The Mysterious Bell – Chapter 954
गुड्डू ने सफ़ेद चादर ओढ़ रखी थी, जिसके एक कोने पर फूल छपे थे, और गले में साइकिल की ज़ंग लगी चेन लटकी थी।
रफ़ीक़ की कमर में माँ का लाल कपड़ा बँधा था और हाथ में बेंत की जगह सूखी नीम की डंडी।
और चिंटू — चिंटू के हाथ में समोसे का काग़ज़ी डिब्बा था, जिसे वो सीने से चिपकाए खड़ा था, जैसे कोई खज़ाना हो।
मैं दरवाज़े के सहारे खड़ा हो गया और कुछ नहीं बोला।
टिंकू ने अपना भाषण शुरू किया। "आज का सीन समझो। रणवीर — यानी गुड्डू — अपने आदमियों के साथ दुकान पर आता है। उस्ताद की दुकान पर एक चाबी है। असली चाबी कभी नहीं। हम नकली चाबी से प्रैक्टिस करेंगे।"
उसने जेब से एक मुड़ी हुई कील निकाली और गर्व से दिखाई।
"यह है चाबी," उसने कहा।
चिंटू ने आँखें बड़ी करके देखा। "ये तो कील है।"
"चोरी में चीज़ें वैसी ही नहीं दिखतीं जैसी होती हैं," टिंकू ने कहा, जैसे उसने किसी किताब में पढ़ा हो।
"तो फिर चोरी कैसे पकड़ी जाएगी?" चिंटू ने पूछा।
"पकड़ी नहीं जाएगी, बस यही तो बात है," रफ़ीक़ बोला और अपनी डंडी घुमाई। "इसीलिए तो पुलिस बनते हैं।"
सानिया ने कैमरा आगे किया। "मैं रिकॉर्ड कर रही हूँ। ये बात बाद में काम आएगी।"
टिंकू ने योजना समझाई। चाबी समोसे के डिब्बे में छिपाई जाएगी। रणवीर के आदमी आएँगे, दुकान खँगालेंगे, औज़ारों वाला ट्रंक खोलेंगे, पुराने डिब्बों को उलटेंगे — पर समोसे के डिब्बे को कोई नहीं छुएगा। क्योंकि चोर भी जानता है कि खाने की चीज़ को छूने से पहले सोचना पड़ता है।
"ये तो बहुत अच्छा प्लान है," गुड्डू ने चादर सँभालते हुए कहा।
"हाँ," टिंकू ने कहा, "बस एक शर्त है। डिब्बे को कोई खोलने वाला नहीं।"
चिंटू ने बहुत मासूम चेहरा बनाकर पूछा, "क्यों?"
"क्योंकि उसमें समोसे हैं," टिंकू ने कहा, "और हमारे मोहल्ले में समोसे का लालच सबसे बड़ा जासूस है।"
मैं हँस पड़ा। हल्का-सा, अंदर से।
फिर टिंकू ने चाबी — माफ़ कीजिए, कील — काग़ज़ के नीचे रख दी और डिब्बा चिंटू के हाथ में थमा दिया।
"अब बैठ, और जैसे कोई नहीं देख रहा हो, वैसे बैठ।"
चिंटू बैठ गया।
फिर गुड्डू चादर लहराता हुआ आया और गले में से आवाज़ निकाली, "कहाँ है मिस्त्री? मेरी कंपनी का काग़ज़ कहाँ है?"
रफ़ीक़ ने डंडी घुमाई, "हाथ ऊपर करो!"
सानिया ने कैमरा आगे किया।
और तभी — मुझे पता नहीं कैसे हुआ — मैंने चिंटू की तरफ़ देखा।
उसका हाथ डिब्बे के अंदर था।
उसके गाल फूले हुए थे।
टिंकू ने उसे देखा और जैसे किसी का पूरा सिनेमा एक झटके में टूट गया। "चिंटू!"
चिंटू ने जल्दी से निगल लिया और बोला, "मैंने कुछ नहीं किया।"
"तू समोसा खा रहा है!"
"मैं बस… मैं बस डिब्बा सूँघ रहा था।"
"सूँघने से गाल फूलते हैं क्या?"
चिंटू ने बहुत ईमानदारी से कहा, "मेरे तो फूलते हैं।"
गुड्डू चादर में उलझकर हँसने लगा। रफ़ीक़ ने डंडी ज़मीन पर पटकी और सानिया का कैमरा हिल गया।
मैंने देखा — डिब्बे में एक समोसा बचा था और कील कहीं गायब थी।
"रुको रुको," टिंकू ने कहा, "चाबी कहाँ है?"
चिंटू ने डिब्बा खाली करके उलट दिया। काग़ज़ गिरा। टुकड़े गिरे। कील नहीं गिरी।
"अरे," चिंटू ने कहा, "इसमें तो दूसरा समोसा भी था।"
"तूने दोनों खा लिए?"
