The Mysterious Bell – Chapter 911
"पर अब…" उसने रजिस्टर की तरफ़ देखा। "अब लग रहा है कि मास्टर इरफ़ान भी उसी काग़ज़ में लिखे हैं।"
"हर आदमी किसी न किसी काग़ज़ में लिखा होता है, टिंकू," मैंने कहा। "फ़र्क़ ये है कि कौन उस काग़ज़ को पढ़ता है — आदमी खुद, या कोई और।"
मैंने घंटी उठाई।
वो ठंडी थी। बहुत ठंडी नहीं। बस ऐसी, जैसे सुबह से किसी ने उसे छुआ न हो।
मैंने उसे हथेली में रखा। हल्का सा हिलाया।
एक बार बजी। छोटी सी। और फिर वो आवाज़ आई, जो मुझे सिर्फ़ मैं ही सुन सकता हूँ। पहले जैसी नहीं। अब उसमें कुछ साफ़ था, कुछ धीमा और कुछ ऐसा जैसे कोई बूढ़ा सामने बैठा हो और बिना जल्दी किए बोल रहा हो।
"दो रास्ते।"
मैंने उँगली रोक दी।
"बोल।"
"एक — सब काग़ज़ जला दे। आग सबसे आसान हल है। आग के बाद कोई सवाल नहीं बचता।"
"और दूसरा?"
"दूसरा — सबको साथ लेकर खड़ा हो जा। काग़ज़ जलाने से ज़मीन नहीं बदलती। आदमी खड़े होने से बदलती है।"
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। वो मेरी तरफ़ देख रहा था, और उसकी आँखों में वो पुराना डर था — कि कहीं उसे भी दुकान से निकाल न दिया जाए।
"मैं दूसरा चुनता हूँ," मैंने कहा।
घंटी चुप रही।
"पर एक बात बता," मैंने कहा। "मेरी जो याद खो गई है — वो इसी रास्ते से लौटेगी?"
कमरे में बहुत देर तक कुछ नहीं हुआ।
बल्ब गुनगुनाता रहा। बाहर किसी ने पानी डाला और फिर बर्तन खड़खड़ाया। मेरा अपना साँस लेना मुझे सुनाई दे रहा था।
फिर घंटी बोली।
"याद ताले में है।"
मैंने आँखें बंद कीं।
"और ताला?"
"ताला तेरे ही घर में है।"
मैंने घंटी नीचे रखी। बहुत धीरे। जैसे कोई चिड़िया हाथ से उतारता है।
क्योंकि अब मुझे समझ आ गया था।
वो याद मेरी ही थी।
जिस दिन मैंने गुस्से में उस तंत्र से कुछ माँगा था — नहीं, माँगा नहीं, चिल्लाकर हुक्म दिया था — उस दिन मैंने उससे एक शक्ति ली थी। और उस शक्ति की क़ीमत मुझे बाद में पता चली थी। तंत्र कहता है कि स्वार्थ में इस्तेमाल हुआ तो सबसे प्यारी याद ताले में बंद हो जाएगी।
मुझे याद नहीं था कि वो कौन सी याद थी।
बस इतना पता था कि कुछ खो गया है। कभी माँ की साड़ी में, कभी पीपल की छाँव में, कभी दादा की साइकिल की घंटी में मुझे लगता था कि कोई चीज़ मेरे पास है, बहुत करीब है, बस नाम नहीं है। किसी के हँसने पर मुझे लगता था कि यही हँसी मैंने कहीं सुनी है। किसी के हाथ में मिठाई देखकर मेरा गला भर आता था और मुझे पता नहीं होता था क्यों।
तंत्र ने वो याद मुझसे ली थी। और ताले में बंद कर दी थी।
"अंकुश," एक आवाज़ आई। काजल की।
मैंने आँखें खोलीं। वो दरवाज़े पर खड़ी थी। हाथ में दवा की प्लास्टिक थैली और चेहरे पर वो थकान जो अब उसके चेहरे पर पक्की हो गई थी।
"माँ की दवा कल खत्म हो रही है," उसने कहा। "और अस्पताल की खिड़की पर कह दिया गया है कि नई खेप तब तक नहीं, जब तक काग़ज़ साफ़ न हो।"
"काग़ज़ साफ़ हो जाएगा," मैंने कहा।
"कब?"
"आज रात से पहले।"
वो कुछ देर मुझे देखती रही।
"अंकुश, तू बहुत अजीब कर रहा है। तू कहता है माँ का अंगूठा नहीं लगेगा, और फिर बैठकर रजिस्टर पढ़ता है। तू कहता है आज रात काग़ज़ निकालेगा, और फिर घंटी से बातें करता है — जिस घंटी से तेरी बातें होती हैं, वो कोई मेरी तो नहीं होती?"
"काजल।"
"ना, सुन।" उसने थैली मेज़ पर रख दी। "मैं हर बार तेरे पीछे खड़ी हूँ। पर आज सुबह से तू जो कर रहा है, वो सिर्फ़ तेरा काम नहीं है। इसमें माँ है। मैं भी उसमें हूँ। और तू मुझे बीच में कुछ नहीं बताता।"
मैं उठा। मैंने उसकी तरफ़ हाथ बढ़ाया और फिर रोक लिया — क्योंकि अंकुश यादव हाथ नहीं पकड़ता, वो बस सामने खड़ा होकर बात करता है। मैंने हाथ वापस किया।
"कल रात," मैंने कहा, "मैंने घंटी से कुछ पूछा था। और आज उसने जवाब दिया। मेरी एक याद ताले में बंद है।"
काजल की आँखें बदलीं।
"कौन सी याद?"
