The Mysterious Bell92 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 92

6 min read November 5, 2026

मैं उठ खड़ा हुआ।

"कहाँ जा रहे हो?" शबनम आपा ने पूछा।

"पीपल के नीचे," मैंने कहा। "चाय पीने।"

"अभी सुबह के दस बजे हैं। वो दोनों दोपहर के बाद आते हैं।"

"तो मैं उनसे मिलने जाऊँगा," मैंने कहा। "किसी के घर। मुझे पता है ऐसे लोगों को कहाँ ढूँढना चाहिए।"

—

उस्ताद तुफ़ैल का घर पीपल के पूरब वाली गली में था। एक छोटा सा कमरा, बाहर आँगन, और आँगन में सुखी हुई मिर्च की लाल लड़ियाँ टँगी थीं। दरवाज़े पर मैंने दस्तक दी।

"कौन?"

"अंकुश। साइकिल वाला।"

कुछ देर चुप्पी।

"अंदर आ।"

मैंने दरवाज़ा खोला। कमरे में धूल की गंध थी, पुराने तेल की गंध थी, और एक तीसरी गंध थी जो मुझे पहचान नहीं आई। बाद में समझ आया — वो हारमोनियम की गंध थी। पुराने लकड़ी की, पुराने रीड की, जिस पर सालों से कोई हाथ नहीं फिरा।

कमरे के कोने में एक हारमोनियम रखा था। ढका हुआ था, एक सफ़ेद पुराने कपड़े से, जिस पर पीले धब्बे पड़ गए थे।

उस्ताद तुफ़ैल चारपाई पर बैठे थे। सफ़ेद दाढ़ी, जिसे कंघी नहीं की गई थी। एक आँख पर पुराना सा पर्दा, और हाथ में वो लाठी जिसके साथ सानिया ने कहा था वो रोज़ आता है।

"बैठ," उन्होंने कहा।

मैं बैठ गया। ज़मीन पर, उनके पैरों के पास। मुझे लगा कि ऐसे आदमी के सामने कुर्सी पर नहीं बैठना चाहिए।

"तू वही है," उन्होंने कहा, "जो पीपल के नीचे बुज़ुर्गों को मिलाता है?"

"ऐसा ही कहते हैं लोग।"

"मुझे नहीं मिला।"

"आप मिलने नहीं आ रहे," मैंने कहा।

उन्होंने लाठी की नोक ज़मीन पर रखी।

"मैं आता हूँ," उन्होंने कहा। "रोज़।"

"मिलने के लिए?"

"उस पेड़ को देखने।"

"और वो दूसरे?"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।

"तू सीधा बोलता है," उन्होंने कहा। "यही अच्छा है। पर सीधा बोलने वाले को सीधा जवाब नहीं मिलता।"

"तो टेढ़ा पूछूँ?"

वो मुस्कुराए। बहुत हल्का। मुश्किल से होंठ हिले।

"तुझे क्या जानना है?"

"चालीस साल पहले क्या हुआ था?"

उन्होंने अपनी लाठी उठाई और उसकी नोक से ज़मीन पर एक लकीर खींची। फिर उसे मिटा दिया, उंगली से।

"उस वक़्त मैं तीस का था," उन्होंने कहा। "वो भी। हमने पहली बार साथ बजाया था — इसी गली में। किसी के घर शादी थी। उस दिन से हम जुड़ गए। गली के बाहर भी जाने लगे। शहर-शहर।" उन्होंने रुककर ज़मीन पर पड़ी धूल में उंगली फिराई। "मैं उसके बिना हारमोनियम नहीं बजाता था। और वो मेरे बिना तबला नहीं छेड़ता था।"

"फिर?"

"फिर एक रात," उन्होंने कहा, "हम बड़े शहर में बजा रहे थे। उस रात बहुत भीड़ थी। बीच में, ठीक उस वक़्त जब वो बजा रहा था, उसकी एक ताल टूट गई। छोटी सी बात थी। एक आदमी बैठा था — न जाने कौन, किसी का जीजा या चचेरा। उसने बीच में चुटकी बजाई और कहा, "हारमोनियम जैसा तबला कोई नहीं बजाता। तबले की तो छुट्टी है।"

"और आपने?"

"मैं हँसा नहीं था," उन्होंने कहा। धीमे से। "मेरी आँखों में पानी आ गया था। मुझे उसकी जगह अगर कोई कुछ बोलता तो मैं उसे छोड़ता नहीं। वो मेरा सबसे अच्छा साथी था। मेरा भाई। मुझसे ज़्यादा मेरी माँ उसे प्यार करती थी। और मैं — मैं उस रात हँस नहीं रहा था। मेरी आवाज़ नहीं निकल रही थी।"

"तो प्यारेलाल बाबा ने क्या समझा?"

"उसने मेरा चेहरा देखा ही नहीं," तुफ़ैल उस्ताद ने कहा। "उसने सिर्फ़ मेरी तरफ़ से कुछ सुना — शायद मेरी आवाज़ में एक हल्की सी हवा। मुझे लगता है उसे लगा कि मैं हँस रहा हूँ। वो तबला उठाकर बाहर चला गया।"

"और फिर?"

"फिर वो कभी नहीं बजाया," उन्होंने कहा। "वो कभी नहीं बजाया। दो लोगों की रात का काम था, और एक ही रह गया तो बंद हो गया। उसने तबला पीपल के कोटर में छुपा दिया — मुझे पता है, वो आज भी वहीं है। और मैंने हारमोनियम उठाकर सफ़ेद कपड़े से ढक दिया।"

"आपने बात क्यों नहीं की?"

