The Mysterious Bell – Chapter 895
बबलू ने काग़ज़ उठाया और उसे पढ़ने लगा — नहीं, पढ़ने का नाटक करने लगा। क्योंकि जो आदमी पढ़ना जानता है, वो काग़ज़ को पढ़ने से पहले उसकी तरफ़ ऐसे नहीं देखता जैसे तमाशा देख रहा हो।
"देखिए," उसने काग़ज़ मेज़ पर खोल दिया। "यहाँ पर साफ़ लिखा है। सुशीला यादव का नाम। नीचे नूर अस्पताल की ज़मीन। यानी यह दावा जो आपका है, वो आपका है भी और नहीं भी है।"
दुबे अंकल ने अपनी छड़ी की नोक ज़मीन पर टिकाई।
"बोल जल्दी," वो बोले। "मुँह में पान रखा है, मतलब बोल मत रखा है।"
बबलू हँसा। हँसी में वो चीज़ थी जो बताती है कि आदमी को अपनी हँसी पर भरोसा है, बात पर नहीं।
"दरोगा साहब, ये काग़ज़ बताता है कि शंकर भाई का ज़मीन पर जो हिस्सा है, वो उनका अपना नहीं है। वो साहब की मेहरबानी है। हर महीने आप आते थे, अंगूठा लगाते थे, और साहब उसे जारी रखते थे। जारी। समझ रहे हैं न? आज भी अगर आपका दावा ठीक है, तो सिर्फ़ इसलिए कि भारद्वाज साहब आपको हर महीने दावा बढ़ाने देते हैं।"
उसने काग़ज़ को उँगली से थपथपाया।
"यानी दरोगा साहब, दोनों तरफ़ एक ही आदमी का हाथ है।"
कमरे में हवा का एक टुकड़ा रुक गया।
मैंने माँ की तरफ़ देखा। माँ ने अपनी हिसाब की कॉपी सीने से लगाई हुई थी, और उनकी उँगलियाँ उसके किनारे पर सफ़ेद पड़ गई थीं।
और मैं देख रहा था कि पापा — जो आज सुबह उठकर नीली शर्ट पहनकर थाने तक चलकर आए, जो सबके सामने खड़े होकर बोले कि गलती मेरी है — पापा का चेहरा कुछ नहीं बदला। और मुझे इस बात से सबसे ज़्यादा चिढ़ हुई। मुझे चिढ़ हुई कि बबलू ने पापा को वो चीज़ सुना दी जो पापा बीस साल से खुद अपने आप को सुना रहे थे — कि तुम्हारा कुछ भी तुम्हारा नहीं है।
मेरी जेब में घंटी गरम थी। और मेरी मुट्ठी अपने आप बंद हो गई। ग्रीस के निशान उँगलियों पर थे और मुझे लगा कि सारा गुस्सा उन्हीं उँगलियों में जमा हो गया है।
"अंकुश।"
माँ की आवाज़। धीमी। बस एक शब्द।
पर मैं उठ चुका था।
कुर्सी पीछे खिसकी और उसकी टाँग फ़र्श पर ऐसी चरमराई कि दरोगा जी का हाथ मेज़ पर रखे रजिस्टर पर चला गया।
मैंने दो कदम में बबलू का कॉलर पकड़ लिया।
मुझे याद है, उस वक़्त उसके गले की चेन मेरी हथेली से टकराई और ठंडी थी, जबकि मेरा हाथ जल रहा था। उसका कुर्ता बहुत धुला हुआ था और उस पर इत्र की गंध थी — वो इत्र जिससे लोग अपनी बदबू नहीं, अपना डर छिपाते हैं।
"तुम्हारे साहब को क्या लगता है?" मैंने कहा। मेरी आवाज़ मेरी नहीं लग रही थी। "कि मेरे पापा का डर कभी खत्म ही नहीं होगा? कि वो बीस साल डरे, तो अगले बीस साल भी डरेंगे? कि अंगूठा लगाते रहेंगे, लकीर खिंचवाते रहेंगे, और तुम्हारे साहब हर महीने उन्हीं काग़ज़ों पर बैठकर कहते रहेंगे कि मेहरबानी जारी है?"
बबलू के चेहरे पर पहले वो झटका आया जो हर बदनसीब आदमी के चेहरे पर आता है जब उसे उम्मीद नहीं होती कि कोई उसकी छाती पकड़ लेगा। फिर उसके पीछे वाला मुंशी — वो दुबला काग़ज़ थमाने वाला आदमी — एक कदम पीछे हट गया, और उसका हाथ अपने आप फ़ाइल के ऊपर चला गया, जैसे फ़ाइल ढाल हो।
गोविंद भाई की गोद से रसीदों वाली फाइल फिसलकर फ़र्श पर गिर पड़ी और उनका टूटा चश्मा नाक पर और तिरछा हो गया। उन्होंने उसे बार-बार सीधा करने की कोशिश की और हर बार वो फिसल गया।
"अंकुश! छोड़!"