"मुझे नहीं पता। यही तो सबसे बड़ी बात है। मुझे सिर्फ़ एहसास है कि कुछ खो गया है। और ताला मेरे ही घर में है।"
काजल ने धीरे से कहा, "चूल्हे के पीछे का दरवाज़ा।"
मैंने सिर हिलाया।
"माँ ने कहा था उसे आज रात मत खोलना।"
"माँ ने कहा था उसे अकेले मत खोलना," काजल ने कहा। "माँ ने कहा था उसे साथ रखना। फ़र्क़ है, अंकुश।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। कभी-कभी छोटी बहनें ऐसी बात कह जाती हैं जो बड़े भाई के दिमाग़ में उस वक़्त तक नहीं आई होती।
"ठीक है," मैंने कहा। "तो आज शाम दो काम होंगे।"
"दो?"
"पहला — अपने घर का ताला। दूसरा — बाहर का।"
टिंकू ने कुर्सी से उठते हुए कहा, "उस्ताद, तीसरा काम भी है।"
"क्या?"
"उसे पता न चले कि हम क्या कर रहे हैं।"
मैं मुस्कुराया। पहली बार पूरे दिन में।
"तू अब बड़ा हो रहा है," मैंने कहा।
"आपने ही कहा था कि छोटा रहने का वक़्त खत्म हो गया।"
शाम पाँच बजे अस्पताल के सामने की दीवार पर जो हुआ, वो मैंने सोचा भी नहीं था।
मैंने सोचा था गली के बीस-पच्चीस लोग आएँगे। आए — पूरी गली।
दीवार के सामने लोग ऐसे खड़े थे जैसे कोई शादी हो रही हो। शबनम आपा की गुमटी से बड़ी केतली आई थी और कटोरियाँ। रज़िया अपनी पुरानी चोट वाली टाँग के साथ स्टूल पर बैठी थी और हर किसी को चाय पकड़ा रही थी। कौशल्या दादी अपनी लाठी के सहारे सबसे आगे बैठीं। शांति देवी उनके पास, हाथ में वो पुरानी पीली चुनरी। बंसी बाबा और हाफ़िज़ बाबा साथ, चबूतरी से आए थे — साथ! एक महीने पहले ये बात गली में मज़ाक बनती, पर उस शाम किसी ने हँसा नहीं।
गोविंद भाई भी आए थे। हाथ में नींबू-मिर्ची का हार और चेहरे पर वो दिखावटी हिम्मत। डॉक्टर इसरानी अपनी छड़ी के साथ गेट पर लगभग खड़े थे, और उनके पीछे काजल सफ़ेद कोट में — डॉक्टर इसरानी की बीवी का पुराना घिसा कोट।
दुबे अंकल अपनी कुर्सी लेकर आए थे। उन्होंने कहा था, आदमी अपनी चीज़ पर बैठकर कम झूठ बोलता है।
बच्चे — टिंकू, सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू — दीवार के किनारे खड़े थे और हर आने-जाने वाले को घूर रहे थे।
और उस्ताद अली बक्श — उस्ताद सबसे आख़िर में आए। उन्होंने अपनी दुकान की कुर्सी साथ लाई थी। कुर्सी रखी, उस पर बैठे और कहा —"जिस चीज़ पर रोज़ बैठता हूँ, वही फ़ैसले साफ़ करती है।"
पाँच बजे मैंने दीवार पर लिखी रणवीर की सफ़ेद सूचना पढ़ी।
तीसरी मंज़िल, नया ताला, सरकारी मुहर, आज रात बारह बजे। और नीचे छोटी लाइन — सभा न हो तो काग़ज़.
वो काग़ज़ का अक्षर आधा था। जैसे किसी ने लिखते-लिखते हाथ रोक लिया हो।
मैंने लोगों की तरफ़ देखा। दीवार के सामने इतनी भीड़ थी कि गली का मुँह बंद हो गया था। स्कूल से लौटते बच्चे मुँह उठाकर देख रहे थे। दूसरी गली से भी लोग आ गए। एक ठेली वाला अपनी ठेली छोड़कर खड़ा था।
और मैं समझ गया कि ये सभा यहाँ नहीं हो सकती। ये जगह छोटी है।
मैंने बोलना शुरू किया तो किसी ने टोका।
"पीपल पर चलो," शबनम आपा ने कहा। "यहाँ बैठने की जगह नहीं है और मेरी कटोरियाँ खत्म हो रही हैं।"
हाफ़िज़ बाबा ने कहा, "पीपल के नीचे ज़ुबान कस जाती है। मैं चलता हूँ।"
और फिर वो हुआ जो मैंने सोचा नहीं था।
पूरी गली चल दी। धीरे-धीरे। बीमार, बूढ़े, बच्चे, ठेली देखने लौटा ठेली वाला, स्कूल से लौटते दो लड़के — सब। कोई किसी का हाथ पकड़ रहा था।
ये सभा नहीं थी। ये गली थी।
छह बजे पीपल के नीचे पूरी गली जमा थी।
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