The Mysterious Bell – Chapter 901
पीछे वाली गली में वो गंध थी जो सिर्फ़ बड़े दफ़्तरों के पीछे होती है — गीली सीमेंट, बासी कूड़ा, और उसके ऊपर पुरानी स्याही। दो बड़े हरे कचरे के डिब्बे दीवार से सटे खड़े थे। उन्हीं के पीछे, बिल्कुल दीवार में, एक लोहे की छोटी सीढ़ी चिपकी थी जिसे देखकर लगता था कि इसका इस्तेमाल सिर्फ़ मकान मालिक करता होगा, वो भी कभी-कभार।
टिंकू ने एक हाथ से डिब्बे को ज़रा हटाया और दूसरे हाथ से मेरी कमीज़ पकड़ी।
“उस्ताद, सीढ़ी पर ज़ंग है। पाँव फिसलेगा।”
“तो संभालकर चढ़।”
“मैं सबसे पहले चढ़ूँगा,” उसने कहा, जैसे ये उसका जन्मसिद्ध हक़ हो।
“क्यों?”
“क्योंकि मैं हल्का हूँ। अगर मैं गिरूँगा तो आवाज़ कम होगी।”
काजल ने पीछे से कहा, “बेवकूफ़, हल्का होने से आवाज़ कम नहीं होती। ज़मीन पर पड़ने की आवाज़ का वज़न पाँव से तोला जाता है, तेरे सिर से नहीं।”
मैं हँस पड़ा। उस्ताद ने काजल की तरफ़ देखा और उनकी आँखों में वो भाव था जो अक्सर बूढ़े लोगों की आँखों में होता है — जैसे वो कह रही हों कि लड़की की बात में मज़ाक भी है और सच भी।
“तुम दोनों चुप हो जाओ,” उस्ताद ने कहा। “और टिंकू, ध्यान से। ज़ंग वाली सीढ़ी पर जल्दबाज़ी सबसे बड़ी चोरी होती है — वो पाँव चुरा लेती है।”
टिंकू ने बड़ी गंभीरता से सिर हिलाया और चढ़ना शुरू किया। मैं नीचे खड़ा रहा और उसकी पतली टाँगों को देखता रहा कि वो किस तरह चढ़ रहा है — पहले दो क़दम सावधानी से, फिर तीसरे पर उसने सीधे झटके से सीढ़ी पकड़ी और आगे बढ़ गया। और फिर वो ऊपर एक छोटी खिड़की तक पहुँच गया जिसकी लकड़ी का पटिया आधा टूटा था।
उसने पहले हाथ से हिलाया। पटिया हिली।
“उस्ताद, ये खुल रही है।”
“खोल दे, पर आवाज़ कम कर।”
उसने अपनी पतली बाँहें अंदर की तरफ़ कीं — ऊपर सींक की तरह उठकर — और टूटी पटिया को ज़ोर से खींचा। खिड़की खुली, और अंदर से इतनी धूल निकली कि टिंकू ने एक हाथ से मुँह ढक लिया।
“क्या है अंदर?” मैंने पूछा।
“अंधेरा है, उस्ताद। पर शेल्फ़ दिख रही है। और…” उसकी आवाज़ रुक गई।
“और?”
“और एक आलमारी है। बड़ी। लोहे की। धूल से इतनी ढकी है कि लग रही है सालों से इसे कोई नहीं छू रहा।”
मैंने गोविंद भाई की दी हुई चाबी जेब में कसी। ठंडी थी। काजल नीचे खड़ी थी और उसकी आवाज़ वैसी ही थी जैसे हम किसी लड़ाई में जा रहे हों, न कि काग़ज़ लेने।
“सुन लो सब,” उसने ज़ोर से कहा, “अब जब अंदर जाओ, तो अगर कोई आदमी हो अंदर, तो उसे याद रखना — हम काग़ज़ लेने आए हैं। चोरी करने नहीं। हमारा तो काम ही काग़ज़ का है।”
उसकी आवाज़ गली में गूँजी। मैं मुस्कुराया।
उस्ताद ने अपना मोटा चश्मा ठीक किया और कहा, “बेटा, चोरी और माँगने में ज़मीन-आसमान का फर्क होता है। चोरी वो है जब तू किसी की चीज़ छुपाकर ले जाए। और माँगना वो है जब तू उसके सामने खड़ा होकर कहे कि ये मेरी है। पर आज तेरी बात सही है। क्योंकि आज देने वाला कोई है नहीं, इसलिए हम खुद लेने आए हैं, ग़लती करके नहीं, हक़ से।”
काजल ने कुछ नहीं कहा, पर उसके चेहरे पर वो भाव था जो माँ के चेहरे पर सुबह होता है — डर और ज़िद एक साथ।
मैंने सीढ़ी पकड़ी और चढ़ना शुरू किया। ज़ंग ने हाथ पर वो गंदगी छोड़ी जो पानी से नहीं जाती, सिर्फ़ मेहनत से जाती है। तीन क़दम और मैं खिड़की के सामने था।
टिंकू पहले से अंदर उतर चुका था। उसने हाथ बढ़ाकर मुझे सहारा दिया और मैं उतर गया।
कमरा छोटा था। नहीं, गलत कहूँगा। कमरा छोटा नहीं था, कमरा खाली था। बस ज़्यादा फर्क यही है। खाली कमरे बड़े लगते हैं, छोटे नहीं। और ये कमरा इतना खाली था कि इसमें अपनी आवाज़ भी अजनबी लगती।
