी खींचकर लाए थे, क्योंकि उनका कहना है कि जिस चीज़ पर आदमी रोज़ बैठता है, वही चीज़ उसके फ़ैसले भी साफ़ करती है। शबनम आपा आईं — हाथ में थाली में सिली हुई मिट्टी की केतली की चाय और दो प्लेट समोसे। कह गईं कि आज चाय का पैसा नहीं लेंगी, क्योंकि आज चाय की नहीं, सच की ज़रूरत है।
हबीब चाचा कमरे के कोने में चुपचाप बैठ गए। उनकी आँखें सूखी थीं, पर वो सूखापन जिसमें आदमी रोज़ मरता है और किसी को पता नहीं चलता। उनके हाथ में इमरान का वो पुराना रूमाल था जो उन्होंने आज सुबह गाँठ बाँधकर दिया था। रूमाल जैसे किसी दुआ का सहारा पकड़े बैठा था।
माँ आईं — बैसाखी के सहारे, आँगन तक। दरवाज़े पर रुकीं, मुझे देखा, और बिना कुछ बोले अंदर आ गईं। उनका आना ही काफ़ी था। कुछ माँएँ ऐसे ही आती हैं — बिना बोले, बिना पूछे, और आदमी को लगता है कि दुनिया में एक जगह ऐसी भी है जहाँ उसे साबित नहीं करना पड़ता कि वो ठीक है।
पापा आए। चुपचाप आए, दरवाज़े के पास खड़े रहे। उन्होंने कोई कुर्सी नहीं माँगी। मैंने उनकी तरफ़ देखा और कुछ नहीं कहा। पिछले कुछ हफ़्तों में मैंने उनसे जितनी बातें की थीं, उतनी शायद पूरी ज़िंदगी में नहीं की थीं। और अब भी हम दोनों के बीच वो चुप्पी थी जिसे तोड़ने के लिए शब्द नहीं, हिम्मत चाहिए थी।
मीरा आई — कार स्टेशन से लेकर। पहले बाहर आवाज़ आई कि कार कहाँ खड़ी करूँ, फिर अंदर आई। हाथ में एक पुरानी लिफ़ाफ़े की फाइल, कंधे पर फटा बैग, और आँखों में वो चमक जो मुझे अब पहचानने लगी थी। वो चमक कहती थी — मैंने कुछ पकड़ा है।
"मिल गई?" मैंने पूछा।
"मिल गई," उसने कहा। "पर पहले तुम बताओ — उस्ताद क्या देख रहे हैं?"
उस्ताद मेज़ पर झुके हुए थे। ट्रंक से निकाला वो पीला पुराना काग़ज़ — जो बंसीलाल की माचिस की डिब्बी से आया था — उन्होंने रोशनी में उठाकर पकड़ा था। और उनके हाथ काँप रहे थे।
"उस्ताद," मैंने धीरे से कहा। "क्या है?"
उन्होंने काग़ज़ को मेज़ पर रखा और अपना मोटा चश्मा उतारकर पोंछा। फिर कहा —
"ये काग़ज़ टुकड़ा है। आधा कटा हुआ। पर इसमें जो लिखा है, वो बत्तीस साल पुरानी एक बात कह रहा है।"
"कौन सी बात?"
उस्ताद ने कुर्सी खींचकर बैठकर कहा।
"जिस ज़मीन पर ये अस्पताल खड़ा है, वो ज़मीन किसी एक की नहीं थी। वो गली के लोगों ने मिलकर दी थी। बत्तीस साल पहले। एक दान-पत्र लिखा गया था — जगदीश यादव की मौजूदगी में।"
मेरे पेट में कुछ ठंडा उतरा।
"दादा?" मैंने कहा।
"हाँ," उस्ताद ने कहा। "तेरे दादा। और उस दान-पत्र में शर्त लिखी थी — ये ज़मीन कभी बेची नहीं जाएगी। न बेची जाएगी, न गिरवी रखी जाएगी। इलाज के लिए दी है, तो इलाज के लिए ही रहेगी। बस।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
"पर —" शबनम आपा ने कहा, "पर साहब के काग़ज़ों में ये ज़मीन बिक रही है।"
"इसीलिए," उस्ताद ने कहा, "पीली फाइल में वो असली दान-पत्र नहीं है। उसमें उसकी नक़ल है, या फिर उसका वो हिस्सा है जिसमें शर्त नहीं छपी। और असली पन्ना — जिस पर सात अंगूठे हैं — वो अभी कहीं छिपा है। साहब उसी को निकाल रहा है।"
मीरा ने अपनी कलम निकाली और हाथ में पकड़ी रही। उसने कुछ नहीं लिखा, बस काग़ज़ पकड़े रही।
"तो मतलब," उसने कहा, "अगर असली पन्ना साबित हो जाए, तो पूरा सौदा टूट जाता है।"
"पन्ना चाहिए," उस्ताद ने कहा। "और पन्ने को उस जगह से निकालना है जहाँ साहब उसे रखता है। और वो जगह कहाँ है, ये इमरान जानता है।"
हबीब चाचा का सिर उठा।
"इमरान?" उन्होंने कहा। आवाज़ कर्कश थी, जैसे बहुत देर से इस्तेमाल न हुई हो।
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"हाँ चाचा। इमरान ने साइट पर काम करते हुए नक़्शा उतारा था। उसने काला कमरा देखा था। वही अब गायब है।"
"तो —"
"तो," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो कड़कपन आ गया जो रिपोर्टिंग में आता है, "तो सबसे पहले इमरान को निकालना होगा। और साथ ही पन्ना पकड़ना होगा। दोनों अलग नहीं हैं। एक बिना दूसरे के मतलब नहीं रखता।"
"कल रात तक पीली फाइल बाहर जानी है," मैंने कहा। "यानी आज रात।"
"आज रात," मीरा ने दोहराया। "और इमरान कल की सुबह तक शायद ज़िंदा बचे न बचे।"
कमरा फिर चुप हो गया। बल्ब ने एक बार झपककर खुद को सँभाला और मेज़ पर पड़ी केतली से भाप उठती रही।
फिर हबीब चाचा उठे।
धीरे। बैसाखी के सहारे नहीं, अपने काँपते हुए घुटनों के सहारे। उनकी आँखें अब भी सूखी थीं, पर वो सूखापन अब बोल रहा था।
"मैं जाऊँगा," उन्होंने कहा।
"कहाँ चाचा?"
"भारद्वाज भवन। अकेले।"
मैं खड़ा हो गया।
"चाचा —"
"सुनो," उन्होंने मेरी बात काटी। "तुम बच्चे हो। तुमने ज़िंदगी में जितने साल देखे हैं, मैंने उतने साल इमरान को बड़ा होते देखे हैं। मैं उसे नहीं खो सकता। अगर साहब को मेरी जान चाहिए, तो ले ले। पर बेटा वापस आए।"
उनकी आवाज़ टूटी। पर वो रुके नहीं।
"मैं उसके दफ़्तर जाऊँगा। हाथ जोड़ूँगा। कहूँगा — मेरा बेटा छोड़ दे। मैं तेरे सामने खड़ा हूँ। जो करना है कर।"
शबनम आपा ने कहा, "हबीब भाई —"
"नहीं," उन्होंने कहा। "तुम मत रोको। मैंने तीस साल इस गली में अपने बेटे की आवाज़ सुनी है। और आज —" उनका गला रुंधा — "आज तीन महीने से मैं उसकी आवाज़ सुन नहीं पाया। तुम नहीं समझोगे। जिस आदमी ने अपने बेटे की आवाज़ सुनी हो और फिर वो आवाज़ चली जाए, उस आदमी के लिए हर सुबह एक सज़ा है।"
मैं उनके पास गया। कमरे के उस कोने में जहाँ वो खड़े थे। मैंने उनका हाथ नहीं छोड़ा। पर मेरा हाथ उनके कंधे पर रखा और मैंने धीरे से दबाया — इतना धीरे कि वो बैठ जाएँ, चोट न लगे।
"चाचा," मैंने कहा, "बैठिए।"
"मैं नहीं बैठूँगा।"
"बैठिए," मैंने दोहराया, और इस बार आवाज़ में कुछ और था। "क्योंकि जो बात मैं कहने जा रहा हूँ, वो खड़े होकर नहीं कही जाती।"
वो मेरी तरफ़ देखने लगे। मैंने उन्हें कुर्सी पर बैठाया। वो बैठ गए — इसलिए नहीं कि वो मान गए, इसलिए कि उनके घुटने अब और नहीं टिक रहे थे।
मैं उनके सामने बैठ गया। घुटनों के बल, ज़मीन पर। मेरी जीन्स के घुटने पर ग्रीस का पुराना दाग था, और उस वक़्त मुझे लगा कि वो दाग कोई ऐसा निशान है जो मुझे ज़मीन से जोड़े रखता है।
"चाचा," मैंने कहा, "अकेले जाने का रास्ता इस गली से बंद हो चुका है।"
"क्या मतलब?"
