The Mysterious Bell – Chapter 865
“ये,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ सपाट थी, “ये शिकायत वकील चंद्रेश सक्सेना के दफ़्तर से लिखवाई गई है।”
वो नाम सुनते ही भीड़ में फुसफुसाहट फैल गई। किसी ने कहा, “यही तो वो है जो ज़मीन के काग़ज़ में लाल अंगूठा लगवाता है।”
शबनम आपा पास आईं। उन्होंने उस काग़ज़ को अपने हाथ में लिया, उसे हवा की तरफ़ उठाया, फिर उसे सूँघा, फिर उन्होंने अपनी उँगली से उसकी स्याही रगड़ी।
और फिर उन्होंने अपनी चिमटी उठा ली।
“ये काग़ज़ पुराना नहीं है,” उन्होंने कहा।
सिपाही ने उनकी तरफ़ देखा।
“ये आज सुबह का बना है,” शबनम आपा ने कहा। “मैं चाय के साथ काग़ज़ पकड़ती हूँ, साहब। पुराने काग़ज़ की स्याही सूखकर पीली पड़ जाती है और उस पर धूल जम जाती है। यहाँ स्याही अभी गाढ़ी है और उँगली पर लग रही है। इसे लिखने वाला सुबह चार बजे बैठा होगा, तेरे आने से पहले।”
सिपाही कुछ नहीं बोला। उसने अपनी गर्दन तिरछी की और उसने धीरे से, बहुत धीरे से कहा, “मुझे तो बस देने को दिया गया है।”
“साफ़-साफ़ कह,” मैंने कहा। “अब क्या होगा?”
सिपाही ने नीचे ज़मीन देखी। फिर उसने धीरे से कहा, “कल सुबह ग्यारह बजे दुकान पर सील लगाई जाएगी।”
दुकान पर सील।
पूरी गली ने सुना। और पूरी गली एक साथ चुप हो गई। वो चुप्पी मेरे कानों में उस मशीन की आवाज़ से भी ज़्यादा ज़ोर से बजी।
मैंने मज़ाक करने की कोशिश की। मैंने मुँह खोला, कुछ कहना चाहा — शायद ये कि “भाई, सील लगाओगे तो मैं साइकिल कहाँ बनाऊँगा, छत पर?” — पर मुँह से आवाज़ नहीं निकली।
मैंने अपनी उँगलियाँ देखीं।
ग्रीस लगी उँगलियाँ।
इन्हीं उँगलियों से मैंने पिछले महीने गिरधारी और मोहन की साइकिल जोड़ी थी, जिससे दो भाइयों की पंद्रह साल की दूरी मिटी थी। इन्हीं उँगलियों से मैंने उस बूढ़े की सीट की रॉड कसी थी जो रोज़ अपनी औरत को अस्पताल ले जाता है। इन्हीं उँगलियों से मैंने टिंकू को रिंच पकड़ना सिखाया था।
और अब यही उँगलियाँ मेरी मेज़ पर पड़ी थीं, और मेरी हँसी पहली बार छोटी पड़ गई।
छोटी, पतली, और अंदर गहरी।
तुम सोच रहे होगे कि मैं डर गया। हाँ, डर गया। पर डर वो नहीं था जो तुम सोचते हो। मुझे सील से डर नहीं लगा। मुझे इस बात से डर लगा कि जिस काग़ज़ से मैं लड़ रहा था, वो भी आख़िर में काग़ज़ ही था — और मेरे हाथ में काग़ज़ नहीं, सिर्फ़ ग्रीस थी।
मीरा ने नोटिस मुझसे ले लिया।
“इसमें शिकायतकर्ता का नाम नहीं है,” उसने कहा। “बस दफ़्तार की मुहर है और वकील का हस्ताक्षर। इसका मतलब है कि शिकायत करने वाला कोई है ही नहीं। इसे सिर्फ़ लिखा गया है। लिखवाया गया है।”
“तो लड़ेंगे,” मैंने कहा।
“कैसे?” शबनम आपा ने कहा। “अभी तक तो तेरे पास भी काग़ज़ नहीं था, अब ये नया काग़ज़ आ गया।”
“तो हमारे पास भी दो काग़ज़ हैं,” मैंने कहा। “रसीद और रजिस्टर।”
“और वो दो काग़ज़ इस शिकायत को काटेंगे नहीं,” मीरा ने कहा। “क्योंकि ये शिकायत ज़मीन के बारे में नहीं है। ये मेरी दुकान के काम के बारे में है। वो सीधे तुझे नहीं मार रहा, अंकुश। वो तेरी दुकान मार रहा है। क्योंकि दुकान रहेगी तो तू रहेगा। और तू रहा तो ये गली जुड़ी रहेगी।”
मैंने सिर हिलाया।
हबीब चाचा आगे आए। उन्होंने सिपाही की तरफ़ देखा और कहा, “बेटा, तू तो रोज़ यहाँ से गुज़रता है। तू जानता है ये दुकान क्या है।”
सिपाही ने अपनी आँखें नीची रखीं।
“चाचा,” उसने कहा, “मैं सिपाही हूँ, काग़ज़ लाने वाला। मैं काग़ज़ बनाने वाला नहीं हूँ।”
वो मुड़ा और जाने लगा। फिर वो रुका।
और मैंने देखा कि उसकी पीठ कस गई।
उसने मुड़कर मेरी तरफ़ देखा। उसका चेहरा बदल गया था — अब वो सिर्फ़ काग़ज़ लाने वाला नहीं था, अब वो कुछ और था।
