The Mysterious Bell – Chapter 951
और जैसे उसने यह कहा, बाहर से पैरों की आवाज़ें आईं। बच्चों की भागदौड़। टिंकू सबसे आगे, हाथ में कुछ पकड़े हुए। पीछे सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू।
"उस्ताद!" टिंकू चिल्लाया, साँस फूली हुई। "उस्ताद! बड़ा साहब का बंद लिफ़ाफ़ा!"
सानिया ने हाँ में सिर हिलाया और थोड़ी साँस लेकर बोली, "सुनहरा है टिंकू। ऐसा लगता है जैसे किसी इनाम वाला काग़ज़ हो।"
मैंने वो लिफ़ाफ़ा अपनी तरफ़ बढ़ाया।
वो सच में सुनहरा था। नहीं, सुनहरा नहीं। रेशमी। पीले रंग का मोटा काग़ज़, ऊपर चमकती हुई परत, और कोने पर एक छोटी सी जगह खाली छोड़ी गई थी, जहाँ मुहर लगनी थी। बीच में मेरा नाम लिखा था, नीली स्याही में, साफ़ अक्षरों में।
टिंकू ने इसे मेज़ पर रखा और मैंने उँगली से छुआ। काग़ज़ मोटा था, किसी अच्छे दफ़्तर का।
मेरे पीछे मीरा खड़ी थी। उसकी आवाज़ आई, ठंडी, सपाट।
"खोल," उसने कहा। "पर मेरी बात याद रखना। इस लिफ़ाफ़े के अंदर जो है, वो न्योता नहीं है।"
मैंने किनारे से लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर एक कार्ड निकला, मोटा, चमकदार। ऊपर सुनहरे अक्षरों में लिखा था — भारद्वाज ट्रस्ट।
मैंने पढ़ा।
"आदरणीय अंकुश यादव जी,
साइकिल गली के इस अनमोल बेटे को हम अपने ट्रस्ट के वार्षिक सम्मान समारोह में विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित करते हैं।
आपके संघर्ष, आपकी मेहनत और आपके हुनर ने इस इलाक़े का नाम रोशन किया है।
इस समारोह में आपको सम्मानित करके हमें गर्व होगा।
स्थान — भारद्वाज भवन का खुला प्रांगण।
समय — आज साँझ पाँच बजे।
आपकी उपस्थिति अनिवार्य है।
हस्ताक्षर — रणवीर भारद्वाज।"
मैंने कार्ड बंद कर दिया।
कमरे में सन्नाटा हो गया।
फिर टिंकू का शोर — "अरे, यह तो बहुत बड़ी बात है उस्ताद! यह तो तेरी इज़्ज़त का काग़ज़ है!"
गुड्डू ने कहा, "अरे, वहाँ तो बहुत सारी मिठाई होगी।"
रफ़ीक़ ने कहा, "मैं भी चलूँगा।"
चिंटू ने चुप्पी से कहा, "उस्ताद, वहाँ फोटो खिंचेगी।"
मगर मीरा ने कुछ नहीं कहा। वो मेरी तरफ़ देख रही थी और उसका चेहरा कड़ा था, वैसा जैसे बारिश से पहले आकाश कड़ा हो जाता है।
"नहीं," उसने अंत में कहा। "यह न्योता नहीं है। यह जाल है।"
टिंकू ने सिर उठाया।
"क्यों, दीदी?"
मीरा ने सबकी तरफ़ देखा और फिर मेरी तरफ़।
"टिंकू," उसने कहा, "जो आदमी रातों-रात अस्पताल की ज़मीन की मोहर बदल देता है, जो दुकान को सील करने की धमकी देता है, जो कहता है कि सभा में सिर्फ़ दो लोग बैठेंगे और बाक़ी खड़े रहेंगे, वो अचानक तेरे उस्ताद को इज़्ज़त देने क्यों लगा?"
टिंकू चुप हो गया।
"क्योंकि," मीरा ने कहा, "वो अंकुश को उसके घर से बाहर निकालना चाहता है। उस वक़्त जब उसका अपना घर, उसका दरवाज़ा, उसका संदूक खुलने वाला है। वो चाहता है कि उस दरवाज़े के सामने कोई न हो। वो चाहता है कि उसकी गली आज सुबह से खाली हो।"
मैंने कार्ड फिर खोला।
मैंने उसे उलटा किया।
मैंने उसे ध्यान से देखा।
और तब मेरी नज़र नीचे की तरफ़ गई।
कार्ड के निचले कोने पर, स्याही से नहीं, पेंसिल या धातु की नोक से, बहुत छोटा सा निशान बना था। दो पतली लकीरें, और उनके बीच एक बिंदु।
वही निशान।
वही निशान जो मंसूर चाचा के पीले काग़ज़ पर था। वही निशान जो चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े पर बाईस साल से खुदा है। वही निशान जो उस्ताद की घंटी के छल्ले पर पचास साल पहले था।
मेरा हाथ काँप गया।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"क्या हुआ?"