"मतलब ये कि जिस दिन से ये घंटी मेरी जेब में आई है, उस दिन से इस गली में कोई अकेले नहीं जाता। एक-एक आदमी जो अकेले गया, वो दब गया। जो साथ गया, वो लौटा। और मैं चाचा — मैं तुम्हें खोकर इमरान को नहीं लाऊँगा। मैं दोनों को लाऊँगा।"
उनकी आँखों में पानी आ गया। वो अब भी काँप रहे थे।
"पर मेरा बेटा —"
"तुम्हारा बेटा अब सिर्फ़ तुम्हारा नहीं है, चाचा। वो हम सबका है। जब वो साइट पर सीमेंट ढोता था, तो वो अपनी माँ के लिए ढो रहा था। पर जब वो नक़्शा उतार रहा था — तब वो इस गली के लिए उतार रहा था। और अब जब वो गायब है, तो वो सिर्फ़ तुम्हारा बेटा नहीं, हमारा भाई है।"
कमरे में कोई नहीं बोला।
तभी दरवाज़े पर खटखट हुई।
नहीं — खटखट नहीं। धमाका। जैसे कोई बच्चा अपनी पूरी ताक़त से दरवाज़े पर गिरा हो।
मैं पलटा।
दरवाज़ा खुला और उसमें से पाँच चेहरे एक साथ अंदर झाँक रहे थे — टिंकू, सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू।
"उस्ताद!" चिंटू ने कहा, और वो इतनी तेज़ी से बोला कि उसके शब्द आपस में टकरा गए। "उस्ताद ज़रूरी बात है!"
"अरे," मैंने कहा, "साँस ले।"
"नहीं लूँगा! पहले सुनो!"
"क्या?"
चिंटू ने एक कदम आगे बढ़ाया और अपने पैर फैलाकर खड़ा हो गया — एक बड़ा-सा पेट निकाला, गाल फुलाए, और चलने लगा जैसे कोई जान-बूझकर धीरे-धीरे, बड़ी-बड़ी डग भर रहा हो। फिर उसने कहा — "बेटा, तूने साहब की बात नहीं मानी —" और अपनी कलाई घुमाकर पान चबाने की नक़ल की।
कमरे में हँसी फूट पड़ी।
शबनम आपा की हँसी सबसे पहले आई। वो ऐसी हँसीं कि उनका पूरा शरीर हिलने लगा। हबीब चाचा के चेहरे पर भी एक पल के लिए कुछ ढीला हुआ। माँ ने अपनी बैसाखी की तरफ़ देखकर मुँह छिपाया, पर उनके कंधे हिल रहे थे।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
"बबलू," सानिया ने कहा। उसकी आवाज़ में गंभीरता वापस आ गई थी। "मैंने उसे मंदिर के पीछे देखा। वो वहाँ बैठा था।"
"क्या कर रहा था?"
सानिया ने चारों तरफ़ देखा, जैसे ये बात बड़ों को बताने से पहले सोचना हो।
"रो रहा था," उसने कहा।
चिंटू की नक़ल की हँसी एकदम रुक गई। जैसे किसी ने बल्ब बुझा दिया हो।
"रो रहा था?" मैंने कहा।
"रो रहा था," सानिया ने कहा। "और वो अपनी जेब टटोल रहा था। जैसे कुछ खो गया हो।"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। और बिना कुछ बोले हम दोनों एक ही चीज़ सोच रहे थे।
बबलू — जो हमेशा सबको डराता था — वो खुद डरा हुआ है।
और जब डरा हुआ आदमी अकेले रोता है, तो समझ लो कि डर उसके अंदर से बड़ा हो चुका है।
तभी मेरी जेब से एक आवाज़ आई। बहुत धीमी।
"जिसके हाथ खाली हों, वही सबसे ज़्यादा खतरनाक होता है।"
मैंने घंटी के काग़ज़ पर हाथ रखा। उसे थाम लिया।
फिर हबीब चाचा की तरफ़ देखा। उनकी आँखें भर आई थीं — अब सूखी नहीं थीं। वो अब बह रही थीं।
"चाचा," मैंने कहा। और ये दो शब्द इतने धीरे निकले कि शायद मैंने कभी किसी को इतने धीरे से नहीं बुलाया था।
मैंने उनका हाथ थाम लिया। उनकी हथेली ठंडी थी। मैंने अपनी दोनों हथेलियों के बीच थामा और रगड़ा।
"मैं तुमसे वादा नहीं करता," मैंने कहा। "क्योंकि वादा करके तोड़ना मुझे नहीं आता। पर मैं इतना कहता हूँ — जिस दिन इमरान वापस आएगा, उस दिन वो खुद तुम्हारे आँगन के हैंडपंप से पानी पिएगा। और जो हत्था उसने तोड़ा था, वो वो खुद जोड़ेगा। ये मेरा वादा है।"
वो मेरी तरफ़ देखने लगे। एक लंबी नज़र। फिर उन्होंने सिर हिलाया। एक छोटा-सा हिलाना। पर वो काफ़ी था।
तभी कमरे में सन्नाटा आ गया। मेरा मोबाइल बज उठा।
पहले तो मैंने सोचा कि मीरा का कोई मैसेज होगा। फिर देखा — नंबर।
इमरान का नंबर।
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। क्योंकि मीरा ने सुबह ही कहा था कि इमरान का नंबर अब किसी के नाम पर नहीं है। ऐसे नंबर से कॉल आ ही नहीं सकती।
मैंने अंगूठा स्क्रीन पर नहीं रखा। मैंने कमरे में सबकी तरफ़ देखा। टिंकू ने भी अपनी साँस रोक ली थी।
मैंने कॉल उठाई।
"हेलो?"
दूसरी तरफ़ से कोई आवाज़ नहीं आई।
फिर — तीन आवाज़ें।
खट। खट। खट।
धीमी, बराबर, जैसे किसी ने दीवार पर तीन उँगलियाँ टिकटिकाई हों।
और उसके बाद एक आवाज़ आई। इतनी धीमी कि मुझे शब्द नहीं, छाया सुनाई दी।
"काला कमरा।"
लाइन कट गई।
मैंने फोन को देखा। स्क्रीन अब खाली थी। मीरा की तरफ़ देखा — वो पहले से अपनी कलम से कुछ लिख रही थी। टिंकू ने धीरे से कहा, "उस्ताद, वो इमरान भैया की आवाज़ थी?"
मैंने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि आवाज़ इमरान की नहीं थी।
आवाज़ किसी और की थी।
किसी ऐसे की जो उस कमरे के अंदर है और जो जानता है कि हम क्या खोज रहे हैं।
फिर घंटी बोली। और इस बार उसकी आवाज़ में वो धीमापन नहीं था जो पिछली आवाज़ों में था। इस बार आवाज़ साफ़ थी और कड़ी।
"आज रात। अभी। पीली फाइल कल तक नहीं रुकेगी।"
मैंने घंटी को जेब से निकाला और मेज़ पर रख दिया। उसकी पीतल की चमक अब भी वैसी ही थी, पर मुझे लगा कि वो मेरी नहीं — किसी और की है।
"टिंकू," मैंने कहा।
"हाँ उस्ताद?"
"माचिस का डिब्बा निकाल।"
उसने जेब से निकाला। बबलू का दिया हुआ वो माचिस का डिब्बा, जिसमें तीन बत्तियाँ थीं।
"इसमें बत्तियाँ हैं," उसने कहा।
"आज रात काम आएँगी," मैंने कहा। "और तेरी टॉर्च भी।"
"और चाक?"
"चाक भी।"
मैंने सबकी तरफ़ देखा। माँ, पापा, उस्ताद, शबनम आपा, हबीब चाचा, टिंकू, शबनम आपा के पीछे बैठी रज़िया आपा, और मीरा।
"आज रात," मैंने कहा, "हम अस्पताल जाएँगे। पर जाने से पहले एक बात तय कर लो — कौन अंदर जाएगा और कौन बाहर रहेगा।"
"मैं अंदर जाऊँगा," टिंकू ने तुरंत कहा।
"तू नहीं जाएगा," मैंने कहा।
"उस्ताद —!"
"तू बाहर रहेगा," मैंने कहा, "क्योंकि तेरे पास वो चीज़ है जो शायद हममें से किसी के पास नहीं — तेरी उम्र। अगर अंदर कुछ गड़बड़ हुई, तो तू इतनी तेज़ी से भाग सकता है जितनी तेज़ी से मैं नहीं भाग सकता। और तू सबको बता सकता है। तेरे पास वो आवाज़ है जिसे कोई बंद नहीं कर सकता।"
उसने मुँह बनाया। फिर मान गया।
"पर मैं पीछे नहीं रहूँगा," उसने कहा। "मैं सीढ़ी के मुँह पर रहूँगा।"
"ठीक है," मैंने कहा।
उस्ताद ने अपनी मशीन की तरफ़ देखा। फिर कहा —
"मैं साथ चलूँगा।"
"उस्ताद —"
"मैं साठ साल पहले इस घंटी को चला चुका हूँ," उन्होंने कहा। "और मैं जानता हूँ कि इसे अंधेरे में कैसे पकड़ना है। तू अकेले पकड़ेगा, तो उँगली जल जाएगी।"
मैं कुछ नहीं बोला। क्योंकि जब कोई बुज़ुर्ग अपनी उम्र की फिक्र छोड़कर साथ चलने की बात कहे, तो उसे मना करना उसका अपमान करना होता है।
"ठीक है," मैंने कहा।
पापा आगे आए। पहली बार उस रात उन्होंने मुँह खोला।
"मैं और सलीम बक्श पीछे वाले फाटक पर रहेंगे," उन्होंने कहा।
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"पर पापा —"
"जो आदमी एक बार झुक जाए," उन्होंने कहा, "उसके लिए दोबारा खड़ा होना सबसे मुश्किल होता है। मुझे खड़े होने का मौका दे।"
मैंने उनकी आँखों में देखा। और उस वक़्त मुझे वो पापा दिखे जो तीस साल पहले थे — जब वो साइकिल की दुकान चलाते थे, जब उनकी कमर झुकी नहीं थी।
"ठीक है," मैंने कहा।
मीरा उठी। उसने अपना बैग उठाया और कंधे पर टाँगा।
"मैं अंदर चलूँगी," उसने कहा। "क्योंकि अगर ये फाइल मिली और कोई कैमरा नहीं रहा, तो वो फाइल घर नहीं आएगी। ये मेरा काम है।"
"और तेरी जान?"
