The Mysterious Bell8 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 8

7 min read November 5, 2026

मैंने जेब से घंटी निकाली।

पीतल। पुरानी। मेरी हथेली में छोटी सी लग रही थी। मैंने उसे घुमाया। मैंने उसे रोशनी में उठाया। मैंने उसे अपने घुटने पर रखा।

वो चुप थी।

मैंने उसे अपनी मुठ्ठी में लिया। मैंने उसे हिलाया। कुछ नहीं।

तो ये क्या है? जब मैं उसे दबाता हूँ, तब वो बोलती है, और जब मैं उसे हिलाता हूँ, तब चुप। इसका मतलब ये है कि उसे शुरू करने की ज़रूरत है। उसे शुरू करने के लिए किनारे से दबाना पड़ता है।

मैंने अपने अँगूठे को उसके बीच वाले किनारे पर रखा।

और फिर मैंने उसे धीरे से गोल घुमाया।

शायद ये आम घंटी है। शायद कुछ नहीं होगा। शायद मैंने पूरा पागलपन में निकाल दिया।

और फिर मैंने सोचा, रुक जा। अभी न बजा। सोच पहले।

मैंने घंटी को अपने घुटने पर रखा और आसमान की तरफ़ देखा।

मैंने सोचा, क्या कहा था उसने? "मैं बुखार नहीं हूँ।" ये कोई आम बात नहीं थी। ये उसने मेरी सोच का जवाब दिया था। मैं सोच रहा था — गर्मी, धूप, कान में बजना। और उसने वही कहा।

मतलब वो मेरे अंदर झाँक सकती है।

और ये बात मुझे डरा नहीं, ठंडा कर गई।

मैंने सोचा, ठीक है। अगर तू मेरे अंदर झाँक सकती है, तो मेरा अगला सवाल भी सुन ले — तू कुछ माँगती क्या है?

क्योंकि मैं साइकिल मिस्त्री हूँ। मैं जानता हूँ कि कोई चीज़ मुफ़्त नहीं आती। एक पहिया ठीक करने के लिए भी हाथ लगाना पड़ता है, ग्रीस गंदा करना पड़ता है, हवा डालनी पड़ती है। मेले में एक कबाड़ी ने मुझे दो सौ में साइकिल दी, और उस साइकिल पर एक बोलती घंटी थी। और कबाड़ी चुप बैठा था, बिल्कुल चुप, जैसे जानता था कि मैं क्या ले जा रहा हूँ।

अब सवाल है — मैं क्या ले आया हूँ?

और यही सोचते-सोचते, मेरी उंगली अपने आप घंटी पर रखी गई।

घंटी बजी।

इस बार मैंने अपने आप को तैयार रखा था। हथेली में झनझनाहट आई, कलाई तक, और वो ठंडी लकीर रीढ़ से गर्दन तक खिंच गई।

और आवाज़ आई।

"कल मेले में वो औरत जो तुझे ठग समझेगी, उससे बचकर मत भागना। उसकी बात सुनना।"

मेरा हाथ घंटी पर जम गया।

"कौन औरत?" मैंने फुसफुसाकर पूछा।

पर घंटी चुप हो चुकी थी। जैसे बोलने की उसकी चीज़ ख़त्म हो गई हो। जैसे उसने एक बात कहने के लिए बहुत ज़ोर लगाया हो, और अब उसे आराम चाहिए।

मैं छत पर बैठा रहा।

नीचे गली से आवाज़ आई, टिंकू की माँ की आवाज़, "टिंकू, चल सो जा!" और फिर दरवाज़ा बंद होने की आवाज़।

मैंने घंटी को देखा।

"ठग समझेगी," मैंने धीरे से दोहराया। "मेला तो आज ही था।"

मेरे अंदर एक झटका सा हुआ। मेला आज था। पर घंटी कह रही है — कल मेले में। यानी कल फिर मेला है। या फिर मैं गलत समझ रहा हूँ।

मैंने अपनी जेब टटोली, पर वो खाली थी। घंटी मेरे हाथ में थी।

मैंने अपने आप से कहा, हो सकता है वो कल की बात कर रही हो। सड़क पर। कहीं और। किसी और मेले की।

मेरी माँ ने कहा था, दो टेस्ट और होने हैं। काजल ने कहा था, दो टेस्ट और होने हैं। और मेले में मैंने एक लड़की देखी थी, कैमरा लिए, बहुत जल्दी में। मीरा? नहीं, मीरा आज मेले में नहीं थी। या थी? मुझे याद नहीं।

मैंने घंटी को मुठ्ठी में लिया।

"ठग समझेगी," मैंने फिर कहा, धीरे से। "कोई औरत मुझे ठग समझेगी। मैं किसी को ठगता नहीं हूँ। मैं तो दो रुपये का पंचर पैच पाँच में करता हूँ, और वो भी बताकर करता हूँ।"

मुझे गुस्सा आया। सच में आया। किसी अजनबी की बात का गुस्सा, किसी अनजान चीज़ का गुस्सा।

और फिर वो गुस्सा एक ठंडी बात में बदल गया, जो मेरे अंदर बैठ गई — अगर कोई औरत मुझे ठग समझती है, तो शायद इसकी वजह है कि मैं उसकी नज़र में ठग हूँ।