मैंने कार्ड उसकी तरफ़ बढ़ाया।
"नीचे देख," मैंने कहा।
उसने देखा। और एक पल के लिए मीरा की आँखें फैल गईं।
"यह…" उसने धीमे से कहा।
"हाँ," मैंने कहा। "यह वही निशान है।"
टिंकू ने कार्ड छीनकर देखा, फिर सानिया को दिया, फिर गुड्डू को।
सानिया के हाथ से कार्ड फिसलकर ज़मीन पर गिरा। पर कोई उसे उठाने नहीं गया।
मैंने कुर्सी खींचकर बैठ गया।
मेरे हाथ में वो निशान था। मेरे सामने मीरा का चेहरा था। और मेरे भीतर वो धुन फिर से गूँजने लगी थी, धीरे-धीरे, पर इस बार वो मेरी ही धुन नहीं थी। इस बार वो साफ़ सुनाई दे रही थी।
फिर मीरा ने धीरे से कहा, "अंकुश।"
"हूँ।"
"यह निशान… इसे जानता है कौन?"
"मंसूर चाचा," मैंने कहा। "और शायद दादा। और शंकरलाल।"
"तो इस कार्ड पर यह निशान क्यों है?"
मैंने कोई जवाब नहीं दिया, क्योंकि मेरे पास जवाब नहीं था।
मैं सिर्फ़ इतना जानता था कि आज शाम पाँच बजे, भारद्वाज भवन के प्रांगण में, रणवीर मेरे हाथ में कुछ देने वाला है।
और मुझे पता था — जो भी वो देगा, वो मेरे हाथ में नहीं, मेरे घर की चुप्पी में जाएगा।
मैंने घंटी जेब से निकाली। उसे हथेली पर रखा।
घंटी ठंडी थी। बहुत ठंडी।
इतनी ठंडी कि जैसे अभी-अभी किसी बंद कमरे से लाई गई हो।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"आज शाम," मैंने कहा, "जब वो मुझे बुला रहा है, तो चलूँगा।"
मीरा ने मुँह खोला, पर मैंने हाथ उठाकर उसे रोका।
"चलूँगा," मैंने दोहराया, "पर अकेला नहीं।"
"क्या मतलब?"
मैंने कार्ड उठाया। उसकी तरफ़ देखा। फिर टिंकू की तरफ़, जो मेरी तरफ़ देख रहा था, मुँह खुला हुआ।
"मीरा," मैंने कहा, "मुझे आज सभा में सिर्फ़ रणवीर से नहीं मिलना है। मुझे आज सभा में उस निशान से मिलना है। और उस निशान से मिलने के लिए मुझे शंकरलाल चाहिए। पूरा शंकरलाल। आधा नहीं। आधी आवाज़ से आधी चुप्पी नहीं खुलेगी।"
मीरा ने धीरे से कहा, "और वो कहाँ है?"
मैंने चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े की तरफ़ देखा। दीवार के उस पार, मेरे ही घर के भीतर।
"पता नहीं," मैंने सच कहा। "पर आज शाम तक पता चल जाएगा।"
और मैंने कुर्सी से उठते हुए घंटी को मुट्ठी में कस लिया।
घंटी ने कुछ नहीं कहा।
पर मुझे लगा — जब मैंने उसे मुट्ठी में कसा, तो बहुत हल्का सा, बहुत धीमा सा, वो फुसफुसाई।
जैसे किसी बच्चे ने नींद में कुछ कहा हो।
और उस फुसफुसाहट में सिर्फ़ दो शब्द थे —
"अब देख।"
मैं बाहर निकला।
पीपल की छाया में सुबह की बात अब भी ताज़ा थी। मगर इस बार पीपल के नीचे कोई नहीं था। बस चबूतरी खाली पड़ी थी, और हवा, और वो गंध — बहुत हल्की, इतनी हल्की कि मैं उसे पहचान भी नहीं पा रहा था।
मैंने दुकान में आकर कार्ड को अपनी मेज़ पर रखा।
उसके नीचे वो दो लकीरें और बिंदु थे।
मैंने अपनी जेब से मंसूर चाचा का पीला काग़ज़ निकाला। उसे कार्ड के बगल में रखा।
दोनों निशान अलग नहीं थे। एक ही थे।
एक ही हाथ ने बनाए थे। या एक ही हाथ ने छापे थे।
और मैंने अपने आप से कहा —
अगर यह निशान मंसूर चाचा के पीले काग़ज़ पर है, और यह काग़ज़ ताले-चाबी वाले आदमी का है…
तो फिर यह निशान रणवीर के कार्ड पर क्यों है?
या फिर…
रणवीर वो नहीं है, जो वो दिखता है।
या फिर…
रणवीर किसी और का नहीं, अपने ही घर का आदमी है।
और मुझे आज शाम, पाँच बजे, न सिर्फ़ रणवीर से मिलना है।
मुझे आज शाम, पाँच बजे, उस निशान से मिलना है।
क्योंकि निशान झूठ नहीं बोलते।
सिर्फ़ इंसान झूठ बोलते हैं।
और मैंने आज शाम के लिए तीन चीज़ें तैयार रखी थीं —
घंटी।
तस्वीर।
और मंसूर चाचा का ताला।
क्योंकि अगर आज शाम रणवीर मुझे सबके सामने सम्मान देने वाला था, तो मैं भी उसे सबके सामने एक नाम देने वाला था।
नाम जो अब तक बंद था।
मगर जिसे आज शाम बंद नहीं रहना था।
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