"मैंने एक खाया। दूसरा खुद ही चला गया।"
टिंकू का चेहरा ऐसा हो गया जैसे उसने पूरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा विश्वास खो दिया हो। "चिंटू… तूने… तूने सबूत खा लिया।"
चिंटू ने कहा, "मैं गवाही दे सकता हूँ कि समोसे अच्छे थे।"
सानिया ने कैमरा बंद कर दिया। "ये नहीं चलेगा। असली में तो पूरी गली सुन लेती।"
रफ़ीक़ आगे आया, "मैं पुलिस हूँ, मैं चिंटू को गिरफ़्तार करता हूँ। सबूत खाना गंभीर अपराध है।"
"मैंने सबूत नहीं खाया," चिंटू चिल्लाया, "मैंने समोसा खाया! सबूत तो काग़ज़ है!"
"हाँ, और काग़ज़ भी तूने खाया," रफ़ीक़ ने कहा।
"काग़ज़ नहीं खाया! काग़ज़ फेंक दिया!"
"तो फिर चाबी कहाँ है?"
सब चुप हो गए।
और तभी मैंने देखा — चिंटू की कमीज़ की जेब से एक सिरा निकला हुआ है। वो मुड़ी हुई कील वहीं थी। समोसे के साथ जेब में चली गई थी।
मैंने उँगली से इशारा किया।
टिंकू ने देखा, और उसका चेहरा लौट आया। "चिंटू… तेरी जेब।"
चिंटू ने जेब टटोली और कील निकालकर सबको दिखा दी, जैसे उसने कोई खज़ाना खोज लिया हो। "मिल गई!"
"मिल गई नहीं, तेरे पेट से बच निकली," टिंकू ने कहा।
"मैं कह रहा था ना, मैंने कुछ नहीं खाया।"
"तूने दोनों खाए!"
मैं हँसते-हँसते दरवाज़े के सहारे झुक गया।
"बस बस," मैंने कहा। "अब सुनो।"
सब मेरी तरफ़ मुड़े।
"तुम लोग चोरी में भी इतने ईमानदार हो," मैंने कहा, "कि डर लगता है। समोसे में चाबी, चाबी जेब में, और जेब वाले की जेब खुली — ये चोरी नहीं, ये प्रसाद बाँटना है।"
चिंटू ने कहा, "तो क्या मैं अब भी पुलिस का बंदी हूँ?"
"नहीं," मैंने कहा। "तू अब गवाह है। और गवाह को सबसे पहले ये बताना पड़ता है कि उसने क्या देखा, क्या नहीं।"
चिंटू ने सोचकर कहा, "मैंने देखा कि समोसे अच्छे थे।"
टिंकू ने उसका सिर पकड़कर हिलाया।
फिर मैंने उन सबको बैठा दिया — चबूतरी से उतारकर, दुकान के सामने की पत्थर की पटिया पर — और जो बात कहनी थी, वो कही।
"असली चोरी में चाबी कभी खाने की चीज़ के पास नहीं रखते," मैंने कहा। "क्योंकि भूख चोरी से तेज़ होती है। और एक बात — चाबी छिपाना बड़ी बात नहीं है। चाबी उस आदमी के हाथ में न जाना चाहिए जिसे तुम डरते हो। बस इतना याद रखो।"
टिंकू ने धीरे से कहा, "और अगर हम असली में डरते हों?"
मैं कुछ देर उसकी तरफ़ देखता रहा।
"तो भी काम करना पड़ता है," मैंने कहा।
तभी मीरा गली के मोड़ से आई।
उसके हाथ में कैमरा था, बैग कंधे पर, और चेहरे पर वो भाव जो अब मैं पहचानने लगा हूँ — जैसे वो किसी को डाँटने आई हो और डाँटने से पहले खुद को रोक रही हो।
उसने सबको देखा। गुड्डू की चादर। रफ़ीक़ की डंडी। चिंटू के मुँह पर लगा काग़ज़ का टुकड़ा। सानिया का गत्ते का कैमरा।
"समोसे किसने खाए?" उसने पूछा।
चिंटू ने गुड्डू की तरफ़ देखा। गुड्डू ने रफ़ीक़ की तरफ़। रफ़ीक़ ने डंडी की तरफ़।
मीरा ने गहरी साँस ली और कैमरा मेज़ पर रख दिया।
"अच्छा," उसने कहा। "अब मेरी बारी।"
सब चुप हो गए, क्योंकि मीरा की आवाज़ में वो चीज़ थी जो नाटक के बीच आ जाए तो नाटक रुक जाता है।
"तुम लोग ये सब कर रहे हो," उसने धीरे से कहा, "लेकिन असली माफ़ी का एक बार भी रिहर्सल नहीं किया।"
टिंकू बोला, "वो तो मैंने सोचा था, पर चिंटू—"
"चिंटू बाद में," मीरा ने कहा। "अंकुश, तुम पाँच बजे भवन में माफ़ी माँगने वाले हो। बोलो, क्या कहोगे?"
मैंने सोचा।
और मुझे कुछ नहीं सूझा।
मैंने हँसकर कहा, "देखो, मैं कुछ ऐसा कहूँगा जो सुनने में माफ़ी लगे, पर अंदर से तीर जैसा हो।"
मीरा ने सिर हिलाया। "यही तो दिक्कत है।"
फिर उसने बच्चों की तरफ़ देखा और कहा, "तुम सब बाहर। दुकान के बाहर, पत्थर की पटिया पर। कोई अंदर नहीं झाँकेगा।"
"मैं पुलिस हूँ," रफ़ीक़ ने कहा, "पुलिस को इजाज़त होती है।"
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