ये बात बुरी थी। माँ की पर्ची, पापा की चुप्पी, भारद्वाज का बैनर — ये सब रहस्य थे। पर "तुझे कोई ठग समझेगा" कोई रहस्य नहीं है। वो इल्ज़ाम है।

और इल्ज़ाम का जवाब देना पड़ता है।

मैंने घंटी को देखा।

"सुन," मैंने कहा, "तू अगली बार जब बोले, तो पूरी बात बोल। अधूरी बात बोलकर चुप हो जाना, ये बुज़ुर्गों की आदत है। और मैं बुज़ुर्गों की आदतों से तंग आ चुका हूँ।"

घंटी चुप रही। बस पीतल चमका, थोड़ा सा, मेरी मुट्ठी में।

मैंने उसे अपनी जेब में डाला, और छत पर लेट गया। आसमान में कोई तारा नहीं था। बस एक चाँद था, जो शहर की धूल में पीला पड़ रहा था।

और नीचे, घर की सबसे पुरानी दीवार के पास, जंग लगी साइकिल खड़ी थी। दीवार की तरफ़ मुँह किए हुए। जैसे किसी से बात कर रही हो।

मुझे नींद नहीं आई।

मैंने सुना — नीचे पापा ने करवट बदली। माँ ने खाँसा। काजल ने अपनी किताब बंद की।

और एक पल ऐसा आया जब मुझे लगा कि पूरी गली सो रही है, और सिर्फ़ मैं जाग रहा हूँ। सिर्फ़ मैं, और मेरी जेब में पीतल की घंटी।

मैंने सोचा, अगर ये घंटी मेरी है, तो मैं इसका मालिक हूँ। और अगर मैं मालिक हूँ, तो मुझे इससे सवाल पूछने का हक़ है। और अगर वो मेरे सवाल का जवाब नहीं देती, तो मैं उसे उस ब्रैकेट पर लटका दूँगा और कबाड़ी के पास वापस ले जाऊँगा।

"दो सौ वापस," मैंने अपने आप से कहा। "और एक झटका मुफ़्त।"

मुझे हँसी आई।

फिर मेरे अंदर एक और बात उठी, अचानक, बिना बुलाए — अगर कोई मुझे ठग समझेगी, तो हो सकता है वो मुझे ठगने की कोशिश भी करेगी। और अगर वो पहले से मुझे ठग समझती है, तो शायद वो मुझे कुछ ऐसा देगी जो देखने में सस्ता हो और अंदर से महँगा।

और मैंने तय किया — मैं कल उससे नहीं भागूँगा। चाहे वो कुछ भी हो। चाहे वो कैमरा लिए कोई जल्दबाज़ लड़की हो, या कोई बूढ़ी कबाड़न, या कोई ऐसी जो मेरे बारे में कुछ ऐसा जानती हो जो मैं खुद नहीं जानता।

क्योंकि उस रात मुझे एक बात समझ आ गई थी।

मेरे पास दो रहस्य थे — जो मैंने खुद देखे थे, और जो मुझे दिखाए गए थे। माँ की पर्ची पहला था। और ये घंटी दूसरा। और दोनों में एक बात एक जैसी थी।

दोनों मुझसे कह रहे थे — अंकुश, तू जो समझ रहा है, वो पूरी बात नहीं है।

और मुझे लगा कि कल, अगर मैं मेले में जाऊँगा, तो मुझे उस पूरी बात का एक टुकड़ा मिलेगा। शायद सिर्फ़ एक टुकड़ा। पर मैं उस टुकड़े के लिए किसी से नहीं भागूँगा।

और जब आधी रात के बाद मैंने करवट बदली, तब मेरे कान में वो रूखी आवाज़ बहुत दूर से आई।

"अब सो जा। तेरे पास कल एक औरत से मिलने जाना है। और तू जानता है, औरतों के सामने ऐसी हालत में नहीं जाना चाहिए।"

मैंने आँख खोली।

कोई नहीं था। बस छत, बस चाँद, बस गली की चुप्पी।

मैंने घंटी को जेब में अच्छी तरह खोंसा और मुँह फेरकर लेट गया।

पर मेरे अंदर एक बात चुभ रही थी — घंटी ने पहली बार मुझसे मज़ाक किया था। और मुझे ये मज़ाक पसंद आया।

ये बात ख़तरनाक थी।

क्योंकि जिससे आपकी बनने लगे, उसे आप आसानी से छोड़ नहीं पाते।

और मैं आज किसी चीज़ को छोड़ने के मूड में नहीं था।

मैं सो गया।

पर नींद में मुझे एक साइकिल दिखी, जो चल रही थी, और उस साइकिल पर घंटी नहीं थी, और फिर भी घंटी बज रही थी। और आवाज़ कह रही थी — तू अकेले नहीं उठाएगा।

सुबह मुझे किसी के हँसने की आवाज़ से नींद खुली।

टिंकू नीचे खड़ा था, गली में, और मेरी जंग लगी साइकिल की तरफ़ देखकर हँस रहा था।

"उस्ताद!" उसने चिल्लाकर कहा। "ये कबाड़ा बाहर क्यों खड़ा है? किसी को ठोकना है?"

मैंने करवट बदली और अपनी जेब टटोली।

घंटी वहीं थी। गरम, जैसे रात भर जागी हो।

और मैं मुस्कुराया।

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