The Mysterious Bell – Chapter 872
“मुझे दिखा,” मीरा ने कहा। “वो रसीद जैसी चीज़ है। लाल कपड़े में लिपटी।”
चिंटू ज़ोर से हँसा। हम सबने उसकी तरफ़ देखा।
“मतलब अब चाबी की ज़रूरत नहीं,” उसने कहा, हँसी रोकते हुए। “अब हमें बस एक लंबी छड़ी चाहिए।”
“इतनी आसान नहीं,” मैंने कहा।
“क्यों?”
“क्योंकि जिसे हम छड़ी से निकालेंगे, उसे कोई और चलाकर अंदर रख सकता है। और फिर हम पर चोरी का इल्ज़ाम आ जाएगा।”
“तो क्या करें?”
“चलाकर निकलेंगे,” मैंने कहा। “और मीरा का कैमरा पीछे खड़ा रहेगा।”
रफ़ीक़ ने पलक झपकते ही अपने पीछे से एक पुरानी साइकिल की छड़ी निकाल दी। लोहे की पतली, टेढ़ी, एक सिरे पर मुड़ी हुई छड़ी — जो साइकिल के पुराने सामान में पड़ी रह गई थी।
मैंने उसे देखा। “ये कहाँ से?”
“पीछे की गली में पड़ी थी,” रफ़ीक़ ने कहा, गर्व से। “मैंने सोचा काम आएगी।”
“तू तो हमारे दल का सबसे समझदार आदमी निकला,” मैंने कहा। “ये छड़ी आज रसीद निकालेगी।”
मीरा ने उस छड़ी के सिरे पर चिपकाने के लिए च्युइंग गम निकाली, फिर सोचकर रख दी। “नहीं, गम से काग़ज़ फटेगा।”
“फिर क्या?”
सानिया ने अपने बालों से एक रबर बैंड निकाला। “ये।”
“ये क्यों?”
“क्योंकि ये काग़ज़ को पकड़ लेगा, और छोड़ेगा भी,” उसने कहा। “गम नहीं लगेगा।”
हम सब सानिया की तरफ़ देखने लगे। चिंटू ने उसके कंधे पर हाथ रखा और बोला, “तू हमारे दल की सबसे तेज़ दिमाग़ है।”
“पता है,” सानिया ने कहा।
रफ़ीक़ ने छड़ी का सिरा खिड़की के छेद से अंदर डाला। गुड्डू दूसरे छेद से देखते हुए रास्ता बता रहा था।
“थोड़ा और आगे,” वो कह रहा था। “अब ठीक। अब ऊपर। अब ज़रा दाईं तरफ़।”
छड़ी हिल रही थी। मैंने रफ़ीक़ का हाथ थामा, ताकि छड़ी खिड़की के काँच पर न लगे।
“धीरे,” मैंने कहा। “एक आवाज़ हुई तो मुंशी भागकर आएगा।”
“मुंशी तो अभी दफ़्तर में बैठा है,” मीरा ने कहा। “पर उसकी नज़र कभी कान से कम नहीं होती।”
फिर — एक हल्की-सी सरसराहट। छड़ी का सिरा रसीद के कपड़े के नीचे फिसला। रफ़ीक़ ने खींचा।
“आ गई,” गुड्डू ने कहा। “आ गई। पकड़ लिया।”
हम सबने साँस रोक ली। रफ़ीक़ ने धीरे-धीरे छड़ी बाहर निकाली। छड़ी के सिरे पर एक लाल कपड़े में लिपटी चीज़ झूल रही थी। कपड़ा हल्का फटा, किनारों से पीला पड़ा था, और उसे छूते ही उसमें से धूल उड़ी — सूखी, बासी, पुराने काग़ज़ों की धूल।
रफ़ीक़ ने उसे मेरी तरफ़ बढ़ाया। मैंने दोनों हाथों से पकड़ा। कपड़ा बहुत हल्का था, पर काग़ज़ भारी था। जैसे लपेटने वाला कपड़ा वक़्त के साथ हल्का हो गया, पर अंदर का सच भारी हो गया।
मैंने कपड़ा खोला।
अंदर एक पुरानी रसीद थी — नीली स्याही, टूटे किनारे, ऊपर एक गोल मोहर जो आधी घिस चुकी थी। रसीद की भाषा सरकारी थी, पर जो लिखा था वो साफ़ था। मैंने पढ़ा।
“ये गुमटी की ज़मीन का पुराना किराया है,” मैंने धीरे से कहा। “और ऊपर नगरपालिका की मोहर है।”
मीरा ने पास आकर मेरे कंधे के ऊपर से पढ़ा। फिर उसकी साँस तेज़ हुई।
“इसमें लिखा है,” उसने कहा, “कि ये ज़मीन नगरपालिका की नहीं, बल्कि किराये पर दी हुई है — पचास साल के लिए, खेलू के पिता के नाम।”
“खेलू?” मैंने पूछा।
“हाँ,” उसने कहा। “खेलू! वही खेलू, अंकुश! जो हमारी गली की चबूतरी पर बैठता है!”