"मेरी जान," उसने कहा, "पहले से ही किसी और के हिसाब में लिखी है। मैंने पाँच साल पहले रमा मैडम की खबर छापकर अपनी आत्मा बेच दी थी। अब वो वापस कमानी है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो सीधी खड़ी थी।
"ठीक है," मैंने कहा।
फिर मैंने उन बच्चों की तरफ़ देखा। सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू।
"तुम लोग —"
"हम?" सानिया ने कहा, जैसे उसे बुरा लगा हो। "हम पीछे रहेंगे। पर हम रास्ता देखेंगे। आज शाम हमने देखा है — कौन सा रास्ता खाली है और कौन सा भरा है।"
"कौन सा है?"
"टंकी के पीछे वाला रास्ता खाली है," उसने कहा। "और पीछे वाले फाटक पर दो लकड़ी के जूते वाले आदमी खड़े हैं। हमने देखा है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। ये बच्ची… ये तेरह साल की बच्ची मुझसे ज़्यादा देख रही थी।
"सानिया," मैंने कहा, "तू मेरी आँखें है।"
उसने सिर हिलाया। और उसकी आँखों में वो चमक आई जो बड़े होने पर किसी इंसान में कम ही आती है — वो चमक जो कहती है कि मुझ पर भरोसा किया गया है।
मैं उठा। कमरे में सब उठे।
मैंने देखा — माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं। उन्होंने सब सुना था। उनकी आँखें में कुछ था जो पहले कभी नहीं था — डर नहीं, बल्कि वो डर जो समझ में बदल गया हो।
"अंकुश," उन्होंने कहा।
"हाँ माँ।"
वो मेरे पास आईं। बैसाखी के सहारे, धीरे-धीरे। फिर मेरे सामने रुकीं और अपनी ऊँगली उठाकर मेरे माथे पर रखी — जैसे कोई पुराना टीका लगा रही हों।
"जो गली की छत के नीचे खड़ा हो," उन्होंने कहा, "उसे किसी की परछाईं से नहीं डरना चाहिए।"
"हाँ माँ," मैंने कहा।
उन्होंने अपनी हथेली मेरे सिर पर रखी। एक पल। और उस एक पल में मुझे लगा कि मैंने जो सब पिछले कुछ महीनों में किया — वो सब सही किया।
फिर वो पलटीं और पापा के पास चली गईं। धीरे से उनका हाथ पकड़ा। और पापा ने — पहली बार — उनका हाथ थामकर रखा।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी और दादा का काग़ज़, दोनों वहीं थे।
और जब मैं बाहर निकला, तो गली में हवा ठंडी हो चुकी थी। दूर कहीं अस्पताल की पीली दीवार पर एक लालटेन जल रही थी। कोई चल रहा था — धीमे कदमों से — पिछली दीवार की तरफ़।
मेरा फोन फिर बजा।
इस बार स्क्रीन पर कोई नंबर नहीं था। बस एक लाइन चल रही थी — "कॉल चल रही है।"
मैंने सुना।
दूसरी तरफ़ से तीन खटखटें फिर आईं। फिर एक आवाज़ — वही धीमी, वही बिना जल्दबाज़ी के।
"तेरे दादा का नाम अभी भी उस काग़ज़ पर है। सोच ले — उसे बचाना है या उसके साथ जलना है।"
लाइन कट गई।
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।
"चल," मैंने कहा। "हमारे पास एक रात है और उसमें से आधी तो पहले ही बीत चुकी है।"
और हम चले — अस्पताल की पिछली दीवार की तरफ़।
जहाँ से रास्ता संकरा था, और जहाँ से शायद कोई वापस नहीं आता।
पर मैं आ जाऊँगा।
ये मैंने अपने आप से नहीं कहा।
ये मैंने अपने दादा से कहा — जिनका अंगूठा मेरी जेब में था।
॥
रात ग्यारह बजे मैं अस्पताल के पिछले फाटक पर पहुँचा तो देखा कि सब मुझसे पहले आ चुके थे।
ये बात मेरे लिए नई थी। आम तौर पर मैं वो आदमी हूँ जो सबसे पहले पहुँचकर दूसरों का इंतज़ार करता है, चाय बनाता है, और फिर शिकायत करता है कि लोग वक़्त पर नहीं आते। पर आज पूरी गली मुझसे पहले आ गई थी। यानी डर सबको एक ही वक़्त पर जगा देता है।
फाटक के पास पीली रोशनी में उस्ताद अली बक्श खड़े थे। उनके हाथ में अपनी सिलाई की दुकान की वही पुरानी लकड़ी की कुर्सी थी जिस पर वो रोज़ बैठते हैं। मैंने देखा और मुझे हँसी आ गई।
"उस्ताद," मैंने कहा, "कुर्सी भी लाए हो?"
"हाँ," उन्होंने कहा, बिल्कुल गंभीर। "जिस चीज़ पर आदमी रोज़ बैठता है, फ़ैसला वही साफ़ करती है। मेरी कुर्सी ने पचास साल में एक भी झूठ नहीं बोला।"
मीरा ने अपना कैमरा कंधे पर टाँगा और पापा की टूटी घड़ी कलाई पर बाँधी। घड़ी रुकी हुई थी, पर वो उसे बाँध रही थी, जैसे वक़्त सही चलने की ज़िद कर रही हो।
"घड़ी तो रुकी है," टिंकू ने कहा।
"पता है," मीरा ने कहा। "इसीलिए बाँधी है। जो घड़ी रुकी हुई है, वो कम से कम झूठ नहीं बोलती कि कितना वक़्त बचा है।"
टिंकू ने सिर हिलाया, जैसे दुनिया का सबसे गहरा सच सुन लिया हो। उसके हाथ में बबलू का वही माचिस का डिब्बा था जिसमें तीन बत्तियाँ थीं, और दूसरे हाथ में टॉर्च। उसका पूरा नाम अब तक मुझे नहीं पता था और आज रात मुझे लगा कि शायद वो इसीलिए नहीं बताता — जब पूरा नाम बोलना पड़े, तब पता चलेगा कि वो कितना बड़ा आदमी है।
फाटक के अंधेरे में कोई हिला।
मैंने टॉर्च उठाई और रोशनी गिरी बंसीलाल पर। वो वहाँ खड़े थे, दोनों हाथों में एक लोहे की बड़ी चाबी दबाए, और उनका पूरा शरीर काँप रहा था। तीस साल की नौकरी करने वाला चौकीदार। तीस साल। और आज वो इस तरह काँप रहे थे जैसे पहली बार रात देखी हो।
"बंसीलाल भाई," मैंने कहा। "चाय पी ली होती तो हाथ नहीं काँपते।"
वो मेरी तरफ़ देखकर हँसे भी नहीं। बस चाबी आगे बढ़ाई।
"ये फाटक अब मेरा नहीं है," उन्होंने कहा। "आज रात के बाद ये फाटक, ये टंकी, ye चारपाई — कुछ भी मेरा नहीं रहेगा। पर चाबी आज भी मेरी है। इसीलिए मैं खुद खोलूँगा।"
उन्होंने चाबी डाली। ताले में ज़ंग थी और चाबी ने वो आवाज़ की जो पचास साल पुरानी चीज़ें ही करती हैं — किसी बूढ़े के गले से निकलती खाँसी जैसी। ताला खुला। फाटक हिला और अंदर से एक ठंडी हवा निकली जिसमें मिट्टी, ज़ंग और कुछ जले हुए काग़ज़ की दबी गंध थी।
मैंने बिना सोचे अपना हाथ जेब में डाला। घंटी वहाँ थी, और वो गरम थी। ऐसी गरम जैसे किसी ने अभी हाथ में पकड़कर रखी हो।
तभी पीछे से स्कूटर की आवाज़ आई।
मैंने पलटकर देखा। स्कूटर पर बबलू था। बिना चेन, बिना सोने का लॉकेट, पानदान की जगह उसकी जेब खाली दिख रही थी। उसके दाहिने हाथ पर सफ़ेद रूमाल बँधा था और रूमाल पर सूखे गुलाबी दाग थे।
फाटक के पास खड़े लोग सहम गए। किसी ने धीरे से कहा कि ये आदमी आज धमकी देने आया है।
पर बबलू स्कूटर से उतरा, हेलमेट हुक पर टाँगा, और फाटक से लगभग दस कदम दूर रुक गया।
"मैं अंदर नहीं आऊँगा," उसने कहा।
उसकी आवाज़ सूखी थी। जैसे बहुत देर से कुछ कहा नहीं गया हो।
"बबलू भाई," मैंने कहा, "आज चेन कहाँ है?"
