The Mysterious Bell – Chapter 952
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कार्ड मेरी मेज़ पर पड़ा था, और उसके नीचे मंसूर चाचा का पीला काग़ज़। दोनों पर एक ही निशान — दो लकीरें, बीच में एक बिंदु।
मैंने कार्ड उठाया। एक बार फिर खोला।
और तभी मेरे हाथ में कुछ और आया।
कार्ड के अंदर, दाहिनी तरफ़, एक छोटी जेब बनी थी। उस जेब में एक पतली सी पर्ची दबी थी, जो पहले मुझे दिखी ही नहीं थी।
मैंने उसे निकाला।
पर्ची पर नीली स्याही में, बहुत साफ़ अक्षरों में, तीन लाइनें लिखी थीं।
पहली लाइन — समारोह में आपका स्वागत है।
दूसरी लाइन — समारोह के अंत में, मंच पर, सबके सामने, आप अपनी ग़लती मानकर माफ़ी माँगेंगे।
और तीसरी लाइन —
उसी पल, आपकी खोई हुई याद की चाबी, आपको लौटा दी जाएगी।
मैंने पर्ची को दो बार पढ़ा।
तीसरी बार पढ़ते वक़्त मेरे हाथ काँप रहे थे — गुस्से से नहीं, हैरानी से।
क्योंकि माफ़ी माँगने की बात तो मैं समझ गया था। वो तो रणवीर का पुराना तरीक़ा था। पहले सबके सामने झुकवाओ, फिर उस झुकने की तस्वीरें छापो, और फिर साल भर कहो कि देखो, जो मेरे पास आया, उसने खुद माना कि उससे ग़लती हुई थी।
मगर याद की चाबी?
यह रणवीर को कैसे पता चली कि मेरी कोई याद खोई हुई है?
मैंने पर्ची मेज़ पर रखी, और उसी वक़्त दुकान के बाहर से टिंकू की आवाज़ आई।
"उस्ताद! उस्ताद, कार्ड मिल गया?"
वो भागता हुआ आया। पीछे-पीछे सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू। चारों के हाथ में कुछ न कुछ था — टिंकू के हाथ में मेरी पुरानी रिंच, सानिया के हाथ में माचिस की डिब्बी, गुड्डू के हाथ में रस्सी का एक टुकड़ा और रफ़ीक़ के हाथ में आधा खाया समोसा।
मैंने पर्ची उनकी तरफ़ सरका दी।
टिंकू ने उसे पढ़ा। उसके मुँह से सिर्फ़ इतना निकला —
"अरे, ये तो आसान है!"
"क्या?"
"उस्ताद, चाबी चुरा लें!"
मैं एक पल के लिए चुप रह गया।
"क्या?"
"चुरा लें!" टिंकू ने दोनों हाथ फैलाकर कहा, जैसे किसी बड़ी योजना का ऐलान कर रहा हो। "सिनेमा में ऐसा ही होता है। एक आदमी मंच पर बोलता रहता है, दूसरा पीछे से चाबी उठा लेता है। बस चार लोग चाहिए। एक मंच के पीछे, एक सीढ़ी पर, एक भीड़ में, और एक बाहर गाड़ी के पास।"
सानिया ने तुरंत कहा, "मैं झाड़ू लेकर चलूँगी। पोशाक बदल लूँगी। कोई कहेगा कि सफ़ाई करने आई है।"
"मैं रस्सी लाऊँगा," गुड्डू बोला। "छत से लटक जाऊँगा। छत से सब दिखता है।"
"और मैं," रफ़ीक़ ने आधा समोसा ऊपर उठाया, "समोसे में नींद की दवा डाल दूँगा। सामने वाला खा लेगा, तो सो जाएगा।"
"नींद की दवा कहाँ से लाएगा?" चिंटू ने पूछा।
"चूड़ी वाली बाई के यहाँ से।"
"चूड़ी वाली बाई नींद की दवा नहीं बेचती।"
"तो तू अपना समोसा दे देना। तेरा समोसा खाने के बाद कोई भी सो जाता है।"
चिंटू ने समोसा छीन लिया, और चारों बच्चे वहीं लड़ने लगे।
मैं हँस पड़ा।
सच कहूँ, तो कई दिनों बाद मैं सच में हँसा था। इतने दिनों से मेरी हँसी उधार की लग रही थी, कोई न कोई चीज़ उसे अंदर से खींच रही थी। मगर इस वक़्त, इस छोटी सी दुकान में, पाँच बच्चों की उस बेतुकी योजना को सुनकर, मेरी हँसी अपनी लगी।
टिंकू मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराया।
"देखा? हँस दिए न। मेरा प्लान बुरा है क्या?"
"बुरा नहीं है," मैंने कहा। "बस एक कमी है।"
"क्या?"
मेरी हँसी धीरे-धीरे उतर गई।
मैंने पर्ची उठाई और उसे सामने रखा। फिर कुर्सी खींचकर बैठ गया। बच्चे भी चुपचाप बैठ गए — सानिया फ़र्श पर, गुड्डू और रफ़ीक़ पंचर वाले टब के किनारे, चिंटू मेरे पैर के पास, और टिंकू मेरे सामने वाले स्टूल पर।
"टिंकू," मैंने कहा, "तूने मंसूर चाचा की बात सुनी थी?"
"कौन सी?"
