The Mysterious Bell980 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 980

7 min read November 5, 2026

"ये राहत नहीं है," मैंने धीरे से कहा। "ये और बड़ा डर है।"

"हाँ," मीरा ने कहा।

"क्योंकि काग़ज़ बनाने वाला सिर्फ़ काग़ज़ नहीं बना रहा। वो पापा को फिर से उसी कुर्सी पर बैठाने की तैयारी कर रहा है। बाईस साल बाद। जैसे किसी के पास उनका पुराना डर जमा करके रखा हो, और वो उसे बाहर निकालकर दिखा रहा हो कि देखो, ये तुम्हारा है।"

शबनम आपा ने अचानक चिमटी अलग रखी।

"अब सुनो मेरी बात," उन्होंने कहा। "अगर किसी के पास इतना पुराना अंगूठा है, तो वो कोई गली का नहीं है। गली वाला इतना सब्र से चीज़ें इकट्ठी नहीं करता। ये कोई दफ़्तार है जिसके पास बाईस साल का हिसाब है।"

"और जिसके पास बाईस साल का हिसाब है," मीरा ने कहा, "उसके पास बाईस साल की खामोशी भी है।"

मैं उठ खड़ा हुआ।

मीरा के काग़ज़ को उसने सँभालकर बैग में रखा, अपने पास वाली सफ़ेद काग़ज़ की नकल मेरे हाथ में दी, और हम दोनों गुमटी के बाहर आ गए। सूरज सिर पर चढ़ रहा था और गली में धूप पीली होकर गिर रही थी। पंप पर कोई नहीं था। पानी बह रहा था, और उसकी आवाज़ सुनकर भी कोई रुक नहीं रहा था।

और तभी।

"अंकुश भाई!"

आवाज़ पीछे से आई। मैं पलटा।

गोविंद भाई आ रहे थे।

और मैंने उन्हें इस तरह पहले कभी नहीं देखा था।

उनके हाथ काँप रहे थे। नहीं, यह काँपना नहीं था। यह वो हालत थी जो डर के बाद आती है, जब शरीर को समझ नहीं आता कि क्या करे। उनके माथे पर पसीना था — इतना पसीना कि गमछा भीग चुका था और वो उसे हाथ में मसल रहे थे। उनकी धोती का पल्ला बाहर निकला हुआ था। उन्होंने चश्मा नहीं पहना था; चश्मा उनके हाथ में था, और कान पर टेप लिपटा हुआ था।

"गोविंद भाई," मैंने कहा, "आप —"

"पानी," उन्होंने कहा।

"क्या?"

"पानी दे।"

शबनम आपा ने फौरन कुल्हड़ में पानी दिया। उन्होंने एक बार में पूरा नहीं पिया — तीन बार में पिया, फिर चौथी बार लिया और सिर का पसीना पोंछा।

मैंने उन्हें बेंच पर बैठाया।

"धीरे," मैंने कहा। "साँस लीजिए।"

वो बैठे। साँस ली। फिर मेरी तरफ़ देखा।

और जाने क्यों, उस वक़्त मुझे लगा कि वो मुझसे कोई बात कहने से पहले मुझे तौल रहे हैं।

जैसे कोई बहुत भारी तराज़ू पर अपना ही दिल रख रहा हो।

"मैं आज सुबह भवन गया था," उन्होंने कहा। "हिसाब की कॉपी लेकर। वो मेरा रोज़ का काम है।"

"हाँ, जानता हूँ।"

"और वहाँ एक औरत आई थी।"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। मीरा ने फौरन कैमरा नहीं उठाया। उसने हाथ नीचे रखा और बस सुनने लगी। यह उसकी आदत थी — जब बात बहुत भारी होती, तो वो पहले कैमरा बंद करती थी।

"कौन?" मैंने पूछा।

"मैं उसे नहीं जानता," गोविंद भाई ने कहा। "पच्चीस साल से भवन में हूँ, और उसे पहली बार देखा।"

"कैसी दिखती थी?"

"वर्दी में थी।" उन्होंने अपना चश्मा पहना, फिर उतार दिया, फिर फिर पहना। "सफ़ेद वर्दी। नर्स की।"

गुमटी के चूल्हे की लौ जैसे एक पल के लिए झुक गई।

"और?" मेरी आवाज़ जाने कहाँ से आई थी।

गोविंद भाई ने मेरे घुटनों की तरफ़ देखा। फिर अपने हाथों की तरफ़। फिर मेरे चेहरे की तरफ़।

"उसने नाम नहीं बताया," उन्होंने कहा। "उसने सिर्फ़ आपका नाम लिया। बड़ी मेज़ के पास खड़ी होकर पूछा — अंकुश यादव कहाँ रहता है?"

मैंने कुछ नहीं कहा।

"और मैंने," गोविंद भाई ने धीरे से कहा, "गलती की।"

"क्या गलती?"

"मैंने कहा — तुम कौन हो?"

