The Mysterious Bell91 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 91

7 min read November 5, 2026

"उस्ताद," सानिया ने कहा, "सूची तैयार है।"

"कौन सी सूची?"

"ट्रकों की।" उसने कॉपी खोली। "कल शाम से रात तक पीछे के प्लॉट पर छह ट्रक मिट्टी डालने आए"उस्ताद," सानिया ने कहा, "सूची तैयार है।"

"कौन सी सूची?"

"ट्रकों की।" उसने लाल कवर की कॉपी खोली। "कल शाम से रात तक पीछे के प्लॉट पर छह ट्रक मिट्टी डालने आए। छह। एक भी कम नहीं। और हर ट्रक पर पीली पट्टी चिपकी थी, जिस पर काली स्याही से लिखा था — भारद्वाज कंस्ट्रक्शन।"

गुड्डू ने आधा समोसा मुँह से निकालकर कहा, "मैंने अपनी आँखों से देखा, उस्ताद। दो ट्रक ऐसे थे जिनके पीछे लोहे का बड़ा डिब्बा था, और उस डिब्बे से मिट्टी ऐसे गिर रही थी जैसे कोई घाव से खून बहा रहा हो।"

"तूने पीछे क्या कर रहा था?" मैंने पूछा।

"मैं पीपल की जड़ के नीचे बैठा था, चाचा। मेरी गेंद पीछे भाग गई थी। तो देखा कि ट्रक आ रहे हैं।"

रफ़ीक़ ने कहा, "और उस्ताद, एक ट्रक वाले का हाथ में सोने की मोटी चेन थी। मोटी। जैसे किसी खानदानी बैल के गले में घंटी। मुझे पता है ऐसी चेन पहनने वाले दो ही तरह के लोग होते हैं — या तो दूल्हा होता है, या ऐसा जो अपना वज़न बढ़ाने के लिए चेन पहनता है।"

"तूने दूल्हे को देखा क्या?" सानिया ने टोका।

"नहीं, पर मैंने चेन वाले को देखा। वो असली दूल्हा है।"

चिंटू, जो सबसे छोटा था और अब तक अपनी जेब से मूँगफली निकालकर खा रहा था, उसने मुँह भरे हुए कहा, "उस्ताद, मुझे एक और चीज़ मिली।"

"क्या?"

"रात आठ बजे एक सफ़ेद गाड़ी प्लॉट के मुहाने पर आई थी। बड़ी गाड़ी, जैसी बड़े साहब की होती है। उसमें से कोई उतरा नहीं। खिड़की खुली, अंदर बैठा आदमी कुछ देर देखता रहा, फिर गाड़ी चल दी। मैं उस वक़्त गुड्डू के साथ था, और हम दोनों एक बोरी के पीछे छिपे थे।"

"तूने अंदर का आदमी पहचाना?"

"नहीं। पर उसके हाथ में जो चीज़ थी, वो मैंने देखी।" चिंटू ने समोसे का आख़िरी हिस्सा निगला और आगे झुका। "फ़ोन के अलावा। उसके हाथ में एक काग़ज़ था, उस्ताद। मोड़ा हुआ। और वो उसे बार-बार खोलकर देख रहा था, जैसे कोई माँ बच्चे की तस्वीर देखती हो।"

मेरे पेट में कुछ ठंडा उतर गया।

"कौन सा काग़ज़ था वो?"

"अंधेरा था, उस्ताद। मैं इतना ही बता सकता हूँ कि उस काग़ज़ पर ऊपर की तरफ़ कुछ लिखा था, और नीचे एक लाल चीज़ चिपकी थी। लाल। जैसे किसी ने हाथ से लाल स्याही की बूँद लगाई हो।"

मैंने सानिया की तरफ़ देखा। सानिया ने अपनी कॉपी के पन्ने उलटकर कुछ दिखाया।

"और उस्ताद," उसने कहा, "छह ट्रक में से चार तो आठ बजे तक आ गए थे। बाकी दो रात नौ बजे के बाद आए। उन दोनों में एक अलग बात थी — उन्होंने मिट्टी प्लॉट के बीच में नहीं डाली, बल्कि एक तरफ़ ज़मीन पर बड़ा गड्ढा खोदने लगे। मिट्टी से ऊपर भरने की जगह वो नीचे खोद रहे थे।"

"तूने किससे पूछा?"

"मैंने नहीं पूछा," सानिया ने निर्दोष चेहरा बनाया। "मैंने सिर्फ़ देखा। मैं तो पीपल पर बैठी थी, अपनी चप्पल उतारकर, जैसे कोई फ़िल्म में छिपी नायिका होती है।"

चारों बच्चे मेरी तरफ़ देखने लगे। मैंने सोचा।

"सानिया," मैंने कहा, "ये गड्ढा कहाँ खोद रहे थे?"

"प्लॉट के उस कोने में, जहाँ से नूर अस्पताल की पिछली दीवार दिखती है।"

मेरे पीछे शबनम आपा ने समोसे की कढ़ाही को ज़ोर से रखा। लोहे की चिमटी चटकी।

"अरे बाप रे," वो बोलीं। "सारी गली की ज़मीन चाटने आए हैं। अस्पताल की दीवार से सटकर गड्ढा। अब समझ में आया कि सफ़ेद कुर्ते वाले लोग रोज़ सुबह चौक से लेकर अस्पताल तक क्यों पैदल घूमते हैं।"

"आपको दिखते हैं?" मैंने पूछा।

"मुझे सब दिखता है," शबनम आपा ने कहा। "चाय वाली को सब दिखता है। वो जो समोसे खाते हैं, वो सोचते हैं कि हम सिर्फ़ समोसे गिनते हैं।" उन्होंने चिमटी उठाई। "हम लोग भी गिनते हैं।"

मैं मुस्कुराया। "आपा, आपकी इसी खूबी के लिए तो गली आपको नहीं छोड़ती।"

"छोड़ना तो दूर," उन्होंने कहा। "अब बात कर तो सही। इन बच्चों ने मेहनत की है। कुछ करने का?"