"मैंने बहुत बार पूछना चाहा," उन्होंने कहा। "पहले महीने में तीन बार उसके दरवाज़े तक गया। तीनों बार हाथ दरवाज़े पर रखकर लौट आया। फिर साल भर गया। फिर दो। फिर ऐसे ही चालीस।"

"क्यों?"

"क्योंकि मैंने सोचा — जो इंसान तबला उठाकर चला जाए, वो अगर बात करना चाहे तो खुद आएगा।"

"और उन्होंने?"

"वो भी यही सोचता रहा होगा," उस्ताद तुफ़ैल ने कहा। "हम दोनों अब बूढ़े हो गए हैं, बेटा। हम दोनों ने अपनी-अपनी ज़ुबान को पेड़ पर टाँग दिया और चले गए। बोलने वाला कोई नहीं बचा। फिर हम चाय पीते हैं, हारमोनियम पर हाथ नहीं रखते, और एक-दूसरे की तरफ़ नहीं देखते।"

"पर आप एक-दूसरे के लिए चाय मँगवाते हैं।"

"वो मेरी नहीं होती," उन्होंने कहा। "वो उसकी होती है। वो मेरे लिए मँगवाता है, मैं उसके लिए। हम दोनों ने एक ही रोज़ शुरू किया था। एक-दूसरे से पूछे बिना।"

मैं कुछ देर बैठा रहा।

फिर मैंने कहा, "उस्ताद, आप मुझे एक चीज़ दे सकते हैं?"

"क्या?"

"एक बात। जो आपने अब तक किसी से नहीं कही।"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। सफ़ेद दाढ़ी के नीचे उनका मुँह हिला।

"तू क्या करेगा उस बात का?"

"मैं उसे आपके सामने रखूँगा। पीपल के नीचे।"

—

शाम पाँच बजे मैं पीपल के नीचे था।

उस्ताद तुफ़ैल पूरब से आए। लाठी टेकते हुए। मास्टर प्यारेलाल पश्चिम से आए। पतला शरीर, चश्मा, पुराना रूमाल। दोनों अपनी जगह बैठे। दोनों ने एक-दूसरे को देखा नहीं। दोनों के बीच में मैं बैठा था, और चारों बच्चे पीछे, चबूतरी के नीचे, चुपचाप।

शबनम आपा ने चाय भेज दी। दो कटोरियाँ। एक पूरब, एक पश्चिम। मैंने कहा, "आज एक कटोरी और भेजिए। तीसरी। मेरे लिए।"

पाँच मिनट तक कोई नहीं बोला।

फिर मैंने कहा, "तुफ़ैल उस्ताद, आप मेरे सामने एक बात कहना चाहते थे। कहिए।"

उस्ताद तुफ़ैल ने चाय का कटोरा नीचे रखा।

"मैं उस रात हँसा नहीं था," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। "मैं रो रहा था। मेरी आँखों में पानी था और मैं उसे छुपा रहा था। तेरा तबला टूटा देखकर मुझे अपना हारमोनियम टूटा लगा था।"

मास्टर प्यारेलाल की उँगलियाँ रुक गईं। वो चाय के कटोरे पर थीं।

"मैंने चालीस साल तुझे हँसता हुआ सोचा," उन्होंने कहा। रूखी आवाज़। "चालीस साल। मैंने सोचा कि तू मेरा तमाशा देखकर हँसा और चला गया। मैंने उसी रात तय कर लिया कि मैं तबला नहीं छेड़ूँगा। किसी के सामने नहीं।"

"तूने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं था," तुफ़ैल उस्ताद ने कहा। "तूने सिर्फ़ आवाज़ सुनी।"

"मैंने सुना," प्यारेलाल ने कहा। "मैंने सिर्फ़ आवाज़ सुनी। और मैं चला गया। मैंने तुझसे पूछा भी नहीं।"

कुछ देर चुप्पी रही।

फिर मास्टर प्यारेलाल ने धीमे से कहा, "तू मेरे लिए रोज़ चाय मँगवाता है।"

"तू भी," तुफ़ैल उस्ताद ने कहा।

"मैंने सोचा था तू मुझे माफ़ नहीं किया।"

"मैंने सोचा था तू मुझे।"

"मैंने तुझे कभी नहीं छोड़ा, बेवकूफ़," प्यारेलाल ने कहा। उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो चालीस साल बाद फूट रहा था। "मैं तबला उठाकर चला गया, पर मैं तुझे कभी नहीं भूला। मैं रोज़ उस कोने से गुज़रता हूँ जहाँ हम बजाते थे। मैं रोज़ सोचता हूँ कि अगर एक बार तू हारमोनियम उठा ले, तो मैं चुपचाप आकर पीछे बैठ जाऊँगा।"

"मेरा हारमोनियम सफ़ेद कपड़े में ढका है," तुफ़ैल उस्ताद ने कहा। "चालीस साल से।"

"और मेरा तबला," प्यारेलाल ने कहा, "इसी पीपल के कोटर में है। धूल में। मैं उसे साल में एक बार छूता हूँ — किसी दिन जब कोई न देख रहा हो।"

मेरे हाथ में घंटी गरम हो गई।

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