The Mysterious Bell – Chapter 972
"पर मरीज़ों को हटाना पड़ेगा। बरामदा खाली चाहिए।"
डॉक्टर साहब ने उनकी तरफ़ बिना गुस्से के देखा। जैसे कोई चश्मा पोंछकर रख रहा हो।
"अफ़सर," वो बोले, "मरीज़ कुर्सी हैं क्या, जो हटा दिए जाएँ? ये लोग यहाँ बैठे हैं क्योंकि इनके घर में उनका इंतज़ार कोई नहीं कर रहा। आप नापिए। जहाँ चाहिए, वहाँ से नापिए। पर जो हाँफ रहा है, उसकी साँस से कोई फ़ीता नहीं बाँधिए।"
उन्होंने अपना काम जारी रखा। "अब ज़रा हाथ बढ़ाइए अम्मा।"
बूढ़ी औरत ने हाथ बढ़ाया।
और यही उनका सबसे बड़ा तेवर था।
न कोई फ़ाइल, न कोई धमकी, न कोई डपट। वो बस अपना काम कर रहे थे, बहुत शांति से, और यही शांति उस अफ़सर के चेहरे पर छोटी-सी चोट की तरह लग रही थी। क्योंकि गुस्सा करने वाले को गुस्सा खींचना पड़ता है। और जो शांति से काम कर रहा हो, उसका गुस्सा खींचने का कोई तरीक़ा नहीं होता।
मैं बाहर खड़ा था। मीरा ने कैमरा मेरे हाथ से लेकर अपने कंधे पर रखा।
बाहर धीरे-धीरे लोग जुटने लगे।
पहले नीम के पेड़ के नीचे एक बूढ़ा काका आए — वही, जिनके पोते की जान डॉक्टर साहब ने रात दो बजे बचाई थी। उनके हाथ में छोटी पोटली थी। वो कुछ नहीं बोले, बस दीवार से टिककर खड़े हो गए।
फिर दवा की खिड़की वाला आदमी आया, हाथ में पुरानी पर्ची। फिर एक औरत, गोद में बच्चा। फिर वो बूढ़ी माँ जो सीढ़ी पर बैठती हैं, सीने से ज़ंग लगा बक्सा चिपकाए।
दस मिनट में अस्पताल के बाहर पचास से ज़्यादा आदमी थे। कोई कुछ बोल नहीं रहा था। बस देख रहे थे।
और यही सबसे खतरनाक था — जब भीड़ चिल्लाती नहीं, तब वो सबसे ज़्यादा डरती है।
फिर वो पहली आवाज़ आई।
"अस्पताल बंद हो जाएगा तो इलाज कहाँ जाएगा?"
किसी ने कहा। हल्की आवाज़, जैसे किसी ने सोचकर धीरे से कहा हो।
और फिर पूरी भीड़ में वो बात रेत की तरह फैल गई।
"मेरी बहू का इलाज यहीं चल रहा है—"
"मेरे बेटे का तीन महीने से यहीं—"
"डॉक्टर साहब अच्छे हैं, दूसरे अस्पताल में इतना खर्च कौन देगा—"
"बबलू वाले ने कहा था नई इमारत बनेगी, इलाज भी वहीं—"
आख़िरी आवाज़ पर मेरा मुँह कड़वा हो गया।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने भी मुझे देखा और सिर हिलाया। उसके चेहरे पर वही भाव था जो मेरे अंदर था — कि कहीं यह सब वैसे ही न हो जाए जैसे रणवीर चाहता है।
उस वक़्त मैंने आगे जाकर उस अफ़सर से कहा, "साहब, आप जो नाप रहे हैं, वो नापिए। पर गली को भी कुछ देखना है। काग़ज़ दिखा दीजिए।"
अफ़सर ने मुझे देखा।
"तुम कौन?"
"मैं अंकुश यादव। साइकिल गली, सातवाँ नंबर।"
वो मुस्कुराया। बहुत छोटी-सी मुस्कान, जैसे कोई पुरानी आदत हो।
"अच्छा," उसने कहा। "तुम्हारा नाम आता है काग़ज़ों में।"
"अच्छा? किस काग़ज़ में?"
उसने अपने लड़के की तरफ़ हाथ बढ़ाया। लड़के ने क्लिपबोर्ड से काग़ज़ों का बंडल निकाला। अफ़सर ने ऊपर का काग़ज़ खोला और मेरी तरफ़ घुमा दिया।
"यह हैं अस्पताल की ज़मीन के लिए गली के लोगों की सहमति। अस्पताल तो यहीं आएगा, बस नया हो जाएगा। पर यह ज़मीन, यह सब, सबसे पहले इन्हीं लोगों की मर्ज़ी है।"
मैंने काग़ज़ देखा।
और मेरा हाथ रुक गया।
ऊपर की तरफ़ लिखा था — सार्वजनिक विकास हेतु सहमति पत्र। और नीचे, स्याही की लाल मोहर। और फिर नीचे, बहुत सारे अंगूठे।
मैंने गिनना शुरू किया।
एक। दो। तीन। चार।
मेरी उँगली चलती रही।
बीस। पच्चीस। तीस।
मैं रुका और फिर से ऊपर से गिना, क्योंकि मुझे लगा कि शायद मैं किसी को दो बार गिन रहा हूँ।
तीस। पैंतीस। चालीस।
पचास।
पाँच दर्जन से ज़्यादा।
और नाम?