दाएँ कोने में लोहे की अलमारी। बड़ी। धूल से ऐसी ढकी हुई कि उसका असली रंग पता नहीं चल रहा था — जैसे किसी ने जान-बूझकर उसे धूल की चादर ओढ़ा दी हो।
बीच में एक पुरानी कुर्सी। लकड़ी की। एक टाँग टूटी हुई थी और उसकी जगह ईंट रखी गई थी।
छत से एक टूटा पंखा लटक रहा था। उसके तीन ब्लेड थे और उनमें से एक मुड़ा हुआ था — पंखे का वो हिस्सा जो अब हवा नहीं, डर देता है।
और दीवार पर — मैं रुक गया। दीवार पर रणवीर की बड़ी तस्वीर लगी थी। वही मुस्कुराती हुई तस्वीर जो भारद्वाज भवन के बाहर लगी है। पर यहाँ वो अलग लग रही थी। यहाँ वो अकेली थी — कोई काँच नहीं, कोई फ्रेम नहीं, सिर्फ़ चार कीलों पर टँगा काग़ज़ — जैसे भीतर के कमरे में भी उसकी निगरानी रखनी हो।
टिंकू ने धीमे से कहा, “उस्ताद, ये तस्वीर भी उसी की है।”
“हाँ,” मैंने कहा। “ये बताती है कि इस कमरे में जो कुछ है, वो उसके लिए अनजान नहीं है।”
मैंने चाबी जेब से निकाली। ताले पर लगाई। पहले तो वो ठीक बैठी, फिर थोड़ी हिली, फिर रुक गई।
टिंकू ने साँस रोक ली।
मैंने चाबी ज़रा उलटी करके लगाई। क्लिक हुई — और वो आवाज़ उस रात की सबसे मीठी आवाज़ थी।
दरवाज़ा खुला। अंदर धूल, काग़ज़ और पुराने फेनाइल की गंध आई।
और मैंने देखा।
अलमारी के अंदर — ऊपर की शेल्फ़ पर — काग़ज़ों के दो बंडल थे। पहला — मोटा रजिस्टर, भूरे रंग की जिल्द वाला, जिसके किनारे घिसे हुए थे और जिस पर कोई नाम नहीं लिखा था। दूसरा — एक पुरानी लाल डायरी, मोटी, जिसकी जिल्द उखड़ी हुई थी और जिस पर पहली नज़र में ही किसी बूढ़े इंसान की लिखाई में चार शब्द उभरे थे — “जिसे पढ़ना हो, पढ़ ले।”
मैं रुक गया। मेरी उँगलियाँ काँपी नहीं, पर उनमें वो ठंडक ज़रूर आई जो घंटी अक्सर देती है। मैंने रजिस्टर उठाया। वज़न भारी था। काग़ज़ पुराना था पर मज़बूत — जैसे लिखने वाले ने सोच-समझकर ऐसा काग़ज़ चुना हो जो सालों बाद भी लोगों को चोट पहुँचा सके।
मैंने पन्ने पलटने शुरू किए।
पहला पन्ना। तारीख़। साल पच्चीस पुराना। एक नाम, एक रक़म, एक मोहर।
दूसरा पन्ना। दूसरी तारीख़। दूसरा नाम।
तीसरा।
मैं पलटता गया और मेरे सामने एक पूरी दुनिया खुल रही थी — ऐसी दुनिया जिसे रणवीर भारद्वाज ने सालों से अपने काग़ज़ों में बंद कर रखा था।
और फिर मैं वहाँ पहुँचा जहाँ ये दुनिया मुझसे सीधी टकराने वाली थी।
“शंकर यादव — बाईस साल पहले — अस्पताल की ज़मीन — अंगूठा — तीन हज़ार रुपये।”
नीचे एक और लाइन। “सुशीला यादव — नाम — दो हज़ार रुपये।”
मेरे हाथ रुक गए।
टिंकू ने धीमे से पूछा, “उस्ताद?”
“एक मिनट,” मैंने कहा।
मैंने पन्ना पलटा। यहाँ एक नया नाम था। “नसीमा बाई — राशन दुकान — अंगूठा — पाँच हज़ार।” नीचे टिप्पणी: “समय पर नहीं दिया तो दुकान का रास्ता बंद।”
मैंने अगला पन्ना पलटा। “गिरधारी — साइकिल की दुकान — गिरवी — दो सौ पचास।” और नीचे: “भाई मोहन के नाम से लिया गया, काग़ज़ गिरधारी के नाम पर सील हुआ।”
अगला पन्ना।
“हाफ़िज़ भाई — अत्तर की दुकान — ज़मीन — सील की तारीख़ — कुछ नहीं दिया।”
अगला पन्ना।
“बंसी बाबा — पीतल की दुकान — ज़मीन — तीन हज़ार दिए — मगर दुकान खाली करने की तारीख़ आगे बढ़ी।”
मैं पलटता गया, पलटता गया, और पन्ने खत्म ही नहीं हो रहे थे। ये एक आदमी का रजिस्टर नहीं था, ये एक पूरी बस्ती का हिसाब था — हर टूटी हुई इच्छा का, हर मजबूर अंगूठे का, हर वो रात जब किसी ने अपना नाम लिखवाया और बदले में कुछ नहीं पाया।
और फिर मैं एक नाम पर अटक गया।
“शबनम — गुमटी — ज़मीन — किराया दस साल — खेलूराम के नाम से सील — बीस साल पहले।”
नीचे एक छोटी लाइन थी, जो किसी और हाथ से लिखी गई थी, जैसे बाद में जोड़ी गई हो।
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