"वो वाली, जब वो ताले के बारे में बता रहे थे। मैंने तुझे बताया था।"
टिंकू ने सोचा, फिर उसका चेहरा उतर गया। "वो जो कह रहे थे… कि ताला चोरी से खोलोगे तो…"
"तो क्या?"
"तो याद उसके पास चली जाएगी जिसने उसे छिपाया है।"
मैंने सिर हिलाया।
"चोरी का मतलब है डर। और जहाँ डर है, वहाँ ताला खुद अपना रास्ता चुनता है। अगर मैं आज सभा में हाथ साफ़ करके चाबी उठा लूँ, तो ताला ऐसे नहीं खुलेगा जैसे सच बोलने से खुलता है। वो खुलेगा भी, तो किसी दूसरे गले पर।"
"मतलब?"
"मतलब यह कि मेरी याद मुझ तक नहीं आएगी। वो उसी के पास जाएगी जो उसे अभी पकड़े बैठा है। और फिर मैं सालों तक यही ढूँढता रहूँगा कि आख़िर खोया क्या है।"
सानिया ने धीरे से कहा, "तो फिर सिनेमा वाला प्लान बेकार?"
"सिनेमा वाला प्लान बेकार नहीं है," मैंने कहा, "सिनेमा वाला प्लान सिर्फ़ सिनेमा में चलता है। असली दुनिया में उसका बिल आख़िर में मुझे भरना पड़ता है।"
रफ़ीक़ ने समोसा जेब में रख दिया, जैसे उसने अपनी योजना भी वहीं रख दी हो।
टिंकू कुछ देर चुप रहा। फिर उसने पूछा, "तो उस्ताद, अगर चोरी नहीं, तो फिर क्या? क्या सच में आप मंच पर जाकर सबके सामने माफ़ी माँगेंगे?"
"नहीं," मैंने कहा।
"तो?"
"मैं सोच रहा हूँ," मैंने कहा, "कि मुझे माफ़ी माँगनी है या नहीं, ये बात रणवीर की नहीं, मेरी है। और ये बात मंच की नहीं है।"
तभी बाहर से मीरा की आवाज़ आई।
"अंकुश!"
वो अंदर आई, कंधे पर कैमरा, और हाथ में एक काग़ज़। उसके बाल आज भी बेतरह बिखरे थे, और माथे पर पसीना था।
"मैं तेरे पास एक ज़रूरी बात लेकर आई हूँ," उसने काग़ज़ मेज़ पर रखते हुए कहा, "समारोह का कार्यक्रम। जो काग़ज़ रणवीर के लोगों ने आज सुबह गुमटी पर छोड़ा है।"
मैंने उसे उठाया।
उस काग़ज़ पर सब लिखा था — कौन बोलेगा, कितने मिनट, किस क्रम में, और कब तालियाँ बजेंगी।
सबसे नीचे, बड़े अक्षरों में, मेरा नाम।
और उसके आगे छोटे अक्षरों में: आत्म-स्वीकृति एवं क्षमा-याचना।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"मीरा?"
"हाँ?"
"माफ़ी माँगने को इतना बड़ा मंच क्यों चाहिए?"
मीरा ने काग़ज़ वापस लिया और उसे तह कर दिया।
"क्योंकि माफ़ी मंच पर नहीं माँगी जाती," उसने कहा। "माफ़ी दो लोगों के बीच माँगी जाती है। तीसरा जो देख रहा हो, वो माफ़ी नहीं होती, तमाशा होती है।"
बच्चे चुप हो गए।
मीरा ने आगे कहा, "और सबके सामने झुकना माफ़ी नहीं होता, अंकुश। जिसे सच में माफ़ी माँगनी हो, वो ज़्यादा बोलता नहीं। जो कैमरे के सामने माफ़ी माँगे, उसे माफ़ी नहीं चाहिए, उसे सिर्फ़ सबूत चाहिए। सबूत कि मैंने अपनी ग़लती मान ली। सबूत कि मैं बड़ा आदमी हूँ।"
"मैंने कहा था कि सिक्का दो तरफ़ का होता है?"
"नहीं, तूने नहीं कहा था।"
"तो सुन," मैंने कहा, "रणवीर को मेरी माफ़ी से कोई मतलब नहीं है। उसे सिर्फ़ एक वीडियो चाहिए। और मुझे पता है वो क्यों चाहिए।"
मीरा ने आँखें सिकोड़कर देखा।
"क्यों?"
"क्योंकि जिस दिन पूरी गली यह कहेगी कि अंकुश ने खुद माफ़ी माँगी थी, उस दिन जो भी मेरे साथ होगा, उसे लोग ऐसे देखेंगे जैसे कोई गुस्सा नहीं, कोई बदला नहीं — बस हिसाब। माफ़ी माँगने वाले से कोई दूसरी माफ़ी नहीं माँगता। बस।"
टिंकू ने कहा, "तो हम माफ़ी नहीं माँगेंगे?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"टिंकू, माफ़ी माँगने से बड़ा कोई काम नहीं होता। मैं माफ़ी माँगने की बात से नहीं डरता। मैं सिर्फ़ यह नहीं चाहता कि मेरी माफ़ी को कोई सबूत बना दे।"
बच्चे चुपचाप बैठे रहे।
मैं कुछ कहने ही वाला था कि मेरी नज़र दुकान के दरवाज़े पर गई।
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