"घर रख आया," उसने कहा। "जो चीज़ गले में पहनकर आदमी अकड़ता है, वो आज नहीं पहनी।"
फिर वो कुछ देर चुप रहा और अपनी जेब टटोलने लगा। फिर हाथ निकाल लिया, जैसे जेब में कुछ है ही नहीं।
"मैं यहीं खड़ा रहूँगा," उसने कहा। "अगर साहब के आदमी आए, तो मैं शोर मचा दूँगा। ऐसा शोर मचाऊँगा कि पूरी बस्ती जाग जाएगी। मुझे शोर मचाने में उस्तादी हासिल है।"
"शोर सुनकर तू क्या करेगा?" उस्ताद ने पूछा। सीधा सवाल, जैसे कपड़े पर सीधी सिलाई।
बबलू ने उनकी तरफ़ देखा।
"कुछ नहीं," उसने कहा। "मैं भाग जाऊँगा। पर आप लोगों को पता तो चल जाएगा कि कोई आया था।"
सच बात थी। और सच्ची बात कभी-कभी बहादुरी से भी ज़्यादा काम करती है।
मैंने उसकी तरफ़ अपनी टॉर्च घुमाई और उसके कंधे पर हाथ रखने के लिए बढ़ाया। वो पीछे हट गया।
"हाथ मत लगाओ," उसने कहा। "मैं किसी का दोस्त बनकर नहीं आया। मैं सिर्फ़ अपना हिसाब साफ़ करने आया हूँ।"
"हिसाब धोखे से साफ़ होता है तो शुरू में ही कर लेते," मैंने कहा।
वो हँसा। छोटी, फटी हँसी।
"तू छोटा है," उसने कहा। "और मुझे तेरी बातें अच्छी लगती हैं। इसीलिए तेरा मुँह नहीं तोड़ा।"
"अच्छा," मैंने कहा। "इसका मतलब अब तुझे मेरी बातें अच्छी लगने लगी हैं। तरक़्क़ी हो रही है।"
वो कुछ नहीं बोला। बस फाटक के बाहर एक पत्थर पर बैठ गया, मुँह गली की तरफ़ करके। जैसे कोई पहरेदार, बिना तनख़्वाह।
मैंने देखा — पापा और सलीम बक्श गली के मोड़ पर खड़े थे। सलीम सफ़ेद कुर्ते में, बिल्कुल शांत। पापा उनसे थोड़ा आगे, हाथ में रिंच पकड़े हुए। जो आदमी ज़िंदगी में कभी लड़ने नहीं आया, वो आज रात हाथ में औज़ार लेकर खड़ा था। मेरा गला भर आया और मैंने उनकी तरफ़ देखना बंद कर दिया, क्योंकि आज रात मुझे साफ़ दिखना था।
टिंकू ने मेरी कमीज़ का कोना खींचा।
"उस्ताद," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो डर था जो वो छिपाने की कोशिश करता है और कभी नहीं छिपा पाता।
"क्या?"
"मैं ऊपर से सीढ़ी गिनूँगा।"
"क्यों?"
"क्योंकि नीचे उतरते वक़्त गिनती भूलना ठीक नहीं," उसने कहा। "अट्ठाईस सीढ़ियाँ हैं। अगर नीचे जाकर मुझे उनतीस लगें, तो मतलब कुछ गड़बड़ है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। तेरह साल का लड़का। और उसने वो तरीक़ा सोच लिया जो मैंने उस सोच में नहीं सोचा था — गिनती को हैरानी से बचने का औज़ार बना दिया।
"गिन," मैंने कहा। "जोर से गिन। अगर मैं तुझे गिनते न सुनूँ, तो मैं वापस आऊँगा।"
"और अगर आप सुनें ही न?"
"तो तू बोलता रहेगा," मैंने कहा। "तू गिनता रहेगा और मैं सुनता रहूँगा।"
उसने सिर हिलाया। मैंने देखा कि उसके होंठ हिल रहे थे — वो अभी से गिन रहा था।
बंसीलाल आगे आए। उनके हाथ में एक लालटेन थी, और लालटेन की रोशनी में उनका चेहरा और भी पुराना लग रहा था।
"सुनो," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ पहली बार सख़्त हुई। "अंदर जाने वाला अपना पूरा नाम ज़ोर से बोलेगा। पूरा नाम। जितना बड़ा नाम, उतना कम डर। ये नियम मेरा नहीं, उस कमरे का है।"
"क्यों?" मीरा ने पूछा।
"क्योंकि वहाँ जो बैठा है," बंसीलाल ने कहा, "वो नाम याद रखता है। और नाम याद रखने वाले से हमेशा डरना चाहिए, क्योंकि वो बाद में पूरा हिसाब माँगता है।"
उन्होंने लालटेन मेरे हाथ में दी।
"और दरवाज़ा पीछे से बंद होने मत देना," उन्होंने कहा। "जो दरवाज़ा पीछे से बंद होता है, वो आगे से खुलता है। पर जो अंदर से बंद हो जाए, वो फिर कभी खुलता ही नहीं।"
"आप अंदर नहीं आ रहे?" टिंकू ने पूछा।
"मैं ऊपर रहूँगा," बंसीलाल ने कहा। "ऊपर कोई रहना चाहिए, वरना नीचे वाले को लगेगा कि ऊपर दुनिया खत्म हो गई।"
मैंने फाटक के अंदर पहला कदम रखा। ज़मीन पत्थर की थी और ठंडी। ऊपर आसमान में बादल थे — न तारे, न चाँद। बस एक पीली दीवार और उस पर जलती लालटेन।
पीछे से आवाज़ आई — आवाज़ सानिया की थी।
"हम यहीं हैं," उसने कहा। "टंकी के पीछे वाला रास्ता खाली है। हम देख रहे हैं।"
मैंने पलटकर हाथ उठाया। और मैंने उन चारों बच्चों को देखा — सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू — मोड़ पर खड़े, इतने छोटे कि पीली रोशनी में उनकी परछाईं भी नहीं बन रही थी। और फिर भी वो वहाँ थे।
हमने सीढ़ी का दरवाज़ा खोला। अंदर से वो ठंडी हवा आई जो पहले भी आई थी, पर इस बार उसमें एक चीज़ और थी — नमी। जैसे अंदर कभी धूप नहीं पहुँची हो।
मैंने टॉर्च जलाई और रोशनी नीचे गिराई। अट्ठाईस पत्थर की सीढ़ियाँ, धूल से ढकी।
"मैं पहले जाऊँगा," मैंने कहा।
"नहीं," उस्ताद ने कहा। "मैं पहले जाऊँगा।"
"उस्ताद, आपकी टाँग —"
"मेरी टाँग में दर्द है, मौत नहीं," उन्होंने कहा। "और मेरे पास कुर्सी है। अगर सीढ़ी टूटे, मैं बैठ जाऊँगा। तेरे पास क्या है?"
मैंने उनकी तरफ़ देखा और कुछ नहीं कहा। बात में दम था।
फिर मीरा ने कैमरा चालू किया। लाल बत्ती जली।
"मैं सिर्फ़ सबूत के लिए रिकॉर्ड करूँगी," उसने कहा, "और जिस पल कोई कहे बंद करो, मैं बंद कर दूँगी।"
"लाल बत्ती से अंदर वालों को पता चल जाएगा," टिंकू ने कहा।
"पता चलने दो," मीरा ने कहा। "जो चोरी का काम करता है, वो लाल बत्ती देखकर डरता है। और डरा हुआ आदमी ग़लती करता है।"
हम सीढ़ी पर उतरे। सबसे पहले उस्ताद, फिर मैं, फिर मीरा, और सबसे पीछे टिंकू — जो ज़ोर से गिन रहा था।
"एक," टिंकू बोला, और उसकी आवाज़ सीढ़ी में गूँजी।
"मेरा नाम उस्ताद अली बक्श है," उस्ताद ने कहा, इतनी साफ़ आवाज़ में कि मुझे लगा दीवारें भी सुन रही हैं।
"मेरा नाम मीरा तिवारी है," मीरा ने कहा।
"और मेरा नाम," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ सीढ़ी में उतरती गई, "अंकुश यादव है। जगदीश यादव का पोता।"
और जब मैंने दादा का नाम बोला, तो मेरी जेब में घंटी हिली। बिना बजे, बस हिली। जैसे किसी ने सिर हिलाकर कहा हो — ठीक है।
"तीन," टिंकू बोला।
"चार।"
"पाँच।"
हर पाँचवीं सीढ़ी पर वो सफ़ेद चॉक का पुराना निशान आ रहा था। मैंने उन निशानों को देखा और मुझे लगा कि जिसने भी ये निशान बनाए थे, वो नीचे जाते वक़्त गिनती भूलना नहीं चाहता था। ठीक वैसे ही जैसे टिंकू।
फिर घंटी ने धीमी आवाज़ में कहा।
वो आवाज़ मेरी जेब से आई, इतनी धीमी कि बस मैं सुन सका।
"आज वादा तोड़ने वाला भी सुन रहा है।"
मैंने चलना नहीं रोका। पर मेरा हाथ जेब पर चला गया और मैंने घंटी उँगलियों में दबा ली।
"कितना नीचे है?" मीरा ने पूछा।
"जितना ऊपर है, उतना ही," उस्ताद ने कहा। "बस उलटा।"
"बारह," टिंकू बोला। "तेरह। चौदह।"
फिर उसकी आवाज़ हल्की हुई।
"उस्ताद," उसने कहा, "यहाँ कुछ अजीब है।"
"क्या?"
"जितनी सीढ़ियाँ मैं गिन रहा हूँ, उतनी ही धूल भी कम होती जा रही है। जैसे नीचे रोज़ कोई आता है।"
मैंने अपनी टॉर्च नीचे की। सही कह रहा था लड़का। ऊपर की सीढ़ियों पर धूल मोटी थी, नीचे की सीढ़ियों पर पतली। किसी के पैरों ने उसे रौंदा था — बार-बार।
"पंद्रह," टिंकू बोला, और उसकी आवाज़ में डर अब साफ़ आ गया था।
"तेज़ चलो," उस्ताद ने कहा। "धूप ढल गई है।"
"धूप?" मीरा ने कहा। "उस्ताद, रात के ग्यारह बज रहे हैं।"
"मैंने धूप का नाम नहीं लिया," उन्होंने कहा। "मैंने वक़्त का नाम लिया।"
हम नीचे उतरते रहे। हवा और ठंडी होती गई। और फिर अचानक, बिना किसी आवाज़ के, मुझे लगा कि हम उस जगह पहुँच रहे हैं जहाँ से बाहर की कोई आवाज़ नहीं आती। न गली का कुत्ता, न दूर की गाड़ी, न पीपल की पत्तियाँ।
"बीस," टिंकू बोला।
और तभी ऊपर से आवाज़ आई।
बंसीलाल।
पर वो आवाज़ उनकी नहीं थी। वो आवाज़ सीधी हवा में फटी — एक तेज़ चीख़, जैसे किसी का हाथ किसी लोहे पर पड़ा हो और वो हाथ अंदर से चीख़ उठा हो।
चीख़ ने सीढ़ी को हिला दिया। धूल ऊपर से नीचे तक आई और मेरे मुँह में गई।
"बंसीलाल!" मैं चिल्लाया। "बंसीलाल भाई!"
