The Mysterious Bell – Chapter 9
"नहीं," मैंने नीचे चिल्लाकर कहा। "ये कबाड़ा नहीं है, टिंकू। ये मेरी नई साइकिल है। और इसका किराया बहुत भारी है।"
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"नई साइकिल है," मैंने खिड़की से नीचे चिल्लाकर कहा। "और इसका किराया बहुत भारी है।"
टिंकू ने मुँह बनाया, जैसे उसने मुझसे कोई बहुत बड़ा जवाब उम्मीद किया था और मैंने उसे और बड़ी उलझन दे दी।
"उस्ताद," उसने हाथ में पट्टी बँधा घुटना सहलाते हुए कहा, "किराया तो वो होता है जो हर महीने देना पड़ता है। ये तो एक बार का झटका है ना?"
मैं मुस्कुराया। ये लड़का सवाल ऐसे पूछता है जैसे कोई वकील जिरह कर रहा हो। और सच कहूँ तो कई बार इसके सवाल मुझे मेरे ही जवाब से ज़्यादा डराते हैं।
"टिंकू," मैंने कहा, "कुछ चीज़ें एक बार में ही पूरी ज़िंदगी का किराया वसूल कर लेती हैं।"
"मतलब?"
"मतलब ये कि तू अभी छोटा है। तेरे लिए ये सिर्फ़ जंग लगी साइकिल है। मेरे लिए ये एक ऐसा किरायेदार है जो पहले महीने में ही मकान मालिक बनने की तैयारी कर रहा है।"
टिंकू हँसा। उसकी हँसी सुबह की गली में ऐसे फैली जैसे किसी ने पानी में कंकड़ मार दिया हो। दो-तीन दुकानों के शटर खुल रहे थे, कोई बाल्टी भर रहा था, कोई झाड़ू मार रहा था। मैंने साइकिल को दुकान के पीछे वाले कमरे से बाहर निकाला और घर की सबसे पुरानी दीवार की तरफ़ मुँह करके खड़ा कर दिया, ठीक जैसे कबाड़ी बूढ़े ने कहा था।
टिंकू ने गौर से देखा।
"उस्ताद, इसमें तो घंटी ही नहीं है।"
मेरी जेब में घंटी गरम हुई। जैसे किसी ने सुन लिया हो और कह रहा हो, चुप कर, बेवकूफ़।
"घंटी है," मैंने कहा। "बस इसने अभी फ़ैसला नहीं किया कि इसे कहाँ बैठना है।"
टिंकू ने सिर खुजाया और चला गया, ये कहकर कि उसकी माँ उसे दूध लाने भेज रही है और अगर वो देर की तो उसका कान गरम हो जाएगा। मैं उसके जाने के बाद साइकिल के हैंडल पर हाथ फेरता रह गया।
लोहे पर जंग की परत ऐसी थी जैसे किसी बूढ़े की ज़ुबान पर चुप्पी जम गई हो।
घर के अंदर से माँ की खाँसी आई। दो बार। फिर थोड़ी देर बाद तीसरी बार। मैंने आँख बंद की और मन में गिना — सुबह से ये चौथी खाँसी है।
तुम सोच रहे होगे कि चौथी खाँसी में क्या बड़ी बात है। भाई, जब घर में कोई बीमार हो और वो बीमारी अपनी क़ीमत काग़ज़ पर लिखकर लाती हो, तो हर खाँसी एक हिसाब की लाइन बन जाती है। मेरी जेब में एक पर्ची थी, जिस पर माँ ने अपने हाथ से एक आँकड़ा लिखा था, जो मेरी पूरी दुकान की महीने भर की कमाई से भी बड़ा था।
और पीछे एक लाइन — अंकुश को मत बताना।
मैंने वो पर्ची चार तह करके जेब में रखी हुई थी, बिल्कुल उसी जेब में जहाँ घंटी थी। दोनों एक साथ रहते थे, और मुझे लगता था कि दोनों एक-दूसरे से बात करते हैं, जब मैं सो जाता हूँ।
नाश्ते की मेज़ पर पापा चुप बैठे थे। रोटी के दो टुकड़े सामने रखे थे, और उन्होंने एक भी नहीं उठाया। चश्मा कान पर टेप से बँधा हुआ था, टेप पुराना होकर पीला पड़ गया था। हाथ में एक छोटी सी रेती थी, जिसे वो बिना वजह घुमा रहे थे।
कल रात उन्होंने कहा था — कल सब बताऊँगा।
मैंने कल का इंतज़ार किया। कल आ गया था, मेरी आँखों के सामने बैठा था, और कुछ नहीं बोल रहा था।
"पापा," मैंने कहा।
"हम्म।"
"कल आज हो गया।"
उन्होंने रेती घुमाना बंद किया। फिर उसे मेज़ पर रख दिया और उठकर हाथ धोने चले गए। जब लौटे तो माँ की तरफ़ देखा, माँ ने उनकी तरफ़ देखा, और बीच में जो बात थी वो दोनों की आँखों के बीच से होकर गुज़र गई, मेरे पास नहीं आई।
"शाम को," पापा ने कहा। सिर्फ़ इतना। दो शब्द। और फिर औज़ारों का थैला उठाकर बाहर।
काजल ने मेरी तरफ़ देखा और कंधे उठा दिए। वो अपनी नर्सिंग की किताब खोल रही थी, उसकी उँगली पन्ने पर रुकी हुई थी, जैसे वो पढ़ रही हो और साथ में पूरा घर भी सुन रही हो।
"तू जानती है ना," मैंने धीरे से कहा।
"क्या?"
