The Mysterious Bell – Chapter 900
“और जो नहीं लौटे?” चिंटू ने पूछा, और उसकी आवाज़ में वो बेवकूफ़ी थी जो बच्चों को सच बोलने की हिम्मत देती है।
शबनम आपा ने उसकी तरफ़ देखा। “सब लौटेंगे,” उन्होंने कहा। और उनकी आवाज़ में इतना भरोसा था कि किसी ने दोबारा नहीं पूछा।
फिर मैंने काम बाँटा।
गोविंद भाई साथ चलेंगे, क्योंकि वो उस अलमारी को जानते हैं और उन्होंने चाबी की नक़ल बनवाई थी। उस्ताद चलेंगे। काजल चलेगी। मीरा चलेगी, और उसका कैमरा बाहर रहेगा, क्योंकि अगर कैमरा दिखा तो आदमी वो बोलेगा जो काग़ज़ में लिखा है, नहीं कि जो उसके अंदर है। टिंकू सीढ़ी के नीचे रहेगा, बच्चों की टोली के साथ, और अगर ऊपर से कोई गड़बड़ की आवाज़ आए तो वो पीपल तक भागकर दुबे अंकल को बताएगा।
“मैं?” दुबे अंकल ने कहा। उन्होंने अपनी छड़ी उठाई। “मैं थाने में रहूँगा। अगर उस रजिस्टर की नक़ल लानी है तो उसे रजिस्टर की शक्ल में आना पड़ेगा, और मैं उसे वैसे ही दर्ज करूँगा जैसे आज सुबह तुम्हारे पापा का बयान दर्ज किया।”
इसरानी साहब ने कहा, “मैं अस्पताल जाऊँगा। सीढ़ी पर आज रात बारह बजे का जो खतरा है, वो अलग है। वहाँ कोई मेरे मरीज़ों की तरफ़ नहीं देख रहा, तो मैं देखूँगा।”
“आप अकेले नहीं जाएँगे,” इमरान ने कहा, और वो अपने बाप की तरफ़ देखकर बोला, जैसे इजाज़त माँग रहा हो। हबीब चाचा ने कुछ नहीं कहा, बस अपनी तस्बीह का एक दाना आगे बढ़ा दिया।
“इमरान जाएगा,” हबीब चाचा ने कहा। “पर मेरे आँगन के पंप से पानी नहीं भरेगा। वो पंप आज टूटा है।”
ये बात किसी को समझ नहीं आई, पर मुझे आई। बूढ़े आदमी अपनी बात सीधी नहीं कहते; वो उसे किसी टूटी चीज़ में लपेटकर कहते हैं।
फिर मैंने मीरा की तरफ़ देखा। “तेरे पास जो वो लिखा काग़ज़ है न — मीरा तिवारी, गवाह।”
“हाँ।”
“उसे उसी रजिस्टर के पन्नों की तरह मत रखना। जब उस आदमी से बात हो, तू अपने हाथ में रखना, और अगर ज़रूरत पड़े तो दिखा देना। आज रात हमें उस आदमी को ये बताना है कि हम सिर्फ़ गली के मज़दूर नहीं हैं, हम गवाह भी हैं।”
मीरा ने अपना बैग सीधा किया। “और एक चीज़,” वो बोली। “आज रात अगर हम सब ऊपर गए और वहाँ से कुछ निकला, तो उसे उसी रात पूरी गली में सुनाया जाएगा। चाहे रात दो बजे हो जाए। मैं चैनल पर डालूँगी, पर उससे पहले यहाँ गुमटी पर सबको बताया जाएगा।”
शबनम आपा ने चिमटी उठाई और कहा, “जो काग़ज़ आज रात निकलेगा, वो मेरी थाली पर रखकर पढ़ा जाएगा। ये थाली अब नगरपालिका की नहीं है। इस थाली पर मेरा हाथ है और मेरे बाप का हाथ था।”
मैंने सिर हिलाया। और मैंने देखा कि रज़िया ने शबनम आपा का हाथ पकड़ लिया। बिना कुछ कहे।
अब गुमटी में जो माहौल था, वो डर का नहीं था। वो उस चीज़ का था जो आदमी को किसी शादी की सातवीं फेर में पकड़ती है, जब आदमी जानता है कि उसके पीछे पूरा खानदान खड़ा है और आगे ज़िंदगी है, और फिर भी उसकी टाँगें काँपती हैं।
मैंने कहा, “अब जो भी कहना है, कह लो। सुबह दस बजे से पहले हमें बहुत कुछ करना है, और उससे पहले आज रात बारह बजे हमें उस दरवाज़े तक पहुँचना है।”
कोई कुछ नहीं बोला। फिर टिंकू ने हाथ उठाया, जैसे स्कूल में।
“क्या?”
