The Mysterious Bell – Chapter 875
“हाँ भाई, मैं ही हूँ,” मैंने कहा। “गाड़ी नहीं हूँ, इंसान हूँ, ज़रा सब्र से पेश आइए। और अंदर आइए, चाय पी लीजिए, धूप में खड़े हैं।”
भीड़ में हल्की हँसी फूटी। सिपाही की ज़ुबान पर आया कुछ रुक गया।
“मैं मज़ाक नहीं कर रहा,” उसने कहा।
“मैं भी नहीं कर रहा,” मैंने कहा। “चाय की बात सच में कह रहा हूँ। पहले बैठिए। ताला जल्दी नहीं भागेगा।”
वो नहीं बैठा। उसने दुकान की दीवार पर नोटिस चिपकाने के लिए गोंद की डिब्बी निकाली, पर मैंने हाथ बढ़ा दिया।
“एक मिनट,” मैंने कहा। “पहले यह देख लीजिए।”
मैंने जेब से रसीद निकाली — वो लाल कपड़े में लिपटी, आधी घिसी नगरपालिका की मोहर वाली, पचास साल पुरानी रसीद — और मीरा की तरफ़ बढ़ा दी।
मीरा ने कैमरे के सामने उसे खोला। कैमरे की लाल बत्ती रसीद पर पड़ रही थी।
“सिपाही जी,” मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ साफ़ और ठंडी थी, जैसे फ़ैसला पहले ही हो चुका हो। “आपके हाथ में जो नोटिस है, उस पर तारीख़ कल की है। और ये रसीद पचास साल पुरानी है। अगर इन दोनों तारीख़ों के बीच पचास साल का फ़र्क़ है, तो क्या आपको नहीं लगता कि पहले ये फ़र्क़ जाँचना चाहिए?”
भीड़ में सन्नाटा आ गया।
सिपाही ने नोटिस अपने हाथ में उलटा-पलटा देखा।
“मैंने ये नहीं लिखा,” उसने धीमे से कहा।
“हमें पता है,” मीरा ने कहा। “पर आपने ये उठाया ज़रूर है, और जो आदमी काग़ज़ उठाता है, वो उसकी तारीख़ भी उठाता है। आप चाहें तो इसे मेरे कैमरे में दिखा दीजिए।”
सिपाही ने कैमरे की तरफ़ देखा। लाल बत्ती जल रही थी।
“ये मत कीजिए,” उसने कहा।
“मैं कुछ नहीं कर रही,” मीरा ने कहा। “मैं सिर्फ़ अपना काम कर रही हूँ। आप अपना कीजिए।”
तभी शबनम आपा आगे आईं। उनके हाथ में लोहे की चिमटी थी, जैसे हमेशा रहती है। उन्होंने ताले की तरफ़ देखा और फिर सिपाही की तरफ़।
“ये ताला किसका है?” उन्होंने पूछा।
“ये — ये सरकारी है,” सिपाही ने कहा।
“सरकारी ताला मेरी गुमटी का है,” शबनम आपा ने कहा। “मेरी गुमटी, जिसकी ज़मीन का काग़ज़ अभी इस लड़के की जेब से निकला है। ये कोई खिलौना नहीं है, भाई। मेरे बाप ने चूल्हा जलाया था उस ज़मीन पर और मेरी माँ ने उसी चूल्हे पर पचास साल चाय उबाली है। ताला लगाने से पहले उसका हिसाब लगाओ।”
उनकी आवाज़ ऊँची नहीं थी। बस इतनी थी कि गली के आख़िरी कोने तक पहुँच गई।
और तभी रज़िया ने, प्लास्टर वाली टाँग के सहारे लाठी टेकते हुए, आगे बढ़कर शबनम आपा का हाथ पकड़ लिया।
किसी ने कुछ नहीं कहा। पंद्रह साल बाद, दो बहनें एक-दूसरे का हाथ पकड़े खड़ी थीं, एक सरकारी ताले के सामने।
मैंने देखा कि सिपाही की आँखें झुक गईं।
और फिर टिंकू आगे आया।
उसके हाथ में उसकी नई कॉपी थी। वो कॉपी जो उसने कल ही ली थी, जिस पर उसका नाम लिखा था और जिसके पहले पन्ने पर उसने बड़े अक्षरों में कुछ लिख रखा था। वो सिपाही के सामने खड़ा हो गया। उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर वो ठिठककर रुका नहीं।
“देखिए,” उसने कहा। “ये मेरी नई कॉपी है। मैं कल से स्कूल जाऊँगा। रोज़ जाऊँगा। मास्टर जी ने मेरा नाम लिख दिया है।”
“तो?” सिपाही ने कहा।
“तो ये भी सुन लीजिए,” टिंकू ने कहा। “कल से स्कूल जाऊँगा, पर आज मेरे उस्ताद की दुकान नहीं बंद होगी।”
भीड़ में पहले हँसी फूटी — इतनी छोटी कॉपी और इतनी बड़ी बात। फिर हँसी गुस्से में बदल गई। किसी ने कहा, “सही कह रहा है।” किसी ने कहा, “ताला लेकर आए हो, काग़ज़ तो दिखाओ पहले।” कोई पीछे से बोला, “ये बच्चा अच्छा बोला।”
सिपाही ने भीड़ को देखा। भीड़ वापस नहीं हटी। दुबे अंकल अपनी कुर्सी से उठे और दुकान के दरवाज़े के बीच जाकर खड़े हो गए — बिना कुछ कहे, सिर्फ़ खड़े होकर। उनकी नीली शर्ट धूप में चमक रही थी।