मेरे हाथ रुक गए। मुझे अपनी गली का वो बूढ़ा याद आया — सफ़ेद दाढ़ी, पीली पगड़ी, और जेब में वो पीली पुड़िया जो कभी खोली नहीं गई थी। मुझे याद आया कि बबलू जब भी चबूतरी पर चढ़ता, खेलू काका उठकर अपने घर की तरफ़ चले जाते। सब सोचते थे बूढ़ा है, बैठ नहीं पाता। अब समझ आया कि वो बैठ नहीं पाते थे — वो बबलू के सामने बैठना नहीं चाहते थे।
“यानी बबलू का दावा,” सानिया ने कहा, कॉपी में कुछ लिखते हुए, “कि गुमटी की ज़मीन नगरपालिका की है — वो इस काग़ज़ से काग़ज़ी तौर पर गलत हो जाता है।”
“हाँ,” मीरा ने कहा। “सिर्फ़ गुमटी नहीं, बल्कि पूरी गली की ज़मीन का बुना हुआ धागा इसी रसीद से जुड़ सकता है। अगर यह पचास साल का किराया है, तो कोई इसे बार-बार बढ़ा नहीं सकता। और जिसने इसे आज के काग़ज़ में बदल दिया — उसका पूरा काग़ज़ झूठा हो जाएगा।”
मैंने रसीद मोड़कर अपनी जेब में रख दी। मेरे सीने में एक अलग-सी गर्मी फैल रही थी — वो गर्मी जो चीज़ें जुड़ने के वक़्त आती है, पर मुझे घंटी नहीं बजी थी। ये सिर्फ़ मेरा जानना था, मेरा उम्मीद करना। घंटी से जोड़ने वाला काम अभी बाकी था।
तभी — मैंने पीछे से जूतों की आवाज़ सुनी। सख़्त, साफ़, तेज़ — जैसे कोई दौड़ा नहीं, पर चला ज़रूर तेज़ी से आ रहा है। मैंने पलटकर देखा।
गली के मुँह पर एक आदमी खड़ा था। पैंतीस-चालीस के बीच, सफ़ेद कुर्ता, पर जेब पर कोई मोहर नहीं। हाथ में मोबाइल, कैमरा चालू। उसने हमें देखा। फिर उसकी नज़र मेरी जेब पर गई। मेरी जेब में रसीद थी और जेब का कोना बाहर झाँक रहा था।
“वो क्या है?” उसने पूछा।
“क्या?” मैंने कहा।
“जो तुमने जेब में रखा है।”
“जेब की चीज़,” मैंने कहा। “जेब की चीज़ किसी और को क्यों चाहिए?”
वो दो कदम आगे आया। उसके साथ दूसरा आदमी भी था, जो पहले नहीं दिखा था। वो दुबला था और उसके हाथ में भी मोबाइल था — कैमरा चालू, हल्का झुका हुआ।
“हमें सिर्फ़ एक तस्वीर चाहिए,” पहला आदमी बोला। “कोई छुएगा नहीं। सिर्फ़ देखेंगे।”
“किसके लिए?”
“चंद्रेश सक्सेना साहब के लिए,” उसने कहा।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने अपना कैमरा नीचे कर लिया था। उसकी आँखों में वही भाव था जो मुझे पसंद है — शिकारी की तरह, जब शिकार बदल जाए और वो समझ जाए कि अब वो नहीं, मैं हूँ।
“तस्वीर चाहिए?” मीरा ने कहा। “ये लो।” और उसने अपना कैमरा ऊपर उठाकर उस आदमी की तस्वीर ले ली।
वो चौंका।
“ये क्यों?” उसने पूछा।
“क्योंकि मुझे भी एक तस्वीर चाहिए थी,” मीरा ने कहा। “यही चीज़ जो अभी हुई। आज शाम की सभा में दिखाऊँगी।”
वो दोनों आदमी एक-दूसरे की तरफ़ देखने लगे। फिर पहले ने मोबाइल जेब में रखा, हाथ पीछे किए, और बोला, “अच्छा।”
“अच्छा?” मैंने कहा।
“अभी तुम जाओ,” उसने कहा। “हम आएँगे।”
“कब?”
“जब समय होगा।”
वो दोनों पलटकर चले गए। उनके जाने के बाद गली में कुछ पल के लिए सन्नाटा रहा। चिंटू ने पहली बार खाँसी रोकी और बोला, “ये जासूसों जैसे आदमी क्यों आते हैं हर बात में?”
“क्योंकि वो जासूस नहीं हैं,” मीरा ने कहा। “वो काग़ज़ के पीछे भागने वाले हैं।”
“फ़र्क़ क्या है?”
“जासूस सच ढूँढता है,” मीरा ने कहा। “ये लोग सच को पहले पकड़ते हैं, ताकि उसे दबा सकें।”
मैंने गुड्डू की तरफ़ देखा। वो खिड़की के नीचे खड़ा था, हाथ में रबर बैंड, चेहरे पर पसीना और आँखों में जीत।
“तू ठीक है?” मैंने पूछा।
“हाँ,” उसने कहा। “पर उस्ताद, एक बात पूछूँ?”
“पूछ।”
“जब हमने वो रसीद निकाली, तो अंदर से एक आवाज़ आई थी — जैसे काग़ज़ खिसका हो।”
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
“तूने क्यों नहीं बताया?”
“मैंने सोचा कि छड़ी की आवाज़ होगी,” उसने कहा। “पर छड़ी तो बाहर थी। और आवाज़ अंदर से आई थी।”
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
“अंकुश,” उसने धीरे से कहा, “कहीं उस कमरे में कोई और भी हो?”
मैंने दरवाज़े की तरफ़ देखा। ज़ंग लगा ताला अभी भी वैसे ही लटक रहा था। कोई हिला नहीं था। कोई दरवाज़ा नहीं खुला।
“नहीं,” मैंने कहा। “ताला बंद है।”
“तो आवाज़ किसकी?”
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