The Mysterious Bell – Chapter 171: jodne wala mistri hissa 018 ep171-180
घंटी की वो आख़िरी बात मेरे कान में बैठी रही, और मैं चारपाई पर बैठा सुबह की पहली किरण का इंतज़ार करता रहा।
तेरी याद लाएगा।
मेरी याद।
मैंने आँखें बंद कीं और मन में एक-एक चीज़ गिनने लगा — मेरे पास क्या है जो याद कहलाता है? दुकान? साइकिल? घंटी? माँ का हाथ? पापा की चुप्पी? काजल की डाँट? या वो दिन जब दादा की साइकिल पहली बार मेरे हाथ में आई थी और मैंने उसकी घंटी बजाई थी और घंटी ने कुछ नहीं कहा था, बस बजी थी, जैसे कोई बच्चा हँस दे?
कोई जवाब नहीं आया।
और जब जवाब न आए, तो आदमी को नींद भी नहीं आती। बस करवट बदलता रहता है और छत को देखता है, जैसे छत कोई किताब हो और उस पर जवाब लिखा हो।
मैं उठा। पाँच बजे से पहले।
आँगन में अंधेरा था, बस पूरब की तरफ़ आकाश थोड़ा धुँधला सफ़ेद हो रहा था, जैसे किसी ने दूर से एक उबलता हुआ कपड़ा निचोड़ दिया हो।
मैंने मुँह धोया। पानी ठंडा था। मैंने हथेलियों में पानी लेकर आँखों पर मारा और वहीं खड़े-खड़े सोचा — आज मशीन आनी थी। आज वो दिन था जिसका डर पूरी गली को तीन रात से चूस रहा था।
मैंने पीछे वाले कमरे से काग़ज़ों का बंडल उठाया। कपड़े में लिपटा हुआ। भारी नहीं था, पर हाथ में ऐसा लगा जैसे कोई ईंट पकड़ी हो।
फिर मैंने घंटी देखी।
धागे से बँधी, हथेली पर रखी, मटमैली। मैंने उसे जेब में डाला और दो गाँठें कस दीं। काजल ने कहा था — जेब के अंदर रहेगी तो बजेगी नहीं, पर हिलेगी। मुझे लगा, आज हिलना ही काफ़ी है।
घर से निकलते वक़्त माँ की आवाज़ आई।
"अंकुश।"
मैं रुका।
वो बैसाखी के सहारे दरवाज़े तक आई थीं। चेहरा धुँधला था, पर आँखें साफ़। माँ की आँखें जब साफ़ होती हैं, तो उनसे बहस नहीं की जाती।
"बंद दरवाज़ा," उन्होंने कहा। "याद रखना। जिस दिन खोलो, मुझे साथ रखना।"
"माँ, आज तो मशीन का दिन है —"
"मैंने मशीन के बारे में नहीं पूछा।" उन्होंने बैसाखी टिकाई। "मैंने दरवाज़े के बारे में कहा। तू जवाब मत दे। बस याद रख।"
मैंने सिर हिलाया। और जब मैं मुड़ा, तो पीछे से उन्होंने बहुत धीरे से कहा, "और हाँ, जो काग़ज़ ले जा रहा है — उसे सीने से लगाकर मत चल। आज सबके सामने रखना है। सीने से लगी चीज़ सच नहीं बोलती।"
मैं हँसा। सच में हँसा। माँ का यही तो कमाल है — जब सबसे ज़्यादा डर लग रहा होता है, तब वो ऐसी बात कहती हैं कि डर शर्मिंदा हो जाता है।
पीपल पर पहुँचा तो छह का ठीक समय था। सूरज निकला नहीं था, पर पीपल की पत्तियाँ रोशनी पकड़ चुकी थीं, ऊपर से नीचे तक हरी-पीली चमक रही थीं।
चबूतरी पर लोग पहले से थे।
मीरा सबसे पहले। कैमरा तिपाई पर, बाल बँधे, आँखों के नीचे काला — कल रात भी इसने सोया नहीं। उसके पास एक मोटा काग़ज़ था जिस पर उसने रात भर सब कुछ लिखा था — तारीख़ें, काग़ज़, नाम, गोल मोहर वाले लोग।
उस्ताद अली बक्श चबूतरी के किनारे बैठे थे, गोद में कपड़े में लिपटी वो लाल जिल्द वाली कॉपी। उनका मोटा चश्मा आज कान पर पेंसिल के साथ नहीं था। आज चश्मा सीधा था। यही सबसे डरावना था।
शबनम आपा खड़ी थीं। उनके हाथ में चिमटी नहीं थी, एक स्टील का गिलास था। और उनके पीछे रज़िया खड़ी थी — सफ़ेद दुपट्टा, हाथ में वो टेप से बँधा सूटकेस नहीं, आज बस एक छोटा थैला।
मेरे पापा चबूतरी के उस सिरे पर खड़े थे। भूरी फाइल सीने से चिपकाए। बोल नहीं रहे थे। बस खड़े थे। और उनका खड़ा होना ही मेरे लिए उस दिन की सबसे बड़ी खबर थी।
काजल आई, हाथ में दवा के दो पत्ते, और पीछे-पीछे टिंकू, सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू — पाँचों।
टिंकू के सिर पर माँ का गुलाबी दुपट्टा बँधा था और आँख पर वही काला एक काँच वाला चश्मा। मैंने कहा, "टिंकू, आज गुप्तचर नहीं, गवाह बनना है। दुपट्टा उतार।"
उसने उतारा, पर चश्मा नहीं उतारा। बोला, "उस्ताद, चश्मा जानकारी के लिए है, गुप्तचर के लिए नहीं।"
कुछ लोग हँसे। अच्छा हुआ। सुबह छह बजे हँसी बहुत काम की चीज़ है।
फिर सब चुप हो गए और मेरी तरफ़ देखने लगे।
मैंने काग़ज़ों का बंडल चबूतरी पर रखा। कपड़ा खोला। रसीदें, फाइल, पीला पन्ना, लोहे की चिट्ठी, कतरन, कॉपी — सब।
फिर मैंने कहा, "मैं लंबा भाषण नहीं दूँगा। मुझसे नहीं होता। बस तीन बातें।"
"एक — आज हम मशीन रोकने नहीं जा रहे। हम यह देखने जा रहे हैं कि काग़ज़ पर लिखा क्या है। जो काग़ज़ पर लिखा है, वो सबका है। और जो सबका है, उसे कोई एक आदमी अपनी जेब में नहीं रख सकता।"
"दो — कोई भी अकेले नहीं बोलेगा। हम बारी-बारी बोलेंगे। एक बोलेगा, बाकी खड़े रहेंगे। और जब कोई हमें डराने की कोशिश करे, तो हम उसकी तरफ़ देखेंगे, आँख नीची नहीं करेंगे। डर सबसे ज़्यादा तब बढ़ता है जब आदमी आँख नीची कर लेता है।"
"तीन —" मैंने घंटी को जेब के बाहर से छुआ। "आज हम किसी को हराने नहीं जा रहे। हम सिर्फ़ इतना कहने जा रहे हैं कि यह गली, यह अस्पताल, यह स्कूल, यह दुकान — यह हमारी है। और हमारी चीज़ के बारे में हमसे पूछा जाएगा। बस।"
कुछ देर चुप्पी रही।
फिर उस्ताद ने कहा, "और चौथी बात मैं कहूँगा।" उन्होंने कॉपी उठाई। "जो आदमी काग़ज़ पर मुहर लगाता है, वो अगर रुक जाए तो काग़ज़ काग़ज़ नहीं रहता — बस काग़ज़ बन जाता है। आज हमें मुहर रोकनी है। चिल्लाकर नहीं। खड़े होकर।"
शबनम आपा ने गिलास मेज़ पर रखा — टक। बोलीं, "चलो फिर। मेरी गुमटी आज बंद है। चूल्हा रात से बंद है। जब तक यह काग़ज़ साफ़ नहीं होता, चाय नहीं बनेगी।"
रज़िया ने धीरे से कहा, "मैं साथ चलूँगी।"
शबनम ने उसकी तरफ़ देखा। देखा, और कुछ नहीं कहा। बस सिर हिलाया। बहनों के बीच यह सिर हिलाना बहुत बड़ी बात है, तुम नहीं समझोगे।
हम निकले।
गली से बाहर निकलते वक़्त मैंने पीछे मुड़कर देखा। पूरी गली पीछे आ रही थी। साठ-सत्तर लोग। कोई धोती में, कोई पैंट में, कोई नंगे पैर, कोई चप्पल पकड़े हुए।
मेरे पीछे पापा थे। बिना बोले। भूरी फाइल सीने से लगाए।
और मुझे अचानक लगा कि मैं जितना समझ रहा था, उससे ज़्यादा बड़ा कुछ हो रहा था। मैं साइकिल मरम्मत करने वाला लड़का था, और मेरे पीछे पूरी गली चल रही थी, जैसे कोई साइकिल नहीं, एक पूरा मोहल्ला हवा भरकर चला जा रहा हो।
दफ़्तार सात बजे खुलता था। हम सात बजे से पहले पहुँच गए। पुरानी पीली इमारत, हरी खिड़कियाँ, बाहर सीमेंट की बेंच, और बेंच पर एक बूढ़ा बैठा था जो छह महीने से आ रहा था और जिसका काग़ज़ नहीं बन रहा था।
सात बजे गेट खुला।
हम अंदर गए। गलियारा लंबा था, छत ऊँची, और ऊपर से पंखे धीरे घूम रहे थे, जैसे उन्हें भी नींद आ रही हो।
मेज़ पर एक क्लर्क बैठा था। पतला, चश्मा नाक पर, सामने रजिस्टर खुला, और उसकी अगल-बगल में काग़ज़ों के ढेर।
मैंने कहा, "साहब, नूर अस्पताल की ज़मीन का काग़ज़। आज पहली तारीख़ थी।"
उसने सिर उठाया। मुझे देखा। फिर मेरे पीछे खड़ी भीड़ को देखा। और उसका चेहरा बदल गया — वो चेहरा जो क्लर्कों के पास सिर्फ़ भीड़ देखकर आता है।
उसने रजिस्टर में उँगली रखी और बोला, "काग़ज़ रुक गया है।"
मैं ठिठका।
"रुक गया? साहब, आज पहली तारीख़ थी। आपने खुद लिखा था — पंद्रह दिन की कार्रवाई, पहली तारीख़ आज।"
"था," उसने कहा। "अब नहीं है।" और उसने एक पतला काग़ज़ उठाकर मेरी तरफ़ सरका दिया।
मैंने उसे उठाया।
उस पर लिखा था कि अस्पताल की ज़मीन के पीछे वाला हिस्सा, जहाँ से पानी की पुरानी लाइन गुज़रती है, उस पर नया विवाद खड़ा हुआ है। मतलब — उसी ज़मीन के एक टुकड़े पर किसी ने दावा ठोक दिया है कि वहाँ का पानी उसका है।
मैंने काग़ज़ मीरा को दिया। मीरा ने पढ़ा। उसका चेहरा सख़्त हो गया। उसने कहा, "साहब, यह दावा किसने ठोका?"
क्लर्क ने कंधे उचकाए। "यह मैं नहीं जानता। जिसने ठोका, वो काग़ज़ में लिखा है। पर जब तक पानी का नया काग़ज़ नहीं बनेगा, ज़मीन का काम आगे नहीं बढ़ेगा। यह ऊपर का आदेश है।"
"कितने दिन?" मैंने पूछा।
"पानी के काग़ज़ में जितने दिन लगेंगे।"
"और उतने दिन में —"
"उतने दिन में," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो थकान थी जो ऐसे आदमियों की होती है जो सुबह से जानते हैं कि वो किसी और का काम कर रहे हैं, "उतने दिन में कुछ नहीं होगा। न मशीन, न तारीख़, न काग़ज़।"
मैं चुप खड़ा रहा।
और तभी — मुझे पता नहीं तुम कैसे समझोगे — मुझे अपनी जेब में घंटी ठंडी लगी। बहुत ठंडी। न बजी, न कुछ कहा। बस ठंडी हो गई, जैसे किसी ने उसे बर्फ़ में दबा दिया हो।
फिर दफ़्तार के दरवाज़े से एक आवाज़ आई।
"अरे, यह तो अच्छी खबर है।"
मैं मुड़ा।
बबलू पांडे दरवाज़े पर खड़ा था। पान चबाते हुए। गले में चेन नहीं थी — वो चेन पिछले हफ़्ते गायब हुई थी और आज भी नहीं लौटी थी — पर उसकी जगह उसने एक मोटा सफ़ेद रूमाल बाँध रखा था, जैसे चोट छुपा रहा हो।
वो मुस्कुराया।
और मैं तुम्हें सच बताता हूँ — बबलू की मुस्कान रणवीर की मुस्कान से भी ज़्यादा खतरनाक है। क्योंकि रणवीर की मुस्कान में हिसाब होता है। बबलू की मुस्कान में सिर्फ़ खुशी होती है। और वो खुशी तब आती है जब वो किसी को तकलीफ़ में देखता है।
"अंकुश भाई," उसने कहा, "आज तो तुम्हारा बड़ा दिन था ना? मशीन, काग़ज़, सब।" उसने पान थूका — साफ़, दफ़्तार की सीढ़ी पर, बिल्कुल साफ़ निशाने से। "पर शहर बदल गया है भाई। अब शहर में पानी भी काग़ज़ माँगता है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। सीधा।
"किसने ठोका दावा?"
"मैं क्या जानूँ?" उसने कंधे उचकाए। "मैं तो आदमी हूँ, वकील नहीं।" और फिर वो थोड़ा आगे झुका और धीरे से बोला, "पर हाँ, एक बात सुन लो। जिस ज़मीन के पीछे पानी हो और पानी के पीछे कोई और बैठा हो — वो ज़मीन कभी किसी गरीब की नहीं होती।"
वो हँसा और मुड़कर चला गया। जाते-जाते उसने उस्ताद को देखा और सिर झुकाकर अभिवादन किया — जैसे गली का छोटा आदमी बड़े आदमी को करता है। उस्ताद ने जवाब नहीं दिया।
पीछे से टिंकू ने कहा, "उस्ताद, ये बात जो उसने कही — पानी के पीछे कोई और बैठा है। इसका मतलब?"
"मतलब," मीरा ने कहा, "कि यह दावा ख़ुद से नहीं आया। किसी ने बैठकर बनाया है। और उसके पीछे कोई है।"
मैंने काग़ज़ों का बंडल उठाया।
"चलो," मैंने कहा। "दफ़्तार से अभी कुछ नहीं निकलेगा। पहले देखते हैं कि इस काग़ज़ की असली ताक़त कहाँ बैठी है।"
हम गली लौटे।
और जब गली में दाख़िल हुए, तो मुझे लगा कि हम किसी और गली में आ गए हैं।
सबसे पहले नल दिखे।
मोहाने वाला पुराना नल, पत्थर के टैंक के पास वाला। वो सूखा था। मतलब — सूखा तो वो कभी-कभी होता था, पर आज उसके नीचे बाल्टियाँ रखी थीं और बाल्टियाँ खाली थीं। पाँच बाल्टियाँ, पाँचों खाली। और उनके चारों तरफ़ पानी के छींटे भी नहीं थे।
आगे चले तो पीपल के नीचे एक टैंकर खड़ा था। पुराना टैंकर, पीले रंग का, पीछे लोहे की टंकी, और उसके ऊपर एक आदमी बैठा था जो रस्सी से खेल रहा था।
शबनम आपा ने पूछा, "भाई, एक बाल्टी।"
टैंकर वाले ने सिर हिलाया।
"क्यों?"
"काग़ज़ नहीं है," उसने कहा, जैसे कोई मज़ाक बता रहा हो।
"क्या काग़ज़?"
"पानी का काग़ज़।" उसने रस्सी खींची। "ऊपर से आया है — जब तक पानी की नई लाइन का काग़ज़ नहीं बनता, किसी टैंकर को गली में पानी नहीं डालना। और हमें साफ़ कह दिया गया है — एक बूँद भी नहीं।"
"भाई, यह गली है," मैंने कहा। "यहाँ बच्चे हैं, बूढ़े हैं। पानी नहीं मिलेगा तो सब क्या करेंगे?"
टैंकर वाले ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो लाचारी थी जो काग़ज़ के नीचे दबे आदमी की होती है।
"भाई," उसने बहुत धीरे कहा, "मुझे माफ़ कर दो। मेरे चार बच्चे हैं और मैं चाहकर भी नहीं दे सकता। मेरा टैंकर भी उसी काग़ज़ पर चलता है।"
मैंने सिर हिलाया। मैंने उसे कुछ नहीं कहा। मुझे पता था — यह आदमी दुश्मन नहीं है। यह भी उसी मशीन का एक पुर्ज़ा है जो हमें कुचलने आई थी। बस इस पुर्ज़े को खुद नहीं पता कि वो किस मशीन में लगा है।
फिर मेरी नज़र पीपल के उस तरफ़ गई।
वहाँ हबीब चाचा का पुराना हैंडपंप था।
पीतल का, लोहे का, उन्नीस-बीस साल पुराना, जिस पर बच्चे झूलते थे और जिसे हबीब चाचा रोज़ सुबह चलाते थे — ठक-ठक-ठक, और पानी आता था, ठंडा, मीठा। मैं बचपन से वहीं पानी पीता आया हूँ।
आज वो हैंडपंप टूटा पड़ा था।
उसका लीवर बीच से मुड़ा हुआ था, और उसका ढक्कन बगल में धूल में पड़ा था।
हबीब चाचा वहीं बैठे थे। सफ़ेद दाढ़ी, टोपी आँखों तक, चप्पल उतारकर बगल में रखी थी और वो अपने हाथों को देख रहे थे, जैसे अपने हाथों से अब कोई उम्मीद टूट गई हो।
मैं दौड़ा।
"चाचा, यह कब टूटा?"
"आज सुबह।"
"कैसे?"
"मैंने चलाया," उन्होंने कहा, "और वो टूट गया। बस।" और फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो गुस्सा था जो पचास साल के पानी के बाद आता है। "बीस साल से मैं इसे चला रहा हूँ। बीस साल। इससे कभी एक बाल्टी कम पानी नहीं आया। और आज — जिस दिन मशीन आनी थी — टूट गया।"
मैंने लीवर को हाथ लगाया। मुड़ा हुआ था, पर ज़ंग नहीं खाया था। टूटा नहीं था, जान-बूझकर मोड़ा गया था।
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उस्ताद ने सिर हिलाया।
हम दोनों जान गए थे।
"चाचा," मैंने धीरे से कहा, "यह मज़बूती से मोड़ा गया है। किसी ने पीछे से पकड़कर झटका दिया है।"
हबीब चाचा उठे।
और फिर वो कुछ ऐसा बोले जो मैंने उनके मुँह से ज़िंदगी में पहली बार सुना।
"जानता हूँ," उन्होंने कहा। "और मुझे यह भी पता है किसने झटका दिया।"
मैं चुप हो गया।
"चार दिन पहले," चाचा ने कहा, "मेरा बेटा आया था। इमरान।" उन्होंने उसका नाम ऐसे लिया जैसे कोई कड़वी दवा मुँह में रखता है। "वो आजकल रणवीर की साइट पर काम करता है। बीस हज़ार महीने का। उसने ठेकेदारी की काग़ज़ात की बात की। मैंने कहा — बेटा, उस आदमी का नाम मत लेना मेरे आँगन में। वो हँसा, बोला — अब्बा, आपके ज़माने का ईमान किसी कबाड़ी के पास गिरवी रखा है। फिर पानी पर बात आई। मैंने कहा, पानी तेरे ठेकेदार की ज़मीन में नहीं बहता, मेरे हैंडपंप में बहता है। और वो चला गया।"
वो फिर बैठ गए।
और मैंने उनकी आवाज़ में वो चीज़ सुनी जिसे मैं बहुत अच्छी तरह जानता हूँ, क्योंकि मैंने वो चीज़ अपने पापा की आवाज़ में सालों सुनी है।
चुप्पी। बस चुप्पी। एक आदमी जो अपने बेटे से बात नहीं कर पा रहा, और वो बात नहीं कर पाने की वजह खुद है, और वो जानता है।
"चाचा," मैंने कहा, "इमरान का नंबर है?"
"मत बुला उसे," उन्होंने कहा। "वो अब कभी इस गली में नहीं आएगा। उसका नया नाम है, नई आँखें हैं। वो मुझे भी नहीं पहचानेगा।"
"चाचा —"
"मत बुला," उन्होंने दोहराया। "एक हैंडपंप ज़्यादा तोड़ना है क्या?"
मैंने कुछ नहीं कहा।
मैंने हैंडपंप के मुड़े लीवर पर हाथ रखा।
अपने हिसाब से सोचने लगा — मुझे यह ठीक करना है। बस एक लीवर है, मुड़ी हुई धातु है, दो घंटे का काम। फिर यह पानी देगा। फिर गली का पानी वापस आएगा। और फिर मुझे काग़ज़ नहीं चाहिए। काग़ज़ का जवाब लोहे से।
मैंने घंटी को जेब में छुआ।
और घंटी ने कहा — चार शब्द।
"नल नहीं, रिश्ता।"
मैं रुक गया।
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
क्योंकि मुझे समझ आ गया।
हम चारों तरफ़ से घिरे हुए थे, और सबका दरवाज़ा एक ही था — पानी। रणवीर ने इमारतें नहीं गिराईं, ईंटें नहीं तोड़ीं। उसने बस एक काग़ज़ बनवाया — पानी का काग़ज़ — और पूरी गली प्यासी हो गई।
और ज़्यादा बड़ी बात यह थी कि उस काग़ज़ की सबसे मज़बूत कील जो थी, वो हबीब चाचा के अपने बेटे के हाथ में थी।
क्योंकि साइट पर काम करने वाले लोगों को पता होता है कि साइट कैसे चलती है। और उस काग़ज़ पर किसका हाथ है, यह सिर्फ़ वही बता सकता है जो अंदर खड़ा हो।
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
उस्ताद ने धीरे से कहा, "घर के अंदर से दरवाज़ा खोलना पड़ता है। बाहर से धक्का देने से दीवार गिरती है, दरवाज़ा नहीं खुलता।"
और तभी —
पीछे से एक आवाज़ आई।
"अब्बा।"
मैं मुड़ा।
गली के मुँह पर एक लड़का खड़ा था। उम्र पच्चीस-छब्बीस के आसपास। सिर पर पीला हेलमेट, हाथ में झोला, पैरों में साइट के जूते, कपड़ों पर सीमेंट की सफ़ेद धूल, और आँखों में वो शर्म जो बेटे की आँखों में तब आती है जब वो अपने बाप के सामने खड़ा होता है और नहीं जानता कि क्या कहे।
हबीब चाचा ने सिर उठाया।
चेहरे पर कुछ नहीं था। बिल्कुल कुछ नहीं। और यही सबसे बुरा था।
इमरान ने हेलमेट उतारा। उसने एक कदम आगे रखा और फिर रुक गया, जैसे गली ने उसे अंदर आने से मना कर दिया हो।
फिर उसने कहा — और उसकी आवाज़ पूरी गली ने सुनी, क्योंकि उस वक़्त गली में कोई नहीं बोल रहा था —
"मैं पानी लाऊँगा।"
हबीब चाचा के हाथ काँपे।
"पर अपने बाप के आँगन से नहीं।"
वो चुप हो गया।
शबनम आपा ने मेरी तरफ़ देखा। उस्ताद ने अपनी कॉपी सीने से और कसकर पकड़ ली। मीरा ने धीरे से कैमरा उठाया और मैंने हाथ से रोका — अभी नहीं। कुछ चीज़ें कैमरे के लिए नहीं होतीं।
मैंने इमरान की तरफ़ देखा।
और मुझे अचानक वो पल याद आया जब पापा ने कहा था — पच्चीस साल की चुप्पी ने मुझे बचाया नहीं, खोखला किया।
मैंने घंटी जेब में छुई।
वो ठंडी थी। पर हिल रही थी।
जैसे किसी की साँस।
मैंने एक कदम आगे रखा और सोचा — अब जो भी होगा, इस रिश्ते से होगा। काग़ज़ से नहीं। पानी से नहीं। इस बाप और इस बेटे के बीच से होगा।
और मुझे सच में नहीं पता था कि मैं क्या कहने वाला हूँ। पर मुझे इतना पता था कि अगर आज मैंने यहाँ गलत शब्द बोला, तो कल गली में पानी फिर भी नहीं आएगा, और रिश्ता तो कभी नहीं आएगा।
मैंने मुँह खोला।
घंटी खुद भी चुप थी। जैसे वो भी सुनना चाहती हो कि मैं क्या कहता हूँ।
॥
मैंने मुँह खोला, पर पहला शब्द इमरान ने नहीं, गली ने बोला।
क्योंकि जैसे ही मैंने कदम आगे बढ़ाया, पीछे से बाल्टियों की आवाज़ आई। लोहे के हैंडल पत्थर पर टकराए। कोई किसी से कह रहा था, "तेरी बारी बाद में, पहले मेरी।" कोई कह रहा था, "सुबह से खड़ी हूँ, एक बूँद नहीं मिली।"
हबीब चाचा ने इमरान की तरफ़ देखा।
देखा। ठीक से देखा। अपने बेटे को देखा, जो गली के मुँह पर खड़ा था, हेलमेट हाथ में, सीमेंट की धूल से सफ़ेद, और आँखों में वो टूटापन जो बीस साल की चुप्पी में ढल जाता है।
और फिर हबीब चाचा ने नज़र हटा ली।
न हाँ, न ना। न गुस्सा, न प्यार। बस हटा ली। जैसे कोई दीवार पर का पोस्टर देखकर आँख फेर लेता है।
इमरान के हाथ से हेलमेट फिसला।
फिर उसने उसे उठाया, झोले में डाला, और बिना कुछ कहे गली के किनारे पत्थर पर बैठ गया।
न गया। न आया।
मैं बीच में खड़ा रह गया।
काजल मेरे पीछे आई और धीरे से बोली, "कुछ बोल क्यों नहीं रहा?"
"सोच रहा हूँ," मैंने कहा।
"क्या सोच रहा है?"
"कि बाप-बेटे की चुप्पी में खुद से ज़्यादा मेरा वक़्त गया है, यह सोच रहा हूँ। और मुझे यह भी नहीं पता कि इसमें मेरा हक़ क्या है।"
काजल ने कुछ नहीं कहा।
तभी गली में पानी की कतार बढ़ गई।
सुबह के आठ बजे थे, पर धूप पहले से चढ़ी हुई थी। शबनम आपा की गुमटी के चूल्हे पर बर्तन नहीं थे, क्योंकि शबनम आपा ने चूल्हा बंद कर दिया था। गुमटी के बाहर की बेंच पर पाँच औरतें बैठीं थीं, और किसी के हाथ में चाय का कप नहीं था। यह नज़ारा ही अजीब था। इस गली में चाय के बिना लोग बैठते नहीं थे।
पहली बाल्टी लेकर नसीमा बाई आई। मुँह पर थकान, हाथ पर आटे का निशान। उसने बाल्टी मेरे सामने रखी और बोली, "अंकुश, तेरा नल सूखा है, मेरा भी। पूरी गली का सूखा है। हबीब चाचा का पंप तोड़ दिया, अब बचा क्या?"
"बचा है," मैंने कहा। "बस सोच रहा हूँ कि किससे शुरू करूँ।"
"शुरू क्या करना है? पानी लाना है।"
"पानी लाना है, पर पहले यह देखना है कि पानी किसने रोका।"
उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर उस्ताद की तरफ़, फिर गुमटी की तरफ़। "सबको पता है किसने रोका। फिर भी कोई कुछ नहीं बोलता।"
"तो आज बोलेंगे," मैंने कहा। "एक-एक करके।"
तभी बच्चों की टोली दौड़ती हुई आई।
सानिया आगे, उसके पीछे गुड्डू, फिर रफ़ीक़ और आख़िर में चिंटू, जो अपनी चप्पल पकड़े हुए था, जैसे भागते-भागते निकल आई हो।
"अंकुश भैया!" सानिया ने कहा, साँस फूली हुई। "हमने गिन लिया।"
"क्या गिना?"
"बर्तन। हर घर के।"
रफ़ीक़ ने अपनी टूटी चश्मे से देखा और बोला, "कुल मिलाकर चालीस से ज़्यादा बाल्टियाँ हैं। और सत्रह घड़े। और तीन टब। एक टब तो वो बड़ा वाला है जिसमें कपड़े धोते हैं।"
चिंटू ने कहा, "और सात मग भी हैं। छोटे वाले। बच्चों के।"
गुड्डू ने कहा, "मग तो पानी नहीं रोकते।"
"रोकते हैं," चिंटू ने कहा, गंभीरता से। "जब प्यास लगी हो, तो मग बाल्टी जैसा ही होता है।"
मुझे हँसी आई।
पर हँसी गले में ही रुक गई, क्योंकि सानिया ने आगे कहा, "अंकुश भैया, सबसे ज़्यादा बर्तन सुनीता दीदी के क्वार्टर के बाहर हैं। राहुल ने दो बाल्टियाँ और एक टब निकाल रखा है। वो कह रहा था कि अगर पानी न आया तो वो स्कूल भी नहीं जाएगा, क्योंकि नहाए बिना नहीं जाएगा।"
"और सुनीता दीदी ने क्या कहा?"
सानिया ने कंधे उचकाए। "कुछ नहीं। बस बैठी थी। उसके हाथ में कटोरी थी, खाली।"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
उस्ताद मेरे पास आए, कॉपी सीने से लगाए। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस मेरे कंधे पर हाथ रखा और दबाया। जैसे कह रहे हों — सुन रहा है? सुनता रह। बात दरवाज़े से नहीं, खिड़की से आती है, और खिड़की की तरफ़ देखने के लिए सिर घुमाना पड़ता है।
तभी गली के मुँह पर ट्रक की आवाज़ आई।
भारी, गरजती, दबंग।
मैं मुड़ा।
एक टैंकर आ रहा था। पुराना, पीले रंग का, ऊपर लोहे की सीढ़ी, पीछे से पानी टपक रहा था — टप, टप, टप — जैसे टैंकर खुद भी प्यासा हो।
टैंकर के बोनट पर कोई बैठा था।
बबलू पांडे।
आज उसने चेन नहीं पहनी थी। पानदान नहीं था। हाथ पर सफ़ेद रूमाल बँधा था, जिस पर गुलाबी दाग सूख रहा था। वो मुस्कुरा रहा था, और उस मुस्कान में वो बात थी जो भूखे आदमी के सामने रोटी लहराने वाले की आँखों में होती है।
टैंकर रुका।
गली की सारी बाल्टियाँ एक साथ आगे बढ़ीं, फिर रुक गईं, जैसे किसी ने हवा में लकीर खींच दी हो।
बबलू नीचे उतरा।
उसने पहले काजल को देखा, फिर मीरा को, फिर उस्ताद को, और सबसे आख़िर में मुझे।
"अंकुश भाई," उसने कहा, आवाज़ में मिठास घोलकर, "तुम्हारी दुकान बंद है, फिर भी तुम गली में खड़े हो। यही तो तुम्हारी सबसे बड़ी खूबी है। दुकान बंद, पर आदमी खुला हुआ।"
"बबलू भाई," मैंने कहा, "सुबह-सुबह इतनी तारीफ़? कहीं मुँह में पान रखना भूल गए हो? तारीफ़ वाली बात है, पान की जगह तारीफ़ से काम नहीं चलेगा।"
गली में दो-चार लोग हँसे।
बबलू ने मुस्कान कस ली।
"मज़ाक ठीक है, पर पानी मज़ाक नहीं है," उसने कहा। "देखो, साहब को तुम लोगों की तकलीफ़ की बड़ी फ़िक्र है। इतनी गर्मी, इतने बच्चे, इतनी बूढ़ी औरतें। साहब ने कहा — भाई, इनको पानी दो। मुफ़्त नहीं, चलो, थोड़ा काग़ज़ी काम हो जाए, बस।"
उसने हाथ हिलाया।
टैंकर के पीछे से एक आदमी उतरा, हाथ में मोटा बंडल। काग़ज़ों का, रस्सी से बँधा। उसके पीछे दूसरा, हाथ में स्याही की डिब्बी और कपड़ा।
पूरी गली को पता था यह क्या है।
मुझे याद आया वो दिन जब दो सफ़ेद कुर्ते वाले गली में आए थे और बूढ़े काका ने अंगूठा लगाने से साफ़ मना कर दिया था। और मुझे याद आया कि उसी दिन मैंने सोचा था कि शायद इस बार कुछ नहीं होगा। शायद यह भी निकल जाएगा।
वो ग़लती थी।
वो धागा वहीं से शुरू हुआ था, और आज उसी धागे से पूरी गली फँसाई जा रही थी।
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उस्ताद धीरे से बोले, "काग़ज़ माँगो। पहले पढ़ो। पढ़ने से इनकार नहीं कर सकते।"
मैं आगे बढ़ा।
"बबलू भाई, एक काग़ज़ दिखाओ," मैंने कहा। "सबको। ज़ोर से। ताकि सब सुन लें। मैं पढ़ दूँगा।"
बबलू ने देखा, जैसे तराज़ू में तोल रहा हो। फिर उसने काग़ज़ निकाला, एक मोटी शीट, जिस पर नीली स्याही से बड़े अक्षरों में कुछ लिखा था, और नीचे गोल मोहर।
उसने इसे मेरे हाथ में रखा।
"पढ़ो," उसने कहा। "फिर बताओ कि साहब कितने बुरे हैं।"
मैंने काग़ज़ खोला।
ऊपर लिखा था — पानी की सुविधा अनुबंध। मुफ़्त। गली के हर परिवार को। हर महीने। पंद्रह दिन में पहली बार।
मैंने आगे पढ़ा।
फिर मैं चुप हो गया।
नीचे की लाइनें छोटी थीं। बहुत छोटी। ऐसी छोटी कि लगे कोई जान-बूझकर इन्हें छिपा रहा हो।
और उन लाइनों में वो बात लिखी थी जिसने मेरे हाथ ठंडे कर दिए।
मैंने सिर उठाया।
गली मेरी तरफ़ देख रही थी। बाल्टियाँ हाथों में, घड़े कमर के सहारे, बच्चे आगे, बूढ़े पीछे।
मैंने काग़ज़ ऊपर उठाया और ज़ोर से पढ़ा — "यह सुविधा उसी परिवार को मिलेगी जो पीछे वाले प्लॉट के सुधार कार्य से सहमत होकर, नीचे दिए गए स्थान पर अंगूठा लगाएगा।"
गली में सन्नाटा।
फिर कोई बोला, पीछे से, किसी औरत ने — "मतलब?"
"मतलब," मैंने कहा, "कि यह काग़ज़ ऊपर से पानी का है, और नीचे से ज़मीन का। बाक़ी सब दिखावा है। यह एक काग़ज़ में दो काम कर रहा है।"
बबलू हँसा। "तुम बहुत सोचते हो, अंकुश भाई। पानी पी लो पहले, फिर सोचना।"
"बबलू भाई," मैंने कहा, और मुझे पता था कि मैं क्या कहने वाला हूँ, "ज़रा सुनो। मेरा एक दोस्त था, उसकी शादी तय हो रही थी। लड़के वाले गए, लड़की वाले गए, बैठे, मिठाई आई, अच्छी बातें हुईं, और फिर लड़के वाले बोले — भाई साहब, बात आगे बढ़ाने से पहले एक छोटी सी बात। माँगने का मौक़ा है, तो हम अपनी गाड़ी भी ले जाएँगे।"
गली में हल्की हँसी।
"अब सोचो," मैंने कहा, "शादी में दहेज माँगना गुनाह है, यह तो सब जानते हैं। पर पानी के बदले ज़मीन माँगना इससे भी बड़ा दहेज है, क्योंकि इसमें तुम अपनी बेटी नहीं, अपनी छत का टुकड़ा दे रहे हो।"
हँसी बढ़ी।
कोई बोला, "सही कह रहा है।"
कोई औरत बोली, "मेरा तो घर ही जा रहा होगा तो पानी से क्या करूँगी?"
बबलू का चेहरा सख़्त हुआ। उसने काग़ज़ मेरे हाथ से खींचा।
"हँसी अच्छी बात है," उसने कहा, आवाज़ अब थोड़ी ऊँची। "पर याद रखो, हँसी से प्यास नहीं बुझती। जिस घर को पानी चाहिए, उसका एक अंगूठा चाहिए। बस एक। और काग़ज़ में कहीं यह नहीं लिखा कि घर तुम्हारा नहीं रहेगा। काग़ज़ में सिर्फ़ सुधार कार्य से सहमति लिखी है।"
"सुधार कार्य," मैंने कहा।
"हाँ, सुधार कार्य।"
"बबलू भाई, एक बात पूछूँ?"
"पूछो।"
"सुधार कार्य में एक दिन मेरी दुकान भी आएगी, या सिर्फ़ मेरी ज़मीन?"