मैंने सिपाही को धीरे से कहा — “भाई, मैं आपकी नौकरी नहीं छीन रहा। मैं सिर्फ़ कह रहा हूँ, आप जो कर रहे हैं, वो आपने खुद नहीं सोचा। एक बार ऊपर बात कर लीजिए। अगर ऊपर से भी यही हुक्म आए, तो ताला लगा दीजिए। मैं रोकूँगा नहीं।”
वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखता रहा।
फिर उसने थैले से फोन निकाला। दूर जाकर बात की — कभी हाथ में फोन दबाकर, कभी दीवार की तरफ़ मुँह करके, कभी मेरी तरफ़ देखकर। दो बार उसने नोटिस देखा। एक बार रसीद की तरफ़ झाँका। उसकी आवाज़ नहीं सुनाई दे रही थी, पर उसकी गर्दन बता रही थी कि सामने वाला खुश नहीं है।
पूरी गली उसके चेहरे को पढ़ रही थी। मैं भी।
पाँच मिनट। आठ मिनट। दस मिनट।
तभी गली के मोड़ से खेलू काका आते दिखे। बहुत धीरे। उनकी लाठी ज़मीन पर टक-टक कर रही थी। उन्हें देखकर भीड़ अपने आप दो हिस्सों में फट गई — जैसे रास्ता खुद बन गया। वो सीधे मेरे पास आए और मेरे कंधे पर हाथ रखा। उन्होंने कुछ नहीं कहा।
सिपाही ने फोन बंद किया। वो लौटा। उसके चेहरे से कुछ उतर गया था।
“ऊपर से कहा है,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ वापस आम आदमी की आवाज़ थी, “कि रसीद की जाँच पूरी होने तक सील नहीं होगी।”
भीड़ ने साँस ली। किसी ने ताली बजाई। काजल ने माँ का हाथ दबाया। पापा ने आँखें बंद कर लीं — दो पल के लिए, बस।
पर सिपाही ने हाथ उठाया।
“रुकिए,” उसने कहा। “जाँच पूरी होने तक दुकान का लाइसेंस निलंबित रहेगा। मतलब, नए काम नहीं, नए काग़ज़ नहीं, सिर्फ़ रखरखाव कर सकते हैं। और मैं हर तीसरे दिन आकर देखूँगा।”
भीड़ में फुसफुसाहट फैली। मैंने देखा उस्ताद की आँखें तंग हुईं, पर उन्होंने कुछ नहीं कहा।
“लाइसेंस निलंबित का मतलब क्या है, भाई?” नसीमा बाई ने पूछा। “ये बेटा मेरी तराज़ू का पलड़ा जोड़ रहा था। अब नहीं जोड़ेगा?”
“मैंने ये नहीं कहा,” सिपाही ने कहा, थोड़ा झुंझलाकर। “मैंने कहा — नए काम नहीं।”
“तो जोड़ केंद्र?” भोला भाई ने पूछा।
“उस पर मैं कुछ नहीं कहूँगा,” सिपाही ने कहा। “वो मेरे काग़ज़ में नहीं है।”
“तो जोड़ केंद्र चलता रहेगा,” मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में खुद मुझे हल्की हँसी सुनाई दी। “अच्छी बात है। क्योंकि मेरा असली काम तो वही है। साइकिल तो बहाना है।”
सिपाही ने मेरी तरफ़ देखा। इस बार उसकी आँखों में कुछ और था — थोड़ी शर्म, थोड़ी थकान।
“अंकुश यादव,” उसने कहा, धीमे से, ताकि सिर्फ़ मैं सुनूँ, “मैं आपका दुश्मन नहीं हूँ। मुझे हुक्म मिलता है, मैं करता हूँ। पर एक बात कहूँ?”
“कहिए।”
“आपके काग़ज़ में दम है,” उसने कहा। “पर दम काग़ज़ में नहीं, उसमें होता है जो उसे सही वक़्त पर सही आदमी के सामने रखता है।” उसने मीरा की तरफ़ देखा। “आज आपने सही वक़्त पर रखा। कल नहीं रख पाते।”
वो मुड़ा और जाने लगा। फिर रुका और पीछे मुड़कर बोला — “और वो ताला — वो मैं वापस ले जा रहा हूँ।”
उसने ताला थैले में रखा और भीड़ के बीच से निकल गया। मैंने देखा कि जाते वक़्त उसने दुबे अंकल को देखा और उनकी तरफ़ सिर हिलाया। दुबे अंकल ने भी। कोई शब्द नहीं, बस दो आदमी और एक इशारा।
भीड़ ढीली पड़ने लगी। नसीमा बाई ने कहा, “अच्छा हुआ, अच्छा हुआ,” और अपनी दुकान की तरफ़ चलीं। भोला भाई ने प्लेटें समेटीं। रज़िया ने शबनम आपा का हाथ छोड़ते वक़्त एक पल ज़्यादा पकड़े रखा, फिर छोड़ा।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो कैमरा बंद कर रही थी और उसके हाथ काँप रहे थे।
“क्या हुआ?” मैंने पूछा।
“मुझे नहीं पता,” उसने कहा। “इतनी आसानी से नहीं होना चाहिए था। इतनी आसानी से कुछ नहीं होता।”
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