The Mysterious Bell981 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 981

7 min read November 5, 2026

"मैं जानता हूँ," उन्होंने कहा। "इसीलिए तो भागकर आया हूँ।" उन्होंने अपनी कलाई की तरफ़ देखा जैसे वहाँ घड़ी हो। "मैंने सुना कि नूर अस्पताल में कुछ हो रहा है।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"क्या सुना?"

"भवन से निकलते वक़्त," उन्होंने धीरे से कहा, "मैंने बाहर वाले कमरे में दो आदमी बात करते सुने। एक कह रहा था — सफ़ेद वर्दी वाली का काम हो गया, अब वो डॉक्टर के पास जाएगी।"

मेरा खून जम गया।

"कौन से डॉक्टर के पास?"

"मैंने सुना," उन्होंने कहा, "कि जो सबसे पहला गवाह है।"

मीरा ने फौरन अपना बैग उठाया। "अंकुश," उसने कहा, "हमें अभी जाना है।"

"गोविंद भाई," मैंने कहा, "आप आइए हमारे साथ।"

वो रुके।

"मैं?" उनकी आवाज़ में एक अजीब डर था। "मैं क्या करूँगा वहाँ? मैं तो —"

"आप वहाँ आप ही रहेंगे," मैंने कहा। "बस। इससे ज़्यादा कुछ नहीं।"

वो मेरी तरफ़ देखते रहे, फिर मीरा की तरफ़, फिर अपनी धोती की तरफ़।

"ठीक है," उन्होंने कहा।

और हम चले।

गली में धूप पीली होकर गिर रही थी। पीपल की परछाईं एक तरफ़ सिमटी हुई थी, जैसे पेड़ भी थक गया हो। पंप पर कोई नहीं था — पानी बह रहा था, और ज़मीन पर उससे एक छोटी नदी बन गई थी जो नाली की तरफ़ भाग रही थी। जाने क्यों, उस पानी को देखकर मुझे लगा कि कल सुबह जो लोग खुश थे वो सब अब अपने घरों में पानी भरने के लिए आते और चले जाते हैं, पर पंप के पास खड़े नहीं रहते — जैसे खुशी भी अब अधूरी हो गई है।

भोला भाई का शटर आधा गिरा था। उसके ऊपर वही लाल-सफ़ेद बोर्ड टँगा था। मैंने देखा कि शटर के नीचे से ज़मीन पर एक पीला काग़ज़ निकला है। किसी ने उसे ध्यान से नहीं देखा था।

"मीरा," मैंने कहा। "रुक।"

मैं झुका। काग़ज़ खींचा। वो नोटिस नहीं था। वो पुरानी रसीद थी, बहुत पुरानी, और उस पर ऊपर से कोई कुछ लिख गया था — मोटी नीली स्याही में दो शब्द।

"क्या है?" मीरा ने पूछा।

"बोलना नहीं," मैंने कहा।

"क्यों?"

मैंने काग़ज़ उसकी तरफ़ बढ़ाया।

उसने पढ़ा और उसका चेहरा बदल गया। उसने गोविंद भाई की तरफ़ देखा, फिर मेरी।

"ये —"

"हाँ," मैंने कहा। "बोलना नहीं। अभी। जब वक़्त आएगा, तब।"

मैंने काग़ज़ जेब में रखा। उसके ऊपर घंटी थी, अब भी ठंडी।

और हम अस्पताल चले।

रास्ते में गोविंद भाई लगातार मेरी तरफ़ देखते रहे, जैसे कुछ कहना चाह रहे हों और शब्द न मिल रहे हों। आख़िर उन्होंने कहा —

"अंकुश भाई, एक बात पूछूँ?"

"पूछिए।"

"आपको कैसे पता चलता है?"

"क्या?"

"कि किस बात को मानना है और किसको नहीं? मैं इतने साल से हिसाब देख रहा हूँ। आप काग़ज़ देखते हैं और बता देते हैं कि ये झूठ है। मुझे तो —" उनकी आवाज़ फिर टूटी। "मुझे तो पता भी नहीं चला जब मैंने खुद झूठ पर अंगूठा लगाया।"

मैंने कुछ कदम चलकर सोचा।

"गोविंद भाई," मैंने कहा, "आपको काग़ज़ ने धोखा नहीं दिया। आपको उस वक़्त डर ने धोखा दिया था।"

वो कुछ नहीं बोले।

"और डर," मैंने कहा, "काग़ज़ नहीं देखता। डर दस्तख़त देखता है, आँखें नहीं।"

अस्पताल की गली में मुड़ते ही हवा बदल गई। यहाँ हवा में सेवई जैसी दवा की महक थी, और उसके साथ एक गीली दीवार की बास जो हर पुराने अस्पताल में होती है, जैसे साल-दर-साल बारिश और सीलन मिलकर कुछ पका रहे हों।

अस्पताल के बाहर कुछ लोग बैठे थे। एक बूढ़ी औरत पुरानी पर्ची लिए बैठी थी, और वही पर्ची उसके हाथ में इस तरह मुड़ी हुई थी जैसे वो उसे महीनों से दबाए हुए है। एक आदमी बैठा था जिसके कंधे पर बच्चा सो रहा था। और किनारे पर एक लड़की खड़ी थी — एक सफ़ेद कोट में, हाथ में दवा की थैली, माथे पर पसीना — काजल।

वो हमें देखकर दौड़ी आई।

"भैया," उसने कहा। "मैंने सुना सुबह की सब बातें। शबनम आपा ने फोन किया था। माँ कैसी हैं?"

