The Mysterious Bell – Chapter 971
"बोला तो ज़रूर।"
"कैसा लगा?"
वो रुके। फिर बोले, "लगा कि साँस ले रहा हूँ।"
और मैं हँस पड़ा। इस बार हँसी में पानी भी था, पर वो अच्छा लगा।
घर पहुँचकर माँ ने चूल्हा जलाया। काजल ने मेरी उँगली पर बँधी खून की लकीर देखी और मरहम लगा दिया। दुबे अंकल आए और बोले, "मैंने आज काग़ज़ नहीं छुआ। तुम्हारे बाप ने बोला और मेरे हाथ काँप गए।"
मंसूर चाचा ने जेब से ताला निकाला और मेज़ पर रखा।
"देख," उन्होंने कहा।
मैंने उँगली रखी। ठंडा था। ठंडा और भारी, जैसे किसी पत्थर के नीचे दबा पानी।
"क्यों?" मैंने पूछा।
"क्योंकि आज तेरे बाप ने सच बोला, पर माफ़ी नहीं माँगी। दोनों में फर्क है। सच बोलना कबूल करना है। माफ़ी माँगना झुकना है। और झुकना जो नहीं जानता, वो न जुड़ता है, न कराता है।"
रात आ गई। मैं अपने कमरे में गया और दुकान के पीछे की खिड़की खोली। पीपल की डाल हिल रही थी। नीचे चबूतरी पर कोई बैठा था — मंसूर चाचा, ताला सामने।
मैंने जेब से घंटी निकाली। धागा उतारा और उँगलियों में पकड़कर हिलाया।
टिन। टिन।
धीमी। दूर से। बहुत थकी हुई।
"सुन," मैंने कहा। "आज मैंने किसी को नहीं जोड़ा। मुझे पता है। पर मैंने एक काम किया — मैंने अपने पापा को अपने साथ खड़ा कर दिया। ये कम है क्या?"
घंटी एक पल चुप रही। फिर बोली, बहुत धीरे, जैसे कोई थका हुआ आदमी आख़िरी बात कह रहा हो।
"कल सुबह जो आएगा… वो तुम्हारा दुश्मन नहीं है।"
मेरी उँगलियाँ रुक गईं।
"तो कौन है?"
"तुम्हारे घर का ही कोई है।"
और घंटी चुप हो गई।
मैं खिड़की पर टिका रहा, हाथ में ठंडी घंटी। नीचे मंसूर चाचा अब भी ताला देख रहे थे, मानो उससे कोई जवाब माँग रहे हों। पीपल की पत्तियाँ हिल रही थीं और गली में एक कुत्ता भौंका, दूर, बहुत दूर।
सात बजे। कल सुबह सात बजे।
और मेरे घर का ही कोई आएगा।
॥
रात भर मैंने घंटी को तीन बार हिलाया।
तीनों बार वही आवाज़ — टिन। टिन। जैसे कोई थका हुआ आदमी दूर से हाँफ रहा हो और बोलने की हिम्मत न जुटा पा रहा हो।
मैं खिड़की से चिपका रहा। नीचे चबूतरी पर मंसूर चाचा अब भी बैठे थे, ताला सामने रखा हुआ। रात की ठंडी हवा में उनका सफ़ेद कुर्ता धीरे-धीरे फूल की तरह खुलता और बंद होता रहा। कभी-कभी वो ताले को उँगली से छूते, और फिर हाथ वापस खींच लेते, जैसे किसी बंद दरवाज़े पर दस्तक देकर भाग रहे हों।
"तुम्हारे घर का ही कोई है।"
घंटी की वो बात मेरे कान में बार-बार लौट रही थी। मैंने सोचा — घर का कौन? मैं? पापा? माँ? काजल? या कोई ऐसा, जिसे मैंने कभी घर का माना ही नहीं और वो पच्चीस साल से दरवाज़े के बाहर खड़ा रहा?
नींद आई तो बहुत हल्की, और सपने में भी वही सात बजे की सुई घूमती रही।
सुबह पाँच बजे माँ के चूल्हे की आवाज़ से आँख खुली। मैं उठकर बैठा। उँगली पर काजल के मरहम की पतली परत अब सूख चुकी थी और खून की लकीर उसके नीचे जम गई थी, जैसे किसी ने लाल धागे से मेरी उँगली नाप ली हो।
आँगन में माँ बैठी थीं। उनके सामने आटे का डिब्बा खुला था और वो उसमें हाथ डालकर कुछ टटोल रही थीं।
"माँ?"
"हूँ।"
"क्या ढूँढ रही हो?"
"कुछ नहीं।" उन्होंने डिब्बा बंद किया। "बस देख रही थी कि जो चीज़ें हम छिपाकर रखते हैं, वो सच में छिपी रहती हैं या नहीं।"
मैं उनके पास बैठ गया।
"आज सात बजे कोई आएगा," मैंने कहा।
"आए।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "और याद रख, जो घर का होकर आता है, वो दुश्मन की तरह नहीं आता। वो अपने ही घर में चोर की तरह आता है। घुसता नहीं, पहले से बैठा होता है।"
"तो फिर क्या करूँ?"