दरोगा जी की आवाज़ कड़क थी। पर उनके शब्द से पहले एक और हाथ मुट्ठी पर आ चुका था।
पापा का हाथ।
मैंने देखा — उनकी उँगलियाँ मेरे हाथ पर थीं, पतली, सूखी, नाखूनों में काले निशान, सालों का तेल और धूल। उन्होंने ज़ोर नहीं लगाया। यही बात है उनमें। पापा कभी ज़ोर नहीं लगाते। वो सिर्फ़ हाथ रख देते हैं और हाथ अपने आप कह देता है कि बस।
"बेटा, छोड़ दे।"
"पापा—"
"छोड़ दे।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "ये वही कर रहा है जो इसका काम है। इसे नाराज़ मत कर। इसे काम करने दे।"
मुझे कुछ समझ नहीं आया।
पापा ने मेरे हाथ को धीरे से नीचे किया, मेरी मुट्ठी खोली, जैसे कोई बच्चे के हाथ से टूटा हुआ काँच निकालता है — बिना डाँट, बिना जल्दी। फिर वो मेरे आगे खड़े हो गए।
और मैंने देखा कि मेरे पापा, जिन्हें मैंने बचपन से हमेशा झुकी कमर में देखा, आज सीधे खड़े थे।
बबलू ने कुर्ता सीधा किया। उसकी साँस थोड़ी तेज़ थी। उसने मुझे एक बार देखा, फिर पापा को, और फिर अपनी आवाज़ में फिर से वो मिठास लाकर बोला, "शंकर भाई, बच्चे हैं। बच्चों को तो मालूम ही नहीं कि दुनिया कैसे चलती है।"
"मुझे मालूम है," पापा ने कहा।
उन्होंने मेज़ पर रखे पीले काग़ज़ को नहीं उठाया। उन्होंने बस उसकी तरफ़ देखा और कहा, "इस काग़ज़ में क्या लिखा है, मैं नहीं देखता। जो देखता हूँ, वो यह है — तुम्हारे हाथ में स्याही है और मेरे नाम पर लकीर पहले ही खिंच चुकी है। यह काग़ज़ नया है, बात पुरानी है।"
बबलू हँसा। "तो क्या करें, भाई? हम तो सिर्फ़ बताने आए थे कि आपका दावा चल रहा है। मेहरबानी जारी है। आप खुश रहिए, दरोगा साहब खुश रहिए, हम चले।"
"जाकर अपने साहब से कह दो," पापा ने कहा, "कि शंकर यादव अब नया काग़ज़ नहीं माँगेगा।"
बबलू ठिठक गया।
"अब वो पुराना रजिस्टर माँगेगा।"
कमरे में एक पल ऐसा आया कि सबने एक साथ साँस ली। दरोगा जी की कुर्सी एक बार चरमराई और फिर चुप हो गई। मीरा, जो दरवाज़े के पास दीवार से टिकी खड़ी थी, हिली नहीं, पर उसकी उँगलियाँ अपने फटे बैग के पट्टे पर कस गईं।
और बबलू — बबलू ने वो किया जो हर आदमी करता है जब उसके सामने ऐसी बात आ जाए जिसकी उसे तैयारी न हो। वो हँस पड़ा।
पर उस हँसी में पहली बार कुछ कम था।
"रजिस्टर?" उसने कहा। "भाई साहब, रजिस्टर तो साहब की जेब में है। जिस दिन चाहें, निकालकर आपकी मेज़ पर रख दें। आप क्या समझते हैं, रजिस्टर कोई अलमारी में पड़ा रहता है जो आप जाकर खोल लेंगे?"
और उसी वक़्त मेरे अंदर कुछ बजा — घंटी नहीं, मेरा ही दिमाग़। किसी चीज़ की आवाज़ जैसी, जो लंबे समय से बंद पड़ी हो और अचानक खुल जाए।
क्योंकि जो आदमी किसी चीज़ को "जेब में है" कहकर बढ़ाई करता है, वो उसे देख नहीं रहा होता। वो सिर्फ़ सुना हुआ दोहरा रहा होता है।
और अगर रजिस्टर सच में साहब की जेब में होता, तो गोविंद भाई इतने दिन इस अलमारी की नक़ल वाली चाबी की बात क्यों करते?
गोविंद भाई मेरे पीछे खड़े थे। मैंने उनकी आवाज़ सुनी, इतनी धीमी कि दरोगा जी भी न सुनें।
"अंकुश भाई," वो फुसफुसाए। उनकी साँस गरम थी और हाथ काँप रहा था। "ये नहीं जानता। रजिस्टर अलमारी में है। ये डींग मार रहा है। साहब के सामने इसकी कोई औकात नहीं, यहाँ आकर बड़ा आदमी बन रहा है।"
मैंने बबलू का कॉलर छोड़ दिया।
मेरी मुट्ठी खुली और उसमें से गुस्सा नहीं गिरा — गुस्सा वहीं रहा, पर उसका रूप बदल गया। गुस्सा अब शोर नहीं कर रहा था। गुस्सा अब गिन रहा था।
मैंने कुर्ता सीधा किया — नहीं, मैंने नहीं किया, मैंने उसे छोड़ दिया और वो अपने आप सीधा हो गया।
फिर मैं मुस्कुराया।
और मेरी मुस्कान देखकर बबलू का चेहरा बदला, क्योंकि जिस आदमी को तुम गुस्से में देखने के लिए तैयार हो, उसकी मुस्कान तुम्हारे लिए सबसे बड़ी बेईमानी होती है।
"ठीक है भाई," मैंने कहा। "जाकर अपने साहब से कह दो — शंकर यादव का बेटा आज तीसरी मंज़िल की सीढ़ी चढ़ेगा।"
बबलू की भौंहें उठीं।
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