और फिर बत्ती बुझी।
एक झटके में। नीचे की लालटेन, मेरी टॉर्च, मीरा के कैमरे की लाल बत्ती — सब एक साथ। जैसे किसी ने तार खींच दिया हो।
अंधेरा आया तो मुझे पता चला कि अंधेरा भी एक चीज़ होती है, सिर्फ़ रोशनी का न होना नहीं। उसका वज़न होता है। वो आपके कंधों पर बैठ जाता है।
टिंकू की आवाज़ आई, बहुत पास से।
"उस्ताद — उस्ताद, गिनती — मैं भूल गया।"
"छोड़ दे गिनती," मैंने कहा। "मेरा हाथ पकड़।"
"कहाँ है हाथ?"
मैंने अपना हाथ आगे बढ़ाया और उसने पकड़ लिया। उसका हाथ छोटा था और काँप रहा था। मैंने उसे कसकर पकड़ा।
"उस्ताद," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो छोटी सी कँपकँपी थी जो वो कैमरे के पीछे छिपा लेती है। "मेरा कैमरा बंद हो गया है।"
"टॉर्च?"
"दोनों बंद।"
"तुम ठीक हो?"
"हूँ," उसने कहा। "तुम?"
"मैं भी। और उस्ताद?"
"मैं यहाँ हूँ," उस्ताद की आवाज़ आई, बिल्कुल स्थिर। "और मैं अपनी कुर्सी पकड़े हुए बैठ गया हूँ, क्योंकि अंधेरे में खड़े आदमी को लोग धक्का दे देते हैं।"
मेरी जेब में घंटी हिली। और फिर वो बजी — अंधेरे में, सीढ़ी के बीच, हम चारों के बीच।
बजी और बोली।
"ऊपर कोई चीख़ा नहीं।"
मेरी छाती रुक गई।
"क्या?" मैंने कहा।
"ऊपर कुछ टूटा है," घंटी ने कहा। "और अब वो नीचे आ रहा है।"
उसकी आवाज़ में कोई जल्दी नहीं थी। और यही सबसे डरावना था।
"टिंकू," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ बाहर आते ही सख़्त हो गई। "तू मेरी कमीज़ पकड़। मेरे पीछे मत आ। मेरे साथ रह।"
"और मीरा?"
"मीरा मेरी दूसरी तरफ़। मुझे दीवार चाहिए। दीवार से सटकर उतरेंगे। जो अंधेरे में आता है, वो कभी दीवार से नहीं आता — वो बीच से आता है।"
"ये तूने कहाँ सीखा?" मीरा ने पूछा।
"जब दस साल का था," मैंने कहा, "तो पापा के औज़ारों के कमरे में बत्ती जाती थी। मैंने दीवार पकड़कर रास्ता निकालना वहीं सीखा था। उन चार रातों में जो डर मैंने झेला है, वो आज डिग्री की तरह काम आ रहा है।"
मैंने दीवार टटोली। ठंडी। पत्थर। रेत जैसी महीन चीज़ फिसल रही थी। मैंने हाथ नीचे सरकाया और अगली सीढ़ी ढूँढ ली।
"एक कदम," मैंने कहा। "थोड़ा नीचे।"
हम उतरे। धीरे-धीरे। अंधेरे में हर कदम दुगुना लंबा लगता है। मुझे लगा मैं हमेशा उतरता ही रहूँगा और ये सीढ़ी कभी खत्म नहीं होगी।
फिर टिंकू ने कहा, बहुत धीमे, "उस्ताद, मेरे नीचे कुछ है।"
मेरा खून जम गया।
"क्या?"
"मेरे पैर के नीचे — सीढ़ी नहीं है। ज़मीन है।"
मैंने अपना पैर आगे बढ़ाया। ज़मीन। सपाट ज़मीन।
"हम नीचे हैं," मैंने कहा। "टिंकू, गिनती?"
"मैंने छोड़ दी थी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में शर्म थी।
"कोई बात नहीं," मैंने कहा। "अब दीवार पकड़कर चलेंगे। टिंकू बाएँ, मीरा दाएँ। उस्ताद, आप मेरे पीछे।"
"और तू?" उस्ताद ने कहा।
"मैं बीच में," मैंने कहा। "मुझे बीच में रहना आता है।"
और फिर ऊपर से आवाज़ आई।
पर ये चीख़ नहीं थी।
ये कदम थे।
धीमे कदम। लकड़ी के जूते। सीढ़ी पर एक-एक करके उतरते हुए। ठक। ठक। ठक।
मीरा ने मेरी बाँह पकड़ी। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं।
"अंकुश," उसने कहा।
"सुन रहा हूँ," मैंने कहा।
"वो ऊपर से आ रहे हैं।"
"हाँ।"
"तो हमें क्या करना चाहिए?"
मैंने अंधेरे में अपना मुँह खोला और उससे पहले कि मैं कुछ कहूँ, मेरी जेब में घंटी फिर बजी। इस बार उसकी आवाज़ में कुछ था जो मैंने पहले कभी नहीं सुना — जल्दी।
"नाम बोल," उसने कहा। "फिर से नाम बोल। अभी।"
"अंकुश यादव," मैंने कहा, ज़ोर से, और मेरी आवाज़ कमरे में गूँजी। "जगदीश यादव का पोता।"
"मीरा तिवारी," मीरा ने कहा।
"टिंकू," टिंकू ने कहा, और फिर अटका।
"पूरा नाम," घंटी ने कहा।
टिंकू ने एक गहरी साँस ली।
"टिंकू — टिंकू कुमार," उसने कहा, और उसकी आवाज़ पहली बार अपने नाम से बड़ी लगी।
उस्ताद ने अपना नाम बोला। और उनका नाम सबसे आख़िर में गूँजा, जैसे कमरे ने उसे पहचाना हो।
कदम रुक गए।
एक पल के लिए पूरा कमरा साँस रोककर बैठ गया।
फिर एक आवाज़ आई — ऊपर नहीं, सामने से। बहुत पास से। इतनी धीमी कि लगा दीवार बोल रही है।
"नाम बोलने से कुछ नहीं होता, बेटा। नाम तो काग़ज़ पर भी लिखा है। और काग़ज़ मेरे पास है।"
मैंने घंटी उँगलियों में दबाई।
और मैंने अंधेरे में वो कहा जो मुझे कहना था, चाहे मेरी आवाज़ काँप रही थी।
"तो काग़ज़ लेकर आ," मैंने कहा। "हम यहाँ खाली हाथ आए हैं।"
जवाब में जो आवाज़ आई, वो हँसी नहीं थी। वो किसी चीज़ के खिसकने जैसी थी — जैसे काग़ज़ों का ढेर एक तरफ़ से हटाया जा रहा हो।
और घंटी ने धीरे से कहा।
"वो खाली हाथ नहीं है। उसने तेरा घर उठा रखा है।"
॥
"वो खाली हाथ नहीं है। उसने तेरा घर उठा रखा है।"
घंटी की वो आवाज़ मेरे कान में ऐसे बैठ गई जैसे किसी ने ठंडी कील ठोक दी हो। मेरी जेब में घंटी अब भी गरम थी, पर उसका गरम होना अब तसल्ली नहीं दे रहा था। पहले जब वो गरम होती थी, मुझे लगता था कि वो मेरे साथ है। आज लगा कि वो मुझे चेतावनी दे रही है।
"घर?" मैंने धीरे से कहा। "कौन सा घर? मेरा घर तो — "
"बात करने का वक़्त नहीं," घंटी ने कहा। "सीढ़ी। पीछे मत देख। ऊपर चल।"
"पर वो आवाज़ — "
"वो आवाज़ जानती है तू यहाँ है। इसीलिए बोली। अब चुप कर और चल।"
मैंने मीरा का हाथ कसकर पकड़ा। उसकी उँगलियाँ बर्फ जैसी ठंडी थीं, पर उसने हाथ नहीं छुड़ाया। टिंकू मेरे बाएँ था, और मुझे उसकी साँस सुनाई दे रही थी — तेज़, छोटी, जैसे कोई दौड़कर आया हो।
"उस्ताद?" मैंने कहा।
"मैं यहाँ हूँ," उस्ताद की आवाज़ पीछे से आई। "कुर्सी उठा ली है। बोलो किधर।"
"सीढ़ी आपके सामने है," मैंने कहा। "दीवार पकड़कर। एक-एक कदम। मैं आगे जा रहा हूँ।"
"अंकुश," मीरा ने कहा, "वो कदम — वो रुक गए थे।"
"हाँ।"
"तो क्या वो ऊपर चला गया?"