"देख। बस देख। और जो दिखे, उसे मत झुठला।" उन्होंने मेरे माथे पर हाथ रखा। "तू बहुत जल्दी सबको बचाने दौड़ता है, अंकुश। कभी-कभी बचाने का सही तरीक़ा यह होता है कि पहले देख लिया जाए कि आख़िर गिर कौन रहा है।"
छह बजे गली जाग गई। ऐसी सुबह गली में कभी नहीं देखी थी कि हर आदमी चुप हो और फिर भी पूरी गली चुप न हो। शटर उठने की आवाज़ें आ रही थीं, पर किसी की आवाज़ नहीं। जैसे चाय उबल रही हो, बात नहीं।
शबनम आपा ने गुमटी का चूल्हा जला दिया था। बड़ी केतली चढ़ी थी। वो मेरी तरफ़ पलटीं और बोलीं, "आज चाय का पैसा नहीं लूँगी। आज चाय ज़ुबान की जगह है।"
"क्या मतलब?"
"मतलब, जब शब्द काम न आएं, तो लोग चाय पीकर बैठ जाते हैं। आज वही दिन है।"
मीरा अपना कैमरा लेकर आई। बाल आज भी कंधों तक खुले थे और आँखों के नीचे काला गड्ढा। उसने कुछ नहीं पूछा, बस कैमरा मेरे हाथ में दिया और बोली, "रिकॉर्डिंग चालू है। बोल।"
"क्या बोलूँ?"
"जो सुबह सात बजे बोला जाता है। जो सच, किसी की जल्दबाज़ी में दब न जाए।"
मैंने कैमरे में देखा। लाल बत्ती जल रही थी। मैंने सोचा — काश सच भी ऐसा होता। एक बत्ती जलती और सब पकड़ा जाता।
पापा दुकान से निकले। नीली शर्ट, वही घिसी आस्तीन, हाथ में रिंच। तीन साल में पहली बार मुझे लगा कि उनका कद थोड़ा बढ़ गया है। पहले वो झुके हुए नहीं चलते थे, झुके हुए दिखते थे। आज चलते हुए ज़मीन पर पैर पूरा टिका रहे थे।
"चलें?" उन्होंने पूछा।
"चलिए।"
उस्ताद भी दुकान से बाहर आए। चश्मा पोंछ रहे थे। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और कहा, "जो काग़ज़ आज देखने को मिलेगा, उससे नाराज़ मत होना।"
"क्यों?"
"क्योंकि काग़ज़ नाराज़ी का नहीं, पढ़ने का मामला है। नाराज़गी जो लोग काग़ज़ से करते हैं, वो बाद में आदमियों से करते हैं। और आदमियों से नाराज़गी में हमेशा एक आदमी ज़्यादा टूटता है।"
हम निकले। बच्चे पहले से चबूतरी पर बैठे थे। टिंकू के हाथ में बाल्टी नहीं थी। आज वह सीधा खड़ा था, जैसे उसने भी कोई फ़ैसला कर लिया हो।
अस्पताल की गली में पहुँचते-पहुँचते सात का ठीक वक़्त हो गया।
और जैसे ही हम मुड़े, सामने वही दृश्य था जिसकी मुझे सुबह पाँच बजे से आदत सी हो गई थी — पीली जैकेट।
तीन लोग।
एक अफ़सर, जिसके हाथ में लंबी पीली पट्टी बँधी थी। दो लड़के, एक के हाथ में काग़ज़ों का बोर्ड, दूसरे के हाथ में कैमरा। कैमरा अस्पताल के दरवाज़े की तरफ़ उठा हुआ था, जैसे वो नाप नहीं रहे हों, गिन रहे हों।
अफ़सर ने पट्टी को ज़मीन पर रखा। पट्टी खुलते हुए ज़ोर की आवाज़ करती रही — एक लंबी चीख जैसी, जो धीरे-धीरे फैलती गई। और फिर आवाज़ आई, "टक।"
एक निशान, ज़मीन पर। दीवार से लेकर नीम के पेड़ के पास तक।
"फिर से," अफ़सर ने कहा।
और फिर वही आवाज़ — पट्टी खुलना, ज़मीन पर पड़ना, टक।
यही तो यह लोग करते हैं, मैंने सोचा। नापते हैं। और जिस दिन नाप खत्म हो जाए, उस दिन आदमी भी खत्म हो जाता है।
मैंने अस्पताल के गेट के अंदर झाँका।
डॉक्टर इसरानी वहीं थे।
वो बरामदे में, अपने पुराने स्टेथोस्कोप को हाथ में लिए बैठे थे। एक बूढ़ी औरत सामने कुर्सी पर थी, उनका हाथ उसकी कलाई पर। जैसे बाहर कुछ हो ही न रहा हो।
अफ़सर अंदर आया। उसके पीछे दोनों लड़के आए।
"डॉक्टर साहब," अफ़सर ने कहा, "हमें अस्पताल का बाहरी हिस्सा नापना है और कुछ फोटो लेने हैं। ज़रा पच्चीस मिनट दीजिए।"
डॉक्टर इसरानी ने बूढ़ी औरत की कलाई छोड़ी। फिर धीरे से बोले, "पच्चीस मिनट देना तो मेरे हाथ में है। पर मरीज़ का हाथ छोड़ना मेरे हाथ में नहीं है। आप नाप लीजिए। मैं बीच में नहीं आऊँगा।"
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