The Mysterious Bell – Chapter 828
वो तस्वीर के पास आईं। लालटेन उनके चेहरे पर पड़ रही थी, और उसकी रोशनी में उनकी आँखें दो गड्ढे जैसी लग रही थीं।
उन्होंने उँगली उठाई और सफ़ेद कुर्ते वाले आदमी पर रखी।
“ये,” उन्होंने कहा। आवाज़ काँप रही थी, पर टूट नहीं रही थी। “यही आदमी उस आग की रात इलाही बक्श के पास आया था। यही आदमी आग के तीसरे दिन पूरे बाज़ार में ये बात फैलाने लगा कि इलाही ने रात में काग़ज़ बदल दिए थे — कि इलाही ने अपने फ़ायदे के लिए सातों अंगूठों वाला काग़ज़ बदला।”
उस्ताद की कैंची उनके हाथ में काँपी।
“और यही आदमी,” दादी ने कहा, और उन्होंने तस्वीर के आगे झुककर उस चेहरे को देखा, “आज सुबह अस्पताल की सीढ़ी पर बड़ी काली चाबी लेकर खड़ा था।”
गली में सन्नाटा छा गया। असली सन्नाटा। जिसमें तुम अपनी साँस तक सुन सकते हो।
“कौशल्या आपा,” याकूब ने धीरे से कहा, “आप ठीक से देख लो।”
“मैंने उसे देख लिया है,” दादी ने कहा। “पचास साल पहले भी यही इतना ही बूढ़ा था।”
किसी ने कुछ नहीं कहा।
“पचास साल पहले ये इतना ही बूढ़ा था,” दादी ने फिर कहा, इस बार ज़ोर देकर, जैसे खुद को भी यक़ीन दिला रही हों। “और बीस साल पहले ज़ुबैर की तस्वीर में भी यही इतना ही बूढ़ा है। मैं जानती हूँ ये कैसा लगता है, ज़ुबैर। कि आदमी बूढ़ा नहीं होता, सिर्फ़ उसका काम बढ़ता जाता है।”
मैंने तस्वीर देखी।
सफ़ेद कुर्ता। सफ़ेद जूते। बिना चेहरा।
और मुझे याद आया — वो लकड़ी के जूते। वो एक ही आवाज़। खड़ाऊँ का निशान। चौखट पर, सूखी नाली में, अस्पताल की पिछली दीवार के पास।
“दादी,” मैंने कहा, “इसके जूते — लकड़ी के हैं?”
दादी ने मेरी तरफ़ देखा। और एक पल के लिए उनके चेहरे पर कुछ ऐसा आया जैसे कोई बूढ़ा आदमी याद कर रहा हो कि उसने दरवाज़े में चाबी लगाई थी या नहीं।
“हाँ,” उन्होंने कहा। “लकड़ी के। और उनकी आवाज़… उनकी आवाज़ किसी सीटी जैसी थी। जैसे कोई नीचे से घरघराता हो।”
शांति देवी तब तक चुप बैठी थीं। उनके हाथ में रफ़ीक़ का वो काग़ज़ था — रणवीर का हाथ से बनाया नक़्शा, जिस पर पूरी गली, अस्पताल, बाज़ार और झुग्गी एक लाल घेरे में बंद थी। उन्होंने उसे धीरे से खोला और उस जगह पर उँगली रखी जहाँ मुझे आज शाम मोहर के नीचे सात नाम मिले थे और आठवीं लाइन खाली पड़ी थी।
“देखो,” उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ रूखी थी, पर उसमें वो चीज़ थी जो काग़ज़ों के साथ लंबे समय तक बैठने से आती है। “यहाँ नाम नहीं है।”
“हाँ, खाली है,” मीरा ने कहा। “लाइन खींची है, नाम नहीं लिखा।”
“नहीं, मेरी बात ध्यान से सुनो,” शांति देवी ने कहा। “आठवीं जगह पर नाम नहीं है, अंगूठा है।”
मैंने नक़्शे को उनके हाथ से लिया और लालटेन के नीचे झुकाकर देखा।
मोहर के नीचे की लकीरें धुँधली थीं, काग़ज़ पुराना था, स्याही बह चुकी थी — पर सच कहूँ, अगर शांति देवी न कहतीं, तो मैं उसे कभी नहीं पहचानता। सात नामों के नीचे, आठवीं लकीर के आगे, एक गोल धुँधला निशान था। स्याही का धब्बा नहीं। धब्बे का आकार गोल होता है, बराबर होता है। यह निशान नीचे से चौड़ा था, ऊपर पतला, बीच में हल्का खुला।
अंगूठा।
“जिस दिन यह काग़ज़ बना,” शांति देवी ने कहा, “उस दिन सात लोगों ने अपना नाम लिखवाया। और यह आदमी उन सात के पीछे खड़ा रहा। उसने सातों के हाथ पकड़े, सातों को कहा कि यहाँ अंगूठा लगाओ। और जब आख़िरी लकीर आई, तो उसने उसमें अपना नाम नहीं लिखवाया। सिर्फ़ अंगूठा लगाया।”
“क्यों?” टिंकू ने पूछा। वो मेरी कमर से चिपका खड़ा था, और उसकी आवाज़ में वो डर था जो बच्चों की आवाज़ में सबसे पहले आता है और सबसे आख़िर में जाता है।
शांति देवी ने उसकी तरफ़ देखा और कुछ देर चुप रहीं।
“क्योंकि जिसका नाम होता है, वो पकड़ा जाता है,” उन्होंने कहा। “और जिसका सिर्फ़ अंगूठा हो, उसे कोई नहीं पकड़ता। नाम बोलते ही आदमी सामने आ जाता है, बेटा। अंगूठा चुप रहता है।”
मैंने नक़्शे को पलटा।
पीछे की तरफ़ भी काग़ज़ ही था — सादा, पीला, हल्का। पर उस पर पुरानी स्याही में कुछ बना हुआ था।
मैंने लालटेन और करीब की।
और मेरा हाथ रुक गया।
वो इमारत थी।
नूर अस्पताल।
मैं इसे पहचान गया — वो ऊँची छत, वो पीली दीवार, वो छोटी-छोटी खिड़कियाँ जो आज टूटी हैं पर आज भी उसी तरह की हैं। पर स्याही में बनी इमारत में एक चीज़ ऐसी थी जो आज नहीं है।
चार दरवाज़े।
नीचे की मंज़िल पर चार चौकोर दरवाज़े बने थे।
“ये तीन दरवाज़े तो हैं,” मीरा ने कहा, कैमरा करीब लाकर। “मुख्य दरवाज़ा, दवा की खिड़की के पास वाला, और पीछे फाटक वाला। पर चौथा?”