मैंने पहला नाम पढ़ा — रमेश कुमार भार्गव। रमेश भाई। नल वाले रमेश भाई। जिनकी बीवी की किडनी में पत्थर है।
मैंने दूसरा नाम पढ़ा — भोला प्रसाद। भोला भाई। जो रेडियो, पंखा और प्रेस ठीक करते हैं।
तीसरा — नसीमा बी।
चौथा — किशनलाल, किराने की दुकान।
पाँचवाँ — साजिद, नसीमा बाई का बेटा।
छठा — चूड़ी वाली बाई। जिसके हाथ में लाल धागे लिपटे रहते हैं।
और ऐसे और चले नाम। बीस। तीस। पचास। सारे गली के, सारे मेरे पास के।
मैंने अफ़सर से पूछा, "ये किसने लिए?"
"हम नहीं लिए," उसने कहा, "हम तो बस लाए हैं। ये काग़ज़ गली से गया था। घर-घर से।"
"घर-घर कौन गया था?"
"यह तो यहीं के लोग बता देंगे।"
उसकी बात सुनकर मेरे भीतर तेज़ गुस्सा उठा। और उस गुस्से में मैं उसकी तरफ़ बढ़ा ही, पीछे से एक आवाज़ आई।
"मैंने तो लगाया था।"
सब पलटे।
एक औरत थी, जिसकी गोद में बच्चा था। उसने धीरे से कहा, "एक भैया आए थे रोज़। कह रहे थे अस्पताल के लिए अंगूठा लग रहा है, सब लगा रहे हैं। मैंने भी सोचा, अस्पताल तो ठीक हो जाएगा। मुझे नहीं पता था कि ज़मीन जाएगी।"
"मैंने भी लगाया," एक दूसरे आदमी ने कहा।
"मुझे लगा पानी के लिए है—"
"मैंने दो बार लगाया, पढ़ नहीं पाया—"
"मेरे बेटे ने भी लगाया—"
और फिर एक और तरह की आवाज़ आई। तेज़, तीखी, किसी दूसरे की तरफ़ उँगली करती हुई।
"तुमने लगाया! तुमने ही तो सबको बुलाकर लगवाया! तुम्हें पता था!"
"मुझे क्या पता था—"
"तुम्हारा बेटा साइट पर काम करता है, तुम्हीं—
"ओए, ये सब मुझ पर मत—
"मैं बोलूँ क्या सच, तुम—
"चुप रह, तू तो खुद—
"तेरे बेटे ने ही सबको—
"अपना बेटा देख, मेरा मत देख—
महज़ दस सेकंड।
दस सेकंड में पूरी भीड़ दो हिस्सों में बँट गई। एक तरफ़ जो अंगूठा लगाकर रो रहे थे, दूसरी तरफ़ जो सबको ईमानदार बता रहे थे। और बीच में कोई नहीं — बीच में सिर्फ़ काग़ज़।
मैंने देखा — यही है।
यही उसका तरीक़ा है।
रणवीर ने कभी झूठ नहीं बोला।
मैं जानता हूँ, यह सुनकर तुम सोच रहे होगे कि मैं पागल हो गया हूँ — कैसा आदमी जो पूरा मोहल्ला खा रहा है, वो कभी झूठ नहीं बोला। तो सुनो, ध्यान से सुनो।
वो हमेशा आधा सच बोलता रहा।
अस्पताल के लिए — ये सच है। वो अस्पताल बनाएगा। पर छोटा, कहीं और। उसका सच में यही इरादा है — अस्पताल बने। जो हम नहीं जानते, वो यह है कि वो इस ज़मीन पर बनाएगा, और उससे पहले यह ज़मीन हमसे लेगा।
जिस रात उसने सभा में नक्शा दिखाया, वो झूठ नहीं बोला था — उसने कहा "नया स्वास्थ्य केंद्र बनेगा"। बनेगा। पर कहाँ बनेगा, किसके पैसे से, और उसके बाद यह बंद पुराना अस्पताल क्या होगा — यह उसने नहीं कहा।
आधा सच ऐसा होता है। वो झूठ नहीं होता, इसीलिए कोई उसे पकड़ नहीं पाता। वो सच की तरह सुनाई देता है, सच की तरह चलता है, और फिर आख़िर में सबसे बड़ा झूठ बन जाता है — क्योंकि जो सुना नहीं गया, वो ही तो सबसे ज़्यादा मारता है।
और सबसे बुरी बात?
वो हमें आपस में लड़ने के लिए छोड़ देता है। वो खुद लड़ता नहीं। वो काग़ज़ रखता है, हमें बाँट देता है, और फिर आराम से बैठकर देखता है कि कौन पहले किसका गला पकड़ता है। क्योंकि जब दो आदमी लड़ते हैं, तो आधार कमज़ोर पड़ता है। और जब आधार कमज़ोर पड़े, तो ज़मीन खुद बिक जाती है।
अंकुश।
मेरे भीतर की आवाज़ ने मेरा नाम लिया। मैंने अपनी उँगली कसी। खून की लकीर वाली उँगली पर मरहम खुरदरा लगा।
मैं भीड़ के बीच चला गया।
"रुको।"
कोई नहीं रुका।
"रुको!"
सबको लगा कि आवाज़ कहीं और से आई। फिर धीरे-धीरे सब मेरी तरफ़ पलटे।
मैंने कहा, "जिसने अंगूठा लगाया, वो धोखेबाज़ नहीं है। जिसने नहीं लगाया, वो भी धोखेबाज़ नहीं है। धोखेबाज़ वो है, जिसने ऐसा काग़ज़ बनाया, जिसमें लगाने वाले का भी नाम नहीं और बेचने वाले का भी नाम नहीं।"
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