“मैंने एक लाइन और लिखी है,” उसने कहा, और अपनी कॉपी मेरी तरफ़ बढ़ा दी। “कल सुबह के लिए।”
मैंने पढ़ा। उसने लिखा था — आज रात हमने कुछ नहीं तोड़ा।
मैंने उसे पढ़कर कॉपी वापस उसे दी। फिर मैंने घंटी जेब से निकाली और एक बार बजाई। उसकी आवाज़ गुमटी के टिन के नीचे गूँजी और बाहर पीपल तक गई, जहाँ पुराने बुज़ुर्ग आज भी चुप बैठे थे, और मुझे लगा कि उस आवाज़ ने उनकी चुप्पी पर अंगूठा लगा दिया।
और तभी मीरा का फोन बजा।
वो फोन देखकर एक पल रुकी, फिर उठाकर गुमटी से बाहर चली गई। हम सब उसका चेहरा देख रहे थे, क्योंकि गुमटी के शीशे के बाहर उसका चेहरा उसी तरह दिख रहा था जैसे पीपल के नीचे जलती मशाल का साया।
वो लौटी। उसका चेहरा बदला हुआ था। उसने फोन जेब में रखा और गोविंद भाई की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।
“क्या हुआ?” मैंने पूछा।
“थाने से खबर आई है,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ सपाट थी, जैसे वो खुद नहीं मान रही हो जो बोल रही है। “आज शाम को साहब की तरफ़ से थाने में नई शिकायत दर्ज हुई है।”
“किस बात की?”
“कि शंकर यादव ने झूठा बयान दिया है,” मीरा ने कहा। “कि उन्होंने दबाव में आकर अपने ऊपर इल्ज़ाम लिया है और उनका असली बयान कुछ और था।”
गुमटी में एक आवाज़ भी नहीं आई।
“और,” मीरा ने कहा, और उसने डॉक्टर इसरानी की तरफ़ देखा, फिर पापा की तरफ़, “नोटिस में लिखा है कि शंकर यादव को कल सुबह दस बजे तक अस्पताल की ज़मीन के काग़ज़ पर फिर से अंगूठा लगाना होगा।”
पापा उठ खड़े हुए। उनकी कुर्सी पीछे हटकर गुमटी की दीवार से टकराई और उसकी आवाज़ उस रात की पहली सबसे तेज़ आवाज़ थी।
“फिर से?” उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था। उसमें वो थकान थी जो बाईस साल से जमा हो रही थी। “मैंने आज सुबह अपना पूरा सच बोल दिया। रजिस्टर में लिखवा दिया। दरोगा ने सुना…”
“दरोगा ने सुना,” गोविंद भाई ने धीमे से कहा, “पर सुनने वाला और भी कोई है।”
मैंने घंटी अपनी हथेली में कस ली। वो पहले से ज़्यादा गरम थी, और मुझे लगा कि उसकी गरमाहट से मेरी हथेली की ग्रीस पिघल रही है।
“समय क्या दिया है?” मैंने पूछा।
“दस बजे सुबह,” मीरा ने कहा। “और एक बात और। शिकायत में यह भी लिखा है कि अगर अंगूठा नहीं लगा, तो यही काग़ज़ इनकार की शक्ल में अदालत जाएगा और यह साबित कर देगा कि शंकर यादव अपने ही दस्तख़त से मुकर गए हैं।”
मैंने कुछ देर सोचा। फिर मैंने देखा कि गुमटी के बाहर पीपल की छाया में कोई खड़ा है। एक बूढ़ी औरत, ओढ़नी वाली, जिसकी लाठी की नोक धूल में टिकी हुई है।
कौशल्या दादी।
वो अंदर नहीं आईं। उन्होंने सिर्फ़ मेरी तरफ़ देखा और सिर हिलाया, बहुत हल्का, जैसे कह रही हों कि अब जो होगा, वो सीढ़ियों पर नहीं, काग़ज़ों पर होगा।
मैंने घंटी को अपनी जेब में रखा और गली की तरफ़ मुँह किया।
“ठीक है,” मैंने कहा। “योजना बदली नहीं। बस एक काम बढ़ गया। आज रात बारह बजे हम तीसरी मंज़िल से जो भी लाएँगे, वो सुबह दस बजे उसी मेज़ पर रखा जाएगा जिस पर वो अंगूठा माँग रहे हैं। और जो अंगूठा वो माँग रहे हैं, वो अंगूठा अब किसी काग़ज़ पर नहीं लगेगा।”
फिर टिंकू ने, बिल्कुल पीछे से, अपनी पतली आवाज़ में कहा, “उस्ताद, अगर आज रात कुछ हो जाए तो मेरी कॉपी किसको दूँ?”
मैंने पलटकर देखा। उसकी आँखें डबडबाई थीं, पर वो रो नहीं रहा था।
“अपने पास रख,” मैंने कहा। “क्योंकि कल सुबह तू उसमें ये लिखेगा कि पापा ने दूसरी बार अंगूठा नहीं लगाया।”
बाहर पीपल की डाल हिली और धूल में से एक पत्ता गिरकर शबनम आपा की पीतल की थाली पर आ बैठा। उन्होंने उसे उठाया, देखा, और बिना कुछ कहे उसे जेब में रख लिया।
और मैंने अपनी जेब में घंटी को फिर से हिलते महसूस किया। धीरे से। जैसे कोई बूढ़ा आदमी बैठे-बैठे अपनी उँगली से मेज़ पर गिनती कर रहा हो।
॥
सुबह नौ बजे से पहले ही हम भारद्वाज भवन के पीछे वाली गली में पहुँच गए थे। कारण सीधा था — जिस शख्स ने मुझे रात भर जगाया था, वो मेरे सपने में भी घूम रहा था। काजल ने तो सुबह चाय में चीनी भी कम डाल दी थी, और मैंने बिना शिकायत किए पी ली, क्योंकि आज तारीख़ खुद मीठी नहीं थी।
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