“चौथा दवाइयों के पुराने कोठे के पीछे है,” कौशल्या दादी ने कहा।
वो इतनी धीमी आवाज़ में बोलीं कि मुझे लगा कि वो चिल्ला रही हैं।
“और वो चौथा दरवाज़ा ईंट से बंद कर दिया गया है। किसी ने नहीं, मैंने किया है। मेरे ही हाथों से।”
मैंने उनकी तरफ़ देखा। दादी की लाठी ज़मीन पर थी और उसकी लोहे की गोली खड़खड़ा रही थी, क्योंकि उनके हाथ काँप रहे थे।
“दादी,” मैंने धीरे से कहा, “आपने क्यों बंद किया?”
उन्होंने आँखें बंद कीं।
“क्योंकि उस रात के बाद, उस दरवाज़े से होकर कोई आने-जाने लगा था। और मैं गली की सबसे बूढ़ी औरत थी। मुझे यह सोचने का हक़ नहीं था कि कौन आ रहा है — मुझे बस यह हक़ था कि कोई और न आए।”
“दादी,” मैंने कहा, और मेरी आवाज़ अब मेरी अपनी नहीं लग रही थी, “वो बड़ी चाबी — जो सफ़ेद कुर्ते वाले के हाथ में है — वो किस दरवाज़े की है?”
कौशल्या दादी ने आँखें खोलीं।
और इस बार उनकी आँखों में वो चीज़ नहीं थी जो पाँच मिनट पहले थी। इस बार डर था।
“उसीकी,” उन्होंने कहा।
गली में हवा चली और पीपल का पूरा पेड़ एक साथ हिला।
“और वो दरवाज़ा,” दादी ने कहा, और अब उनकी आवाज़ फुसफुसाहट बन गई थी, “नीचे से होकर पीछे की गली में निकलता है। तहखाने से होकर। सीढ़ियाँ उतरती हैं, और फिर एक सूखी नाली से… और फिर ठीक उस जगह पर आता है जहाँ अब…”
वो रुकीं।
और मुझे पहले से पता था कि वो क्या कहेंगी। मुझे पहले से पता था, क्योंकि घंटी ने पिछली रात मुझे ठीक इसी की तरफ़ इशारा किया था — कि घर का एक दरवाज़ा गली की तरफ़ खुलता है और दूसरा कहीं और।
“कहाँ, दादी?” मीरा ने कहा। “कहाँ आता है?”
“जहाँ अब अंकुश का घर बना है,” दादी ने कहा। “ठीक उसकी रसोई के पीछे। जहाँ चूल्हा जलता है।”
मैं वहीं खड़ा रह गया।
मुझे अपने घर की वो जगह याद आई — चूल्हे के पीछे वाला वो पुराना बंद दरवाज़ा। तीन बार पेंट चढ़ा। ज़ंग लगा कुंडा। माँ ने कहा था, आज रात मत खोलना। घंटी ने कहा था, दो तरफ़ का दरवाज़ा।
मैंने जेब से घंटी निकाली और उसे अपनी हथेली में रखा।
और मुझे लगा — बहुत हल्का सा — कि ठंडे पीतल के भीतर कहीं, बहुत गहरे, एक तार फिर खिंचा। एक बार। फिर नहीं।
टिंकू ने मेरी कमीज़ खींची।
“उस्ताद।”
“हाँ।”
“उस्ताद, मैं…”
मैंने मुड़कर देखा।
टिंकू का चेहरा गीला था। वो रो रहा था — बिना आवाज़, जैसे बच्चे रोते हैं जब उन्हें लगता है कि रोना गुनाह है। उसकी दाहिनी हथेली पर वो जला हुआ निशान था, जो मंच पर उसने सबको दिखाया था और जिसके बाद पूरा मैदान हँस पड़ा था।
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