गली में फिर सन्नाटा।
बबलू ने काग़ज़ मोड़ा और जेब में डाल दिया। "अंकुश भाई, तुम्हारी दुकान का काग़ज़ बड़े साहब खुद देखेंगे। मैं उसमें नहीं पड़ता।"
"बड़े साहब खुद देखेंगे," मैंने दोहराया। "यह लाइन सुनकर अच्छा लगता है। जैसे डॉक्टर कहे कि तुम्हारा ऑपरेशन खुद भगवान करेंगे। बात अच्छी लगती है, पर भरोसा कम होता है।"
कुछ लोग फिर हँसे।
पर सबको हँसी नहीं आई। औरतें बाल्टियाँ लिए खड़ी थीं, और उनके चेहरे पर वो हिसाब चल रहा था जो गरीबी में हर रोज़ चलता है — पानी चाहिए या ज़मीन बचानी है, आज का पेट भरे या कल का घर।
यही सबसे बड़ा हथियार था रणवीर का। वो लोगों को डराता नहीं था। वो उन्हें भूखा रखकर खुद चुनने पर मजबूर करता था।
और सबसे बुरी बात यह थी कि वो चुनाव कभी बराबर का नहीं होता।
मैंने घंटी जेब में छुई।
वो ठंडी थी। बहुत ठंडी। जैसे बर्फ में दबी हो।
और फिर उसने कहा — धीमे, रूखे, चार शब्द।
"पहले ज़ुबान का रिसाव रोको।"
मैं रुक गया।
मैंने गली में देखा।
किसी ने किसी से कहा — "मैंने सुना है हबीब चाचा के बेटे ने ही पंप तोड़वाया।"
किसी ने कहा — "अरे, वो तो साइट पर काम करता है।"
किसी ने कहा — "बाप का पंप, बेटे की साइट। हिसाब तो बैठता है।"
किसी औरत ने धीरे से कहा — "शायद इसीलिए बेटा घर छोड़कर गया था।"
और यह सब दो मिनट में फैल गया। एक कान से दूसरे कान तक। बाल्टियों के बीच से, घड़ों के बीच से, बच्चों के बीच से।
यही रिसाव था।
मैंने आवाज़ ऊँची की।
"रुको," मैंने कहा। "सब रुको। एक बात सुन लो।"
गली चुप हुई, पर वो चुप्पी अच्छी नहीं थी। वो चुप्पी वो होती है जिसमें शक चलता रहता है, बस आवाज़ नहीं आती।
"अभी दो मिनट में," मैंने कहा, "मैंने पाँच लोगों को हबीब चाचा के बेटे के बारे में बात करते सुना। किसी को कुछ पता नहीं। पर सब बोल रहे हैं। और बबलू भाई यहीं खड़े हैं, और उन्होंने एक शब्द नहीं कहा। क्योंकि उन्हें इसी चीज़ की ज़रूरत थी — कि हम बोलें। कि हम खुद ही अपने को चीर दें।"
बबलू ने कहा, "मैंने कुछ नहीं कहा।"
"आपने कहा है," मैंने कहा। "कल गुमटी पर कहा था — पानी के पीछे कोई और बैठा है। आपने बीज बोया, अंकुर हमने निकाला। यही तो आपका काम है।"
गली में कोई नहीं बोला।
तभी इमरान उठा।
वो पत्थर से उठा, झोला कंधे पर डाला और सीधा मेरे पास आया। उसने बबलू को देखा, फिर गली को, फिर अपने बाप को।
हबीब चाचा ने नज़र नहीं उठाई।
इमरान ने झोला खोला।
उसके अंदर कुछ था — कपड़े में लिपटा, लंबा, भारी। उसने कपड़ा खोला और उसे ज़मीन पर रख दिया।
लोहे का टूटा हत्था।
हैंडपंप का हत्था। वो हिस्सा जो लीवर के सिरे पर लगता है, जिसे पकड़कर हम पानी निकालते हैं।
वो टूटा हुआ था। जंग लगा, किनारे से चटका, और एक तरफ़ वो लकड़ी गायब थी जो हाथ पकड़ने के लिए लिपटी होती है।
पूरी गली ने देखा।
इमरान ने कहा — और उसकी आवाज़ साफ़ थी, धीमी नहीं —
"यह हिस्सा मैंने उसी दिन निकाला था, जिस दिन मैंने यह घर छोड़ा था।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
उसके हाथ काँप रहे थे।
"मैंने इसे फेंका नहीं," उसने कहा। "मैं रोज़ इसे अपने झोले में रखता हूँ। साइट पर भी। सोने से पहले भी। जब अब्बा की याद आती है, तो इसे हाथ में पकड़ लेता हूँ।"
उसने रुककर साँस ली।
"मैंने यह नहीं तोड़ा। मैं इसे जोड़ नहीं पाया। दोनों में फ़र्क़ है। मैंने इसे जोड़ने की कोशिश की थी, एक बार, रातों-रात, अपने कमरे में। पर मुझे नहीं आता। मुझे लोहा जोड़ना नहीं आता। मुझे सीमेंट ढोना आता है।"
उसने अपने बाप की तरफ़ देखा।
"अब्बा, मैंने यह टुकड़ा उस दिन निकाला था क्योंकि यह टूटा था। और मैं उस दिन घर से गया क्योंकि मुझे लगा कि मैं भी इस टुकड़े की तरह हूँ — किसी काम का नहीं। मुझे पढ़ाई नहीं आई, अब्बा। मुझे तुम्हारा हुनर नहीं आया। मुझे सिर्फ़ भार उठाना आया। और भार उठाने वाले को घर में जगह नहीं मिलती, यह मैंने तुम्हारी चुप्पी से सीखा।"
हबीब चाचा का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
बिल्कुल सफ़ेद। जैसे किसी ने उनके चेहरे से खून का आख़िरी कतरा भी खींच लिया हो।
उन्होंने धीरे से कहा — और उनकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो चालीस साल की चुप्पी में जमा होती है — "तूने मेरा पंप नहीं तोड़ा।"
वो रुके।
"तूने मेरा घर तोड़ा था।"
इमरान पत्थर की तरह खड़ा रहा।
"एक टुकड़ा निकाल लिया," हबीब चाचा ने कहा, और अब उनकी आवाज़ काँप रही थी, "और चला गया। बिना बताए। बिना एक शब्द कहे। तेरी माँ ने तीन महीने तक तेरी थाली नहीं उठाई। तीन महीने। मैंने उसे कहा — वो लौट आएगा। वो हर रोज़ दरवाज़े की तरफ़ देखती रही। और मैं? मैं क्या कहता?"
उन्होंने आँखें मींच लीं।
"मैं तो तेरी साइकिल भी नहीं बेच सका, इमरान। तेरी साइकिल आज भी आँगन में खड़ी है। लोहे पर ज़ंग लग गई, टायर फट गए, पर मैंने उसे छुआ नहीं। मेरी बीवी कहती थी — यह साइकिल कब तक रखोगे? मैं कहता था — जब तक वो नहीं आता।"
इमरान की आँखें भर आईं।
"पर तू आया कब?" हबीब चाचा ने कहा। "आज। जब गली में पानी रुका। जब सब बोल रहे हैं। तब तू आया — और पानी का वादा लेकर। बाप के आँगन से नहीं, बोल दिया। बड़ी बात बोल दी।"
उन्होंने लाठी उठाई, फिर रख दी, जैसे हाथ में ताक़त न बची हो।
"तू आया होता," उन्होंने धीमे से कहा, "तो मैं तुझे पानी देता। गली को नहीं, तुझे। तेरी बाल्टी में अपने हाथ से भरता। पर तू पहले गली को बोलने आया, अपने बाप को नहीं।"
इमरान ने एक कदम आगे रखा।
"अब्बा —"
"मत कह," हबीब चाचा ने कहा। "आज कुछ मत कह। मैंने चालीस साल सुना है, इमरान। आज बस थोड़ा सा चुप रहने दे।"
वो मुड़े।
और चले गए। लाठी की आवाज़, धीमी, टपकती, गली की धूल में रह गई।
इमरान वहीं खड़ा रहा, टूटा हत्था हाथ में।
बबलू ने देखा, हँसा और बोला, "अच्छी बात है। घर की बात घर में। पानी की बात गली में। अब आओ, बाल्टियाँ आगे लाओ।"
कोई आगे नहीं आया।
कोई नहीं।
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उस्ताद ने आँखें बंद कर लीं, जैसे किसी चीज़ का इंतज़ार कर रहे हों।
मैंने घंटी छुई।
वो ठंडी थी। पर अब हिल रही थी। जैसे अंदर से कोई आवाज़ आने वाली हो।
मैंने इमरान के कंधे पर हाथ रखा।
"अभी मत जा," मैंने कहा।
उसने सिर हिलाया। आँसू पोंछे।
"मुझे नहीं पता था," उसने कहा। "मुझे नहीं पता था कि वो साइकिल रखी है।"
"मुझे भी नहीं पता था," मैंने कहा, "कि मेरे पापा ने मेरे लिए कितनी चीज़ें अंदर दबा रखी हैं। यह बीमारी है, इमरान। इस गली की हर बाप-बेटे की बीमारी। हम सब चुप रहते हैं, और सोचते हैं कि चुप्पी से बचा लेंगे। बचता कुछ नहीं। सिर्फ़ देर होती है।"
मैंने पीछे मुड़कर देखा।
बबलू का हाथ अब रूमाल पर कस रहा था। उसने अपनी जेब से फोन निकाला और किसी को मिलाया।
उसकी आवाज़ धीमी थी, पर मैंने सुना — "साहब, यहाँ कुछ गड़बड़ है। हाँ। वो लड़का आ गया। हबीब का।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
मीरा ने कैमरा नहीं उठाया। उसने सिर्फ़ सिर हिलाया, जैसे कह रही हो — मैं सुन रही हूँ, तुम चलो।
मैंने गली की तरफ़ देखा।
औरतें बाल्टियाँ लिए खड़ी थीं। बच्चे बर्तन गिनकर भूल गए थे। और सबसे पीछे, नीम की छाया में, सुनीता दीदी खड़ी थी — हाथ में वो खाली कटोरी, जो उसने सभा में ज़मीन पर रखी थी।
मैंने सुनीता दीदी की तरफ़ देखा। उन्होंने नज़र चुराई।
"बबलू भाई," मैंने कहा, "एक बात और पूछूँ?"
"पूछो। पर ज़्यादा मत पूछो। मेरा वक़्त है।"
"आपने कहा — जो अंगूठा लगाएगा, उसे पानी मिलेगा। ठीक है। पर एक बात बताओ — जिस घर में कोई अंगूठा लगाने वाला ही न हो? जैसे सुनीता दीदी का क्वार्टर। उसमें सिर्फ़ एक औरत है और एक चौदह साल का बच्चा। अंगूठा किसका लगेगा? राहुल का? चौदह साल के बच्चे का अंगूठा काग़ज़ पर चलेगा?"
बबलू हँसा।
"चलेगा," उसने कहा। "उम्र का क्या है? हम काग़ज़ देखते हैं, उम्र नहीं।"
गली में कोई बोला — "हद है।"
कोई औरत बोली — "बच्चे का अंगूठा? शर्म नहीं आती?"
बबलू ने कंधे उचकाए। "शर्म से पानी नहीं आता। मैं तो सिर्फ़ साहब का हुक्म बता रहा हूँ।"
मैंने घंटी जेब में छुई।
और घंटी ने कहा — साफ़, पहले से साफ़, जैसे अब उसकी आवाज़ गली की आवाज़ों में घुल गई हो —
"अब बोलो।"
मैंने आँखें बंद कीं।
फिर मैं मुड़ा और मैंने गली से कहा — "सब सुनो। मेरी बात ध्यान से। यह काग़ज़ मुफ़्त नहीं है। यह काग़ज़ उधार है। इसमें पानी ऊपर लिखा है, ज़मीन नीचे छिपी है। आज अंगूठा लगाओगे, कल यह गली तुम्हारी नहीं रहेगी। मैं जानता हूँ कि प्यास सबसे बड़ी होती है। जब बच्चा रोता है तो आदमी हर काग़ज़ पर अंगूठा लगा देता है। पर यही तो उनका हथियार है। वो हमें प्यासा रखेंगे, और फिर पानी का काग़ज़ थमा देंगे। हम पानी के लिए अंगूठा लगाएँगे, और वो हमारी ज़मीन के लिए।"
गली चुप थी।
फिर शबनम आपा ने कहा — और उसकी आवाज़ में वो तेज़ी थी जो चूल्हे में कम पड़ी थी — "मेरा चूल्हा आज बंद है। कल भी बंद रहेगा। मैं अपनी गुमटी की ज़मीन पर अंगूठा नहीं लगाऊँगी। और जो लगाएगा, उसे मेरी गुमटी से चाय नहीं मिलेगी।"
किसी ने हँसी में कहा — "आपा, चाय तो बंद है ही।"
शबनम आपा ने कहा — "तो यह भी जान लो। मेरी चाय न मिलने की खबर पहले फैलेगी, फिर पानी की।"
गली हँसी।
और वो हँसी अच्छी थी। वो हँसी में डर का टूटना था।
बबलू ने फ़ोन जेब में रखा। उसका चेहरा अब मुस्कुरा नहीं रहा था।
"ठीक है," उसने कहा। "तुम्हारी मर्ज़ी। पर एक बात याद रखना। पानी कल भी नहीं आएगा। परसों भी नहीं। मशीन कल सुबह सात बजे आएगी। और मशीन काग़ज़ नहीं माँगती।"
वो टैंकर पर चढ़ा।
इंजन गरजा।
और टैंकर चला गया, पीछे से टपकता हुआ — टप, टप, टप।
जब टैंकर गली के मुँह से निकला, तो पीछे से एक आवाज़ आई।
"अंकुश भैया, वो टपकता था।"
चिंटू था।
"हाँ," मैंने कहा।
"तो हम बाल्टी रख देते टैंकर के नीचे। दो बूँद तो मिल जाती।"
मैं हँसा।
"चिंटू," मैंने कहा, "आज तूने सबसे समझदारी की बात कही। दो बूँद से काम नहीं चलेगा, पर याद रखना। दो बूँद भी किसी की प्यास बुझा सकती है, अगर वो सही हाथ में गिरे।"
चिंटू ने सीना फुलाया।
इमरान ने टूटा हत्था उठाया।
"यह मैं तुम्हें दे देता हूँ," उसने कहा। "तुम इसे जोड़ सकते हो। मुझे नहीं आता। तुम्हें आता है।"
मैंने हत्था लिया।
वो भारी था। बहुत भारी। लोहा भारी था, पर उससे ज़्यादा भारी वो साल थे जो इस टुकड़े ने झेले थे।
मैंने इमरान के बाप की तरफ़ देखा। वो गली के अंदर, अपने आँगन में जा रहे थे, हाथ में लाठी, कमर झुकी हुई।
"एक काम कर," मैंने इमरान से कहा। "तू घर जा। मैं यह हत्था आज रात तक जोड़ दूँगा। और कल सुबह, मशीन आने से पहले, तू अपने बाप के आँगन में जाकर उनसे कहेगा — अब्बा, पंप ठीक हो गया। चलो, पानी निकालें।"
इमरान ने मेरी तरफ़ देखा।
"और अगर वो न मानें?"
"तो तू चुपचाप बाल्टी लेकर खड़ा रह जाना। बस। कुछ मत बोलना। वो खुद आएँगे।"
इमरान ने सिर हिलाया।
वो जाने लगा, फिर रुका।
"अंकुश," उसने कहा, "एक बात पूछूँ? तुम यह सब क्यों कर रहे हो? तुम्हारा फ़ायदा क्या है?"
मैं रुक गया।
मैंने सोचा — इस सवाल का जवाब मुझे भी नहीं पता। मैं सिर्फ़ इतना जानता हूँ कि घंटी मेरी जेब में ठंडी है और मेरा हिसाब डेढ़ सौ अठ्ठावन पर अटका है, और मेरी दुकान बंद है, और मेरी माँ की दवा रुकी है, और मेरे पापा उस खिड़की के पीछे बैठे हैं जिसके पीछे वो दरवाज़ा है जो अभी नहीं खुला।
और फिर भी।
"पता नहीं," मैंने कहा। "शायद इसलिए कि किसी को तो पहला कदम उठाना होता है। और यहाँ सब दूसरे के कदम का इंतज़ार कर रहे हैं।"
इमरान मुस्कुराया।
वो गया।
मैंने हत्था दोनों हाथों से उठाया और उसे दुकान के आगे रख दिया।
गली में लोग धीरे-धीरे बिखरने लगे। बाल्टियाँ फिर भी खाली थीं।
तभी काजल मेरे पास आई।
"अंकुश," उसने कहा, "माँ की दवा। आज रात खत्म हो रही है।"
मैंने आँखें बंद कीं।
"पता है," मैंने कहा।
"और काग़ज़ नहीं रुके तो?"
"तो मशीन आएगी," मैंने कहा। "और हम मशीन के आगे खड़े होंगे।"
काजल ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी हथेली गर्म थी।
"मैं डर गई थी," उसने कहा। "जब हबीब चाचा ने कहा — तूने मेरा घर तोड़ा था। मैं डर गई थी।"
"मैं भी," मैंने कहा।
"फिर भी तुम बोल रहे थे?"
"मैं बोल रहा था क्योंकि डर अंदर था। बाहर बोलता रहा, तो अंदर वाला डर दब गया।"
काजल हँसी। हँसी में आँसू थे।
उस्ताद पास आए।
"हत्था मुझे दे," उन्होंने कहा। "आज मेरी दुकान में जोड़ेंगे। सिलाई मशीन का हुनर और हैंडपंप का हुनर एक ही है — सब्र। और तेरी सब्र आज खत्म हो रही है। मैं जोड़ूँगा।"
मैंने हत्था उन्हें दिया।
वो उसे उठाकर ले गए, जैसे कोई बच्चा उठाता है।
मैंने पीछे मुड़कर देखा।
नीम की छाया में सुनीता दीदी अब भी खड़ी थी। मैंने उसकी तरफ़ देखा। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
फिर वो आई।
धीरे, आँखें नीची किए हुए। उसके हाथ में वही खाली कटोरी थी।
"अंकुश भैया," उसने कहा, "मुझे कुछ बोलना है।"
"बोलिए," मैंने कहा।
वो रुकी। फिर बोली — "मैंने बबलू से पैसे लिए थे। दो हज़ार। मीरा मैडम पर झूठा इल्ज़ाम लगाने के लिए। राहुल के दाख़िले के लिए। मुझे शर्म आ रही है।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
मैंने सिर्फ़ उसकी कटोरी ली और उसे गुमटी की तरफ़ बढ़ा दिया।
"शबनम आपा," मैंने कहा, "कटोरी में कुछ डालो।"
शबनम आपा ने कटोरी देखी, फिर सुनीता को, फिर मुझे।
"चूल्हा बंद है," उसने कहा।
"एक कटोरी के लिए जलाओ," मैंने कहा। "पूरी गली के लिए नहीं। बस एक के लिए।"
शबनम आपा ने कुछ सोचा। फिर वो अंदर गई, और थोड़ी देर में लौटी — कटोरी में गरम चाय थी, और भाप उठ रही थी।
उसने कटोरी सुनीता को दी।
"अब रो मत," उसने कहा, "चाय ठंडी हो जाएगी।"
सुनीता ने कटोरी थाम ली।
मैंने घंटी जेब में छुई।
वो गर्म थी।
और उसने कुछ नहीं कहा। बस एक आवाज़ आई — धीमी, बहुत धीमी — जैसे कोई दूर से साँस छोड़ रहा हो।
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। वो हत्था लिए जा रहे थे, और उनका सिर थोड़ा ऊपर था।
मैंने इमरान की तरफ़ देखा। वो अपने घर के दरवाज़े पर खड़ा था, हाथ दरवाज़े पर रखे हुए।
मैंने अपने घर की तरफ़ देखा।
और मुझे लगा — यह एक छोटा कदम है, बहुत छोटा। एक हत्था। एक कटोरी। एक बेटा जो दरवाज़े पर खड़ा है, पर अंदर नहीं गया। एक बाप जो अंदर है, पर बाहर नहीं आया।
पर यही छोटे कदम हैं जिनसे गली बनती है।
मैंने काग़ज़ जेब से निकाला — वो मोटी शीट, पानी वाली, ज़मीन छिपाने वाली — और उसे देखा।
नीचे की छोटी लाइनें मेरे हाथ में थीं। और उन लाइनों में एक जगह खाली थी, अंगूठे के लिए।
मैंने उस जगह को देखा और सोचा — अंगूठा लगाने वाला पहले कौन होगा? किस दिन?
और तभी मुझे एहसास हुआ कि इस गली में सबसे ज़्यादा डर बबलू का नहीं है।
सबसे ज़्यादा डर उस खाली जगह का है।
क्योंकि खाली जगह कभी भी भर सकती है। बस किसी को हिम्मत करनी है।
मैंने काग़ज़ मोड़कर जेब में रखा।
फिर मैंने शबनम आपा की तरफ़ देखा और कहा, "आपा, आज कितनी कटोरियाँ जलेंगी?"
उसने कहा, "जितनी बच्चों की भूख है।"
"तो पूरी गली के लिए जलाओ।हिसाब मैं दूँगा।"
शबनम आपा ने मेरी तरफ़ देखा।
"तू दुकान बंद है, अंकुश। तेरे पास पैसा कहाँ?"
"मेरे पास घंटी है," मैंने कहा।
उसने सिर हिलाया, जैसे समझ गई हो। फिर वो चूल्हे की तरफ़ चली गई।
मैं वहीं खड़ा रहा, गली के बीच, हाथ जेब में, घंटी ठंडी, और सामने पीपल का पेड़, और उसके नीचे वो कोरा काग़ज़ जो अब भी तने पर चिपका था — मशीन, कल सुबह सात बजे।
मेरे पास आज की रात थी।
बस एक रात।
मैंने आँखें ऊपर कीं।
आसमान साफ़ था। धूप तेज़ थी। और गली में चाय की भाप उठने लगी थी — जैसे गांव में किसी की छत पर चूल्हा जला हो।
मैंने सोचा — कल सात बजे मशीन आएगी।
पर आज शाम, चाय पहले आएगी।
और चाय के बाद, बात।
और बात के बाद, अंगूठा।
और अंगूठे से पहले, मुझे इमरान को अपने बाप के सामने खड़ा करना था।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और घंटी को छुआ।
वो चुप थी।
पर वो चुप्पी भी एक जवाब थी।
जैसे कह रही हो — अब तू बोल।
॥
मैंने घंटी जेब में छुई और धीरे से कहा, "अब तू बोल।"
वो चुप रही।
बस गर्म थी, जैसे किसी ने अभी हाथ हटाया हो और अपनी गर्मी मेरी जेब में छोड़ गया हो।
मैं गली के बीच खड़ा रहा। सामने पीपल, उसके नीचे वो कोरा काग़ज़, और उस पर वही एक लाइन — कल सुबह सात बजे मशीन।
आज की रात बची थी। बस एक रात।
मैंने शबनम आपा की तरफ़ देखा। वो चूल्हे पर कटोरियाँ रख रही थीं, और उनका हाथ तेज़ था — जैसे गुस्सा चाय में उतार रही हों।
"आपा," मैंने कहा, "दो स्टूल निकालो।"
"किसके लिए?"
"एक बाप के लिए। एक बेटे के लिए।"
शबनम आपा ने चूल्हे से नज़र हटाई। फिर गुमटी के पीछे से दो लकड़ी के स्टूल खींचकर लाई और पीपल की छाया के किनारे रख दिए।
"अगर ये दोनों यहाँ बैठकर चीख़-चिल्ला करें," उसने कहा, "तो मेरी गुमटी का किराया तू भरेगा।"
"तेरे हिसाब में लिख लेना," मैंने कहा।
मैं हबीब चाचा के आँगन की तरफ़ चला।
उनका आँगन गली से सटा था, पर गली से अलग लगता था। टूटी चारदीवारी, ऊपर से पुरानी टिन की चादर, और कोने में एक खुला हुआ हैंडपंप जिसका हत्था गायब था।
हत्थे की जगह खाली थी। बस एक गोल धुरी, जंग में डूबी, और उस पर सूखी घास का एक टुकड़ा अटका हुआ।
मेरा हाथ अपने आप उस धुरी की तरफ़ गया। मैंने छुआ नहीं। बस देखा।
क्योंकि मैं जानता था — घंटी अभी बजेगी तो फिर कहेगी कुछ ऐसा जो मुझे रात भर नींद नहीं देगा।
उसी आँगन में, दीवार से टिकी, इमरान की साइकिल खड़ी थी।
ज़ंग लगी हुई। दोनों पहियों में हवा नहीं। सीट फटी हुई, और उस फटी सीट पर बारिश के पुराने दाग़ थे।
पर एक चीज़ अजीब थी।
साइकिल ज़ंग में डूबी थी, पर उसकी चेन पर ताज़ा तेल चढ़ा था।
मैं वहीं रुक गया।
कोई साइकिल को छोड़ देता है, तो उसकी चेन में तेल कौन डालता है?
मैंने दरवाज़ा खटखटाया।
"कौन?"
"मैं, चाचा। अंकुश।"
अंदर कुछ देर चुप्पी रही। फिर कुंडी खुली, और हबीब चाचा बाहर आए — एक हाथ में लाठी, दूसरे हाथ में पुराना गमछा, जो उन्होंने माथे पर रखा हुआ था।
"क्या है?" उन्होंने पूछा।
"चाय पीनी है," मैंने कहा।
"मेरे यहाँ चीनी नहीं है।"
"चीनी मैं लाया हूँ।"
वो रुक गए। मेरी तरफ़ देखा, फिर गली की तरफ़, फिर उस स्टूल की तरफ़ जो पीपल के नीचे खाली पड़ा था।
"मैं नहीं बैठूँगा," उन्होंने कहा।
"आप बैठिए, चाचा," मैंने कहा। "चाय पीने के लिए। लड़ने के लिए नहीं।"
"उसके साथ?"
"हाँ।"
उन्होंने लाठी ज़मीन पर टेक दी। उनकी उँगलियाँ लाठी के सिरे पर सफ़ेद पड़ गई थीं — चूने की धूल। शायद वो सुबह से पंप के पास बैठे थे, हत्था ढूँढ रहे थे, या याद कर रहे थे कि कब हत्था वहाँ था और कब नहीं।
"तेरे पास क्या कहने को है?" उन्होंने पूछा।
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "मैं सिर्फ़ स्टूल लगा रहा हूँ। बोलना आप दोनों का काम है।"
वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखते रहे।
फिर बोले, "दो मिनट।"
और वो चल पड़े, बिना लाठी की आवाज़ किए, जैसे लाठी भी उनके साथ शर्मा रही हो।
इमरान दरवाज़े पर खड़ा था।
जब मैं आँगन से निकला, वो वहीं था — कंधे से सीमेंट की धूल झाड़ता हुआ, पर झाड़ते-झाड़ते रुक गया, क्योंकि धूल जाती नहीं थी।
"बाप आ रहे हैं?" उसने पूछा।
"आ रहे हैं," मैंने कहा।
"तो मैं क्यों जाऊँ?"
"क्योंकि तू उनका बेटा है।"
"यही तो दिक्कत है," उसने कहा।
फिर भी चल पड़ा।
मैंने उसकी तरफ़ देखा — उसकी कलाई पर पुरानी घड़ी थी, जिसका पट्टा टेप से बँधा था। वही टेप मैंने किसी और के हाथ पर भी देखा था — शुक्ला बाबू के चश्मे पर। यह गली की आदत थी। चीज़ टूटती नहीं, टेप से बँध जाती है, और फिर पचास साल चलती रहती है।
पीपल के नीचे दो स्टूल थे।
हबीब चाचा पहले बैठे।
और जैसे ही इमरान ने दूसरा स्टूल खींचा और बैठा, हबीब चाचा ने अपना मुँह दूसरी तरफ़ फेर लिया।
पूरा मुँह नहीं। बस इतना कि नाक उस तरफ़, और आँखें पीपल की डाल पर।
इमरान रुक गया। आधा बैठा, आधा खड़ा।
फिर वो पूरा बैठ गया, हाथ घुटनों पर रखकर।
चुप्पी।
गली की आवाज़ें अब भी थीं — किसी के बर्तन की, किसी की चप्पल की, किसी के बच्चे की — पर हमारे बीच चुप्पी इतनी मोटी थी कि उसमें चम्मच खड़ी हो जाए।
मैंने शबनम आपा की तरफ़ देखा।
वो आई, दोनों के बीच एक छोटा स्टूल रखा, और उस पर दो गिलास — भाप उठती हुई चाय।
"गरम है," उसने कहा। "सोचने से पहले पी लो। सोचने से चाय ठंडी हो जाती है और बात भी।"
फिर मेरी तरफ़ झुककर धीरे से बोली, "चाचा का मुँह उस तरफ़ है। कान उस तरफ़ नहीं।"
मैं हँसा नहीं। पर मुझे अंदर कहीं अच्छा लगा, कि गली में अभी भी कोई ऐसा है जिसे लड़ाई से ज़्यादा चाय की फ़िक्र है।
मैंने एक गिलास हबीब चाचा की तरफ़ सरकाया।
"चाचा," मैंने कहा, "आप मुँह फेर लो। पर कान मत फेरना।"
उनका जबड़ा हिला। कुछ कहने को था, फिर चुप हो गए।
इमरान ने गिलास उठाया, दो घूँट पिए, और फिर उसने देखा कि उसके हाथ काँप रहे हैं। उसने गिलास नीचे रख दिया — ज़ोर से नहीं, बहुत धीरे।
फिर वो बोला।
"मैंने हत्था निकाला था।"
हबीब चाचा का सिर हिला — बहुत थोड़ा — पर वो पलटे नहीं।
"गुस्से में," इमरान ने कहा। "हाँ। और मैं झूठ नहीं बोलूँगा। मैंने उसे निकाला, और मैंने उसे अपने पास रखा। छह महीने।"
मेरे हाथ में चाय थी। मैंने उसे पीया नहीं। मैंने बस हाथ में रखा, जैसे कोई गवाही पकड़ रहा हो।
"क्यों?" मैंने पूछा।
इमरान ने हबीब चाचा की तरफ़ देखा।
"क्योंकि उस दिन उन्होंने मुझे निकम्मा कह दिया था।"
हबीब चाचा की लाठी ज़मीन पर थोड़ी खिसकी। बस इतना।
"उस दिन मैं साइट से आया था," इमरान ने कहा। "उस दिन मैंने उन्हें बताया था कि साहब के आदमी लोगों से अंगूठे ले रहे हैं। काग़ज़ों पर। जो पढ़ नहीं सकते, उनसे भी। मैंने कहा — बाबा, हमारी गली का भी काग़ज़ बन रहा है।"
"तो मैंने क्या कहा था?" हबीब चाचा ने कहा। आवाज़ पीपल की जड़ जैसी — नीचे से, दबी हुई।
"आपने कहा था — तू चुप रह।"
"नहीं। मैंने कहा था — तू क्या करेगा। बता, तू क्या करेगा।"
इमरान ने एक गहरी साँस ली।
"वही तो," उसने कहा। "मेरे कानों ने सुना — निकम्मा। आपके मुँह से शब्द दूसरा निकला, पर मेरे कान तक वही पहुँचा जो मैं बीस साल से सुन रहा था।"
चुप्पी।
दूर किसी ने साइकिल की घंटी बजाई। मेरी जेब में भी कुछ हिला, पर आवाज़ नहीं आई।
"मैंने हत्था इसलिए निकाला था," इमरान ने धीमे से कहा, "कि मुझे लगा, तुम पूछोगे — हत्था कहाँ गया? और फिर मैं कहता — मैंने लिया है। और तुम मेरी तरफ़ देखते। बस एक बार। मेरी तरफ़। गुस्से से भी देख लेते, पर देखते।"
हबीब चाचा चुप रहे।
"तुमने नहीं पूछा," इमरान ने कहा।
"मैंने तेरी माँ को भेजा था," हबीब चाचा ने कहा। आवाज़ अब भी पीपल की तरफ़ थी। "दो बार।"
"माँ ने आकर सिर्फ़ यह कहा — जाकर बाप से माफ़ी माँग ले।"
"तो?"
"तो मैं क्या माफ़ी माँगता? जो बात हुई ही नहीं, उसकी माफ़ी?"
हबीब चाचा ने पहली बार अपना सिर घुमाया।
पूरा नहीं। थोड़ा-सा। इतना कि उनकी आँख का कोना इमरान की तरफ़ आ गया।
"तूने घर छोड़ा था," उन्होंने कहा। "बिना बताए।"
"मैंने बताया था।"
"किससे?"
"माँ से।"
"मुझे नहीं बताया।"
"क्योंकि तुम सुनते कब हो, बाबा?"
यह लाइन हवा में लटक गई।
मैंने चाय का एक घूँट लिया। ठंडी हो रही थी। पर मैंने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि मुझे याद आया — तंत्र का नियम। दो लोगों को खुद बोलना पड़ता है। बीच में खड़ा आदमी सिर्फ़ दरवाज़ा खोल सकता है। बात नहीं कर सकता।
और आज मैं दरवाज़ा था। बस।
इमरान ने अपना गिलास उठाया। उसमें चाय बची थी, पर ठंडी। वो पीने लगा, ठंडी ही।
"मैं साइट पर क्यों हूँ, जानते हो?" उसने कहा। "क्योंकि वहाँ रोज़ शाम को पैसा मिलता है। हाथ में। कोई काग़ज़ नहीं, कोई अंगूठा नहीं। और मैं सोचता था — जिस दिन पूरा पैसा जोड़ लूँगा, उस दिन ये टूटा पंप ठीक करवा दूँगा। नया पंप लगवा दूँगा। तुम्हारे आँगन में। और तुम पूछोगे — पैसा कहाँ से? और मैं कहूँगा — मेरी मज़दूरी से।"
हबीब चाचा ने अपनी लाठी दोनों हाथों से पकड़ ली।
उनके हाथ सफ़ेद थे। सफ़ेद और झुर्रीदार।
मैंने इमरान के हाथ देखे — सीमेंट की धूल में, नाखून के नीचे काली लकीरें।
दोनों के हाथ एक जैसे थे। एक पर चूना, दूसरे पर सीमेंट।
और मुझे लगा — यही तो है। गली में बाप और बेटे के हाथ अलग-अलग धूल में हैं, पर धूल एक ही है। बस कोई उन्हें मिलाकर नहीं देखता।
तभी गली के मुँह पर शोर हुआ।
पहले पहियों की आवाज़ — भारी पहियों की, जैसे कोई ट्रॉली खींच रहा हो। फिर किसी का हँसना। फिर पानी की आवाज़ — डिब्बों में भरा पानी हिलने की आवाज़।
मैंने पीछे देखा।
बबलू आ रहा था।
काले कोट में, पीछे दो आदमी एक ट्रॉली खींच रहे थे, जिस पर प्लास्टिक के बड़े-बड़े डिब्बे लदे थे। नीले, पीले, सफ़ेद। ऊपर से ढके हुए।
बबलू के हाथ में काग़ज़ों का बंडल था। और उसके चेहरे पर वो मुस्कान थी जो मुझे किसी चीज़ की याद दिलाती है — ऐसी मुस्कान जो चाकू से पहले आती है।
"अंकुश भाई!" वो चिल्लाया। "पानी आ गया!"
गली के लोग निकलने लगे। पहले दो, फिर पाँच, फिर दस।
वो औरत भी आई जिसके हाथ में बच्चा था। वो बूढ़ा भी आया जो सुबह कतार में खड़ा था। सुनीता भी दरवाज़े से झाँकने लगी।
बबलू ने ट्रॉली के पास खड़े होकर काग़ज़ ऊपर उठाया।
"सुनो! सब सुनो!" वो बोला। "साहब ने कहा है — गली को पानी चाहिए। तो पानी मिलेगा। मुफ़्त।"
भीड़ में कुछ लोग आगे बढ़े।
"कितना मुफ़्त?" किसी ने पूछा।
"पूरा मुफ़्त," बबलू ने कहा। "डिब्बे मुफ़्त। गाड़ी मुफ़्त। रोज़ सुबह-शाम पानी।"
"और बदले में?"
"बदले में कुछ नहीं," बबलू ने कहा। "बस दो अंगूठे।"
उसने दो उँगलियाँ उठाईं।
"दो," उसने दोहराया। "एक इस पानी के काग़ज़ पर। एक पीछे वाले प्लॉट के काग़ज़ पर। बाकी सब माफ़। साहब कहते हैं — जो पानी दे, उससे अंगूठा भी माँग लो, ताकि कल को कोई झगड़ा न हो।"
भीड़ में फुसफुसाहट हुई।
"दो अंगूठे क्या," एक आदमी बोला, "चार लगा देंगे। पानी तो मिले।"
एक औरत ने अपना डिब्बा आगे बढ़ाया।
"भर दो," उसने कहा। "बच्चे बैठे हैं।"
बबलू मुस्कुराया।
"बिल्कुल," उसने कहा। "पहले काग़ज़।"
उसने काग़ज़ों का बंडल खोला और पहला काग़ज़ आगे बढ़ाया।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी।
उसी वक़्त मीरा आई।
वो कहीं से भागकर आई थी — साँस फूली हुई, कैमरा कंधे पर, बाल माथे पर चिपके हुए।
"अंकुश," उसने धीमे से कहा, "ये काग़ज़ देख।"
"क्या है?"
"गवाह का नाम।"
मैंने काग़ज़ देखा। ऊपर मोटी लाइन में लिखा था — पानी की सुविधा हेतु सहमति पत्र। नीचे छोटी लाइनें, फिर अंगूठे की खाली जगह, फिर मोहर।
और सबसे नीचे, एक छोटे बक्से में दो नाम थे।
बाहरी गवाह — और उसके नीचे — स्थानीय गवाह।
मीरा ने उँगली उस नाम पर रखी।
"पढ़," उसने कहा।
मैंने पढ़ा।
"हबीब खाँ।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"हबीब चाचा का नाम क्या है?"
"हबीब अली," मैंने कहा।
"और नीचे जो बाहरी गवाह का नाम है," मीरा ने कहा, "वो वही नाम है जो उन तीन औरतों के काग़ज़ों पर था। जो कल मैंने तेरे सामने खोले थे।"
मेरी उँगलियों में काग़ज़ कस गया।
"यानी," मैंने धीमे से कहा, "ये काग़ज़ कह रहा है कि हबीब चाचा ने गवाही दी है।"
"और नाम भी ग़लत है," मीरा ने कहा। "इतना ग़लत कि अगर चाचा खुद पढ़ते, तो पहचान भी न पाते।"
मैंने पीछे देखा।
हबीब चाचा अब भी स्टूल पर बैठे थे, पर उनका सिर घूम चुका था। पूरा। वो काग़ज़ देख रहे थे।
"क्या है?" उन्होंने पूछा। "मेरा नाम क्यों लिया?"
मैंने काग़ज़ उनकी तरफ़ बढ़ाया और ज़ोर से पढ़ा — ताकि पूरी गली सुन ले।
"स्थानीय गवाह — हबीब खाँ, पुरानी गली, नूर अस्पताल के पास।"
गली में चुप्पी छा गई।
हबीब चाचा ने लाठी के सहारे खुद को उठाया। उनकी टाँग काँप रही थी, पर वो खड़े हो गए।
"मैंने कोई गवाही नहीं दी," उन्होंने कहा। आवाज़ ऊँची नहीं थी, पर साफ़ थी। "मैंने यह काग़ज़ छुआ भी नहीं। मेरा नाम है हबीब अली। खाँ नहीं। मेरे बाप का नाम खाँ नहीं था।"
उन्होंने बबलू की तरफ़ देखा।
"तूने मेरा नाम कहाँ से उठाया?"
बबलू ने कंधे उचकाए।
"चाचा, नाम तो काग़ज़ में लिखा है," उसने कहा। "हमने नहीं लिखा। ऊपर से आया है।"
"तो ऊपर वाले को बुला," हबीब चाचा ने कहा। "मैं उससे पूछूँगा कि मेरा नाम लिखने से पहले उसने मुझसे पूछा क्यों नहीं।"
भीड़ में कुछ लोग पीछे हटे।
पर कुछ लोग अब भी डिब्बों की तरफ़ देख रहे थे। पानी की तरफ़। क्योंकि प्यास नाम नहीं पूछती। प्यास सिर्फ़ डिब्बा देखती है।
मैंने काग़ज़ मोड़ा।
फिर मैंने वो काग़ज़ बबलू की तरफ़ बढ़ा दिया।
"ले जा," मैंने कहा।
वो मुस्कुराया। "सोच लो, अंकुश। पानी —"
"जिस पानी में झूठ घुला हो," मैंने कहा, "वो प्यास नहीं बुझाता।"
चुप्पी।
मैंने उसके हाथ में काग़ज़ रख दिया।
"तेरे डिब्बे वापस ले जा।"
भीड़ में एक आवाज़ उठी।
"अंकुश, हमें पानी चाहिए!"
मैंने पलटकर देखा। वो औरत थी, गोद में बच्चा, आँखों में थकान।
"मिलेगा," मैंने कहा। "आज रात।"
"कैसे? पंप टूटा है। टैंकर तूने भगा दिया।"
मैंने उसकी आँखों में देखा।
"मैंने टैंकर नहीं भगाया," मैंने कहा। "मैंने झूठ भगाया। पानी आज रात आएगा। मेरे हाथ से। अगर न आए, तो कल सुबह जो मशीन आएगी, उसके सामने मैं खुद खड़ा मिलूँगा।"
वो कुछ नहीं बोली। बच्चा उसकी गोद में सो रहा था।
बबलू ने काग़ज़ अपने बंडल में रखा, फिर ट्रॉली की तरफ़ देखा।
"दो डिब्बे यहीं छोड़ देता हूँ," उसने कहा। "गुस्सा ठंडा हो, तो भर लेना। साहब का दिल बड़ा है।"
उसने मुड़कर मेरी तरफ़ देखा।
"और अंकुश," उसने कहा, "कल सात बजे। मशीन। तेरे पास एक रात है। उसका इस्तेमाल समझदारी से करना।"
वो चला गया। ट्रॉली चली गई।
गली में दो प्लास्टिक के डिब्बे पड़े रह गए — पानी से भरे, ढके हुए, जैसे दो सफ़ेद झूठ।
मैंने उन्हें नहीं छुआ।
मैंने जेब में हाथ डाला और घंटी छुई।
वो चुप थी।
बिल्कुल चुप।
न गर्म, न ठंडी।
मैंने घंटी को हिलाया — धीरे से, अँगूठे से — पर वो नहीं बजी।
जैसे कह रही हो — अभी कोई सच बोला ही नहीं।
मैं पलटा।
हबीब चाचा अब भी खड़े थे। इमरान अब भी स्टूल पर बैठा था।
दोनों के बीच चाय के दोनों गिलास ठंडे पड़े थे।
मैंने कुछ कहना चाहा — कुछ ऐसा जो माहौल हल्का कर दे, जो हँसी ले आए। मेरी आदत है। जब बात भारी हो, मैं मज़ाक में उतार देता हूँ।
पर इस बार मैं चुप रहा।
क्योंकि मुझे लगा — अगर मैंने अभी मज़ाक किया, तो जो सच आधा खुला है, वो बंद हो जाएगा।
मैंने दोनों गिलास उठाए और पीछे रखने चला गया।
और तभी, मेरे पीछे, इमरान ने कहा।
आवाज़ बहुत धीमी थी। इतनी धीमी कि मुझे लगा शायद मैंने सुना नहीं, शायद हवा ने कहा।
"मैंने सात चिट्ठियाँ भेजी थीं।"
मैं रुक गया।
"एक भी वापस नहीं आई।"
मैंने पलटकर देखा।
हबीब चाचा के हाथ में चाय का गिलास नहीं था। उनका हाथ खाली था — हवा में, थोड़ा ऊपर, जैसे किसी चीज़ को पकड़ना चाहा हो और वो चीज़ मिली न हो।
और वो हाथ काँप रहा था।
तेज़ नहीं। बहुत धीरे। पर काँप रहा था।
और उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था — डर नहीं, गुस्सा नहीं, बस एक अजीब-सी खाली जगह। जैसे कोई पुराना संदूक खुला हो और उसमें से सब कुछ निकल चुका हो।
मैं वहीं खड़ा रहा।
मेरे हाथ में दो ठंडे गिलास थे।
और गली में चुप्पी इतनी थी कि मुझे अपनी साँस भारी लगने लगी।
सात चिट्ठियाँ।
सात।
और एक भी वापस नहीं आई।
तो सवाल यह नहीं था कि बेटे ने क्यों लिखा।
सवाल यह था — वो चिट्ठियाँ पहुँची कहाँ?
उस आँगन में, जहाँ हैंडपंप का हत्था गायब था, पर साइकिल की चेन में तेल डला हुआ था?
या किसी और हाथ में, जिसने उन्हें खोला भी नहीं?
मैंने हबीब चाचा की तरफ़ देखा।
उनका हाथ अब भी काँप रहा था।
और मेरी जेब में घंटी चुप थी — इतनी चुप कि मुझे लगा, अब ये चुप्पी गली की नहीं, किसी और की है।
किसी ऐसी चीज़ की, जो अभी बोली नहीं।
पर बोलने वाली थी।
बहुत जल्दी।
॥
मैंने दोनों गिलास पीछे वाले तख़्ते पर रखे और पलटा।
हबीब चाचा का हाथ अब भी हवा में था। उँगलियाँ थोड़ी खुली, जैसे किसी ने कुछ पकड़ा हो और वो छूट गया हो। उनकी आँखें मेरी तरफ़ नहीं थीं। वो इमरान की तरफ़ भी नहीं थीं। वो बस सामने, पीपल की जड़ के पास, ज़मीन पर टिकी थीं, जहाँ धूप का एक टुकड़ा पड़ा था।
इमरान स्टूल पर बैठा था। उसके हाथ घुटनों पर थे। और उसकी उँगलियाँ अपनी ही जाँघ को इस तरह दबा रही थीं, जैसे कोई गिनती भूल रहा हो।
“कहाँ भेजी थीं?” मैंने पूछा। आवाज़ बहुत धीमी रखी। ऐसी आवाज़ जो किसी चीज़ को तोड़े नहीं।
इमरान ने साँस ली।
“डाक से कभी नहीं,” उसने कहा। “मैंने उन्हें यहीं छोड़ा था। आँगन की मुंडेर पर, साइकिल की टोकरी में, दरवाज़े के नीचे से सरका कर, संदूक के ऊपर। जहाँ नज़र जाती थी, वहीं रख दी। सोचता था, बाप को मिल जाएगी, पढ़ लेगा, फिर शायद एक बार पूछ लेगा कि तू कहाँ है।”
हबीब चाचा ने धीरे से सिर हिलाया। एक बार। दो बार। फिर बोले, इतना धीमे कि जैसे अपने ही कान में कह रहे हों।
“मुझे कोई चिट्ठी नहीं मिली।”
गली में चुप्पी उतर आई। पीपल की पत्तियाँ भी जैसे रुक गईं। दूर कहीं शबनम आपा की गुमटी से चिमटी की आवाज़ आई, फिर बंद हो गई।
मेरे मन में एक बात आई, और मैं उसे तुरंत कह नहीं पाया।
दो सच एक ही दरवाज़े पर खड़े हो सकते हैं और एक-दूसरे को देख नहीं पाते। बेटा कहता है रख कर गया। बाप कहता है मिली नहीं। दोनों झूठ नहीं बोल रहे। दोनों के हिस्से में सच है। और दोनों के बीच में कोई तीसरा है, जिसने वो चिट्ठियाँ उठाईं।
मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी अभी भी चुप थी। ठंडी भी नहीं, गरम भी नहीं। बस पीतल। जैसे वो भी इंतज़ार कर रही हो कि कोई एक सच्ची बात बोले, ताकि वो बोल सके।
“चाचा,” मैंने कहा, “आप घर चलिए। धूप तेज़ है। हम बात करेंगे।”
हबीब चाचा उठे। घुटने सीधे नहीं हुए, दो बार अटके। इमरान ने हाथ बढ़ाया, पर चाचा ने नहीं पकड़ा। न घुस्से से। डर से। जैसे पकड़ लेने से कोई पुरानी बात पकड़ में आ जाएगी।
वो चले गए।
इमरान वहीं बैठा रहा।
“तू भी चल,” मैंने कहा।
“मैं नहीं जाऊँगा,” उसने कहा। “मुझे उस आँगन में खड़ा होना अच्छा नहीं लगता।”
“तो खड़ा मत हो। बैठ जाना।”
वो मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराया — थोड़ा-सा, टूटा हुआ। फिर उठा और चला गया, दूसरी तरफ़, साइट की तरफ़।
मैं पीपल के नीचे अकेला खड़ा रहा, और मुझे अपनी ही जेब में रखी घंटी से शिकायत होने लगी। तू क्यों चुप है? इतनी बड़ी बात चल रही है, तू कुछ कह क्यों नहीं रही?
पर घंटी ने कुछ नहीं कहा।
और मैं जानता हूँ, घंटी तब चुप होती है जब सच अभी पूरा नहीं हुआ होता। अधूरे सच पर वो बोलती नहीं। वो इंतज़ार करती है।
दोपहर तक गली में पानी का सवाल सिर पर चढ़ गया।
सुबह की कतार अब बातों में बदल गई थी। कोई कहता, टैंकर वाला रात को लौटेगा। कोई कहता, लौटेगा तो डंडा लेकर लौटेगा। कोई कहता, चूल्हा जलाने के लिए भी पानी चाहिए और यहाँ तो बरतन ही सूखे पड़े हैं।
मैंने टिंकू को बुलाया।
“स्कूल के आँगन में हैंडपंप है ना?”
“है,” टिंकू ने कहा। “पर गेट पर ताला है।”
“ताला चाबी से खुलता है, टिंकू।”
“रामलाल बाबा की चाबी से,” उसने कहा, और उसकी आँखों में वो चमक आ गई, जो हर उस काम से पहले आती है जिसमें उसे जासूसी करनी हो।
“तो जा। उनसे कह, पानी सिर्फ़ भरने के लिए, किसी चीज़ के लिए नहीं। और हाँ, गली की तरफ़ से कोई काग़ज़ वाला आए, तो गेट बंद कर देना।”
“और अगर वो धक्का दे?”
“तो खिड़की से कह देना कि घर में पानी है, काग़ज़ नहीं।”
टिंकू हँसा। फिर दौड़ा।
आधे घंटे में गली में साइकिलें, ट्रॉली, बाल्टियाँ, घड़े, और गुड्डू की अगुवाई में एक कतार खड़ी हो गई। सानिया ने बाल्टियों के नीचे कपड़ा बिछाया, ताकि रास्ते में पानी न गिरे। रफ़ीक़ ने अपनी टूटी साइकिल पर दो डिब्बे बाँधे और चिंटू ने उसके पीछे बैठकर पूरी गली को हिदायत दी कि कोई जल्दी नहीं करेगा।
शबनम आपा ने गुमटी का चूल्हा नहीं जलाया, पर उन्होंने बड़ा ताँबे का बर्तन बाहर रख दिया और कहा, “जो भरे, वो सबका भरे। एक बर्तन मेरे नाम भी।”
सुनीता दीदी ने भी एक बाल्टी भरी, और जब उसने मेरी तरफ़ देखा तो शर्म से नज़र नीची कर ली।
दोपहर के तीन बजे तक गली के हर घर में पानी था।
दो प्लास्टिक डिब्बे, जो बबलू ने छोड़े थे, उसी तरह खाली पड़े रहे। किसी ने उन्हें नहीं भरा। मैंने देखा, कई लोग जान-बूझकर उनसे बचकर निकले। गली का मन समझदार है। झूठ का पानी किसी को नहीं चाहिए।
शाम को उस्ताद अली बक्श ने मुझे दुकान पर बुलाया।
उनकी मेज़ पर हैंडपंप का टूटा हत्था रखा था — अब टूटा नहीं था। जुड़ा हुआ था। जंग साफ़ की हुई, लोहे की गर्दन पर दो पतले वेल्ड के निशान थे, लकड़ी का हिस्सा नया नहीं था, पर बैठा हुआ था।
“भारी नहीं है,” उस्ताद ने कहा। “पुराना है, इसलिए भारी लगता है। जब लगाओ, तो तेल डालकर लगाना। सूखा लोहा चीख़ता है।”
मैंने हत्था उठाया।
“चाचा जी के आँगन में जाना है,” मैंने कहा।
उस्ताद ने चश्मा सीधा किया और मेरी तरफ़ देखा।
“आँगन में जाने से पहले बात जान ले,” उन्होंने कहा। “आँगन वाला आदमी अक्सर अपने ही आँगन में कैद होता है।”
“किस बात की?”
“उसकी चिट्ठियों की,” उन्होंने कहा। “मैंने आज सुबह देखा, जब वो पीपल से उठा। उसका हाथ काँप रहा था। काँपने वाला हाथ झूठ नहीं बोलता। वो बस देर से बोलता है।”
शाम सात बजे मैं हबीब चाचा के घर पहुँचा।
उनका घर गली के मोड़ से हटकर था, नीम की छाया में। बाहर से दिखता नहीं, अंदर जाओ तो लगता है कि घर नहीं, कोई पुरानी याद रहने के लिए बना दी गई है। आँगन छोटा था। बीच में सीमेंट की परत उखड़ी हुई, उसमें से ईंटें दाँत दिखा रही थीं। दीवार के सहारे हैंडपंप का ज़ंग लगा पाइप खड़ा था, हत्था गायब। उसके नीचे पानी का कोई निशान नहीं था, बस सूखी धूल थी।
और कोने में इमरान की साइकिल खड़ी थी।
पुरानी, काली, पिछला मडगार्ड टेढ़ा। चेन चढ़ी हुई। और जब मैंने देखा, तो चेन पर ताज़ा तेल की पतली चमक थी।
हबीब चाचा चारपाई पर बैठे थे। मेरे आने पर उठने की कोशिश नहीं की।
“हत्था लाया हूँ,” मैंने कहा। “उस्ताद ने जोड़ दिया है।”
चाचा ने देखा। उनका गला भर आया, पर वो रोए नहीं। बोले, “रख दो।”
मैंने हत्था दीवार के सहारे रखा और चुपचाप उनके सामने वाली पुरानी चौकी पर बैठ गया।
आँगन के दूसरे कोने में एक संदूकची रखी थी।
लकड़ी की, छोटी, ऊपर पीतल की चार पट्टियाँ। मैंने देखा और मेरी नज़र वहीं अटक गई।
उस पर धूल की मोटी परत जमी थी।
इतनी मोटी कि किसी ने उसे बरसों नहीं खोला। और इतनी सीधी, इतनी बराबर, कि साफ़ लग रहा था — उस पर कुछ रखा भी नहीं जाता। कोई उसके पास आता भी नहीं।
मुझे अजीब लगा। घर में एक चीज़ ऐसी हो, जिस पर धूल जमने दी जाए, तो वो चीज़ या बहुत बेकार होती है, या बहुत ज़रूरी। बेकार चीज़ें लोग फेंक देते हैं। ज़रूरी चीज़ों से लोग डरते हैं।
“चाचा,” मैंने कहा, “चाय बना लूँ?”
“चूल्हा ठंडा है।”
“मैं जला दूँगा।”
वो कुछ नहीं बोले। मैं उठा, चूल्हे के पास गया। लकड़ी नहीं थी, रसोई में काग़ज़ के पुराने टुकड़े थे। मैंने देखा, वो अख़बार नहीं थे। वो पुरानी रसीदें थीं, फटी हुई, जिनसे किसी ने चूल्हा जलाया था।
मैंने चाय बनाई और उनके हाथ में दी।
उन्होंने दो घूँट पिए। फिर गिलास घुटनों पर रख दिया।
“इमरान आज सुबह चला गया था, है ना?” उन्होंने पूछा।
“हाँ।”
“रात को वो यहाँ आया,” चाचा ने कहा। “उसने साइकिल की चेन में तेल डाला। मैंने छत से देखा। पर मैं नीचे नहीं आया।”
“क्यों?”
उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। उनकी उँगलियाँ गिलास पर कस गईं।
“मैंने उसे कभी ठीक से सुना ही नहीं,” वो बोले, अचानक, जैसे बात उनके अंदर से धक्का देकर निकली हो।
मैं चुप रहा।
“जब वो छोटा था, तो साइकिल के पुर्जे जोड़कर बैठता था। मैं कहता — पढ़ाई कर। पुर्जे तेरे किस काम के। जब वो दसवीं में फेल हुआ, तो मैंने कहा — तू निकम्मा है। जब वो मज़दूरी पर जाने लगा, तो मैंने कहा — तेरी ज़िंदगी में कुछ नहीं होगा। जब वो सीखने की बात करता, तो मैं कहता — पहले पैसा कमा, फिर सीखना।”
उन्होंने रुककर गिलास देखा, जैसे उसमें चाय नहीं, कोई पुराना चेहरा दिख रहा हो।
“मैं हर बार अपनी बात थोपता रहा। मैंने उससे कभी नहीं पूछा — तू क्या चाहता है? मैंने बस कहा कि मुझे क्या चाहिए।”
मैंने गला साफ़ किया।
“चाचा,” मैंने कहा, “आज सुबह आपने कहा कि आपको कोई चिट्ठी नहीं मिली।”
“नहीं मिली।”
“तो सात चिट्ठियाँ कहाँ हैं?”
उनका हाथ गिलास पर और कस गया।
तभी दरवाज़े पर साया पड़ा।
इमरान खड़ा था।
कमीज़ पर सीमेंट की सफ़ेदी थी, हाथ धुले नहीं थे। वो अंदर नहीं आया। दरवाज़े के फटे कोने पर खड़ा रहा, जैसे आँगन में पाँव रखना कोई गुनाह हो।
“आ जा,” चाचा ने कहा।
आवाज़ में गुस्सा नहीं था। थकान थी।
इमरान आया। दो कदम। फिर रुक गया।
“पापा,” उसने कहा।
“बैठ।”
वो नहीं बैठा।
“मैं कुछ कहने आया हूँ,” उसने कहा। “और अगर आज नहीं कहा, तो फिर कभी नहीं कहूँगा।”
चाचा ने उसकी तरफ़ देखा।
“मैं बिना बताए चला गया था,” इमरान ने कहा। “वो मेरी गलती थी। मुझे चाहिए था कि मैं एक बार आकर कहता — पापा, मैं निकल रहा हूँ। मुझे ये शहर नहीं चाहिए। मुझे ये झगड़ा नहीं चाहिए। पर मैंने कुछ नहीं कहा। मैं बोरा उठाकर निकल गया, और जब लौटा तो साल गुज़र चुके थे।”
चाचा ने गिलास चौकी पर रखा। उनका हाथ काँप रहा था।
“मैंने तुझे निकाला नहीं था,” वो बोले।
“कहने की ज़रूरत नहीं थी,” इमरान ने कहा। “मैं आपकी आवाज़ से समझ जाता था।”
दोनों चुप हो गए।
मैंने कभी दो आदमियों को इतनी तेज़ी से चुप नहीं होते देखा। दोनों की आँखें एक-दूसरे पर थीं, पर बीच में कोई शब्द नहीं था। जिस शब्द को आना चाहिए था, वो आते-आते दरवाज़े पर रुक गया था, और इधर-उधर देखने लगा था।
मेरी जेब में घंटी हल्की-सी गरम हुई।
इतनी हल्की कि जैसे किसी ने दूर से अँगीठी दिखाई हो।
फिर वो बोली, धीमे से, रूखी आवाज़ में।
“दरवाज़ा आधा खुला है। पूरा नहीं।”
मैंने आँख बंद की।
आधा। हमेशा आधा।
जैसे मेरी ज़िंदगी में हर दरवाज़ा आधा ही खुलता है। शबनम आपा और रज़िया का भी आधा। मीरा का भी आधा। मेरा और पापा का भी आधा। और अब ये।
“चाचा,” मैंने कहा, और आवाज़ में जो सख्ती मैं लाना चाहता था, वो नहीं आई, “वो संदूकची।”
उन्होंने देखा। बहुत देर देखा।
फिर वो उठे।
धीरे-धीरे गए, जैसे कोई पुरानी कब्र की तरफ़ जा रहा हो। संदूकची के सामने बैठे। पीतल की पट्टी पर हाथ रखा। और उसी पल मैंने देखा — उनकी उँगलियाँ साफ़ थीं। धूल उन पर नहीं लगी।
क्योंकि वो रोज़ उसे छूते हैं।
रोज़ छूते हैं, पर खोलते नहीं।
उन्होंने कुंडी खोली। ढक्कन उठाया, और अंदर से पुरानी लकड़ी और कपड़े की गंध आई।
संदूक के अंदर कपड़े थे — दो साड़ियाँ, मोड़ी हुई, ऊपर सफ़ेद, नीचे हरी। उनके नीचे एक कपड़े की पोटली। और उस पोटली के अंदर, बराबर, सीधे, एक-दूसरे पर रखे, सात लिफ़ाफ़े।
सात।
इमरान ने एक कदम पीछे रखा।
“ये…” उसकी आवाज़ फट गई।
“हाँ,” चाचा ने कहा। “ये वही हैं।”
इमरान ने अपनी तरफ़ देखा। उसका चेहरा ऐसा था जैसे किसी ने उसके सामने उसका ही पुराना ख़त खोल दिया हो।
हर लिफ़ाफ़े पर लिखाई थी।
वही लिखाई। जो ब आड़ा लिखती है, होड़ी का मोड़ चौड़ा करती है, और आख़िर में कलम ज़ोर से दबाकर रुकती है।
इमरान का ही हाथ। इमरान का ही नाम। ऊपर बड़े अक्षरों में उनके ही नाम से लिखा हुआ।
“आपने खोले ही नहीं?” इमरान ने पूछा।
चाचा ने सिर नीचा कर लिया।
“खोले नहीं,” वो बोले।
“सात साल?”
“सात साल।”
इमरान की आँखें भर आईं। पर गुस्से से नहीं। किसी और चीज़ से, जिसका नाम मैं नहीं जानता।
“क्यों?” उसने पूछा। “क्यों नहीं खोले?”
हबीब चाचा रोए।
वो फूट-फूटकर नहीं रोए। उनके कंधे हिले, आँखों से पानी गिरा, और उनकी आवाज़ इस तरह टूटी जैसे कोई पुरानी रस्सी अंत में टूटती है।
“क्योंकि खोलने का मतलब होता था कि मैं ने पढ़ लिया,” उन्होंने कहा। “और पढ़ने का मतलब होता था कि मैंने सुना। और सुनने का मतलब होता था कि मैं ग़लत था।”
उन्होंने अपनी हथेली संदूक के ढक्कन पर रख दी।
“मैं ग़लत नहीं दिखना चाहता था,” वो बोले। “अपने बेटे के सामने भी नहीं। अपने सामने भी नहीं।”
इमरान ने मुँह खोला, पर कुछ नहीं निकला।
“मैंने इन्हें डर से नहीं, गुस्से से बंद रखा था,” चाचा ने कहा। “डर तो बाद में आया। पहले गुस्सा था। गुस्सा कि मेरा बेटा मुझे छोड़कर गया। और फिर, जब गुस्सा उतरा, तो डर आया — कि अगर इसमें कुछ ऐसा लिखा होगा जो मुझे झेलना पड़ेगा, तो मैं झेल नहीं पाऊँगा। और फिर साल गुज़र गए, और फिर खोलना… खोलना तो अब गुनाह लगता है।”
मैं चुप बैठा रहा। मेरी जेब में घंटी अब गरम थी, पर बजी नहीं।
“आज मैं खोलूँ?” चाचा ने पूछा। उन्होंने पूछा नहीं, उन्होंने माँगा। मेरी तरफ़ देखकर, जैसे मैं कोई हिसाब रखने वाला आदमी हूँ, जो बता सके कि खोलने पर क्या घटेगा।
“आपका संदूक है,” मैंने कहा।
“पर अब ये सिर्फ़ मेरा नहीं है,” उन्होंने कहा।
उन्होंने ऊपर वाला लिफ़ाफ़ा उठाया।
इमरान ने आँखें बंद कर लीं।
काग़ज़ पुराना था, इसलिए किनारे से चटक सकता था। चाचा ने उँगली अंदर डाली, धीरे से किनारा खोला, और लिफ़ाफ़े के मुँह को ऊपर किया।
और तभी एक चीज़ नीचे गिरी।
पतला काग़ज़, हल्का गुलाबी, बीच से दो बार मोड़ा हुआ। वो फ़र्श पर गिरा, धूल में हल्का-सा उछला, और पलटकर सीधा हो गया।
मैंने उसे उठाया।
वो रसीद थी।
ऊपर छपा था — नूर अस्पताल। नीचे हाथ से लिखी दवा का नाम, जो मैं पूरा नहीं पढ़ सका, पर शुरुआती अक्षर पहचाने — वही दवा जो माँ की फाइल में लिखी है। रकम लिखी थी, तारीख़ लिखी थी, और नीचे हस्ताक्षर — इमरान।
दवा की रसीद। पूरे पैसे जमा। कुछ बाकी नहीं।
इमरान ने आँखें खोलीं और रसीद देखी।
“ये…” वो बोला, और फिर रुक गया।
हबीब चाचा ने रसीद मेरे हाथ से ली। उन्होंने उसे पलटा। पीठ पर भी कुछ लिखा था — नीली स्याही, छोटी लिखाई।
और उसी पल मेरी नज़र रसीद के नीचे वाले कोने पर पड़ी।
वहाँ एक गोल मोहर थी। आधी घिसी हुई। नीली।
वही नीली।
वही गोल मोहर, जो तीन औरतों के काग़ज़ों पर थी। वही मोहर, जो पानी के काग़ज़ पर थी। वही मोहर, जिसके नीचे कभी हकीम अली का नाम पढ़ा गया था।
और उस मोहर के ठीक नीचे, नीली स्याही में एक छोटी पंक्ति।
दो शब्द।
अंगूठा — बाकी।
मैंने साँस रोक ली।
हबीब चाचा ने देखा। उनका चेहरा बदल गया। वो रसीद को दूर करके देखने लगे, जैसे आँखें धोखा दे रही हों।
“मैंने ये रसीद नहीं देखी,” वो बोले। “मैंने ये कभी नहीं देखी।”
“पर ये आपके संदूक में थी,” मैंने कहा।
“इसका मतलब… इसका मतलब ये पैसे किसी ने दिए…”
“इमरान ने दिए,” मैंने कहा। “देखिए, हस्ताक्षर उसके हैं।”
“नहीं,” इमरान ने कहा। वो आगे आया और रसीद को देखने लगा। उसकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। “मैंने ये दवा खरीदी थी, पर… पर रसीद मैंने अपने हाथ में नहीं ली। मैंने पैसे किसी और के हाथ से भेजे थे। मैंने चिट्ठी में लिखा था कि ये पैसे माँ की दवा के लिए हैं — मैंने ये रसीद नहीं देखी।”
मैं उन दोनों के बीच खड़ा था, और मेरे हाथ में वो रसीद थी जो सात साल पहले किसी चिट्ठी में बंद होकर आई थी और किसी ने खोली नहीं।
“तो रसीद यहाँ कैसे आई?” मैंने पूछा।
जवाब किसी के पास नहीं था।
और मेरी जेब में घंटी ने बहुत धीमे से, बहुत रूखे स्वर में, एक ही शब्द कहा।
“हाथ।”
मैंने रसीद फिर देखी।
उस पर दो हाथ थे।
एक, जिसने दवा दी। एक, जिसने पैसे दिए। और एक तीसरा, जिसने रसीद को इस संदूक तक पहुँचाया — वो हाथ, जिसने सात चिट्ठियाँ उठाईं और इन सात सालों में एक भी बाप के हाथ में नहीं आने दीं।
हबीब चाचा ने रसीद सीने से लगा ली।
“मैंने इसे क्यों नहीं खोला,” वो बोले, अपने आप से, बहुत धीमे।
इमरान उनके पास बैठ गया।
दोनों के बीच अब भी वो शब्द नहीं आया था, जिसका नाम माफ़ी है। पर अब उनके बीच कुछ और था — एक रसीद, एक टूटी मुंडेर, और सात ख़त जो कभी पढ़े नहीं गए।
मैंने सातवाँ लिफ़ाफ़ा उठाया, जो सबसे नीचे था।
ऊपर लिखा था, बड़े अक्षरों में — “आख़िरी।”
मैंने उसे चाचा की तरफ़ बढ़ाया।
“ये आख़िरी है,” मैंने कहा। “इसे आज खोल लीजिए।”
चाचा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो डर अब भी था — सात साल पुराना, सूखा, बैठा हुआ डर।
“अगर इसमें भी कुछ…” वो रुक गए।
“तो हम सब मिलकर पढ़ेंगे,” मैंने कहा। “अकेले नहीं।”
उन्होंने लिफ़ाफ़ा हाथ में लिया।
मेरी जेब में घंटी चुप थी, पर उसका पीतल अब ठंडा नहीं था। उसमें गरमी थी — वैसी गरमी, जैसे किसी ने दरवाज़े का कुंडा छुआ हो और वो अभी-अभी हिला हो।
आधा खुला।
आधा अभी भी बंद।
और ऊपर वाले लिफ़ाफ़े के नीचे, रसीद की पीठ पर, वो दो शब्द अभी भी मेरी आँखों में तैर रहे थे।
अंगूठा बाकी।
किसका अंगूठा?
और किस काग़ज़ पर?
मैंने धूल में बैठे उस संदूक की तरफ़ देखा, जिस पर सात साल की परत जमी थी, और मुझे लगा — गली में अभी भी एक ऐसा संदूक है, जिसे किसी ने खोला नहीं, सिर्फ़ रोज़ छूकर देखा है।
और जिस दिन वो खुलेगा, उस दिन शायद सिर्फ़ चिट्ठियाँ नहीं निकलेंगी।
उस दिन कुछ और निकलेगा।
जिसका इंतज़ार गली नहीं कर रही।
जिसका इंतज़ार साहब कर रहा है।
॥
लिफ़ाफ़ा हबीब चाचा के हाथ में था, और वो काँप रहा था।
पीला, मोटा, कोना मुड़ा हुआ। ऊपर बड़े अक्षरों में किसी ने मोटी कलम से लिखा था — आख़िरी। स्याही अक्षरों के किनारों से फैल गई थी, जैसे लिखते वक़्त हाथ रुका हो, फिर ज़ोर लगाकर लिखा गया हो।
चाचा उसे खोलने की कोशिश कर रहे थे, पर अँगूठा फिसल रहा था। उनके चश्मे पर धूल थी, और वो धूल उन्होंने पोंछी नहीं। इमरान उनके बगल में घुटनों के बल बैठा था, हाथ ज़मीन पर टिके हुए, जैसे कोई चीज़ गिर न जाए इसलिए सँभाल रहा हो।
मैंने कहा, “चाचा, आप खोलिए। ये आपका ही है।”
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, फिर लिफ़ाफ़े की तरफ़। फिर इमरान की तरफ़। और उनका हाथ और ज़्यादा काँपने लगा।
तुम सोच रहे होगे कि लिफ़ाफ़ा खोलने में क्या रखा है। तो सुनो — लिफ़ाफ़ा खोलना आसान है। उसमें जो लिखा है, उसे पढ़ना आसान नहीं है। और उसे पढ़कर वो कह देना, जो सात साल से नहीं कहा गया, वो सबसे मुश्किल है।
लिफ़ाफ़े के अंदर चार पन्ने थे।
चारों तह किए हुए, चारों पर नीली स्याही, चारों पर वही टेढ़े-मेढ़े बड़े अक्षर, जैसे किसी ने दूर से पढ़ने वाले के लिए लिखा हो।
पहला पन्ना सबसे ऊपर था, और सबसे पुराना।
चाचा ने उसे खोला, आँखों के पास ले गए, और ज़ोर से पढ़ने लगे। ज़ोर से इसलिए, क्योंकि उन्हें अपनी ही आवाज़ पर भरोसा नहीं था।
“अब्बा।”
यही पहला शब्द था। और यही शब्द सुनते ही चाचा की गर्दन थोड़ी झुक गई।
“अब्बा, मैं ठीक हूँ। आप मेरी चिंता मत करना। साइट पर काम मिल गया है। सीमेंट की बोरियाँ ढोता हूँ। सुबह छह बजे उठता हूँ और रात को नौ बजे हाथ-मुँह धोता हूँ। धूल इतनी है कि आँख में जाती है, पर आँख बंद करके मुँह धो लेता हूँ तो निकल जाती है।”
चाचा रुके। उन्होंने एक बार इमरान की तरफ़ देखा, फिर पन्ने पर लौट आए।
“अब्बा, पहले महीने के पैसे में से मैंने दवा की रसीद भेजी थी। पैसे मैंने उसी आदमी के हाथ भेजे जो साइट पर सबका पैसा घर पहुँचाता है। उसका नाम मैं चिट्ठी में नहीं लिख रहा, क्योंकि मुझे पता है आप उससे पूछने जाएँगे और फिर बात बढ़ जाएगी।”
मेरे मुँह से बिना मतलब की एक हँसी निकल गई। चाचा ने सिर उठाया।
“क्यों हँस रहा है?”
“कुछ नहीं चाचा,” मैंने कहा। “बस ये सोच रहा था कि बेटा कितना भी बड़ा हो जाए, बाप से छिपाने के लिए वो भी वही पुरानी तरकीबें लगाता है।”
चाचा कुछ नहीं बोले। पर उनके होठों पर एक बार कुछ हिला, जो न हँसी थी, न गुस्सा।
दूसरा पन्ना था — और वो सबसे भारी था।
“अब्बा, पंप का हत्था मैंने तोड़ा नहीं था।”
चाचा ने पढ़ते-पढ़ते रुककर ऊपर देखा। इमरान ने अपना सिर और नीचे झुका लिया।
“पर सच ये है कि मैं उस दिन घुस्से में था। आपने कहा था कि मैं निकम्मा हूँ, मैं वही करता हूँ जो मुझे करना चाहिए। मैं बाहर जाने की बात कर रहा था और आप सुनते ही नहीं थे। मैंने पंप से हाथ नहीं हटाया, मैंने हत्था पकड़कर खींचा था। वो मेरे हाथ में आ गया और मैं वो अपने साथ ले आया।”
“अब्बा, मैंने उसे छुपाया नहीं। मैंने उसे अपने थैले में रखा और अपने साथ रखा। छह महीने मेरे पास रहा। रात में सोते वक़्त मैं उसे छूता था।”
“मैंने सोचा था कि जिस दिन आप मुझसे पूछेंगे, उस दिन मैं हत्था लौटा दूँगा और कहूँगा — अब्बा, देखो, मैंने ठीक कर दिया। बस एक बार आप पूछ लो। एक बार।”
चाचा का हाथ काँपा और पन्ना हवा में हिल गया।
इमरान धीरे से बोला, “अब्बा, उस दिन आपने कुछ नहीं पूछा।”
“मैंने सोचा तू चला गया, तुझे घर छोड़ना था,” चाचा ने कहा। आवाज़ सूखी थी, जैसा आँगन का पत्थर दोपहर में होता है।
“मुझे जाना नहीं था,” इमरान ने कहा। “बस किसी को पूछना था।”
और यही बात तुम समझ लो — घर में सबसे ज़्यादा नुकसान वो नहीं करता जो चिल्लाता है। नुकसान वो करता है जो चुप रहता है, और दूसरा भी चुप रहता है, और बीच में साल गुज़र जाते हैं।
चाचा ने तीसरा पन्ना खोला।
इस पन्ने के अक्षरों में जल्दी थी, जैसे कोई बहुत दिन रुककर एक साँस में लिख रहा हो।
“अब्बा, मैं हर रविवार फ़ोन लगाता हूँ। घंटी बजती है, आप उठाते हैं, मैं कहता हूँ — अब्बा। और आप कहते हैं — हूँ।”
“बस। वही एक हूँ। और मैं उस हूँ के आगे कुछ नहीं कह पाता। मन में सौ बातें होती हैं — पूछना होता है कि कमर कैसी है, दवा ले रहे हैं या नहीं, सुबह की चाय बन रही है या नहीं, मोहल्ले वाले अब भी मेरी बात करते हैं या नहीं। पर वो हूँ सुनते ही सब कुछ गले में अटक जाता है।”
“इसीलिए मैंने सोचा, चिट्ठी लिखूँगा। चिट्ठी में हूँ नहीं सुनाई देगा।”
चाचा ने पन्ना नीचे रख दिया।
उन्होंने चश्मा उतारा, कुर्ते के आँचल पर उसे पोंछा, फिर वापस लगाया। और मैंने देखा कि पोंछने की ज़रूरत चश्मे को नहीं, आँखों को थी।
चौथा पन्ना — आख़िरी।
इस पर तारीख़ नहीं थी। नीचे कोई नाम नहीं था। बस आख़िरी में एक लाइन थी, पहले से ज़्यादा छोटी, इस बार जल्दी की नहीं, थकान की लिखाई।
“अब्बा, एक बात है जो मैं फ़ोन पर नहीं कह सकता और चिट्ठी में नहीं लिख सकता। जिस दिन आप मुझे बुलाएँगे, उस दिन मुँह पर कहूँगा। बस आप एक बार बुला लीजिए।”
चाचा ने पन्ना मोड़ा, फिर खोला, फिर मोड़ा।
फिर उन्होंने वो किया जो मैंने उन्हें कभी करते नहीं देखा था। उन्होंने अपना चेहरा दोनों हाथों में छिपा लिया।
और अब मैं तुमसे एक बात कहूँगा जो सच है — गुस्सा एक झटके में नहीं टूटता। गुस्सा दरवाज़े की तरह नहीं होता जो धक्के से खुल जाए। गुस्सा पुरानी दीवार की तरह होता है। पहले उसमें बारीक दरार पड़ती है, जो किसी को दिखती नहीं। फिर एक दिन वो दरार बढ़ती है और अंदर से चूना झड़ने लगता है। और फिर उसी दीवार पर टिकी चीज़ें गिरने लगती हैं।
हबीब चाचा की दीवार आज झड़ रही थी।
“मैंने तुझे निकम्मा कहा था,” उन्होंने हाथों के पीछे से कहा। “गली में सब कहते थे, मैंने किसी को टोका नहीं। मैंने अपनी चुप्पी से उनकी बात मान ली।”
“अब्बा—”
“तेरे पीछे मैंने तेरी साइकिल आँगन में खड़ी रखी थी। धूल जमने देता था, पर किसी को छूने नहीं देता था। मैं रोज़ उसका हैंडल पकड़कर खड़ा होता था, जैसे तू अभी आएगा, साइकिल लेकर निकलेगा।”
इमरान का सिर झुका हुआ था। उसके हाथ ज़मीन पर थे, उँगलियाँ धूल में।
“और वो चिट्ठियाँ…” चाचा ने कहा। “सात चिट्ठियाँ। मैंने एक भी नहीं पढ़ी।”
“आपको मिली ही नहीं थीं, अब्बा,” इमरान ने कहा।
“तो भी मैंने पूछा नहीं। मैंने कभी ये नहीं पूछा कि तू कहाँ है, कैसे है, खाता है या नहीं। मैंने सिर्फ़ ये मान लिया कि तू भूल गया।”
फिर चाचा ने वो किया जो इस पूरे दिन का सबसे बड़ा काम था।
उन्होंने अपने बेटे का हाथ पकड़ा।
बहुत धीरे, जैसे कोई ज़ंग लगा हुआ दरवाज़ा पहली बार खोल रहा हो।
“इमरान।”
इमरान ने सिर उठाया।
“मैंने सुनने में देर की,” चाचा ने कहा। “माफ़ कर।”
इमरान ने कुछ कहना चाहा, पर आवाज़ नहीं निकली। उसने एक बार गला साफ़ किया, फिर बोला, “अब्बा, मुझे भी बिना बताए नहीं जाना चाहिए था। मैंने पीछे मुड़कर देखा भी नहीं। अगर मैं एक बार रुक जाता, एक बार कह देता कि मैं जा रहा हूँ, काम करने, तो ये सब नहीं होता।”
“कहने की देर थी,” चाचा ने कहा। “सुनने की भी।”
और दोनों की आँखें भर आईं। किसी ने रोना शुरू नहीं किया। कोई चीखा नहीं। बस दोनों के हाथ जुड़े रहे, और आँगन में धूल उड़ती रही, और दूर कहीं नीम पर एक कौआ बोलता रहा, जैसे गली का कोई बूढ़ा अपने आप से बात कर रहा हो।
तभी मेरी जेब में घंटी गरम हुई।
धीरे से, आवाज़ किए बिना, जैसे किसी ने पीतल के ऊपर हथेली रख दी हो। मैंने जेब में हाथ डाला और उसे छुआ। गरमी आँगन की धूप जैसी नहीं थी। वो गरमी अंदर से आ रही थी।
फिर वो बजी।
छोटी, साफ़, एक बार।
और फिर उसकी आवाज़ आई। पहले जैसी रूखी नहीं।
“गिन लिया।”
मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मैंने चारों तरफ़ देखा, चाचा और इमरान अपने ही हिसाब में थे। मैंने धीरे से जेब में पूछा, “कितना?”
पर घंटी ने अंक नहीं बताए।
उसने बस इतना कहा, “हाथ छोड़ मत।”
मैं कुछ देर वहीं बैठा रहा, और मुझे लगा कि आज घंटी ठंडी नहीं है, बूढ़ी नहीं है, और आज उसकी आवाज़ में वो दो शब्द भी नहीं थे जो पिछले कई दिनों से थे — कम है, उधार है। आज उसने बस इतना कहा, जितना ज़रूरी था।
“अब्बा,” इमरान ने कहा। वो उठा और अपनी कमीज़ की जेब से कुछ निकाला। “ये आपका है। मैं आज लाया हूँ।”
उसके हाथ में पंप का हत्था था।
टूटा नहीं, टूटा हुआ भी नहीं — जोड़ा हुआ। उस्ताद ने कल रात ज़ंग छीलकर, लकड़ी का जो हिस्सा गायब था, उसकी जगह नई लकड़ी की पट्टी लगाकर, लोहे पर दो पेंच डालकर उसे ऐसा कर दिया था कि दूर से पुराना ही लगता था।
चाचा ने हत्था हाथ में लिया। उन्होंने उसे पलटकर देखा, नाखून से ज़ंग छेड़ी, फिर हल्के से बोले, “उस्ताद का हाथ है।”
“हाँ,” मैंने कहा। “उस्ताद ने कहा कि चीज़ें जोड़ने में सबसे ज़्यादा मेहनत ‘छिपाने’ में लगती है। अगर जोड़ साफ़ दिखे, तो लोग जोड़ नहीं देखते, टूटन देखते हैं।”
चाचा ने इमरान की तरफ़ देखा।
“चल,” उन्होंने कहा। “लगा।”
आँगन के कोने में वो हैंडपंप खड़ा था, जिसने बीस साल गली का पानी दिया था और जो कल से सूखा पड़ा था। उसका रंग उतरा हुआ, नीचे काई जमी हुई, और लीवर वाली जगह खाली थी — बस एक छेद, जैसे किसी के मुँह से दाँत निकल गया हो।
इमरान ने हत्था छेद में डाला।
अंदर जाते ही लोहे ने आवाज़ की, वो पुरानी चरचराहट, जो हर घर के पंप में होती है। चाचा ने अपना हाथ हत्थे पर रखा, ऊपर से, अपने बेटे के हाथ के ऊपर।
और दोनों ने साथ खींचा।
पहली बार — कुछ नहीं। सिर्फ़ हवा, एक लंबी सूखी साँस।
दूसरी बार — पानी की आवाज़ आई, पर ज़मीन के नीचे से, दूर। जैसे कोई नींद में बड़बड़ा रहा हो।
तीसरी बार — और मेरे हाथ से मेरी रिंच गिर गई, क्योंकि पानी फूट पड़ा।
पहले भूरा, फिर मटमैला, फिर साफ़। और फिर इतना तेज़ कि चाचा के कुर्ते पर छपाक पड़ी और उनका चश्मा धुँधला हो गया।
गली में आवाज़ गई।
टिंकू पहले पहुँचा, बिना चप्पल, एक पैर पर टेप पट्टी चिपकाए। फिर सानिया, फिर गुड्डू, फिर रफ़ीक़, और सबके पीछे चिंटू, जिसके हाथ में पुरानी रिम थी और जो उसे भूल ही गया।
“पानी!” सानिया चीखी, ऐसे चीखी जैसे स्कूल की छुट्टी हो गई हो।
बच्चे पानी में छपाक-छपाक मारने लगे। टिंकू ने मुँह सीधा धार के नीचे रखा और दोनों गाल फुला लिए। गुड्डू ने हाथ आगे किए और पानी उसकी उँगलियों के बीच से फिसलकर उसकी कमीज़ पर गिरा। रफ़ीक़ अपनी आधी मुड़ी चप्पल से पानी सींचने लगा। चिंटू ने धार के नीचे सिर रख दिया और उसकी नाक से पानी चढ़ गया, फिर वो खाँसते-खाँसते हँसने लगा।
और हबीब चाचा वहीं खड़े थे, कुर्ता गीला, चश्मा धुँधला, दोनों हाथ हत्थे पर, और अपने बेटे के हाथ के ऊपर।
“अब्बा, छोड़िए नहीं,” इमरान ने कहा, हँसते हुए। “धार बंद हो जाएगी।”
“बंद होने दे,” चाचा ने कहा। “मैं तो बीस साल से यही पकड़ रहा था, बंद थी।”
इसके बाद जो हुआ, वो सुनने में बहुत छोटा है, पर गली के हिसाब से बड़ा था।
शबनम आपा गुमटी से निकलीं, चिमटी हाथ में, और उन्होंने ऐलान किया, “चूल्हा जल रहा है। जिसको चाय चाहिए, वो अपना गिलास लेकर आए। आज कटोरी नहीं, गिलास।”
मैंने कहा, “आपा, आपने तो कहा था कि सच खुलने तक चूल्हा बंद।”
“सच खुल गया,” उन्होंने कहा, और रज़िया की तरफ़ देखकर मुस्कुराईं, “अब चूल्हा क्यों बंद रहे?”
रज़िया बर्तन धोने वाली जगह से गिलासों की ट्रे ले आई। उसके हाथ में वो पुरानी रेशमी चुनरी नहीं थी, बस एक साफ़ रूमाल था, जो उसने माथे पर बाँध लिया था।
चाय बंटी।
मीरा आई, कैमरा तिपाई समेत। उसने चाचा की तरफ़ देखा और पूछा, “चाचा, बीस सेकंड?”
चाचा ने उसे देखा। फिर पंप को देखा। फिर बोले, “आज नहीं, बेटा। आज कैमरा रख दे।”
मीरा ने एक बार भी बहस नहीं की। उसने तिपाई बंद की, कैमरा बैग में रखा, और चाय का गिलास दोनों हाथों से लिया। मैंने उसे देखा और मुझे लगा — जो आदमी कैमरा बंद कर सकता है, वो आदमी बहुत कुछ कर सकता है।
हबीब चाचा ने चाय पी। एक घूँट लिया, फिर दूसरा, फिर गिलास इमरान की तरफ़ बढ़ाते हुए बोले, “तेरी चाय में चीनी कम है।”
“अब्बा, ये आपका गिलास है।”
“तो?”
इमरान हँसा। उस हँसी में वो सारी साल थे जो बिना हँसे बीत गए।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी अब भी गरम थी, पर हल्की। जैसे किसी ने उसे गले से उतारकर मेज़ पर रख दिया हो और कह दिया हो — अब थोड़ी देर आराम कर।
“कितना गिना?” मैंने फिर धीरे से पूछा।
इस बार घंटी ने जवाब दिया।
“जितना सहा जा सके।”
मैं हँस पड़ा। “ये तो बहुत कम है।”
“तो कमर झुका के चल।”
यही उसका तरीक़ा है। कभी सीधा जवाब नहीं देती।
दोपहर हो गई थी। आँगन में पानी सूखने लगा, बच्चे अब भी भीगे खड़े थे, और गली में किसी ने हल्की-सी ढोल की ताल छेड़ दी। चाचा ने अपने बेटे को अंदर बुलाया, नाश्ता करने को कहा, और इमरान ने एक पल के लिए मेरी तरफ़ देखा, जैसे कह रहा हो — तू भी आ।
पर मैं नहीं गया।
मैं आँगन के बाहर नीम के नीचे खड़ा रहा और सोचता रहा कि आज का दिन अच्छा था। और जब दिन अच्छा हो तो मुझे हमेशा थोड़ा डर लगता है। मुझे पता है कि इस गली में अच्छे दिन अकेले नहीं आते। वो अपने साथ एक ख़ाली लिफ़ाफ़ा लेकर आते हैं।
मैं ठीक ही सोच रहा था।
शाम के करीब, जब गली में पानी सूख चुका था और गुमटी पर गिलासों की कतार लगी थी, इमरान मेरे पास आया।
उसके चेहरे पर वो रंग नहीं था जो सुबह था। वो हँस रहा था, पर हँसी त्वचा तक ही थी।
उसने मेरा कंधा पकड़ा और धीरे से कहा, “भाई, दो मिनट।”
हम नीम के उस पार चले गए, जहाँ से गली दिखती है पर गली से हम नहीं दिखते। उसने एक बार चारों तरफ़ देखा, फिर आवाज़ और धीमी कर दी।
“कल रात मैंने अस्पताल के नीचे लोहे का बक्सा ले जाते लोगों को देखा था।”
मेरे हाथ रुक गए।
“क्या?”
“कल रात,” उसने दोहराया। “मैं साइट से लौट रहा था। ग्यारह बजे के करीब। मैंने पीछे की गली पकड़ी, क्योंकि सामने ट्रक खड़ा था। और अस्पताल के पीछे वाले फाटक के पास एक टेम्पो खड़ा था। लाइट बंद थी। मैंने सोचा कि सामान उतार रहे होंगे।”
“फिर?”
“फिर मैंने देखा, चार आदमी भीतर से कुछ उठा रहे थे। भारी था, इसलिए दो आगे, दो पीछे। जब उन्होंने टेम्पो की लाइट के नीचे आकर उसे रखा, तब मैंने देखा — लोहे का बक्सा।”
मैंने साँस ली। “कैसा बक्सा?”
“बड़ा। ऊपर से पीटा हुआ, कोने पर कुछ लिखा था। मैं दूर था, पढ़ नहीं सका। पर उस पर धूल की परत नहीं थी। उसे अभी-अभी कहीं से खींचकर निकाला गया था, क्योंकि उसके नीचे की ज़मीन पर एक लंबी लकीर बन गई थी।”
“उनमें से कोई पहचाना?”
इमरान ने होंठ कसे।
“एक के हाथ में पीली फाइल थी,” उसने कहा। “पीली, मोटी। वो उसे सीने से लगाए खड़ा था, जैसे काग़ज़ नहीं, कोई बच्चा हो।”
मेरे पेट में कुछ ठंडा हुआ।
पीली फाइल।
जो फाइल मैंने गोविंद भाई के दफ़्तर में देखी थी, जो फाइल पाँच साल से चल रही थी, जिसका पहला पन्ना मेरे पापा के अंगूठे से जुड़ा था।
“और उन्होंने कुछ बोला?” मैंने पूछा।
“एक ने कहा — जल्दी करो, बारह बजे के बाद सीढ़ी बंद हो जाएगी और फिर अंदर जाना मुश्किल होगा।”
मेरी जेब में घंटी गरम हुई।
बहुत गरम।
मैंने हाथ डाला और उसे हथेली में लिया। वो जल रही थी, पर बजी नहीं। ऐसा लगा जैसे उसने अपनी आवाज़ रोक ली हो, क्योंकि अभी बोलने का वक़्त नहीं था। अभी सुनने का वक़्त था।
“तूने किसी को बताया?” मैंने पूछा।
“किसी को नहीं,” इमरान ने कहा। “मैं डर गया था। मैं सीधा अपने कमरे में आ गया और सो गया, पर नींद नहीं आई। सुबह मैंने सोचा कि कह दूँ, पर फिर सोचा कि किससे कहूँ? अब्बा से? वो तो मुझसे बोलते ही नहीं थे।”
वो रुका, फिर बोला, “आज जब पानी की धार निकली, तब मुझे याद आया। और मुझे ये भी याद आया कि कल रात गली में जिस बक्से की बात हो रही थी, उस पर दादा जगदीश यादव का नाम उभरा था।”
उसने मेरी तरफ़ देखा।
“वो वही बक्सा था क्या?”
मैंने जवाब नहीं दिया। मैं उस वक़्त जवाब नहीं दे सकता था, क्योंकि मुझे खुद नहीं पता था। पर अंदर कहीं एक आवाज़ थी जो कह रही थी — हाँ।
“अस्पताल के नीचे कौन सा कमरा है?” मैंने पूछा।
“वही जिसके बाहर तुम्हारी माँ को पलंग पर लिटाया गया था,” इमरान ने कहा। “उसके पीछे एक और कमरा है। छोटा। मैंने उसकी खिड़की अंदर से पटियों से बंद देखी है। साइट पर लोग कहते हैं कि उस कमरे में पुराना सामान रखा है। पर कोई उसे खोलता नहीं।”
मैंने नीम के तने पर हाथ रखा और कुछ देर चुप खड़ा रहा।
मेरे सामने पूरी गली चल रही थी। शबनम आपा गिलास धो रही थीं। रज़िया ट्रे उठा रही थी। टिंकू पानी में भीगी कमीज़ सुखाने के लिए चबूतरी पर बिछा रहा था। चाचा आँगन में बैठे थे, हत्था अब भी उनके हाथ के पास रखा था, और वो उसे बार-बार छू रहे थे, जैसे यक़ीन न आ रहा हो।
यह सब अच्छा था।
और ठीक इसी वक़्त किसी ने अस्पताल के नीचे से एक लोहे का बक्सा उठाकर कहीं भेज दिया था।
“इमरान,” मैंने कहा। “ये बात अभी किसी को नहीं।”
“अब्बा को भी नहीं?”
“अभी नहीं,” मैंने कहा। “आज उनका दिन है। उन्होंने आज पहली बार अपने बेटे का हाथ पकड़ा है। मैं उनके हाथ में आज एक और डर नहीं रखूँगा।”
इमरान ने सिर हिलाया।
“पर कल सुबह सात बजे मशीन आनी थी,” उसने कहा। “वो?”
“वो रुक गई,” मैंने कहा। “पानी के काग़ज़ ने रोक दी।”
“और काग़ज़ का क्या होगा?”
मैंने जेब में घंटी को दबाया। वो गरम थी, पर अब जल नहीं रही थी। वो ऐसे ठंडी हो रही थी जैसे किसी ने लंबी साँस ली हो।
“काग़ज़ का वो होगा,” मैंने कहा, “जो उस पर अंगूठा लगाने वाले का होगा। और मैं अभी तक यही ढूँढ रहा हूँ कि अंगूठा लगाने वाला कौन है।”
इमरान ने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
“एक बात और,” उसने कहा। “जब वो बक्सा टेम्पो में रखा गया, तब उनमें से एक ने एक लाइन कही जो मुझे समझ नहीं आई।”
“क्या?”
“उसने कहा — अब घंटी किसके पास रहेगी?”
मेरी साँस रुक गई।
“तूने ठीक सुना?”
“हाँ,” इमरान ने कहा। “और फिर सब हँसे। उस हँसी में मज़ाक नहीं था। उस हँसी में वो चीज़ थी जो आदमी के पास होती है जब उसे लगता है कि उसने कोई बड़ा काम कर लिया है।”
मैंने जेब से घंटी निकाली और हथेली पर रखी।
दिन की आख़िरी रोशनी में वो पीली दिख रही थी, जैसे पुराना सोना। उस पर खुदा फूल अब भी साफ़ था। कल वो मंच पर गई थी, मेरी जेब से गायब हुई थी, किसी और के हाथ में बजी थी, और आज वो मेरी हथेली पर थी — चुप, गरम, थोड़ी थकी।
मैंने उसे धीरे से हिलाया।
बजी नहीं।
पर बोली।
इस बार बहुत धीमे, बहुत छोटा वाक्य।
“अब बक्सा नहीं, बक्से वाला ढूँढ।”
मैंने नीम के नीचे से गली की तरफ़ देखा। शाम की रोशनी में सब कुछ नरम दिख रहा था। चबूतरी, पीपल, गुमटी, उस्ताद की दुकान का टेढ़ा बोर्ड, और दूर अस्पताल की पीली दीवार, जिस पर कल रात से सीढ़ी बंद थी।
मुझे लगा कि कल सुबह सात बजे की मशीन तो रुक गई, पर उसके पीछे जो आदमी खड़ा है, वो नहीं रुका। वो बक्सा उठाकर कहीं और पहुँचा चुका है। और वो जानता है कि घंटी मेरे पास है। और वो यह भी जानता है कि मैं उस बक्से को ढूँढूँगा।
“इमरान,” मैंने कहा। “तू कल सुबह साइट पर जाना?”
“नहीं जाना,” उसने कहा। “अब्बा ने नाश्ते पर बैठने को कहा है। तीन दिन की छुट्टी ले ली है।”
मेरे मुँह से हँसी निकली।
“अच्छा किया।”
“क्यों?”
“क्योंकि कल मुझे एक आदमी चाहिए जो साइट का रास्ता जानता हो,” मैंने कहा, “और जिसे पीली फाइल की शक्ल याद हो।”
इमरान ने एक पल मेरी तरफ़ देखा। फिर वो मुस्कुराया — इस बार पूरे चेहरे से।
“अब्बा से पूछ लूँगा,” उसने कहा।
“अब पूछने की ज़रूरत है?”
“अब है,” उसने कहा। “अब है, क्योंकि अब वो सुनते हैं।”
वो अंदर चला गया।
मैं नीम के नीचे अकेला खड़ा रहा। ऊपर आसमान में पहला तारा निकल रहा था, और गुमटी की लालटेन जल चुकी थी। दूर कहीं किसी ने रेडियो पर पुराना गाना लगाया, और गली में हवा चली, और पानी की वो धार जो दोपहर में फूटी थी, अब भी हत्थे में बंद थी, पर उसकी गंध हवा में बची हुई थी।
मैंने घंटी जेब में रखी।
“सुन,” मैंने धीरे से कहा। “आज तूने अंक नहीं बताए।”
“आज अंक की बात नहीं थी।”
“तो कल की बात बता।”
घंटी एक पल चुप रही।
फिर बोली, बहुत सपाट आवाज़ में, बिना किसी नरमी के, जैसे दिन का हिसाब बंद हो गया हो और रात का खाता खुल गया हो।
“कल सुबह तक वो बक्सा शहर में नहीं रहेगा।”
और मैं वहीं खड़ा रह गया, नीम के नीचे, अंधेरे में, एक हाथ जेब पर और दूसरा नीम के तने पर, और मेरे सामने पूरी साइकिल गली चल रही थी — पानी की धार, चाय के गिलास, बाप-बेटे का जुड़ा हाथ, और उसी गली के नीचे से कहीं गायब होता हुआ एक लोहे का बक्सा, जिस पर मेरे दादा का नाम लिखा था।
मुझे उस वक़्त यह नहीं पता था कि उस बक्से में सिर्फ़ काग़ज़ नहीं है।
और यह भी नहीं पता था कि उसे उठाने वालों में एक हाथ वो भी था, जिसने आज सुबह मेरे ही सामने मुँह फेरकर कहा था — आज मशीन नहीं चलेगी।
मशीन नहीं चली थी।
पर मशीन का मालिक तो कहीं और चल रहा था।
॥
इमरान अंदर गया और मैं नीम के नीचे खड़ा रह गया। शाम अब पूरी उतर चुकी थी। गुमटी की लालटेन जल गई थी और उसकी पीली रोशनी गली के पत्थरों पर तेल जैसे फैल रही थी। दूर किसी के रेडियो पर पुराना गाना चल रहा था, बहुत धीमा, जैसे कोई बूढ़ा अपने आप से बात कर रहा हो।
हबीब चाचा के आँगन से आवाज़ आई। लोहे का पतीला रखने की आवाज़, फिर पानी डालने की आवाज़, फिर चाचा की आवाज़ — “दो गिलास, और चीनी कम।”
मैं मुस्कुराया। आदमी जब बेटे से पहली बार ठीक से बोलता है, तो उसे चीनी भी याद रहती है और कम भी रखनी होती है। जैसे डर हो कि ज़्यादा मीठा कर दिया तो कहीं सब सपना न निकले।
इमरान बाहर आया। दोनों हाथों में स्टील के गिलास, और उसके चेहरे पर वो थकान थी जो झगड़े के बाद आती है — बुरी नहीं, अच्छी थकान, जिसमें आदमी को नींद आ जाती है।
“ले,” उसने कहा। “अब्बा ने कहा है, चीनी कम।”
“अब्बा की अक्ल आज पूरी जाग रही है,” मैंने कहा।
इमरान हँसा। फिर वो आँगन के बाहर पड़ी पुरानी चौकी पर बैठ गया और मैं उसके सामने ज़मीन पर, नीम की जड़ के पास, जहाँ मिट्टी ठंडी थी।
चाय गरम थी। इतनी गरम कि गिलास हाथ में रखना पड़े। मैंने एक घूँट लिया और मुँह जला।
“सुन,” मैंने कहा। “अब तेरी बारी। जो तूने गुमटी पर कहा, वो आधा कहा। पूरा कह।”
इमरान ने गिलास दोनों हाथों में पकड़ा और कुछ देर उसमें देखता रहा।
“रात ग्यारह बजे की बात है,” उसने शुरू किया। “मैं साइट से लौट रहा था। पैदल। मेरी साइकिल की चेन उतर गई थी, तो मैंने उसे साइट पर ही छोड़ दिया था, सोचा सुबह ठीक कर लूँगा।”
“चल, आगे।”
“पुराने बिजलीघर की गली में बत्ती नहीं जलती, तू जानता है। वहाँ अंधेरा ऐसा है कि अपना हाथ भी न दिखे। मैं उस गली से नहीं गुज़रता, रोज़ नहीं गुज़रता। पर उस रात मैं गुज़रा, क्योंकि पीछे वाली गली में एक कुत्ता भौंक रहा था और मैं सोचा कि बचकर निकल जाऊँ।”
उसने एक घूँट लिया।
“तो मैं मुड़ा, और बिजलीघर के उस बड़े फाटक के पास एक टेम्पो खड़ा था। बत्ती बंद। पर टेम्पो की पिछली बत्ती जल रही थी, लाल। उस लाल रोशनी में मुझे चार आदमी दिखे।”
“चार?”
“चार। और उनके बीच में एक बक्सा। लोहे का, मोटा, ऐसा कि चार आदमी भी उसे उठाते वक़्त झुक रहे थे।”
मेरा हाथ अपने आप जेब पर गया। घंटी वहाँ थी। ठंडी नहीं, गरम भी नहीं। जैसे कोई चीज़ अपनी साँस रोके बैठी हो।
“इमरान,” मैंने धीरे से कहा। “तूने बक्सा पहचाना?”
“पहले नहीं पहचाना,” उसने कहा। “पर जब वो उसे उठाकर टेम्पो की तरफ़ ले जा रहे थे, तब उसका एक कोना ज़मीन पर रगड़ा। और मैंने आवाज़ सुनी।”
“कैसी आवाज़?”
“ऐसी आवाज़,” उसने कहा, “जैसे लोहा ज़मीन से बोल रहा हो। बहुत धीमी, बहुत लंबी। और उस रगड़ से ज़मीन पर एक सफ़ेद लकीर बन गई। पत्थर की धूल उड़ी और सड़क पर बैठ गई।”
मैंने गिलास नीचे रख दिया।
“बिजलीघर से अस्पताल तक की लकीर?”
“हाँ,” उसने कहा। “मैं उनके पीछे-पीछे चला। दूर से, दीवार के साथ। वो गली से निकले, पीछे के रास्ते से गए, उस सूखी नाली वाली तरफ़ से, जहाँ टूटी बाउंड्री है। और फिर अस्पताल के पीछे वाले लोहे के फाटक पर रुके।”
“वही फाटक,” मैंने कहा। “जिसे मैंने छुआ था। जिसके नीचे आठवाँ पन्ना है।”
“वही,” इमरान ने कहा। “और वहाँ उन्होंने बक्सा उतारा नहीं। वो सीधे अंदर ले गए। अस्पताल के नीचे वाले हिस्से में। उस कमरे में जो माँ के कमरे के पीछे है। छोटा, जिसकी खिड़की अंदर से पटियों से बंद है।”
मैं चुप हो गया।
मुझे वो कमरा याद था। कल ही मैं वहाँ खड़ा था, माँ की जाँच के बाद, और मैंने उस दरवाज़े को देखा था और सोचा था कि कोई नहीं खोलता। अस्पताल का कोई आदमी, कोई चौकीदार, कोई कंपाउंडर — कोई भी नहीं। बस इतना कहते हैं, “पुराना सामान रखा है।”
“और उनके बीच एक आदमी था,” इमरान ने कहा। “दुबला नहीं। मोटा भी नहीं। पर जब वो चलता था तो बाकी तीन उसके पीछे चलते थे।”
“कैसे पहचाना?”
“क्योंकि बक्सा उसके पास से गुज़रा और उसने हाथ नहीं लगाया,” इमरान ने कहा। “बाकी तीन पसीना बहा रहे थे और वो सिर्फ़ खड़ा था। और उसके सीने से एक पीली फाइल चिपकी थी। मोटी। ऐसी मोटी कि उसकी कमीज़ उसके नीचे से उभर रही थी। वो फाइल उसने दोनों हाथों से ऐसे पकड़ी हुई थी जैसे कोई बच्चा पकड़ता है।”
मैंने आँखें बंद कीं।
“फिर?” मैंने पूछा।
“फिर मैं रुक गया,” इमरान ने कहा। “क्योंकि आगे जाना मतलब खुद को दिखा देना। मैं नीम के उस पुराने पेड़ के पीछे खड़ा हो गया जो फाटक से दस कदम पर है। और वहाँ से मैंने सुना।”
“क्या सुना?”
इमरान ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैं जानता था — सुनने के बाद का डर। जब आदमी कुछ ऐसा सुन लेता है जो उसके काम से जुड़ा है, उसकी नौकरी से, उसकी रोटी से, और अब उसके बाप से भी।
“एक ने कहा — जल्दी करो, बारह बजे बाद सीढ़ी बंद हो जाएगी, अंदर जाना मुश्किल। दूसरे ने कहा — सीढ़ी क्या, ये कमरा ही ऐसा है कि साहब के सिवा कोई नहीं खोलता। तीसरे ने हँसकर कहा — अब घंटी किसके पास रहेगी?”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“और चौथा?”
“चौथा चुप था,” इमरान ने कहा। “और जब आदमी चुप हो और बाकी हँस रहे हों, तो समझ लो चुप वाला ही मालिक है।”
नीम के पत्ते हवा में हिले। मुझे ठंड लगी — असली ठंड नहीं, वो ठंड जो अंदर से आती है, रीढ़ से सिर तक, ठीक वैसी जैसी एक बार घंटी ने मुझे दी थी जब वो टूटी थी।
“इमरान,” मैंने कहा। “मज़दूर आपस में क्या बात करते हैं? साइट पर। सुबह, चाय के वक़्त।”
वो कुछ देर चुप रहा। फिर उसने गिलास ज़मीन पर रखा और अपने घुटनों पर हाथ रखकर आगे झुक गया, जैसे कोई राज़ दे रहा हो और दीवारों से डर रहा हो।
“साइट पर चार तरह के लोग हैं,” उसने कहा। “एक जो सीमेंट ढोते हैं, एक जो पत्थर काटते हैं, एक जो हिसाब रखते हैं, और एक जो सिर्फ़ घूमते हैं और कुछ नहीं करते। घूमने वाले किसी से नहीं बोलते। पर जो सीमेंट ढोते हैं, वो बोलते हैं।”
“तो वो क्या बोलते हैं?”
“वो बोलते हैं,” इमरान ने धीरे से कहा, “कि अस्पताल के नीचे एक काला कमरा है। बहुत नीचे नहीं, बस एक सीढ़ी नीचे। जिसे साहब के सिवा कोई नहीं खोलता। न हमारे सुपरवाइज़र को पता है उसकी चाबी कहाँ है, न मुनीम को। और जो उसे खोलने की बात करता है, उसका नाम अगले हफ़्ते हाज़िरी से गायब हो जाता है।”
“हाज़िरी से गायब होना मतलब?”
“मतलब नौकरी से निकाल दिया जाना,” उसने कहा। “पर वो ऐसे कहते हैं — हाज़िरी से गायब। जैसे आदमी खुद ही न आए। जैसे उसका नाम रजिस्टर से उड़ गया।”
मैंने एक लंबी साँस ली।
“और कुछ?”
“एक बात और है,” उसने कहा। “पर ये मैंने खुद नहीं देखी। ये बात चाय की टपरी पर होती है, और जब मैं पास जाता हूँ तो बात बदल जाती है।”
“कह।”
“कहते हैं कि उस काले कमरे में सिर्फ़ काग़ज़ नहीं है,” इमरान ने कहा। “कहते हैं कि वहाँ कुछ ऐसा है जो साहब रात में अकेले देखने जाता है। और कहते हैं कि जिस रात वो जाता है, अगली सुबह साइट पर ऐसा लगता है जैसे कुछ और हो गया हो। कोई झगड़ा, कोई गुस्सा, कोई पुरानी बात उखड़ जाती है।”
मेरा हाथ जेब पर था और घंटी अब थोड़ी गरम हो रही थी, धीरे-धीरे, जैसे कोई जग रहा हो।
“इमरान,” मैंने कहा। “ये बातें तेरे काम से जुड़ी हैं। तू मुझे क्यों बता रहा है?”
वो हँसा। छोटी हँसी।
“क्योंकि सुबह मेरे अब्बा ने मेरा हाथ पकड़ा,” उसने कहा। “और मुझे लगा कि अब मेरे पास कोई चीज़ है जो मैं खो सकता हूँ। जिस आदमी के पास कुछ न हो, उसे डरने की ज़रूरत नहीं होती। आज सुबह से मुझे डर लग रहा है, अंकुश भाई। और डर सिर्फ़ उसी को लगता है जिसके पास कुछ हो।”
मैं चुप बैठा रहा।
यही बात है न। यही वो बात है जो कोई किताब नहीं सिखाती। बक्सा, काग़ज़, मुहर, गवाह — ये सब बाद में आता है। पहले आता है एक हाथ जो दूसरे हाथ को पकड़ता है, और उसके बाद आदमी अचानक कमज़ोर हो जाता है, क्योंकि अब उसके पास खोने की चीज़ है।
“तेरे पास सबूत है?” मैंने पूछा। “कुछ भी। जो मैं मीरा को दिखा सकूँ, जो दुबे अंकल के सामने रख सकूँ?”
इमरान ने मेरी तरफ़ देखा। फिर वो उठा, आँगन की तरफ़ गया, और दरवाज़े की चौखट पर रखा अपना पुराना हेलमेट उठा लाया।
पीला हेलमेट। ऊपर से फटा, टेप से बँधा, अंदर से मैला।
उसने उसे मेरी तरफ़ उलटा किया।
“अंदर देख।”
मैंने अंदर देखा। हेलमेट के अंदर, कपड़े की परत के नीचे, काग़ज़ दबा हुआ था।
“ये क्या है?”
“साइट का नक़्शा,” उसने कहा। “पूरा नहीं। जो हिस्सा हम मज़दूरों को दिखाया जाता है, वो नहीं। ये वो हिस्सा है जो मैंने उस दिन देखा जब सुपरवाइज़र का बैग खुला पड़ा था। मैंने जल्दी में पेंसिल से कॉपी किया, फिर उतारकर हेलमेट में दबा दिया।”
“तूने इसे बाहर क्यों नहीं निकाला?”
“क्योंकि साइट पर हेलमेट चेक होता है,” उसने कहा। “और हेलमेट के अंदर काग़ज़ कोई नहीं देखता। लोग सिर्फ़ हेलमेट पहनते हैं, अंदर नहीं देखते।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“तो ये बाहर है,” मैंने कहा। “फिर तू जाना क्यों चाहता है?”
“क्योंकि जो मैंने उतारा है वो आधा है,” उसने कहा। “उसमें अस्पताल के नीचे वाला हिस्सा नहीं है। जो पूरा नक़्शा सुपरवाइज़र के दफ़्तर की दीवार पर टँगा है, उस पर वो कमरा भी बना हुआ है। मुझे वो लाइन चाहिए — वो एक लाइन जो नीचे वाले कमरे को ज़मीन से जोड़ती है।”
वो रुका। उसने हेलमेट मेरे हाथ से लिया और उसे अपने घुटने पर रखा।
“और अभी साइट पर तीन दिन की छुट्टी का मतलब ये भी है कि अंदर आदमी कम है,” उसने कहा। “मैं अभी जाऊँगा, दो घंटे में लौटूँगा।”
पीछे से आवाज़ आई।
“नहीं जाएगा।”
हबीब चाचा आँगन के दरवाज़े पर खड़े थे। उनके हाथ में एक कटोरी थी और कटोरी में पानी। उनका हाथ काँप रहा था, इसलिए पानी कटोरी के किनारे से बहकर उनकी उँगलियों पर गिर रहा था और वो गिरता ही रहा, और चाचा उसे महसूस ही नहीं कर रहे थे।
“अब्बा—”
“नहीं जाएगा,” चाचा ने कहा। इस बार आवाज़ तेज़ थी। “आज सुबह ही तो मैंने तेरा हाथ पकड़ा है। आज सुबह ही तो तेरे मुँह से अपनी बात सुनी है। मैंने सोचा था कि आज से हम ठीक हो गए। और तू आज ही शाम को उसी साँप की माँद में जाने की बात करता है?”
इमरान उठ खड़ा हुआ।
“अब्बा, मैं कुछ नहीं करने जा रहा। मैं सिर्फ़ एक काग़ज़ लेने जा रहा हूँ।”
“वही काग़ज़ तेरे बाप के सीने से चिपका था न, जब तू घर आया था? वही काग़ज़ जो तुझे छह महीने साइट पर रगड़ता रहा? और तू उसे उठाने जा रहा है, इमरान?”
चाचा की आवाज़ टूट गई।
“मैंने आज तक तुझसे कुछ नहीं माँगा,” चाचा ने कहा। “तेरी माँ जब चली गई तब भी नहीं माँगा। जब तू शहर छोड़कर गया, तब भी नहीं माँगा। अब माँग रहा हूँ। एक बात माँग रहा हूँ। मत जा।”
इमरान ने अपना सिर झुका लिया।
मैं वहाँ बैठा था, और मुझे इस काम में कुछ नहीं बोलना चाहिए था। यह बाप-बेटे की बात थी, और मैं उसमें नहीं घुसता। पर मैं सोच रहा था — अगर ये नक़्शा नहीं आया, तो काग़ज़ों के इस पूरे ढेर में कोई एक भी चीज़ ऐसी नहीं है जो बबलू की बात से आगे जाए। सब कुछ आधा है। सब कुछ।
और मैं उठकर खड़ा हो गया।
“चाचा,” मैंने कहा।
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
“मैं कह नहीं रहा कि उसे भेजिए,” मैंने कहा। “मैं सिर्फ़ इतना कह रहा हूँ कि आज आपके बेटे ने जो किया, वो कोई छोटी बात नहीं है। आज शाम बबलू पूरी गली के सामने पानी का काग़ज़ लेकर खड़ा था, और आपके बेटे ने अपने बाप के नाम की गवाही देने से साफ़ मना कर दिया। उसने चुपचाप मुँह नहीं फेरा, चाचा। उसने आपका नाम नहीं बेचा।”
चाचा की कटोरी हाथ में ही रही।
“वो इमरान वही है जो आज सुबह पंप का हत्था लौटाकर खड़ा था,” मैंने कहा। “और मैं उसे अकेले नहीं भेजूँगा।”
इमरान ने मेरी तरफ़ देखा।
“कैसे?” उसने पूछा।
“मैं साथ नहीं जाऊँगा,” मैंने कहा। “क्योंकि मेरा चेहरा साइट पर जाना-पहचाना है, और कल से ज़्यादा आज है। पर मैं गेट के बाहर खड़ा रहूँगा। उस नीम के नीचे, जहाँ तूने रात को खुद को छिपाया था। और अगर तू दो घंटे में नहीं आया, तो मैं अंदर आ जाऊँगा।”
इमरान कुछ सोचने लगा।
“और अगर तू आया,” मैंने कहा, “और सब ठीक रहा, तो चाचा के सामने मैं हाथ जोड़कर कहूँगा कि तुम्हारा बेटा आज भी वही है — जो आज सुबह था।”
चाचा ने मेरी तरफ़ देखा। बहुत देर देखा। फिर उन्होंने कटोरी दरवाज़े की चौखट पर रख दी और अंदर गए।
वो एक मिनट से ज़्यादा अंदर रहे।
जब बाहर आए, तो उनके हाथ में एक पुराना रूमाल था। धुला हुआ, हल्का पीला, किनारों से एक जगह फटा हुआ, और उसमें गाँठ बँधी थी।
“ये ले,” चाचा ने कहा और इमरान की तरफ़ बढ़ा दिया। “तेरी माँ का था। मैंने तेरे लिए संभालकर रखा था और कभी दिया नहीं, क्योंकि मुझे लगता था कि तू लौटेगा ही नहीं।”
इमरान ने उसे दोनों हाथों से लिया।
“अब सुन,” चाचा ने कहा। उनकी आवाज़ अब नरम थी, बहुत नरम, और उसमें वो चीज़ थी जो बाप की आवाज़ में तभी आती है जब वो अपने बेटे को किसी और के सामने भेज रहा हो। “गाँठ खोलना मत। गाँठ में दुआ है। और जब लौटे तो घर आना। साइट पर नहीं। घर। सीधा घर।”
इमरान ने रूमाल अपनी जेब में रखा। उसने अब्बा के पैर छुए। चाचा ने उसका सिर पकड़कर थोड़ी देर सहलाया और फिर पलटकर आँगन में चले गए, और उनकी चप्पल की आवाज़ सुनकर मुझे कुछ अजीब लगा — जैसे कोई बूढ़ा आदमी बहुत बोझ उठाकर चल रहा हो जो दिखता नहीं।
तभी गुमटी वाली तरफ़ से चप्पलों की आवाज़ आई, तेज़ और जल्दी वाली।
मीरा आ रही थी। कंधे पर कैमरा, हाथ में बैग, और मुँह पर वो थकान जो पूरे दिन की होती है।
“क्या हुआ?” उसने दूर से ही पूछा। “रज़िया आपा ने कहा कि तू अभी भी यहीं है।”
“मीरा,” मैंने कहा। “बैठ।”
“मैं नहीं बैठूँगी। बता।”
“इमरान को साइट का नक़्शा मिला है,” मैंने कहा। “आधा। और वो पूरा लेने जा रहा है।”
मीरा ने अपना बैग नीचे रखा और सीधे इमरान की तरफ़ देखा।
“कैसा नक़्शा?”
“साइट की दीवार पर टँगा नक़्शा,” इमरान ने कहा। “जिस पर अस्पताल के नीचे वाला हिस्सा भी बना है। जिस पर काले कमरे की लाइन है।”
मीरा ने एक गहरी साँस ली और मुझे देखा।
“अंकुश,” उसने कहा। “तू समझ रहा है इसका मतलब?”
“समझा रहा हूँ,” मैंने कहा। “पर तू बता।”
मीरा ने बैग से एक पुराना काग़ज़ निकाला — वो ही जिस पर गली का नक़्शा था, जो बबलू ने दिखाया था। उसने उसे खोलकर ज़मीन पर नहीं, अपने घुटने पर रखा।
“देख,” उसने कहा। “यहाँ गली है। यहाँ अस्पताल। और यहाँ, नीचे की तरफ़, एक छोटा सा चौकोर है जिसमें कुछ लिखा ही नहीं। पता है क्यों नहीं लिखा? क्योंकि जो नक़्शा बाहर दिखाया जाता है, उसमें वो हिस्सा होता ही नहीं।”
“तो इमरान का नक़्शा क्या करेगा?”
“अगर उसमें वो चौकोर है,” मीरा ने कहा, “तो इसका मतलब है कि साइट का जो नक़्शा अंदर दीवार पर टँगा है, वो बाहर दिखाए नक़्शे से अलग है। और अगर एक ही ज़मीन के दो नक़्शे अलग हैं, तो उनमें से एक झूठा है। और जिसके पास दोनों हों, उसके हाथ में पहली बार ऐसी चीज़ आ जाती है जिसे वकील मोड़ नहीं सकता।”
उसने मेरी तरफ़ देखा।
“अंकुश, ये रणवीर के काग़ज़ों में पहली बड़ी दरार होगी। पहली। आज तक जो भी काग़ज़ आया, वो सब आधा था। कटा हुआ। फटा हुआ। कोई गवाह नहीं, कोई मुहर आधी, कोई पन्ना गायब। ये पहली चीज़ होगी जो पूरी है।”
“पर पूरी होगी तभी,” मैंने कहा, “जब वो आएगी।”
और तभी मेरी जेब से आवाज़ आई।
न बजी, न हिली। सिर्फ़ आवाज़। धीमी, छोटी, जैसे कोई दूर से अपना हाथ बढ़ाकर मेरे कान तक बात पहुँचा रहा हो।
“नक़्शा लाओ,” घंटी ने कहा। “पर अकेले मत जाओ।”
इमरान ने चारों तरफ़ देखा।
“ये क्या था?”
“कुछ नहीं,” मैंने कहा। “घंटी।”
“घंटी बोलती है?”
“अब नहीं बताऊँगा,” मैंने कहा। “तेरे पास वक़्त कम है। सुन — घंटी कह रही है, अकेले मत जा। मैं साथ चलता हूँ। नीम के नीचे खड़ा रहूँगा। तू अंदर जा, नक़्शा ला, और बाहर आ।”
इमरान हँसा। पूरी हँसी, जैसे उसने कुछ बहुत मज़ेदार सुन लिया हो।
“भाई,” उसने कहा, “साइट पर अकेले जाना ही मेरी नौकरी है। वहाँ नियम सीधा है — गेट पर हेलमेट, गेट पर नाम, गेट पर हाज़िरी। अगर मैं भीड़ लेकर गया, तो पहले वही निकलेगी। मेरा नाम, मेरी हाज़िरी, मेरा हेलमेट। सुपरवाइज़र पहले मुझे देखेगा। और फिर जो भी होगा, सबसे पहले मेरे हिस्से आएगा।”
वो उठा और हेलमेट सिर पर रखा।
“तू नीम के नीचे रुक,” उसने कहा। “और ये मत सोचना कि मैं कोई कहानी का हीरो हूँ। मैं सिर्फ़ वो आदमी हूँ जिसे आज सुबह उसका बाप पहली बार सुनने लगा है। मुझे वापस लौटना है। इसीलिए मैं सोच-समझकर जाऊँगा।”
फिर वो मेरी तरफ़ झुका और बहुत धीरे बोला, ताकि मीरा भी न सुने।
“और अगर मैं दो घंटे में न आऊँ,” उसने कहा, “तो अब्बा को ये रूमाल दे देना। कहना कि गाँठ मैंने नहीं खोली।”
मैंने उसका कंधा पकड़ा।
“तू आएगा,” मैंने कहा। “दो घंटे में।”
वो हँसा और चल दिया।
गली के मुँह पर एक ट्रक खड़ा था, जो नए बाज़ार की तरफ़ जाता था। उस पर मज़दूर बैठे थे, कुछ सीमेंट की बोरियों के बीच। इमरान ने ट्रक के पीछे हाथ लगाया और एक झटके में चढ़ गया। उसने पीछे मुड़कर मुझे देखा, और मैंने हाथ उठाया।
ट्रक चला। धूल उठी। गली की बत्तियाँ उस धूल में पीली पड़ गईं।
मीरा मेरे पास आकर खड़ी हो गई।
“तुझे भी लग रहा है न,” उसने कहा।
“क्या?”
“कि आज कुछ होगा।”
मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने सिर्फ़ ट्रक को देखा। वो गली के मोड़ पर मुड़ा और अंधेरे में घुल गया।
और तभी मेरी नज़र दूसरी तरफ़ गई।
गुमटी के पीछे, जहाँ बत्ती नहीं पहुँचती, वहाँ एक आदमी खड़ा था।
मैंने उसे पहले नहीं देखा था। वो वहाँ पहले से था, या अभी आया, पता नहीं। पर उसकी शक्ल मुझे सालों से पता थी।
बबलू पांडे।
पर ये वो बबलू नहीं था जो मैं जानता था। उसके गले में सोने की मोटी चेन नहीं थी। हाथ में पानदान नहीं था। उसके मुँह में पान नहीं था और वो चबा नहीं रहा था। उसका दाहिना हाथ सफ़ेद रूमाल में बँधा था — वही रूमाल जिस पर सूखे गुलाबी दाग थे। वो एक हाथ से दूसरे हाथ को सहला रहा था, जैसे ठंड लग रही हो।
और वो देख रहा था। ट्रक को नहीं। मुझे नहीं। उस रास्ते को देख रहा था जिस पर ट्रक गया था।
फिर उसने अपनी जेब से फोन निकाला।
उसने फोन कान पर रखा और अपना चेहरा दीवार की तरफ़ कर लिया।
हवा मेरी तरफ़ थी, वरना उसकी आवाज़ मेरे कान तक न आती। पर हवा मेरी तरफ़ थी। और साइकिल गली की हवा बड़ी अजीब होती है — वो गुमटी की चाय की भाप, नाली की बदबू, पीपल के पत्ते, और दूर से आती किसी की आवाज़, सब एक साथ लाती है।
उसने बहुत धीरे कहा, इतना धीरे कि जैसे कोई अपने आप से बात कर रहा हो।
“साहब,” उसने कहा। “वो नक़्शा लेने गया है।”
और मैं वहीं खड़ा रह गया, एक हाथ नीम के तने पर और दूसरा जेब पर, और घंटी अचानक बर्फ जैसी ठंडी हो गई, इतनी ठंडी कि मुझे लगा जैसे जेब में कोई मुर्दा चीज़ रखी हो।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसने मेरा चेहरा देखा और उसने कुछ पूछा, पर मुझे उसकी आवाज़ नहीं सुनाई दी।
मुझे सिर्फ़ एक बात सुनाई दी।
“साहब, वो नक़्शा लेने गया है।”
और उसके बाद घंटी ने, बहुत छोटी आवाज़ में, बिना बजे, बिना हिले, बस इतना कहा —
“अब तेरा नाम लिया जा रहा है।”
॥
"साहब, वो नक़्शा लेने गया है।"
मैं वहीं खड़ा रह गया। नीम के तने पर हाथ, और जेब में घंटी — बर्फ जैसी ठंडी।
मीरा ने मेरा कंधा हिलाया। "अंकुश। अंकुश, क्या हुआ? तू क्यों ऐसे देख रहा है?"
मैंने गुमटी के पीछे की तरफ़ उँगली उठाई।
बबलू ने फोन कान से हटाया और जेब में रखा। फिर वो मुड़ा। उसकी नज़र मुझ पर पड़ी और वो एक पल के लिए जम गया।
मैंने उसकी तरफ़ कदम बढ़ाया। वो पीछे हटा। दो कदम। उसका बँधा हुआ हाथ छाती के पास आ गया, जैसे कोई ढाल पकड़ ली हो।
"बबलू भाई," मैंने कहा। "किसको खबर दी?"
"किसी को नहीं।"
"मैंने सुना।"
"तो सुन लिया। अब क्या?" उसकी आवाज़ में वो पुरानी धमक नहीं थी। वो सिर्फ़ थकी हुई थी, जैसे कोई बहुत देर से एक ही रास्ते पर चल रहा हो और अब उसे समझ आ गया हो कि रास्ता गोल है।
"तू मेरी दुकान पर आया था," मैंने कहा। "चूड़ियों की गुमटी उलटी थी। मेरा गला पकड़ा था। याद है?"
"याद है।"
"तब तेरी चेन सोने की थी, और तेरे मुँह में पान था। आज कहाँ है?"
उसने अपनी जेब की तरफ़ देखा। खाली जेब। फिर उसने वो सफ़ेद रूमाल सहलाया जो उसके हाथ पर बँधा था।
"चीज़ें रखनी पड़ती हैं," उसने कहा। "जब साहब कहे कि रख। और जब साहब कहे कि उतार, तो उतारनी पड़ती हैं।"
"साहब ने उतरवाईं?"
वो हँसा। बहुत छोटी हँसी। ऐसी हँसी जो मुँह से नहीं, गले से निकलती है, और बाहर आते-आते मर जाती है।
"साहब ने कुछ नहीं कहा," वो बोला। "साहब ने सिर्फ़ इतना कहा कि बबलू, तेरा काम अब खत्म नहीं होगा। तेरा काम अब शुरू होगा। समझा?"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"तू समझेगा नहीं," उसने कहा। "तू साइकिल ठीक करता है। तू पुर्ज़े जोड़ता है। मैं आदमी जोड़ता हूँ — साहब के लिए। पर आज मैंने एक आदमी नहीं जोड़ा। आज मैंने एक आदमी बेचा।"
उसकी आवाज़ लड़खड़ाई और उसने मुँह फेर लिया।
"बबलू भाई।"
"मुझसे कुछ मत पूछ," उसने कहा। "मैं खबर पहुँचाने वाला हूँ। खबर पहुँचाने वाले को कोई नहीं मारता। यही मेरा काम है।"
और वो चल दिया। गुमटी के पीछे से, नाली के किनारे-किनारे, वो पतली गली में घुस गया जो सीधे थाने के पीछे जाती है।
मैंने उसे जाने दिया।
जेब में घंटी फिर हिली। बिना बजे। आवाज़ बहुत पतली थी, जैसे किसी ने दूर से, किसी और कमरे से, दीवार के पार से बुलाया हो।
"जो खबर पहुँचाता है," घंटी ने कहा, "वो भी अब डर रहा है। घंटी नहीं बज रही। आदमी बज रहा है।"
मीरा मेरे पास आई। उसने बबलू के जाने की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।
"उसने क्या कहा?"
"कहा कि उसने आज एक आदमी बेचा।"
मीरा की आँखें बड़ी हो गईं। "इमरान?"
"पता नहीं। पर मुझे लगता है इमरान।"
उसने तुरंत अपना फोन निकाला। नंबर मिलाया। उसने कान पर रखा। फिर हटाया। फिर मिलाया।
"बंद है," उसने कहा। "स्विच ऑफ।"
मैंने अपनी जेब से फोन निकाला। मेरे पास इमरान का नंबर नहीं था। मैंने हबीब चाचा का नंबर मिलाया। उनका फोन घर पर था, आँगन की मुंडेर पर, जहाँ उन्होंने बीस साल से कुछ नहीं बदला।
कोई नहीं उठाया — क्योंकि वो घर पर थे ही नहीं।
वो गली के मुँह पर थे।
उस वक़्त शाम के छह बज रहे थे। आसमान में वो रंग आ रहा था जो भोपाल में सिर्फ़ बरसात से पहले आता है — पीला, फिर गुलाबी, फिर जैसे किसी ने आसमान को थका हुआ कपड़ा निचोड़कर लटका दिया हो।
हबीब चाचा गली के मुँह पर खड़े थे। सफ़ेद कुर्ता, टोपी कानों तक, और हाथ में एक कटोरी जिसमें पानी था और जिसे वो दो मिनट में एक बार दूसरे हाथ में ले लेते थे।
टिंकू उनके पास खड़ा था और कुछ कह रहा था। चाचा सुन नहीं रहे थे, सिर्फ़ सड़क देख रहे थे।
मैं गया।
"चाचा।"
"आया नहीं।"
"दो घंटे कहा था। अभी एक घंटा भी नहीं हुआ।"
"मुझे पता है कितना हुआ।" उन्होंने कटोरी मेरी तरफ़ बढ़ा दी। "तू पी ले।"
"चाचा, मुझे भूख नहीं।"
"मैंने भूख के लिए नहीं दिया। मैंने इसलिए दिया कि मेरे हाथ में कुछ रहे। जब हाथ खाली होता है तो आदमी बैठ जाता है। और मैंने आज बैठना नहीं है।"
मैंने कटोरी ले ली और एक घूँट पीया। पानी गरम था। वो कटोरी सुबह से बाहर पड़ी थी।
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में सवाल थे, पर उसने एक भी नहीं पूछा। यही चीज़ उस लड़के में मुझे सबसे ज़्यादा पसंद थी — वो जानता था कि कब पूछना है और कब बस खड़े रहना है।
गली में बच्चे इकट्ठे हो रहे थे।
सानिया अपनी लाल कवर वाली कॉपी लेकर आई, जिसमें वो ट्रकों की तारीख़, वक़्त और शक्ल लिखती है। गुड्डू दौड़ता हुआ आया और बोला कि नए बाज़ार की तरफ़ तीन ट्रक गए, पर उसने इमरान भैया को किसी में नहीं देखा। रफ़ीक़ अपना टूटा चश्मा आँख पर लगाए खड़ा था और हर आदमी को उसी से देख रहा था, जैसे दूर की चीज़ें चश्मे से पास आ जाती हों। चिंटू पीछे खड़ा था और एक चप्पल हाथ में लिए था, क्योंकि उसका कहना था कि जासूसी में सबसे काम की चीज़ चप्पल है — ज़मीन पर पड़ा काग़ज़ उठाना हो तो चप्पल दबाओ, हाथ मत फैलाओ।
मीरा ने उन चारों को चबूतरी के पास बुलाया और बहुत साफ़ कहा —
"आज कोई अकेले नहीं जाएगा। कोई सड़क पार नहीं करेगा। जो कुछ दिखे, यहीं आकर बताओ। और जो न दिखे, वो भी बताओ।"
"मैडम," सानिया ने कहा, "जो नहीं दिखे वो कैसे बताएँ?"
"सानिया, बता देना," मीरा ने कहा। "क्योंकि जो नहीं दिखता, वही सबसे ज़्यादा मायने रखता है।"
सात बजे तक हबीब चाचा पाँच बार गली के मुँह पर आ चुके थे।
आठ बजे मेरा फोन बजा। मैंने देखा — उस्ताद अली बक्श का नंबर।
"हाँ उस्ताद।"
"बेटा, सुन।" उनकी आवाज़ में वो धीमापन था जो रोज़ नहीं होता। "मैंने इस वक़्त सिलाई मशीन पर कुछ देखा। मशीन की सुई चौदहवीं बार… नहीं, छोड़। मशीन का हिसाब नहीं। मैं अपनी दुकान से बाहर झाँका और नए बाज़ार की तरफ़ एक ट्रक खड़ा है। खाली ट्रक। उसमें कोई नहीं है। पर उसके नीचे पीले रंग का एक हेलमेट पड़ा है, जिस पर सीमेंट की धूल है।"
मेरा हाथ ठंडा हो गया।
"उस्ताद — वो हेलमेट इमरान का था।"
वो एक पल चुप रहे। फिर बोले, "मुझे लगा। इसीलिए मैंने मशीन बंद कर दी और दुकान का शटर आधा गिरा दिया। तू आ रहा है?"
"हाँ।"
"तो एक बात सुन ले पहले।" उन्होंने आवाज़ और धीमी की। "इस गली में जब भी कोई चीज़ बिना वजह सड़क पर पड़ी मिले, तो वो चीज़ पड़ी नहीं होती। वो रखी जाती है। और जो चीज़ रखी जाती है, उसके पीछे कोई एक आदमी नहीं होता। कोई एक तार होता है। तू उस हेलमेट को उठाने से पहले उसके आसपास का तार देखना। समझा?"
"समझा।"
"और बेटा —"
"हाँ।"
"आज तू मुझे बूढ़ा मत समझ। आज मुझे भी बुला ले। मेरी उम्र में अगर मैं सिर्फ़ दुकान पर बैठा रहूँ, तो मेरी मशीन भी मुझसे बात करना बंद कर देगी।"
फोन कटा।
नौ बजे, जब गली में हर दुकान का शटर गिर चुका था और सिर्फ़ शबनम आपा की गुमटी की बत्ती जल रही थी, हबीब चाचा मेरे पास आए।
उन्होंने दोनों हाथ जोड़े।
मैं अब तक किसी भी बुज़ुर्ग को अपने सामने हाथ जोड़ते नहीं देखा था। बंसी बाबा, रहमत बाबा, इब्राहीम चाचा, बृजमोहन बाबा — सबने एक-दूसरे से माफ़ी माँगी थी, पर किसी ने भी मेरे सामने हाथ नहीं जोड़े थे।
मैं उछल पड़ा।
"चाचा, ये क्या कर रहे हैं? हटाइए हाथ।"
"सुन ले पहले।" उनकी आवाज़ रुकी हुई थी, जैसे नल का पानी पहली बार खोला गया हो और पाइप में हवा भरी हो। "मैंने अपनी ज़िंदगी में किसी के सामने हाथ नहीं जोड़े। न बाप के सामने, न मौलवी के सामने, न उस आदमी के सामने जिसने मेरा हिसाब बिगाड़ा। हाथ जोड़ना मेरे लिए कमज़ोरी थी। मुझे लगता था आदमी को सीधा खड़ा रहना चाहिए, चाहे कुछ भी हो जाए।"
"चाचा —"
"आज मुझे लग रहा है कि सीधा खड़ा होना और सीधा बोलना, दो अलग चीज़ें हैं। मैं चालीस साल सीधा खड़ा रहा। और जिस दिन मुझे सीधा बोलना था, उस दिन मैं चुप रहा। इमरान सात चिट्ठियाँ लिखकर लाया। सात! और मैं सोचता रहा कि यह लड़का बिगड़ गया है। मैंने वो चिट्ठियाँ कभी नहीं खोलीं, क्योंकि मुझे लगता था जो बाप के पास सीधा नहीं आ सकता, वो किसी काग़ज़ पर क्या लिखेगा।"
उनके हाथ अभी जुड़े हुए थे।
"मेरा बेटा गया है," उन्होंने कहा। "और वो मेरी ऐसी ग़लती के लिए गया है। मैंने उसे कभी नहीं कहा कि तू अच्छा करता है। यही सबसे बड़ी बात है। मैंने उसे कभी नहीं कहा। सालों में कभी नहीं।"
तब मैं समझा कि आदमी का हाथ जोड़ना बहुत बड़ी चीज़ नहीं होती। आदमी का साफ़ बोलना बड़ी चीज़ होती है। और वो अभी कर रहे थे, पहली बार, नौ बजे रात को, गुमटी की पीली बत्ती के नीचे।
मैंने उनके हाथ नीचे किए और उनका एक हाथ अपने हाथ में लिया।
"चाचा," मैंने कहा। "एक बात पहले साफ़ कर दूँ। इमरान उस नक़्शे के लिए गया है जो मैंने भेजा। मैंने भेजा, आपने नहीं भेजा। अगर कुछ होता है तो हिसाब मेरा है।"
"हिसाब तेरा है," उन्होंने कहा। "पर बेटा मेरा है। और मैं उसे लेने जा रहा हूँ।"
"नहीं।" यह शब्द मेरे मुँह से निकला और मुझे खुद उसकी तेज़ी पर ताज्जुब हुआ। "आप नहीं जाएँगे। आप यहीं रहेंगे, गुमटी पर, शबनम आपा के साथ। अगर हम थोड़ी देर में न आएँ, तो आप थाने जाएँगे, दुबे अंकल के पास, और उन्हें जो भी बोलना हो बोलने देंगे। पर आप अभी नहीं जाएँगे, चाचा। क्योंकि अगर आप आए और आपको कुछ हो गया, तो इमरान मुझे कभी माफ़ नहीं करेगा। और मुझे माफ़ करने की आदत नहीं है — मुझे फ़र्क पड़ता है।"
वो मेरी तरफ़ देखते रहे।
फिर उन्होंने सिर हिलाया और मेरी तरफ़ कटोरी बढ़ा दी, जो अब भी उनके हाथ में थी।
"पी ले," उन्होंने कहा। "अबकी बार पानी गरम नहीं है।"
हम निकले। मैं, मीरा और टिंकू।
उस्ताद गुमटी पर रुके — मैंने उन्हें रोका, और मुझे लगा वो नाराज़ हुए, पर फिर उन्होंने कहा, "ठीक है। पर तू मुझे फोन पर साथ रखेगा। एक फोन एक कान होता है, और मेरे पास दो कान हैं।"
पापा दरवाज़े पर खड़े थे। उनके हाथ में वही भूरी फाइल थी, कपड़े में लिपटी। उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस जब मैं गुज़रा, तो उन्होंने अपना हाथ मेरे सिर पर रखा, फिर हटा दिया, और एक छोटी सी बात कही —
"जो चीज़ ज़मीन पर पड़ी मिले, उसे छूने से पहले सोचना। ज़मीन झूठ नहीं बोलती, पर जो चीज़ ज़मीन पर रखता है, वो बोलता है।"
माँ सीढ़ी तक आई थीं, बैसाखी के सहारे, और खाँस रही थीं।
"जा," उन्होंने कहा। "पर लौटकर आ। और अगर न आ सके तो फोन कर। मैं जानती हूँ कि तू जब फोन नहीं करता, तब कुछ बड़ा होता है। इसीलिए आज फोन कर।"
काजल मेरे साथ दरवाज़े तक आई थी। उसने मेरे हाथ में एक छोटी टॉर्च रखी।
"मेरे बैग से है," उसने कहा। "नर्सिंग वाली टॉर्च। रात में घाव देखने के लिए होती है। बत्ती तेज़ है।"
"काजल मैं घाव नहीं —"
"ले ले," उसने कहा। "मुझे लगता है आज किसी को देखना पड़ेगा। और मुझे ये मत कहना कि तू डॉक्टर नहीं है। आज तू एक ही चीज़ के लिए जा रहा है — देखने के लिए।"
हम चले।
साइट का गेट नए बाज़ार के पीछे है, जहाँ पहले खाली मैदान था और अब सीमेंट की बोरियों के पहाड़ हैं। रात में वो जगह और बड़ी लगती है। दिन में तुम देखते हो कि बोरियाँ हैं, रेत है, लोहे की छड़ें हैं। रात में तुम्हें सिर्फ़ यह दिखता है कि एक आदमी इस सबके बीच कितना छोटा है।
गेट पर लोहे का एक छोटा केबिन था, जिसमें पीली बत्ती जल रही थी। उसके अंदर चौकीदार बैठा था — पचास के आसपास, सिर पर मोटा गमछा, हाथ में स्टील का गिलास।
वो हमें देखकर उठा।
"इमरान?" मैंने कहा।
उसने गिलास नीचे रखा। "तुम इमरान के कौन हो?"
"उसके बाप के जानने वाले।"
वो रुका। फिर उसने गेट के बाहर झाँका, जैसे अंधेरे में कोई खड़ा हो और सुन रहा हो।
"वो शाम को छह बजे हेलमेट लेकर निकला," उसने कहा। "मैंने पूछा कहाँ जा रहा है। बोला — बाहर। मैंने कहा छह बजे बाहर? बोला — बस थोड़ी देर का काम है। फिर वो गेट से बाहर निकला और मैंने उसे सड़क तक जाते देखा। उसके बाद मैंने उसे नहीं देखा।"
"किस तरफ़?"
"वो तो पता नहीं। बाहर जाने के बाद तो आदमी किसी का नहीं रहता।"
"कोई और था साथ?"
चौकीदार ने गमछा ठीक किया। "साथ था या नहीं, ये मैं नहीं कहूँगा। पर एक बात कहूँगा। आज शाम को यहाँ दो लोग आए थे, जो साइट के नहीं थे। वो बात कर रहे थे उस आदमी से जो पीली फाइल रखता है। और उसके बाद इमरान ने अपना हेलमेट तीन बार उतारा और तीन बार पहना। मैंने सोचा कि लड़का घबरा रहा है।"
"कहाँ बात कर रहे थे?"
उसने ठुड्डी से इशारा किया, बाएँ तरफ़, जहाँ साइट के पीछे छोटा सा दफ़्तर है — लोहे का कमरा, जिसकी खिड़की पर जाली और अंदर हरी बत्ती जलती है।
वो दफ़्तर हमने देखा। बंद था। अंदर अंधेरा।
मीरा ने अपना कैमरा निकाला। "मैं इसे चालू नहीं करूँगी," उसने कहा। "पर साथ रखूँगी। जब ज़रूरत होगी, तब चालू होगा।"
उस वक़्त मुझे कुछ और चाहिए था। मुझे बबलू चाहिए था।
और बबलू मिल गया।
वो साइट के पीछे, ट्रकों के बीच, एक टायर पर बैठा था। बिना चेन, बिना पानदान, बँधे हाथ के साथ। वो सिगरेट नहीं पी रहा था। वो बस टायर को खुरच रहा था नाखून से।
मैं गया और उसके सामने बैठ गया।
"बबलू भाई।"
"मैंने कह दिया था," उसने बिना देखे कहा। "मैंने कह दिया था कि मुझसे कुछ मत पूछ।"
"आज नहीं पूछूँगा। आज मैं सिर्फ़ बैठा हूँ।"
वो रुका। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो धमकाने वाले आदमी की आँखों में कभी नहीं होती — वो जानता था कि उसने क्या किया और वो उसे अकेले ढोना मुश्किल हो रहा था।
"मैंने साहब को फोन किया था," उसने कहा। "मैंने कहा — वो नक़्शा लेने गया है।"
"क्यों?"
"क्योंकि मैंने रात देखी है।" उसने अपना बँधा हाथ उठाया। "ये रात मैंने देखी है। उस लोहे के बक्से के साथ जो अस्पताल के पीछे है। जिस दिन मैंने उसे खुला देखा, उस दिन मेरी नींद चली गई। तब से मैं रात में दो बजे उठता हूँ और दीवार को देखता रहता हूँ। मेरी बीवी कहती है कि बबलू तू बदल गया है। मैं कहता हूँ नहीं, मैं वही हूँ। बस अब मुझे पता है कि साहब के मुँह में जो मुस्कान है, वो मिठाई की नहीं, नाप की है। वो मुस्कुराकर देखता है कि तू कितना डरा। और जिस दिन तू पूरा डर जाए, उस दिन तेरा काम हो गया।"
"आज क्या हुआ?"
वो कुछ देर चुप रहा। फिर उसने बहुत धीरे कहा —
"आज शाम मैंने इमरान को साहब के दफ़्तर के पीछे किसी से बात करते देखा। पर वो बात कर रहा था, या बात सुन रहा था — ये मैं नहीं कह सकता। उसका हेलमेट वो हाथ में लिए खड़ा था, और उसके सामने जो खड़ा था, उसके पैरों में…"
वो रुका।
"किसके पैरों में?"
"लकड़ी के जूते," बबलू ने कहा। "वो लकड़ी के जूते। जिनकी आवाज़ गुमटी तक आती है।"
और फिर उसने अपना मुँह बंद कर लिया। बंद। बिल्कुल बंद। मैंने उसे तीन बार पूछा और उसने तीन बार अपना सिर झुका लिया, जैसे कोई गर्दन ही न हो, सिर्फ़ एक बोझ हो।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "कुछ और नहीं बोलेगा।"
"बोलेगा," मैंने कहा। "पर आज नहीं। आज उसका डर बड़ा है और हम छोटे हैं।"
हम अस्पताल की तरफ़ बढ़े।
रास्ता पीछे से जाता है — सूखी नाली के किनारे-किनारे, टूटी बाउंड्री के साथ, जहाँ रात में कुत्ते भी नहीं आते। मुझे वो रास्ता पता था, क्योंकि सत्तर अंक देकर मैंने एक बार वो फाटक छुआ था और उसकी परत देखी थी।
अस्पताल की पिछली दीवार आज अलग दिख रही थी। दीवार पर लगी लोहे की चादरें उतार दी गई थीं और ज़मीन पर पड़ी थीं। उनके बीच से प्लास्टर का पीला मुँह बाहर झाँक रहा था।
टिंकू ने टॉर्च जलाई।
और रोशनी पड़ते ही ज़मीन हमसे बोल उठी।
वहाँ, दीवार से दो हाथ दूर, धूल में लकड़ी के जूतों के निशान थे। ताज़े। जितने ताज़े कि किनारे की धूल अभी बैठी भी नहीं थी। वो निशान दीवार के साथ-साथ चलते थे और फिर पीछे वाले फाटक की तरफ़ मुड़ जाते थे।
और उनके बीच, ज़मीन पर, कुछ चमक रहा था।
मैंने झुककर देखा। पीतल का बुरादा। बिल्कुल महीन, जैसे किसी ने पीतल की छड़ को रेती से रगड़ा हो और जो बुरादा गिरा, उसे पोंछा न गया। वो दीवार के साथ एक लाइन में बिखरा था — बुरादा, फिर धूल, फिर फिर बुरादा।
मैंने हाथ फैलाया।
घंटी जेब में काँपी। काँपी, हिली और बहुत धीमी आवाज़ में बोली —
"जूते पहले आते हैं। आदमी बाद में आता है।"
"मतलब?"
"जो जूते पहनकर आया," घंटी ने कहा, "वो काग़ज़ लेने नहीं आया। वो काग़ज़ देखने आया। और जो काग़ज़ देखने आता है, वो काग़ज़ रखता नहीं — वो काग़ज़ रखवाता है।"
मीरा ने ज़मीन की तरफ़ देखा और फिर दीवार की तरफ़। "यहाँ से अंदर जाने का रास्ता है?"
"पहले था," मैंने कहा। "फाटक है। पर वो बंद रहता है।"
"बंद था," टिंकू ने कहा।
हम दोनों ने उसकी तरफ़ देखा।
वो फाटक के पास गया था। अकेला। बिना पूछे। बिना बताए। यही उसकी आदत थी और यही चीज़ मुझे रात में सबसे ज़्यादा डराती थी।
वो फाटक के पास रुका, झुका, और फिर अचानक उठकर चीखा —
"उस्ताद! यहाँ कुछ पड़ा है!"
मेरा दिल एक बार धड़का और फिर रुक गया, जैसे किसी ने घड़ी की चाबी पकड़ ली हो।
हम दौड़े। मीरा पहले, मैं उसके पीछे, और रास्ते में मेरा पैर लोहे की चादर पर पड़ा और वो बजी, और उस आवाज़ ने पूरी रात को एक झटका दिया।
फाटक के पास, दीवार से सटा, पुराना नीम का पेड़ है। कोई उसे नहीं देखता, क्योंकि वो अस्पताल के पीछे है और अस्पताल के पीछे कोई नहीं आता। उस पेड़ के नीचे, धूल में, पीला हेलमेट पड़ा था।
वही हेलमेट। ऊपर से फटा, टेप से बँधा।
मेरे हाथ ठंडे हो गए। मैंने घुटने टेक दिए और हाथ बढ़ाया, और फिर पापा की बात याद आई — जो चीज़ ज़मीन पर पड़ी मिले, उसे छूने से पहले सोचना।
मैंने सोचा।
मैंने देखा। हेलमेट उल्टा पड़ा था। उसकी पट्टी खुली थी, जैसे किसी ने जल्दी में उतारा हो — खोली नहीं, उतारी। और उस फटी परत के नीचे से, हेलमेट के अंदर से, काग़ज़ का एक कोना बाहर झाँक रहा था।
नक़्शा।
आधा फटा हुआ नक़्शा।
मीरा ने टॉर्च मेरी तरफ़ की। रोशनी उस कोने पर पड़ी और मैंने देखा — काग़ज़ पर पेंसिल की लकीरें थीं, एक घुमाव था, और एक कोना ऐसा था जहाँ से काग़ज़ चीरा गया था, सीधा, साफ़, जैसे किसी ने जान-बूझकर फाड़ा हो।
टिंकू पीछे खड़ा था और उसकी साँस तेज़ थी।
"उस्ताद," उसने कहा, "अगर हेलमेट यहाँ है, तो इमरान भैया कहाँ है?"
मैंने जवाब नहीं दिया। मैंने सिर्फ़ हेलमेट के अंदर से काग़ज़ खींचा — बहुत धीरे, बहुत सँभालकर, जैसे कोई चिड़िया का अंडा उठा रहा हो।
और जैसे ही वो काग़ज़ मेरे हाथ में आया, जेब में घंटी बजी।
पहली बार उस रात। पूरी आवाज़ से। इतनी तेज़ कि टिंकू चौंककर पीछे हटा और मीरा ने अपना हाथ दीवार पर टिका दिया।
और घंटी ने कहा —
"नाम लिया गया। अब नक़्शा तेरे हाथ में है, और आदमी उसके हाथ में।"
॥
नक़्शा मेरे हाथ में था और घंटी की आवाज़ अभी भी हवा में लटकी हुई थी।
"नाम लिया गया। अब नक़्शा तेरे हाथ में है, और आदमी उसके हाथ में।"
मैंने काग़ज़ को दोनों हाथों से पकड़ा। वो पतला था, मुड़ा हुआ, और उसके किनारे पसीने से मेरे अंगूठों पर चिपक रहे थे।
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो सवाल था जो वो पूछना चाहता था, पर बोल नहीं रहा था। और टिंकू का चुप होना सबसे डरावनी चीज़ थी। वो बच्चा बोलता रहता है, तब भी बोलता है जब नहीं बोलना चाहिए। अगर वो चुप है, तो उसके अंदर कुछ हिल रहा है।
मीरा ने टॉर्च धीमी कर दी। रोशनी पीली होकर उस धूल में घुल गई जो हमारे पैरों के नीचे थी।
"अंकुश," उसने धीरे से कहा, "इमरान का हेलमेट यहाँ है। इमरान नहीं है। मुझे समझ आ रहा है कि तू क्या सोच रहा है, पर…"
"मैं कुछ नहीं सोच रहा," मैंने कहा। "सोचना बाद में। पहले इसे यहाँ से हटाते हैं।"
"क्यों?"
"क्योंकि ये जगह उसकी नहीं है।"
मैंने हेलमेट उठाया। वो हल्का था, बहुत हल्का। एक आदमी का हेलमेट उसके सिर के बिना इतना हल्का लगता है कि दिल धक से रह जाता है, जैसे कोई चीज़ बहुत बड़ी होकर भी खोखली हो गई हो।
मैंने उसे सीने से लगाया। टेप की गंध आई — पुराना टेप, धूल, और उसके नीचे इमरान की पसीने की गंध। मैंने आँखें बंद नहीं कीं। आँखें बंद करना तब चाहिए जब सब्र हो, और उस वक़्त मेरे पास सब्र नहीं था।
"फाटक के आगे क्या है?" मीरा ने पूछा। "क्या हम अंदर जा सकते हैं?"
"नहीं।"
"क्यों नहीं?"
"क्योंकि अगर इमरान अंदर होता, तो वो हेलमेट बाहर नहीं पड़ा होता।"
मीरा ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला, फिर बंद कर दिया। वो समझ गई। मीरा को समझने में देर नहीं लगती, बस कभी-कभी वो समझने से पहले गुस्सा कर लेती है।
मैंने एक बार फिर उन निशानों की तरफ़ देखा। लकड़ी के जूतों के निशान। वो फाटक तक आते थे, वहाँ रुकते थे, जैसे कोई खड़ा होकर कुछ देख रहा हो। और फिर वो वापस मुड़ते थे — गली की तरफ़, दीवार के साथ-साथ।
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।
"तूने फाटक छुआ?"
"नहीं उस्ताद। मैंने सिर्फ़ झाँका। अंदर अंधेरा है। बहुत अंधेरा। ऐसा अंधेरा नहीं जैसे रात का हो। ऐसा अंधेरा जैसे वहाँ रोशनी जाती ही न हो।"
मेरी रीढ़ के साथ एक ठंडी लकीर सी गई।
"चल," मैंने कहा। "दुकान।"
रास्ते में कोई नहीं बोला। मीरा मेरे बगल में चल रही थी और टिंकू पीछे। उसकी चप्पल की आवाज़ और मेरे जूतों की आवाज़, बस यही। नीम के पेड़ के नीचे से गुज़रते वक़्त मैंने देखा कि उसकी जड़ पर कुछ पीला पड़ा है — काग़ज़ का कोना। मैंने उसे उठाया। फाड़ा हुआ टुकड़ा था, जिस पर बस एक शब्द बचा था — "नीचे"।
उसने मेरे हाथ में काँपते हुए कहा कि ये नक़्शे का ही टुकड़ा है।
गुमटी पर रोशनी जल रही थी।
शबनम आपा का चूल्हा अब भी जल रहा था, पर धुआँ पतला था — जैसे आग भी थक गई हो। रज़िया किनारे पर बैठी थी। और उनके बीच, स्टूल पर, हबीब चाचा बैठे थे। हाथ जोड़े हुए, आँखें ज़मीन पर, और वो लकड़ी के जूतों की तरह जमे हुए थे।
मुझे देखते ही वो उठ खड़े हुए। इतनी तेज़ी से उठे कि स्टूल पीछे हट गया और उसकी टाँग चटकी।
"इमरान?" उन्होंने कहा। बस एक शब्द। लेकिन उस एक शब्द में पूरा एक बाप था।
मैंने हेलमेट आगे किया।
चाचा ने देखा।
वो हिले नहीं। वो कुछ नहीं बोले। उनका हाथ हवा में रुक गया, जैसे किसी ने उसे बीच से पकड़ लिया हो। फिर उन्होंने हेलमेट को छुआ। उँगलियाँ उस फटी परत पर फिसलीं, टेप पर रुकीं, और फिर वो अपने होंठों पर हाथ रखकर बैठ गए।
शबनम आपा ने उनका कंधा पकड़ा।
रज़िया ने कहा, "चाचा, पानी पीजिए।"
चाचा ने सिर हिलाया। पानी नहीं पिया।
"ये इमरान का है," उन्होंने कहा। आवाज़ बहुत धीमी थी, जैसे किसी और की हो। "ये टेप मैंने लगाया था। पिछले साल, जब ये फट गया था। ये बोलता था कि बापू, हेलमेट फट गया तो क्या, सिर तो साबुत है।"
उन्होंने आँखें बंद कर लीं।
"मैंने कहा था — सिर साबुत है तो हेलमेट बदल ले। इसने कहा — पहले तेरी चप्पल बदल दूँगा।"
चाचा हँसे। एक छोटी सी हँसी, जो गले में ही फँस गई और फिर टूटकर रोने में बदल गई।
मैं वहीं खड़ा रहा। मैंने उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की। कुछ रोना ऐसा होता है जिसे रोकना उससे बड़ा ज़ुल्म है।
मीरा ने मेरी कलाई दबाई। मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसने आँखों से दुकान की तरफ़ इशारा किया। मैंने सिर हिलाया।
"चाचा," मैंने कहा, "दुकान चलिए।"
"इमरान?"
"इसलिए ही दुकान। यहाँ गली में हर कोई सुन रहा है। और जो मैं अभी कहूँगा, वो सबके लिए नहीं है।"
चाचा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी था, पर उस पानी के पीछे कुछ और था — वो चीज़ जो आदमी के अंदर तब जागती है जब उसका बच्चा खतरे में हो। डर नहीं। कुछ और। कुछ ज़्यादा ठंडा।
"चलते हैं," उन्होंने कहा।
उस्ताद की दुकान का शटर आधा गिरा हुआ था। अंदर बत्ती जल रही थी, पर मशीन बंद थी। उनकी मशीन का पहिया अब भी वैसे ही रुका हुआ था जैसे कोई हाथ उसे पकड़कर रोक दे। दुकान में कपड़े की गंध थी, धूल, और उसके नीचे इस्तरी की गरम लोहे जैसी हल्की गंध — जो शायद सिर्फ़ मेरी कल्पना थी, क्योंकि इतनी रात तक उस्ताद इस्तरी नहीं करते।
उस्ताद स्टूल पर बैठे थे। चश्मा नाक पर था, कान पर पेंसिल। उन्होंने हमें देखा, फिर हेलमेट देखा, और उनका चेहरा कुछ नहीं बदला। उस्ताद का चेहरा बदलता नहीं। उस्ताद की आवाज़ बदलती है। और उनकी आवाज़ अब धीमी थी।
"मेज़ पर रखो," उन्होंने कहा।
मैंने रखा।
चाचा ने हेलमेट फिर छुआ और खींच लिया। मैंने उन्हें रोका नहीं।
मैंने नक़्शा निकाला।
"बत्ती लाओ," मैंने टिंकू से कहा। उसने दुकान की छोटी बत्ती मेज़ के ऊपर ला दी। उस्ताद ने उसके नीचे अपनी मशीन की दराज़ से एक साफ़ कपड़ा निकाला और मेज़ पर बिछा दिया — वो कपड़ा जिस पर कोई चीज़ रखते हैं तो रखी चीज़ कपड़े से ज़्यादा कीमती लगती है।
मैंने नक़्शा खोला।
वो पूरा नहीं था। आधा था। एक किनारा सीधा चीरा हुआ था, और बाकी किनारे मुड़े हुए। काग़ज़ पर पेंसिल की लकीरें थीं — पतली, जल्दी में खींची गई, पर इतनी साफ़ कि समझ आ जाए। नीचे की तरफ़ एक बड़ा घेरा था, और उस घेरे के अंदर बहुत छोटे अक्षरों में कुछ लिखा था।
"काला कमरा," मीरा ने पढ़ा। उसकी आवाज़ में वो झटका था जो आदमी को सिर्फ़ तब लगता है जब काग़ज़ पर लिखी बात ज़मीन से मिल जाए।
मैंने अपनी उँगली उस घेरे पर रखी।
"ये अस्पताल की नीचे वाली मंज़िल है।"
"कैसे पता?" टिंकू ने पूछा।
"क्योंकि ऊपर ये दो लकीरें हैं — ये सीढ़ी हैं, जो माँ के कमरे के बाहर से नीचे जाती है। और ये — देख, ये दवा की खिड़की है। फ़ार्मेसी। यहाँ से बाईं तरफ़ मुड़कर अगर नीचे जाओ, तो ये कमरा आता है।"
मीरा ने अपना बैग खोला और उसमें से काग़ज़ों की तह निकाली। पुराने ज़मीन के काग़ज़ों की नक़लें, जो उसने दफ़्तारों से जोड़ी थीं। उसने उन्हें नक़्शे के साथ रखा, उँगली चलाई, और फिर धीरे से बोली —
"अंकुश, ये कमरा दवा की कोठरी के ठीक नीचे है।"
दुकान में एक पल के लिए सब रुक गया।
"ठीक नीचे?" मैंने कहा।
"हू-ब-हू नीचे। जिस जगह आज दवा की खेप रखी जाती है, उसके फ़र्श के नीचे।"
उस्ताद ने चश्मा सरकाया। उन्होंने नक़्शे पर उँगली रखी और काफ़ी देर तक देखते रहे। फिर उन्होंने उँगली हटाई और स्टूल की पीठ पर झुक गए, जैसे कोई पुराना बोझ अचानक कंधों पर आ गया हो।
"ये जगह," उन्होंने कहा, "बत्तीस साल पहले सील कर दी गई थी।"
"आपको पता है?" मीरा ने पूछा।
"मुझे ये पता है कि सील हुई थी। किसने की, ये नहीं पता। उस साल यहाँ बहुत कुछ बंद हुआ था। लोग बंद करके चले गए, और जो चले गए, वो कभी ये पूछने नहीं लौटे कि चाबी कहाँ गई।"
"पर कोई सील तो किसी वजह से होती है," मैंने कहा।
"हर सील की एक वजह होती है," उस्ताद ने कहा। "पर हर वजह सच नहीं होती।"
चाचा ने अब तक कुछ नहीं कहा था। वो हेलमेट पकड़े बैठे थे, और उनकी उँगलियाँ उस टेप के किनारे को बार-बार दबा रही थीं। फिर उन्होंने सिर उठाया।
"इमरान इस कमरे के बारे में बात करता था," उन्होंने कहा।
सबने उनकी तरफ़ देखा।
"कब?" मैंने पूछा।
"कुछ महीने पहले। एक दिन आया था, हाथ में मज़दूरी के पैसे थे और आँखों में कुछ और। मैंने पूछा कि क्या बात है। इसने कहा — बापू, उस अस्पताल के नीचे एक कमरा है जिसे साहब के आदमी खोलना चाहते हैं, पर खोलते नहीं। मैंने कहा, तुझे क्या? तू मज़दूर है, अपना काम कर। इसने कहा — बापू, वहाँ जो है, वो मज़दूरी का हिसाब नहीं है।"
"और आपने?" मीरा ने धीरे से पूछा।
"मैंने कहा — बेटा, जो हिसाब मज़दूरी का नहीं, वो हमारा नहीं।"
चाचा ने हेलमेट मेज़ पर रख दिया। उनका हाथ काँप रहा था, पर आवाज़ साफ़ थी।
"आज मैं वो बात वापस लेता हूँ। अब जो हिसाब मेरे बेटे का है, वो मेरा भी है। मैं अब चुप नहीं बैठूँगा। चाहे कुछ भी हो जाए।"
उस पल घंटी बजी।
पहले तो नहीं बजी। पहले वो ठंडी हुई — मैंने महसूस किया, जेब में, जैसे कोई बर्फ़ का टुकड़ा रख दे। फिर वो बजी, बहुत धीमी, बहुत छोटी, जैसे कोई बूढ़ा आदमी अपनी लाठी ज़मीन पर टिका रहा हो।
"यहाँ जो टूटा है," घंटी ने कहा, "वो इंसान नहीं है।"
मैंने साँस रोकी।
"वादा है।"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। उनका चेहरा अब भी वैसा ही था, पर उनकी आँखें थोड़ी सिकुड़ गईं।
"किसका वादा?" मैंने पूछा।
घंटी चुप हो गई।
"अंकुश," मीरा ने कहा, "इसका मतलब?"
"मतलब ये कि उस कमरे में कोई चीज़ बंद नहीं है, कोई बात बंद है। और जब बात बंद हो जाए, तो उसे खोलने के लिए ताला नहीं, सच चाहिए।"
टिंकू ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला, और ठीक उसी वक़्त दुकान के आधे गिरे शटर पर एक परछाई पड़ी।
किसी ने बाहर खड़े होकर अंदर झाँका।
मैंने सिर उठाया।
बबलू पांडे खड़ा था।
और मैंने उसे देखते ही अपनी आँखों पर यक़ीन नहीं किया।
वो वही बबलू था — मोटा शरीर, काला कोट, वही चेहरा जो पान चबाते हुए हमेशा हल्की मुस्कान में रहता था। पर आज उस मुस्कान का कोई निशान नहीं था। उसके होंठ सूखे थे और उसके हाथ — मैंने साफ़ देखा — काँप रहे थे। उसने दाहिने हाथ पर सफ़ेद रूमाल बाँधा हुआ था, जिस पर सूखा गुलाबी दाग था। उसकी गले की मोटी सोने की चेन गायब थी। उसकी जेब का उभार भी गायब था — पानदान नहीं था।
और सबसे अजीब बात — उसके होंठों पर पान की लाली नहीं थी। बिल्कुल नहीं। जैसे उसने सुबह से पान छुआ ही न हो।
मैंने स्टूल खिसकाया और खड़ा हो गया।
"बबलू भाई?"
उसने अंदर कदम रखा। दो कदम। तीसरे पर रुक गया, जैसे अंदर की हवा उसके लिए भारी हो।
"अंकुश," उसने कहा। बस मेरा नाम। आवाज़ में वो धमकी नहीं थी जो हमेशा होती थी। वो आवाज़ किसी ऐसे आदमी की थी जो बहुत देर से चलकर आया हो और अब खड़ा होने की ताक़त न बची हो।
"बैठो," उस्ताद ने कहा। उन्होंने कोई सवाल नहीं पूछा। उस्ताद कोई सवाल नहीं पूछते, वो बस चीज़ें रख देते हैं।
बबलू नहीं बैठा।
उसने हेलमेट देखा। फिर नक़्शा देखा। और उसके चेहरे पर जो हुआ, वो मैं कभी नहीं भूलूँगा — वो पल भर के लिए ऐसे पीछे हटा जैसे नक़्शे में आग लगी हो।
"ये तुमने कहाँ से निकाला?" उसने कहा। आवाज़ फटी हुई थी।
"आप बताइए," मैंने कहा। "ये आपने कहाँ देखा?"
वो चुप रहा।
"बबलू भाई," मैंने धीरे से कहा, "आपके हाथ काँप रहे हैं। आपकी चेन नहीं है। आपने पान नहीं चबाया। और आप रात के इस वक़्त, बिना किसी को लाए, मेरी दुकान पर खड़े हैं। इसका मतलब है कि आप आए नहीं हैं — आप भागकर आए हैं।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें लाल थीं, डबडबाई हुईं, और उनमें वो डर था जो आदमी को रात में उठाकर खिड़की तक ले जाता है।
"साहब के आदमी," उसने कहा। "उन्होंने आज रात… उस कमरे के बाहर… मैंने दो आदमी पहले भेजे थे, समझे थे कि सिर्फ़ बक्सा है। सिर्फ़ बक्सा उठाना है। पर…"
"पर?"
"पर वो कमरा बक्से वाला नहीं है।"
चाचा ने कुछ कहना चाहा, और मैंने उन्हें आँखों से रोका। अभी बबलू को बोलने दो। जो डरा हुआ आदमी खुद बोल रहा हो, उसे रोकना नहीं चाहिए, क्योंकि डरा हुआ आदमी एक ही बार सच बोलता है — ठीक उस वक़्त जब डर झूठ से बड़ा हो जाए।
"बबलू भाई, आपने वो कमरा खोला?"
उसने सिर हिलाया। न हाँ में, न ना में। फिर उसने हाथ उठाया और रूमाल से माथा पोंछा।
"मैंने खुद नहीं खोला," उसने कहा। "साहब के लोगों ने खोला। दो आदमी थे, लकड़ी के जूते पहने हुए। एक के हाथ में लालटेन थी। उन्होंने दरवाज़ा खोला, और…"
"और?"
"और फिर उन्होंने अंदर रोशनी नहीं डाली।"
मैंने साँस रोक ली। मीरा ने मेरी कलाई दबाई। टिंकू ने एक कदम पीछे हटकर उस्ताद की मशीन की मेज़ पकड़ ली।
"लालटेन थी," बबलू ने कहा, आवाज़ लगातार नीचे जा रही थी, "पर उन्होंने उसे बाहर ही रखा। दरवाज़े के बाहर। एक आदमी दरवाज़े के पास खड़ा रहा, लालटेन हाथ में, और दूसरा अंदर गया — अंधेरे में। जब वो लौटा तो उसका मुँह ऐसा था… मैंने उसे पहले कभी ऐसा नहीं देखा। मैंने पूछा, क्या देखा? उसने कहा — कुछ नहीं। और फिर उसने कहा — बबलू भाई, उस कमरे में रोशनी लेकर मत जाना।"
दुकान में सन्नाटा छा गया।
"रोशनी क्यों नहीं?" मीरा ने पूछा। उसकी आवाज़ ठंडी और साफ़ थी, जैसे किसी डॉक्टर की।
बबलू ने उसकी तरफ़ देखा। फिर उसने बहुत धीरे, बहुत सँभालकर, वो बात कही जो उसने अंदर ही अंदर रातों से पाली थी —
"क्योंकि रोशनी उसे जगा देती है।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"उसे?" मैंने कहा। "किसे?"
बबलू ने जवाब नहीं दिया। उसने बस वो सफ़ेद रूमाल मेज़ पर रख दिया, जैसे कोई गवाही का सबूत रख रहा हो, और फिर कहा —
"इमरान का क्या?"
चाचा आगे आए। उन्होंने हेलमेट उठाया और बबलू के सामने रख दिया।
"ये इमरान का है," उन्होंने कहा। "मेरा बेटा कहाँ है?"
बबलू ने हेलमेट देखा और उसका चेहरा एक और बार पलट गया।
"मैंने उसे उस कमरे के पास नहीं भेजा," उसने कहा। "मैंने सिर्फ़…"
"सिर्फ़ क्या?"
"मैंने सिर्फ़ साहब को फोन किया। मैंने बस कहा कि वो नक़्शा लेने गया है। बस इतना। उसके बाद जो हुआ, मैं वहाँ नहीं था। फिर मैंने सुना कि दो आदमी उसके पीछे गए थे और…"
वो रुक गया।
"और क्या सुना?" मैंने पूछा।
"और ये सुना कि उन्होंने उसे उसी कमरे में बंद कर दिया।"
चाचा की आँखें बंद हो गईं। शबनम आपा ने उन्हें पकड़ लिया, वरना वो गिर पड़ते।
"दरवाज़ा अंदर से बंद होता है या बाहर से?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ खुद मुझे अजीब लग रही थी — बहुत सपाट, बहुत शांत, जैसे मैं किसी और की बात सुन रहा हूँ।
"बाहर से," बबलू ने कहा। "उस पर पुराना ताला है। लोहे का। पर ताला पुराना है तो क्या, साहब के आदमी उसे खोल सकते हैं। मैं… मैं तुमसे यही कहने आया हूँ। तुम उसे बचा सकते हो।"
"मैं?" मैंने कहा। "मैं एक साइकिल मिस्त्री हूँ।"
"तुम वो हो जिसके पास घंटी है।"
उसने ये कहा और दुकान में फिर वो पल आया — वो ठंडा, चुप, थमा हुआ पल, जिसमें हवा भी साँस लेना भूल जाती है।
मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी। बहुत ठंडी।
और फिर वो बजी।
बहुत धीरे। इतनी धीरे कि जैसे किसी ने बहुत दूर से खुद को याद किया हो।
"जो बंद है," घंटी ने कहा, "वो कैद नहीं है। जो बंद है, वो इंतज़ार है।"
"इंतज़ार किसका?"
"उस आदमी का," घंटी ने कहा, "जो उसे खोलने के लिए नहीं, सुनने के लिए जाएगा।"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उन्होंने अपना चश्मा उतार दिया था और उसे कपड़े से पोंछ रहे थे, बहुत धीरे। उनका हाथ स्थिर था। उनका चेहरा स्थिर था। पर मैंने देखा — उनकी उँगली कपड़े पर ज़रूरत से ज़्यादा देर तक रुकी रही।
"उस्ताद," मैंने कहा, "आप कुछ जानते हैं।"
"मैं सिर्फ़ इतना जानता हूँ," उन्होंने कहा, "कि बत्तीस साल पहले जिस रात वो कमरा बंद हुआ, उस रात इस गली में एक ही आदमी ने अपना मुँह खोला था। बाकी सब चुप रहे।"
"कौन?"
उस्ताद ने चश्मा पहना। उन्होंने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे किसी पुराने हिसाब की आख़िरी लाइन पढ़ रहे हों।
"जिसका नाम उस काग़ज़ में और साथ है।"
मैं कुछ कहने ही वाला था कि टिंकू ने अचानक कहा —
"उस्ताद, इमरान भैया को कितनी देर हुई?"
मैंने घड़ी देखी। दो बजकर बीस मिनट। साइट से छह बजे निकला था। आठ घंटे से ज़्यादा।
"बहुत देर," मैंने कहा।
चाचा ने मेरी तरफ़ देखा और उनकी आँखों में वो सवाल था जो मैं टाल रहा था।
"तुम जाओगे ना?" उन्होंने पूछा।
मैंने उनके कंधे पर हाथ रखा।
"चाचा," मैंने कहा, "मैं अकेला नहीं जाऊँगा।"
"अकेला क्यों नहीं?"
"क्योंकि आपका बेटा जिस कमरे में बंद है, वहाँ जाने के लिए ताला नहीं, आदमी चाहिए। और एक आदमी अंधेरे में सिर्फ़ अंधेरा देखता है। दो आदमी एक-दूसरे को देखते हैं।"
शबनम आपा ने अपनी चिमटी उठाई और मेज़ पर रख दी — वो चिमटी जो गुमटी में रोज़ चूल्हे में जाती थी। उसकी आवाज़ में वो कड़क थी जो सिर्फ़ उनके पास थी।
"सुबह," उन्होंने कहा, "मैं चूल्हा नहीं जलाऊँगी। आज सुबह मेरी गुमटी से कोई चाय नहीं पीकर जाएगा।"
रज़िया ने उनकी तरफ़ देखा। कुछ ऐसा देखा जो बहनों के बीच सिर्फ़ बहनें समझती हैं।
"मैं साथ चलूँगी," रज़िया ने कहा।
"तुम नहीं," शबनम आपा ने कहा, और उनकी आवाज़ नरम हो गई। "तू गुमटी पर रह। अगर मुझे कुछ हो जाए तो किसी को तो याद रहेगा कि यहाँ चाय बनती थी।"
"आपा!" रज़िया उठ खड़ी हुई।
"बैठ।"
वो बैठ गई।
मैंने सबको देखा — चाचा, उस्ताद, मीरा, टिंकू, शबनम आपा, रज़िया, और बबलू जो दरवाज़े के पास खड़ा था, हाथ में रूमाल, आँखों में वो डर जो अब भी बुझा नहीं था।
"बबलू भाई," मैंने कहा।
"हूँ।"
"आप आज रात मेरे साथ चलिए?"
उसने सिर उठाया। उसकी आँखों में पहले झिझक आई, फिर कुछ और।
"तुम मुझे साथ ले रहे हो?" उसने कहा। "मैं… मैंने तुम्हें धमकाया है। मैंने तुम्हारी दुकान वाली जगह को… मैंने…"
"आपने बताया," मैंने कहा। "आज रात आपने मुझे बताया कि उन्होंने इमरान को बंद कर दिया। अगर आप न आते, तो मुझे यह नहीं पता होता कि कौन सा दरवाज़ा खोलना है।"
वो एक पल मेरी तरफ़ देखता रहा। फिर उसके होंठ काँपे और उसने बहुत धीरे कहा —
"मैंने एक आदमी बेचा है।"
"पता है।"
"फिर क्यों?"
"क्योंकि अब आप उसे वापस लाने चल रहे हैं," मैंने कहा। "और घंटी का हिसाब बिक्री से नहीं, वापसी से चलता है।"
घंटी जेब में फिर बजी — इस बार छोटी सी, एक घंटी जैसी, जैसे किसी ने अनजाने में ही कोई बात सही कह दी हो।
"चार अंक," घंटी ने कहा। "बिक्री वाला आदमी लौट रहा है।"
बबलू ने वो सुना या नहीं, मुझे नहीं पता। पर उसने वो सफ़ेद रूमाल मेज़ से उठाया, अपनी बाँह से खोला और अपनी जेब में रख लिया। फिर उसने मेरी तरफ़ देखकर कहा —
"उस कमरे में रोशनी लेकर मत जाना।"
"क्यों?"
"क्योंकि मैंने उस आदमी की आँखें देखी हैं जो बाहर आया था," उसने कहा। "वो आँखें नहीं थीं, अंकुश। वो दो चीज़ें थीं जो देख रही थीं, और उनमें इंसान नहीं था।"
उसने अपना हाथ ऊपर उठाया और उँगली मेरी तरफ़ की।
"और एक बात और।"
"कहिए।"
"उन्होंने उस कमरे में जो देखा, वो मुझे नहीं बताया। पर जब वो बाहर आया, तब उसने कुछ कहा। और वो शब्द मेरी छाती में लगे और आज तक लगे हुए हैं।"
"क्या कहा?"
बबलू ने अपना सिर मेरी तरफ़ झुकाया और इतनी धीरे कहा कि सिर्फ़ मैं सुन सकूँ, इसलिए कि उस रात की बात ज़ोर से कहने से फिर ज़िंदा हो जाएगी —
"उसने कहा — इस कमरे में जो बैठा है, वो इमरान नहीं है। इमरान तो अब भी बाहर आने की सीढ़ी ढूँढ रहा है।"
॥
उसकी बात मेरे कान में रह गई।
जैसे कोई चीज़ कान में नहीं, सीधे सीने में उतर जाए और वहाँ बैठकर धीरे-धीरे साँस लेने लगे। मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उनके चश्मे के पीछे की आँखें बंद थीं, जैसे वो कुछ गिन रहे हों जो सिर्फ़ उन्हें दिख रहा हो। मीरा ने अपना कैमरा मेज़ पर रख दिया — वो कैमरा जो अब तक बंद था, पर उसका लाल धब्बा जैसे किसी चीज़ का इंतज़ार कर रहा था।
"बत्तीस साल," उस्ताद ने आँखें खोलकर कहा। "बत्तीस साल पहले वो कमरा सील हुआ था। उस वक़्त मैं इस गली में सिलाई करता था, और उस कमरे की चाबी डॉक्टर इसरानी के पास थी। एक दिन वो आए, अपनी माँ की पुरानी सिलाई पेटी लेकर, और बोले — उस्ताद, इसे ताले में रखिए, कोई खोले तो नहीं, चलिए।"
"और फिर?" मैंने पूछा।
"और फिर वो कमरा बंद हो गया। डॉक्टर इसरानी ने उसके बाद उसका नाम नहीं लिया। जब भी कोई पूछता, वो कहते — वो कमरा गिर रहा है, वहाँ कोई नहीं जाता। पर गिरने वाला कमरा बत्तीस साल नहीं टिकता, अंकुश। गिरने वाली चीज़ पाँच साल में गिर जाती है। जो नहीं गिरती, वो टिकी रहती है किसी वजह से।"
टिंकू ने धीरे से कहा, "उस्ताद, उस कमरे में क्या है?"
उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़, फिर बबलू की तरफ़ जो दरवाज़े पर खड़ा था।
"वो मैं नहीं जानता," उन्होंने कहा। "पर एक बात जानता हूँ। बत्तीस साल पहले उस कमरे के ताले पर एक चीज़ लगी थी जो अब नहीं है। और जिस दिन वो चीज़ निकलेगी, उस दिन यह गली अपनी पुरानी नींद से जागेगी।"
मैं उठ खड़ा हुआ। मेरी जेब में घंटी थी — बंद, चुप, ठंडी। मैंने उसे हाथ में लिया। वो नहीं बजी। पर जब मैंने उसे उठाया, तो मुझे लगा जैसे कोई धागा खिंच रहा हो — मेरे हाथ से लेकर उस कमरे तक, जहाँ इमरान बंद था।
"सुबह जाना है," मैंने कहा। "बारह बजे के बाद नहीं। अभी रात है, अंधेरा है, और अंधेरे में वो हमारा इंतज़ार कर रहे होंगे।"
"और सुबह?" मीरा ने पूछा।
"सुबह हमारा इंतज़ार कोई नहीं करता," मैंने कहा। "सुबह लोग सोते हैं, थके होते हैं, और सबसे ज़रूरी बात — सुबह उन्हें उम्मीद नहीं होती कि कोई आएगा।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर वो भाव था जो अब मैं पहचानने लगा था — वो जानती थी कि मैं ठीक कह रहा हूँ, पर वो चाहती थी कि मैं कहता कि हम सब साथ हैं।
"मैं साथ चलूँगी," वो बोली।
"तुम चलोगी," मैंने कहा। "क्योंकि अगर तुम नहीं चली, तो मैं यह कहीं नहीं लिखवा पाऊँगा कि यहाँ क्या हुआ।"
बबलू ने अपना हाथ उठाया।
"मैं नहीं चलूँगा," उसने कहा। आवाज़ में पहले डर था, फिर जैसे उसे अपनी ही बात पर शर्म आई। "मैं बाहर रहूँगा। मैं… मैं उस कमरे के अंदर नहीं जा सकता।"
"कोई मजबूरी नहीं," मैंने कहा।
वो मेरी तरफ़ आश्चर्य से देखने लगा। जैसे उसे उम्मीद थी कि मैं उसे डाँटूँगा, उस पर ताना मारूँगा, कहूँगा — तुमने ही तो बेचा था। पर मैंने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि मैं अंदर से जानता था — जो आदमी डरता है और फिर भी बाहर खड़ा रहता है, वो अंदर जाने वाले से कम नहीं। सिर्फ़ उसका युद्ध दूसरी जगह है।
उस रात हम सोए नहीं। हम बैठे रहे। उस्ताद की दुकान की टिक-टिक बंद थी। गुमटी में चूल्हा बंद था। पीपल के नीचे कोई नहीं था। गली इतनी चुप थी कि मुझे अपनी साँस भारी लग रही थी।
रात को तीन बार मैंने घंटी देखी। वो चुप थी। पर एक बार, जब मैं चार बजे के करीब आँख झपका रहा था, मुझे लगा जैसे किसी ने बहुत दूर से मेरा नाम लिया हो।
मैं उठ गया।
पाँच बजे टिंकू ने मेरा कंधा हिलाया। "उस्ताद, आप आँख बंद किए बैठे थे।"
"मैं सो नहीं रहा था," मैंने कहा।
"आप सो रहे थे।"
"टिंकू, अगर मैं सो रहा था तो तू बाहर क्यों खड़ा था?"
उसने अपनी उँगली गिनते हुए कहा, "क्योंकि आपने कहा था — सुबह चारों जागते रहना, कोई अकेला नहीं रहेगा।"
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।
"ठीक कहा तूने," मैंने कहा।
सुबह जब पहली किरण गली की पीली दीवारों पर पड़ी, तो मैं उठा। आँगन में टिंकू और सानिया बैठे थे। गुड्डू चबूतरी पर सो रहा था। हबीब चाचा ने आँखों पर हाथ रखकर पूरी रात बिताई थी — उन्होंने एक पल को भी आँख नहीं बंद की थी।
मीरा ने अपना कैमरा उठाया, फिर नीचे रख दिया। "नहीं," उसने कहा। "आज पहले देखेंगे, फिर रिकॉर्ड करेंगे।"
मैंने उसे देखा। वो मेरी तरफ़ नहीं देख रही थी, पर उसकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो पिछले कुछ दिनों में बदली थी — अब वो सबूत से पहले सच खोज रही थी।
हम निकले। मेरे पीछे मीरा, टिंकू, हबीब चाचा। बबलू दूर से हमारे पीछे-पीछे आ रहा था। मैंने उसकी तरफ़ देखा तो उसने हाथ हिलाया और दूरी बनाए रखी। मैंने कुछ नहीं कहा।
अस्पताल का पिछला रास्ता उसी तरह पड़ा था जैसा रात में था — सूखी नाली, टूटी बाउंड्री, लोहे का पुराना फाटक। और फाटक के पास, एक पुरानी चारपाई पर, नीली शर्ट पहने एक बूढ़ा आदमी बैठा था।
वो वर्दी जैसी नीली शर्ट थी — उसकी कलाई की कफ़ पुरानी थी, बटन पर धागा निकल आया था। उसके हाथ में एक लोहे का गिलास था, जिसमें आधी चाय थी। जब हम पास पहुँचे तो उसने गिलास चारपाई के नीचे रख दिया और अपनी कमर सीधी करने की कोशिश करी।
"कहाँ जा रहे हो?" उसने कहा। आवाज़ में थकान थी, पर कोई नरमी नहीं।
"बंसीलाल भाई?" मैंने कहा।
उसने मेरी तरफ़ देखा। "तू कौन है?"
"अंकुश। साइकिलों की गली का।"
"अंकुश यादव?" उसने कहा, और उसके भौंहें सिकुड़ीं। "तू उस मिस्त्री का लड़का है जो अंगूठा लगाता है?"
यह सुनकर मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।
"आपको कैसे पता?"
"मैंने तीन रातों तक उसे उसी सीढ़ी पर बैठे देखा है," बंसीलाल ने कहा। "पाँच साल पहले। तेरे बाप एक काग़ज़ पर अंगूठा लगाकर उतरते थे और सीढ़ी के नीचे बैठकर अपने हाथ देखते रहते थे। एक रात मैंने उसे रोटी दी। उसने नहीं खाई।"
मैं कुछ नहीं बोला।
मीरा ने आगे कदम बढ़ाया।
"बंसीलाल भाई," उसने कहा। "आपको कुछ पूछना है।"
"तुम कौन हो?"
"मीरा। बस्ती की आवाज़ चलाती हूँ।"
"अख़बार वाली?" उसका चेहरा सख़्त हो गया। "तुम लोग यहाँ क्यों आए हो? मैं तीस साल से इस अस्पताल में हूँ। मैंने कोई काग़ज़ नहीं लिया। मैंने कोई हाथ नहीं लगाया। जो मैंने किया, वो सिर्फ़ नौकरी की।"
उसने उठने की कोशिश करी, फिर बैठ गया। उसकी टाँग उसे साथ नहीं दे रही थी।
"बंसीलाल भाई," मैंने कहा। "हम आपसे कुछ नहीं पूछने आए। हम अपना एक आदमी ढूँढ रहे हैं।"
वो रुका। उसने गर्दन घुमाई। "यहाँ कोई आदमी नहीं है। यहाँ सिर्फ़ मैं हूँ।"
मीरा ने अपना बैग खोला और उसमें से वो आधा फटा साइट नक़्शा निकाला। उसने उसे चारपाई पर उसके सामने रख दिया।
बंसीलाल ने पहले तो नहीं देखा। फिर देखा। फिर उसका चेहरा उतर गया।
इतना जल्दी उतर गया कि मुझे लगा किसी ने चेहरे पर पानी फेंक दिया हो।
"ये कहाँ से आया?" उसकी आवाज़ फटी।
"आपका आदमी इमरान साइट पर काम करता था," मीरा ने कहा। "कल रात उसे उस कमरे में बंद कर दिया गया।"
"नहीं। नहीं, नहीं, नहीं।" उसने अपने दोनों हाथ उठाए, जैसे कुछ हटा रहा हो। "मैं उस कमरे से कोई ताल्लुक नहीं रखता। मैं बाहर का चौकीदार हूँ। मुझे अंदर का पता नहीं।"
"बंसीलाल भाई—"
"मैं कुछ नहीं जानता।"
मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली। मैंने उसे उँगलियों में लिया और घुमाया, बिना बजाए। बंसीलाल ने घंटी देखी और उसकी आँखें उस पर टिक गईं।
"ये… ये कहाँ से आई?" उसने कहा।
"पुरानी है," मैंने कहा। "मेरे दादा की साइकिल की।"
वो बहुत देर तक देखता रहा। उसकी आँखों में वो चीज़ उभरी जो सिर्फ़ पुराने आदमियों में होती है — पहचान की चमक, जो एक पल आती है और फिर डर में बदल जाती है।
"साइकिलों की गली की घंटी," उसने धीरे से कहा। "ये तो… ये तो जगदीश की घंटी है।"
अब मेरे हाथ हिल गए।
"आप मेरे दादा को जानते थे?"
"कौन नहीं जानता था?" उसने कहा। "वो साले की दुकान से साइकिल की आवाज़ पूरे बाज़ार में आती थी। वो घंटी बजाता था तो बच्चे दौड़कर उसकी दुकान की तरफ़ भागते थे। एक दिन वो यहाँ आया। उस कमरे में गया। और फिर कभी नहीं आया।"
"वो कमरे में क्या गया था?"
बंसीलाल ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
"बेटा," उसने कहा, "तू मुझे मार डालेगा।"
"नहीं मारूँगा।"
"पर तेरी बातें और तेरी घंटी मुझे… मुझे उस रात की तरफ़ खींच रही हैं जिसे मैंने बत्तीस साल में इस एक भी पल सोचा नहीं था।"
वो उठा। इस बार वो उठा — धीरे, अपनी कमर पकड़कर, अपने बूढ़े घुटनों पर सारा ज़ोर देकर। फिर वो सूखी नाली और टूटी बाउंड्री के बीच की पगडंडी पर चलने लगा और इशारे से हमें अपने पीछे बुलाया।
हम उसके पीछे चले।
जब हम लोहे के फाटक के पास पहुँचे, तो उसने अपनी शर्ट की जेब से एक चाबी निकाली। बहुत पुरानी चाबी — काली, मोटी, जिसके दाँते घिस गए थे और जिसके छल्ले पर लाल धागा बँधा था।
"यह मेरे पास तीस साल से है," उसने कहा। "डॉक्टर इसरानी ने दी थी। कहा था — बंसी, इस अस्पताल की सीढ़ी से नीचे एक कमरा है। उसमें हवा नहीं, रोशनी नहीं। तू वहाँ सिर्फ़ तब जाना जब आग लगे।"
"और वो दिन आया?" मैंने पूछा।
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"बीस दिन पहले आया," उसने कहा। "एक रात मैंने देखा — सफ़ेद कपड़े वाला आदमी अस्पताल के पिछले हिस्से से अंदर गया। मैंने सोचा बड़ा आदमी होगा, चक्कर लगा रहा होगा। पर अगली रात फिर देखा। फिर तीसरी रात देखा। और फिर एक रात मैं उठा और अपनी टॉर्च लेकर उसके पीछे गया।"
"और?"
"और मैंने देखा — उसके साथ तीन आदमी आते हैं। उनके हाथ में मोटी रस्सी है, और वो कुछ घसीटते हैं। एक लोहे का बक्सा। बड़ा, मोटा, सीने से ऊँचा। वो बक्सा ज़मीन पर घिसटता है और उसकी आवाज़ हुई। मैं जब सुनता हूँ, आज भी मेरी रीढ़ में झुरझुरी चल जाती है।"
"आपने कभी पूछा नहीं कि क्या घसीट रहे हो?"
"किससे पूछता?" उसने कहा। "जिस डॉक्टर ने मुझे चाबी दी, वो खुद मुँह बंद किए आता-जाता है। मैंने एक बार उनसे पूछा — साब, वो नीचे क्या हो रहा है? वो कुछ नहीं बोले। बस मेरी तरफ़ देखा और मेरा हाथ पकड़कर हिलाया। उस हाथ में यही बात थी — बंसी, मत पूछ।"
मैं एक पल रुका।
"ज़रूरी है," मैंने कहा। "बंसीलाल भाई, अंदर मेरा आदमी बंद है। वो मेरा गवाह है। उसके पास एक काग़ज़ था जो पूरी गली की ज़मीन का सच है।"
"और तुझे लगता है वो ज़िंदा है?"
"मुझे पता नहीं।"
"तो मैं क्यों खोलूँ उस कमरे को? बत्तीस साल से बंद है। जो बंद रहता है, वो बंद रहने की वजह रखता है।"
मैंने उसकी आँखों में देखा।
"क्योंकि आज आपने अपनी नौकरी नहीं बचाई," मैंने कहा। "आपने अपने आपको बचाया। तीस साल से आप इस अस्पताल की देखभाल कर रहे हैं। आपने हर रात गश्त लगाई, हर सुबह गेट खोला, हर शाम ताले जाँचे। और आज जब आप जाएँगे तो आपको क्या याद रहेगा? यही कि आपने तीस साल बाहर खड़े रहकर देखा और एक रात अंदर कदम नहीं रखा।"
वो गहरी साँस लेता रहा।
"मैंने एक बार कदम रखा था," उसने कहा। "उसी रात पता चला कि उस कमरे की ज़मीन पर कुछ लिखा है। जब मैंने टॉर्च डाली तो मुझे लगा वो लिखाई है — पर वो लिखाई नहीं थी, बेटा। वो निशान थे। दो हाथों के निशान, ज़मीन पर खींचे हुए। जैसे कोई घसीटा गया हो। मैं वापस भागा। उसके बाद से मैं उस सीढ़ी के पास भी नहीं गया।"
"फिर चाबी क्यों रखी?"
"इसलिए कि जिस दिन कोई आए और पूछे," उसने कहा। "मैं कह सकूँ — चाबी मेरे पास है, मैंने नहीं खोली।"
उसने चाबी घुमाई। एक बार। दूसरी बार।
"तू मुझसे यह चाबी माँगता है," उसने कहा। "मैं देने से पहले एक शर्त रखूँगा।"
"कहिए।"
"रात बारह बजे के बाद वो कमरा मत खोलना।"
"क्यों?"
"क्योंकि मैंने जिन रातों में वो आदमी अंदर जाते देखा है, वो हमेशा बारह के बाद गया है। और जब बारह बजते हैं, उनका आदमी बाहर आ जाता है और मेरी तरफ़ देखता है। फिर वो अपना सिर हिलाता है — जैसे कहे, बंसी, तू अपना काम कर। और मैं अपना काम करता हूँ। मैं आँख फेर लेता हूँ।"
"आज वो तरीका नहीं चलेगा," मैंने कहा।
"आज मैं खुद आँख नहीं फेरूँगा," उसने कहा, और उसकी उम्र के हिसाब से उसकी आवाज़ में एक बात आई जो डर से नहीं, गुस्से से बनती है। "मैं बाहर पहरा दूँगा। तू अपने आदमियों को लेकर अंदर जा। पर अगर बारह बाद गया, तो मैं तुझे अंदर नहीं जाने दूँगा, भले मुझे ज़मीन पर गिरना पड़े।"
उसने चाबी मेरी हथेली पर रख दी। बहुत ठंडी चाबी थी। इतनी ठंडी कि मुझे लगा उसने उम्र भर ठंडी ही रही होगी।
"बंसीलाल भाई—"
"सुन," उसने मेरा हाथ पकड़कर कहा। "तीन बातें याद रखना। एक — उस कमरे में रोशनी होने पर साया नहीं दिखता, और वहाँ साये से ही बचना है। दो — अंदर कोई आवाज़ करे तो पहले रुक जाना, सीधे हाथ नहीं बढ़ाना। तीन — अगर तेरी घंटी बजे, तो तू उसी पल रुक जाना, चाहे तुझे कुछ भी दिखे।"
"घंटी अभी नहीं बजी," मैंने कहा।
"ये तो बजेगी," उसने कहा। "बत्तीस साल से ये अस्पताल अपनी साँस रोक रहा है। जिस दिन ये घंटी बजेगी, वो साँस छोड़ेगा। भले ही चीख़ के रूप में।"
तभी घंटी बजी।
बिना छुए। बिना हिलाए। मेरी जेब के अंदर, मेरी हथेली से चिपकी, अचानक ज़ोर से एक बार बजी। बंसीलाल अपनी चारपाई पर वापस गिरा।
"यह क्या था?" उसने कहा।
"ये… ये मेरी সাइकिल की घंटी है," मैंने कहा।
"तेरी साइकिल की घंटी ऐसे नहीं बजती," बंसीलाल ने कहा। "यह तो जैसे कोई बोल रहा हो।"
मैंने घंटी जेब से निकाली। उसका पीतल लाल था, जैसे किसी ने गरम किया हो। मैंने उसे अपनी उँगली पर रखा।
"अब सुनो," घंटी ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ज़ोर था जो मैंने पहले कभी नहीं सुना।
"जो अकेले जाएगा, वो सिर्फ़ अपनी आवाज़ लेकर लौटेगा।"
मेरा हाथ काँपा। मैंने घंटी को कसकर पकड़ा।
"क्या कहा उसने?" बंसीलाल ने पूछा। "मेरी कानों ने… मेरी कानों ने कुछ सुना।"
"कुछ नहीं," मैंने कहा, और मैंने घंटी अपनी जेब में डाल दी।
तभी मेरी नज़र दूर पड़ी। बबलू के बाहर खड़ा था। चारपाई से दो दर्जन कदम दूर, टूटी बाउंड्री के सहारे। उसने हमारी पूरी बात सुनी थी।
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसने अपना सिर हिलाया।
ना। साफ़ ना। हाथ भी नहीं उठाया, बस सिर हिलाया — दो बार, बाएँ से दाएँ।
"बबलू भाई," मैंने कहा। "आप बाहर रहिए। किसी को आने-जाने दीजिए मत।"
उसने कुछ कहा, पर आवाज़ दूर थी। मैंने हाथ से इशारा किया — पास आओ।
वो आया। डरा हुआ, सफ़ेद रूमाल उसके हाथ पर बँधा था।
"मैं अंदर नहीं जाऊँगा," उसने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो इंसान की आख़िरी हद पर बनती है। "मैंने तुमसे कह दिया, मैंने तुम्हें बताया। बस। अब मुझे माफ़ कर दो। मैं उस कमरे में नहीं जाऊँगा।"
"कोई मजबूरी नहीं," मैंने दोहराया। "आप बाहर रहिए।"
"मेरे बाहर रहने से क्या होगा?" उसने कहा। "मैं यहाँ बैठा रहूँगा और कुछ नहीं करूँगा।"
"आप बाहर रहकर हमें बताइए," मैंने कहा, "कि कब कोई आए। कब गाड़ी आए। कब सीढ़ी से कोई उतरे। बबलू भाई, मेरे अंदर जाने के बाद आप मेरे सबसे ज़रूरी आदमी होंगे।"
वो रुक गया।
"मैं?" उसने कहा। "मैं तो…"
"आप बाहर से आँख रख सकते हैं," मैंने कहा। "मैं अंदर से आँख नहीं रख सकता। अंदर अंधेरा है।"
उसने अपने होंठ काटे। फिर उसने अपना हाथ अपने रूमाल से पोंछा, और घुटनों पर रख दिया।
"ठीक है," उसने कहा। "बाहर रहूँगा।"
तभी मीरा ने अपनी जेब से कुछ निकाला।
"बंसीलाल भाई," उसने कहा। "एक बात और पूछनी है।"
"बोलो।"
"आपने कहा कि सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी कई रातों से आता जाता है। उसने कभी आपसे कुछ कहा?"
बंसीलाल ने आँखें झुकाईं।
"एक बार," उसने कहा। "जब मैं आँख नहीं फेर पाया। वो रुका और बोला — बंसी, तेरी नौकरी सिर्फ़ इसलिए है कि तू मुँह बंद रखता है। जिस दिन तूने मुँह खोला, उस दिन सीढ़ी पर ताला लगेगा और तेरी शर्ट उतर जाएगी।"
"और आज आप मुँह खोल रहे हैं," मैंने कहा।
"आज मुँह खोल रहा हूँ," उसने कहा। "और जानता हूँ कि शर्ट उतर जाएगी।"
उसने अपनी नीली शर्ट की कॉलर सीधी करी।
"पर तीस साल बाद, बेटा," उसने कहा, "मैं अपनी शर्ट उतरने से पहले ये देखना चाहता हूँ कि उस कमरे में क्या है। अगर आज नहीं देखा, तो फिर कभी नहीं देखूँगा।"
मैंने उसका हाथ थामा — पहली बार उसका हाथ। बूढ़ा हाथ, जिसमें गर्मी नहीं, जैसे कुछ घंटों से वो आँगन में खड़ा था।
अब हम योजना बनाने बैठे।
हम बंसीलाल की चारपाई के पास, ज़मीन पर बैठ गए। मेरे साथ मीरा, टिंकू, हबीब चाचा। टिंकू ने अपनी जेब से एक छोटा पेंसिल निकाला और ज़मीन पर लिखने लगा।
"उस्ताद," उसने कहा, "मैंने सुना था कि योजना बनानी होती है।"
"तो बना," मैंने कहा।
उसने ज़मीन पर चार खड़ी लकीरें खींचीं।
"नंबर एक — आप," उसने कहा। "अंदर जाएँगे।"
"ठीक है।"
"नंबर दो — मैं। आपके पीछे।"
"टिंकू—"
"उस्ताद," उसने कहा और मेरी तरफ़ देखा। "अगर आपने मना किया, तो मैं चुपचाप पीछे-पीछे आ जाऊँगा। इससे बेहतर है कि आप मुझे साथ रखें, जहाँ मैं दिखूँ।"
मीरा हँसी — पहली बार आज सुबह।
"इसकी ज़ुबान," उसने कहा, "तेरे से भी तेज़ है।"
"ज़ुबान," मैंने कहा, "उम्र से पहले आती है।"
"नंबर तीन — मीरा दीदी," टिंकू ने कहा। "रोशनी और आवाज़। कैमरा बंद रहेगा, पर जो दिखेगा वो बताएँगी।"
"मेरा काम यही है," मीरा ने कहा।
"नंबर चार — हबीब चाचा। बाहर, बबलू भाई के साथ।"
चाचा ने अपना सिर झुकाया।
"मैं बाहर ठीक हूँ," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ में वो थकान थी जो एक रात के जागने से आती है।
"उस्ताद बाहर रहेंगे," मैंने कहा। "वो गुमटी और पीपल के बीच रहेंगे। अगर कुछ भी गड़बड़ हो, तो उनके पास शबनम आपा का सीटी वाला केतली वाला हथियार है।"
"सीटी," उस्ताद ने कहा। "मैं दो बार सीटी बजाऊँगा। पहली बार — रुको। दूसरी बार — भागो।"
"उस्ताद," मैंने कहा, "तीसरी बार?"
उन्होंने अपनी कैंची उठाई, जो अब भी मेज़ पर पड़ी थी।
"तीसरी बार," उन्होंने कहा, "मैं अपने आप आ जाऊँगा।"
टिंकू ने ज़मीन पर आख़िरी लकीर खींची।
"और बाहर से बंद कमरे का रास्ता?" उसने पूछा।
"अस्पताल के अंदर से जाना होगा," बंसीलाल ने कहा। "पीछे की सीढ़ी से। पर आज बारह बजे के बाद वो सीढ़ी बंद हो जाएगी।"
"कितने बजे हैं?" मैंने पूछा।
"सात बजकर दस मिनट," मीरा ने कहा।
"तो हमारे पास कुछ घंटे हैं," मैंने कहा।
"और रास्ता?" टिंकू ने कहा।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"वो आधा नक़्शा," मैंने कहा। "उसमें नीचे का रास्ता दिख रहा था?"
मीरा ने नक़्शा खोला। उसने उँगली रखी।
"यहाँ," उसने कहा। "सीढ़ी से नीचे जाकर एक गलियारा है। गलियारे के आख़िर में लोहे का दरवाज़ा है। फिर काला कमरा।"
"गलियारा कितना लंबा है?"
"पता नहीं। पर इस पर एक निशान है — छोटा सा तीर, जो दिखाता है कि दरवाज़ा बाएँ तरफ़ है।"
"तो बाएँ जाएँगे," मैंने कहा।
"अंकुश," मीरा ने कहा। "एक बात।"
"हाँ।"
"उस कमरे में रोशनी होगी तो साया नहीं दिखेगा। तो हमें बिना रोशनी जाना होगा?"
"नहीं," मैंने कहा। "हमें रोशनी चाहिए। पर साया नहीं दिखेगा — इसका मतलब है कि वहाँ कुछ और है जो रोशनी में छिपेगा।"
"क्या?"
"वो जो बत्तीस साल से चुप है," मैंने कहा। "हम उसे देखेंगे नहीं। हम उसे सिर्फ़ महसूस करेंगे।"
टिंकू ने अपनी छोटी पेंसिल उठाई और ज़मीन से सारी लकीरें मिटा दीं।
"क्यों मिटाई?" मैंने पूछा।
"क्योंकि योजना बन गई," उसने कहा। "अब इसे किसी को दिखना नहीं चाहिए।"
हबीब चाचा ने मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश," उन्होंने कहा। "मेरा बेटा अंदर है।"
"जानता हूँ, चाचा।"
"अगर वो निकल आया, तो मैं उसे पहला थप्पड़ मारूँगा," उन्होंने कहा, और उनकी आँखें भर आईं। "फिर उसे गले लगाऊँगा। फिर उससे माफ़ी माँगूँगा कि मैंने सात चिट्ठियाँ नहीं पढ़ीं।"
कुछ देर हम चुप बैठे रहे। चारपाई पर बंसीलाल अपनी आँखें बंद किए बैठा था। मीरा नक़्शे को मोड़ रही थी। टिंकू अपनी जेब में पेंसिल डाल रहा था। बबलू दूर फाटक पर खड़ा था, हाथ पर रूमाल बाँधे।
और तभी मेरा फोन बजा।
मैंने जेब से निकाला। स्क्रीन पर नाम चमका — इमरान।
मेरी साँस रुक गई।
"मीरा," मैंने कहा।
उसने देखा।
"इमरान का नंबर," मैंने कहा।
"उठाओ," उसने कहा।
मैंने उठाया।
पहले कुछ नहीं सुनाई दिया। फिर साँसों की आवाज़। भारी साँसें, जैसे कोई दौड़कर आया हो और फिर रुककर सीने को पकड़ लिया हो।
"इमरान?" मैंने कहा।
साँसें तेज़ हुईं।
"इमरान, बोल।"
एक पल चुप। फिर एक आवाज़ — कमज़ोर, फटी, जैसे आधे रास्ते में दबा दी गई हो।
"काला।"
और फिर लाइन कट गई।
मैंने फोन को देखा। स्क्रीन बंद हो गई थी।
"क्या कहा उसने?" मीरा ने पूछा।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी उसमें गरम थी।
"सिर्फ़ एक शब्द," मैंने कहा। "काला।"
बंसीलाल ने अपनी आँखें खोलीं।
"काला कमरा," उसने धीरे से कहा। "वो अंदर है। पर वो अंदर किसी और की आवाज़ में बोल रहा है?"
"नहीं," मैंने कहा। "वो अंदर है। और उसके पास फोन है।"
"फोन?" मीरा ने कहा। "अंदर सिग्नल कहाँ से आएगा?"
"यही सवाल मैं पूछता हूँ," मैंने कहा। "और यही जवाब मुझे डरा रहा है।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा।
"उस्ताद," उसने कहा, "मतलब अंदर कुछ है जो चलता है?"
मैंने घंटी अपनी हथेली पर रखी।
"अंदर कुछ है," मैंने कहा। "पर जो चलता है, वो सिर्फ़ कोई नहीं होता। चलने के लिए… आदमी चाहिए। और अगर वहाँ कोई आदमी है, तो वो बाहर आ सकता है। पर वो नहीं आ रहा।"
"मतलब?"
"मतलब वहाँ कुछ ऐसा है," मैंने कहा, "जो उसे आने ही नहीं दे रहा।"
हबीब चाचा ने अपना हाथ मेरी बाँह पर रखा।
"तो जल्दी चल," उन्होंने कहा। "मेरे बेटे को अंदर से निकाल। और अगर वहाँ तेरे रास्ते में कोई आए, तो मेरा नाम ले लेना। मेरा नाम हबीब अली है, और मेरे बाप का नाम भी हबीब था, और हम इस गली के हैं — हम किसी के सामने नहीं झुकते।"
उनकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो दो दिन पहले नहीं थी। उनकी कमर अब भी झुकी थी, पर उनके शब्द सीधे खड़े थे।
मैंने चाबी उठाई — बंसीलाल की दी हुई काली चाबी।
"आज शाम छह बजे," मैंने कहा। "सब तैयार रहें। उस्ताद सीटी लेकर गुमटी पर। चाचा और बबलू भाई फाटक पर। मीरा मेरे साथ। टिंकू मेरे पीछे।"
"और मैं?" बंसीलाल ने कहा।
"आप," मैंने कहा, "सीढ़ी पर। जब तक हम अंदर हैं, आप सीढ़ी पर खड़े रहिए। जिस दिन यह अस्पताल गिरे, वो आपके पीछे गिरे।"
उसने अपना सिर झुकाया।
"मैं खड़ा रहूँगा," उसने कहा।
तभी मेरी नज़र घंटी पर पड़ी। वो हिल रही थी — बिना छुए।
मैंने उसे उठाया। उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी, जैसे दूर से आ रही हो।
"काला," घंटी ने कहा। "काला नहीं, काला।"
"क्या मतलब?"
"काला नहीं। काला।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"काला," मैंने कहा।
"क्या दोनों एक ही शब्द हैं?" उसने पूछा।
"नहीं," मैंने कहा, और मेरा गला सूख रहा था। "घंटी की आवाज़ में दो तरह का काला है। एक — अंधेरा। दूसरा — कोई और काला।"
"और वो क्या है?"
"पता नहीं," मैंने कहा। "पर उसका नाम भी काला है, यही सबसे बड़ी बात है।"
मैंने घंटी जेब में डाली। वो फिर बजी। इस बार ज़ोर से, साफ़, जैसे कोई दरवाज़ा खुल रहा हो।
"अब," घंटी ने कहा, "तेरा नाम लिया जा रहा है। और जिसका नाम लिया जाता है, वो अपना नाम भूल जाता है। जब तक तू नीचे उतरेगा, याद रख कि तेरा नाम अंकुश है और तेरे बाप का नाम शंकर है और तू साइकिलों की गली का रहने वाला है।"
मैंने अपनी आँखें बंद कीं। मेरे सामने माँ का चेहरा आया — बैसाखी पकड़े, आँगन तक आती हुई। काजल की आवाज़ आई — "भैया।" पापा की चुप्पी आई — सीने से चिपकी भूरी फाइल।
"याद है," मैंने धीरे से कहा।
टिंकू ने मेरा हाथ थामा।
"उस्ताद," उसने कहा, "मैं डर रहा हूँ।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"मैं भी," मैंने कहा।
उसने अपनी आँखें बड़ी कर लीं। "आप भी?"
"मैं भी," मैंने कहा। "पर डरना और भागना अलग बात है। हम चलेंगे।"
उसने अपना सिर हिलाया।
"चलेंगे," उसने कहा।
बबलू दूर से आकर खड़ा हो गया।
"अंकुश," उसने कहा, "मैं… मैं खुद भी नहीं जानता कि यह सब करके मैं क्या कर रहा हूँ। पर तुमने मुझे छोड़ा नहीं। मैं तुम्हें नहीं छोड़ूँगा। बाहर चाहे जो हो, मैं फाटक पर रहूँगा।"
और उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया — वो हाथ जिसमें सफ़ेद रूमाल बँधा था।
मैंने उसे थाम लिया।
"अच्छा है," मैंने कहा।
फिर हम सब चुप हो गए। गली के बाहर से कोई टेम्पो गुज़रा और उसका पुराना इंजन धीरे-धीरे खाँसता हुआ दूर चला गया। पीछे के प्लॉट से एक ट्रक की पीली बत्ती की रोशनी आई, फिर गई। सुबह हो रही थी।
मैंने अपनी जेब की घंटी फिर छुई। यह बार वो चुप थी।
मैंने बंसीलाल की काली चाबी को अपनी मुट्ठी में कसकर भींचा। छल्ले पर बँधा लाल धागा मेरी कलाई पर आ गया।
"आज शाम," मैंने धीरे से कहा, "अस्पताल के नीचे जो बत्तीस साल से बंद है, वो खुलेगा।"
मीरा ने अपना कैमरा उठाया। इस बार उसने उसे खोला और रिकॉर्ड बटन दबाया।
"अब," उसने कहा। "अब रिकॉर्ड करना चाहिए।"
"क्यों?"
"क्योंकि अब हम वो नहीं हैं जो बचने आए थे," उसने कहा। "अब हम वो हैं जो सच का इंतज़ार कर रहे थे, और आज वो सच बोलेगा।"
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश," उसने कहा। "एक बात कहूँ?"
"कहो।"
"जब हम नीचे जाएँगे," उसने कहा, "मैं तुम्हारे साथ रहूँगी। चाहे वहाँ कुछ भी हो। पर मुझे एक वादा चाहिए।"
"क्या?"
"कि तुम अंदर जाकर अपना दिमाग़ बंद नहीं करोगे।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"क्या मतलब?"
"मतलब यह कि अकेले कुछ नहीं करना," उसने कहा। "आज रात हम सब अंदर नहीं जाएँगे। कुछ बाहर रहेंगे। पर तुम्हारा ये नियम है ना — कि सब ठीक करना है, अकेले?"
मैं हँसा।
"मुझे लगता था," मैंने कहा, "कि मैं वो नहीं करता।"
"तुम करते हो।"
"मैं अब नहीं करूँगा," मैंने कहा।
"सब ऐसा ही कहते हैं," उसने मुस्कुराकर कहा।
"मैं अंकुश हूँ," मैंने कहा। "मैं जो कहता हूँ, वो करता हूँ।"
"अच्छा," उसने कहा। "तो पहली बार सच कहा तुमने।"
मैंने अपना सिर हिलाया।
चाबी मेरी मुट्ठी में थी। घंटी मेरी जेब में। टिंकू मेरे पीछे। मीरा मेरे साथ। फाटक पर बबलू, गुमटी पर उस्ताद, अस्पताल के अंदर माँ के कमरे में काजल, घर के आँगन में पापा, और कहीं नीचे, बत्तीस साल के अंधेरे में, एक आदमी जिसने अभी-अभी दो शब्द कहे थे।
"काला।"
मैंने अपनी जेब में घंटी को छुआ और फुसफुसाया —
"अब बता। कौन सा काला?"
घंटी ने मेरी हथेली में एक बार हल्की सी तड़प की, जैसे कोई साँस छोड़ रहा हो। फिर चुप हो गई।
और सुबह की पहली किरण अस्पताल की पीली दीवार पर पड़ी। मैंने देखा — दीवार पर एक दरार उस जगह से नीचे जाती थी, जहाँ कभी कोई पोस्टर लगा था। दरार के किनारे पर पुराना चूना झड़कर नीचे गिर रहा था।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"दीवार की दरार," मैंने कहा। "इसे देख रही हो?"
"हाँ," उसने कहा।
"इसे कैमरे में क़ैद कर लो," मैंने कहा। "क्योंकि आज के बाद यह दीवार वैसी नहीं रहेगी।"
उसने कैमरा उठाया।
"और अंकुश," उसने कहा, "अगर हमें नीचे जाना है, तो जाने से पहले अपने पापा से मिल लो।"
मैं रुक गया।
"क्यों?"
"क्योंकि जो आदमी अपने बाप से मिले बिना अंधेरे में जाता है," उसने कहा, "वो अंधेरे से लड़ नहीं पाता।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें भरी हुई थीं। पर वो रो नहीं रही थी।
"तुम्हें कैसे पता?" मैंने पूछा।
"मेरे पापा से नहीं मिली," उसने कहा। "एक बार जब मुझे उनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी।"
वो चुप हो गई।
मैंने हाथ बढ़ाया और उसकी मुट्ठी पर अपना हाथ रख दिया।
"मैं उनसे मिलूँगा," मैंने कहा।
"अब?"
"अभी," मैंने कहा।
मैं मुड़ा। मेरे पीछे टिंकू, मीरा, हबीब चाचा। अस्पताल की पीली दीवार के साथ-साथ हम आगे बढ़े। सुबह की धूप अब हल्की गरम हो रही थी। पीपल के पत्तों में हवा चल रही थी। दूर कहीं बच्चे स्कूल की तरफ़ भाग रहे थे, उनकी चप्पलें पत्थर पर चटक रही थीं।
और मैं सोच रहा था — अगर आज रात मैं बाहर न आया, तो माँ को कौन बताएगा कि मैं उस कमरे में गया था? पापा को कौन बताएगा कि मैंने उनका हाथ थामा था? काजल को कौन बताएगा कि मैंने उसे सुबह छह बजे पीपल पर बुलाया था, और वो नहीं आई, और मैंने उसे माफ़ कर दिया?
फिर मैंने अपने आप से कहा — तू बाहर आएगा। क्योंकि घंटी ने कहा था कि तेरा नाम अंकुश है। और अंकुश का मतलब होता है — जो खींचकर बाहर लाता है।
और बाहर लाने वाले खुद कभी अंदर नहीं रुकते।
यही सोचकर मैंने अपनी जेब में घंटी फिर छुई।
वो चुप थी। पर उसका पीतल गरम था — जैसे वो सुन रही हो।
॥
मैं सीधा घर की तरफ़ चला।
गली में अभी धूप पूरी तरह नहीं खुली थी। पीपल की छाया लंबी थी और उसमें बुज़ुर्गों की चबूतरी खाली पड़ी थी। किसी ने आज सुबह चबूतरी पर पानी नहीं डाला था, इसलिए उस पर कल की धूल जमी थी। दूर कहीं किसी के घर से प्रेशर कुकर की सीटी आ रही थी, और उसके नीचे एक और आवाज़ थी — किसी बच्चे के रोने की, जो हर सीटी पर एक झटका लेकर चुप हो जाता था।
मेरी जेब में घंटी थी। गरम। चुप।
मैंने चलते-चलते अपनी मुट्ठी खोली। बंसीलाल की काली चाबी मेरी हथेली पर पड़ी थी। छोटी, घिसे दाँतों वाली, छल्ले पर लाल धागा बँधा हुआ। धागे की गाँठ पुरानी थी, पर धागा नया लग रहा था। जैसे किसी ने उसे हाल में बदला हो।
घर के आँगन का दरवाज़ा खुला था।
पापा फ़र्श पर बैठे थे। उनके सामने औज़ारदान खुला पड़ा था — लोहे का लंबा बक्सा, जिसके अंदर हर औज़ार अपनी जगह पर रखा था, जैसे कोई स्कूल का बस्ता हो। उसके पास ही भूरे कपड़े में लिपटी वो फाइल रखी थी, जिसे उन्होंने कल रात सीने से चिपकाया था। और उनकी कमीज़ की जेब से ज़ंग लगी चाबी का छल्ला झाँक रहा था।
मैंने उनके सामने बैठने के लिए जगह देखी। वही पुरानी ईंट, जिस पर बचपन में मैं बैठकर उन्हें औज़ार साफ़ करते देखता था।
“चाबी मिली?” उन्होंने पूछा, बिना ऊपर देखे।
“मिली,” मैंने कहा।
“काली?”
“काली,” मैंने कहा।
उनके हाथ में पुरानी रिंच थी। उन्होंने उसे औज़ारदान में रखा, फिर धीरे से बक्सा बंद किया। चाबी घुमाई। क्लिक की आवाज़ आई, जैसे किसी ने दूर से जवाब दिया हो।
“वो कमरा मैं जानता हूँ,” उन्होंने कहा।
मैं चुप रहा।
“कभी अंदर नहीं गया,” उन्होंने कहा। “पर बाहर खड़ा रहा हूँ। एक बार। पाँच साल पहले। सीढ़ी पर बैठकर।”
मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनकी आँखें औज़ारदान पर थीं, मेरे पर नहीं।
“उस वक़्त मुझे लगा कि अंदर से कोई गिन रहा है,” उन्होंने कहा। “धीरे-धीरे। एक, दो, तीन। और हर गिनती पर दीवार से आवाज़ आती थी, जैसे कोई दरवाज़ा खटखटा रहा हो। फिर आवाज़ रुक गई।”
“किस गिनती पर रुकी?” मैंने पूछा।
“सत्ताईस,” उन्होंने कहा।
आँगन में एक पल के लिए सिर्फ़ गौरैया की आवाज़ बची।
“पापा,” मैंने कहा, “तुम अंदर मत चलना।”
“मैं अंदर नहीं जाऊँगा,” उन्होंने कहा। “मैं पिछले फाटक पर खड़ा रहूँगा। जब तक तू बाहर नहीं आएगा, मैं वहीं रहूँगा। अगर आठ बजे तक तू नहीं आया, तो मैं खुद अंदर आऊँगा।”
“और अगर तुम गए,” मैंने कहा, “तो माँ को कौन देखेगा?”
वो चुप हो गए।
मैंने उनका हाथ पकड़ा। उनकी उँगलियाँ खुरदुरी थीं, ग्रीस की पुरानी परत से भरी हुई। उन्होंने मेरा हाथ नहीं छोड़ा, पर हल्का सा दबाया।
“तेरे पास कुछ है?” उन्होंने पूछा।
“क्या?”
“कोई निशान लगाने को। चॉक।”
मैंने जेब टटोली। टिंकू ने कल दुकान पर सफ़ेद चॉक का एक छोटा टुकड़ा छोड़ा था — जिससे हम गली में योजना लिखते हैं और फिर मिटा देते हैं।
“है,” मैंने कहा।
“तो सुन,” उन्होंने कहा। “सीढ़ियाँ गिनते जाना। जाते वक़्त जितनी गिनी, लौटते वक़्त उतनी ही मिलें। अगर एक भी ज़्यादा मिले, तो रुक जाना। वापस मत चढ़ना।”
“क्यों?”
“क्योंकि ज़्यादा सीढ़ियों का मतलब है कि तू उसी जगह से नहीं चढ़ रहा जहाँ से उतरा था,” उन्होंने कहा।
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
“ये तुम्हें किसने बताया?”
“बंसीलाल ने,” उन्होंने कहा। “उसने बहुत बातें बताई थीं उस रात। मैंने सुनी थीं, पर समझा नहीं था। अब समझ आ रहा है।”
फिर उन्होंने एक और बात कही, बहुत धीरे, जैसे वो बात कहने के लिए उन्हें अपने अंदर से कुछ खींचना पड़ा हो।
“दरवाज़ा अगर खुद बंद होने लगे,” उन्होंने कहा, “तो चाबी अंदर से आधी घुमा देना। पूरी मत घुमाना। आधी घुमाने से दरवाज़ा न बंद होगा, न खुलेगा। वो अटका रहेगा। और अटका हुआ दरवाज़ा सबसे ज़्यादा सुनता है।”
“क्या मतलब?”
“मतलब ये कि जब तू सुन नहीं पा रहा हो, तब दरवाज़ा सुनता है,” उन्होंने कहा। “ये मेरी समझ है। तेरा क्या, तेरी समझ क्या कहती है, वो तू जाने।”
मैं हँसा। हँसी फटी हुई निकली।
“तुम्हारी समझ से बुरी नहीं होगी,” मैंने कहा।
“चल,” उन्होंने कहा। “तेरे पीछे टिंकू खड़ा है, वो तीन बार जूता पटक चुका है।”
मैंने मुड़कर देखा। टिंकू दरवाज़े पर खड़ा था, हाथ में मेरी माँ का गुलाबी दुपट्टा और सिर पर काला एक काँच वाला चश्मा। उसने देखा कि मैंने उसे देख लिया, तो सीधा खड़ा हो गया।
“उस्ताद,” उसने कहा, “मीरा दीदी कह रही थीं कि रज़ा सलीम दस बजे पीपल पर आएगा।”
“जानता हूँ,” मैंने कहा।
“और काजल दीदी अस्पताल से आई हैं,” उसने कहा। “वो रो रही हैं। नहीं, रो नहीं रही। बस आँखें भरी हुई हैं।”
मैं उठा।
काजल आँगन के बाहर खड़ी थी, हाथ में प्लास्टिक की थैली। उसमें दवा के दो पत्ते थे, और कुछ नहीं।
“खत्म?” मैंने पूछा।
“दो पत्ते बचे हैं,” उसने कहा। “डॉक्टर इसरानी कह रहे हैं कि नई खेप रुकी है। काग़ज़ साफ़ न हो तो दवा नहीं आएगी। माँ को कल सुबह की खुराक चाहिए।”
“कल सुबह तक काग़ज़ साफ़ होगा,” मैंने कहा।
“कैसे?”
“पता नहीं,” मैंने कहा। “पर होगा।”
काजल ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वही डर था जो पहली बार अस्पताल में माँ को भर्ती करते वक़्त था। फिर उसने अपना डर पीछे धकेला और आवाज़ सख़्त की।
“अगर तुम आज रात नहीं लौटे,” उसने कहा, “तो मैं उस कमरे में खुद जाऊँगी। और मेरे पास कोई चाबी नहीं होगी। मैं दरवाज़ा तोड़ दूँगी।”
“तोड़ने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी,” मैंने कहा।
“मैं मज़ाक नहीं कर रही।”
“मैं भी नहीं,” मैंने कहा। “काजल, तू माँ के पास रह। बस यही एक काम तेरा है। और वो सबसे बड़ा काम है।”
उसने सिर हिलाया। फिर मेरी कमीज़ पकड़ी और खींची, जैसे बचपन में करती थी।
“तुम बदल गए हो,” उसने कहा।
“अच्छे के लिए?”
“पता नहीं,” उसने कहा। “पहले तुम सबसे झगड़ते थे। अब सबको साथ लेकर चलते हो। मुझे डर लगता है कि तुम खुद कहीं पीछे न छूट जाओ।”
मैं हँसा। इस बार हँसी ठीक निकली।
“मैं अंकुश हूँ,” मैंने कहा। “मैं पीछे नहीं छूटता। मैं तो वो हूँ जो दूसरों को खींचकर बाहर लाता है।”
“हाँ,” उसने कहा। “और खुद कभी बाहर नहीं आता।”
वो अंदर चली गई।
मैं कुछ देर वहीं खड़ा रहा। आँगन में पापा ने औज़ारदान उठाया और दीवार से टिका दिया। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, फिर अपनी कमीज़ की जेब से ज़ंग लगी चाबी निकाली, उसे देखा, और वापस जेब में डाल दी।
मैंने पीछे मुड़कर पैर बढ़ाए।
पीपल पर रज़ा सलीम ठीक दस बजे आया। न ठीक दस बजे — दस बजकर कुछ मिनट पर, जैसे वो घड़ी से नहीं, अपने मन से चलता हो। उसके हाथ में लाल कपड़े में लिपटा मोटा रजिस्टर था। उसके पीछे वही काला दुबला आदमी खड़ा था, हाथ पीछे बाँधे।
रज़ा ने रजिस्टर चबूतरी पर रखा और बिना कुछ कहे पन्ने पलटने लगा।
“सातवाँ नाम,” उसने कहा और उँगली रख दी।
जगदीश यादव। मेरे दादा का नाम, नीली स्याही में, टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में। नाम के नीचे बराबर हिस्सा लिखा था, और उसके नीचे एक अंगूठा — धुँधला, फीका, पर असली।
“ये अंगूठा झूठा नहीं है,” रज़ा ने कहा। “ये मजबूरी का है। सात अंगूठों में सिर्फ़ यही एक ऐसा है जो झूठा साबित नहीं हुआ।”
“क्यों?”
“क्योंकि इसे लगाने वाले ने बाद में इसे मिटाने की कोशिश नहीं की,” उसने कहा। “झूठा अंगूठा लगाने वाला हमेशा मिटाने की कोशिश करता है। सच्चा अंगूठा लगाने वाला चुप बैठ जाता है। तुम्हारे दादा चुप बैठ गए।”
मैंने रजिस्टर को छुआ। काग़ज़ पुराना था, पर उसकी गंध नई थी — जैसे अभी किसी अलमारी से निकाला गया हो।
“और कटा पन्ना?” मीरा ने पूछा, जो मेरे पीछे आ गई थी।
रज़ा ने जेब से एक मोड़ा काग़ज़ निकाला, उसे हवा में पकड़ा, और वापस जेब में रख दिया।
“ये पन्ना मेरे पास है,” उसने कहा। “और ये तभी तुम्हारे हाथ में आएगा जब घंटी का लोहे का टुकड़ा मेरे हाथ में आएगा।”
“नहीं,” मैंने कहा।
“सोच लो,” उसने कहा। “यही पन्ना बताएगा कि ज़मीन किसकी है और किसने उसे बेचा।”
“घंटी का टुकड़ा नहीं दूँगा,” मैंने कहा।
“क्यों?”
“क्योंकि घंटी मेरी नहीं है,” मैंने कहा। “वो उस आदमी की है जिसने इसे पचास साल संभाला और मुझे दिया। मैं उसका हिस्सा किसी को नहीं बेचता।”
रज़ा मुस्कुराया। उसकी मुस्कान में कोई गुस्सा नहीं था, कोई धमकी नहीं थी। सिर्फ़ एक पुरानी थकान थी, जैसे वो बरसों से इसी जवाब का इंतज़ार कर रहा हो।
“तो फिर पन्ना तुम्हारे पास नहीं आएगा,” उसने कहा। “पर एक बात सुन लो। जिस दिन तुम्हें लगे कि तुम सब कुछ खो रहे हो, उस दिन मेरे पास आना। मैं तुमसे कुछ नहीं माँगूँगा।”
वो रजिस्टर उठाकर चला गया।
टिंकू ने उसके जाने के बाद कहा, “उस्ताद, ये आदमी अच्छा है या बुरा?”
“पता नहीं,” मैंने कहा। “पर ये ज़रूर है कि ये झूठ नहीं बोलता। और झूठ न बोलने वाला आदमी अच्छा न हो, तो और भी खतरनाक होता है।”
अब दोपहर से पहले सब अस्पताल के पिछले दरवाज़े पर जमा होने लगे।
वो जगह मैंने पहली बार इतनी साफ़ देखी। पीछे की दीवार पीली थी, पर उस पर बरसों की धूल और बरसात की लकीरें ऐसी जमी थीं कि दीवार किसी पुराने नक्शे जैसी लगती थी। दीवार के साथ सूखी नाली चलती थी, जिसमें अब पानी नहीं, सिर्फ़ सूखे पत्ते और किसी की फेंकी हुई चप्पल पड़ी थी। और उसी दीवार के आख़िर में लोहे का फाटक था — काला, ज़ंग लगा, जिसका ऊपरी कब्ज़ा टूटा था और नीचे का कब्ज़ा पूरा झुका हुआ।
बंसीलाल की चारपाई उसी फाटक के पास पड़ी थी।
उन्होंने आज सुबह नहाने के बाद साफ़ कुर्ता पहना था। यह मैंने पहली बार देखा। उनकी दाढ़ी कटी हुई थी, बाल कंघी किए हुए, और हाथ में वही काली चाबी थी — दोनों हाथों से पकड़ी हुई, जैसे कोई चिड़िया पकड़ी हो और छूट जाने का डर हो।
“आ गए,” उन्होंने कहा।
“आ गए,” मैंने कहा।
“सब आ गए?”
“लगभग,” मैंने कहा। “उस्ताद गुमटी पर हैं। शबनम आपा ने चूल्हा बंद रखा है। रज़िया भी वहीं है। हबीब चाचा रास्ते में हैं। बबलू—”
“वो कहाँ है?”
“वहीं खड़ा है,” मैंने कहा और सिर से इशारा किया।
बबलू पांडे नीम के पेड़ के नीचे खड़ा था। उसकी सोने की चेन गायब थी, पानदान गायब था, और उसके दाहिने हाथ पर सफ़ेद रूमाल बँधा था। वो अपनी जेब बार-बार टटोल रहा था, जैसे कुछ खोज रहा हो जो वहाँ नहीं है।
बंसीलाल ने चाबी आगे बढ़ाई। मेरी तरफ़।
फिर वापस खींच ली।
फिर आगे बढ़ाई।
“बाबा,” मैंने कहा, “दे दीजिए।”
“एक बात कहूँ?” उन्होंने कहा।
“कहिए।”
“दरवाज़ा अंदर जाते ही बंद मत करना,” उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ काँप रही थी, पर वो काँपते हुए भी साफ़ बोल रहे थे। “उस कमरे में हवा नहीं चलती। आवाज़ चलती है। दरवाज़ा बंद हुआ तो आवाज़ भी बंद। और जिस कमरे में आवाज़ बंद हो जाए, वहाँ इंसान कुछ देर में अपनी आवाज़ भी भूल जाता है।”
“हम दरवाज़ा खुला रखेंगे,” मीरा ने कहा।
“और एक बात,” उन्होंने कहा। “जो भी अंदर जाए, वो अपना नाम ज़ोर से बोले। पूरा नाम। दीवार को नाम सुनना पड़ता है। तभी वो रास्ता देती है।”
“नाम?” टिंकू ने कहा। “मेरा नाम भी?”
“तेरा भी,” बंसीलाल ने कहा। “और तू मेरे पास रहेगा। सीढ़ी पर। मैं तेरा हाथ पकड़कर रखूँगा।”
“मैं अंदर जाऊँगा!” टिंकू ने कहा।
“तू सीढ़ी पर रहेगा,” मैंने कहा।
“उस्ताद—”
“टिंकू,” मैंने कहा, “ये सीढ़ी का काम सबसे ज़रूरी है। अगर दरवाज़ा बंद होने लगे, तो तू बाहर से आवाज़ देगा। तेरी आवाज़ वहाँ तक पहुँचेगी, इसीलिए मैं तुझे बाहर रख रहा हूँ।”
उसने मुँह बनाया। फिर मान गया। फिर उसने अपनी जेब से माचिस की डिब्बी निकाली और उस पर कुछ लिखा।
“क्या लिख रहा है?” मैंने पूछा।
“आज की तारीख़,” उसने कहा। “और वक़्त। ताकि बाद में कोई झूठ न बोले।”
मुझे हँसी आई। फिर हँसी रुक गई।
क्योंकि मैंने फाटक के पास ज़मीन पर कुछ देखा।
पीला हेलमेट।
वही हेलमेट, जो कल हमें नीम के नीचे मिला था और जिसे हमने बंसीलाल की चारपाई के नीचे रख दिया था। वो अब ठीक दरवाज़े के सामने रखा था। सीधा, टिकाकर। ऊपर से साफ़, धूल पोंछी हुई। जैसे किसी ने उसे उठाया हो, साफ़ किया हो, और फिर जान-बूझकर वहीं रख दिया हो।
“बाबा,” मैंने कहा, “आपने इसे यहाँ रखा?”
“मैंने चारपाई के नीचे रखा था,” उन्होंने कहा। “सुबह उठा तो ये यहाँ पड़ा था। मैंने सोचा कि हवा से आ गया होगा। पर हवा से सीधा खड़ा कौन होता है?”
मैंने हेलमेट उठाया।
उसका वज़न वही था। ऊपर टेप से बँधी दरार वही थी। अंदर कपड़े की परत वही थी।
और उस परत के नीचे, वही फटा नक़्शा।
मेरा हाथ रुक गया।
“मीरा,” मैंने कहा, “नक़्शा तेरे बैग में था ना?”
उसने अपना बैग खोला। पलटा। फिर से पलटा। उसका चेहरा बदल गया।
“था,” उसने कहा।
“अब?”
“नहीं है।”
मैंने नक़्शा खोला। वही फटा कोना, वही आधा नक़्शा — पर अब उस पर कुछ नया था। नीचे वाले हिस्से में, जहाँ कमरे की लाइन बनी थी, उस जगह पर गोल घेरा बना था और अंदर लिखा था — काला कमरा।
अक्षर पेंसिल के थे। छोटे, तेज़, झुके हुए। जैसे किसी ने लिखते वक़्त हाथ नहीं रोका हो।
“ये इमरान की लिखाई नहीं है,” मीरा ने कहा।
“तुझे कैसे पता?”
“इमरान ने नक़्शा उतारा था,” उसने कहा। “उसके अक्षर सीधे और बड़े हैं। ये अक्षर किसी और के हैं।”
मीरा ने नक़्शे का किनारा पकड़ा और उसे धूप की तरफ़ किया।
“और ये देखो,” उसने कहा।
किनारे पर, बहुत छोटे, पेंसिल में एक तारीख़ लिखी थी। नीचे एक छोटा धागा-सा निशान भी था।
“रविवार,” मीरा ने कहा।
मैंने उसे देखा।
“आज क्या दिन है?” मैंने पूछा।
“शुक्रवार,” टिंकू ने कहा।
“तो रविवार कब है?”
“परसों,” उसने कहा।
“और रविवार को क्या है?” मीरा ने कहा।
मैं चुप हो गया।
रविवार। वही दिन जिस दिन रणवीर भारद्वाज की बड़ी सभा है। वही दिन जिस दिन वो अपने सारे काग़ज़ खोलकर शहर को दिखाएगा। वही दिन जिस दिन लोगों को डरना चाहिए।
तो ये कमरा उसी दिन के लिए तैयार किया जा रहा है।
मेरे पीछे घुटनों के टकराने की आवाज़ आई।
हबीब चाचा आए थे। उनके हाथ में वही हरी गाँठ वाला रूमाल था, जो उन्होंने इमरान को दिया था। पर इमरान के पास नहीं, उनके पास था। मतलब इमरान ने उसे वापस भेज दिया? या किसी ने वापस लाकर रख दिया?
उन्होंने हेलमेट देखा।
फिर नक़्शा देखा।
फिर वो घुटनों पर बैठ गए।
“मैंने इसे फिर खो दिया,” उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ रुँध गई। “पहली बार तब खोया जब मैंने उसकी सात चिट्ठियाँ नहीं खोलीं। और अब दूसरी बार।”
“चाचा,” मैंने कहा, “उठिए।”
“मैं उस दिन उसके पास बैठा था,” उन्होंने कहा, “जब वो पाँच साल का था और उसने मेरी पहली चाय बनाई थी। उसने चीनी नहीं डाली थी। मैंने कहा था — चीनी नहीं डाली। और वो रो पड़ा था।”
उनके हाथ काँप रहे थे।
मैंने उनके दोनों हाथ पकड़े और उन्हें उठाया। मेरी पीठ में खिंचाव आया, पर मैंने उन्हें उठा ही लिया। उनका वज़न पहले से कम लगा — जैसे डर आदमी का वज़न भी खा जाता है।
“चाचा, सुनिए,” मैंने कहा। “इमरान अभी ज़िंदा है।”
“तुम्हें कैसे पता?”
“क्योंकि उसने फोन किया,” मैंने कहा। “मरा हुआ आदमी फोन नहीं करता। उसने सिर्फ़ दो शब्द कहे — काला। और लाइन काट दी। मरा हुआ आदमी फोन नहीं काटता। वो सिर्फ़ चुप हो जाता है।”
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
“और ये हेलमेट?” उन्होंने कहा। “ये किसने लौटाया?”
“जिसने इसे कल लिया था,” मैंने कहा। “वो हमें डरा रहा है। वो चाहता है कि हम डरकर पीछे हट जाएँ। पर एक बात वो भूल गया।”
“क्या?”
“जो आदमी डराने के लिए चीज़ें लौटाता है,” मैंने कहा, “वो खुद डरा हुआ है। क्योंकि अगर उसे डर न होता, तो वो कुछ लौटाता ही नहीं।”
हबीब चाचा ने मेरी बात सुनी। फिर उन्होंने अपनी आँखें पोंछीं और सीधे खड़े हो गए।
“मैं फाटक पर रहूँगा,” उन्होंने कहा। “जब मेरा बेटा बाहर आएगा, तो पहले मैं उसके मुँह पर थप्पड़ मारूँगा। फिर गले लगाऊँगा। फिर सात चिट्ठियाँ न पढ़ने की माफ़ी माँगूँगा।”
“पहले थप्पड़?” टिंकू ने कहा।
“पहले थप्पड़,” उन्होंने कहा। “क्योंकि वो मेरा बेटा है। और बेटे को थप्पड़ भी बाप ही मारता है।”
उस्ताद ठीक उसी वक़्त आए। उनके गले में एक छोटी सीटी लटकी थी, जो उन्होंने किसी पुराने धागे से बाँधी थी। उनके हाथ में कैंची थी — वही कैंची, जो सुबह मुझे उनकी दुकान में नहीं दिखी थी।
“ये?” मैंने कहा।
“ये मेरी है,” उन्होंने कहा। “कल कोई मेरी दुकान से ले गया था और आज सुबह वापस रख गया।”
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
“कुछ और गया?” मैंने पूछा।
“नहीं,” उन्होंने कहा। “पर एक चीज़ आई है।”
“क्या?”
“मेरी मशीन के नीचे एक पर्ची थी,” उन्होंने कहा। “छोटी सी। उसमें सिर्फ़ एक लाइन थी।”
“क्या लिखा था?”
“लिखा था — जो नीचे जाएगा, वो ऊपर नहीं आएगा।”
वो चुप हो गए। फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वही चीज़ थी जो पचास साल पुरानी थी — एक आदमी जिसने पहले भी एक दरवाज़ा खोला था और फिर कभी उसे बंद नहीं कर पाया।
“अंकुश,” उन्होंने कहा, “अब भी वक़्त है।”
“नहीं है,” मैंने कहा।
“तू सोच ले।”
“उस्ताद,” मैंने कहा, “अगर हम आज नहीं गए, तो परसों रणवीर वो कमरा खुद खोलेगा। और उस वक़्त हमें न चाबी होगी, न दरवाज़ा, न इमरान।”
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। फिर सीटी को हाथ में लिया और उसे बजाया — हल्की सी, जैसे किसी चिड़िया को बुला रहे हों।
“एक सीटी — रुको,” उन्होंने कहा। “दो सीटी — भागो। तीन सीटी — मैं खुद आऊँगा।”
“और अगर चार बजे?” टिंकू ने कहा।
“चार नहीं होगी,” उन्होंने कहा। “मैं सिर्फ़ तीन बजाऊँगा। उसके बाद सीटी बजाने वाला कोई नहीं होगा।”
शबनम आपा गुमटी से नहीं आईं। पर रज़िया आई। उसके हाथ में स्टील का गिलास था, जिसमें पानी था।
“चाचा,” उसने कहा और हबीब चाचा की तरफ़ बढ़ाया।
उन्होंने पानी पिया। फिर उसने गिलास वापस लिया और मेरी तरफ़ देखा।
“मैं पंद्रह साल बाहर रही हूँ,” उसने कहा। “मुझे पता है इंतज़ार क्या होता है। इंतज़ार सबसे ज़्यादा थकाता है। लड़ाई नहीं।”
“आप अंदर नहीं जाएँगी,” मैंने कहा।
“मैं नहीं जाऊँगी,” उसने कहा। “मैं गुमटी पर रहूँगी। और अगर सीटी बजी, तो मैं पहले उस चूल्हे को जलाऊँगी, फिर देखूँगी क्या होता है।”
मैं हँसा।
“यही ठीक है,” मैंने कहा।
बबलू पांडे नीम के नीचे से आया। उसने अपना सफ़ेद रूमाल खोला और मेरी तरफ़ बढ़ाया।
“इसके अंदर देखो,” उसने कहा।
मैंने रूमाल खोला। अंदर कोई चीज़ नहीं थी।
“क्या देखूँ?” मैंने कहा।
“इसके अंदर कुछ था,” उसने कहा। “एक छोटी पर्ची। और अब नहीं है।”
“क्या लिखा था?”
“मैं नहीं पढ़ सका,” उसने कहा। “पर उस पर लिखा था — अब घंटी किसके पास रहेगी।”
वो रुका। फिरबबलू ने अपनी जेब टटोली, जैसे वो पर्ची वहाँ से भी गायब हो गई हो।
"मैंने इसे दस मिनट पहले ही तो देखा था," उसने कहा। उसकी आवाज़ में वो ढीठपन नहीं था जो थाने के सामने हुआ करता था। "मैं सुबह से इसी रूमाल में बाँधे घूम रहा था। किसी को पता ही नहीं था कि इसमें क्या है।"
"किसी को पता था," मीरा ने कहा। उसने अपना कैमरा अभी भी नीचे किया हुआ था। "क्योंकि जिसने ये पर्ची रखी थी, उसे ये भी पता था कि तुम इसे कब खोलोगे।"
बबलू ने मेरी तरफ़ देखा।
"मैं जानता हूँ तुम सोच रहे हो कि मैंने खुद निकालकर कहीं और रख दी," वो बोला। "पर मैंने नहीं की। मैंने तुम्हें सच बताया था। मैं अब भी सच बोल रहा हूँ।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके हाथ काँप रहे थे। और उसका दाहिना हाथ, जिस पर सफ़ेद रूमाल बँधा था, वो रूमाल अब भी सूखा रहा होगा — पर उसके नीचे कुछ और था, जो मुझे दिख रहा था।
"अपना रूमाल खोलो," मैंने कहा।
"क्यों?"
"खोलो।"
उसने धीरे से गाँठ खोली। रूमाल के नीचे उसकी हथेली पर एक जगह लाल थी, जैसे किसी ने ज़ोर से दबाया हो।
"यह क्या है?" टिंकू ने पूछा।
"जब मैं सो रहा था," बबलू ने कहा, "तब किसी ने मेरा हाथ पकड़कर मेरे ही रूमाल में पर्ची बाँध दी। मुझे पता भी नहीं चला। उठा तो पर्ची को महसूस किया, और जैसे ही तुम लोगों को दिखाने के लिए खोला — वो अंदर नहीं थी।"
वो रुका।
"जैसे वो पर्ची खुद को देखने पर मर जाती है," उसने कहा। "जैसे वो चाहती थी कि तुम्हें पता चले — पर तुम्हारे हाथ में कुछ न आए।"
मेरी जेब में घंटी फिर हिली। एक हल्की सी, पतली आवाज़ — जैसे दूर से कोई साया बुला रहा हो।
मैंने चारों तरफ़ देखा। फाटक पर सिर्फ़ नीम का पेड़ था, सूखी नाली थी, और दूर अस्पताल की पीली दीवार। और उस दीवार के पास, धूल में, मुझे वो चीज़ दिखी जो अभी पाँच मिनट पहले वहाँ नहीं थी।
इमरान का पीला हेलमेट।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने भी देखा था। उसने कैमरा उठाया, एक फ्रेम लिया, फिर मेरी तरफ़ देखा — बिना कुछ कहे। मैंने सिर हिलाया। वो जानती थी कि मुझे क्या कहना है।
मैं दौड़कर उस हेलमेट के पास पहुँचा। टिंकू मेरे पीछे आया। हबीब चाचा ने धीरे से पुकारा — "इमरान?" — जैसे उनके मुँह से अपने आप निकल गया हो।
हेलमेट धूल में पड़ा था। ऊपर से फटा हुआ। टेप उसका जगह-जगह से उखड़ा हुआ। और वो धूल में इस तरह रखा था, जैसे किसी ने जान-बूझकर उसे सीधा करके नहीं, बल्कि हल्का सा तिरछा रखा हो।
मैंने उसे उठाया।
"अंकुश," मीरा ने कहा, "पाँच मिनट पहले ये यहाँ नहीं था।"
"मैं जानता हूँ," मैंने कहा।
"फिर किसने—"
"जिसने बबलू के रूमाल में पर्ची रखी," मैंने कहा। "उसी ने इसे यहाँ रखा। जान-बूझकर। हमें दिखाने के लिए।"
मैंने हेलमेट के अंदर देखा। उसके अंदर का कपड़ा अलग करके मैंने उसी जगह हाथ डाला जहाँ से पहले नक़्शा मिला था।
इस बार भी कुछ था।
मैंने उसे बाहर निकाला। काग़ज़ का एक टुकड़ा — वो पहला फटा कोना, जो कल मिला था। पर इस बार उसके ऊपर कुछ और था। किसी ने उसी टुकड़े पर पेंसिल से एक छोटा सा कमरा बनाया था — चौकोर, दो लाइनें, एक-दो सीढ़ियाँ — और उसके ऊपर मोटे अक्षरों में लिख दिया था —
"काला कमरा"।
और उसके चारों तरफ़ पेंसिल से एक गोल घेरा खींचा हुआ था।
"ये क्या है?" टिंकू ने मेरे कंधे के ऊपर से झाँककर कहा।
"किसी ने हमें रास्ता दिखाया है," मैंने कहा।
"रास्ता या जाल?" हबीब चाचा ने कहा। उनकी आवाज़ फटी हुई थी। "यही तो वो कमरा है जिसमें इमरान को बंद किया जा रहा है।"
"देखिए," मीरा ने कहा।
उसने अपनी उँगली नक़्शे के दाहिने कोने पर रखी। वहाँ पेंसिल से एक छोटी सी तारीख़ लिखी थी। हाल्की, मिटी-मिटी। जैसे किसी ने जल्दी में लिखी हो।
"ये तारीख़?" टिंकू ने कहा।
"रविवार," मीरा ने धीमे से कहा।
कुछ देर कोई नहीं बोला।
वो रविवार — वही रविवार जो इसी हफ़्ते आने वाला था। और वही रविवार जिस दिन रणवीर भारद्वाज ने मेले के मैदान में ज़मीन के दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर कराने की सभा रखी थी।
"तो मतलब," बबलू ने धीरे से कहा, "अब तक तो बोला जा रहा था कि कमरा शाम को खुलेगा। रविवार — होली का दिन — ताला खुलेगा।"
"हाँ," मीरा ने कहा। "और मतलब यह भी है कि अब हमारे पास सिर्फ़ पाँच दिन हैं। उससे ज़्यादा नहीं।"
हबीब चाचा फाटक के पास खड़े थे। उनके हाथ जोड़े हुए थे। मैंने देखा — उनकी नज़र उस काग़ज़ पर थी जो मेरे हाथ में था।
और फिर वो घुटनों पर बैठ गए।
"चाचा—" मैंने कहा।
"मैंने फिर से खो दिया," वो बोले।
उनकी आवाज़ टूट गई। वो धूल भरी ज़मीन पर घुटनों पर बैठे थे, और उनके हाथ दोनों तरफ़ फैले थे, जैसे कुछ ढूँढ रहे हों जो कभी था ही नहीं।
"चाचा, उठिए," मैंने कहा और उनकी तरफ़ हाथ बढ़ाया।
"मैं नहीं उठूँगा," वो बोले। "मैंने उसे शहर जाने से नहीं रोका। मैंने उसे सात चिट्ठियाँ लिखने दीं, और एक भी नहीं पढ़ी। मैंने उसे अपने ही आँगन में अपने ही हाथ से पानी भरने से रोका। और अब वो उस कमरे में है जहाँ मेरे जैसा कोई नहीं पहुँच सकता।"
मैं उनके पास बैठ गया। मेरे घुटने उनके घुटनों के सामने थे।
"चाचा, वो ज़िंदा है," मैंने कहा। "मैं जानता हूँ आपको यक़ीन नहीं हो रहा। पर जो मर जाता है, उसका मुँह बंद हो जाता है। इमरान का नहीं हुआ। उसने फोन किया। उसने एक शब्द कहा। और एक शब्द कहने वाला इंसान अभी यहीं है, इस शहर में, इस दीवार के पीछे। और जो ज़िंदा है, उसे ढूँढना हमारा काम है।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"अगर वो ज़िंदा है," उन्होंने कहा, "तो मैं पहले उसे थप्पड़ मारूँगा।"
"मारिए," मैंने कहा।
"फिर गले लगाऊँगा।"
"लगाइए।"
"और फिर उसे अपनी सातों चिट्ठियाँ पढ़कर सुनाऊँगा," वो बोले। "और बताऊँगा कि मैंने उन्हें क्यों नहीं छुआ।"
मैंने हाथ बढ़ाया। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। मैंने उन्हें उठाया। वो खड़े हो गए। उनके घुटनों पर धूल थी। मैंने अपनी जेब से रूमाल निकाला और उनकी तरफ़ बढ़ाया।
"नहीं," उन्होंने कहा। "धूल रहने दो। जब तक ये धूल नहीं जाती, तब तक मैं जानता रहूँगा कि मेरा बेटा अंदर है।"
तभी मेरी जेब में घंटी बजी। एक बार। पतली, फीकी। पर इस बार उसमें वो गूँज नहीं थी जो आम तौर पर होती थी। इस बार वो ऐसी बजी, जैसे कोई दूर से बुला रहा हो — कोई ऐसा जो पास नहीं, पर दूर भी नहीं।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"क्या कहा?" उसने पूछा।
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "अभी कुछ नहीं।"
"घंटी ने कुछ कहा?"
"उसने कहा," मैंने धीमे से कहा, "कि अंदर मुझे जो मिलेगा, वो वो नहीं होगा जो मैं ढूँढ रहा हूँ।"
"ये उसने नहीं कहा," मीरा ने कहा। "ये तुमने खुद कहा।"
"तुम्हें कैसे पता?"
"क्योंकि जब घंटी कुछ कहती है," उसने कहा, "तो तुम्हारा चेहरा बदल जाता है। जब तुम खुद कहते हो, तो तुम्हारी आँखें।"
मैं हँसा।
"तुम पत्रकार हो," मैंने कहा। "तुम्हें सब दिखता है।"
"यही मेरा काम है," उसने कहा।
बंसीलाल उस वक़्त तक हमारे पीछे खड़े थे। मैंने देखा वो अपनी कमर से कुछ निकाल रहे थे। एक काली चाबी — वही जो उन्होंने कल दी थी। पर उन्होंने उसे वापस अपनी जेब में रख लिया था। अब वो उसे फिर से मेरी तरफ़ बढ़ा रहे थे।
"ये लो," उन्होंने कहा। "पर सुनो।"
"बोलिए।"
"अंदर जाते ही दरवाज़ा बंद मत करना," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ काँप रही थी। "बत्तीस साल पहले मैंने एक बार इस कमरे का दरवाज़ा पीछे से बंद किया था — एक आदमी के कहने पर। उस आदमी ने कहा था कि अंदर कुछ ज़रूरी रखा है, कोई न देखे। और उसके बाद से मैं उस दरवाज़े को खुद नहीं खोल पाया। आज तुम खोल रहे हो। पर खुला रहने दो। खुला रखने से अंदर हवा आती है। और जहाँ हवा आती है, वहाँ आदमी ज़िंदा रहता है।"
मैंने चाबी ली।
"मैं ये याद रखूँगा," मैंने कहा।
"नहीं," उन्होंने कहा। "याद मत रखो। बस दरवाज़ा बंद मत करना।"
मैंने चाबी को अपनी हथेली में रखा। पर फिर मैंने मुड़कर देखा।
पीपल के नीचे से टिंकू आ रहा था, उसके हाथ में एक लंबी सी चीज़ थी। जब वो पास आया तो देखा — वो एक लकड़ी का लंबा डंडा था, जिसके ऊपर एक छोटी सी पीतल की बाल्टी टँगी थी।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
"माइक," उसने कहा, बड़े गर्व से।
"ये माइक नहीं, बाल्टी है," मीरा ने कहा।
"अंकुश भैया ने कहा था ना," टिंकू ने कहा, "कि जो अंदर जाए, उसकी आवाज़ बाहर सुननी चाहिए। तो मैंने सोचा — ये बाल्टी से बोलेंगे तो आवाज़ दूर तक जाएगी।"
मैं हँसा। पहली बार उस सुबह मैं सच में हँसा था।
"ठीक है," मैंने कहा। "बाल्टी रख टिंकू। तू मेरे साथ अंदर आ रहा है। अगर मुझे कुछ हो जाए तो तू बाहर आकर उस्ताद को सीटी दे। और अगर तू न आ पाए, तो बाल्टी को पत्थर मारकर बजाना।"
"पर भैया—"
"बाल्टी ही सही," मैंने कहा। "माइक से बेहतर है।"
मीरा ने देखा।
"अंकुश," उसने कहा, "मैं चाहती हूँ कि तुम एक बात मानो।"
"क्या?"
"जब हम अंदर जाएँ," उसने कहा, "तो जो भी मिले — साँप, खज़ाना, आदमी, आवाज़ — तुम मेरी तरफ़ देखकर पहले मेरा हाथ थामना। पहले मुझे बताना। क्योंकि अगर तुम अकेले दौड़ोगे, तो मैं तुम्हारे पीछे नहीं आऊँगी।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"क्यों?"
"क्योंकि तुम्हारे पीछे दौड़ने वाले बहुत हैं," उसने कहा। "टिंकू, बच्चे, चाचा, बबलू। मैं उनमें नहीं हूँ। मैं तुम्हारे साथ चलने वाली हूँ। और साथ चलने वाले एक-दूसरे का हाथ पहले थामते हैं, पीछे नहीं देखते।"
मैंने मुस्कुराकर सिर हिला दिया।
"ठीक है," मैंने कहा।
हबीब चाचा ने अपना हाथ बढ़ाया और मेरी तरफ़ देखा। मैंने उन्हें अपनी कलाई दी। उन्होंने उसे कसकर थामा।
"मैं यहीं रहूँगा," उन्होंने कहा। "फाटक पर। और जब तक मेरा बेटा बाहर नहीं आता, मैं अपनी जगह से हिलूँगा नहीं।"
"चाचा," मैंने कहा, "अगर आपको कोई और आता दिखे — जो अंदर जाने की कोशिश करे — तो—"
"तो मैं उसका नाम पूछूँगा," उन्होंने कहा। "और अगर वो नाम न बताए, तो मैं अपनी लाठी उठाऊँगा।"
"आपकी लाठी?"
"मेरी लाठी नहीं," उन्होंने कहा। "इमरान की साइकिल का हैंडल। मैंने उसे आज सुबह आँगन से उठा लिया था। दोनों सिरों पर रबर की ग्रिप है। सत्तर साल के बूढ़े के हाथ में वो लाठी से कम नहीं लगता।"
मैं हँसा और उनकी तरफ़ देखा।
फिर मैंने बबलू की तरफ़ देखा। वो अब भी मेरी तरफ़ देख रहा था, अपने हाथ की लाल जगह को रगड़ते हुए।
"बबलू," मैंने कहा, "तू बाहर रहेगा।"
"मैं बाहर रहूँगा," उसने कहा। "मैं अपने हाथ पर क़सम खाता हूँ। आज जो मेरे हाथ पर लिखा हुआ जा रहा है — वो तेरा नाम है, अंकुश। मैं इसे मिटाऊँगा नहीं।"
वो मेरी तरफ़ आया और उसने अपना हाथ बढ़ाया।
मैंने उसका हाथ थामा। उसका हाथ ठंडा था। पर काँप नहीं रहा था।
"बबलू," मैंने धीरे से कहा, "एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"तूने मुझे कल रात गुमटी के पीछे फोन पर साहब से कहते सुना," मैंने कहा। "तूने कहा कि वो नक़्शा लेने गया है। उस वक़्त तुझे क्या लग रहा था? तेरा दिल क्या कह रहा था?"
वो रुका।
"मैं तेरा दुश्मन हूँ," उसने कहा। "मैं तेरे दुश्मन की तरफ़ से आया था। पर कल रात जब मैंने वो फोन किया, तो कहते वक़्त मेरा हाथ काँप रहा था। क्योंकि मुझे पता था — इमरान उस कमरे में अकेला है और उसकी माँ घर पर उसका खाना गरम रखे बैठी है। और मैं ये बात साहब को बता रहा हूँ, जो उसे कभी बाहर नहीं आने देगा।"
वो रुका।
"उस वक़्त मुझे लगा," उसने कहा, "कि मैंने अपनी ज़िंदगी में पहली बार किसी को इंसान की तरह देखा — और खुद को जानवर की तरह।"
मैंने उसका हाथ दबाया।
"आज बाहर रह," मैंने कहा। "अगर कोई आए जो तुझे पहचानता हो, तो उससे बात कर। अगर तेरे पास कोई नाम हो जो अंदर जाने की कोशिश करे, तो याद रखना। और अगर मैं बाहर आऊँ, तो तेरी उस रात की बात पर हम बैठकर एक चाय पिएँगे।"
वो हँसा। उसकी हँसी में पान की गंध नहीं थी, क्योंकि उसने सुबह से पान नहीं चबाया था।
"ठीक है," उसने कहा।
फिर मैंने उस्ताद को फोन मिलाया। उन्होंने दूसरी रिंग पर उठाया।
"उस्ताद," मैंने कहा, "हम तैयार हैं।"
"सीटी याद है?" उन्होंने पूछा।
"एक रुको, दो भागो, तीन आओ," मैंने कहा।
"और चार?"
"चार नहीं होगी," मैंने कहा।
वो हँसे। उनकी हँसी फोन पर भी सूखी सी लगी।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "एक आख़िरी बात — अंदर जाते वक़्त, और बाहर आते वक़्त, अपना नाम याद रखना। पूरा नाम।"
"क्यों?"
"क्योंकि उस कमरे में," उन्होंने कहा, "नाम सबसे पहले जाता है। आवाज़ के बाद। और जो अपना नाम भूल जाए, वो बाहर आ भी गया तो वो वो नहीं होगा जो गया था।"
"ठीक है," मैंने कहा।
मैंने फोन रखा।
मीरा ने अपना कैमरा उतारकर बैग में रखा। उसने अपनी कलाई पर एक घड़ी बाँधी, जो मैंने पहले नहीं देखी थी। वो टूटी हुई थी। सुइयाँ हिल नहीं रही थीं।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
"मेरे पापा की घड़ी," उसने कहा। "उन्होंने मुझे दी थी, उस दिन जिस दिन मैंने घर छोड़ा था। कहा था — जब तू सही वक़्त पर लौटेगी, तब ये अपने आप चलने लगेगी।"
"ये नहीं चल रही।"
"नहीं चल रही," उसने कहा। "पर आज मैं इसे पहन रही हूँ, क्योंकि मुझे लगता है — अगर मैं अंदर गई, और बाहर आई, तो आज सही वक़्त होगा।"
टिंकू आगे आया। उसके हाथ में एक छोटा सा औज़ार था — वो रिंच जो कल हमने उसकी तरफ़ बढ़ाई थी।
"मैं ये साथ ले जा रहा हूँ," उसने कहा।
"रिंच क्यों?" मीरा ने पूछा।
"क्योंकि अगर अंदर ताला हो," उसने कहा, "और चाबी काम न करे, तो रिंच काम आएगा। और अगर कोई पकड़े, तो ये मेरे हाथ में होगी।"
मीरा हँसी।
"तू सच में जासूस है," उसने कहा।
"मैं अंकुश भैया का शागिर्द हूँ," उसने कहा। "जासूस तो सानिया है। मैं तो सिर्फ़ हाथ हूँ।"
मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली। मेरी हथेली में वो गरम थी। पर इस बार उसमें एक अजीब सी बात थी — वो मेरी हथेली पर हल्की सी काँप रही थी। जैसे बूढ़े आदमी का हाथ।
"तू डर रही है," मैंने धीरे से कहा।
घंटी बजी। एक बार। हल्की।
"डरना अलग है," उसकी आवाज़ आई। "गिनती करना अलग है।"
"क्या गिन रही है?"
"जो अंदर है, वो तेरे जैसा नहीं है," उसने कहा। "वो बोलता नहीं, वो जोड़ता है। वो लोगों को जोड़कर एक-दूसरे के खिलाफ़ खड़ा करता है। और जब तक तू उसे शब्दों में पकड़ने की कोशिश करेगा, वो तेरे ही शब्दों को तेरे खिलाफ़ घुमा देगा।"
"तो मैं क्या करूँ?"
"तू जो करता है, वो कर," उसने कहा। "मरम्मत।"
और फिर वो चुप हो गई।
हम चल पड़े।
पीली दीवार के साथ-साथ हम पीछे के फाटक की तरफ़ बढ़े। टिंकू मेरे पीछे, मीरा मेरे साथ, हबीब चाचा फाटक पर, बबलू बाहर। बंसीलाल उस दरवाज़े के पास खड़े थे जिसके पीछे सीढ़ियाँ उतरती थीं।
अंधेरा था। दीवार के भीतर और भी अंधेरा था। सुबह की धूप अंदर तक नहीं आ रही थी।
बंसीलाल ने चाबी मेरी तरफ़ बढ़ाई।
"ये लो," उन्होंने कहा।
मैंने चाबी ली।
"बंसीलाल भाई," मैंने कहा, "एक आख़िरी बात।"
"बोलो।"
"तीस साल में तुमने इस दरवाज़े को कभी अंदर से खुलते हुए सुना?"
वो रुके।
"एक बार," उन्होंने कहा। "दो साल पहले। रात में। मैंने सुना कि अंदर से कोई दरवाज़ा खटखटा रहा है। तीन बार। फिर बंद हो गया। मैंने सुबह देखा — दरवाज़ा बाहर से बंद था। अंदर कोई नहीं था। पर मैंने उस दिन के बाद से अपनी चारपाई दरवाज़े के सामने से हटा दी है।"
"क्यों?"
"क्योंकि जो ज़िंदा है," उन्होंने कहा, "वो खटखटाता है। जो मरा है, वो चुप रहता है।"
मैंने चाबी को ताले में डाला। ताला ज़ंग से भरा था। मैंने ज़ोर लगाया। चाबी घूमी नहीं।
"मीरा," मैंने कहा, "ये लो।"
मैंने चाबी उसे दी।
"मुझ पर भरोसा?" उसने पूछा।
"तुम पर भरोसा," मैंने कहा। "क्योंकि तुम्हारे हाथ काँपते नहीं।"
उसने चाबी ली। एक बार घुमाया। दो बार। तीन बार। ताला चरचराया, फिर टूटकर नीचे गिर गया। बंसीलाल ने एक आवाज़ निकाली — जैसे कोई पुराना बोझ उतर गया हो।
दरवाज़ा खुला।
अंदर अंधेरा था। एक सीलन भरी गंध आई — पुरानी, दम घोंटने वाली, जैसे बरसों से किसी कोठरी में हवा न आई हो।
मैंने अंदर देखा।
और तभी, उसी अंधेरे में, अस्पताल की नीचे वाली मंज़िल से एक परछाईं उभरी।
सफ़ेद कुर्ते वाली। लंबी। धीमी।
वो मेरे सामने नहीं थी, दूर थी — नीचे की सीढ़ियों के मोड़ पर, जहाँ रोशनी बमुश्किल पहुँच रही थी।
और वो धीरे से फुसफुसाई —
"जोड़ना बंद करो। अब तुम्हारा दोस्त मेरा मेहमान है।"
उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था। उसकी आवाज़ में मिठास थी — जैसे किसी पुराने रिश्तेदार की, जो बरसों बाद आया हो और चाय माँग रहा हो।
मैंने मीरा का हाथ थामा।
"तैयार?" मैंने धीरे से पूछा।
"तैयार," उसने कहा।
"टिंकू?"
"तैयार, भैया," उसने कहा। उसकी आवाज़ में डर नहीं था, बस उतनी ही धौंकनी थी जितनी चौदह साल के लड़के में होनी चाहिए।
मैंने पीछे मुड़कर देखा। हबीब चाचा दरवाज़े के बाहर खड़े थे, दोनों हाथ फाटक पर। बबलू उनके पीछे। बंसीलाल सीढ़ी पर।
मैंने अपनी जेब में घंटी फिर छुई। वो गरम थी। और उसने बहुत धीमे से कहा —
"नाम।"
मैंने अपनी आँखें बंद कीं।
"अंकुश," मैंने धीरे से कहा। "अंकुश यादव। बाप — शंकर यादव। माँ — सुशीला यादव। बहन — काजल। गली — साइकिलों की गली। घर — पीपल के नीचे, पत्थर की चबूतरी के सामने, वहाँ जहाँ उस्ताद अली बक्श की सिलाई मशीन टिक-टिक करती है।"
मैंने आँखें खोलीं।
"मैं जानता हूँ मैं कौन हूँ," मैंने कहा। "और मैं यहाँ तुम्हारी चाय पीने नहीं आया हूँ। मैं यहाँ अपना दोस्त लेने आया हूँ।"
और हम अंदर उतर गए।
सीढ़ियाँ ठंडी थीं। हर कदम पर एक आवाज़ आती थी — जैसे कोई पुराना पत्थर कराह रहा हो। मेरी हथेली में चाबी थी, दूसरी में मीरा का हाथ, और जेब में घंटी।
और नीचे, अंधेरे के उस मोड़ पर, वो सफ़ेद कुर्ते वाली परछाईं अब भी खड़ी थी — चुप। इंतज़ार करती हुई।
जैसे उसे पता हो कि हम आएँगे।
जैसे वो हमारा ही इंतज़ार कर रही हो।
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