The Mysterious Bell – Chapter 894
कमरा फिर चुप हो गया।
मैंने अपने हाथ देखे। उँगलियों पर ग्रीस के निशान थे, जैसे हमेशा। मैं साइकिल ठीक करने वाला लड़का था। मैं रजिस्टर चुराने वाला लड़का नहीं था। और दरोगा जी की बात सच थी — सच इस तरह कि वो मेरे सीने में चुभ रही थी।
मीरा ने धीरे से कहा, "दरोगा जी, एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"अगर काग़ज़ किसी ऐसे आदमी के हाथ में हो जिसके नाम पर वो काग़ज़ बना ही नहीं, तो वो काग़ज़ किसका है?"
दरोगा जी ने उसकी तरफ़ देखा।
"तू वकील है?" उन्होंने पूछा।
"नहीं," मीरा ने कहा। "मैं पत्रकार हूँ। और मैंने पाँच साल पहले एक आधा सच छापकर एक घर तोड़ा था। तब से मैं अपने हर सवाल को दो बार तोलती हूँ। यह सवाल दूसरी बार तोला हुआ है।"
दुबे अंकल ने छड़ी ज़मीन पर रखी और धीरे से बोले, "दरोगा जी, रजिस्टर उठाना चोरी होगी अगर वो मालिक की मर्ज़ी के बिना उठे। पर अगर वो काग़ज़ खुद कहे कि मैं इन लोगों का हूँ — तो फिर बात बदल जाती है। और हमारे पास अभी एक पन्ना है, जिस पर एक नाम है। उस नाम वाली औरत इस कमरे में बैठी है और कह रही है कि उसका हाथ पकड़कर उससे लकीर खींचवाई गई थी।"
दरोगा जी ने कुर्सी घुमाई। उन्होंने माँ की तरफ़ देखा। और फिर उन्होंने एक पुराने आदमी की तरह, धीरे से कहा, "यह बात आज रजिस्टर में लिखी जाएगी। पूरी। बिना एक शब्द काटे।"
माँ ने सिर हिलाया।
"और फिर?" मैंने पूछा।
"और फिर," दरोगा जी बोले, "काग़ज़ ज़ब्त होगा। इमारत से काग़ज़ ज़ब्त होता है, अंकुश। चोरी से नहीं। अगर हम उस अलमारी पर कानूनी मुहर लगा दें और उसे खोलने का हुक्म लिख दें, तो सबूत हमारा होगा।"
"उसके लिए कितना वक़्त लगेगा?" मीरा ने पूछा।
दरोगा जी ने अपनी घिसी कलम उठाई और मेज़ पर रखी।
"दो दिन," वो बोले। "शायद तीन।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
क्योंकि सब जानते थे कि हमारे पास तीन दिन नहीं हैं।
उस वक़्त सबसे पहले मैंने सुना — बाहर बरामदे में किसी के उठने की आवाज़। कुर्सी या स्टूल घिसटने की। फिर किसी के पैरों की आहट।
और फिर बाहर से एक आवाज़ आई।
वो आवाज़ पुरानी थी। भारी थी। पर भारीपन में भी उसमें वो चीज़ थी जो मुझे तब से पता है जब से मैंने इस गली में आँख खोली है।
पान चबाता हुआ, मुँह में थूक घुमाता हुआ, मोटी सोने की चेन खनकाता हुआ।
बबलू पांडे।
"दरोगा साहब," उसने बाहर से आवाज़ दी, इतनी ऊँची कि पूरा थाना सुन ले और जो बाहर खड़े हैं वो भी सुन लें। "क्या बात है, साहब! इतनी देर तक बंद कमरे में क्या चल रहा है?"