मैंने अंधेरे में अपना सिर हिलाया। फिर याद आया कि वो मुझे देख नहीं सकती।
"नहीं," मैंने कहा। "वो ऊपर नहीं गया। वो कहीं और गया। उसे नाम बोलने से फ़र्क़ नहीं पड़ता — उसने खुद कहा। उसे फ़र्क़ काग़ज़ से पड़ता है। और काग़ज़ उसके पास है।"
"तो अब?" टिंकू ने कहा। उसकी आवाज़ में वो डर था जो बच्चों की आवाज़ में तभी आता है जब वो किसी बड़े को भी डरा हुआ देख लें।
"अब हम ऊपर जा रहे हैं," मैंने कहा। "तेज़। मगर बिना शोर।"
हम सीढ़ियाँ चढ़ने लगे।
मैंने पहले वाली चढ़ाई में ध्यान दिया था कि उतरते वक़्त सीढ़ियाँ कैसी लगती हैं — ठंडी, ऊपर से रेत जैसी महीन धूल फिसलती हुई। अब चढ़ते वक़्त वही सीढ़ियाँ अलग लग रही थीं। जैसे कोई मेरे पीछे खड़ा गिन रहा हो।
टिंकू धीरे-धीरे गिन रहा था। "एक। दो। तीन।"
"चुप," मैंने फुसफुसाया।
"गिनना ज़रूरी है, उस्ताद," उसने वही बात दोहराई जो मैंने उसे सिखाई थी। "अंधेरे में गिनती ही रस्सी होती है।"
मैं मुस्कुराया। डर में भी। क्योंकि वो सही कह रहा था, और मुझे अच्छा लगा कि मेरी सिखाई बात किसी के काम आ रही है।
हम चढ़ते रहे। आठ। नौ। दस।
फिर अचानक ऊपर से रोशनी की एक पतली लकीर आई। किसी ने दरवाज़ा खोला था।
"दरवाज़ा खुला है," मीरा ने कहा।
"देखा," मैंने कहा।
"तो अंदर कोई — "
"हाँ। कोई है।"
हम आख़िरी सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर पहुँचे। दरवाज़ा खुला था, और बाहर से हल्की पीली रोशनी आ रही थी — फाटक की लालटेन, या चाँद, जो भी था। मैंने दरवाज़े से सिर निकाला।
बंसीलाल ज़मीन पर बैठा था।
अपनी चारपाई के पास, दीवार से टिका हुआ, घुटने मोड़कर, दोनों हाथ ज़मीन पर टिकाए। उसका सिर झुका हुआ था, और पहले पल मुझे लगा कि उसके सिर से खून बह रहा है।
"बंसीलाल भाई!" मैं दौड़कर उसके पास गया और घुटनों के बल बैठ गया। "आपको — आपके सिर — "
मैंने उसका सिर छुआ। खून नहीं था। चोट नहीं थी। सिर्फ़ पसीना था, ठंडा पसीना, जो उसके झुर्रियों में भरा हुआ था।
"बंसीलाल भाई, आप ठीक हैं?"
उसने सिर उठाया। उसकी आँखें — मैंने उन आँखों में वो देखा जो मैंने अपनी माँ की आँखों में एक बार देखा था, जिस दिन उन्हें पहली बार अस्पताल में भर्ती किया गया था। वो डर नहीं था। वो कुछ और था। जैसे कोई अंदर से खाली हो गया हो।
"मैंने बत्ती जलाई," वो धीरे से बोला। उसकी आवाज़ फटी हुई थी। "मैं ऊपर था, चारपाई पर बैठा। मैंने सुना कि नीचे से आवाज़ आई — तेरी आवाज़, अंकुश। तू अपना नाम बोल रहा था। फिर उस्ताद का नाम आया। मैं उठा। मैंने सोचा कि बत्ती जलाकर नीचे देखूँ।"
उसने एक गहरी साँस ली। उसका हाथ काँप रहा था।
"मैंने लालटेन उठाई। और फिर — फिर कुछ हुआ।"
"क्या हुआ?" मीरा ने पूछा। वो मेरे पीछे खड़ी थी, पर उसकी आवाज़ में जो था, वो पत्रकार की आवाज़ नहीं थी। वो किसी बहन की आवाज़ थी।
"मुझे याद नहीं," बंसीलाल ने कहा। "मुझे बस इतना याद है कि मैंने लालटेन उठाई। और फिर मैं यहाँ बैठा था। ज़मीन पर। बत्ती बुझी हुई। और — और मेरे हाथ में ये।"
उसने अपना दाहिना हाथ उठाया।
उसकी उँगलियाँ काली थीं।
मैंने देखा। सिर्फ़ उँगलियाँ नहीं — उसकी हथेली पर कालिख की पतली लकीरें थीं, जैसे किसी ने उसका हाथ पकड़कर किसी काली चीज़ पर रगड़ा हो।
"बंसीलाल भाई," मैंने धीरे से कहा, "आपने कोई चीज़ छुई?"
उसने सिर हिलाया — ना में।
"मुझे याद नहीं।"
टिंकू ने मेरी कमर पकड़ ली। "उस्ताद," उसने फुसफुसाया। और उसकी आवाज़ में जो था, उसने मेरी रीढ़ ठंडी कर दी।
"क्या?"
"दीवार।"
मैंने मुड़कर देखा।
अस्पताल की पिछली दीवार — वही पीली दीवार जिस पर हम रोज़ गुज़रते हैं, जिस पर नया पीला बोर्ड लगा था — उस पर काले अक्षरों में कुछ लिखा हुआ था।
बड़े अक्षर। कालिख से। हाथ से।
तीन शब्द।
जोड़ना बंद करो।
मैं उठकर खड़ा हो गया। मेरे पैर अचानक भारी लग रहे थे। मैंने उन शब्दों को पढ़ा, फिर दोबारा पढ़ा, फिर तीसरी बार — जैसे बार-बार पढ़ने से वो मिट जाएँगे।
मिटे नहीं।
और हवा में एक गंध थी।
जले काग़ज़ की गंध।
तेज़। तीखी। मीठी जैसी, पर उसमें धुआँ था। वो गंध मेरी नाक से सीधे मेरे सिर के पीछे उतर गई। मेरी आँखें पानी भरने लगीं। मैंने अपना हाथ नाक पर रखा।
"मीरा," मैंने कहा। "तुम्हें भी — "
"हाँ," उसने कहा। उसकी आवाज़ भी भारी थी। "जला हुआ काग़ज़। बहुत।"
"इतना कौन जलाता है?"
"अंकुश," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ अब ठंडी हो गई थी, "ये गंध इतनी तेज़ है कि लगता है पूरा रीम जलाया गया हो। और दीवार पर ये सब लिखने में समय लगता है। किसी को यहाँ घंटों रुकना पड़ा होगा।"
"घंटों नहीं," बंसीलाल ने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ कड़ा आया। "मैं यहाँ से गया नहीं। मैं सिर्फ़ एक पल के लिए — "
वो रुक गया। उसने अपनी काली हथेली को देखा।
"मुझे कुछ याद नहीं," वो फिर बोला, और इस बार वो फूट-फूटकर रोने लगा। "मैं यहाँ तीस साल से हूँ। मैंने कितनी रातें इस अस्पताल में काटी हैं। मुझे कभी कुछ नहीं हुआ। आज — आज मुझे याद नहीं कि मैं कहाँ था।"
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा। उसका कंधा हड्डी जैसा सख़्त था।
"ठीक है," मैंने कहा। "ठीक है, बंसीलाल भाई। आप यहाँ बैठिए। मैं देखता हूँ।"
तभी शोर हुआ।
पहले दरवाज़े की तरफ़ से — और फिर बाहर से, गली की तरफ़ से — और फिर कई आवाज़ें एक साथ।
मरीज़ों के परिवार वाले आ रहे थे। जो अस्पताल के बरामदे में रात गुज़ारते हैं, चारपाई पर या फ़र्श पर, बच्चों को सीने से लगाए, कोई दवा की थैली हाथ में लिए।
शबनम आपा सबसे आगे थी। उसके हाथ में लोहे की चिमटी थी और उसके पीछे रज़िया — दोनों बहनें, जो पंद्रह साल बाद एक ही छत के नीचे आई थीं, और आज उनके चेहरे पर एक ही भाव था।
और उनके पीछे चार बच्चे — सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू।
सानिया ने दीवार देखी और उसका हाथ अपने मुँह पर चला गया।
"अंकुश भैया — " वो धीरे से बोली।
फिर सबने दीवार देखी।
और फिर जो हुआ, वो मैंने कई बार देखा है। मैंने उसे उस एक पल में शब्दों में नहीं सोचा, बस देखा। बच्चे पीछे हटे। एक औरत ने अपने बच्चे का चेहरा अपनी साड़ी में छिपा दिया। एक बूढ़ा आदमी, जिसका बेटा अंदर दवा पर था, धीरे-धीरे पीछे हटा — जैसे दीवार के शब्द उसके भी नाम लिख रहे हों।
डर।
डर जो किसी शब्द में बसता है, किसी चाकू में नहीं।
"जोड़ना बंद करो," एक औरत ने धीरे से पढ़ा। "ये क्या है? किसने लिखा?"
"मैंने नहीं," बंसीलाल ने कहा, और उसकी आवाज़ टूट गई।
"मैंने भी नहीं," मैंने कहा।
"तो किसने?" वही औरत बोली। "यहाँ तो कोई — मैं रात भर यहीं थी — किसी को — "
"इसीलिए," शबनम आपा ने कहा, और उसकी आवाज़ में जो था वो मुझे जाना-पहचाना लगा। वो डर नहीं था, वो गुस्सा था। "इसीलिए हमें सुबह सब कुछ हटाना पड़ेगा। ये लोग डराते हैं। बस यही उनका काम है।"
"ये कोई लोग नहीं," एक आदमी ने कहा। "ये जिन्नात — "
"चुप करो," शबनम आपा ने कहा। "जिन्नात काग़ज़ से नहीं जलाते। आदमी जलाते हैं।"
मीरा ने अपना कैमरा उठाया, देखा, और उसका चेहरा चला गया।
"बंद है," उसने कहा। "मैंने रात में चार्ज किया था। सोलह — "
उसने फिर देखा। इस बार ज़्यादा ज़ोर से।
"अंकुश, बैटरी है। मैंने बारह में आया था, पूरी थी।"
"अब?"
"अब बंद है।"
मैंने अपना फ़ोन निकाला — कुछ नहीं। मुझे लगा फ़ोन मरा पड़ा है, पर फॆ। नहीं — स्क्रीन जल रही थी। सिर्फ़ नेटवर्क गया था। एक लकीर भी नहीं।
तभी पीछे से कोई आया।
लाठी की आवाज़। ठक। ठक। धीमी, पर हर ठक पर पूरा बरामदा सुन रहा था।
डॉक्टर निहाल इसरानी।
सफ़ेद कोट, जो रात में भी उन्होंने पहन रखा था। हाथ में लाठी। और चेहरे पर वो भाव जो मैंने उनके चेहरे पर हमेशा देखा है — थकान, पर हार नहीं।
सबने उनके लिए रास्ता छोड़ दिया।
वो आगे आए। दीवार के सामने रुके।
उन्होंने दीवार देखी। लंबे समय तक।
फिर मुड़े।
"कोई जाने नहीं रहा है," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ में वो धीमापन था जो साठ साल के आदमी की आवाज़ में तभी आता है जब वो पूरी तरह साफ़ बोल रहा हो। "फ़र्श पर जो बैठा है, वो यहीं सोएगा। जो बच्चा है, वो यहीं करवट लेगा। जो दवा चल रही है, वो यहीं — "
"डॉक्टर साहब," वो बूढ़ी औरत बोली जो पहले पीछे हटी थी। "ये दीवार कह रही है — "
"दीवार नहीं बोलती," डॉक्टर इसरानी ने कहा। "दीवार पर कोई लिख देता है।"
"मगर फिर भी — "
"अम्मा," उन्होंने कहा, और उन्होंने उस औरत का हाथ पकड़ लिया, "इस शहर में चालीस साल से मैं यहाँ हूँ। मुझे यहाँ बारिश में छत गिरने से लोग मरे हैं। मुझे रोगियों ने अंदर से ताला लगाकर अपने आप को बंद कर लिया है। मुझे वो रातें भी याद हैं जब गली में आग लगी थी और कोई अपने घर से बाहर नहीं आया। डर हमेशा आया है। और वो हर बार यही कहता है — भागो।"
उन्होंने चारों तरफ़ देखा।
"डर इलाज से बड़ा नहीं हो सकता," उन्होंने कहा। "मैं यहाँ हूँ। दवा यहाँ है। और मैं साफ़ कहता हूँ — आज रात यहाँ से कोई नहीं जाएगा।"
कुछ लोग चुप हो गए। कुछ नहीं। मगर डर की आवाज़ थोड़ी धीमी हुई। बस थोड़ी।
तभी हबीब चाचा आए। मुझे नहीं पता वो कब आए, कब रुके। वो सीधे दीवार के सामने गए और ज़मीन पर अपना हाथ टिकाकर खड़े हो गए।
"इमरान," उन्होंने कहा।
उनकी आवाज़ भारी नहीं थी। वो धीमी थी।
"इमरान," वो फिर बोले। "मेरा बेटा। तू जो भी है, जो भी है — "
उनका गला रुक गया।
"मैं जानता हूँ तू मेरे बेटे को रखे हुए है। मैं जानता हूँ तू मुझसे कुछ चाहता है। दे दे। जो चाहिए।"
वो थोड़ा झुके और उन्होंने अपनी हथेली दीवार पर रख दी। ठीक उन अक्षरों के नीचे।
"पर बेटा," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में अब कुछ और आ गया, "बच्चा माँ-बाप के हाथ से छीनकर नहीं लिया जाता। वो सिखाया नहीं जाता। वो पूछकर लिया जाता है।"
कुछ पल कुछ नहीं हुआ।
फिर घंटी बोली।
धीमे से। मेरी जेब में।
"ये स्याही नहीं है।"
मैंने हाथ जेब में डालकर उसे दबाया।
"फिर क्या है?"
"आग की राख। जली हुई। और राख कभी झूठ नहीं बोलती। स्याही बोलती है। तेल बोलता है। पेंट बोलता है। राख — राख सिर्फ़ अपना सच बोलती है।"
"मतलब?"
"मतलब — जो यहाँ जला है, वो यहाँ से गया नहीं है। अभी भी यहाँ है।"
मैंने मुड़कर देखा।
बंसीलाल की चारपाई। वो उस पर बैठ गया था, और उसकी बगल में, धूल में, कुछ पड़ा था।
मैं वहाँ गया। झुका।
पीले रंग के छोटे-छोटे टुकड़े। बहुत छोटे। जैसे किसी ने काग़ज़ को जलाकर, फिर उसकी राख को रगड़कर यहाँ छोड़ दिया हो। पर चूरा नहीं — टुकड़े। जले हुए, पर पहचानने लायक। मैंने एक उठाया।
उसका किनारा कटा हुआ था — सीधा, चाकू से कटा हुआ, जैसे फाइल से निकाला गया हो।
"मीरा," मैंने कहा।
वो आई। उसने मेरे हाथ में वो टुकड़ा देखा और उसका चेहरा बदल गया।
"ये काग़ज़ है," उसने कहा। "मगर जला हुआ।"
"हाँ।"
"अंकुश — "
"मीरा, वो काग़ज़ जलाकर, उसकी राख से दीवार पर लिखा है।"
उसने मेरी आँखों में देखा।
"मतलब वो काग़ज़ चाहता नहीं?"
मैंने उसका हाथ पकड़ा। मेरी हथेली पर भी वो कालिख लग गई।
"नहीं," मैंने कहा। "मतलब वो काग़ज़ अब जल चुका है। उसने जो कुछ जलाया, वो अब काग़ज़ नहीं रहा। वो अब सिर्फ़ याद है। और याद सिर्फ़ उसे होती है जिसने जलाया हो।"
तभी सानिया ने चीख़ मारी।
"अंकुश भैया — दीवार — दीवार पर — "
हम सब भागकर दीवार के पास गए।
मैंने दीवार ढंग से देखी। मैंने "जोड़ना बंद करो" के नीचे वाला हिस्सा देखा। वहाँ हल्की सी धूल थी — कोई नहीं छूता उसे।
मैंने अपनी आस्तीन से उस कोने को पोंछा।
कालिख निकल आई। स्याह कालिख मेरी आस्तीन पर। और उसके नीचे —
उसके नीचे कुछ और था।
एक पतली लाइन। अक्षर छोटे। पर साफ़।
मैंने उसे पढ़ा।
"अगली बार तुम्हारा घर।"
मैंने एक कदम पीछे रखा।
क्योंकि वो कालिख मेरी आस्तीन पर थी — ताज़ी। गीली। मैंने उसे पोंछा — वो फैली। वो सूखी नहीं थी। जबकि उसके नीचे के अक्षर पुराने लग रहे थे, ऊपर वाली लाइन के।
किसी ने वो नीचे वाली लाइन पहले लिखी थी। ऊपर वाली — वो अभी भी गीली थी।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
वो समझ गई।
"अभी," उसने कहा। "अभी किसी ने इसे — "
"हाँ।"
शबनम आपा आगे आई। उसने दीवार देखी। उसने फिर उस कोने पर अपनी उँगली फेरी और अपनी उँगली देखी।
"कौन?" उसने कहा। उसकी आवाज़ मुझे कभी इतनी सख़्त नहीं लगी थी।
"आपा — "
"मैंने पूछा कौन?" वो मुड़ी। उसने वहाँ खड़े सब लोगों को देखा — मरीज़ों के परिवार, बूढ़े, बच्चे, डॉक्टर, मुझे, मीरा, टिंकू, उस्ताद, हबीब चाचा — "
"हम यहाँ सब खड़े हैं," उसने कहा। "और किसी ने — अभी, इसी वक़्त — दीवार के नीचे कुछ ज़्यादा — "
वो रुकी। उसने अपनी चिमटी उठा ली।
"मैं अपनी गुमटी की तरफ़ जाने वाले रास्ते पर खड़ी थी," उसने कहा। "तुम सब यहाँ थे। डॉक्टर साहब दरवाज़े पर थे। हबीब चाचा दीवार के सामने थे। रज़िया मेरे पीछे थी। बच्चे सीढ़ी पर थे। तो — "
"तो कोई यहाँ नहीं था," रज़िया ने धीरे से कहा।
"मगर ये कालिख गीली है," मैंने कहा।
डॉक्टर इसरानी ने अपनी लाठी आगे टिकाई और वो उस पर झुके। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो नहीं था जो बाकी लोगों की आँखों में था। उन्होंने डर नहीं दिखाया। उन्होंने सवाल दिखाया।
"बेटा," उन्होंने कहा, "क्या ये लिखने वाला जानता है कि तू यहाँ रुकेगा? या वो सिर्फ़ ये जानता है कि तू डरेगा?"
मैंने उन्हें देखा। उन्होंने अपनी लाठी उठाई और उससे दीवार की तरफ़ इशारा किया।
"डरने वाला भागता है," उन्होंने कहा। "और भागने वाला अपना घर खाली छोड़ जाता है। अगर तू अभी भागेगा, तो वो जीत जाएगा। तेरे घर पर कब्ज़ा कर लेगा।"
मैंने उन्हें देखा।
"आपको कैसे पता, डॉक्टर साहब? कि वो मेरे घर की बात कर रहा है?"
वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखते रहे। फिर उन्होंने अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा — हल्का, पर मज़बूत।
"क्योंकि ये पहली बार नहीं हो रहा, बेटा," उन्होंने कहा। "पाँच साल पहले भी यहाँ के दरवाज़े पर ऐसा ही कुछ लिखा मिला था। उस रात शंकर यादव यहाँ आया था।"
मेरी छाती में कुछ जम गया।
"पाँच साल पहले?" मैंने कहा।
"हाँ।"
"और वो लिखा क्या था?"
डॉक्टर इसरानी ने एक गहरी साँस ली। उन्होंने अपनी लाठी को अपने दोनों हाथों से पकड़ा।
"उस रात — यही लिखा था," उन्होंने कहा। "अगली बार तुम्हारा घर।"
मैंने सुना। मेरे अंदर कुछ ऐसा हिला जो मैंने पाँच साल से नहीं छुआ था। याद? नहीं — याद का एहसास। जैसे किसी ने एक ताला खोलकर उसके पीछे की हवा छोड़ दी हो।
"तो पाँच साल पहले — "
"पाँच साल पहले," डॉक्टर इसरानी ने कहा, "बात सिर्फ़ काग़ज़ तक रही थी। अंकुश — "
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में अब कुछ और था।
"आज ये लाइन लिखने वाला बताना चाहता है कि ये काग़ज़ पाँच साल से यहाँ नहीं है। ये काग़ज़ हमेशा से तेरे घर में है।"
मैं सुनता रहा।
और घंटी, जो अब तक चुप थी, फुसफुसाई।
"अब तेरा नाम लिया जा रहा है।"
"क्या मतलब?" मैंने धीरे से पूछा।
"सीढ़ियों पर तूने अपना नाम बोला था।"
"हाँ।"
"तीन बार बोला।"
"घंटी, ऐसा मत कर। सीधा बोल।"
उसने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ में वो जल्दी थी जो मैंने उसी रात सुनी थी — जब वो फुसफुसाई थी "नाम बोल, फिर से नाम बोल"।
"पहली बार तूने अपना नाम बोला — सीढ़ी तले। दूसरी बार नाम बोला — उससे पहले रात। तीसरी बार तूने अपना नाम बोला — अभी, ऊपर आकर, मीरा ने तुझे बुलाया।" वो हिली। "और हर बार — हर बार — तूने अपना नाम बोला, जगदीश यादव का पोता। कोई पूछ ही नहीं रहा था।"
मेरे मुँह का पानी सूख गया।
"तो?"
"तो अब वो तेरे पापा के नाम की तरह तेरे नाम से भी खेल सकता है," घंटी ने कहा। "क्योंकि तूने उसे दे दिया।"
शबनम आपा ने चिमटी अपनी पीतल की थाली पर पटक दी।
"अब बहुत हुआ," उसने कहा। "मैं उसका नाम नहीं जानती। मैं उसे देखना नहीं चाहती। मगर जो भी है — इस दीवार पर यह सब लिखकर, मेरे मोहल्ले में सबको डराकर — वो जानता है मैं सबको सच बताऊँगी।"
उसने मुड़कर सबको देखा।
"जो डरना चाहता है, डरे," उसने कहा। "मैं अपनी गुमटी यहीं से थोड़ी दूर खोलूँगी। और जो भी यहाँ से जाना चाहे, वो जाए। पर जो रुकेगा — मेरे पास सुबह की चाय मुफ़्त है।"
बूढ़ी औरत, जो पहले पीछे हटी थी, अपने पोते को सीने से लगाकर खड़ी रही। फिर उसने अपना हाथ बढ़ाया और शबनम आपा की तरफ़ बढ़ाया।
"मैं रुकूँगी," उसने कहा।
और फिर एक-एक करके और भी हाथ उठे।
मरीज़ों के परिवार, रज़िया, बूढ़ा आदमी, उस्ताद, टिंकू — सब।
मैंने देखा।
मैंने घंटी को जेब में दबाया।
"घंटी," मैंने धीरे से कहा।
"बोल।"
"ये काग़ज़ — जो जलाया गया — क्या वो अब कोई काम नहीं आएगा?"
घंटी ने मुझे जवाब दिया। और उसका जवाब मुझे अच्छा नहीं लगा।
"जलाया गया काग़ज़ किसी काम नहीं आएगा," उसने कहा। "मगर जलाने वाले का हाथ — हाथ हमेशा काम आता है।"
"मतलब?"
"मतलब — जिसने ये जलाया, उसने अपना कुछ जलाया है। उसकी उँगलियों की खुशबू अभी यहाँ है। वो हवा में है।"
मैंने अपनी नाक भरी।
और मुझे लगा — हाँ, वो सिर्फ़ जले काग़ज़ की गंध नहीं थी। उसमें कुछ और था। कुछ जैसे — मैंने इसे पहले सूँघा है।
किसी का हाथ। किसी का पसीना।
किसी की त्वचा।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"मीरा, तुम कुछ सूँघ रही हो?"
उसने नाक भरी। फिर उसका चेहरा बदला।
"अंकुश," उसने कहा। "ये केवल काग़ज़ नहीं जला है। इसमें — इसमें तेल भी जला है। मिट्टी का तेल।"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उनकी आँखें कुछ सिकोड़ी हुई थीं।
"उस्ताद," मैंने कहा। "आपको कुछ याद आ रहा है?"
वो मेरी तरफ़ देखने लगे। फिर धीरे से बोले।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "इस तेल की गंध — ये वही तेल है जो सलीम के दफ़्तर में जलता है।"
मैंने एक कदम पीछे रखा।
"सलीम बक्श?"
उस्ताद ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने सिर्फ़ अपनी आँखें बंद कर लीं।
और घंटी, मेरी जेब में, फिर फुसफुसाई। और इस बार उसकी आवाज़ में जो था, वो मैंने पहले कभी नहीं सुना — सिर्फ़ थोड़ी-सी नरमी, जो बहुत बड़ी बात होती है, जब घंटी जैसी चीज़ नरम हो।
"अंकुश।"
"हाँ।"
"आज रात सो मत।"
"क्यों?"
"क्योंकि आज रात — तेरे नाम की बारी है।"
मैंने दीवार को देखा। उन ताज़ी लिखी लाइनों को देखा।
"अगली बार तुम्हारा घर।"
और मैंने अपने आप से कहा, बहुत धीरे, इतना धीरे कि कोई सुन न सके — सिर्फ़ मैं सुन सकूँ। मैंने कहा कि अगर ये मेरे घर की बात कर रहे हैं, तो ठीक है। मेरे घर में अब एक भी खाली कमरा नहीं है जिसे छिपाया जा सके। मेरे घर की दीवारें मीरा को जानती हैं, टिंकू को जानती हैं, माँ को जानती हैं, पापा को जानती हैं, काजल को जानती हैं। मेरे घर में बंसीलाल जैसे आदमी ने तीस साल नौकरी की है और आज मुझे उसका नाम पता है।
और घर सिर्फ़ ईंटों का नहीं होता।
घर वो होता है जहाँ लोग तुम्हारा नाम जानते हों।
वो अगर मेरा नाम ले रहा है, तो ठीक है।
क्योंकि मेरा नाम लेने वाले को ये भी जानना पड़ेगा कि मेरा नाम किसके साथ लिखा है।
मैंने हबीब चाचा की तरफ़ देखा। वो अब भी दीवार के सामने खड़े थे, अपनी हथेली दीवार पर टिकाए हुए। मैं उनके पास गया।
"हबीब चाचा," मैंने कहा।
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें सूखी थीं।
"इमरान लौटेगा," मैंने कहा।
"कैसे?"
"उसका नाम भी अभी किसी काग़ज़ पर लिखा जा रहा है," मैंने कहा। "और आज रात उस काग़ज़ को लाने वाला कोई है।"
उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। उनका हाथ सख़्त था।
"मैं साथ चलूँगा," उन्होंने कहा।
"अभी नहीं," मैंने कहा। "पहले मुझे दीवार का वो हिस्सा देखना है जो अभी मेरी आँख के सामने बदल रहा है।"
मैं दीवार के पास लौटा। मैंने देखा।
वो लाइन — "अगली बार तुम्हारा घर" — अब भी वहीं थी।
पर उसके नीचे, बहुत धीमे, और भी कुछ उभर रहा था।
जैसे कोई राख को दबा रहा हो। जैसे कोई उँगली से अभी-अभी कुछ और लिख रहा हो।
मैंने आँखें सिकोड़ी।
और मैंने पढ़ा।
"घर वो नहीं जिसमें तुम रहते हो। घर वो है जिसके लिए तुम लड़ते हो।"
मैं ठिठक गया।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"ये — ये मैंने नहीं लिखा," मैंने कहा।
"मुझे पता है," उसने कहा।
"मैंने यह सोचा था, मगर — "
"अंकुश, तूने सोचा था। और ये लिखा हुआ है।"
वो मेरी तरफ़ देखने लगी। उसकी आँखों में जो था, वो डर नहीं था। वो हैरानी थी।
"अंकुश," उसने धीरे से कहा, "ये दीवार तेरे साथ है।"
और घंटी ने, मेरी जेब में, एक बार फिर से बजकर कहा।
"अब तू जान गया। ये दीवार नहीं है। ये तेरा दरवाज़ा है। जो तूने अभी खोला है।"
मैंने दीवार को देखा।
मैंने उस की ओर अपनी हथेली बढ़ाई।
और कुछ पल के लिए — बस कुछ पल के लिए — मुझे लगा कि दीवार गरम है।
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