मैंने सोचा।

"कुछ करने से पहले," मैंने कहा, "मुझे ये जानना है कि उनका अगला कदम क्या है।"

सानिया ने तुरंत कहा, "अगला कदम ये है कि कोई ट्रक आए तो हम तुरंत खबर लाएँ। हमें सिर्फ़ ये बताना है कि किस वक़्त, कितने ट्रक, और कौन उतरा।" उसने अपनी कॉपी दिखाई। "देखिए, मैंने तीन कॉलम बनाए हैं। एक — वक़्त। दो — ट्रक की शक्ल। तीन — अंदर कौन बैठा था।"

मैंने कॉपी देखी। तीन कॉलम सच में थे। नीचे एक चौथा बना रहा था जिस पर लिखा था — "कोई पहचान दिखी तो।"

"तू कितनी बड़ी हो गई है," मैंने कहा।

"उस्ताद," उसने कहा, "मैं चौदह साल की हूँ, बड़ी नहीं हुई। पर इतना पता है कि जो मिट्टी समोसे के पैसे से ज़्यादा तेज़ी से गिर रही है, वो प्लॉट नहीं, गली भर रही है।"

शबनम आपा ने एक लंबी साँस ली। "बच्चे बड़े हो गए," उन्होंने कहा। "अब इनके सवालों का जवाब सिर्फ़ तू दे सकता है।"

फिर गुड्डू ने कुछ याद किया। "अरे हाँ, उस्ताद। पीपल के नीचे दो बुज़ुर्ग पिछले चालीस साल से बैठे हैं।"

"पिछले चालीस साल?" मैंने कहा। "मुझे तो लगता था वहाँ बंसी बाबा और रहमत बाबा थे।"

"वो अब मिल गए हैं," चिंटू ने कहा। "वो बात पुरानी हो गई। अब वहाँ दो नए बैठे हैं। एक किनारे पर, दूसरा दूसरे किनारे पर। दोनों के बीच में पूरा पीपल।"

"और वो बात नहीं करते?"

"उस्ताद," रफ़ीक़ ने कहा, "ये बात ही नहीं करते। पर रोज़ शाम को दोनों आते हैं। एक पूरब से, एक पश्चिम से। एक अपनी लाठी रखता है, दूसरा अपना रूमाल। फिर बैठते हैं। और चाय!"

"चाय?"

"हाँ," सानिया ने कहा। "और यही सबसे बड़ी बात है। दोनों एक-दूसरे को देखते भी नहीं। पर शबनम आपा की गुमटी से हर शाम दो कटोरी चाय जाती है, एक पूरब वाले के पास, एक पश्चिम वाले के पास। और चाय का पैसा दोनों के कटोरे में से आधा-आधा आता है।"

मैंने शबनम आपा की तरफ़ देखा। वो चिमटी से समोसा उठा रही थीं। रुकीं।

"हाँ," उन्होंने कहा। "चालीस साल से।"

"आपने कभी पूछा नहीं?"

"मैंने पूछा था," उन्होंने कहा। "बहुत पहले। जवाब मिला था कि ये दोनों उस्ताद हैं। संगीत वाले उस्ताद। एक हारमोनियम बजाता है, दूसरा तबला। और मुझे बताया गया कि संगीत वाले लोग बोलते कम हैं, सुनते ज़्यादा हैं।"

"लेकिन ये चालीस साल से?"

शबनम आपा ने चिमटी कड़ाही पर रखी।

"मैं सिर्फ़ चाय वाली हूँ," उन्होंने कहा। "मैं इतना नहीं जानती कि दोनों के बीच क्या हुआ था। पर मैं इतना जानती हूँ कि एक शाम जब ऊपर बादल थे और मैंने उन दोनों को एक-दूसरे की तरफ़ देखते देखा — मैंने अपने हाथ से चाय ज़्यादा गरम बना दी थी। क्योंकि मुझे लगा कि अगर चाय ज़्यादा गरम होगी, तो शायद उन्हें ज़ुबान मिल जाएगी।"

मैं कुछ देर चुप बैठा रहा।

"कौन हैं वो?"

"एक का नाम उस्ताद तुफ़ैल है," सानिया ने कहा। "पूरब वाला। सफ़ेद दाढ़ी, एक आँख कमज़ोर, हाथ में लाठी। दूसरा मास्टर प्यारेलाल — पश्चिम वाला। पतला, मोटा चश्मा, चश्मे के हैंडल पर काले धागे से टेप लिपटा हुआ है।"

"और आपने कभी नहीं सुना कि इनका झगड़ा किस बात का था?"

"सुना था," गुड्डू ने कहा, "पर सुना है, देखा नहीं। मेरी दादी बताती थीं कि एक शादी में दोनों साथ बजाते थे। बहुत पुरानी बात है। उस शादी में कुछ हुआ था। क्या हुआ, ये कोई नहीं बताता।"

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