उन्होंने अपना मुँह पोंछा। उनके होंठ सूखे थे।

"वो मुस्कुराई," उन्होंने कहा। "और बोली — मैं वही हूँ जिसे भुला दिया गया।"

गुमटी की पीतल की थाली पर चिमटी रखी हुई थी। एक हवा का झोंका आया और थाली ज़रा हिल गई — टन।

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी वहीं थी। पट्टी के ऊपर रखी थी।

वो गरम नहीं थी। वो ठंडी थी।

बर्फ़ जैसी ठंडी।

॥

घंटी बर्फ़ जैसी ठंडी थी।

मैंने उसे जेब से निकाला। पीतल पर उँगली रखी तो लगा जैसे किसी ने उसे रात भर पानी में डुबोकर रखा हो। धूप सिर पर थी, गुमटी का चूल्हा जल रहा था, चारों तरफ़ से समोसे की गरम भाप उठ रही थी — और मेरे हाथ में घंटी जम रही थी।

गोविंद भाई मेरे चेहरे को देख रहे थे।

"और कुछ?" मैंने पूछा। "कुछ और कहा उसने?"

"बस इतना," उन्होंने कहा। "फिर वो मुड़कर चली गई। सीढ़ियों की तरफ़ नहीं, बाहर की तरफ़। गेट की तरफ़।"

"आपने पीछा नहीं किया?"

"अंकुश भाई," उन्होंने धीरे से कहा, "मेरे पैर उस वक़्त ऐसे हो गए थे जैसे किसी ने उनमें सीमेंट भर दिया हो।"

मैं समझ गया। मुझे भी वो हालत पता थी जब पैर सुन्न हो जाते हैं और दिमाग़ कहता है भाग, पर शरीर कहता है रुक।

मीरा ने अपना बैग कंधे पर ठीक किया।

"वर्दी कैसी थी?" उसने पूछा। "पुरानी या नई?"

गोविंद भाई ने सोचा। उनके चश्मे का काँच धूप में चमका।

"पुरानी," उन्होंने कहा। "बहुत पुरानी। कॉलर घिसा हुआ था। और उसके कंधे पर एक बैग था — फटा हुआ, रस्सी से सिला हुआ।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।

"पुरानी वर्दी," उसने कहा, "और पुराना बैग। यानी वो नौकरी पर नहीं आई थी। वो कुछ और लेकर आई थी।"

"क्या?"

"यही तो," मीरा ने कहा। "हमें पता करना है।"

मैंने घंटी को हथेली में दबाया। ठंडक मेरी उँगलियों से कलाई तक चढ़ गई।

मैंने धीरे से कहा, "जो अंदर आई, वो कौन है?"

घंटी ने कुछ नहीं कहा।

"सिर्फ़ इतना बता दे," मैंने कहा। "वो दुश्मन है या —"

घंटी बजी।

एक बार। बहुत धीमी। इतनी धीमी कि शबनम आपा ने भी सुना और उनका हाथ केतली पर रुक गया।

"अंदर से," घंटी ने कहा।

"क्या मतलब?"

"अंदर से है।"

और चुप।

मैंने घंटी को जेब में रखा। उसका ठंडापन कपड़े के आर-पार भी महसूस हो रहा था।

"भवन में क्या हुआ था, गोविंद भाई?" मैंने पूछा। "आप वहाँ क्या करने गए थे?"

"हिसाब की कॉपी," उन्होंने कहा। "हर हफ़्ते जाता हूँ। साहब ने बुलाया था।"

"आज भी बुलाया था?"

"नहीं।" उन्होंने चश्मा पहना, कान का टेप उँगली से दबाया। "आज नहीं बुलाया था। मैं ख़ुद गया था।"

"आप ख़ुद क्यों गए?"

वो एक पल चुप रहे। फिर उन्होंने धोती के पल्ले को कमर में खोंसा, उसे ठीक किया, फिर से निकाल दिया, जैसे उन्हें अपने ही हाथों से कुछ करने की ज़रूरत थी, वरना वो काँपते रहते।

"क्योंकि," उन्होंने कहा, "कल रात मैंने सोचा — मैंने अपना पूरा ज़िंदगी काग़ज़ों में काट दिया। हिसाब लिखता रहा। और जब वक़्त आया, तो मैंने इंसान का अंगूठा ले लिया।"

उनकी आवाज़ टूटी। पर वो रोए नहीं। उन्होंने खुद को सँभाला।

"तो आज सुबह उठकर मैंने सोचा कि जाकर वो काग़ज़ देखूँ जो मैंने लिया था। मैं नहीं जानता था कि उसमें क्या था। सच में नहीं जानता था।"

उनका हाथ जेब की तरफ़ गया और रुक गया।

"और फिर," उन्होंने कहा, "वो औरत आई।"

मीरा ने पूछा, "क्या वो हिसाब वाली मेज़ के पास आई थी?"

"हाँ। बिल्कुल मेरे सामने आकर खड़ी हो गई। जैसे उसे पता हो कि मैं कौन हूँ।"

"आपको लगा कि वो आपको जानती है?"

गोविंद भाई ने मेरी तरफ़ देखा।

"वो मुझे नहीं जानती थी," उन्होंने कहा। "वो सिर्फ़ मेरे हाथ देख रही थी।"

कुछ देर तक गुमटी पर शब्दों के अलावा सब कुछ सुनाई दे रहा था। केतली की सीटी, चूल्हे की फुसफुसाहट, दूर किसी गली से आ रहा टेम्पो का हॉर्न, और पंप का पानी बहता हुआ।

"गोविंद भाई," मैंने कहा, "आपको गनीमत है कि यह बात अभी कही, अभी। कल शाम पाँच बजे भवन में सभा है। उससे पहले यह जानना ज़रूरी था।"

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