"ठीक हैं," मैंने कहा। "टिफ़िन लौटा।"

उसका चेहरा उतर गया।

"खाना?"

"अछूता।"

उसने आँखें झपकीं। उसके गाल पर एक दवा की पर्ची चिपकी हुई थी — जाने कहाँ से आई थी — और उसने उसे सँभाला।

"ठीक है," उसने कहा। "बाद में। पहले अंदर चलो। डॉक्टर साहब अंदर हैं, डिस्पेंसरी के पास।"

"काजल," मीरा ने कहा, "आज सुबह यहाँ कोई आई थी क्या?"

काजल ने उसकी तरफ़ देखा।

"कौन?"

"सफ़ेद वर्दी में।"

काजल कुछ सोचने लगी।

"यहाँ रोज़ कई लोग आते हैं," उसने कहा। "कोई नई नर्स नहीं आई। पर —" वो रुकी। "पर एक औरत दोपहर में आई थी। ऊपर वाले गलियारे में। मैंने उसे देखा था। उसने किसी से कुछ नहीं पूछा। बस एक बेंच पर बैठ गई और एक मोटी रजिस्टर अपने घुटनों पर रख लिया। मैंने सोचा कोई मरीज़ की रिश्तेदार होगी।"

"वो अभी है?" मैंने पूछा। "वहाँ?"

"मैंने अभी —"

"काजल," मीरा ने कहा, "तुम्हें वो पहचानी?"

काजल ने मेरी तरफ़ देखा। फिर मीरा की तरफ़।

और उसके चेहरे पर जो आया, वो किसी पुरानी तस्वीर से कोई चेहरा निकलने जैसा था।

"मैं —" उसने धीरे से कहा। "मुझे लगा जैसे मैंने उसे कहीं देखा है। बहुत पहले। जब मैं ट्रेनी आई थी।"

"अभी चलो," मैंने कहा।

अस्पताल के अंदर घुसते ही पहली मंज़िल की सीढ़ियाँ आईं — वही जिन पर काग़ज़ लगा था कि आज रात से बंद रहेंगी, वही जिन पर किसी ने चाबी सौंपने की बात लिखी थी। सीढ़ियाँ आज भी खुली थीं। ऊपर जाते हुए मैंने दीवार पर हाथ फेरा। पीली दीवार थी, पर हाथ लगते ही उसमें से एक झुर्री सी महसूस हुई — जैसे दीवार भी थकी हुई हो और उसे भी कोई पूछने वाला न हो।

ऊपर के गलियारे में रोशनी कम थी। बल्ब पुराना था और उसकी रोशनी भी जैसे किसी बात पर शर्मिंदा थी — आधी देती थी, आधी छिपा लेती थी।

और वहाँ, तीसरी बेंच पर, एक औरत बैठी थी।

उम्र पचपन के आसपास। बाल माथे पर सफ़ेद हो चुके थे, पर पीछे की तरफ़ कुछ काला बचा था — जैसे वक़्त हर जगह एक साथ नहीं आता। उसके कंधे पर एक फटा बैग टँगा था, रस्सी से सिला हुआ, ठीक वैसा जैसा गोविंद भाई ने बताया था। उसके हाथ में एक मोटी रजिस्टर थी, वो पुरानी ड्यूटी वाली रजिस्टर जिसका कवर बाहर से मैला और अंदर से किसी की ज़िंदगी होती है। उसने वो रजिस्टर घुटनों पर रखा हुआ था और उस पर अपना एक हाथ फैला रखा था, जैसे किसी पुराने घाव को ढक रही हो।

उसकी आँखों में वो थकान थी जो लंबे इंतज़ार के बाद आती है — वो इंतज़ार जिसमें तुम्हें पता होता है कि जिसका इंतज़ार कर रहे हो वो आएगा तो शायद कुछ नहीं होगा, पर तुम फिर भी बैठे हो।

काजल ने मेरा हाथ पकड़ा।

"भैया," उसकी आवाज़ फुसफुसाहट में बदल गई। "यह —"

और उसी वक़्त डिस्पेंसरी की खिड़की वाले कमरे का दरवाज़ा खुला और डॉक्टर इसरानी बाहर आए।

उनके हाथ में एक पर्ची थी और एक पेन। वो चलते हुए उस पर्ची पर कुछ लिख रहे थे — अपनी आदत के मुताबिक, बिना देखे, बिना रुके, जैसे सालों से लिखते आ रहे हों।

फिर उन्होंने ऊपर देखा।

और उनका हाथ रुक गया।

पेन की नोक पर्ची पर रुक गई — न शब्द पूरा, न लकीर, बस एक नीला बिंदु बनकर रह गया। उनके चश्मे के पीछे उनकी आँखें कुछ ऐसे काँपीं जैसे किसी साफ़ पानी की झील में एक पत्थर गिर जाए और लहर कहीं दूर तक चली जाए, बिना आवाज़ के।

और उस बेंच पर बैठी औरत ने भी उन्हें देखा।

उसने कुछ नहीं कहा। वो उठ नहीं। वो सिर्फ़ सीधी बैठ गई, जैसे पूरे पंद्रह साल वो झुकी हुई थी और आज पहली बार रीढ़ सीधी हुई।

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