दरोगा जी ने कुर्सी घुमाई। उनकी आँखें सिकुड़ीं। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उस नज़र में वो बात थी जो एक पुराने सिपाही को सबसे ज़्यादा चिढ़ाती है — पूरे बरामदे के सामने किसी का दरवाज़ा खटखटाना।
"रुक," उन्होंने मुझसे कहा।
मैं रुका। पर मेरी जेब में घंटी गरम थी और उसके गरम होने का मतलब मैं अब जान गया था।
बबलू ने चप्पल घसीटते हुए दरवाज़े तक आकर एक बार ज़ोर से खाँसा। फिर उसने अपना मोटा हाथ दरवाज़े के फ्रेम पर टिकाया और यूँ बोला जैसे यह उसका घर हो।
"दरोगा साहब, बुरा मत मानिए। मुझे खबर मिली कि यहाँ शंकर यादव गुज़ारिश करने आए हैं। तो मैं सोचूँ, यह क्या बात हो गई? साहब ने मुझे बोला है — बबलू, तू जा, देख, शंकर भाई को कोई तकलीफ़ तो नहीं। और साथ में एक छोटी सी गुज़ारिश भी है।"
दुबे अंकल ने छड़ी की नोक उठाई और उसे वापस ज़मीन पर रख दिया। फिर उन्होंने मुझे देखा, और उनकी आँख में वो पुरानी चेतावनी थी। जो आदमी इस तरह का वाक्य बोलता है, वो काग़ज़ लेने नहीं आता। वो बयान लेने आता है।
बबलू ने दरवाज़े की चौखट पर अपना पानदान वाला रूमाल खींचा और उसे सीधा करते हुए, धीरे से, इतने प्यार से जैसे कोई दावत का न्योता दे रहा हो, उसने आख़िरी बात कही।
"दरोगा साहब, मैं शंकर यादव का बयान अपने हाथ से लिखवाने आया हूँ।"
कमरे में हवा रुक गई।
मैंने माँ की तरफ़ देखा। माँ ने मेरी तरफ़ देखा।
और मेरी जेब में घंटी, जो पिछले आधे घंटे से चुप थी, उसने एक बार हिलकर ऐसा किया जैसे घुटन भरी साँस छोड़ी गई हो। आवाज़ नहीं आई। शब्द नहीं आया। पर मैंने अपनी जेब के कपड़े पर उस पीतल की गरमाहट महसूस की, जैसे बोल रही हो — बोलने से पहले देख लो कि कौन बोल रहा है।
और मैंने अपना हाथ जेब पर रखा, और मैंने अपने आप से कहा कि अंकुश, आज तेरे पास बात करने के लिए ज़ुबान है, काग़ज़ नहीं। तो ज़ुबान से ऐसी बात निकलवा जो उसके काग़ज़ का ऊपरी ढक्कन उठा दे।
क्योंकि बबलू यह सोचकर आया था कि शंकर यादव डर कर अपना बयान उसके मुँह पर बोल देंगे।
पर उसे यह नहीं पता था कि शंकर यादव आज सुबह उठकर नीली शर्ट पहन चुके हैं।
और जो आदमी एक बार नीली शर्ट पहन ले, वो फिर सफ़ेद कुर्ते वाले के मुँह से अपनी ज़ुबान नहीं बुलवाता।
॥
बबलू ने दरवाज़े की चौखट पर हाथ टिकाया था, पर पैर अंदर रखने से पहले उसने एक बार पूरे कमरे को नापा। जैसे कोई व्यापारी मंडी में आकर पहले देखता है कि किस तरफ़ माल रखा है और किस तरफ़ तराज़ू।
उसकी नज़र मेज़ पर पड़ी। पीले पन्ने पर। फिर माँ पर। फिर पापा पर।
और उसके मुँह पर वो मुस्कान आई जो मुझे तब से पसंद नहीं, जब से मैंने इसे पहली बार मेले में चूड़ियों की गुमटी उलटते देखा था।
उसने पानदान वाला रूमाल खोला, उसमें से एक पीक निकाली और दरवाज़े के बाहर, बरामदे की दीवार की तरफ़, बिना देखे फेंक दी। फिर अंदर आया। चप्पल की आवाज़ ऐसी, जैसे कोई अपने ही घर में आ रहा हो और जूते उतारने की ज़हमत न कर रहा हो।
उसके पीछे एक आदमी था।
दुबला, छोटा, ज़र्द सफ़ेद कुर्ता, घुटनों तक लटकती फ़ाइल, नाक पर फिसलता चश्मा और बालों में इतना तेल कि थाने के पंखे की हवा भी उसके सिर पर फिसल जाए। सक्सेना का मुंशी। मैंने इसे दो बार देखा था — एक बार दुकान के सामने, एक बार अस्पताल के गेट पर। यह वही आदमी है जो कभी नहीं बोलता, बस काग़ज़ थमाता है और पीछे हट जाता है। जैसे काग़ज़ थमाना कोई नौकरी हो और बोलना किसी और का काम।
उसने आगे बढ़कर एक पीला काग़ज़ मेज़ पर रख दिया।
"दरोगा साहब," बबलू बोला, आवाज़ में वो नरमी जो धमकी से भी ज़्यादा चुभती है। "आप बैठिए, बैठिए। मैं कोई झगड़ा करने नहीं आया। मैं तो बस एक छोटा-सा काम लेकर आया हूँ।"
दरोगा जी ने काग़ज़ नहीं उठाया। उन्होंने उसे देखा, जैसे कोई सिपाही सड़क पर पड़ी चीज़ को देखता है — पहले यह तय करते हुए कि उसे छूना है या नहीं।
"क्या है ये?"
"ये?" बबलू ने काग़ज़ की तरफ़ इशारा किया, फिर अपनी सोने की चेन को उँगली में घुमाया। "ये वही काग़ज़ है, साहब, जो आपके रजिस्टर के नीचे होना चाहिए। अस्पताल की ज़मीन का हिसाब। पूरा हिसाब। तारीख़ के साथ।"
उसने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराया।
"शंकर भाई," वो पापा की तरफ़ मुड़ा, "आपने आज सुबह थाने में जो बोला, वो सब माफ़। आदमी है, बोल देता है। बाप-बेटे के बीच, गुस्सा होता है, आँसू आते हैं, बात निकल जाती है। मैं तो यही कहता हूँ — आप बड़े आदमी हैं।"
पापा ने कुछ नहीं कहा। वो नीली शर्ट में बैठे थे, कमर झुकी हुई, टेप वाला चश्मा नाक पर। उनका हाथ मेज़ के किनारे पर रखा था और उँगली एक जगह स्थिर थी।
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