"जो मैं नहीं जानता।"
काजल ने किताब बंद की। उसका चेहरा एक पल के लिए बड़ा हो गया, फिर वो फिर से अठारह साल की हो गई।
"अंकुश भैया," उसने कहा, "मुझे सिर्फ़ इतना पता है कि माँ की रिपोर्ट में दो टेस्ट और लिखे हैं, और माँ ने वो रिपोर्ट अपनी साड़ी के बक्से में रखी है, कपड़ों के नीचे। और मुझे इतना भी पता है कि अगर तूने वो रिपोर्ट देख ली, तो माँ को ये नहीं लगना चाहिए कि हम डर गए हैं।"
"और पापा?"
वो एक सेकंड रुकी।
"पापा के बारे में मुझे कुछ नहीं पता," उसने कहा, और उसका रुकना ही बता रहा था कि वो झूठ बोल रही है। पर उसका झूठ साफ़ था, बुरा नहीं था। घर के झूठ अक्सर ऐसे ही होते हैं — पतले, शर्मिंदा, और दोनों तरफ़ से जाने हुए।
मैंने उसे टोका नहीं। मैं उठकर दुकान की तरफ़ चल पड़ा, और रास्ते में पैर की उँगली से एक कंकड़ उछाला जो नाली के पुल पर जाकर गिरा।
दुकान पर उस सुबह एक पहिया था, एक चेन, और एक ट्यूब जिसे चार जगह से पैबंद लगाना था। मैंने हाथ लगाया तो पता चला कि उस सुबह मेरा मन किसी और जगह था। उँगलियाँ काम कर रही थीं, दिमाग़ नहीं।
उस्ताद अली बक्श की दुकान पर ताला लगा था। तीसरे दिन भी। उनकी सिलाई मशीन की टिक-टिक नहीं सुनाई दी, और सच कहूँ तो गली उस आवाज़ के बिना वैसे ही लग रही थी जैसे सुबह बिना अज़ान के।
मैंने शटर के नीचे से एक काग़ज़ खींचा। चार तह का, किसी अख़बार के कोने पर लिखा हुआ, बूढ़ी उँगली की सीधी-सादी लिखाई में।
लिखा था — घंटी जेब में रखना। आज किसी को मत दिखाना।
मैंने वो काग़ज़ दोबारा पढ़ा। फिर तीसरी बार। नीचे कोई नाम नहीं था। मगर गली में सिर्फ़ एक आदमी है जो इस तरह काग़ज़ मोड़कर छोड़ता है, और वो अभी तीन दिन से गायब है।
शबनम आपा की गुमटी पर भाप उठ रही थी। मैंने वहाँ खड़े होकर चाय माँगी। उन्होंने कप रखा, फिर मेरी तरफ़ देखा, फिर मेरी जेब की तरफ़।
"सुना," उन्होंने कहा, "तूने मेले से एक कबाड़ खरीदा।"
"साइकिल है, आपा।"
"वही कह रही हूँ।"
मैं हँसा। शबनम आपा की ज़ुबान ऐसी है कि अगर वो तारीफ़ भी करें तो आदमी को लगता है कि कहीं कुछ गड़बड़ है।
"आपा," मैंने धीरे से कहा, "पीछे के प्लॉट पर फिर ट्रक आए?"
उन्होंने चिमटी से एक समोसा उठाया और काग़ज़ पर रखा।
"रोज़ आ रहे हैं," उन्होंने कहा। "और रोज़ उनके साथ एक आदमी आता है, मोटा, गले में चेन, पान चबाता हुआ। वो यहाँ गिनती करता है — कितनी दुकानें हैं, किसका शटर कितना बड़ा है।"
"बबलू।"
"तू नाम लेना भी मत," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ पहली बार धीमी हुई। "आज शाम मेला है। वो वहाँ होगा। देख लेना, किसी से उलझना मत।"
"मैं मेले में जा ही नहीं रहा," मैंने कहा।
पर सच ये था कि मैं जानता था कि जाना पड़ेगा। घंटी ने कहा था — वो औरत मुझे ठग समझेगी, और मुझे उससे भागना नहीं है। मुझे उस रात लगा था कि वो बूढ़ी कबाड़न होगी, या कोई ऐसी औरत जो सपनों में आकर हिसाब माँगती है।
मैं उस रात इस खयाल पर हँसा था। दिन में वो खयाल मुझ पर हँसने लगा।
दोपहर में काम के बीच एक अजीब बात हुई। एक आदमी अपनी साइकिल का हैंडल ठीक करवाने आया, और जब मैंने पैसे माँगे तो उसने कहा, "यार, तू तो अब बड़ा कारोबारी बन गया है। मेले में तेरा नाम चल रहा है।"
मेरा हाथ रुक गया।
"मेला? मेरे नाम का क्या है मेले में?"
वो हँसा। "मतलब तू नहीं जानता? कल शाम को जिसके यहाँ 'उस्ताद' का बोर्ड था, वहाँ अब 'चमत्कारी जोड़ी साइकिल' का बोर्ड लगा है। कहते हैं कोई औरत फ़ोटो खींच रही है और बोल रही है कि गली का एक पागल लड़का लोगों को झांसा देता है।"
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