“अंकुश यादव,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ धीमी थी, “एक बात और कहनी है।”
“कहो,” मैंने कहा।
“ये नोटिस देने से पहले मुझे साहब के दफ़्तार से फोन आया था,” उसने कहा। “और उसमें ये भी कहा गया था कि…”
वो रुका। उसने पूरी गली को देखा — शबनम आपा को चिमटी पकड़े, रज़िया को, उस्ताद को, कौशल्या दादी को, हबीब चाचा को, भोला भाई को, नसीमा बाई को, माँ को बैसाखी पकड़े, काजल को, बच्चों को, मीरा को।
फिर उसने मेरी तरफ़ देखा।
“साहब ने कहा है,” उसने कहा, “कि कल सील के वक़्त तू अकेला नहीं मिलना चाहिए।”
मैं ठिठक गया।
“मतलब?” मैंने पूछा।
उसने अपना सिर हिलाया, जैसे वो खुद भी उस वाक्य को समझने की कोशिश कर रहा हो।
“मतलब ये,” उसने कहा, “कि जब मैं कल सुबह ग्यारह बजे सील लगाने आऊँ, तो तू अकेला खड़ा न मिले।”
वो एक पल रुका।
“पूरी गली रोती हुई मिले।”
और वो चला गया।
पूरी गली एक साथ खड़ी रही, और किसी ने कुछ नहीं कहा।
मैंने धीरे से घंटी जेब से निकाली और उसे हथेली में रखकर देखा।
वो चुप थी।
इतनी चुप, जैसे उसे भी सुनना हो कि अब क्या होगा।
॥
वो सिपाही गया, और गली वैसे ही खड़ी रही, जैसे किसी ने पूरे मोहल्ले को एक ही जगह गाड़ दिया हो।
शबनम आपा के हाथ में चिमटी थी, और चिमटी का सिरा काँप रहा था। रज़िया उनके पीछे खड़ी थी और उनका हाथ पकड़े हुई थी, जैसे कहीं शबनम आपा गिर न जाएँ।
उस्ताद अली बक्श ने अपना चश्मा उतारा। बिना चश्मे के उनका चेहरा और भी पुराना लग रहा था, जैसे किसी पुराने काग़ज़ पर से स्याही उतर गई हो।
हबीब चाचा ने अपनी लाठी ज़मीन पर टिकाई और कहा, “बेटा, अब क्या?”
मैंने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि सच यह था कि मेरे पास कुछ नहीं था। नोटिस मीरा के हाथ में था, और मेरे हाथ में सिर्फ़ ग्रीस थी।
तब माँ ने कहा। माँ बैसाखी पर टिकी खड़ी थीं, काजल उनका हाथ पकड़े हुए थी, और उनकी आवाज़ वैसी थी जैसे कोई चूल्हा जला रहा हो — धीमी, पर साफ़।
“शाम को पीपल के नीचे सब आ जाओ,” उन्होंने कहा। “सब। कोई नहीं छूटेगा। बच्चे भी आएँगे।”
“क्यों?” मैंने पूछा।
“क्योंकि,” माँ ने कहा, “जो आदमी चाहता है कि कल सील के वक़्त हम सब रोते हुए मिलें, तो आज शाम हमें ऐसे मिलना है कि वो सो न सके।”
कौशल्या दादी ने अपनी लाठी की गोली ज़मीन पर टकराई। टक। एक ही टक।
“ठीक कहा,” उन्होंने कहा।
और इस तरह, दस बजे की उस धूप में, पीपल के नीचे शाम की सभा तय हो गई।
शाम छह बजे।
पीपल के नीचे लालटेनें जल रही थीं, और उनकी पीली रोशनी में पूरी गली का चेहरा दिख रहा था — और मैं तुम्हें सच बता रहा हूँ, ऐसा चेहरा मैंने पहले कभी नहीं देखा था। न डर, न गुस्सा। बस एक तरह की थकान, जो बहुत दिनों की हो।
शबनम आपा बड़ी केतली लेकर आई थीं और कप बाँटे जा रहे थे। रज़िया कप धो रही थी गुमटी के टब में। भोला भाई एक कोने में खड़े थे, और उनकी बीवी की बैसाखी उनके हाथ में थी — वो खुद ले आए थे। नसीमा बाई अपने बेटे साजिद के साथ बैठी थीं। हबीब चाचा पत्थर पर बैठे थे और उनके साथ उनका बेटा इमरान खड़ा था, जो आज साइट से जल्दी लौट आया था।
कौशल्या दादी एक सिरे पर बैठीं, और शांति देवी दूसरे सिरे पर। दोनों के बीच पत्थर की चबूतरी थी, और उस पर पुरानी चादर बिछी थी।
उस्ताद अली बक्श अपनी दुकान से एक लकड़ी का स्टूल उठाकर लाए थे। याकूब उनके बगल में बैठा था, अपना थैला घुटनों पर रखे।
और बच्चे — टिंकू, सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू — सब पीपल की जड़ पर बैठे थे। सानिया के हाथ में उसकी लाल कवर कॉपी थी, जिसमें वो सब कुछ लिखती थी। चिंटू जैसे-जैसे बड़े बोलते, अपनी उँगली से हवा में कुछ बनाता रहा।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno